अजनबी - 2

अजनबी (पार्ट 2)
प्रिय,
     पीहू ! तुम्हे क्या लिखूं... यह जानते हुए कि तुम अब इन सबसे परे जा चुकी हो, फिर भी वही कहता हूँ जो अब तक तुमसे कहता आया हूँ... आज भी तुमसे प्यार है और बेशुमार है। 
     मैं जानता हूँ, तुम्हें कोई आश्चर्य नहीं हो रहा होगा, क्योंकि लव यू तो मैं तुमसे पहले भी कहा चुका हूँ और रिस्पेक्ट तो मेरी नजरों में तुम देख ही चुकी हो। मैं यह भी जानता हूं कि यह सब कहने और सुनने की बातें नहीं, महसूस करने की हैं। जो हम बहुत दिनों पहले कर चुके हैं।
   फिर भी लिखता हूँ, मेरे अंतर्मन में प्रवाहित निर्मल भावनाओं को सही दिशा देने वाली प्रेरणा श्रोत हो तुम। मैं अपनी सभी निश्चल भावनाओं को एकत्र कर हृदय से तुम्हारी उज्ज्वल-पावन तस्वीर की वंदना कर श्रद्धां-सुमन अर्पित करता हूँ, इस आशा के साथ कि तुम जहां भी होगी इन्हें सप्रेम स्वीकार करोगी। 
    कभी मैने तुमसे कहा था, "मानवी संवेदनाओं से परे यदि कोई दुनिया होती है, तो वह दुनिया देवताओं की दुनियां है और ईश्वर साक्षी है पीहू ! कि हम देवता नहीं...", तो अच्छा हुआ न कि हम देवता नहीं... यदि होते तो एक दूसरे से अपने हृदय की बात कभी न कह पाते। 
    अब तक न जाने कितने काल्पनिक पात्रों को अपने शब्दों की माला में गूंथ कर छोटी-छोटी कहानियां लिखी और मां सरस्वती के गले में पहनाता चला गया, बेखबर इस बात से कि अच्छा लिखा या नहीं। लेकिन अजनबी लिखते समय मुझे अब किन्हीं शब्दों की जरूरत नहीं। क्योंकि मैं जानता हूँ, इस माला में मुझे शब्द नहीं अपने हृदय से निकलने वाली हर एक आह और आंखों से टपकाने वाले असंख्य अश्रुकणों को पिरोना होगा। 
   तुम्हारी मनमोहक मुस्कान, सीप जैसी बदामी गहरी आंखों के जलते दिये, डार्क गोल्डन स्वीडिश कार्ली हेयर, ताजे फूलों जैसी हंसी से गालों में पड़ने वाले डिम्पल और प्यार की रूमानियत में डूबे हुए लम्हों से तुम्हारी पवन प्रांजल मूर्ति को सजाना होगा।
     क्योंकि अब बात कल्पना की नहीं यथार्थ की है। यथार्थ ! जो कभी हमने साथ-साथ जिए हैं, महसूस किए हैं और एक दूसरे को दिए हैं। वे यथार्थ जो जिंदगी के न होने के बाद भी रहेंगे, किसी काल्पनिक कहानी की तरह, सदा के लिए अमर और अविभाज्य किंतु एक दूसरे में ही समाहित। वे यथार्थ जो जीवन की तरह सत्य और सुंदर हैं। जीवन और मृत्यु के चक्र के साथ भ्रमण करते हुए अनंत, सर्वव्यापी और अविनाशी हैं। 
    कभी मेरे मन में तुम्हारा विस्तार इस अनंत ब्रह्मांड की तरह बृहद और खुला था। लेकिन अब महसूस करता हूँ जैसे तुम एक बिंदु के रूप में मेरे अंतर्मन में समाहित हो चुकी हो। इसलिए तुम मेरी प्रत्येक कल्पना से भी परे हो। तुम्हें लिखने का अर्थ है अपने अंतर्मन को लिखना और भला इसे कौन लिख सका है?
       इसलिए फैसला लिया है कि मैं तुम्हें लिखूंगा नहीं। मैं तो तुमसे बातें करूंगा। वही बातें जो वर्षों पहले मैंने तुमसे की थी। जिस तरह और जिस अंदाज में की थी ठीक उसी तरह। शायद लिखने वाले हमें लिख सके लेकिन हम नहीं लिखेंगे। हम तो एकदूसरे से दिल की बातें कहेंगे और सुनेंगे। उसी तरह हसेंगे, मुस्कुराएंगे, रोएंगे और एकदूसरे के आंसू भी पोंछेंगे। 
    तुम्हारी बगिया के उसी आम के पेड़ के नीचे हम फिर मिलेंगे।  एक दूसरे के लिए नजरों में हजारों मोहब्बतें लिए अपलक एक दूसरे को देखते हुए घंटों बाते करेंगे।
    देखो तो, तुमसे वादा किया था कि तुम्हारी शादी के बाद मैं एकबार ही सही लेकिन तुमसे मिलने जरूर आऊंगा और आ भी गया। जब पहली बार आया था तो उस दिन भी यही तारीख थी, आज भी वही तारीख है, 5 नवंबर, लेकिन दोनों के बीच पांच वर्ष गुजर गए हैं। 
    झूठ बोलकर लाया है सत्य मुझे। लेकिन चलो उसे भी बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ। हो सकता है यदि उसने झूठ न बोला होता तो मैं यहां आने की हिम्मत कभी जुटा ही न पाता। आते समय रास्ते में उसने बताया कि बाबा न रहे। जानकर बहुत दुख हुआ और अपने दिल को तसल्ली भी दे ली। क्योंकि कभी उन्होंने कहा था कि हो सकता है कि तुम दोबारा यहां आओ और मैं न मिलूं, लेकिन उन्होंने यह तो नहीं कहा था कि तुम भी न मिलेगी ? 
     शाम को 4 बजे जब हम दरवाजे पर पहुंचे तो मुझे पूरी आशा थी कि दरवाजा तुम ही खोलोगी, लेकिन ये क्या बाहर से ताला बंद था!! सत्य ने दरवाजा खोला और बैग को बाबा के तख्त में रख दिया। तुम कहीं नहीं दिख रही थी और न ही तुम्हारी कोई आहट मिल रही थी। अभी भी मुझे आशा थी कि तुम निश्चित ही अटारी में होगी और पीछे का दरवाजा खुला होगा। 
     "तुम बैठो... मैं हाथ पांव धो लूं... फिर बगिया चलते हैं...", कह के सत्य बाथरूम में घुस गया। मैं बेसब्री के साथ गैलरी पार करके पीछे पहुंचा लेकिन यहां का भी दरवाजा अंदर से बंद था अब एक प्रश्न मुझे बार-बार परेशान करने लगा कि तुम कहां हो। मैंने तुम्हें धीरे से आवाज दी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मैंने फिर आवाज दी और अटारी में चढ़ गया। तुम वहां भी नहीं थी। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आखिर तुम कहां जा सकती हो... क्या बगिया में हो ? हां जरूर, तभी तो सत्य बगिया जाने की बात कर रहा है ? 
    मैं अलमारी में रखी किताबों को उलटने-पलटने लगा और उन्हीं के बीच तुम्हारी डायरी मिली। मैंने शुरू के दो-तीन पन्ने पढ़े फिर उसे ले कर वापस बैठक में आ गया और तुम्हारी डायरी को बैग में रख लिया। बैंड मैनर न ? तो क्या करू ? तुम तो पढ़ने को देती नहीं, तो इसलिए रख ली... इट्स ओके न ?
    जब मैं सत्य के साथ बगिया आया तब भी मेरी निगाहें बेचैनी से तुम्हें खोज रही थी। लेकिन तुम यहां भी नहीं दिखी ? मंगल मिला, मुझे देख कर बहुत खुश हुआ। मैंने उसे गले से लगा लिया। अभी तक तुम्हारे बारे में सत्य से पूछने के लिए सहज संकोच हो रहा था। सोचा पता नहीं क्या समझे ?  मुझे उसकी बीवी की इतनी फिक्र क्यूं है ? आखिर 5 साल गुजर चुके हैं... शादी भी हो चुकी है... वो दौर कुछ और था, उस दौर के लोग कुछ और थे... अब तो काफी कुछ बदल गया होगा..."
    हम बात करते-करते इसी आम के पेड़ के नीचे पहुंच गए। खाट पहले से बिछी हुई थी, शायद मंगल अभी यहीं पर लेटा था। मैंने मंगल से कहा, "मंगल तीन दिनों से शादी-ब्याह के चक्कर में फंसा था। वहां तो नहीं पी, आते समय ज्ञान ने बैग में डाल दिया था। देखो तो जरा। एक बनाओ... अब थोड़ा सा रिलैक्स हो लिया जाए... है न सत्य ?"
     वह कुछ नहीं बोला। मंगल ने एक पैग बनाया, मैने एक शिप लेते हुए कुछ संकोच के साथ सत्य से पूछा, "वैसे सत्य, पीहू कहीं नहीं दिखी... कहां है ?" 
    लेकिन सत्य चुप था। उसकी निगाहें दूर टीन-शेड पर टिकी हुई थी। उसकी चुप्पी मेरे लिए जानलेवा थी। पहली बार किसी अज्ञात आशंका से  मेरा दिल तेजी से धड़क उठा,
    "सत्य ! ...", मैंने कुछ कठोर शब्दों में पूछा, "प्लीज सत्य बोलो ... कहां हैं मेरी गर्लफ्रेंड...?"
    और इस बार सत्य की सिसकियों ने मुझसे सब कह दिया। बगिया वही थी, आम का पेड़ वही था, पंप हाउस भी अपनी जगह पर ही था। वहीं रखी खाट पर अपनी भींगी पलके लिए मैं बैठा था। 
     पहली मुलाकात की तरह ही जाड़ों के शुरुआती के दिन थे। शाम के चार बज रहे थे। एक हाथ में अधूरा जाम और दूसरे हाथ में सुलगती हुई सिगरेट।
     तो लो पीहू, अब कहानी शुरू होती है, उसी अधूरे जाम से जो तुम्हारी अटारी की खिड़की में आज से पांच साल पहले छोड़ कर गया था मैं...
5 नवंबर 2002.
तुम्हारा
अजनबी

   "पीहू अब हमारे बीच नहीं है...", सत्य के द्वारा कहे गए ये शब्द अभी भी मेरे कानों में गूंज रहे थे।
   मैं देर तक खामोश जड़ बैठा रहा। 
      "तुम झूठ बोलकर मुझे यहां तक ले आए !  क्यों ? ", मेरे स्वर कांप रहे थे।
     "हां, मानता हूँ हमने तुमसे सच छुपाया... क्योंकि हम जानते थे कि सच बताने पर तुम्हे तकलीफ होती... तुम यहां कभी आने के लिए तैयार नहीं होते... तुम यहां एकबार यहां आओ, यह पीहू की आखिरी इच्छा थी... उसने मुझे अपने पत्र में लिखा था कि मैं तुम्हें स्वयं यहां लेकर आऊं..."
      कभी-कभी इंसान करना कुछ और चाहता है लेकिन करता कुछ और है। वही हालत मेरी थी। मै रोना चाहता था, चीखना चाहता था। लेकिन जब दर्द के इंतहा हो जाए तो इंसान खामोश हो जाता है। फिर ना वह चीखता है, न चिल्लाता है न रोता है। मैने मंगल की तरफ खाली गिलास बढ़ाते हुए बोला, "एक और..."
      मंगल एक लार्ज बनाते हुए बोला, "सर जी ज्यादा तो नहीं होगी..."
    "नहीं मंगल ! भूल गए क्या,  देवताओं का वरदान है मुझ पर..." 
     मैने चारपाई पर उसी तरह लेट तकिए में अपनी कोहनी रखते हुए पहले पूरी तरह रिलैक्स हो कर गिलास से दो-तीन घूट भरे, हृदय से एक आह निकली, "पीहू..."
    मंगल अपनत्व से बोला, " सर जी ! हम तो समझे.. आप हमे भूल गए..."
      मंगल की तरफ देखते हुए मैने कहा, "काश ! मांगल, भूलना आसान होता है...? लेकिन कौन कमबख्त है जो उसे भूलने के लिए पी रहा है, मैं तो पी रहा हूँ कि उसे और शिद्दत से याद कर सकूं... मै तो पी रहा हूँ कि मैं उसे अपने अंदर रोता हुआ महसूस कर सकूं..."
    आगे के शब्द मेरी जुबान पर घुट के रह गए। पल भर के लिए उसका चेहरा मेरी नजरों के सामने आया... न कोई क्रंदन, न कोई हिचकी, न कोई सिसकी बस मेरी आंखों से अविरल अश्वधारा बह निकली।
       मंगल का मुंह खुला का खुला रह गया और सत्य एक दम खामोश। 
    कुछ देर बाद सत्य बोला, "बच्चे मत बनो शैल, प्लीज अब चुप हो जाओ…. जो होना था वह दो साल पहले हो चुका।
   मैं सिर्फ इतना ही कह पाया, "प्लीज लीव मी..."
   सत्य मेरे नजदीक आया, मेरे कंधे में हाथ रखते हुए बोला, "अपने आप को संभालना। मैं खेत का एक चक्कर लगा के आता हूँ...", फिर मंगल की तरफ देखते हुए कहा, "मंगल चाचा ! लो ये घर की चाभी... कमली को दे कर कहना डिनर तैयार कर देगी..."
   मैने सर झुकाए हुए उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए धीरे से बोला, "सॉरी सत्य ! तुम्हें दिलासा देने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है..."
   "इट्स ओके ! हम तो रो चुके यार... तुम अपने आप को संभालना... अधिक न पीना... यही सोच लेना... कभी उसने चाहा था कि तुम कभी भी देवदास न बनो..."
  सत्य कह के चला गया। मंगल भी जाने के लिए उठा तो मैने इशारे से रोक लिया।
   अचानक फिजा ने अपना रंग बदल लिया था। आम की लंबी छाया किसी प्रेत की तरह मुझे डरावनी लग रही थी। टीन शेड की तरफ डूबता हुआ सूरज किसी दैत्य की लाल आंखों की भांति विशालकाय और भयानक लग रहा था। पत्तों की सरसरहट मेरे कानों में मृत्यु गीत गा रही थी। 
    कुछ देर मैं इस तरह बैठा पीता रहा। जब गिलास खाली हो गई तो मैं खाट से उठते हुए बोला, "मंगल ! समेट लो सब..."
   मैं पूरी तरह उठ भी न पाया था कि गश खा चारपाई पर लुढ़क गया। पूरा आसमान घूमता नजर आया। मैं चीखा, "मंगल..."
   अगले ही पल मुझे महसूस हुआ जैसे देवताओं ने मुझसे अपना वरदान छीन लिया हो। फिर मुझे कुछ होश नहीं।
    जब कुछ होश आया तो मंगल को गीली तौलिया से अपना चेहरा पोछते देखा। उसके सर के ऊपर आम के पेड़ की बड़ी-बड़ी टहनियां और उनके ऊपर नीला आसमान था। मैंने खोई-खोई नजरों से मंगल की तरफ देखा फिर उसके गाल को अपनी उंगलियों से टटोलते हुए धीरे से पुकारा, "म मंगल...!"
    "जी सर जी..."
    "मुझसे लग गई थी क्या..."
     मंगल कुछ रुआंसे स्वर में बोला, "अरे नहीं सर जी, आपको कैसे लगेगी ! भूल गए आपको तो देवताओं का वरदान मिला है न !! आप सो गए थे..."
   मैंने चारों तरफ देखा, फिर मंगल से पूछा, "पीहू कहां हैं मंगल...?"
   मंगल मुझे अपने हाथ का सहारा देकर उठता हुआ बोला, "पीहू बिटिया!!... जी वो भैया जी के साथ घर गई हैं... मुझे कह गई है कि जब सर जी उठ जाएं तो उन्हें मड़ैया में ले जाना... आप चलिए वो भईया जी के साथ कुछ देर से आ जाएंगी..."
   मैं उसके कंधे का सहारा ले कर चल पड़ा। रास्ते भर अपने आप में बड़बड़ाता जा रहा था, "मंगल यह ज्ञान में कितना लापरवाह है... देखो आज जाना था... आज भी रुक गया... मेरे लिए खुद की जिंदगी भी तबाह कर रहा है... अच्छा बताओ तो मंगल मैं कितनी देर तक सोता रहा... और कब सोया ?"
   मंगल खमोश था। मैंने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा, "कुछ बोलते क्यों नहीं... मौन व्रत धारण कर लिया है क्या ? चलो दो पैग पिलाता हूँ... तब फिर तोते जैसे बोलने लगोगे..."
    जब मैं मड़ैया पहुंचा तो एक साफ सुथरा बिस्तर लगा हुआ था। एक बैग पटिया में रखा हुआ था। मैंने मंगल से पूछा, "मंगल यह किसका बैग है क्या कोई और भी आया है..."
    मंगल मेरी तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोला, "नहीं सर जी यह बैग तो आपका ही है...!! अभी आपने पास से कमली ले कर आई है..!!"
   मेरे चेहरे में भी आश्चर्य के भाव आ गए। "अच्छा मेरा है !!... नहीं मंगल यह मेरा बैग नहीं हो सकता... इसका रंग तो दूसरा है...कुछ बड़ा भी है... उठाओ तो जरा..?"
   मंगल ने बैग उठाकर मेरे पास रख दिया। मैंने चेन खोल कर देखा। उसमें ऊपर ही व्हिस्की की एक खुली बॉटल, एक गिलास, एक डायरी दिखी। मैंने तीनों चीज निकाल कर चारपाई में रखते हुए मंगल से कहा, "लो बनाओ... लेकिन मंगल ! ये डायरी किसकी है ?... मेरी तो नहीं लगती..?"
   मंगल मेरा कंधा झगझोरता हुआ कुछ तेज आवाज में बोला, "सर जी होश में आइये... ये डायरी पीहू बिटिया की है... क्या सचमुच आपको कुछ नहीं याद ?"
   मैंने कुछ गुस्से से कहा, "सचमुच से तुम्हारा क्या मतलब है,? और इससे मेरी याददाश्त का क्या संबंध? तुमने ही तो कहा है यह बैग मेरा है और पीहू भैया जी के साथ घर गई हुई है ? लेकिन उसकी डायरी मेरे बैग में कैसे...? यह बैग भी मेरा नहीं लगता... देखो कलर ही अलग है... मेरा तो बैग नीले कलर का था न ? ये तो ब्लैक कलर का है... तुम क्या कह रहे हो क्या छुपाने की कोशिश कर रहे हो मैं कुछ नहीं जानता..."
   "अरे सर जी... मैं आपको कैसे समझाऊं...", वह मेरे सामने घुटने के बल बैठते हुए बोला, "अच्छा यह बताइए यह कौन सा साल है...?"
