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Showing posts with the label तुम कहां गए

तुम कहा गए ? 30

    एक दौर ऐसा भी गुजरा था, जब तुम लिखा करते थे, और मैं पढ़ा करती थी। या यूं कहो बस पढ़ लिया करती थी। मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई रूहानी या फिर कोई रोमांटिक जज्बात न थे। अब ऐसे में तुम्हारा लिखा कुछ भी, कैसे भी, सामने आता तो मैं उसे बस पढ़ लिया करती थी।    बिना किसी संवेदना के, बिना किसी भाव के। प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात है मैं तो उसे कुछ पल से अधिक याद भी नहीं रख पाती थी। यदि किसी भी अभिव्यक्ति के लिए मैं पत्थर दिल थी, तो फिर बताओ, ऐसे में मैं भला तुम्हें इबादत करने से कैसे रोक सकती थी . . . कैसे कहें अब तुमसे, हम तुम्हारी इबादत के काबिल नहीं, जब खुद को पत्थर बना लिया हमने। . . . रुक रुक कर चलती है, कुछ इस तरह से जिंदगी मेरी। वफाओं की तो अब बात नहीं, खामोश लबों से भी भला, कोई दुआ निकलती है कभी। तेरी निगाहों ने भी देखा होगा वो मंजर, कि सजदे में आकर भी, कोई मुराद पूरी होती नहीं ।। . . . कोई और ही शख्स था तेरे अंदर, जो जीता रहा अपनी जिंदगी, सहेज खुद मेरी यादों को, हर रोज मिटाता रहा यादें तेरी।।       मैने लिखा न कि तुम रूहानी, रोमांटिक औ...

तुम कहां गए ? 29

   जहां तक मैं जानती हूं, तुम एक अति संवेदनशील इंसान थे। भावनाएं तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण थी। और उनकी अभिव्यक्ति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण थी। तुमने अपनी समस्त भावनाओं को मुझसे व्यक्त किया या करना चाहा। शायद यह सोच कर कि मैं उन्हें समझूंगी, या फिर समझने का प्रयत्न करूंगी।     लेकिन मैंने कभी भी प्रत्यक्षत: तुम्हें यह ज्ञात नहीं होने दिया कि मैं किस हद तक और किस ऊंचाई तक तुम्हारी भावनाओं को देखती हूं। उनका सम्मान करती हूं ।      कभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, और तुमने मुझे बेहद ही प्रैक्टिकल इंसान समझा। बस यहीं भूल कर गए तुम। तो फिर बताओ मुझे खुद से अधिक समझने का दावा करने वाले तुम, हां तुम ! मुझे समझ ही कहां पाए ?      जैसा कि मैं हमेशा भ्रम में रही कि मैं अपनी जिंदगी जी रही हूं, ठीक वैसा ही भ्रम तुमने भी तो अपने मन में मेरे लिए सजों रखा था।      संवेदनाएं आहत हुई, मुखर भावनाएं टूटी, तुम्हारी आंखें सजल हुई और भरी आंखों से तुमने मुझे देखा। और तुम्हें बस मेरी धुंधली सी तस्वीर नजर आई, इतनी कि तुम खुद भी भ्रम में पड़ गए। मुझ...

तुम कहां गए ? 28

    हृदय के मानसरोवर में तुम्हारी मनमोहक पावन प्रांजली मूर्ति स्थापित करने के बाद अब उसी में विसर्जित करने का क्या समय आ गया है, मेरे दोस्त?     कर भी दूं तो कैसे ? फिर इस सुने मन में क्या शेष रह जायेगा ?      मैं नहीं जानती कि इस सृष्टि का अभ्युदय कब हुआ और उसका विनाश कब होगा। लेकिन वे पल मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है जो मैंने तुम्हारे साथ गुजारे या तुम्हारे निकट होते हुए भी तुमसे दूर रहकर।       तुमसे प्रथम मिलन का वह पल मेरे लिए कोई विस्मयकारी नहीं था। मुझे उत्तेजित नहीं कर पाया। और न ही आश्चर्यचकित करने वाला था। हो भी तो क्यों तुम जैसे साधारण व्यक्ति से मिलना विस्मयकारी, उत्तेजक और आश्चर्यचकित करने वाला कैसे हो सकता था भला !!     यह कैसे लिख दूं कि तुमने एक रिश्ते का परित्याग किया जबकि तुमने मुझसे कोई रिश्ता बनाया ही नहीं ; यह भी कैसे लिख दूं कि तुम मेरी नियति थे, मेरे भाग्य में लिखे थे! होते तो आज इतनी दूर कैसे चले जाते । तुमने त्याग किया और मैंने उसे स्वीकार किया। सहर्ष न सही आंखों में आंसू लेकर भी नहीं, लेकिन ...

