सोने का पिंजड़ा (The Golden Cage)

     
सोने का पिंजड़ा 
(The Golden Cage) 

      बाबा ने शांत मन से कहा, "यदि तुम सोचते हो कि यह सब मुझे किसी और ने बताया है तो गलत हो तुम। यह तुम्हारी हाथ की रेखाओं में लिखा है, तुम्हारे माथे में लिखा है, जिसे मैं पढ़ सकता हूँ। और इसीलिए कहता हूँ कि पीहू के जीवन में तुम्हारा जो कार्य था वह तुम पूर्ण कर चुके। अब यहां रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं... पीहू का अस्तित्व तुम्हारे लिए नहीं।
    इस बार मैंने फिर विरोध किया लेकिन मेरे विरोध में याचना थी, "बाबा ! आपने मेरे बारे में बताया वो सब सच है। लेकिन यदि नियति का सहारा लेकर मेरी एक कमी के कारण कि मैं शराब पीता हूँ, मुझे उसकी जिंदगी से दूर करना चाहते हैं... तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसी क्षण मैं शराब पीने की बात तो दूर उसे छूने की भावना तक का परित्याग करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मुझे उसकी जिंदगी से दूर मत कीजिए..."
   "मैं जानता हूं कि तुम ऐसा कर सकते हो... लेकिन तुम्हे जाना होगा...", बाबा के चेहरे में एक अजीब सी कठोरता थी। उनकी यह कठोरता देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं रो पड़ा...
    "बाबा !! इतने कठोर न बनिए !! मेरे बारे में न सही लेकिन उसके बारे में तो सोचिए, मैं उसके जीवन में कोई देवता या मसीहा बन कर नहीं आया हूँ, एक सच्चा मित्र बनकर आया हूँ, उसे मेरी जरूरत है, मुझे उसकी जरूरत है, या यूं कह लीजिए हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। अच्छा ठीक है, मैं उसे किसी भी रिश्ते के लिए मजबूर नहीं करूंगा... प्लीज बाबा मान जाइए...?"
   मैं कुछ देर तक उनके जवाब की प्रतीक्षा करता रहा लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। मै उठा, बाबा के पैर छूते हुए कहा, "बाबा सॉरी, आपको समझे बिना अनजाने में आपसे बहस कर गया... आपके आदेश का पालन होगा। अब स्वयं की इच्छा से मैं यहां कभी नहीं आऊंगा..."
   उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "एक बार फिर तुम्हारी नियति तुम्हें लेकर यहां आएगी, लेकिन तब मैं नहीं रहूंगा। यह समझ लो यह तुमसे मेरी अंतिम मुलाकात है... इसलिए समझा रहा हूँ। अपनी हृदय से शोक की भावना का परित्याग  करो और जीवन पथ पर आगे बढ़ जाओ..."
    "जी बाबा ...", मैंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और जाने के लिए पलटा। दो कदम चलने के बाद ही बाबा ने मुझे पुकारा, "सुनो !! जो सवाल तुम खुद से और पीहू से बार-बार पूछते रहे और जिसे आज भी तुम उससे पूछने जा रहे हो... उसे जरूर पूछना... यदि जवाब ना मिले तो उसका जवाब भी देकर जाना..."
    भावनाओं के प्रबल वेग ने मेरे कदम ही नहीं रोक दिए बल्कि मैं वापस लौटकर बाबा के पास आया। उनके सामने घुटने के बल बैठ उनकी गोद में सर रख छोटे बच्चों की तरह रोते हुए बोला, "बाबा !! ... मुझे माफ कर दीजिए... मैं कोई सफाई नहीं दे रहा हूं... बल्कि ईश्वर को साक्षी मानकर आपसे एक बात कहता हूँ ... हां मानता हूं कुछ पल के लिए मैं स्वार्थी हो गया था। आपने सच कहा, मैं अपने जीवन में प्यार की कमी को पीहू से भर लेना चाहता था। उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर उसके साथ जिंदगी जीना चाहता था। लेकिन बाबा इसके लिए क्या मैं सत्य का हृदय दु:खाता ? क्या आपके वचनों को झूठा होते हुए देखता ?  नहीं बाबा नहीं... आपने तो उसका कन्यादान किया है न। यह विचार आते ही मैंने अपनी इस लालसा का भी त्याग कर दिया। लेकिन सच कहता हूँ बाबा, आज उसे छोड़कर जाने का मन नहीं हो रहा है। पता नहीं क्यूं उससे दूर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ। बाबा क्यों लगता है कि जैसे मेरी सांसे रुक जाएंगी। मैं मर जाऊंगा। कभी किसी ने न चाहते हुए मेरा त्याग किया, और मुझे निर्मोही कहां!! आज पीहू कहती है, मैं किसी की भी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोल सकता हूँ... तो फिर ठीक है बाबा... यही सही!! मै उसकी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोलूंगा..."
