तुम कहा गए ? 30
एक दौर ऐसा भी गुजरा था, जब तुम लिखा करते थे, और मैं पढ़ा करती थी। या यूं कहो बस पढ़ लिया करती थी। मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई रूहानी या फिर कोई रोमांटिक जज्बात न थे। अब ऐसे में तुम्हारा लिखा कुछ भी, कैसे भी, सामने आता तो मैं उसे बस पढ़ लिया करती थी। बिना किसी संवेदना के, बिना किसी भाव के। प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात है मैं तो उसे कुछ पल से अधिक याद भी नहीं रख पाती थी। यदि किसी भी अभिव्यक्ति के लिए मैं पत्थर दिल थी, तो फिर बताओ, ऐसे में मैं भला तुम्हें इबादत करने से कैसे रोक सकती थी . . . कैसे कहें अब तुमसे, हम तुम्हारी इबादत के काबिल नहीं, जब खुद को पत्थर बना लिया हमने। . . . रुक रुक कर चलती है, कुछ इस तरह से जिंदगी मेरी। वफाओं की तो अब बात नहीं, खामोश लबों से भी भला, कोई दुआ निकलती है कभी। तेरी निगाहों ने भी देखा होगा वो मंजर, कि सजदे में आकर भी, कोई मुराद पूरी होती नहीं ।। . . . कोई और ही शख्स था तेरे अंदर, जो जीता रहा अपनी जिंदगी, सहेज खुद मेरी यादों को, हर रोज मिटाता रहा यादें तेरी।। मैने लिखा न कि तुम रूहानी, रोमांटिक औ...