तुम कहां गए ? 27

    लेकिन शायद उस दिन मैं तुम से अधिक खुद का ही उपहास कर रही होऊंगी। जब तुम ही ना रहोगे, तो फिर मेरी हंसी का क्या अर्थ रह जाता है? मैं तुम्हारी हंसी उड़ा कर तुम्हें विवश देखना चाहती हूं। हां सच कहूं तो मैं तुम्हें अपना जैसा बनते देखना चाहती हूं।      मैं एक आस लेकर एकटक तुम्हें देखते रहना चाहती हूं। और यह भी चाहती हूं कि तुम मुझे उसी तरह उपेक्षित करते रहो जैसा की मैंने कभी तुम्हें किया था, इतना ही विवश ! हां मेरे दोस्त।     तुम चाहकर भी मेरे किसी आस का उत्तर न दे सको, आगे बढ़ कर उसे स्वीकार न कर सको, न ही मुझे तुम गले से लगा सको। तो फिर जरा सोचो मेरे दोस्त, उस वक्त तुम्हारे दिल में क्या गुजरेगी?    बस मैं तुम्हें भी इतना ही विवश देखना  चाहती हूं, एकदम मजबूर। तब शायद उस दिन तुम्हें इस बात का एहसास होगा कि उस वक्त मेरी विवशता क्या रही होगी जब तुम किसी आस से मेरी तरफ देखते थे, और मैं तुम्हें उपेक्षित करने के लिए इतना ही मजबूर थी, जितना की उस वक्त तुम होगे? अब देखो न ! भूत, वर्तमान और भविष्य किस तरह एकाकार हो गए हैं !      हां...

तुम कहां गए 26

    अनंत ब्रह्मांड के विस्तार में यदि पृथ्वी एक कण मात्र है, तो हमारा अस्तित्व? जरा सोचो तो क्या होगा, मेरे दोस्त ? हमारा मन और उसमें उत्पन्न इच्छाएं, कितनी सार्थक और महत्वपूर्ण हो सकती हैं, तब उनका विस्तार क्या होगा?      एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए कितने आयाम पार करने होंगे? मन के इस विस्तार की जटिलता में सार्थकता क्या है? क्या कभी सोचा है तुमने?      मैंने जब भी सोचा, तो मन की सारी आतुरता, व्याकुलता और जटिलता को एक शांत सरोवर की तरह स्थिर पाया। ब्रह्मांड के अनंत विस्तार को एक अदृश्य कण में परिवर्तित होते हुए देखा।     जब मैं दिन भर के काम से फुर्सत होती हूं और तब भी जब अपने आप को थका हुआ महसूस नहीं करती , तब मैं अक्सर इन सब के बारे में सोचती हूं, और चाहती हूं कि मैं सोचते सोचते इतना थक जाऊं कि जब सब कुछ एक बिंदु में समाहित हो जाए तब मैं उसे अपने अंदर महसूस करू। एक छोटा सा बिंदु जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड का यह अनंत विस्तार समाहित है।     हम अपनी कल्पना में एक संभावना की तलाश करते हैं। संभावना ! किसी भी कार्य के ...

