चोर खिड़की
चोर !
चोर खिड़की से देखती हो मुझे !
खुलती है ये खिड़की,
जब भी देखती हो मुझे।
रु-ब-रू हो कर कभी देखो,
मेरी नजरों से छुप कर,
क्यो ? चोर खिड़की से देखती हो मुझे।
नजर भर देख, नजर फेर लो न,
फिर मुझे तो क्या इस दुनिया को भी,
जताती रहो कि परवाह नहीं मेरी,
कभी भी, कही भी, किसी हाल में सही,
मेरा दिल तोड़ दो न !
कि अब मुझे भी,
एक विरह गीत लिखना है.
अब बंद भी कर लो ये चोर खिड़की,
हां, मुझे तुम्हें बेवफ़ा जो लिखना है।
Shailendra S.
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