   "लो यह पूछने की बात है ? मैं तो तारीख तक बता सकता हूँ... लेकिन यार मेरा सिर दर्द कर रहा है... पहले एक बनाओ.…", मैंने अपना सर पकड़ते हुए मंगल से कह।
   मंगल ने वही किया जो मैंने कहा। मैं एक ही सांस में पूरी गिलास पी गया, "हां तो तुमने क्या पूछा था कौन सा साल है मतलब ईयर न ? आज 10 नवंबर 1997 है... मेरी याददाश्त थोड़ी न चली गई है.."
   मंगल मुझसे बोला कुछ नहीं उसने डायरी मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा अब इसे देखिए। जब मैं डायरी पलट कर देखी तो मै चकित रह गया। डायरी के प्रथम पृष्ठ पर पीहू और इस गांव और जिले का नाम लिखा था। और डायरी 1 जनवरी 1998 से शुरू थी देख कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए, "मैंने फटी-फटी नजरों से मंगल की तरफ देखते हुए पूछा तो क्या यह..."
  वह बीच में ही बोला, "नहीं सर जी 1998 भी नहीं यह 2002 है... आप यहां दोबारा पांच साल बाद आए हैं..."
   "पांच साल बाद !!... यह तुम क्या कह रहे हो मंगल...", मैंने फटी-फटी नजरों से उसकी तरफ देखते हुए कहा। देखा पास ही कमली भी खड़ी है। मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, "कमली ! यह मंगल क्या कह रहा है... मैं यहां दोबारा आया हूँ !! वह भी पांच साल बाद...?"
   कमली दूसरी तरफ मुंह करके रोने लगी। मैं कतार दृष्टि से मंगल की तरफ देखते हुए कहा, "सचमुच मंगल मुझे कुछ भी याद नहीं मुझे तो यह भी याद नहीं कि मैं यहां से गया... एक मिनट... एक मिनट... हां मंगल मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है.... तुम ठीक कह रहे हो... मैं यहां से गया था। यहीं पर बैठकर हम चारों ने आखिरी जाम... हां यार मुझे याद आ रहा है...", फिर मुझे धीरे-धीरे याद आने लगा। बगिया से निकल कर पीहू के साथ इन्हीं पगडंडियों का आखिरी सफर सब कुछ... फिर यहां दोबारा आना सत्य का मुझे कहना सब कुछ। मैं जोर से चीख पड़ा, "पीहू..."
   मेरी इस चीख से खुद मेरी अंतरात्मा फट गई। मंगल ने कसकर मुझे अपनी बाहों में भर लिया, "मंगल... ओह मंगल... ये क्या हो गया...", मैं उसके कंधे पर सर रखकर बच्चों की तरह चीख रहा था, रो रहा था...
     "सर जी... होनी थी हो गई... कोई कुछ न कर पाया.... चुप हो जाइए... संभालिए अपने आप को.. उन्हें तो गुजरे हुए दो साल हो गए..."
   "नहीं मंगल... मुझे कुछ भी नहीं मालूम था... यहीं आ के मालूम पड़ा, वो भी अभी... यहां से जाने के बाद ज्ञान के टच में भी ज्यादा नहीं रहा... उसने भी कुछ नहीं बताया... और मंगल तुमने भी तो कुछ..."
    मंगल उदास स्वर में बोला, "लंबी कहानी है सर जी... सब बताऊंग...
    उसने कोने में रखी एक गिलास निकाल ली, "सर जी, आपके लिए..."
   "हां, बना लेना...", मैं हताश स्वर में बोला।
    मै उठ कर मड़ैया के बाहर आ गया, कमली कुछ दूर पर खड़ी थी। मंगल ने ग्लास मेरी तरफ बढ़ाते हुए कुछ आश्चर्य से कहा, "मैं तो समझता कि आपको कहीं ना कहीं से मालूम पड़ ही गया होगा..."
    मैने मंगल से कहा, "ये खाट यही बाहर बिछा दो, अभी तो काफी दिन बाकी है..."
    मंगल ने वही किया। मै बाहर खाट में बैठ गया। इस जगह से मेरे जीवन की कभी न भूलने वाली यादें जुड़ी हुई है। मंगल पास ही एक चौकोर पत्थर में अपनी ग्लास ले कर बैठ गया। 
    कुछ देर बाद मैने कमली को पुकारा था, "कमली ! इधर तो आना..."
   "अभी आई... ",  कमली ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। कुछ देर बाद मंगल बाहर आते हुए बोला, "मैं भैया जी को ले कर आता हूँ... उनको गए काफी टाइम हो गया..."
   मैं पीछे से बोला, "उनको अभी के बारे में कुछ न बताना"
    कुछ देर बाद कमली मेरे पास आई तो मैने उससे कहा, "तो कमली ! पीहू न रही अब... है न ?"
    पीहू का जिक्र आते ही कमली उदास हो गई। रोते हुए कहा, "हां सर जी... नहीं रहीं...", 
   मै आगे बोला, "आज खाना यही बनाओ... मैं मंगल के साथ रुकूंगा... रोना चाहता हूँ कमली... लेकिन रो नहीं पा रहा हूँ मैं...?"
     "अच्छा तो है सर जी... रोए तो फिर आंसू कौन पोंछेगा... ", 
    मेरे हृदय से एक आह निकली, "जो टीन शेड में है... वही पोंछेगी !"
    "नहीं सर जी...", कमली बीच में ही बोल पड़ी, "पीहू बिटिया का अंतिम संस्कार यहां नहीं हुआ था... मरने से पहले भैयाजी के नाम उन्होंने पत्र लिखा था... उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार आदिवासी बस्ती के पास हो... नदी के किनारे..."
   "नदी के किनारे !! ... तुम्हारा मतलब नदी तीर की आदिवासी बस्ती के पास ? लेकिन क्यों ?", मुझे आश्चर्य हुआ था।
    "आपके जाने के बाद उनमें बहुत बदलाव आ गया था। बचपन में कभी-कभी बाबा के साथ वहां जाया करती थी। एक दिन भैया जी के साथ गई। वहां की गरीबी देखी। आदिवासी बच्चों को देखा। उनके अंदर पता नहीं इतनी दया कहां से जागी, बहुत सारे काम उनकी भलाई के लिए किए और सरकार से भी करवाए। बहुत सारे बच्चों का स्कूल में एडमिशन करवाया, बहुत सारे बच्चे उनसे पढ़ने के लिए यहां भी आते थे ... उनकी गरीबी दूर कर उनके बढ़ावे के लिए वह हमेशा तैयार रहती थीं...  तीन सालों में उन्होंने बहुत कुछ किया। उन्हें बस्ती के लोग बहुत प्यार भी करने लगे थे... उन सभी के प्रति उनकी सोच ठीक उसी तरह थी जैसे एक बच्चे के प्रति एक मां की होती है... 
     सर जी इतनी कम उम्र में उनमें इतना बदलाव देखकर तो मैं दंग रह जाती...  बस्ती जाती तो अक्सर मुझे साथ ले जाती ... लेकिन सर जी ! आप यहां क्यों आए... नहीं आना चाहिए था... हम लोग को तो अब उनके बगैर रहने की आदत पड़ गई है... आप कैसे सहन करेंगे...?  हो सके तो आप कल ही यहां से निकल जाइए... मैं सब जानती हूँ..."
   "सब जानती हो... क्या जानती हो ?"
   "आप बहुत चाहने लगे थे उनको... और वो भी..."
   "तुम्हे कैसे मालूम... क्या कभी पीहू ने...", मैंने आश्चर्य से पूछा था।
    "नहीं सर जी उन्होंने कुछ नहीं कहा, और हर बात कहने की नहीं होती है, कुछ समझने की भी होती हैं। मैं तो उसी दिन समझ गई थी जिस दिन वह आपको लेकर टीन-शेड के पास गई थी। कभी भैया जी के साथ नहीं गई, लेकिन आपके साथ गई। कभी सोचा, क्यों ? क्योंकि वो आपको अपने पूरे परिवार से मिलाना चाहती थीं... अपनी पसंद को सभी को बताना चाहती थी...?"
    मैं जानता हूँ कमली सच कह रही थी और वे दृश्य आज भी मेरी आंखों में कैद हैं। हर एक लम्हा जो उस वक्त मैंने उसके साथ जिए हैं, हूँ-ब-हूँ उसी तरह याद हैं। मेरी आंखों में आंसू आते इससे पहले मैंने चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। कमली उसी तरह आगे कह रही थी, "यादें बहुत रुलायेगी आपको... इसलिए कहती हूँ... चले जाइए इन यादों से दूर..."
    मैंने अपने आंसू पोछते हुए उससे कहा, "नहीं कमली, मैने कभी उससे वादा किया था कि एक बार मैं उससे मिलने आऊंगा... शायद इसीलिए मेरी नियति मुझे दोबारा यहां ले आई... बैठो कमली... मै वहीं हूँ... संकोच मत करो... याद है आखिरी दिन के वो चार कुल्हड़... चलो उठा लो अपना... जिंदगी फिर वही से शुरू करते हैं..."
    कमली ने वहीं किया। मेरे सामने चौकोर पत्थर में बैठ गई। मैने पूछा, "कमली ! पीहू की डेथ कैसे हुई... मै तो कुछ जानता ही नहीं... सत्य से कुछ देर पहले ही मालूम पड़ा... "
    "तो आपको कुछ नहीं मालूम ! ... भइया जी और उनमें पता नहीं किस बात को ले कर झगड़ा हुआ था... आज तक कोई नहीं जानता... वो पीहू को छोड़ कर चले गए थे... यहां तक कि उनकी मौत के समय भी वो उनके पास नहीं थे...  उन्हें भर क्यूं दोष दें सर जी ! हममें से कोई यहां नहीं था..."
    कमली जो कह रही थी वह मेरे लिए अविश्वसनीय था, "क्या ? कोई नहीं था मतलब ?"
    "हां सर जी, कोई नहीं था। 6 महीने पहले बाबा गुजर गए थे... ध्रुव भइया आए...पीहू को बहुत कहा साथ चलने को लेकिन वो तैयार नहीं हुईं... भइया जी पर बहुत विश्वास करती थीं... क्या पता था कि एक दिन वही उनको छोड़कर चले जाएगे !"
   "और तुम लोग...?", मैने पूछा।
    "ये तो भैया जी को बुलाने शहर गए थे... मैं और मेरा लड़का यहीं थे... जब ये गए थे तो लड़के को थोड़ा सा बुखार था। लेकिन जाने के दूसरे दिन ही लड़के की तबीयत बहुत खराब हो गई... कस्बा ले जाना पड़ा ... वहां के डॉक्टर ने बताया कि पीलिया बढ़ गया है, हालत खराब है, एडमिट करना पड़ेगा। तो उसे लेकर उसी दिन शहर जाना पड़ा... सब कुछ इस तरह हुआ की वो अकेली रह गई..."
    "उफ़ ! ... एक गुमनाम मौत कमली !! ... उसके अंतिम पल में उसके साथ कोई न था...", मैं भभक के रो पड़ा।
    "हा सर जी कोई नहीं था... बाद में जब ये भइया जी को लेकर पहुंचे तो उनको मरे दो-तीन दिन हो चुके थे, उनकी लाश अटारी में...", कमली दूसरी तरफ मुंह करके रोने लगी।
   मैंने अपने आप को सामान्य करते हुए कमली से आगे पूछा, "मंगल को भइया जी कहां मिले थे...?"
   "यहां से पहले शहर अपने घर गए फिर वहीं से फैक्ट्री के काम से बंबई चले गए थे... मै चलती हूँ ... वो भइया जी आ रहे हैं... लेकिन यहां खाना बनाने के लिए भैया जी...?"
    "वो मान जाएंगे... मुझ पर छोड़ दो...", मैंने कहा।
    कमली चली गई। कुछ देर बाद ही वह सभी जरूरी सामान का इंतजाम करने में जुट गई। 
    "ये क्या !! क्या होने जा रहा है...?", कमली को सामान रखते देख उसने पूछा। 
   "कुछ नहीं... खाना यहीं बनेगा..."
   "ओह !! लेकिन..."
   "लेकिन कुछ नहीं, कमली सब इंतजाम कर लेगी..."
   "तो ठीक है... तुम लोग तैयारी करो... मै थोड़ा घर से हो कर आता हूँ... कमली कोई और सामान चाहिए तो बताओ ?"
   "नहीं सब है भैया जी..."
     उसके जाने के बाद मैने मंगल से पूछा, "ये बताओ... सत्य घर क्यूं गया...?"
    "सर जी... शाम की पूजा करते हैं..."
    "अच्छा यह बताओ इसके मम्मी-पापा आते हैं मिलने के लिए ?", मैने पूछा था।
    "जी कभी वो आते हैं, तो कभी भैया जी चले जाते हैं..."
     "हूँ... और ध्रुव भैया वही जर्मनी में हैं ?", मैने पूछा था।
    "जी अभी तो वही है... लेकिन सुना है बंबई में जल्द ही कोई कंप्यूटर की कंपनी खोलने वाले है... "
    "और तुम्हारा बेटा कैसा है...?"
   "अच्छा है, बोर्डिंग स्कूल में नवी कक्षा में पढ़ रहा है,... भैया जी ने ही सब प्रबंध किया है..."
    "चलो ये तो बहुत अच्छी बात है... तुम जाते हो मिलने...?"
     "जी साल में तीन बार परमिशन है, और एक माह गर्मी में घर भी आने देते हैं..."
     "सर जी और बना दूं...?"
      मैने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा था, "बना दो .. और अपने लिए भी... लेकिन ज्यादा नहीं..."
     कुछ देर बाद मंगल मुझे ग्लास थमा के बोला, "सर जी मैं थोड़ा कमली की मदद कर के आता हूँ..."
    मंगल चला गया। पीहू की मृत्यु मेरे लिए एक रहस्य बनती जा रही थी। एक ऐसा रहस्य जिसके सदमे में मैं था। दिल कर रहा था कि मैं चीख-चीख कर रोऊं? इस ढलती हुई शाम से, बहती हुई इन हवाओं से, बगिया के हर एक पेड़-पौधों से, उस परमपिता परमेश्वर से जो इस सृष्टि का नियंता है, मैं पीहू को मांग लूं।
    मेरे और पीहू के बीच का संबंध केवल मित्रता, चाहत और प्रेम का नहीं था। इससे अलग भी एक संबंध था और वह था दर्द और आंसुओं का, और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस संबंध की इंटेंसिटी सर्वाधिक थी। अपने दर्द में तो हर इंसान रोता है। लेकिन जो एक अजनबी के दर्द को महसूस कर उसे गले से लगाकर रोता है उसे क्या कहेंगे ? एक बिखरे हुए इंसान को उसने समेटा लेकिन जब वह बिखरी तो उसे समेटने के लिए, उसे गले लगा रोने के लिए मैं नहीं था। सत्य तुम एक बार तो कहते कि पीहू का तुम ध्यान नहीं रख पाओगे, एक दिन उसे छोड़कर चले जाओगे, तो मैं उसे छोड़कर कभी नहीं जाता। ... और उसी आग मे मैं जल रहा था।
     कभी मैने मंगल से कहा था कि बिना मांगे मुझे ईश्वर से एक वरदान मिला है, और वह है त्याग करने का। तो सत्य मैने तो बाबा के कहने पर तुम्हारे लिए पीहू का त्याग किया और एकदिन तुमने उसे ही त्याग दिया !! मैं अपनी सारी चाहतों का इज़हार करके भी उससे दूर चला गया कि कहीं मेरे कारण तुम्हारे रिश्तों में कोई कड़वाहट न आ जाए।
    लेकिन तुम वही एक रिश्ता निभाने में नाकाम रहे। मुझे सिर्फ उसकी ख़ूबसूरती से नहीं बल्कि उनकी स्वभाव, ज्ञान, और उसके लिटरेचर के प्रति रुचि से भी प्यार था। सूरत और सीरत के इस अदभुत संगम को तो तुम भी पसंद करते थे न ? तो फिर उसे गुमनाम मौत मारने के लिए छोड़ के जाने के तुम भी दोषी पाए जाते हो, और इसकी सज़ा तुम्हे नियति अवश्य देगी।
      लेकिन सत्य ने पीहू को छोड़ा क्यूं ? क्या ओथेलो, डेसडेमोना और कैसियो की कहानी की पुनरावृत्ति हुई थी ? थोड़ी देर के लिए मान लिया कि मैं कैसियो की जगह पर था तो फिर इस कहानी में इयागो कौन था ? क्या उन दोनों के बीच के फ्रैक्शन का कारण मैं था ? नहीं ! ये नहीं हो सकता ? मै तो जा चुका था और मेरे जाने के तीन साल बाद पीहू की मृत्यु हुई थी, और उसके भी दो साल बाद मैं यहां दुबारा आया हूँ। सत्य की नजरों में अब तक खुद के लिए न घृणा देखी न उपेक्षा? लेकिन सवाल यह उठता है कि जब पीहू है ही नहीं तो सत्य मुझे यहां लेकर आया क्यों? आखिर उसके मन में है क्या ?
     मैं जानता हूँ, प्यार और दर्द की इंटेंसिटी सबके लिए एक समान नहीं होती हैं। उसी तरह उसके प्रवाह की दिशा भी अलग होती है। सत्य के लिए पीहू का अस्तित्व जीवन-संगनी के रूप में था, लेकिन मैने अपनी चाहत को किसी भी रिश्ते की बंदिश से दूर ही रखा था। मुझे पीहू के होने से प्यार था, चाहे वह धरती के किसी कोने पर रहे। लेकिन आज पीहू है ही नहीं ! कैसे स्वीकार कर लूं ? 
     उसका शरीर, उसका साथ, उसका प्रेम और उसके साथ जिंदगी जीने की लालसा से तो मैं बहुत पहले ही दूर जा चुका था। तो आज उसके होने या न होने से मुझे क्या फर्क ? उसका अस्तित्व मेरे लिए भौतिकता से परे था। उसका रूप, सौंदर्य, उसकी गहरी बदामी आंखें, डार्क गोल्जन स्वीडिश कार्ली बाल ये सब कभी मेरे लिए थे ही नहीं। तो फिर उसके न होने से मेरे अंदर शोक की भावना क्यों ?
