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तुम मेरी 5 सेकंड की मुहब्बत

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💢💢💢💢💢💢💢💢 वह एक खूबसूरत सी सुबह, आकाश में बस अभी-अभी, का उगा लाल-लाल सूरज। चहल-पहल, भीड़ भाड़ में, खुद को बचता-बचाता सा मैं। ⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡⚡ जिंदगी की रफ्तार से भागती सड़क, मैं बेपरवाह, बेलगाम, बेजार, बेरोजगार बेवजह बस! चले जा रहा था। अचानक,  हां एकदम अचानक ही  !! जब तुम मेरे सामने आ गई, मुझसे टकराते-टकराते कुछ ही बची। 💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓💓 मेरी भागती और दौड़ती जिंदगी, जब एकदम अचानक ठहर सी गई। वक्त के खजाने से मिले कुछ ही सेकंड, मैं जब सब कुछ भूल सा गया, आवारगी, अपनी बेचारगी, उदासी, हां सबकुछ, शायद खुद को भी। और तुम्हे ! बस तुम्हे देखता रह गया । 💓💓💓💓💚💚💚💚💚💓💓💓💓 वक्त की घड़ी की तरह मेरा दिल💓 धड़का टिक💓 टिक💓 टिक 💓टिक💓 टिक💓💚 अगले ही पल मैं सचेत कुछ सावधान। छठवीं बार !! दिल की धड़कनो को, धड़कने से रोक सा लिया मैंने। डर था लगातार 6 सेकंड देखने पर, कहीं तुम मुझे स्टॉकर न समझ लो। और सातवां सेकंड तो गजब का होता, मैं तुम्हारा दीवाना जो बन गया होता। 💚💚💚💚💚💚💚💚💚💚💚💚💚 मेरी पाक साफ पहली नजर तुम, ये, हां तुम ! कही तुम रुसवा न हो जाती। 💚💓💚?...

मैं डिजिटल युग का

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मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विरह प्रेमी कवि हूं। तुम्हारे अनंत:पुर से, निष्कासित श्रापित यक्ष हूं। मेघ नहीं बिट से अपना, हाल-ए-दिल पहुंचाता हूं। तुम्हारी विरह वेदना में जब, ऑफ से ऑन हो जाता हूं। तब एक अक्षर लिखने को भी, एट बिट से एक बाइट बनाता हूं।। एमबी फिर जीबी भी, जब कम पड जाते हैं। तब चाहत से अपनी,  टेरा बाइट बनाता हूं। नेटवर्क कंजेक्शन और, व्यस्ततम रूट तुम्हारा। फिर भी अपना सन्देश,  तुम तक पहुंचाता हूं। जज़्बातों के छोटे-छोटे पैकेट कर, हर पैकेट में लिख दोनों का एड्रेस, फिर सभी को तुम्हें सेंड करता हूं। उनमें से कुछ तुम तक पहुंचे, कुछ कंजेक्शन में फंस के लौटे, आहों के रूटर से उनको, फिर री रूट दिखलाता हूं। ये क्रम यूं ही अनवरत चलता रहेगा, जब तक हर पैकेट तुम तक न पहुंचा दूं। क्योंकि ? मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विराह प्रेमी कवि हूं। मेघ नहीं बिट से तुम तक, अपनी विरह वेदना पहुंचाता हूं। Shailendra S. Mr. भूपेंद्र सिंह बघेल, सतना को सादर समर्पित।

अक्सर मुझे देख कर !

