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अजनबी - 2

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02 प्रिय पीहू  प्रिय पीहू,  नमस्ते। कभी मैने तुमसे कहा था, "मानवी संवेदनाओं से परे यदि कोई दुनिया होती है, तो वह दुनिया देवताओं की दुनियां है और ईश्वर साक्षी है कि हम देवता नहीं...", तो अच्छा हुआ न ?... यदि होते तो एक दूसरे से अपने हृदय की बाते कभी न कह पाते।  अब तक न जाने कितने काल्पनिक पात्रों को अपने शब्दों की माला में गूंथ कर छोटी-छोटी कहानियां लिखी और मां सरस्वती के गले में पहनाता चला गया, बेखबर इस बात से कि अच्छा लिख पाया या नहीं। लेकिन अजनबी लिखते समय मुझे अब किन्हीं शब्दों की जरूरत नहीं। क्योंकि मैं जानता हूँ, इस माला में मुझे शब्द नहीं दोनों के हृदय से निकलने वाली हर एक आह और आंखों से टपकाने वाले असंख्य अश्रुकणों को पिरोना होगा।  मुझे तुम्हारी मनमोहक मुस्कान, सीप जैसी बदामी गहरी आंखों के जलते दिये, डार्क गोल्डन स्वीडिश कर्ली हेयर, मोगरे के ताजे फूलों जैसी हंसी से गालों में पड़ने वाले डिम्पल और प्यार की रूमानियत में डूबे हुए लम्हों से तुम्हारी पवन-प्रांजल मूर्ति को सजाना होगा। बात अब कल्पना की नहीं यथार्थ की है। यथार्थ ! जो कभी हमने साथ-साथ जिए हैं, महसूस किए...