       कुछ देर जी भर रो लेने के बाद मैंने अपने आंसुओं को पोंछा, "लेकिन बाबा आपसे झूठ नहीं कहूंगा। आपसे मिलने से पहले मन ही मन मैंने एक फैसला लिया था कि मैं वापस लौट कर जल्द ही आऊंगा। पीहू जिस रूप में मुझे अपने पास रखना चाहेगी मैं उसके पास रहूंगा। बाबा ईश्वर साक्षी है, मैंने किसी लालच या सिर्फ अपने जीवन में किसी कमी को पूर्ण करने के लिए पीहू से प्रेम नहीं किया बल्कि उसकी शख्सियत ही ऐसी है कि धीरे-धीरे मुझे उससे प्यार हो गया..."
   बाबा ने दिलासा देते हुए मुझसे कहा, "नियति अर्थात प्रकृति तुमसे वही मांगती है जो तुम उसे दे सकते हो। तुम्हारे अंदर त्याग करने की अद्भुत क्षमता है, इसलिए हर बार आवश्यकता पड़ने पर तुमसे वही मांगती है। पीहू का अस्तित्व तुम्हारे लिए नहीं है...मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिष शास्त्री नहीं हूँ। लेकिन जहां तक मुझे ज्ञान है उसी के आधार पर कह रहा हूँ कि यहां पर रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं है। अब जाओ..."
     "जी बाबा आप जो चाहते है वही होगा ... लेकिन सच मानिए बाबा ! मेरा उसके प्रति प्रेम किसी भी भौतिक चाहत से परे था, अब भी है, और सदैव रहेगा। यदि मेरे जीवन में इसी तरह का प्रेम मेरी नियति है, तो मैं उसे अब हृदय से स्वीकार करता हूँ... किन्हीं भी लम्हों में आप अपने आप को मेरा दोषी मत मानिएगा।
    बाबा ! कभी-कभी मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता हूँ, जाने से पहले अपनी ही लिखी एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ...?"
   बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, "हां क्यों नहीं, पीहू ने बताया था कि तुम कहानियां लिखते हो, साहित्य में रुचि है तुम्हारी... सुनाओ मैं सुनूंगा..."
   मैंने उनकी गोद में उसी तरह अपना सर रखे हुए कहना शुरू किया,
   किसी वन में एक महात्मा कुटी बना के रहते थे। एक दिन उन्होंने ध्यान दिया कि एक बुलबुल प्रत्येक सुबह और शाम उनकी कुटी में आकर गीत गाता है। धीरे-धीरे महात्मा को उस पक्षी से लगाव हो गया। वैसे दिनभर वह बुलबुल जंगल में खुले आसमान में घूमता लेकिन शाम को महात्मा के पास उनकी कुटी में बने अपने घोंसले में लौट आता। वह उन्हें रोज गीत सुनाता और महात्मा जी खाने-पीने के लिए कुछ दाने डाल देते।
      एक दिन उस राज्य का राजा महात्मा जी के पास भूले भटके पहुंचा। शाम का वक्त था। उसने भी बुलबुल का गीत सुना। उसे बुलबुल का गीत और सुंदरता पसंद आई। उसने महात्मा से उस पक्षी को मांग लिया।
   महात्मा को भी अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका था। उन्हें भी उस मासूम पक्षी की चिंता थी। अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उसे राजा को भेट कर दिया। 