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अक्सर मुझे देख कर, तुम्हारी ही बातें करते हैं लोग, हां सच! मैं कुछ भी नहीं पूछता, फिर भी ! सब कुछ बताते हैं,  तुम्हारे बारे में लोग। न जाने क्यों यह भी पूछते हैं कि,  मैं तुमसे कहीं नाराज तो नहीं? फिर भी मैं कुछ नहीं कहता ! हां चुप रहता हूं !! तब बड़ी हमदर्दी से,  लोग मुझसे कहते हैं, संभालो खुद को,  अक्सर दिल में ही तो, बिजलियां गिरा करती हैं दोस्त!! फिर भी मैं कुछ नहीं कहता,  चुप रहता हू, और तब ? और भी बारीकी से बताते हैं लोग। कैसे कुछ ने तुम्हें उदास देखा था, कैसे कुछ ने तुम्हें हंसता भी देखा था। किसी की याद में गुमसुम, अपने घर के सामने ही, कल बैठा हुआ भी देखा था। चलती राह के मुसाफिरों को रोक, मेरे बारे में पूछते हुए भी देखा था। नादान हैं, न जाने कौन सी कहानियां बनाते हैं लोग? हां, मैं जानता हूं, मुझे पता है ! बस यह कहानियां ही तो है, जो अक्सर मुझे सुनाते हैं लोग ।। और भी ना जाने,  क्या-क्या बताते हैं लोग। जैसे वे गवाह हो,  तुम्हारी तन्हाइयों के, जैसे वे गवाह हों,  तुम्हारी रुसवाईयों के, जैसे वे गवाह हों,  मेरी बेबाफाइओ के, कुछ ...

न जाने क्या पा लिया उसने !

ना जाने क्या कह गया वह जमाने से, अपना ही शहर छोड़ गया मेरे आने से। बमुश्किल खोज पाया था मैं उसे, फिर क्यों रूठा है ? लौट कर न आने से। शायद तुमसे ही कुछ कह गया हो मेरे बारे में अब तुम भी बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से। ना जाने क्या पा लिया, उसने किसी खजाने से ? क्या कम थे ये मोती, जो गिरे मेरी आंखों से? ना जाने क्या पा लिया, उसने चुप रह जाने से? बमुश्किल छोड़ा होगा उसने भी, किसी के समझाने से। बताओ कुछ तो कह गया होगा वह तुमसे? अब तुम्ही बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से।। Shailendra S.

आशिकी भी फातिया न पढ़ेगी

  ख्वाब को अपने अधूरा मत छोड़ शैलेंद्र, जागने पर तुझे बेचैनियां मिलेंगी। गर टूट कर बिखर गए राह में तो क्या, खुद को समेट अभी तो मंजिल मिलेगी। कौन है जो जज्ब कर लेगा तेरे एहसास, उम्मीद से ही शमा- ए - महफिल जलेगी। दफन तो होना है सभी को ब-दस्तूर, तोड़ मायूसी की कब्र रोशनी दिखेगी। गर अधूरे छोड़ ख्वाब मर भी गया, तेरी आशिकी भी फातिया न पढ़ेगी। जिंदादिली से अभी तो चल वरना ? मुर्दा को चलता देख दुनिया भी हंसेगी।। Shailendra S.

मैं तेरे गांव की छोरी हूं

मैं तेरे गांव की छोरी हूं,  तू मेरे गांव का बूढ़ा है। पकड़ के चूहा लटका दूंगी  जो तू मुझको छेड़ा है। आना-जाना दुश्वार किया, तूने ऐसा व्यवहार किया, मोहन को भी बदनाम किया, मुरलीवाला भी अब सोचेगा, राधा को क्यों बदनाम किया? मैं तेरी मार की मारी हूं, तू मेरे प्यार का मारा है। मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। तू मरण-सेज पर लेटा है, मैं प्रिय-सेज पर लेटी हूं, इतना भी ज्ञान न आता है? यूं तो तू बदमाश बहुत है, मैं भी कुछ कम चालाक नहीं, तू मुझको जिस रस्ते घेरा है, मैं दूजे से फिर आती हूं। मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। पकड़ के चूहा लटका दूंगी, जो तू मुझको छोड़ा है। कान पकड़कर बैठक करवा लूंगी, सरे आम पब्लिक से पिटवा दूंगी, या फिर, गांव के पागल कुत्तों को,  तेरे पीछे दौड़ा दूंगी। तुझको! तेरे ही घर में बंधवा दूंगी, या फिर, थाने के बैरक में डलवा दूंगी। अबकी जो तू मुझको छेड़ा है? मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। क्यों करता बदनाम मुझे? हाथ फेर सर पे, दे आशीष मुझे, बचपन में मेरे गाल को चूमा है। अब क्यों डर लगता है, मुझको तेरी ना...