      क्या मुझे खुद को रोकना होगा ? जिस आध्यात्मिक प्रेम की शुरुआत 18 वर्ष की उम्र में हुई उसकी परिणीति पीहू के न होने के रूप में होना अब मेरी नियति है। लेकिन अपनी इस नियति को स्वीकार करना मेरे लिए मुश्किल क्यूं हो रहा है ? यदि पीहू की माने तो प्रेम की अवधारणा व्यक्तिपरक नहीं हो सकती। यह तो एक भावना है, और शायद इसीलिए मैं इस तथ्य से दूर आ चुका था कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है।
     पीहू का चेहरा, उसकी बातें, उसकी हंसी, उसकी मुस्कुराहट सभी याद आ रहीं थीं। जिंदगी के कैनवास पर यादों की हर एक तस्वीर है मेरे पास। उसके साथ जिंदगी के जिए गए हर एक लम्हे मेरे लिए यादगार हैं। आज भी पहली मुलाकात से लेकर आखिरी मुलाकात तक की जिंदा तस्वीरें मेरी नजरों में कैद हैं। उसके लिए लिखा गया पहला और अंतिम लव लेटर आज भी कई सवाल लिए मेरी डायरी में मुस्कुराता है। 
      और ये यादें काफी थीं मेरी आंखें को नम करने के लिए। मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठाता कि आखिर सत्य ने पीहू को उसके अंतिम क्षणों में छोड़ा क्यूं था ? ऐसी क्या मजबूरी थी ? मजबूरी थी या मानवीय दोष ?
    या कि फिर मैं ? मुझे सत्य समझ कर अपनी दोनों बाहें फैलाते हुए बेखुदी में उसके द्वारा मेरे ही लिए कहे गए उसके शब्द मेरे दिल-ओ-दिमाग में आज भी गूंजते से हैं, "... लेकिन सत्य ! ... वो... वो बहुत अच्छा इंसान है... तुम्हारी पीहू उसे बहुत... बहुत... पसंद करती है..."
    कुछ अर्ध-चेतन अवस्था में उसके द्वारा कहे गए इन शब्दों ने मुझे अंदर तक हिला दिया था और मैं सोचने पर मजबूर हो गया था कि शायद मुझे यहां से जल्द से जल्द चले जाना चाहिए और बाबा के कहने पर मैंने किया भी। कभी न लौटने का फैसला लेकर मैं यहां से चला भी गया। 
   भले ही कभी सत्य ने मेरी राइटिंग स्किल देखने के लिए पीहू को अपनी प्रेमिका मानकर प्रेम-पत्र लिखने के लिए कहा था, लेकिन वह पत्र तो सत्य ने कभी पढ़ा ही नहीं, और न ही पीहू ने सत्य के सामने ये शब्द कहे थे ! तो फिर !! तो फिर मैं उनके रिश्तों के बीच कैसे आ सकता था ? क्या कभी मुझे लेकर सत्य के हृदय में पीहू की निष्ठा को लेकर कोई संदेह पैदा हुआ था ? यदि ऐसा है तो निश्चित ही मुझसे गुनाह-ए-अजीम हुआ अब जिसकी कोई मुआफी नहीं। जिसने कभी मुझे जिंदगी दी, हौसला दिया, जिंदगी जीने के प्रति एक नया दृष्टिकोण दिया, तो क्या मैं ही उसकी मौत का कारण बन गया ? उफ़ ! ये तो जुर्म हुआ !!
       अस्ताचलगामी अपने सफर के अंतिम पड़ाव पर था। डूबते सूरज की ललिमा में एक अजीब सी उदासी थी।
      न जाने कितनी यादें जुड़ी है इस जगह से। भावुकता में लिखे गए एक पत्र का प्रभाव ज्ञान पर इतना पड़ा कि पत्र पढ़ते ही वह सीधे मेरे घर पहुंच गया। मेरी मोहब्बत का दूसरा गवाह मेरा हॉस्टल फ्रेंड। जिसके साथ मैंने तीन साल रूम के साथ-साथ दिल की बातें भी शेयर की। अपने साथ ले जाने की उसकी जिद के आगे मेरी एक न चली। मैंने उसे समझाना भी चाहा कि वह एक कमजोर लम्हा था, जो आया और आकर चला गया, लेकिन वह मानने के लिए तैयार नहीं था। 
     मैं जिस इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर साइंस पढ़ता था, 10-12 दिन की छुट्टी ली। आगरा, अलीगढ़, ग्वालियर इन जगहों पर या तो उसके रिलेटिव थे या हमारे हॉस्टल फ्रेंड थे हम लगातार सात-आठ दिनों तक घूमते रहे। एक शहर से दूसरे शहर, एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन पकड़ते रहे। अंत में जब उसके घर पहुंचे, तो पता चला की पूरा परिवार मौसी के यहां शादी में जाने के लिए तैयार है। ज्ञान तो मुझे भी अपने साथ ले जाना चाहता था। लेकिन मुझे वहां जाना बहुत ही अजीब लग रहा था, मैंने उसे साफ मना कर दिया, "देख यार तेरी जिद थी तो मैं चला आया, लेकिन वहां शादी ब्याह में मुझे मत ले जा, एक तो मौसी की बेटी की शादी है, तुझे भी दस तरह के काम करने पड़ेंगे। मैं वहां बोर हो जाऊंगा। वैसे भी तू जानता है, मुझे भीड़-भाड़ पसंद नहीं है। 
     हम लोगों में डिस्कशन चल ही रहा था कि उसका स्कूल का बेस्ट फ्रेंड यानी कि सत्यप्रकाश उससे मिलने आया। हम लोगों में पहली बार परिचय हुआ, और समस्या का हल निकला, "यार तुम चलो मेरे साथ। तीन दिन की तो बात है। तन्हाई पसंद इंसान हो न, वहां तुम्हें तन्हाई के सिवा और कुछ नहीं मिलेगा..."
    ज्ञान भी उसकी बात से सहमत था, "देख यार, तू सत्य के साथ चला जा। ज्यादा नहीं यहां से कोई 60 किलोमीटर है, रोड भी अच्छी है। बाइक के सफर में डेढ़ घंटे से अधिक नहीं लगेगा। जिस दिन मैं लौट कर आऊंगा तो मैं तुझे लेने आ जाऊंगा, मैक्सिमम फोर डेज... वैसे तू तीन ही मान..."
   नवंबर का फर्स्ट वीक, ठंड के शुरुआती के दिन जब मैं पहली बार इस जगह में पहुंचा था। यहां की दूर से दिखता सड़क के किनारे का घर, ये गलियां, ये बगिया पूरा का पूरा मौसम जाना पहचाना लगा रहा था। मैने सत्य से पूछा भी, "क्या मैं पहले यहां आ चुका हूँ ?"
   उसने कहा, "मुझे नहीं लगता... पर तुम्हे क्यूं लगता है...?"
   उसके इस प्रश्न का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैने मन ही मन सोचा था, सभी गांव कुछ-कुछ एक जैसे ही तो लगते हैं। यह मेरे मन का भ्रम है। जब मैं सत्य के साथ बगिया के अंदर पहुंचा तो पहला परिचय मंगल से दूसरा कमली से हुआ। 
   "तुम इस घर में रहते हो ...?", मैने सत्य से मड़ैया के पीछे बने घर की तरफ इशारा करते हुए आश्चर्य से पूछा था। 
    मेरी बात सुन सत्य हंसा था, "नहीं यार... वो देखो जो दूर घर दिखाई दे रहा है न ?... वहां रहता हूँ... यहां मंगल और कमली रहते हैं।
   "वो घर !! ... अभी उसी के पास से तो निकल कर यहां आए हैं... तुम इतने बड़े भूत बंगले में अकेले रहते हो...", मैंने जिज्ञासा से पूछा। 
  "नहीं, यह सब मैं सब बाद में बताऊंगा,  पहले तुम यहां नहा-धो कर फुर्सत हो लो, फिर घर चलेंगे ... मंगल ! ओ मंगल !! ...  सर जी के नहाने का इंतजाम करो ..."
   मंगल पास आता हुआ बोला, "जी भइया जी..."। फिर सत्य ने मंगल को कुछ समझा के चला गया।
  मंगल मुझे पंप हाउस के पास ले आया। चहरी से दो बाल्टी पानी, जग और एक साबुन दे कर चला गया। कुछ देर बाद वह सर पे एक चारपाई और कंधे पर मेरा बैग लटकाए हुए हाजिर हुआ, "मंगल तुम्हारे भैया जी कहां गए ...?"
   "जी वो घर गए है, कुछ देर में आ जायेंगे ... तब तक आप नहा लीजिए और आराम कीजिए", मंगल ने जवाब दिया।
  "अच्छी बात है...", मैने कपड़े उतरते हुए कहा, "जरा बैग खोलो टावेल और अंडर गारमेंट्स निकल कर चहरी के ऊपर रख दो...", इतना कह कर मैं नहाने में व्यस्त हो गया। कुछ देर बाद मैने चहरी की एक दीवाल के ऊपर टावेल और विस्की की बॉटल रखी देखी, देख कर दंग रह गया, "मंगल ये क्या है... ?"
   "जी सर जी, टॉवेल और अंडर...", मंगल मासूमियत से कह रहा था।
   "इसे अंडर गारमेंट्स कहते हैं...?", मैंने अपनी हंसी रोकते हुए कहा।
   "पता नहीं सर जी, हमारी तरफ तो इसे दारू कहते हैं... आपकी तरफ शायद अंडरग्रांट कहते हों ?"
    "उफ़! नहीं भाई हमारे तरफ भी इसे दारू यानि शराब ही कहते हैं, मैने तो तुमको...  छोड़ यार... भाई इसे उठा... मैं खुद ही निकाल लूंगा...", मुझे हंसी भी आ रही थी और ज्ञान के ऊपर गुस्सा भी। एक है तो छोड़ के चला गया और दूसरा ... बिल्कुल महान।
    मैने कपड़े पहने। बैग में सीसा, कंघी, ऑयल, क्रीम सभी था। मुझे खास किसी चीज की जरूरत नहीं महसूस हुई सिवाय इसके कि जोरो की भूख लग रही थी। मैने चारों तरफ देखा। बगिया शानदार थी, आम, अमरूद, आंवला, अनार जैसे फलदार वृक्ष खेत के किनारे-किनारे लगे थे। बीच में हरी सब्जियां। मंगल आम के पेड़ की जड़ में मुझसे कुछ नाराज़ बैठा था, बिल्कुल शांत। 
   मैने उसे प्यार से पुकारा, "मंगल ! तुम्हारी बगिया में कुछ खाने लायक है ? मतलब कंद-मूल, फल- फूल ?"
   "जी...", वह कुछ रूखेपन से बोला। 
    "तो हे पवन पुत्र !!  ... तो कुछ तोड़ लाइए, मुझे कुछ-कुछ भूख लग रही है। आपके भैया जी तो छोड़ के चले गए... अब आप ही कुछ सेवा कीजिए... और हां... उस प्रदर्शनी को जरा यहां दे दीजिए...", मैने बॉटल की तरफ इशारा करते हुए उससे बोला। वह उठा और बॉटल मेरी खाट में ला कर रखते हुए बोला, "मैं आता हूँ..."
   मैने बैग खोला, कपड़ों के बीच दो कांच की छोटी छोटी ग्लास जो अभी भी सुरक्षित थीं। मैने एक छोटा पैग बनाया। चहरी में पानी साफ ही था। मै उठा और एक जग पानी ले आया, मिलाया और एक ही बार में पी गया। दिमाग को कुछ रिलेक्स महसूस हुआ। मैने फटाफट दूसरा पैग बनाया और बॉटल को बैग में डाल, सिगरेट निकल ली लेकिन माचिस नहीं मिली।
    मैने ग्लास से एक घूट लेने के बाद उसे नीचे रख दिया। कुछ देर बाद मंगल तीन-चार अमरूद, एक बड़ा अनार, और गाजर ले कर हाजिर हुआ। मैने गाजर खाते हुए उससे कहा, "मंगल ये बगीचा और खेत तुम्हारा है ?"
      उसने मेरी गिलास की तरफ देखते हुए बोला, "नहीं... दाऊ साहब के हैं..."
     मैं इतना तो समझ गया था कि यदि मुझे यहां तीन-चार दिन गुजारना है तो इस इंसान को पटा के रखना पड़ेगा। लेकिन यह शीशे में उतरेगा कैसे...? शीशा... यानी कांच... मेरे दिमाग में खयाल आया... मैने गिलास से एक घूट लेते हुए उससे इशारे में पूछा, "लोगे...?"
    सर हिला कर उसका इंकार।
    मैने दूसरा घूट लिया फिर इशारे में ही कहा, "थोड़ा सा...?"
    इस बार न तो इंकार और न ही इकरार। 
   तीसरी बार मैंने उससे पूछा नहीं, बल्कि उसके लिए बनया। वह मेरे खाट के नजदीक बैठ गया और जल्दी से पूरी गिलास एक ही सांस में पी गया। फिर एक गाजर और एक मूली लेकर फिर आम के पेड़ की जड़ पर बैठ गया।
   मैं फल और कंद-मूल खाता जा रहा था और घूट-ब-घूट पीता भी जा रहा था। 
   फिर मैंने हम दोनों के लिए दूसरा बनाया। यद्यपि मंगल ने मना किया, "रहने दीजिए सर जी, भैया जी जान जाएंगे तो डांटेंगे ..."
   "यार मंगल एक पैग दुश्मन को पिलाते हैं।  तुम हमारे दुश्मन थोड़ी हो। कुछ नहीं होगा.... छोटे छोटे ही तो पी रहे हैं। वैसे भी यह व्हीस्की है, अधिक नहीं महकती।  भैया जी से बस दो कदम दूर रहना, नहीं जान पाएंगे..."
    और इस तरह मंगल दूसरे पैग के साथ ही मेरा दोस्त बन गया। मैं उससे पूछता गया वह बताता गया। अपने बारे में, दाऊ साहब के बारे में, सत्य के बारे में, और फिर एक नया नाम आया .... पीहू ! यानी कि दाऊ साहब की पोती। 
    गाजर मूली अमरुद अनार सभी ताजा थे खाने में बहुत ही स्वादिष्ट लगे, "यार मंगल, तुम्हारे कंद-मूल तो बहुत अच्छे हैं..."
   मैंने तीसरा बनाया, "अरे सर जी अब रहने दजिए..."
  "यार मंगल ! दो पैग तो दोस्त पीते हैं, लेकिन तीसरा पैक बेस्ट फ्रेंड पिता है,  मतलब जो बहुत गहरा दोस्त होता है... ",
   "जनता हूं सर जी... सातवीं तक पढ़ा हूँ...", वह पास आया अपनी गिलास ले कर पुनः वहीं बैठ गया। 
   "ओह ! अच्छी बात है !! .... माचिस है ?", मैने उसे सिगरेट दिखाते हुए पूछा।
    वह पंप हाउस के अंदर गया और माचिस मुझे देता हुआ बोला, "आप भैया जी के मास्टर साहब है ?"
    "ये तुमसे किसने कहा ...", मैंने आश्चर्य से पूछा था।
    और उसने भोलेपन से जवाब दिया, "नहीं!! वह आपको सर जी बोले न इसलिए..."
   "देखो मंगल मैं तुम्हारे भैया जी का मास्टर न सही लेकिन मास्टर हूँ... कंप्यूटर पढ़ता हूँ..."
   "ओह ! मर गए, सर जी...", मंगल चौंकते हुए एकदम से बोला।
   "इसमें मारने जैसी क्या बात है ?", मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
   "अरे नहीं सर जी .... मेरा मतलब वो देखिए ... पीहू बिटिया आ रही हैं... हे भगवान अब मैं क्या करू...", मंगल कुछ डरते हुए बोला। 
  मैने देखा, दूर गेट के उस पार खेतों के बीच से गुजरती हुई पगडंडी में एक हाथ में झोला लिए हुए, ब्राउन कलर का सलवार सूट पहने एक सामान्य हाइट की लड़की चली आ रही है। जिसके कमर तक झूलते डार्क गोल्डन कलर के बाल धूप में चमक रहे थे। मैंने मंगल की तरफ देख और कुछ हंसते हुए कहा, "रिलैक्स मंगल रिलैक्स ...डरते क्यों हो ? पहले अपनी बची हुई खत्म करो, फिर जल्दी से मुंह हाथ धो लो, और पकड़ो ये अमरूद। खाते हुए निकल जाओ..."
   मंगल ने वैसा ही किया। लेकिन कुछ नर्वस था, मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा, "तुम बिल्कुल ठीक हो मेरे भाई, नशे में नहीं लग रहे... बस दो कदम का फासला रखना... अब जाओ..."
   "शायद आपके लिए खाना ले के आई हैं... मैं अभी वहीं जाकर ले लेता हूँ...", फिर मंगल तेज कदमों से लगभग भागता हुआ गेट की तरफ चला गया। 
      मैंने एक सिगरेट जलाई, और बैग से टाइम पास के लिए एक पोएट्री बुक निकली। बैग को सिरहाने रख आराम से उस पर कोहनी टिका अध-लेटें बुक पढ़ने लगा। थोड़ी देर बाद मंगल की पुकार सुनाई दी, "सर जी !..."
    मैंने उसकी तरफ बिना देखे हुए पूछा, "हां मंगल, तो चली गई तुम्हारी पीहू बिटिया....?"
    जब मंगल से कोई जवाब न मिला तो मैंने पलट कर उसकी तरफ देखा। मंगल से कुछ ही दूरी पर वही लड़की खड़ी थी। मेरे एक हाथ में बुक और दूसरे हाथ में जलती सिगरेट... खाट के पास ही रखा एक अधूरा जाम और विस्की की बॉटल। बढ़ी हुई दाढ़ी और डेढ़ बीते से भी ज्यादा बड़े बाल... जो हवा चलने के कारण आपस में उलझ कर माथे तक बिखरे हुए थे। आंखों में टूटे, कुछ अधूरे ख्वाब की परछाई... हृदय में अंगड़ाइयां लेती बहुत-सी बेचैनियां। तीन पैग के शुरूर के साथ... उसी की बगिया के आम के पेड़ के नीचे... एक खाट में अध-लेटे... इस कहानी के राइटर की... इसी कहानी के एक अहम हमउम्र किरदार से पहली रू-ब-रू मुलाकात थी। 
       मैं खाट के नीचे पांव लटका कर बैठते हुए सवालिया निगाह से उसकी तरफ देखा, "आप पीहू...?"
   "जी हां... नमस्ते !!", एक पल के लिए उसके चेहरे में मुझे भय की लहर दिखी। उसकी नजरों में मुझे अजीब-सा डर दिखा। लेकिन दूसरे ही पल बिल्कुल शांत और शालीन। मैंने सोचा शायद मेरे चारों तरफ का माहौल देखकर उसे मुझसे डर लगा हो। मैं उसे बराबर देखता जा रहा था। यदि उसके बालों के रंग को छोड़ दिया जाए तो उसका पूरा चेहरा मुझे बहुत ही जाना पहचाना नजर आ रहा था। शर्मिंदगी और संकोच के मिले-जुले भावों से मैंने भी उसके अभिवादन का उत्तर दिया। मैंने भी अपने दोनों हाथ जोड़ दिए, "जी नमस्ते ...!  सॉरी... इस तरह...", मैंने हड़बड़ाते हुए क्षमा मांगी और जलती सिगरेट दूर फेक दी।
    उसने मेरे द्वारा फेंकी गई जलती हुई सिगरेट की तरफ देखा, फिर कुछ गुस्से से मेरी तरफ, उसके बाद मंगल की तरफ।
      मंगल भागता हुआ सिगरेट के पास पहुंचा और पैर से उसे कुचलते हुए बोला, "वो क्या है न सर जी, आसपास खेतों में कटी हुई फसल रखी हुई हैं, तो आग लग सकती है, इसलिए..."