तुम कहां गए ? 25

     संबंधों की इतनी घनिष्ठता के बाद रिश्तो का इतना प्लेटोनिक हो जाना गले नहीं उतरा था, बेवजह की बकबक करते हुए तुम्हारा एकदम से यूं खामोश हो जना मुझे अखरने लगा था, मेरे दोस्त।    तभी तो तुम्हे सताने के लिए, तुम्हे ये एहसास दिनाने के लिए कि हां तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते, कोई महत्व नहीं रखते, मैंने भी तुम्हे दुगने भाव से उपेक्षित किया। जबकि वास्तविकता यही थी कि तुम सदैव ही मेरे अंदर ही रहे।     तुम्हारी पावन प्रांजल देवमूर्ति को मैं खुद से कभी अलग और विस्थापित नहीं कर पाई।      तुम मेरे जीवन के वह सूर्य हो जिससे निकली रश्मि किरणें जलकण से विछिन्न होकर सप्तरंगी और अद्भुत आकृत का निर्माण करती हैं, और वह इंद्रधनुष धरती के एक छोर को दूसरे छोर से मिलाता हुआ प्रतीत होता है। तुम मुझसे जब भी टकराते थे, तो यही होता था मेरे दोस्त। मैं अपने अस्तित्व के एक छोर से दूसरे छोर पर आ मिलती थी।      तुम्हारी दृष्टि ही नहीं बल्कि तुम्हारे दृष्टिकोण में भी अपनी विशिष्टता पर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती। यदि तुम पर अपना अविश्वास ज...

तुम कहां गए 24

अश्कों से भरी इन आंखों में, तेरी तस्वीर छुपा रखी है,  मिट ना जाए तू कहीं मेरी यादों से, अश्कों की दीवार बना रखी है। तुम्हें पा लेने की चाहत,  और खो देने का डर,  अपने जीवन में  यही एक,  इबारत लिखा रखी है। अब किसे रखूं मैं अपनी यादों में !! सारी यादें तेरे नाम लिखा रखी हैं। मेरी चाहत की अब ये इंतहा है, अब भी जो तू रूठा रहा तो, तेरी कब्र भी इस दिल में बना रखी है।      जानती हूं भावुकता और जज्बातों के अधीन रहते हुए जिंदगी में लिए गए निर्णय उतने सही नहीं होते हैं जितने कि हम चाहते हैं।        यदि कहूं कि मैं तुम्हें बेहद प्रेम करती हूं, तो इस में यह बात भी अंतर्निहित है कि कभी मैं तुम्हें बेहद प्यार नहीं करती थी।      यदि कहूं कि आज मैं सच कह रही हूं तो इसका एक अर्थ यह भी है कि मैंने कभी तुमसे झूठ भी कहा था। अर्थात प्रत्येक स्वविकार्य तथ्य का एक विरोधाभासी अस्वाविकार्य तथ्य पहले से मौजूद होता है।     कुछ होने या न होने के बीच का अंतर व्यापक होता है। यदि यह कहूं कि मैंने सदैव ही तुम्हें प्रेम किया है तब भी एक...

तुम कहां गए 23

    कभी सोचती हूं, तुम्हें सजा-ए-मौत लिखकर अपनी कलम तोड़ दूं।      मैं भी तुम्हें खारिज कर दूं अपनी जिंदगी से। लेकिन अगले ही पल सोचती हूं, यदि ऐसा कर दिया, तो ये सारे उलाहने, अपने दिल के सारे दर्द फिर किससे कहूंगी? किसे लिखूंगी?       मैं यह भी जानती हूं कि तुम मेरे द्वारा निर्धारित कोई भी सजा सहर्ष स्वीकार कर लोगे। तुम कहीं भी रहो मेरी बात तुम तक अवश्य पहुंचेगी, और तुम ? बड़े ही खामोशी के साथ बिना कोई सफाई दिए, वह सजा सहजता से स्वीकार कर लोगे।    वर्जनाएं आकर्षित करती हैं। सहजता और सरलता से प्राप्त कोई भी वस्तु या व्यक्ति कभी आकर्षित नहीं करता। वह दर्शनीय तो हो सकता है, किंतु आकर्षक नहीं।         यदि तुम चीखों, चिल्लाओ उत्पाद मचाओ, अपनी सफाई पेश करो, तो मैं अवश्य ही तुम्हें सजा-ए-मौत तक दे सकती हूं। लेकिन तुम्हारे लिए सहजता से स्वीकार कोई भी सजा मुझे स्वविकार्य नहीं।        तुम जहां भी रहो सुखी रहो, खुश रहो, ऐसी दुआएं मैं कभी भी नहीं मांग सकती। मैंने तुम्हारे लिए जो सजा निर्धारित की है वही सह...