कलयुग में तीन युगों का

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कलयुग में सतयुग का,  अब तो आरंभ करो। हरिश्चंद्र से-सत्य पुरुष का,  अब धारा में अवतार करो। तारामती की बलिदान शक्ति का   अब हर नारी में संचार करो।। गगन-भेदी हुंकार करो,   हां राम, धनुष टंकार करो। खड़ा दसों बुराई का रावण,   अब दिव्यास्त्र संधान करो। अमृत घट लिए नाभि में तो क्या,    हां राम! अब तुम संघार करो।। बाल्यावस्था में ही, अत्याचारी कंस का, कर भीषण आघात, मुष्ठि प्रहार करो। सबल पुरुष की वीर सभा में, खड़ी द्रोपदी की करुण पुकार सुनो। शस्त्र-त्याग, अर्जुन खड़ा बीच कुरुक्षेत्र, भगवत गीता का संचार करो। अधर्म पक्ष में खड़े भीष्म तो क्या, उन पर भी बाणों की बौछार करो। पुत्र-मोह, धर्म-विरुद्ध, हैं खड़े गुरुदेव, उन पर भी द्रष्टधुम तुम वार करो। युद्ध क्षेत्र के भगोड़े दुर्योधन पर, हां भीम! तुम अंतिम प्रहार करो।। इस कलयुग में भी तीन युगों-सा, हे पुरुषोत्तम!! तुम न्याय करो।। Shailendra S.

एक इश्क ऎसा भी

हां मुझे याद है जब पहली बार,  मैं तुमसे रूबरू हुआ था। सामने जलता हुआ कलश, सर पर मंडप, गीत गाती हुई ढोलक में थाप देती हुई, कुछ औरतें, कुछ तुम्हारी सहेलियां, उनमें से कुछ मेरी सालिया, मम्मी, बुआ, सरहज कुछ चाचियां, मेरे पीछे बैठे मेरे कुछ ही दोस्त, अजनबी देश, अजनबी लोग। हा, इन सभी के बीच , मैंने देखा था तुम्हे पहली बार। लजाती सकुचाती सहमी खुद से ही शर्माती, अपने पापा- मम्मी के सामने बैठी तुम। मेरे हाथ में देकर तुम्हारा हाथ, जब किया था माता - पिता ने कन्यादान। तब शायद पहली बार जी भर के  देखा था हमने  एक + दूसरे की आंखों में। इस एक रिश्ते से, बने कई रिशतें, गवाह बने धरती - गगन, चांद - सितारे, मंडप, कलश, अग्नि, दसों दिशाएं, देव, गंधर्व, यक्ष, और ये हवाएं। हां कुछ ऎसे शुरू हुआ था, ये इश्क हमारा + तुम्हारा। हां . . . उसी इश्क कि सारी कशिश के साथ, मुबारक हो  शादी हमारी + तुम्हारी। Shailendra S.

हमसफ़र

तुम्हे विवाह के सालगिरह पर क्या तोहफा दूं ? लाक - डाउन जो है ? वस्तुएं दुकानों में लॉक,  ऑक्सीजन सिलेंडरों में लाक, तनहाइयां हमारे दिलों में लॉक, वफाएं, बेवफाइयों में लॉक, प्रोफाइले फेसबुक में लॉक, ट्विस्ट टियूटर में लॉक, इंटरेस्ट इंस्टाग्राम में लॉक, एहसास मैसेज बॉक्स में लाक, चिट्ठियां, ई - मेल में लॉक, अपनों के आंसू पलकों में लॉक, चांद है बादलों में लॉक, मैं खुद तुमसे दूर यहां,  सरकारी फाइलों में लॉक। पर कुछ वजहें हैं, देने के लिए तुम्हें, नहीं है बारिश, किन्हीं बंदिशों में  लॉक, नहीं है हवा, किन्हीं दिशाओं में लॉक, तुमसे मिलने की आस,  अभी नहीं हुईं हैं लॉक। शुभ कामनाएं हैं तुम्हे, हमारी शादी की अप-कमिंग सालगिरह पे Shailendra S.  With love to my wife ( Companion) HMA - 20th May

जो तुम रुठ जाओ तो ?