    राजा ने उसके लिए एक खूबसूरत सोने का पिंजरा बनवाया और खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने दिए। उसके पिंजरे को अपने शयन कक्ष की खिड़की के पास टंगवा दिया। बुलबुल खुश था। सुंदर राजमहल, रहने के लिए सोने का पिंजरा, खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने। वह राजा को रोज सुबह-शाम गीत सुनाता। दिन भर राजा राजकाज के काम में व्यस्त रहता और बुलबुल अकेला उसी खिड़की से बाहर खुले आसमान को देखता बैठा रहता। जब राजा अपने शयन कक्ष में पहुंचते तो बुलबुल उनसे बहुत सारी बातें करता। राजा भी दिन भर की हुई घटनाओं के बारे में उसे बताता है। धीरे-धीरे राजा को बुलबुल से अतिशय लगाव हो गया। बुलबुल की मीठी-मीठी बातें उसका गीत राजा की जरूरत बन गया।
      एक दिन भूले भटके एक दूसरा बुलबुल उसी खिड़की पर आकर बैठा। उसे देखकर पिंजरे में कैद बुलबुल को अपने दिन याद आए। खिड़की पर बैठे बुलबुल ने उसे बाहर की दुनिया की बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बताई।  फिर दोनों ने एक साथ गीत गाया। राजा के आने पर वह बुलबुल खुले आसमान में उड़ गया। दूसरे दिन वह फिर आया। फिर उसने बाहर की दुनिया की नई-नई बातें उसे बताई। दोनों ने एक साथ गीत भी गया। यही क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा। पिंजरे में कैद बुलबुल खुश रहने लगा। अब वह दुगने भाव से राजा को भी गीत सुनाता। अब उसे हर शाम अपने साथी बुलबुल का इंतजार रहता। 
     इंतजार के पल उससे काटे न कटते। तब उसे  धीरे-धीरे अपनी जिंदगी नीरस लगने लगी। उसे महसूस हुआ पिंजरा चाहे सोने का हो या फिर लोहे का, पिंजरा ही होता है। वह भी उस बुलबुल के साथ अपनी पूरी आजादी से खुले आसमान में उड़ना चाहता था। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर गीत गाना चाहता था। खुली हवा में सांस लेना चाहता था। बारिश में भीगना चाहता था। लेकिन वह चाह कर भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता था।
    एक दिन उसने अपने हृदय की बात राजा को बताई। उसने कहा कि वह भी अपने साथी बुलबुल के साथ खुले आसमान में उड़ना चाहता है। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर उसके साथ गीत गाना चहता है, बारिश में भींगना चाहता है और अपनी मेहनत से किसी पेड़ की डाली में अपना घोंसला बनाना चाहता है। 
    राजा ने उसके सामने कुछ नहीं कहा, लेकिन वह समझ गया कि यदि दूसरा बुलबुल यहां आता रहा तो...? राजा डर गया। उसे बुलबुल से बहुत प्यार था। यदि उसका प्यारा बुलबुल यहां से चला गया तो वह दिन भर की बातें किससे करेगा ? अपना दुख-दर्द किससे कहेगा ? सुंदर-सुंदर गीत गाकर उसका दिल फिर कौन बहलायेगा ? प्यारे बुलबुल के बिना क्या उसका जीवन स्वयं नीरस न हो जाएगा ? राजा स्वयं चिंता ग्रस्त हो गया। लेकिन उसने अपनी चिंता बुलबुल से जाहिर नहीं की।
      और एकदिन वही महात्मा राजा से मिलने राज-दरबार में- आए। राजा ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और अपने राजमहल में विशेष अतिथि के रूप में एक दिन ठहर जाने का निवेदन किया। महात्मा ने सोचा कि चलो इसी बहाने वह अपने प्यारे बुलबुल से भी मिल लेंगे। राजा ने महात्मा को राजमहल के उसी विशेष शयनकक्ष में ठहराया जहां वह अपने प्यारे बुलबुल के साथ रहता था। बुलबुल ने उनसे ढेर सारी बातें की, उन्हें भी बहुत अच्छे-अच्छे गीत सुनाए।