     "सॉरी ....", मैंने लापरवाही से कहा।
     "चलिए खाना खाइए..."
   मैंने उससे रिक्वेस्ट की, "नहीं आप परेशान मत होइए... मंगल मुझे परोस देगा... प्लीज... अब आप जाइए..."
   इसबार बदले में वह थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली, "मैं नहीं देख रही... वैसे भी मेरे आंख बंद कर लेने से दुनिया में अंधेरा नहीं हो जाएगा...",
     फिर वह मंगल से बोली, "मंगल जाओ एक जग और गिलास में पानी लेकर आओ... और ये क्या ? खाट में कुछ डाल तो देते... ऐसा करना दरी और तकिया भी लेते आना..."
   पीहू मंगल को निर्देश देती जा रही थी और मैं इधर जल्दी से ग्लास खाली कर सामान समेटने में व्यस्त हो गया। बॉटल और गिलास को बैग के अंदर डाला। मग के बचे हुए पानी से मुंह और हाथ धोया। इस बीच मैंने पूछा, "सत्य नहीं आया ?"
   "माइंस में जरूरी काम निकल आया था..", उसने आगे बताया, "घर के पास की नौकरी अच्छी भी होती है और बुरी भी... यही कुछ दूर पर माइंस चलती है। कोई काम पड़ता है तो चले आते हैं बुलाने के लिए। यदि आपको पीनी जरूरी ही थी तो कम से कम साफ-सुथरा पानी तो मंगल से मंगवा लिए होते...", और मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि यह मुझे डांट रही थी या समझा रही थी।
    "जी सॉरी ! ...",  मैंने किताब को चारपाई में एक तरफ रखते हुए कहा। सॉरी शब्द मेरी जुबान से अनायास और अपने आप ही निकलते जा रहे थे। तहजीब का प्रभाव था या फिर उसकी डांट का असर?
   "कौन सी बुक है... मैं देख सकती हूँ...?"
   "जी बिल्कुल, क्यों नहीं...", मैंने बुक उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा। चलो इस बहाने मुझे डांटते की तरफ से इसका ध्यान तो हटेगा। 
    "ओह ! गोपाल दास नीरज ! क्या बात है !! आपको पोयट्री पसंद है ?", इस बार प्रसन्नचित और मुस्कुराते हुए उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा था।
     मैंने फौरन मौके का फायदा उठाया, "जी बिल्कुल, बहुत पसंद है, रेलवे स्टेशन में देखी, दो-चार पन्ने पढ़ी, अच्छी लगी तो ले ली... वो आपने एक फेमस गीत तो सुना होगा, पुरानी मुवी का, बच के निकल जा इस बस्ती से करता मोहब्बत कोई नहीं, इन्होंने ही लिखा है...", मैंने अपना इंप्रेशन जमाने के उद्देश्य से कहा। 
       "जी पता है...", उसने धीरे से कहा था। 
       पता है!! मेरा चेहरा बुझ गया। वह किताब के पन्ने पलटती जा रही थी और कुछ-कुछ पढ़ती भी जा रही थी। इस बीच उसने पूछा था, "आप इस तरफ पहली बार आए हैं ?"
      "जी हां, अजनबी जगह में एक अजनबी हूँ । सत्य के अलावा किसी को नहीं जनता, अभी कुछ देर पहले मंगल से परिचय हुआ है, और अब आपसे हो रहा है...", मैंने सहानुभूति जुटाने की कोशिश की।
    "आप करते क्या हैं...?", उसकी तरफ से अगला तीर।
      और इस बार मैंने तय कर लिया कि इस तीर को तो पास नहीं फ़टकने दूंगा। इसके प्रभाव को तो बीच में ही खत्म करूंगा।
    "मैं ? क्या करता हूँ ...? तो गौर फरमाइए...
    औरों का धन सोना चांदी,
    अपना धन तो प्यार रहा, 
    दिल से जो दिल का होता है, 
    वह अपना व्यापार रहा।
 
     उसने गौर से मेरी तरफ देखा। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "जो बुक आपके हाथ में है...
     "ये कविता इसी में है....  है न ?, मैने अभी-अभी देखी है…", 
    तीर वापस मुझे ही आ कर लगा। 
        "... वैसे मैं अपने शहर के एक इंस्टिट्यूट में प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पढ़ाता हूं... जावा, सी प्लस-प्लस का नाम तो सुना होगा...?", इस बार मैंने अपनी समझ से दिव्यास्त्र चलाया था।
      "उसने फिर ध्यान से मेरी तरफ देखा। आशा थी कि  "नहीं सुना...", लेकिन जब वह हौले से मुस्कुराई तो मुझे अपने पूर्वानुमान पर शंका हुई है।
      "जी सुना है, ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड बेस्ड कंप्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है... जावा को सन माइक्रो सिस्टम्स ने इंट्रोड्यूस्ड किया है, जेम्स गोसलिंग इसके प्रमुख डेवलपर हैं... आई थिंक 1995 में मार्केट में एज अ लैंग्वेज इंट्रोड्यूस्ड हुई है... और क्या करते है...?"
       मेरे दिव्यास्त्र को धराशाही करते हुए उसने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया। मै चकित था, केवल सुना ही नहीं बल्कि ये तो जावा का इतिहास जानती है !! हे भगवान !!!
       अब मैंने उसको सर से लेकर पांव तक तिरछी नजर किंतु ध्यान से देखा। उसका ध्यान मेरी तरफ न होकर बुक पढ़ने की तरफ था।
    बाल कार्ली, खुले हुए लेकिन क्लिप लगाकर पीछे की तरफ संवारे गए थे। उनका रंग बिल्कुल अलग, ऐसा रंग जिसे आज से पहले मैने रू-ब-रू कभी नहीं देखा था। न पूरी तरह से गोल्डन और न ही पूरी तरह से मैरून बल्कि इनके बीच का रंग, जिन्हें कुछ कुछ डार्क गोल्डन कहा जा सकता है। मैने किसी मैगज़ीन में पढ़ा था कि इस कलर के बाल अधिकांशतः नार्वे और स्वीडन की लड़कियों के होते हैं। 
    दुपट्टा अपने सही जगह पर था। मतलब लड़की में संस्कार हैं। कान के इयर रिंग्स आधुनिक किंतु छोटे-छोटे हैं। सलवार सूट की फिटिंग ज्यादा चुस्त नहीं है। पांव की चप्पल महंगी जरूर लग रही है, किंतु कलर ज्यादा भड़कीला नहीं है। चेहरे की ब्यूटीनेस नेचुरल है, यानी मेकअप का ज्यादा रोल नहीं है। बातचीत का लहजा और ज्ञान का कुछ-कुछ प्रदर्शन तो हो ही चुका था। मतलब लड़की आधुनिक तो है... लेकिन तहजीब वाली है।
      अंत में मैंने निष्कर्ष निकला कि लड़की खानदानी, रहीश, आधुनिक और प्रतिभा संपन्न है, जिसमें फैशन और आधुनिकता का दिखावा नहीं है। ये गांव की साधारण लड़की के लक्षण नहीं हो सकते। इसकी पूरी डेप्थ जाने बिना अपना एटीट्यूड दिखाने का मतलब है, आ बैल मुझे मार। तो अब ?
     रणछोड़ बनना पड़ेगा। मैंने साधारण ढंग से ही उसकी बात का जवाब देना उचित समझा, "जी साथ में प्राइवेट बीकॉम कर रहा हूं, सेकंड ईयर है..."
      "कंप्यूटर किसी प्राइवेट इंस्टिट्यूट से सीखा है या फिर...",  उसके दिव्यास्त्रों की मारक क्षमता बढ़ती जा रही थी। लेकिन अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। क्योंकि मैं पुरुष के एक स्वाभाविक अभिमान को छोड़कर बिल्कुल डिफेंसिव मोड में आ चुका था।
   "जी कंप्यूटर साइंस से पॉलिटेक्निक की है..."
   "ओह ! ..."
    "और अपने कहां से किया है...", मैंने दबे पांव पहला कदम बढया था।
     "क्या ? "
     "कंप्यूटर...?"
     "किसने कहा कि मैंने कंप्यूटर किया है, वह तो स्कूल में पढ़ा है। फंडामेंटल ऑफ़ कप्यूटर, बेसिक प्रोग्रामिंग लैंग्वेज और सी... सब्जेक्ट में था "  
    मैंने बढ़े हुए कदम को दबे पांव पीछे खींच लिया। स्कूल में सब्जेक्ट के रूप में पढ़ा है ! तो इसकी एजुकेशन मध्य प्रदेश की नहीं हो सकती। मैं समझ गया कि मैं खुले मैदान में हूँ और यह बैरक में। गोलीबारी से कोई फायदा नहीं। जो पूछा जाए सभ्य मेहमान का धर्म समझ सीधे-सीधे जवाब देते जाओ। कौन सा मुझे इसे इंप्रेस करना है... ? 
   उसने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए फिर एक अप्रत्याशित प्रश्न पूछा, "लिटरेचर में इंटरेस्ट हैं .."
    " हु ! कभी-कभी जब खाली समय होता है तो पढ़ लेता हूं ... अब लैंग्वेज कोई भी हो, चाहे कंप्यूटर की c++ हो या फिर हिंदी या इंग्लिश हो, क्या फर्क पड़ता है ? तो इसे भी पढ़ लेता हूँ...",  मैने थोड़ा रूखेपन से जवाब दिया था। 
     "आप की एज क्या है...?", अगला प्रश्न। 
      अरे यार ये कुछ देर यहां और रही तो तो खाना पीना दुभर कर देगी। मैंने कुछ खीजते हुए कहा,  "मेरी एज...! कभी हिसाब नहीं लगाया। अगस्त 1974 का जन्म है... एज का हिसाब अब आप ही लगा लीजिए..."
    उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, "आप अपनी एज से अधिक मेच्योर्ड लगते हैं... "
    मै हंसा था, "अच्छा !! .... तो यह भी बता दीजिए, कि बाई फेस या बाई बिहेव ..."
   "दोनों से... ", उसकी मुस्कुराहट ब-दस्तूर जारी थी।
   "थैंक्स फॉर कॉम्प्लीमेंट्स... वैसे भी सुना है, लड़कियों को बच्चे पसंद नहीं...", मैने अपनी डिसग्रेस को मुस्कुराते हुए उसे ही वापस कर दिया। 
   "हाजिर जवाब भी हैं... ", उसने भी उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
    तभी मंगल समान लेकर पहुंचा। उसने खाट पर दरी बिछाई और उसने टिफिन निकालकर मेरे सामने रखते हुए कहा, "लीजिए... मंगल तुम इनका ध्यान रखना और देखो जब खा लें तो टिफिन घर पहुंचा देना... आप की बुक ले जा रही हूँ... आप बोर तो नहीं होंगे...?"
    "जी नहीं, शौक से ले जाइए, वैसे भी खाने के बाद आराम ही करूंगा... काफी थका महसूस कर रहा हूँ...", मैंने व्यंगात्मक लहजे में कहा।
   वह जाने के लिए दो कदम आगे बढ़ी ही थी कि मैंने धीरे से पीछे से पुकारा, "पीहू !..."
    वह पलटी, मेरी तरफ देखा, जैसे पूछ रही हो, "क्या है...?"
    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "सॉरी विथ थैंक्स..."
    उसने कुछ रूखेपन से संक्षिप्त जवाब दिया, "इट्स ओके..."
    सामान्यतः मैंने लोगों को थैंक्स का जवाब वेलकम, या माय प्लेजर से देते हुए सुना था, लेकिन 'इट्स ओके...' पहली बार सुन रहा था। उसके चेहरे के भाव और कहे गए शब्दों में मुझे सच्चाई नजर आई। कोई नकली मुस्कुराहट नहीं, कोई दिखावा नहीं, कोई अदाकारी नहीं, सिर्फ सच्चाई। एक अजनबी और शराबी का वह वेलकम कैसे और क्यों करे ?
   वह मुड़ी और चार- छः कदम चलने के बाद स्वयं पलटी और पूछा, "कुछ कहा आपने...?"
  मैंने धीरे से मुस्कुराते हुए इंकार में अपना सर हिला दिया। 
  वह चली गई। उसके जाते ही मैंने मंगल से कहा, "ला बना एक जल्दी से... सब उतर गई यार... "
   "मेरी भी सर जी, पीहू बिटिया से बहुत डर लगता है। ... वो जानती तो है कि मैं कभी-कभार पी लेता हूं, लेकिन आज तक न सामने पी है और न ही पी कर उनके सामने गया हूँ...", मंगल ने अपनी आपबीती सुनाई। 
     "हूँ ... तो अपने लिए भी बना लो...  हो सकता है... कल को तुम्हारा यह रिकार्ड टूट जाए..."
    "मतलब...!!"
    मैंने अभिनेता राजकुमार की नकल करते हुए कहा, "जानी ! मतलब के चक्कर में पड़ोगे तो जान से जाओगे... अभी तो तुम हमारे लिए एक ड्रिंक बनाओ...",  मंगल मुझे टुकुर-टुकुर देखता रह गया।
     मंगल मेरी सेवा करता रहा, साथ में मैं खाना खाता रहा। और मन ही मन बोला, "पीहू जी ! कुछ भी हो, यदि यह खाना आपने बनाया है तो आप काबिल-ए-तारीफ है... जैसे आपके ये डार्क गोल्डन रेशमी कार्ली बाल।
     अचानक मेरे दिमाग में बिजली कौंध गई, यह मंगल किस दिन काम आएगा। और खाना खाते-खाते मैंने उससे पीहू और उसकी फैमिली के बारे में जितना उसे मालूम था सब पता कर लिया। 
    ओह !... तो मैडम जी मुंबई में पढ़ी हैं, इसीलिए इतना ज्ञान है। लेकिन सत्य और पीहू के बीच क्या रिलेशन है, यह मंगल भी पूरी तरह से नहीं जानता था। हां उसने संभावना जरूर व्यक्त की थी कि हो सकता है कि कल को उनकी शादी हो जाए। 
   जब मैंने खाना खा लिया तो उसने खाली टिफिन समेटकर एक किनारे रखा और मुझसे बोला, "सर जी अब आप आराम कीजिए, मैं थोड़ा कमली के साथ बगिया के काम देखूं लूं..."
    "हा जाओ...", मैंने तकिया में आराम से सर रख लेटते हुए कहा, "पर ध्यान रखना, कमली से..."
   "दो कदम दूर...", वह हंसते हुए बोला।
    "नहीं... पत्नी से चार कदम दूर... समझे ?", मेरी बात सुनकर वह मुस्कुराते हुए वहां से चला गया। 
   मैं बिल्कुल एक अजनबी जगह पर था। लेकिन यहां का मौसम, ये बगिया मुझे अपनी-सी लगी। लेकिन दो प्रश्न मुझे अभी भी परेशान कर रहे थे। पहला ये लड़की मुझे देख कर पहले कुछ चौंकी फिर कुछ देर के लिए ही सही उसके चेहरे में भय की लहर दौड़ गई, क्यूं ? दूसरा, वह मुझे जानी पहचली क्यूं लगी ?
   मैने दिमाग को झटका दिया, "कभी इस तरह का कोई चेहरा देखा रहा होगा। मैं भी पता नहीं क्या सोचने लगता हूँ। 
    कुछ देर बाद मुझे नींद आ गई। जब आंख खुली तो सत्य को अपने सामने खड़ा हुआ पाया। मैने कैजुअली पूछा, "क्या टाइम हुआ यार ?"
   "कुछ अधिक नहीं, टी-टाइम... यदि तुम्हारा ड्रिंक टाइम खत्म हो गया हो तो ?"
   "यार ताने मार रहे हो या शिकायत कर रहे हो ...?"
   "दोनों ही नहीं... मजाक कर रहा हूँ... उठो, जल्दी से मुंह हाथ धो लो... और चलो मेरे साथ...."
   "लेकिन एक मिनिट !!... मैने यहां पी है, ये कैसे मालूम पड़ा ? मंगल ने बताया ? लेकिन वह कैसे बता सकता है ? वह तो खुद ही डर-डर के ...। कहता था भैया जी जान जाएंगे तो डटेंगे ?ओह ! तो जरूर उस लड़की ने बताया होगा क्या नाम है उसका, हां पीहू... ओह ! तो उसने चुगली की !! यार बच के रहना पड़ेगा ?  मेरे पीछे जासूस छोड़ रखे हैं ?", मैंने कुछ चिंतित होने का अभिनय करते हुए कहा।
       उसने मुस्कुराते हुए फिर पूछा, "तो चले ?..."
      "हां क्यूं नहीं ! ऐसी प्यारी क्यूट सी स्माइल के साथ पूछोगे तो भला कौन मना करेगा... लेकिन यार जिस घर ले जा रहे हो, उस घर में खुद तुम्हारी पोजीशन क्या है, पहले यह तो क्लियर करो। ताकि मैं अपना बिहेवियर निर्धारित कर सकूं कि किसके साथ कैसे रिएक्ट करना है ?",  मैने कपड़ों में परफ्यूम डालते हुए कहा। 
    सत्य बता रहा था, मै सुन रहा था। सभी कुछ सही-सही बताया लेकिन खुद और पीहू के रिश्ते के बीच की बात उसने पूरी नहीं बताई। उसने बस इतना कहा कि वह उसकी एक अच्छी दोस्त है। उस वक्त मैंने अंदाजा लगाया था कि सत्य जरूर पेइंगगेस्ट होगा, या फिर पीहू के बाबा से कोई जान पहचान होगी।
   मैंने पास ही खड़े मंगल से कहा, "ये बैग मड़ैया के अंदर रख लेना, और हां... टिफिन न पहुंचाया हो तो दे दो ..."
   "पहुंचा दिया है...", मंगल ने संक्षिप्त जवाब दिया।
    मै सत्य के साथ पहली बार उस घर में पहुंचा जिस घर के इर्द-गिर्द यह पूरी कहानी चल रही है और शायद जीवनपर्यंत मेरे अंतर्मन में चलती रहेगी। प्रवेश आंगन के गेट की तरफ से हुआ। सामने बैठक में बाबा को तख्त में बैठे हुए देखा। सत्य ने मेरा परिचय उनसे करवाते हुए कहा, "बाबा यही हैं मेरे दोस्त जिनके बारे में आप को सुबह बताया था..."