तुम कहा गए 22

   जिंदगी को जी लेना और गुजार लेना दोनों में फर्क होता है, मेरे दोस्त !        सशर्त जिंदगी गुजारी तो जा सकती हैं, जी नहीं जा सकती! जिंदगी जी लेने के लिए यह आवश्यक है कि वह सभी बंधनों और शर्तों से मुक्त हो। किसी के होने या न होने को समय से नहीं मापा जा सकता।      समय तो वह यूनिट है जिससे घटनाओं की अवधि या जिसे हम अब समयावधि कह सकते हैं को व्यक्त करना है। शायद इसीलिए ही तुम भी कहते थे कि इस दुनिया में समय नाम की कोई चीज नहीं होती। अब देखो तो मैं तुम्हारी ही भाषा बोलने लगी हूं !      आश्चर्य किंतु इस निर्धारित सत्य जिससे होकर गुजरना ही था। जिस समयावधि के लिए तुम मेरी जिंदगी में निर्धारित थे, वह गुजर चुका है। अब इसलिए मेरे लिए यह समय भी किसी काम का नहीं।       यदि हम जिंदगी अपने तरीके से नहीं जी सके, उसे शर्तों के बंधनों में बांधकर रखा तो अब पछताना कैसा ? यह तो हमारे ही द्वारा स्वीकार किया गया निर्धारित सत्य था।     काश, हम यह कर पाते, काश कि हम यह कह पाते, कि काश ऐसा हुआ होता, कि काश ऐसा न हुआ ह...

तुम कहां गए 21

   स्वयं पर मोहित होना अज्ञानता की पराकाष्ठा है।      पंच तत्वों से बने स्थूल शरीर की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आश्चर्यजनक किंतु सत्य है कि मानव के सूक्ष्म शरीर के निर्माण में सम्मिलित 18 तत्त्वों में सभी प्रकार की इंद्रियां, काम, क्रोध, मद, लोभ इत्यादि जैसे तत्व भी सम्मिलित हैं।     स्थूल और सूक्ष्म शरीर की उत्पत्ति का एकमात्र कारण जीव और उसकी आत्मा में पारस्परिक संतुलन है, जो प्राकृतिक है।        इसलिए इसे सभी शरीरों का कारण भी कहते हैं।  शरीर की परिभाषा इतनी सरल कहां कि हम उसे सही-सही समझ सके, मेरे दोस्त।        24 तत्व से बने स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर यानी प्राकृतिक शरीर। अब जरा मेरी लिखी बात पर ध्यान पूर्वक विचार करो -    "जिसे देखकर मन में उठी तरंगे, आपके शरीर को हिला कर रख दे " -      क्या अब भी कहोगे कि मैं भौतिकता से परे नहीं सोचती हूं ? मैं विश्वास करती हूं, कि प्रत्येक वैराग में राग स्वत: ही समाहित है। इसके बगैर वैराग्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती।    ...