जो तुम रुठ जाओ तो फिर, कुछ भी अच्छा नहीं लगता। दूर चली जाओ तो फिर, किसी की नज़दीकियां नहीं भाती, महफिल हैं तमाम, पर कहीं मन नहीं लगता। किसी की नज़दीकियां दिल को नहीं लुभाती, जब तक तेरा कोई जख्म, दिल को नहीं लगता। महफिल हैं तमाम, पर मन नहीं लगता। जो उभर कर एक चेहरा आता है मेरे सामने, उस चेहरे के सामने फिर, कुछ भी अच्छा नहीं लगता। दूर जाकर फिर मेरी खबर न लेना, फिर तेरा कभी यूं पलट कर ना देखना, मेरी तन्हाइयों में तेरा बार बार यूं आना, हर रात छीन लेना मुझसे मेरे चांद सितारे वीरान आसमा में, स्याह काली रातों में, हर रात तेरी उजली तस्वीर बनाना, सच कहता हू, बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। Shailendra S. 'Satna'

Lyrics - यादें - 1

जो की थी कभी मैने, बातें तेरी तस्वीर से, वो बातें न कह पाया तुझसे कभी मेरे यार। हो के जुदा अब ...… तुझसे  चले हम लेकर वही दिल में तस्वीर मेरे यार। अब किससे कहेंगे ... कैसे कहेंगे, वो सारी बाते.... वो सारी यादें बस रहेंगी दिल में मेरे यार। जो कभी तुम .... करोगी मुझे याद, आऊंगा नजर मैं , यही कहीं आसपास। फिर न जाने देना,  मुझे खुद से दूर। इतने करीब ला हमें। .........  ना करना फिर से हमें खुद से दूर। भटकता रहूंगा, तुम्हारी ही  यादों के पास। लेती रहोगी हिचकियां करके याद, रो भी ना सकोगी .... तुम मेरे यार। लेना ही होगा ये फैसला अब तुम्हें मेरे यार ... …........   .......... मन से एक म्यूजिक कंपोज कीजिए फिर इस लिरिक्स को गुनगुना कर देखिए By - Shailendra S.

आह !

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आज लगता है फिर उसने,  दिल में दी दस्तक। आज की रात फिर वही, तूफान- सा  आने वाला है। बड़ी ही खामोश तनहाइयों में, उसने किया फिर याद मुझे, गूंज उसी की आज, ये बादल सुनाने वाला है। बड़ी ही कशमकश  से टकराई है, फिर से यह जिंदगी उसकी, जिसकी चमक फिर ये फलक, मुझे आज दिखाने वाला है। छुपा के रखे है जो दरिया उसने, अपनी काली गहरी आंखों में, उसी दरिया में फिर से वह, मुझे आज डूबोने वाला है । कह दो इस जहां से कि, अब न रोके उसे। कि अपनी आह से फिर वह, मुझे आज रुलाने वाला है । ले आ अब ए हवा, बादल बिजली उसके पैगाम मुझ तक। ना पहुंचे तो ? फिर वह,  ये जहां जलाने वाला है।।             Shailendra S.

चोर खिड़की

चोर ! चोर खिड़की से देखती हो मुझे  ! खुलती है ये खिड़की, जब भी देखती हो मुझे। रु-ब-रू हो कर कभी देखो, मेरी नजरों से छुप कर, क्यो ? चोर खिड़की से देखती हो मुझे। नजर भर देख, नजर  फेर लो न, फिर मुझे तो क्या इस दुनिया को भी,  जताती रहो कि परवाह नहीं मेरी, कभी भी, कही भी, किसी  हाल में सही, मेरा दिल तोड़ दो न ! कि अब मुझे भी,  एक विरह गीत लिखना है. अब बंद भी कर लो ये चोर खिड़की, हां, मुझे तुम्हें बेवफ़ा जो  लिखना है।  Shailendra S.