     सत्य के मुताबिक उन की ऐज 80 साल के ऊपर थी, लेकिन लग कहीं से नहीं रही थी। चेहरे की चमक शरीर का संतुलन उनकी उम्र को कम ही दिखा रहा था। कुल मिलाकर एक आकर्षक व्यक्तित्व। मैंने आगे बढ़कर उनके पैर छुए। उन्होंने एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा, "बैठो बेटा..."
     कुछ देर तक वे मुझसे मेरी व्यक्तिगत जानकारी लेते रहे... इसी बीच पीहू ट्रे में तीन कप चाय लेकर हाजिर हुई। मैंने फॉर्मेलिटी के लिए उससे पुनः हाथ जोड़कर नमस्ते किया। प्रतिउत्तर में उसने सिर हिलाकरते हुए कहा, "जी नमस्ते ! लीजिए ..."
    पहला मैंने, दूसरा सत्य ने और तीसरा कप वह स्वयं लेकर एक कुर्सी में बैठ गई। ट्रे में नमकीन और बिस्किट भी रखी हुई थी। मैंने जिज्ञासा से पूछा, "और बाबा आप...?"
   "नहीं...! तुम लोग आराम से पियो। मेरा कुछ देर में पूजा का टाइम हो रहा है। वैसे भी मैं चाय नहीं पीता हूँ..."
     हम लोग कुछ देर तक बाबा से और आपस में बातचीत करते रहे। फिर मैं सत्य के साथ घर के पीछे की तरफ आ गया। साफ-सुथरा कच्चा मकान, बाहर कुछ खुला मैदान और गौशाला उसके आगे सड़क और सड़क के उस पार एक बड़ा शीशम का पेड़।
    जब हम वापस घर के अंदर पहुंचे तो दरवाजे के दाहिने तरफ ऊपर जाती हुई कच्ची मिट्टी की सीढियां नजर गई। मै समझ गया कि ऊपर अटारी होगी, जिसकी खिड़की बाहर से मुझे दिखाई दी थी। सत्य ने मुझे खुद ऊपर चलने के लिए कहा। जब मैं अटारी पहुंचा तो उसकी साफ-सफाई, सामान रखने का तरीका ये सब देख कर मैं काफी प्रभावित हुआ।
      "ये पीहू की अटारी है, यही उसकी छोटी-सी दुनिया है...", सत्य मुझे आगे बता रहा था, "जब मैं घर में नहीं होता हूँ... तो पीहू का समय यहीं गुजरता है... और ये रही उसकी बुक्स, यही सब पढ़ती रहती है...", उसने एक अलमारी की तरफ इशारा किया।
      "जब मैं घर में नहीं होता हूँ...", सत्य के इस कथन को सुनकर मैं थोड़ा सा चौक था किंतु जाहिर नहीं होने दिया। मैने अलमारी में वह बुक भी रखी हुई देखी, जो पीहू ने दोपहर को मुझसे ली थी। मैंने दूसरी किताबें भी उल्टा-पुल्टा के देखी। कुछ जनरल नॉलेज की और बहुत सारी साहित्य की किताबें। हिंदी, इंग्लिश, संस्कृत, मराठी इत्यादि भाषाओं में। किताबों का स्तर यह बता रहा था कि इन्हें पढ़ने वाला कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। मैंने सत्य से उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, "इतनी कम उम्र में साहित्य में इतनी रुचि !  यहां तक की संस्कृत और मराठी में भी...!! जीनियस !!! "
      यहीं से पीहू के प्रति मेरी धारणा बदलने लगी थी। यदि किसी में ज्ञान और प्रतिभा है, तो फिर है, और हमें उसका सम्मान करना चाहिए।
      सत्य आगे बता रहा था, "अरे !! ये तो रनिंग हालत की हैं, और भी हैं। उधर बक्से में रखी है, और जो बची है, वे लिस्ट के रूप में मेरी जेब में पड़ी हैं, यह देखो...", मैंने दृष्टि लिस्ट पर डाली और मुस्कुरा दिया। उसकी आंखों की चमक और पीहू के प्रति उसका दृष्टिकोण मुझे साफ बता रहा था कि उनके बीच केवल दोस्ती का संबंध नहीं हो सकता...
     "शैल, तुम यहीं रुको, मैं अभी आया। कमली आई है, गाय बछड़ों को चारा-भूसा, पानी देना है। दूध भी दुहना होगा। मैं पीहू की हेल्प करके आता हूं..."
     "ठीक है, तुम जाओ, मै यही हूँ... ", सत्य नीचे सीढ़ियां उतरता चला गया, और मैं खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया। खिड़की से बाहर देखा, कमली, पीहू और सत्य तीनों गौशाला के सामने खड़े थे। कुछ देर बाद सत्य को टोकरी में भूसा उठाए हुए देखा। पीहू कमर में दुपट्टा कसे हुए कमली को निर्देश दे रही थी। मैं धीरे से मुस्कुरा दिया, तो जनाब आप इस तरह से मदद करने गए हैं। तभी पीहू की नज़र खिड़की की तरफ उठी, मुझे खिड़की में खड़ा देख कर एक पल के लिए उसके चेहरे में कुछ संकोच दिखा। अगले ही पल उसने अपना दुपट्टा कमर से खोल कर गले में डाल लिया।
     सूरज ढल चुका था और धीरे-धीरे शाम का उजाला भी सिमटता जा रहा था। मैं खिड़की की छड़ पकड़े बाहर के इस दिलकश नजारे को देख रहा था। कभी मेरी नजर पीहू पर जाती है तो कभी अलमारी पर रखी उसकी कताबों पर, और मैं यह सोचकर हैरान रह जाता की इतनी साधारण और सामान्य-सी दिखने वाली लड़की की अभिरुचि इतनी उच्च कोटि की हो सकती है!!
      कुछ देर बाद मैंने आलमारी से चित्रलेखा उठाई और चारपाई पर लेट कर पढ़ने लगा। मैंने 20-22 पेज लगातार पढ़े और फिर बाहर की तरफ देखा। अब बाहर शाम पूरी तरह से ढल चुकी थी। चंद्रमा की हल्की-हल्की रोशनी फैल रही थी कुछ देर बाद ही सत्य और पीहू दोनों आए, "कौन सी सब्जी खाना पसंद करेंगे...", पीहू ने कुछ अनमने मन से मुझसे पूछा। 
    मैंने उसकी तरफ गौर से देखा और कुछ मुस्कुराते हुए शालीनता से कहा, "अरे फॉर्मेलिटी की कोई जरूरत नहीं... मैं अजनबी जरूर हूँ,  लेकिन कोई मेहमान नहीं... जो भी पसंद हो बना लीजिए... मैं खा लूंगा...", 
      "एक मिनट... एक मिनट... ये अजनबी टाइटल में मेरा कॉपीराइट है... इसे मत छीनो यार...", सत्य ने हंसते हुए कहा।
    "टाइटल... कॉपीराइट... मतलब !!  मै कुछ समझा नहीं !!!"
     "यार फिर कभी तुम पीहू से ही पूछ लेना... ये पीहू अभी चलते हैं... बाबा की पूजा समाप्त हो गई होगी... खाना बन जाए फिर आराम से बैठते हैं... शैल कैरी ऑन... तुम बुक पढ़ो... हम लोग कुछ देर में आते हैं... ओके ?"
   मैने मुस्कुराते हुए कहा, "ओके..."
   वे दोनों चले गए। मैने चित्रलेखा फिर से खोल ली। लगभग साढ़े आठ बजे दोनों आए। हाथ में डिनर लिए हुए। चटाई बिछाई गई, पीहू थाली में खाना परोसते हुए बोली, "बाबा ने खा लिया है, हमे बोले कि तुम लोग अपने दोस्त के साथ खा लो..." 
   सत्य ने पीहू से कहा, "चलो तो फिर शैल को थैंक्स तो कहो .. कितने महीने बाद हम लोग साथ में इसी अटारी में खाएंगे..."
     "मतलब... मै कुछ समझा नहीं...?"
    "कुछ नहीं यार... तुम खाओ... हमारे चक्कर में रहे तो भूखे रह जाओगे।"
    मैंने डिनर शुरू किया और उन्होंने भी। कहने को उनके बीच दो थाली थी, लेकिन दोनों लगभग एक ही थाली में खा रहे थे। कुछ हंसी-मजाक करते, कुछ लड़ते-झगड़ते। दोनों के बीच एक अद्भुत केमिस्ट्री नजर आ रही थी। उनके लिए मैं वहां हो कर भी नहीं था।
     दोनों की उपेक्षा ने मेरे हृदय में एक अजनबी होने के एहसास को कई गुना बढ़ा दिया। मैं अब अपने ही फैसले पर पछता रहा था। इससे अच्छा तो मैं ज्ञान के साथ ही वैवाहिक कार्यक्रम में ही चला जाता। मेरा मन खाने से उचट गया। मैं दो रोटी खा के उठा गया। सत्य ने टोंका था, "अरे, और लो..."
     "नहीं तुम लोग खाओ... मैं खा चुका...", कहता हुआ गिलास में पानी लिए मैं खिड़की के पास आ गया। खिड़की के बाहर हाथ निकाल कर धोया, फिर गिलास को खिड़की पर ही रखकर रुमाल से हाथ पोंछ कर बाहर देखता वहीं खड़ा रहा।
   कुछ देर में दोनों ने हंसी-खुशी डिनर समाप्त किया। बर्तन समेटे गए। पीहू ने चटाई तह कर के एक किनारे रख दी, फिर जमीन को पानी से सींच कर थोड़ा झाड़ू भी लगा दी। अब जगह पहले की तरह स्वच्छ और साफ थी।
      जाने से पूर्व सत्य ने मुझे समझाया कि कौन से स्विच से क्या चालू होगा और क्या बंद होगा। इस बीच पीहू अपनी अलमारी के पास खड़ी कुछ किताबों को उलट-पलट कर अच्छे से जमा रही थी। पीछे से सत्य ने कहा, "चले पीहू ?"
   "हां तुम चलो, मैं आती हूँ। किताबों को अच्छे से रख दूं..."
    सत्य चला गया। मैं अभी भी खिड़की के पास ही खड़ा था। कुछ देर में वह चारपाई के पास पहुंची और बिस्तर को अच्छे से झटक कर बिछाया। फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "चित्रलेखा पढ़ेंगे कि अलमारी में रख दूं..."
    मैंने अनमने मन से जवाब दिया, "नहीं, रहने दीजिए, अभी पढ़ूंगा..."
    उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना काम किया। फिर अलमारी से वही पोएट्री बुक अपने हाथ में ले धीरे-धीरे सीढ़ी उतरने लगी। मैं पीछे से उसे देख रहा था। सीढ़ी के अंतिम पायदान तक पहुंचने पर उसने पलट कर मुझे देखा। मैं उसी तरह निर्मेष खड़ा उसे देखता रहा। उसकी नज़रें मुझे कुछ अजीब सी लगी, जैसे मेरे यहां होने का उसे विश्वास न हो रहा हो। यह पहली बार था कि हम दोनों ने एक दूसरे को कुछ पल तक एक साथ देखा था। फिर वह चली गई। हमारे बीच ना तो कोई गुड नाइट हुई और ना ही उसने कुछ और कहा। लेकिन उसकी खामोश निगाहें मुझसे बहुत कुछ कह गई। उसके सीढ़ी उतारने का अंदाज कुछ ऐसा था कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना या पूछना चाह रही थी। फिर सीढ़ी के अंतिम पायदान में उसका यूं मौन खड़े रह मुझे देखते रहना, जैसे उसे इंतजार हो कि मैं उससे कुछ कहूं, क्या ये सब मेरे मन का भ्रम है। मैने मन ही मन सोचा जरूर भ्रम होगा। आखिर एक अजनबी से वह क्या कहना चाहेगी। मैं सभी विचारों को झटक के बिस्तर में आ गया।
    काफी देर तक मैं चित्रलेखा में उलझा रहा। जब मन नहीं लगा तो वापस खिड़की की छड़ पकड़ के खड़ा हो गया। चंद्रमा की हल्की सफेद झक चांदनी चारों तरफ फैल रही थी। पीहू और सत्य के बीच का इंट्रैक्शन मुझे तेजी से अतीत की तरफ खींच रहा था। ये प्यार, ये चाहते, ये मोहब्बतें हमेशा के लिए क्यों नहीं रहती। 
     फिर अचानक ही चंद्रमा की सफेद झक चांदनी की जगह चारों तरफ जगमगाती लाइटिंग ने ले ली।  सजी हुई बारात, ढोल-ताशे, बैंड-बाजों की आवाजे, पटाखों की गूंज, जगमगाते कलश-घट, सखियों के मंगल गीत, चारों तरफ शोर ही शोर। अब खिड़की में खड़ा रहना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था मैं वापस बिस्तर पर आ गया।
      फिर रात की उन तन्हाइयों में अचानक ही चारों तरफ से शहनाई और विवाह मंत्रों की आवाजे आनी शुरू हो गईं। महसूस होने लगा जैसे आंगन में शादी की रस्में चल रही हैं। मै बिस्तर में औंधे मुंह लेट गया और तकिया को अपने सर के ऊपर कस कर रख लिया। तब भी बाहर से आती आवाजें बंद नहीं हो रही थी। मै कुछ देर यूं ही पड़ा रोता रहा, और मेरे साथ रो रही थी हृदय में बसी एक पवन प्रांजल मूरत, लग्न मंडप में बैठी गुमसुम, मेरी चेहरे में ठहरी उसकी निगाहें, कन्यादान की रस्में निभाते हुए उसके माता-पिता। सभी दृश्य मेरी आंखों के सामने से एक-एक करके गुजरने लगे।
     अब इस बंद अटारी में मुझे घुटन सी होने लगी थी। कंठ सूख रहा था। प्यास का एहसास हुआ। अपने चारों तरफ इस आशा से देखा कि हो सकता है किसी जग में या फिर लोटे में पानी रखा हो। लेकिन मुझे कहीं कुछ नहीं दिखा। तभी मुझे ध्यान आया कि बैठक के पास शाम को एक घड़ा रखा देखा था। 
     मैं सीढ़ी से नीचे आया। गैलरी से होते हुए बैठक में आ गया। घड़े के ऊपर स्टील की एक प्लेट और उसके ऊपर एक लोटा रखा था। बाबा की पीठ मेरी तरफ थी। मैने बिना आहट के एक लोटा पानी निकाला और उसी तरह दबे पांव वापस गैलरी में पहुंचा। अंदर से पीहू और सत्य के बातें करने की हल्की-हल्की आवाजे आ रही थी। एक पल को मेरे कदम रुके लेकिन अगले ही पल मैं आगे बढ़ गया। सीढ़ी के सबसे निचले पायदान में बैठ कर मैने पानी पिया और शेष पानी के साथ लोटे को वहीं रख दिया। अटारी में जाने का मेरा अब कोई इरादा नहीं था। मैं यहां से, इस घर से दूर भाग जाना चाहता था।
    लेकिन सवाल ये था कि इतनी रात को जाऊं कहा। तभी बगिया याद आई। हां ... वहीं चलता हूँ। मैने धीरे से पिछला दरवाजा बिना आहट के खोला, फिर उसे बाहर से बंद कर दिया। बांस की कमटी का गेट खोला और बाहर निकलने के बाद उसे भी बंद कर दिया।
    फिर मैं वहां से भगा। बगिया पहुंचते पहुंचते रास्ते में एक बेर की छोटी-सी झाड़ी से उलझ कर गिरा भी। शरीर में कांटे चुभे। दाएं हाथ की कोहनी में चोट भी आई, लेकिन मैं रुका नहीं। जब मैं बगिया पहुंचा तो मेरी हालात बुरी थी। मै गेट खोल कर अंदर तो आ गया लेकिन अब मेरे कदम आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। मै गेट के पास से जोर से चीखा, "मंगल !... ओ मंगल !!"
    फिर मैं हताश थका हारा वही जमीन पर गेट के अंदर गेट पर ही टिक कर बैठ गया। मै बुरी तरह हॉफ रहा था। सांसे इतनी तेज चल रही थी कि लगा जैसे हार्ट-अटैक आ जएगा।
  मंगल भागता हुआ मेरे पास आया और एक दम से मुझे देख कर चौक पड़ा, "सर जी, इतनी रात को आप यहां !! और ये क्या ? हाथ में चोट, कपड़ों में धूल, गिरे हैं कही क्या ? ... चलिए उठिए...", वह मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला।
    "वो सब बाद में मंगल.... जा पहले भाग के जा... बॉटल ले आ... जा मंगल जल्दी जा... नहीं तो मर जाऊंगा मैं...", मै उससे बड़ी मुश्किल से बोल पा रहा था।
   मंगल भागता हुआ गया और भागता हुआ ही वापस आया। उसके हाथ में मेरा बैग और हाथ में पानी का जग था। मैंने जल्दी से बैग खोला। बॉटल निकली, ढक्कन खोल कर उसे थमा दिया। फिर सीधे बॉटल से कितने घूट पी गया ख़ुद ही नहीं मालूम। मैने एक गहरी सांस छोड़ी। कुछ देर में सांसे कुछ सामान्य हो गईं थीं। मैने अपनी कोहनी की तरफ देखा, चोट गहरी नहीं थी, बस ऊपर की चमड़ी कुछ उधड़ गई थी। खून रिस रहा था। शर्ट भी कोहनी के पास से उधड़ गई थी। मैने बांह ऊपर की और थोड़ी-सी शराब सीधे बोतल से कोहनी में उड़ेल ली। जख्म में जलन हुई, मैंने आंखें बंद कर लीं।
   मंगल अभी भी आंखों में कई प्रश्न के लिए मेरे पास बैठा था, "वो क्या है मंगल... बंद कमरे में मुझे घुटन हो रही थी... तो मैं बिना किसी को बताए पीछे के दरवाजे से निकल आया... बाहर से सांकल चढ़ा दी है... कुत्ता बिल्ली नहीं घुसेंगे...", मैं यह सब मंगल को एक सांस में बताता चला गया, "अब ये बताओ, मेरा कोई इंतजाम हो सकता है... ?"
   "अरे सर जी आपकी खाट अभी भी वहीं है, चलिए आपको वही ले चलता हूँ ..."
   मै मंगल के साथ उसी आम के पेड़ के नीचे पहुंचा और खाट पर बैठ गया। बैग और जग का पानी मेरे पास रखते हुए मंगल बोला, "मै तकिया और बिछौना ले कर आता हूँ....।"
       कुछ ही देर में मंगल सभी सामान ले कर हाजिर हो गया। खाट में एक दरी, उसके ऊपर एक चद्दर, सिरहाने तकिया, और पैर की तरफ कंबल रखते हुए बोला, "अब ठीक है सर जी ..."