तुम कहां गए 20

   तुम मेरी आह से निकले वो आंसू हो, जिन्हें मैंने कभी पलकों में भी न आने दिया। डर था पलकों में आए तो कहीं यादें न धुंधली हो जाए। पलकों से लुढ़के तो कहीं मेरे जीवन से जुड़ा तुम्हारा अस्तित्व ही न बह जाएं। बेशकीमती अश्क कही जाया न हो जाए, उनमें तुम जो ठहरे हुए से हो।    प्रेम के विस्तार में ब्रह्मांड की अविनाशी, अनंत शक्तियां अंतर्निहित है। और शायद इसीलिए प्रेम की सीमाओं का विस्तार भी अनंत से कहीं अधिक है।      हम प्रेम पर अविश्वास तो जाता सकते है, लेकिन उसके वजूद को झुठला नहीं सकते। जिस तरह की हम शरीर के अस्तित्व को नश्वर मान सकते हैं, किंतु आत्मा रूपी उर्जा को नहीं। जो रिश्तो में सिमट जाए, जो बंधनों में बंध जाए जो स्थूल से सूक्ष्म होने पर अपने अस्तित्व को गवां दे, वह प्रेम कैसा? यह तो उसके होने का भ्रम मात्र है.      प्रेम को मैं दो जवां दिलों के बीच की धरोहर या बपौती नहीं मानती मेरे दोस्त। प्रेम तो वह भावना है जो एक सबल द्वारा एक निर्बल को सहारा देकर, छोटे से बच्चे को दुलार देकर, बड़े बुजुर्गों को सम्मान देकर, रोते को हंसा कर, अपने प्रि...

तुम कहां गए - 19

     शून्य आयाम से लेकर अनंत आयाम तक की दुनिया ही हमारी दुनिया होती है। जिसमें किसी के होने का या न होने का एहसास होता है।     शून्य अर्थात कुछ भी नहीं और अनंत अर्थात अनकाउंटेबल अनडिफाइंड। कुछ नहीं और सब कुछ के बीच ही कुछ होता है।     इसलिए लिखती हूं कि सब कुछ सदैव के लिए नहीं रहता, और न ही सदैव के लिए होता ही है। एक न एक दिन चाहे वह अनंत ही क्यों न हो अपरिभाषित ही क्यों न हो, सब कुछ नष्ट होना ही है। एक दिन सारे ब्रह्मांड, सारी सृष्टिया नष्ट होगी। और केवल बचेगा शून्य अर्थात कुछ नहीं।      स्मृतियां भी सदैव के लिए साथ नहीं रहती। ब्रेन डेड एवरी थिंग्स डेड।      इसलिए मैं तुमसे कोई वादा नहीं करती, और न ही कर सकती हूं। सदैव तुम्हें याद रखूंगी ऐसा कोई वादा हो ही नहीं सकता। लेकिन हां, जब तक यह ब्रेन डेड नहीं होता और मेरी स्मृतियां रहेंगी, तब तक तुम मेरी स्मृतियों में जिंदा रहोगे, भले ही चाहे तुम भौतिक रूप से कहीं भी किसी भी स्थान पर मर ही क्यों न जाओ।      तुम्हारी दुनिया में आत्मा होगी सब कुछ। लेकिन मेरी दुन...

तुम कहां गए - 18

    शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं विजन होता है मेरे दोस्त!    एक प्रश्न, जब एक पुकार बन जाए, तो वह पुकार मन की सारी व्यथा कह देता है। अंतर्मन की सारी अभिव्यक्ति, जिज्ञासा, देख लेने की चाहत, कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा, झुंझलाहट, खीझ, सभी कुछ तो समाहित होता है उस पुकार में।      जैसे कोई प्रिय वस्तु खो जाए, और हम उसे ढूंढते रहे, तो उस तलाश में मन के सारे भावों की अभिव्यक्ति दृश्य होती है ।    मेरे अंतर्मन में एक प्रश्न जागा - तुम कहां गए ? इस एक प्रश्न में तुम्हें पुनः देख लेने की चाहत, जिज्ञासा और कुछ पा लेने की अभिलाषा जागृत होने लगी।       और जब प्रत्युत्तर में तुम सामने न आए तो मन की सारी झुंझलाहट, समाहित होकर एक उलाहना बन गई - कहां गए तुम ? शब्द वही रहे किंतु उनका क्रम बदल गया।        जब इस प्रश्न से मन की सारी  हलचल और अशांति समाप्त हो गई तब यही प्रश्न एक पुकार बन गया, तुम कहा गए ...      इस पुकार में जो व्यग्रता थी, मन में हलचल थी, जब सब कुछ शांत हो गया, मन की सारी झुंझलाहट दू...