      जब शाम हुई तो उसका साथी बलबुल मिलने आया। उसकी मुलाकात महात्मा जी से भी हुईं। उसने आदर-पूर्वक महात्मा जी को प्रणाम किया। फिर रोज की तरह ही दोनों ने एकदूसरे से गुजरे हुए दिन के बारे में ढेर सारी बातें की। दोनों ने एक साथ गीत गया। इस बीच दोनों ही एक दूसरे में इतना खो गए कि उन्हें महात्मा जी और राजा की उपस्थिति का भी ज्ञान न रहा। महात्मा जी की पारखी नजरों से यह बात छुपी न रह सकी। वे बहुत चिंतित हो गए। उन्हें अपने बुलबुल के भविष्य को लेकर फिर चिंता हुई। इतना अच्छा राजमहल, इतनी अच्छी सुख सुविधा, इतनी अच्छी सुरक्षा उसे और कहां मिलेगी। उन्होंने जाते समय अपने बुलबुल से कहा कि जब उसका साथी बुलबुल उससे कल मिलने आए तो उसे उनके पास भेज दें। वो भी उससे मिलना चाहते हैं, उसका गीत फिर से सुनना चाहते हैं ।
     फिर पता नहीं बाबा क्या हुआ मैं नहीं जनता। यह भी नहीं जानता कि महात्मा जी ने उस बुलबुल से क्या कहा होगा। कुछ कहा होगा या कुछ मांगा होगा ? हां सच में बाबा, मैं बिल्कुल नहीं जनता। लेकिन हुआ ये कि फिर वह बुलबुल दोबारा अपने साथी बुलबुल से मिलने नहीं आया !! 
      सोने के पिंजरे में कैद बुलबुल राजमहल में उसका रोज शाम को इंतजार करता रहा... रोता रहा, उसकी याद में तड़पता रहा। धीरे-धीरे जीवन जीने के प्रति उसकी लालसा खत्म होने लगी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। अब वह राजा से भी कम ही बात करता। उसने गीत सुनाना भी बंद कर दिया। अब वह अक्सर बीमार रहने लगा। राजा ने बहुत कोशिश की लेकिन कोई दवाई कोई हमदर्दी काम न आई। राजा को उसके गीत से प्रेम था, और जब बुलबुल ने गाना ही छोड़ दिया तो धीरे-धीरे राजा भी उसके प्रति उदासीन होता चला गया।  
    और जानते है बाबा फिर क्या हुआ ?  एक रात बदल जोर से गरजे, तेज हवाएं चली, पूरी रात जमकर बरसात हुई, आसमान जी भर के रोया। आंधी से राजमहल के सभी चिराग बुझ गए। घुप अंधेरा जैसे मृत्यु के देवता ने पूरे राजमहल को घेर लिया हो। स्वयं राजा को रात भर नींद न आई। लाखों बेचैनियां लिए वह भी टहलता रहा। 
    दूसरे दिन एक नई सुबह हई। बारिश बंद हुई। आसमान बिल्कुल साफ और स्वच्छ हो गया । सूरज की सुनहरी किरणों से सोने का पिंजरा जगमगा उठा। राजा ने पिंजड़े के पास जा कर देखा, उसका प्यार बुलबुल सोने के पिंजड़े से आजाद हो चुका था।
      मैं उठा, बाबा की तरफ देखा उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे। बड़ी हिम्मत करके मैंने उनके आंसू पोछे, "नहीं बाबा रोते नहीं... यह तो कहानी है... सच थोड़े न है... अब चलता हूँ, इजाजत दीजिए..."
      और फिर बाबा को पुनः प्रणाम कर, उन्हें उसी तरह बैठा छोड़ मैं वापस चल पड़ा था। 
    जब मैंने आंखें खोली तो मेरी आंखों के कोर भीगे हुए थे। विंडो सीट पर बैठी उस लड़की की नजरे मुझ पर टिकी हुई थीं। मैने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, "सॉरी..."
    वह मुझे गौर से देखती रही फिर उसने अपनी रुमाल मेरी तरफ बढ़ाई। मैंने हाथ के इशारे से मना करते हुए कहा, "नो थैंक्स, इट्स ओके..."
   उस लड़की ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, "नो... इट्स नॉट ओके... प्लीज टेक इट..."
(..... अजनबी से)

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