    "हूँ... ठीक है, बैग खोलो, सिगरेट का पैकेट और माचिस निकालो, और एक पैग बनाओ ...", मै खाट में लेटता हुआ बोला।
    मंगल ने वही किया। मैने आधा पैग खाली कर सिगरेट जलते हुए बोला, "मंगल तुम भी बना लो... लेकिन रुको... कमली से डांट मत खिलवाना... पता चले सुबह-सुबह सुनने की मिले, हम तो बर्बाद हैं ही... तुम्हे भी कर रहे हैं..."
        "नहीं सर जी वो अंदर सोती है... मै मड़ैया में... बगिया की रखवाली भी रात को करनी पड़ती है न इसलिए ....", वह आम की जड़ के पास दोपहर को छुपा के रखी अपनी खाली गिलास लाते हुए बोला।
   फिर अपने लिए एक पैग बनाते हुए बोला, "मुझे लगा था खाना-पीना खाने के बाद आप सोने के लिए यहीं आएंगे। इसलिए खाट नहीं हटाई थी। लेकिन सोचा तो यह था कि भैया जी छोड़ने आयेंगे... आप तो अकेले ही चले आए... आप इसी तरह रोज पीते हैं सर जी ?"
   "अच्छा ! तो तुम समझ रहे हो मै शराब पीने के लिए यहां आया हूँ ? बताया न मंगल बंद कमरे में मुझे घुटन हो रही थी... और रही बात रोज पीने की तो नहीं, हॉस्टल में एक बार वेलकम पार्टी में थोड़ी सी बियर पी थी, लेकिन हां पिछले हफ्ते से हर दिन पी रहा हूँ... यूं मानलो पिकनिक मनाने निकला हूँ... घर लौटूंगा तो फिर छोड़ दूंगा... और फिर टाइम भी नहीं मिलता... सुबह से शाम वही भाग दौड़ की जिंदगी... मै कोई आदतन मुजरिम नहीं हूँ मंगल, लेकिन क्या करूं कुछ गुनाह हो गए ... कुल मिलाकर तुम ये समझ लो कि मैं शराबी नहीं हूँ ... इस वक्त कोई अपने आंसू पी रहा होगा और मैं शराब..."
    कहने को तो मंगल से कह गया। लेकिन खुद के आंसू न रोक पाया। अधूरे जाम में आंखों से निकले कुछ आंसुओं की एक बूंद को मधुर चांदनी के उजले में मैने घुलते हुए देखा। मै पीता रहा मंगल जाम बनाता रहा, कितनी अपने लिए और कितनी मेरे लिए अब कोई हिसाब नहीं था।
   "सर जी !! ये तो खत्म होने वाली है ..?"
   "अरे कोई बात नहीं मंगल, देख कपड़ों के बीच अखबार में लिपटी हुई एक बॉटल और होगी... देख तो सही..."
   मंगल ने सर्च अभियान शुरू किया। बॉटल मिल गई, अखबार को एक तरफ फेंकते हुए बोला, "सर जी मिल गई  ..."
   "अरे मंगल ये क्या किया... उठा अखबार...", मैने उसे कुछ डांटते हुए कहा। उसने अखबार उठाते हुए पूछा, "सर जी कोई खास बात है क्या इस अखबार में...?"
    मैने उसके हाथ से अखबार लेते हुए कहा, "ये देख इसमें मेरी कहानी छपी है... देख... अरे रात है... कैसे दिखाई देगी... सुबह दिखाऊंगा... अभी इसे सुरक्षित रखो..."
    "जी सर जी ..."
    "मंगल एक तो खत्म होने को है ... और दूसरी भी मान के चलो एक तिहाई तो खत्म हो ही जाएगी... अभी दो-तीन दिन रुकना भी है, कोई इंतजाम हो सकता है क्या...", मैने एक समझदार गणितज्ञ की तरह हिसाब लगते हुए पूछा था।
    "जुगाड़ तो हो जाएगा सर जी लेकिन उसका रंग कुछ काला होता है ... गांव में दो-तीन घर हैं जिनके लड़के फौज में हैं, वो लाते है ... मै सुबह पता करूंगा..."
   "पता नहीं लगाना है ...मंगल ! ...  लाना है। ... समझे। ... लेकिन यार पैसे ... कितने लगेंगे ...?"
    "कितनी बॉटल लेनी है ... ", मंगल ने एक और पैग मुझे पकड़ाते हुए बोला।
    मैने दो घूट लेने के बाद, एक सिगरेट जलते हुए कहा, "चार से कम में तो काम नहीं बनेगा..."
   "हजार रुपए के अंदर आ जाएंगी...", मंगल ने अपने लिए बनते हुए कहा।
    "हूँ... देखूं तो मेरे पास इस समय हैं कितने...", इतना सोचना था कि दिमाग को एक झटका लगा। ज्ञान के घर में कपड़े चेंज करते समय पेंट की जेब से पर्स निकालना भूल गया था, "मर गए मंगल !! मेरा पर्स तो दोस्त के घर में ही छूट गया... अब क्या होगा... चलो सुबह देखी जाएगी... अभी तो है न ? क्यूं चिंता करना ...? है न मंगल ?
    "और नहीं तो क्या साहब ... गांव में उधारी करने में मुझे संकोच लगता है ... आप चिंता न कीजिए ... नदी तीर में आदिवासी एक नंबर की देशी शुद्ध महुआ की बनते है ... फ्री ले आऊंगा, लेनिन साहब पी लो तो एक किलोमीटर दूर से महकती है... ये कम से कम महकती तो नहीं है..."
   "चलो सुबह की सुबह देखी जाएगी... अभी कौन सी खत्म हुई है...", हम दोनों अब मेच्योर्ड और समझदार इंसानों की तरह बातें कर रहे थे। 
   "मंगल टाइम कितना हुआ होगा... ?"
    उसने असमान की तरफ देखते हुए कहा, "सर जी ग्यारह और साढ़े ग्यारह के बीच होगा। मेरा तो हो गया सर जी... आपके लिए...?"
    "अभी नहीं... और ये क्या आसमान की तरफ देख कर टाइम बताया... ऊपर वाले से पूछा था क्या...", मैने हंसते हुए पूछा।
   "अरे नहीं सर जी, चंद्रमा की पोजीशन देख कर अंदाज लगा लेते हैं... अब मैं चलू ..."
   "हां जाओ... लेकिन एक बना के... और पीने के लिए पानी रख देना। 
    पंप चल रहा है, यहीं से भर देता हूं, फिर बंद भी करना है, नहीं तो रात भर में पानी ज्यादा हो जाएगा... लेकिन सर जी, आपको ज्यादा तो न हो जाएगी...?"
   "नहीं मंगल मुझे शराब नहीं चढ़ती, देवताओं का वरदान हैं मुझ पर...", मैने हंसते हुए कहा।
    "फिर भी साहब इतनी न पिया कीजिए... आखिर शरीर को नुकसान तो करेगी न...? वैसे किसको भूलने के लिए..."
    "ठहरो मंगल.! जरा ठहरो.... मै किसी को भूलने के लिए नहीं पी रहा... अब ये बात दुबारा न कहना। समझ गए न ? अब जाओ, मुझे सोने देना, सुबह-सुबह न उठा देना..."
   मंगल हाथ जोड़ के चला गया। मै असमान की तरफ देखता रहा। अतीत में गुजरी हुई न जाने कितनी मधुर चांदनी की वो रातें मुझे याद आई। कुछ मिलन की तो कुछ विरह की... कुछ रातों को याद कर मेरे होठों में सजीली मुस्कान आई, तो कुछ को याद करके आंखों से आंसू भी बहे। अपने लिए किसी की दीवानगी याद आई, उसका समर्पण याद आया। दिल से एक आह निकली... जाओ...
मिले तुम्हें मुकम्मल जहां मेरे बगैर भी, 
मिले तुम्हें मुकम्मल खुशी मेरे बगैर भी...

   मै पीता रहा, रात ढलती रही। मैने दूसरी बॉटल खोली, एक लार्ज पैग बना तो लिया लेकिन एक घूट से ज्यादा पी नहीं पाया। खाली बॉटल को दूर खिसका दिया। भरी गिलास को खाट के नीचे पेपर से ढक के लेट गया। मंगल को गए हुए एक डेढ़ घंटे तो हो गए होंगे !  मैंने कम्बल को कंधे तक ओढ़ा और आंखें बंद कर लीं।
    सुबह जब मेरी नींद खुली तो देखा बोर चल रहा था। पानी खेतों की तरफ बराबर जा रहा था। मंगल और कमली दोनों खेत पर काम करते हुए दिखाई दिए। मै खाट से उठा, कंबल को तह करके पैर की तरफ रखा, बिस्तर को टावेल से झटक के साफ किया। लेकिन टावेल तो बैग में थी !!... ये बाहर कैसे !! तभी मेरी नजर सिरहाने में पड़ी। अंडर-गारमेंट्स, एक जोड़ी कपड़े, तेल, कंगी, शीशा, परफ्यूम एक तरफ रखे मिले। बैग और जाम गायब थे। लगता है मंगल ने व्यवस्थित मड़ैया में रख दिया होगा। मै चहरी के पास गया और पहले जी भर के मुंह धोया। शराब की खुमारी थी। मैंने मंगल को आवाज दी। वह लगभग भागते हुए मेरे पास आया।
   "अरे सर जी जाग गए !! कल तो आप हंगामा कर दिए...", मंगल पास आते हुए बोला।
   "हंगामा ! मैने किया !! क्या कह रहे हो... ", मैने आश्चर्य से पूछा।
    "वो सब बाद में बताऊंगा। पहले आप फ्रेश होइए और फिर अच्छे से नहा लीजिए..."
     मैंने उसकी आज्ञा का पालन किया। स्नान किया, कपड़े चेंज किए। बालों में तेल- कंघी की। फिर मंगल से मैंने पूछा, "हां बताओ, क्या हुआ। 
   "बड़े सुबह खोजते हुए पहले भैया जी आए, आपको देखे और लौट गए। फिर अभी कुछ देर पहले पीहू बिटिया आईं थीं। उन्होंने ही आपके कपड़े निकाल कर रखते हुए मुझसे बोलीं कि नहला धुला कर अपने सर जी को घर ले के आ जाना। फिर बैग अपने साथ लेकर चली गई...", मंगल मुस्कुराते हुए बता रहा था। 
   "ओह !! .... लेकिन मंगल... खाट के नीचे..."
   "गिलास न... ? उसके बारे में उन्हें नहीं मालूम, वो बड़े सुबह ही मैने आम की जड़ के पीछे पत्थर से ढक के छुपा दिया था... और पेपर को आपके बैग में ही डाल दिया था।
   "चलो ठीक है, जाओ कुछ ताजी गाजरें ले आओ, खाने का मन है..."
     मैने शुद्ध देशी गाजर और अमरूद खाए। फिर हैंगओवर को दूर करने के लिए छुपा के रखे पैग को पिया। उसकी महक को दूर करने के लिए खूब सारा परफ्यूम शर्ट के ऊपर और बटन खोल के सीने में भी डाला। लेकिन तब भी मुझे घर जाने की न तो हिम्मत हो रही थी और न ही इच्छा। मैंने मंगल से कहा, "यार मंगल खाने की ही तो बात है... और यहां कौन सी कमी है... तुम जाओ खाना और बैग लेते आना...?"
      "बात सिर्फ खाने की नहीं है। खाना तो कमली भी बना कर खिला देगी सर जी। बात पीहू बिटिया के गुस्से की है... कल रात आप किसी को बताए बिना आधी रात को बगिया भाग आए थे... और ऊपर से पीछे के दरवाजे की कुंडी भी बाहर से बंद कर दी... वो मुझे दस बातें सुना कर गई हैं, और आपसे भी बहुत नाराज हैं... अब देर न करिए चलिए ... 11 बज रहे होंगे..."
   "यार ऊपर वाले से तुम्हारा कोई डायरेक्ट कनेक्शन है क्या ! बिना घड़ी देखे तुम टाइम का अंदाजा लगा लेते हो...? ये सुनो कल रात को मेरे गिरने-पड़ने की बात किसी को बताई तो नहीं न ?....", मैंने उसके साथ चलते हुए पूछा। 
   "अरे नहीं सर जी... लेकिन निसान..."
   "वो शर्ट की बांह से ढका है, किसी को पता नहीं चलेगा..."
    कुछ देर बाद ही हम दोनों टेढ़ी-मेढी पगडंडियों के बीच से गुजरते हुए घर के दरवाजे के सामने खड़े थे। मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था, और उतनी ही तेजी से मैं मन ही मन ज्ञान प्रकाश को गालियां भी दे रहा था, साले ने कहां फसाया है। पाबंदियों की आदत मुझे थी नही। मंगल ने दरवाजा ठोका, "दाऊ साहब ! ओ दाऊ साहब !!"
   किसी के आने की आहट हुई। कुछ देर बाद दरवाजा खुल गया। सामने पीहू खड़ी थी। मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर और कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "जी नमस्ते..."
   "नमस्ते... आइए ", उसने भी जवाब दिया, लेकिन इस जवाब में न अपनत्व, न बेरुखी बल्कि उदासीनता थी।
   मैं अंदर आ गया। बैठक में बाबा को तख्त में लेटे हुए देखा। मैंने बढ़कर उनके पैर छुए, "बाबा प्रणाम !", तभी मेरी नजर सामने दीवाल घड़ी पर पड़ी 11 बज के 20 मिनिट्स हो चुके थे।
   "अरे तुम आ गए... चलो अच्छा है, मैने तो पीहू से कहा था कि तुम्हारा खाना वहीं बगिया में पहुंचा दे, तुम्हें यहां आने में असुविधा होगी... लेकिन इसी ने बताया कि तुम्हारी इच्छा आज हमारे साथ खाने की है। लेकिन बेटा हमने कुछ देर तक तुम्हारा इंतजार किया। लेकिन क्या है न, हमारा एक बना बनाया रूटीन है। अधिकतम साढ़े दस, बस अभी खा के उठा हूँ... सत्य को भी आज माइंस की तरफ जल्दी जाना था..."
   मेरी इच्छा ! ... मैने पीहू की तरफ देखते हुए प्रत्यक्षतः बोला, "कोई बात नहीं बाबा... मै अकेला खा लूंगा। खाना ही तो खाना हैं...अभी तो प्यास लगी है...", मैने हाथ जोड़ते हुए कहा और एक कुर्सी खींचकर बाबा से कुछ दूर बैठ गया।
    बाबा मेरी तरफ गौर से देखते हुए कहा, "... तुम अकेले क्यों खाओगे !... अभी पीहू ने भी नहीं खाया है... उसी के साथ खा लेना..."
    "बाबा अब ये इंतजार करें... मैं कुछ काम निपटा लूं, उसके बाद ही खाना मिलेगा... समझ ले की लेट होने की सजा है...", उसने मेरे हाथ में पानी का गिलास देते हुए कहा।
   मै बिल्कुल धीरे से बोला, इतना कि बाबा सुन न सके, "हां बाबा, सजाएं ही तो मेरा मुकद्दर है...",  फिर मैंने बाबा की तरफ देखते हुए कहा, "बाबा बगिया से मै कंद-मूल-फल खा के आ रहा हूँ... इंतजार कर लूंगा..."
    उसने भी उतनी ही महीन आवाज में मुझे सुनाया, "सजा से डर लगता है तो गलतियाँ क्यों की जाती हैं...", 
   फिर वह रसोई में चली गई।
   "चलो ठीक है तो फिर इंतजार कर लो... वैसे तुम सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक करते हो ये अच्छी बात है, लेकिन बाहर से कुंडी बंद करके चले गए... हम लोग सुबह उठ जाते हैं। बता दिया होता..." 
     कल रात की घटना को बाबा के सामने कैसे और किस रूप में प्रस्तुत किया गया, यह मैं नहीं जानता था। और मैं समझ गया कि यदि मैं कुछ देर तक यहां और बैठा तो बताई गई बात और मेरी बात में कानफ्लिक्ट पैदा होगा। 
    "सॉरी बाबा ! ... मैने सोचा आप लोग सो रहें होगे, सुबह-सुबह क्यों डिस्टर्ब करू... कुत्ता बिल्ली या कोई और जानवर न घुस पाए इसलिए बाहर से कुंडी लगा दी थी..." मैं उठते हुए बोला, "बाबा मैं पछे घूम कर आता हूं... मंगल आओ..."
   और यह बहाना करके मैं कच्चे घर की तरफ आ गया। मंगल मेरे साथ था, "बच गए मंगल। उफ ! पता नहीं मेरे बारे में कल रात की कौन सी कहानी बनाई गई है... तुम ऐसा करो जाओ और बता देना कि मैं अटारी में बुक पढ़ रहा हूं। जब फुर्सत हो जाए तो बुला लेंगे, मैं आ जाऊंगा..."
    मंगल चला गया। मैं अटारी में आया, खिड़की खुली हुई थी। मेरा बैग एक तरफ रखा था। वह अखबार जिसमें मेरी कहानी पब्लिश हुई थी, तकिया के पास रखा हुआ था। मैंने चित्रलेखा उठाई और बिस्तर में आराम से लेट कर उसे पढ़ने लगा। 
   लगभग आधे घंटे के बाद पीहू आई थी, "ओहो !! ... आप कितना परफ्यूम लगाते हैं, चोरी को छुपाने के लिए ? पूरी अटारी तो क्या पूरा घर तक महक रहा है... लीजिए उठिए...", उसने टेबल चारपाई के पास रख उस पर खाने की थाली रखते हुए कहा।
   "अरे ! आपने इतना कष्ट क्यों किया... मुझे नीचे बुला लिया होता..."
    "बात तो वही है... बुलाने तो आना ही पड़ता न..."
    "अपने खा लिया...?", मैने पूछा।
   "हां... मैं अभी जस्ट खा के ही आ रही हूँ... आप लीजिए...", उसने जवाब दिया।
   मैने मुस्कुराते हुए कहा, "वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मुझे छूत की बीमारी नहीं है..."
   उसने भी मुस्कुराते हुए कहा, "हां... बीमारी तो सोई हुई रात में घर छोड़कर भागने की है... है न ?"
      मैं कहां पीछे रहने वालों में से था, "नहीं मुझे नींद में चलने की बीमारी नहीं है। लेकिन जब इस भूत-अटारी में मुझे अकेला छोड़ दिया गया तो डर लगने लगा और इसलिए भाग गया था... फिर भी कल के लिए सॉरी..."
       कुछ जिद्दी मक्खियां भी खाने पर झपट पड़ी। वह पास ही एक कुर्सी में बैठी थी। उठी और आलमारी से एक पंखी निकाली और उसी से मक्खियों को दूर भगाते हुए बोली, "आप आराम से खाइए..."