तुम कहां गए - 17

  अच्छा ही हुआ कि तुम चले गए।       जब कोई इंसान अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण, अर्थपूर्ण, वैभवयुक्त क्षणों को जी रहा हो तो उसके इस नितांत एकांत के क्षणों में प्रतिरोध नहीं उत्पन्न करना चाहिए। ऐसा करने पर दोष लगता है, और स्वयं में भी अपराध बोध का एहसास होता है।      जिन पलों में तुमने मुझे छोड़ा तो मैं अपने जीवन के सार्थक, समर्पित, अर्थपूर्ण और वैभव युक्त जीवन को ही तो जी रही थी ! तब तुमने स्वयं को मुझसे दूर ही रखना उचित समझा और शायद यह दूसरी वजह रही होगी तुम्हारे चले जाने की, इसलिए तुम चले भी गए।       जानती हूं, तुम ऐसे नहीं थे कि स्वयं अपने आप को दोषी सिद्ध करते या किसी अपराध बोध से ग्रसित हो मुझसे नजरें झुका लेते। जिंदगी को आनंदपूर्वक गुजार लेने की चाह किसमें नहीं होती ? कौन है जो जिंदगी के कष्टों को भोगना चाहता है ? कौन है जो अपने मन मंदिर में एक तस्वीर लिए वेदना को ही अपना जीवन साथी बना लेता है ?     हां तुम ही बताओ ? ऐसा कौन सा व्यक्ति है जो सरलता का परित्याग कर दुर्गम रास्तों का चयन करता है ? शायद तुम्ही थे ! ! कौन जाने ? ...

तुम कहां गए - 16

      अविश्वास, अटूट विश्वास की प्रथम सीढ़ी होती है। अर्थात किसी पर भी किया गया अविश्वास जब विश्वास में परिवर्तित होता है तो वह अटूट हो जाता है।       अब हम कह सकते हैं कि एक अटूट विश्वास का जन्म एक अविश्वास से होता है। चाहे वह अविश्वास क्षण मात्र के लिए ही क्यों न हो।    मानवीय संवेदना से परे यदि कोई दुनिया होती है, तो वह दुनिया देवताओं की दुनिया है। उद्गम और उच्छृंखल लहरों का आवेग मन में उठे तूफान का प्रतिरूप ही होता है।    तो क्या राम का सीता के वियोग में यूं भटकना उनकी खोज करते हुए पुष्प लताओं, वाटिकाओं, वृक्ष कुंजों, पर्वत श्रृंखलाओं से बार - बार ये पूछना, - तुम देखी सीता मृगनयनी !      एक दूसरे की विरह वेदना में राधा और कृष्ण का संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाना, सामाजिक स्वीकार्यता के बावजूद एक दूसरे से दूर रहना, निरर्थक था ?     अपने जिस विराट रूप को प्राप्त करने के लिए कृष्ण कर्म योगी बने, उससे भी विराट स्वरूप राधा ने सिर्फ कृष्ण से प्रेम करके प्राप्त किया, और कृष्ण से एक पायदान ऊपर ही रहीं। राधे-कृष्ण कहलाई।...

