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अजनबी - 4 (वह पत्र)

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अंत की शुरुआत  कभी मैंने सोचा था, जो कहानी 08 नंबर 1997 से शुरू हुई वो 12 नवंबर 2002 को खत्म हो गई। लेकिन मैं गलत था। कहानी का आखिरी पन्ना लिखा जाना तो अभी बकी था। कहानी का एक किरदार शारीरिक बंधनों से मुक्त हो चुका था। मैं भी जीवन पथ पर आगे बढ़ ही गया था। सत्य पीहू की यादों को हृदय में संजोए, उसके काम को आगे बढ़ते हुए वहीं रह गया। एक किरदार ने फिर दूसरे किरदार को अकेला और तन्हा छोड़ दिया। मंगल अपनी मुंह बोली बेटी को खो कर भी सत्य के साथ उसके संघर्ष में पूरी निष्ठा के साथ शामिल रहा। हो सकता है कि यह बात उसके हृदय में हमेशा चुभती रही हो कि अंतिम क्षणों में सत्य पीहू के पास नहीं था। लेकिन था तो उसकी बेटी का पति, वह भी प्रायश्चित करता हुआ, तो फिर उसका साथ कैसे छोड़ देता ? लेकिन कहानी का एक ऐसा किरदार जिनसे मैं न तो कभी मिला और न ही कही देखा था। बस उनके बारे में सुना था, एक ही बार फोन पर बात भी हुई, वह थे ध्रुव भैया। उनसे मिलने से पहले इस कहानी का अंत कैसे संभव था। वर्षों बाद देर होने की वजह से जल्दबाजी में मैं अपने रिजर्व एसी-3 कोच में न चढ़कर एसी-2 कोच में चढ़ा दिया गया। रात्र...