    मैंने थाली को ध्यान से देखा। खाना परोसने का भी अपना एक ढग होता है, उसका पालन पूरी निष्ठा के साथ किया गया था। एक कटोरी में आलू-गोभी-टमाटर-मटर की मिक्स सूखी सब्जी, दूसरे में दाल फ्राई, तीसरी छोटी कटोरी में आचार, सलाद और गरमां-गरम चार रोटियां सलीके से रखी गई थी। मैं थोड़ी सी सब्जी और डाल के साथ पहले कौर खाया। मैंने उसकी तरफ प्रशंसा भरी नजरों से देखते हुए कहा, "पीहू जी ! आप खाना लाजवाब बनती हैं... सभी कुछ बिल्कुल परफेक्ट, गजब का स्वाद, अहा ... सच पूछिए आनंद आ गया..."
   उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा !!... कल रात में तो तारीफ नहीं की थी... आज कैसे ?"
   "वो क्या है कि हो सकता है कल इतने प्यार से आपने न बनाया हो... आज अपने कुछ डांटा और उसकी पूर्ति खाने में स्वाद बढ़कर कर दी ?", फिर मैंने कुछ हंसते हुए कहा, "बिल्कुल एक मां की तरह जो अपने बच्चे को डांटने-मारने के बाद खाना बड़े प्यार से खिलाती हैं...", मैने दूसरा कौर चबाते हुए कहा।
   "आपको पसंद आया, आपने तारीफ की, हमें अच्छा लगा। अब आप इत्मीनान से खाइए...", उसने उसी तरह पंखी हिलाते हुए कहा।
   पीहू को अभी तक मैंने जितना देखा और समझा था, मैं बखूबी अंदाजा लगा सकता था कि यह संस्कारी लड़की जब तक मैं खाना खा नहीं लूंगा तब तक कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगी। लेकिन मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि मेरे कल के आचरण से क्या हआ और किस पर क्या असर पड़ा। मैंने ही बात को आगे बढ़ाने के लिए उससे कहा, "सच में बहुत शर्मिंदा हूँ ... रियली आई एम सॉरी .."
    "सॉरी तो मैं भी कहूंगी आपसे, आपका हम ध्यान नहीं रख पाए। सुबह जब सीढ़ी के पास लोटे को रखे हुए देखा तब एहसास हुआ कि कम से कम एक जग या लोटे में पानी तो रखना ही चाहिए था... कल डिनर में भी मैं और सत्य आपस में खोए रहे, आपकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया... बिल्कुल अजनबी जैसा व्यवहार किया... लेकिन शिकायत तो इस बात की है कि यदि आपको कोई दिक्कत थी तो आप हमें कह सकते थे, बुला सकते थे ? ... चलिए मान लिया कि हम लोग नीचे थे लेकिन जब पानी पीने के लिए आप बैठक तक आ ही गए थे, तब तो बुलाना चाहिए था न...?"
    "जी जरूर बुला सकता था... यहां तक कि जब मैं आप दोनों कमरे के पास से गुजरा तो आप दोनों की बातचीत कुछ-कुछ सुनाई पड़ रही थी। जहां तक सत्य ने मुझे बताया है कि आप उसकी दोस्त हैं, तो इस तरह एक साथ बेडरूम शेयर करते देख मुझे खुद आश्चर्य हुआ... ऐसे में आपको बुलाना मुझे ठीक नहीं लगा... बस इसीलिए आप लोगों को नहीं बुलाया...", मैने सच कह दिया।
    "क्या !! तो आपको कुछ...", कहते-कहते वह रुक गई।
   "क्या..", मैने भी आश्चर्य से पूछा।
   "कुछ नहीं... लेकिन आप यहां से गए ही क्यों...? जानते नहीं रात को कुछ जंगली जानवर भी आसपास घूमते रहते हैं। यदि आपको कुछ हो जाता तो ? तो हम आपके दोस्त को क्या मुंह दिखाते ? इतना तो सोचना चाहिए था न ?"
    मैं जानता था कि उसकी बात गलत नहीं है। एक अनजान जगह में वह भी जंगली इलाके में रात को साढ़े दस और ग्यारह के बीच एक-डेढ़ किलोमीटर दूर बगिया जाना सेफ नहीं था। लेकिन मैं अब इस लड़की को क्या बताऊं कि मैं यहां से क्यूं भागा...? मैंने बात को समाप्त करने के इरादे से अपनी नजरें झुकाते हुए कहा, " मुझे रात को यहां घुटन महसूस हो रही थी... बड़ा अजीब-सा लग रहा था, इसलिए चला गया, और इसके लिए मैं आपसे फिर एक बार सॉरी कहता हूं... मैं जानता हूं सत्य भी नाराज होगा उससे भी क्षमा मांग लूंगा..."
      "और अब हम आपको अकेला छोड़ेंगे भी नहीं... और यह बताइए आप इतनी शराब क्यों पीते हैं ?... जब सुबह बगिया गई तो एक बॉटल खाली लुढ़की थी, दूसरी का भी ढक्कन खुला हुआ मिला। पूरी रात पीते रहे क्या ? आप तो पढ़े-लिखे समझदार इंसान नजर आते हैं... सुबह कपड़े निकालते समय आपके बैग में रखा हुआ अखबार देखा, सोचा ऐसे ही रद्दी होगा, फेंकने को हुई तो मंगल ने बताया कि आपकी कहानी छपी है, तो साथ लेती आई। अच्छा लिख लेते हैं... देखिए आप अपने आप को यूं बर्बाद मत कीजिए...", उसकी आवाज में क्रोध और अपनत्व दोनों था। 
      मैं चुपचाप खाना खा रहा था और वह आगे कह रही थी, "सच बताइए यदि सुबह बैग उठा न लाई होती, तो आप फिर सुबह से ही शुरू हो गए होते न ? क्या आपके घर में आपको डांट नहीं पड़ती..."
  "नहीं..."
  "कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है जो आपको डांटे...?"
   "घर में पीता ही नहीं। रही बात गर्लफ्रेंड की तो उसके सामने जब पी तो वह डांट रही है...", मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
    "कौन मैं ? गर्लफ्रेंड !.. आपकी !! "... उसने आश्चर्य से पूछा था।
    "हां... मेरी... क्यों यकीन नहीं हो रहा...?", मैंने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
    "फ्लर्ट कर रहे हैं...?", उसने मेरे चेहरे में नजर रखते हुए कहा।
   "नहीं फ्लर्ट नहीं कर रहा, प्रूफ कर सकता हूँ...?"
   "प्रूफ कर सकते हैं...? क्या इससे पहले आप मुझसे मिले हैं...?", उसने आश्चर्य से पूछा था। 
   "हां बिल्कुल... हम मिले हैं...", मैंने रहस्य से मुस्कुराते हुए कहा।
  "कहां...?", उसकी जुबान से फसी-फसी सी आवाज निकली।
      मैंने उसकी तरफ देख कुछ मुस्कुराते हए कहा, "पिछले जन्म में... या फिर इसी जन्म में... शायद किसी अधूरे स्वप्न में... क्या आप सपने नहीं देखती...?"
     उसके चेहरे में वही डर की लहर दौड़ गई जो मैंने पहले मुलाकात में देखी थी। उसने कुछ डरते-डरते खुद से कहा, "हां... शायद सपने में...!"
     मुझे उसकी यह हालत देखकर कुछ हंसी आ गई, "अरे ! आप डरिए नहीं... मैने तो मजाक में कहा हैं... अच्छा बताइए, आप मुझे अपना दोस्त मानती हैं न...?"
   उसने सामान्य होते हुए कहा, "हाँ सत्य के हैं... तो मेरे भी हुए...तो इससे क्या ?"
   "और आप लड़की यानी गर्ल भी हैं...?"
   "हां हूँ... लेकिन..."
    "लेकिन-वेकिन क्या,  प्रूफ हो गया... तो हुई न आप मेरी गर्लफ्रेंड ? अब देखिए  महिला-मित्र और पुरुष-मित्र शब्द का प्रयोग करते समय क्या प्रेमी-प्रेमिका वाली फिलिंग्स महसूस होती है ? नहीं न ? तो फिर बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड में क्यों होनी चाहिए ? लड़का-मित्र और लड़की-मित्र क्यूं नहीं हो सकते...?
   उसने हंसते हुए कहा, "वाह क्या जस्टिफिकेशन है ! मान गए आप राइटर हैं !! ... चलिए यह तो मजाक की बात है, मैं रियल में पूछ रही हूँ..."
    मैने उसकी नजर से नजर मिलते हुए कहा, "नहीं, यदि आपका मतलब उस तरह की गर्लफ्रेंड यानी प्रेमिका या प्रेयसी से है तो नहीं है... वैसे भी मुझ जैसे इंसान की कोई प्रेमिका हो सकती है क्या ? अरे सोचा ही नहीं जा सकता..."
   "क्यों आपमें क्या बुराई है...?", उसने संजीदगी से पूछा।
   "अब छोड़िए पीहू जी, एक हो तो बताएं। यहां तो बुराइयां और कमियां कूट-कूट कर भरी हुई हैं... कुछ तो आप देख ही चुकी हैं, और कुछ का तो मुझें खुद भी पता नहीं। वो क्या कहते हैं... 

 न काबिल थे, न काबिल हैं, न होंगे तेरी मोहब्बतों के,
 अपना गुजर तो अब खुद से या फिर खुदा से होगा।

    "वाह ! क्या बात है, ये भी इसी पोएट्री बुक में है ?"
   "नहीं...", फिर मैंने खुद की तरफ इशारा करते हुए कहा, "शायरी मे कोई त्रुटि हो तो नजरअंदाज कर दजिएगा, साइंस और अब कॉमर्स का स्टूडेंट हूँ, यह लिटरेचर -विटरेचर मुझे नहीं आता..."
   "नहीं, मैने मान लिए कि आप शायर हैं... डेमो तो मैं अभी कुछ देर पहले बैठक में ही सुन चुकी हूँ, जब आपने संजीदगी से कहा, हां बाबा ! सजाएं ही तो मेरा मुकद्दर है... वाह क्या डायलॉग मारा था, आई इंप्रेस्ड। वैसे मुझे ज्यादा उर्दू नहीं आती है। आपको डरने की जरूरत नहीं. ..", उसने हंसते हुए कहा।
   "जी तो मैंने कौन सी पीएचडी कर रखी है...", मैने भी हंसते हुए कहा, "दिल की बात हिंदी में कहो तो कविता, और कुछ शब्द उर्दू के मिला लो तो शायरी। बस फर्क इतना ही है। हां फर्क शब्द से कुछ और याद आया, सुनिएगा ...?
   "जी... वो क्या कहते हैं... इर्शाद..."
       "अभी आठ-दस पंक्तियां ही लिखी है, उसकी शुरू की कुछ पंक्तियां सुनाता हूँ..."
   "बिल्कुल..."
    तो सुनिए...

    तू हंसती होगी तो कैसी लगती होगी, 
   अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
   अपने ग़म भी भूल गया हूँ,
   जब से तेरी इन आंखों में,
   तिरते आंसू देखे हैं...

  उसने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, "अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया है, नहीं आप कुछ भी कहिए...  इस दिल में कहीं न कहीं बहुत बड़ा दर्द छुपा है। नहीं पूछूंगी... बिल्कुल नहीं पूछूंगी... जब तक आप खुद नहीं बतएंगे... लेकिन इससे इंकार भी मत कीजिए... देखिए लिटरेचर मैंने भी बहुत पढ़ा है। लेकिन पढ़ना एक अलग चीज है और अपने जज्बातों को शब्द देना एक अलग बात है। और फिर आप तो दूसरे के दर्द को महसूस कर रहे हैं... सच ए ब्यूटीफुल पोयम। मैं तो इसे लिखूंगी... इजाजत मिलेगी ?"
   मैंने हंसते हुए कहा,  "ज्यादा सर पर मत चढ़ाइए... कहीं यदि धोखे से सचमुच का राइटर बन गया न, तो सबसे पहले मेरी किताबें आप तक पहुंचेगी। मुझे पढ़-पढ़ कर परेशान हो जाएंगी ... और फिर इस दिन को कोसेंगी कि क्यों मैंने इतनी तारीफ की थी... मैं एक अच्छा राइटर हूँ या नहीं, नहीं जानता। पर हां इतना जानता हूँ, इंसान अच्छा हूं। तो यदि आप मुझसे दोस्ती करना चाहे तो कर सकती हैं...", मेरी हंसी में उसकी हंसी भी शामिल हो गई थी।
   मैने आँखें खोली, अविरल अश्रुधारा बह निकली। एक चौथाई से भी कम आकृति लिए आसमान में विचरण करता निशा पथिक। असंख्य सितारों से भरा यह संपूर्ण बह्मांड। जिसका हर एक चमकता सितारा एक सूर्य की तरह है। इनमें से कुछ तो लाखों वर्ष पहले मर चुके होंगे, लेकिन उनकी रोशनी आज हम तक पहुंच रही है। मैंने आंखें फिर से बंद कर ली। 
    पीहू मुझसे पूछ रही थी, "जी बिलकुल... लेकिन सिर्फ दोस्ती... हूं ?"
   "बिल्कुल मैने तो सिर्फ दोस्ती ही कहा न ? वैसे भी अभी एक-दो दिन और रुकूंगा तो इसे पूरा कर आपको देकर जऊंगा... आपको लिखने की जरूरत नहीं है .. लीजिए मैं खाना खा चुका अब यह बताइए मैं हाथ कहां ..?"
   "वह झट से कुर्सी से उठाते हुए बोली "अरे.. नहीं, अभी कहां... ओह ! मैं तो बातों ही बातों में भूल गई, अभी तो गरम चावला और खीर रखी है... मैं लाती हूँ..."
    मैंने रोकना चहा, "नहीं मैं खा चुका..."
    लेकिन वह रकी नहीं। सीढ़ियां उतरते हुए हंस कर बोली, "हाथ मत धोएगा... और अफसोस भी न कीजियेगा कि क्यों खाने की तारीफ की थी..."
  "जी बिल्कुल नहीं... और सुनिए जब चावल ला ही रही है तो थोड़ा सा सब्जी और दाल भी लेते आइएगा..."
    पलक झपकते ही वह वापस लौटी और एक थाली में बाकायदा चावल, दाल, सब्जी और खीर की कटोरी थी। उसने मेरी इच्छा अनुसार मेरी थाली में उन्हें परोसा। मैंने दाल चावल और सब्जी को मिक्सअप करके खाते हुए कहा, "आपके यहां के चावल का स्वाद अलग ही है... और खुशबू तो इतनी अच्छी की बस खाते ही चले जाओ..."
    उसने भी थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा, "वर्ल्ड फेमस है जी, हमारे क्षेत्र का चावल। ऐसे ही इसे धान का कटोरा नहीं कहते हैं... और लाऊं..."
   "नहीं.... लेकिन वाकई सच कहा आपने...", फिर मैं चुपचाप खाने लगा। सबसे अंत में खीर की कटोरी उठाई। काजू, बादाम और भी न जाने कौन-कौन से मेवे का उपयोग कर के बनाई गई खीर वास्तव में लजवाब थी। खीर खाते हुए मैं उससे बोला, "वाकई यहां बहुत शांति है शोर-शराबे से दूर एक अलग दुनिया, चारों तरफ हरियाली, बड़े-बड़े पेड़, ऊंची-ऊंची पहाड़िया, हरे भरे जंगल, मन को लुभा लेते हैं...", फिर मैंने हंसते हुए कहा, "मुझे ऐसे स्थान बहुत पसंद हैं... तन्हाई पसंद इंसान हूं न...यदि मुझे यहां कभी रहने का मौका मिले तो मैं कम से कम दो-चार बड़ी-बड़ी कहानी या फिर एक नॉवेल ही लिख डालूं..."
   उसने भी हंसते हुए कहा, "तो रोका किसने है, रुक जाइए और लिख दीजिए... इसी बहाने हम भी पढ़ लेंगे। क्या कहते हैं... हां स्क्रिप्ट, वह भी आपकी ओरिजिनल राइटिंग में ...?"
   "मुझे एक फायदा और होगा... आप साथ रहेंगी तो आपका एक्सपीरियंस मेरे काम आएगा... आपने इतना लिटरेचर पढ़ा है... माय गॉड, इसका तो दस बीस प्रतिशत भी मैने नहीं पढ़ा होगा... खासकर आपके साथ इंग्लिश लिट्रेचर के टच में भी आ जाऊंगा...  मैं भी एडगर एलन, इलियट, कीट्स, शेली की पोयम और शेक्सपियर, मार्लो, बर्नार्ड शॉ के ड्रामा पढ़ना चाहता हूँ। पर साथ ही नहीं मिलता और कुछ अंग्रेजी भी ज्यादा अच्छी नहीं है, हां कोई बुक सामने आ गई तो काम चलाऊं पढ़ लेता हूँ... डीप सेंस तक नहीं पहुंच पाता, वोकेबुलरी ही अच्छी नहीं है... आप जैसा टीचर मिल जाए तो काफी सीख सकता हूँ... अरे इस तरह मत मुस्कराइए, मैं मजाक नहीं कर रहा..."
   उसने मेरी बात बीच में काटते हुए कहा, "आई थिंक ज्यादा फायदा मुझे होगा। मुझे भी लिखने के लिए मोटिवेशन मिल जाए और हो सकता है मैं भी कुछ लिख सकूं..."
   "नहीं... बिल्कुल गलत कहा आपने...", मैंने भी उसे बीच मे टोकते हुए कहा, "ऐसा नहीं है, आपको लिखने के लिए कोई प्रेरणा चाहिए। आप कोशिश ही नहीं करती हैं। आपके पास तो इतना पढ़ने का एक्सपीरियंस है, अच्छे-अच्छे शब्द हैं, बहुत से उत्कृष्ट साहित्यकारों की कृतियां आपने पढ़ी है। जानती हैं पीहू !! मेरा मानना है कि शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं विजन होता है... एक ऐसा दृश्य जो भावनाओं और अनुभूतियों को यथार्थ के धरातल पर लाकर खड़ा कर देता है। सही शब्दों का सही क्रम उन्हें सुनहरी आभा प्रदान करता है, और उनसे लिखी गई भावनाएं सितारों की तरह चमकती हैं... एक अलग ही दुनिया, जैसे सितारों की दुनिया हो... और फिर उन्हें पढ़ने वाला एक पल के लिए सब कुछ भूल जाता है। अपनी भावनाओ की गहराइयों में इस तरह डूब जाता हैं कि फिर उसे यह एक काल्पनिक कहानी नहीं लगती है... कहानी के किरदारों को अपने अंतर्मन में इस तरह समाहित कर लेता है कि फिर वह कहानी उसे अपनी खुद की नजर आती है... उसकी अव्यक्त भावनाओं को उसके किरदार व्यक्त करते हैं। 
      और फिर पढ़ने वाले का मन एक सरिता के निर्मल प्रवाह की तरह बहता है, लहराती हुई लहरों का शोर संगीतमय हो जाता है... लीजिए मेरी खीर भी खत्म हो गई और प्रवचन भी... अब बताइए हाथ कहां धोए ?", जब मुझे कोई जवाब ना मिला तो मैंने उसकी तरफ देखा, वह मुझे निर्मेष देख रही थीं। मैंने फिर पुकारा, "पीहू जी !! कहां खो गई, खुली आंखों से सोने की बीमारी तो नहीं...? बताइए मैं हाथ कहां...."