तुम कहां गए - 15

  लेकिन यह भी मानू तो कैसे मानलू ? यदि इस दुनिया में तुम न होते तो मेरे मन में खामोशी होनी चाहिए, स्थिरता होनी चाहिए, शांति होनी चाहिए ? पर ऐसा क्यों नहीं है ?      मैं जानती हूं दो बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा, अनंत बिंदुओं से होकर गुजरती है. चाहे वह बिंदु कितने ही पास पास ही क्यों न हो।     अनंत, अनकाउंटेबल। वे तथ्य जो अपरिभाषित हैं। जिसकी, कोई परिभाषा ही न हो। उस अपरिभाषित तक पहुंचने के लिए तुमने भी न जाने कितने अनंत बिंदुओं को पार किया होगा ! मुझसे उपेक्षित होना यदि तुम्हारी नियति थी, तो मेरा यूं खामोश रहना मेरी नियति थी, मेरे दोस्त।        तुम्हारे नि:स्वार्थ सच्चे मन में उपजे प्रेम की परख कर के भी, मेरा यूं खामोश रहना, बेवजह तो न था ?  नि:संदेह मैंने तुम्हें भी और-सा ही समझा था। जिनके लिए प्रेम एक मनोरंजन, एकतरफा विश्वास होता है। जबकि तुम्हारे सभी विश्वासों की आधारशिला तो तुम्हारा मुझ पर अटूट विश्वास ही रहा था।  तुम तो मेरे विश्वास के साथ चलते रहे और मैंने खामोशी से तुम्हारे उसी विश्वास को तोड़ा था।     मेरा...

तुम कहां गए - 14

 अपनी सभी समस्याओं, सारी मजबूरियों को दरानिकार कर तुम्हारे प्रति यदि कोई जवाबदेही तय भी करती, तो तुम ही बताओ वह क्या होती ?       मान्यताएं टूटती हैं, अवधारणाएं बदलती हैं, किंतु किसके लिए ? किसी को जवाबदेही तो तय करनी होती है, उठानी भी पड़ेगी है।  यदि वह व्यक्ति ही न हो तो यह सब किसके लिए और क्यों ? तब सब कुछ व्यर्थ नहीं लगता ? माया - मोह का निरर्थक प्रपंच ?           तुम जहां भी हो, निष्कर्ष तो तुम्हे ही निकालने होंगे। जब तुम मेरी जिंदगी में कभी शामिल हो ही नहीं सकते थे, तो मैं तुमसे क्योंकर कोई संबंध रखती ?         यदि हमारे कर्मों के द्वारा पाप - पुण्य का निर्धारण होना होता तो बात कुछ और होती, लेकिन यहां तो विपरीत था। पाप पुण्य की परिभाषा से हमारे कर्म निर्धारित होने थे । जब मान्यताएं और अवधारणाएं दोनों के मापदंड पहले से ही तय हो चुके हो तो उसके बाद ? क्या शेष राह जाता है ?  उनके अधीन रहकर हम क्या पा लेते, यहां तो सिर्फ खोना ही होता।    माना कि कुछ पा लेने और कुछ खो जाने के डर से जीवन ...

तुम कहां गए - 13

   कालिदास के मेघदूत के यक्ष की तरह श्रापित अभिशप्त जीवन जीने का श्राप तो तुम मुझसे ले ही चुके, वह भी बिना किसी सवाल - जवाब के। यह मेरे अंतर्मन से निकली एक चित्कार है, जो तुम्हारे अंतर्मन तक अवश्य पहुंचेगी।      ओह ! ये मुझसे क्या हो गया, मैं तो ऐसी ही न थी। चलो जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ। अब यही मान लेती हूं, शायद यही तुम्हारी नियति थी, और आज भी है।    ऐसा नहीं है कि मैं बहुत दुखी हूं या तुमसे मैं बहुत ही क्रोधित हूं, जो मैने तुम्हें यह अभिशप्त जीवन जीने का श्राप दिया। कहीं कुछ ऐसा है, जो पहले घटित हुआ होगा, और जिसका परिणाम मेरी यह चित्कार है।     भरी महफिल तुम्हे तन्हा देखा कई बार खुद मेरे साथ होते हुए भी कहीं और खोया हुआ-सा पाया। तब मन होता कि पूछू , तुम किस दुनिया में रहते हो ? और बताओ तो, कौन सी दुनिया से आए हो?       जब मेरे पास आकर भी तुम्हारा मन स्थिर नहीं होता है, तो तुम मेरे पास आते ही क्यों हो ? हमेशा कहीं और जाने के लिए तैयार । मैं खुद को जब भी  तुम्हारी आंखों में देखती, सहम सी जाती। मुझे दिखाई देता...