    वह किसी स्वप्न से जागते हुए बोली, "हां... इसी थाली में धो लीजिए..."
   मैंने हाथ धोते हुए पूछा, "हां... वो कल रात मंगल बता रहा था कि यहां से कुछ दूर एक नदी भी बहती हैं और एक बहुत पुरानी आदिवासी बस्ती भी है... आप गई है कभी उधर..?"
   "हां गई हूँ... लेकिन पिछले तीन सालों से नहीं गई... वहां बसंत पंचमी में एक छोटा सा मेला भी लगता है... आप थोड़ा सा पैर उधर कीजिए... नीचे चावल गिरे हैं...", फिर वह थोड़ा सा हंसते हुए आगे बोली, "बिल्कुल बच्चों की तरह खाते हैं..."
  "अरे !! सो सॉरी... मैं उठा देता हूँ न...?", मैं नीचे देखते हुए कहा लेकिन मेरे उठाने से पहले उसने समेट लिया, "मैं नीचे थाली रखकर आती हूँ..."
   "जी... ठीक है"
   वह थाली लेकर नीचे चली गई। मैं खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया। पीछे से आते हुए उसने पूछा, "सिगरेट का पैकेट निकालू...?"
    शायद खिड़की के पास मुझे खड़ा देखकर उसने अंदाजा लगाया होगा कि मैं सिगरेट पीने के लिए खड़ा हूँ। मैंने उससे कहा, "कल एक बात मैंने मंगल से भी कही थी और आज आपसे भी कहता हूँ... मैं कोई शराबी नहीं, और न ही स्मोकर हूँ। पिछले एक हफ्ते को छोड़ दिया जाए तो मैंने जीवन में एक ही बार पी थी, वह भी हॉस्टल में। वेलकम पार्टी में जब सीनियर ने काफी फोर्स किया था तो थोड़ी सी बीयर पी ली थी। यह सिगरेट शराब सिर्फ एक हफ्ते की देन है। घर जाऊंगा तो यह सब छूट जाएगा... और आप जैसी गर्लफ्रेंड ने समझाया है, तो कुछ लिहाज तो करना पड़ेगा न ? लेकिन जब तक यहां हूँ... तो थोड़ा सा आजादी दे दीजिए...?"
     "लेकिन आई थिंक... रात को ? दिन को नहीं... आपकी बॉटल अभी भी बैग में सुरक्षित रखी हुई है... मैंने फेंकी नहीं है। वैसे मैंने आपके बारे में सही कहा था न कि आप अपनी उम्र से ज्यादा मेच्योर्ड दिखते हैं..."
   "तो...?"
    "आप राइटर हैं, इतनी समझदारी की बात करते हैं... तो हेंस प्रूव्ड...कुछ मैथमेटिक्स मैंने भी पढ़ी है", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
   "अरे जी कहां के राइटर ! दो चार कहानी छप जाने से कोई राइटर नहीं बन जाता है, पता नहीं आप क्या समझती हैं, मैं तो कुछ भी नहीं... लेकिन शायद मैंने यह भी कहा था कि लड़कियों को बच्चे पसंद नहीं..."
     उसने अधिकार पूर्वक और पूरे आत्मविश्वास से मेरी बात का खंडन करते हुए कहा, "यहां पर आप बिल्कुल गलत है। लड़कियों को हमेशा बच्चे ही पसंद होते है... उनके हृदय का सच्चापन, उनकी मासूमियत उन्हें पसंद आती है..."
   "और शायद इसीलिए आप सत्य को बहुत-बहुत चाहती हैं। बहुत पसंद करती है..."
   उसने मेरी बात काटते हुए आश्चर्य से पूछा, "मैं सत्य को चाहती हूँ... ये किसने कहा आपसे ?"
   मैं कुछ संकोच के साथ बोला, "सॉरी, लेकिन मैं आपकी आंखों में उसे देख सकता हूँ। सत्य ने खुलकर तो कुछ नहीं बताया और सही भी है... एक अजनबी जिससे अभी दो दिन पहले जान पहचान हुई है, अपने दिल की सारी बातें बता पाना मुश्किल है। आपने मुझे सहजता से अपना दोस्त समझा, उसके पीछे भी हम दोनों का साहित्य के प्रति प्रेम ही है..."
   "वजह और भी हो सकती है... जैसे आपका दृष्टिकोण, सामने वाले को समझने की समझ रखना, उसके बारे में उसे वह बता देना जो वह खुद नहीं जानता है, और भी...", फिर वह थोड़ा सा मुस्कुरा दी। मुझे उसकी यह मुस्कुराहट व्यंगात्मक लगी। 
    मैंने भी आश्चर्य जताते हुए कहा, "इतना सब अपने जान लिया...?"
  "बुरा मत मानिएगा मैं आपको जज नहीं कर रही हूँ, आप जो हैं वही बताने की कोशिश कर रही हूँ..."
   "जी मैंने बिल्कुल बुरा नहीं माना और मानू भी क्यों ? सब तो अच्छा ही बताया है...", मैंने हंसते हुए आगे कहा, "और भी जो रह गया हो वह भी बता दीजिए...?"
   "बता दूं... बुरा तो नहीं मानेंगे...?", उसने रहस्यमई नजरों से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "तो सुनिए, आप किसी की भी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोल सकते हैं... क्या मैं गलत हूँ...?"
   मैंने उसकी आंखों में आंखें डालकर हौले से मुस्कुराते हुए कहा, "जी आप बिल्कुल गलत हैं... और मैं आपके बारे में कुछ कहूं... आप संकोची बहुत है। सच कहने से नहीं डरतो लेकिन अपने मन के सच को भी जल्दी नहीं स्वीकार कर पाती हैं... शायद इसी लिए आज तक सत्य से भी अपने हृदय की बात नहीं कही होगी... क्या मैं गलत हूँ ?"
  "नहीं....", फिर उसने खिड़की से बाहर देखते कहा, "जानते हैं, मैंने लगातार सत्य को दो-ढाई महीने तक उसी शीशम के पेड़ के नीचे खड़ा हुआ इसी खिड़की से देखा था... मुझे आश्चर्य होता कि आखिर यह लड़का यहां करता क्या है ? पहले सोचा कि किसी से मेरे बारे में मालूम पड़ा होगा, तो ट्राई कर रहा है। कुछ दिनों तक मैं देखती रही लेकिन ऐसा कुछ नहीं पाया, वह अपना काम करता... ट्रक आते, रुकते, वह कुछ नोट करता और फिर ट्रक आंगे बढ़ जाते। तब इतना ही समझ में आया था कि शायद माइंस में नौकरी करता होगा..."
     धीरे-धीरे क्यूरियोसिटी बढ़ती गई। फिर बरसाती हुई शाम में इसी गौशाला के पास मैंने इसी खिड़की से उसे कुछ भींगते हुए खड़ा देखा... बस उसी शाम से मेरी दुनिया बदल गई...", उसने एक गहरी सांस लेते हुए अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
   मैं कुछ देर तक उसे ध्यान से देखता रहा। उसकी नज़रें बाहर स्थिर थी और चेहरे में कोई भाव नहीं थे।उसकी बात को खुद ही पूरा करने के उद्देश्य से मैने मुस्कुराते हुए कहा, "यूं मीन... लव..?"
   उसने मेरी तरफ देखा और प्रतिउत्तर में थोड़ा सा मुस्कुरा दी। बाहर का मौसम अच्छा था। तेज धूप, सामने गौशाला, सामने से गुजरती रोड, रोड के उस पार शीशम का पेड़ और खिड़की पर खड़े हम दोनों। 
   "आपने जवाब नहीं दिया ...?", मैने उत्सुकता से फिर पूछा।
   उसने आश्चर्य से पूछा, "किस बात का ...?",  कुछ देर बाद खुद ही बोली, "ओह ! समझी !! ... क्या कहूं आपको तो मेरी नजरों में दिखाई देता है न...?", फिर मेरी आंखों में देखते हुए आगे बोली, "तो देख लीजिए..."
   मै खामोशी से एक पल के लिए उसकी गहरी बादामी आंखों में देखता रहा फिर खिड़की के बाहर देखने लगा। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने ही पूछा, "क्या देखा अपने...?"
   मैं उसी तरह बाहर देखते हुए बोला, "खुद को देखा...", फिर उसकी तरफ देखते हुए आगे बोला, "और क्या ... सच में खुद को देखा... अरे तुम्हारी नजरों के सामने जब मैं हूँ, नेचुरल है तुम्हारी आंखों में मेरा ही अक्स होगा... यह तो साइंटिफिक प्रूफ है..."
   "क्यों अभी तक तो सत्य दिख रहा था...?", उसने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा।
  मेरे होठों में फीकी मुस्कान आ गई, "साइंस अभी तक सोल तक कहां पहुंच पाई है..."
   फिर मैं चुप हो गया। मंगल से मुझे कुछ बातें पहले से ही पता थी। घरेलू हादसे, बाबा का स्वभाव, उनकी खेती-पाती, जमीन जायदाद और यहां तक की ध्रुव के बारे में भी काफी कुछ जान गया था। 
   जब खामोशी लंबी होने को आई तो मैने उससे कहा, "पीहू ! कुछ और बताओ न...", 
   "पहले आप एक बात बताइए, आपने अभी जो पोयम सुनाई है...अंतिम लाइन में तिरते शब्द क्यों यूज किया, आंसू तो बहते हैं न ?"
    "हां, लेकिन जब इंसान रोते-रोते थक जाता है तब उसकी आंखों से आंसू बहते नहीं बल्कि आंखों में तैरते हैं, इसे ही कहते हैं आंखों का भर आना या डब-डबा जाना ...। एक ऐसे इंसान का दर्द जिसके आंसू पोछने के लिए उसके पास कोई अपना नहीं और न ही वह अपने दर्द को किसी और से कह पा रहा है, तो अब उसने रोना छोड़ दिया है, बस उसकी आंखों में आंसू तैरते रहते हैं... यह दर्द की इंटेंसिटी को बयां करता है।"
   "ओह! वही वाली बात, सही शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं..."
    "विजन होता है...", उसकी बात पूरी करते हुए मैं मुस्कुरा दिया।
   "जी बिल्कुल , क्या डीप इमोशन है और कहते हैं  लिटरेचर-विटरेचर नहीं आती है...", उसने कुछ उलाहना भरी नजरों से मेरी तरफ देखा। प्रतिउत्तर में मेरे होठों में एक फीकी मुस्कान तैर गई। अब मैं उससे कैसे कहता कि मैं तो लिटरेचर जैसी जिंदगी तो ही जी रहा हूँ... 
    पीहू कह रही थी और मैं केवल सुन ही नहीं रहा था बल्कि उसे अंदर से भी महसूस कर रहा था। उसके जज्बात, उसकी प्रखर और उज्जवल भावनाएं, चेहरे के भाव सभी कुछ मुझे बता रहे थे कि यह लड़की किस हद तक ईमानदार है। उस के स्वाभाव में कितना अपनापान और रिश्तों के प्रति कितना समर्पण है। पहली मुलाकात में इसके प्रति मैंने जो धारणा इसके पहनावे को देखकर बनाई थी वह सही साबित हो रही थी।
   कुछ देर बाद मैं चारपाई पर लेटा था और वह कुर्सी पर बैठी अपनी अब तक की जिंदगी की कहानी बता रही थी। 
   लेकिन इस वक्त पीहू और सत्य के बीच का संबंध मुझे मेरे अतीत की तरफ खींच कर ले गया। मैं उनकी कहानी को अपनी जिंदगी से को-रिलेटेड महसूस कर रहा था। प्यार की कशिश, मोहब्बत की रूमानियत, दर्द, आंसू और इन सब पर भारी प्रतिष्ठा और अभिमान।
      मैने ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना की... ऐसा पल उनकी जिंदगी में कभी न आए। जिन लम्हों और अंजामों से मैं गुजरा हूँ इन्हें न गुजरना पड़े...लेकिन मुझे इस बात की तसल्ली हो रही थी कि यदि बाबा की स्वीकृति है, जो कि मैं देख और महसूस भी कर चुका हूँ...  तो जात-पात, कुल-गोत्र, धर्म और सबसे बड़ी चीज प्रतिष्ठा और अभिमान इनके संबंधों के बीच में रुकावट नहीं होंगे। लेकिन पीहू की आँखें....? नहीं... नहीं.... यह मेरा वहम भी हो सकता है...?
   जब उसकी कहानी पूरी हो गई तो मुझे कुछ असहजता महसूस हुई, मैंने उससे कहा, "अब आप आराम कीजिए, मैं धीरे-धीरे बगिया निकल जाऊंगा..."
    "नहीं आप लेटे रहिये, मैं ऐसे ही ठीक हूं...", उसने मेरे सिरहाने में रखी चित्रलेखा उठाते हुए कहा, "इसे पढ़ रहे थे...?"
   "जी... आपके पास तो बहुत सारी लिटरेचरल बुक हैं... पढ़ने का इतना शौक !! वह भी इस स्तर की बुक्स... आजकल कोई नहीं पढ़ता... लोग बोर हो जाते हैं...", मैंने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा।
   "अरे नहीं...", उसने कुछ संकोच में अपना सर झुकाए हुए कहा, "यह समझ लीजिए पढ़ने का शौक विरासत में मिला..."
   "अच्छा ये बताइए, सचमुच अपने कुछ नहीं लिखा... मतलब कोई कविता, कहानी या कुछ भी...", मैंने मुस्कुराते हुए फिर से पूछा।
  उसने मेरी तरफ गौर से देखते हुए पूछा "... क्यूं...?"
  मैंने सोचा हो सकता है मेरी बात उसे बुरी लगी हो, मैंने बात को संभालते हुए कहा, "नहीं ऐसे ही पूछा है...  यदि कुछ लिखा होगा तो अच्छा ही लिखा होगा न, इसलिए। मैं पढ़ाना चाहूंगा..."
   उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए फिर कहा, "आप पढ़ेंगे...!!"
   "क्यों नहीं, आपने इतनी सारी बुक्स पढ़ी हैं, इतना लिटरेचर पढ़ा है, जो भी लिखेंगी बहुत ही अच्छा लिखेंगी... ईमानदारी से कह रहा हूँ। यदि लिखा हो तो मुझे दिखाये, मैं पढ़ूंगा और हो सकता है उसे और बेहतर करने में मैं आपकी कुछ हेल्प भी कर सकूं...?", मैंने उसे विश्वास दिलाते हुए कहना चाहा।
   मेरी आशा के विपरीत उसने मुझसे ही पूछ लिया, "आपने कब से लिखना शुरू किया..."
   "अधिक समय नहीं हुआ है, यह कोई चौथी या पांचवी कहानी है जो पब्लिश हुई है, कुछ कविताएं है, जो अभी अनपब्लिश्ड हैं... कल सत्य ने बताया कि जितनी बुक्स अलमारी में है, उससे कई गुना तो आपकी पेटी में रखी हुई हैं... मैंने इतनी सारी बुक्स नहीं पढ़ी है... लेकिन मेरा मानना है कि कुछ अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना जरूरी है... काफी कुछ सीखने को मिलता हैं... इमोशंस को विजुलाइजेशन करने के लिए अच्छे शब्द मिलते हैं, भाषा-शैली मिलती है... यूं समझिए कि अच्छे पकवान को यदि अच्छे से परोसा जाए तो उसके खाने का स्वाद और भी बढ़ जाता है। उसी तरह एक कहानी या कविता या कुछ और भी जिसे हम लिखते है, उसके लिए यह जरुरी है कि उसे प्रस्तुत कैसे किया जाए..."
   उसने मुझे बीच में रोकते हुए पूछा, "लिखने के लिए सबसे जरूरी क्या होता है...?"
   "सभी कुछ अपने स्थान पर जरूरी है, थीम्स अच्छी होनी चाहिए फिर उनके किरदारों के अनुसार ही उनकी भाषा-शैली होनी चाहिए... प्रस्तुतीकरण यह सभी कहानी के लिए जरूरी होता है। लेकिन कविता के लिए इमोशंस यानी भावना ... कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की कला होनी चाहिए और यह सभी लगातार पढ़ते रहने से ही आता है..."
   "अच्छा ! अभी तक मैने इतनी बुक्स पढ़ी तो कुछ लिखा क्यों नहीं...?"
   "क्योंकि आपने लिखना चाहा ही नहीं... आपने इमोशन अपने हदय में संजो कर रखे हैं... इन्हें बाहर आने दीजिए ठीक उसी तरह जैसे जब पीड़ा सहनशक्ति से बाहर हो जाती है... तो इंसान रोता है... हृदय प्रसन्न हो तो होठों में मुस्कुराहट आती है। वैसे भी आपके पास तो इतनी अच्छी लव स्टोरी है, उसी को आधार बनाकर कुछ लिखिए...?"
    "मतलब...", उसने पूछा।
    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "सत्य को खिड़की से यूं देखना, उसके प्रति जिज्ञासा, बरसती हुई शाम में उससे पहली मुलाकात, अपकी सत्य के साथ इंगेजमेंट, उसके साथ मूवी देखना... गार्डन घूमना... उसके घर जाना... जो भी आपने अभी बताया और वह भी जो न बताया हो। कितने सारे इमोशन और इवेंट्स हैं आपके पास... जिसे आप जी रही हैं... उसी से शुरुआत कीजिए... ऐसा कीजिए अपनी पर्सनल डायरी लिखिए, सबसे छुपा कर। जब पूरी हो जाए तो फिर मुझे चुपके से दीजिएगा, मैं पढूंगा... ठीक है ?"
  अब उसने भी थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहां, "अच्छी बात है, जब लिखूंगी तो सबसे पहले आपको ही पढ़ने की लिए दूंगी..."
     तभी एक बाइक की आवाज सुनाई दी। पीहू झट से उठी, "सत्य आ गया ....", उसने खिड़की से झांक कर देखा, "बाइक गौशाला के अंदर खड़ी कर दो ... मैं अभी नीचे आती हूँ ..."
    कुछ देर बाद वह सत्य के साथ अटारी में आई। सत्य मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया, "कितनी डांट पड़ी दोस्त ? इसने तो तुम्हें बिल्कुल नहीं छोड़ा होगा ? सुबह से नाराज बैठी है। और तुम भी तो भाई अजीब हरकतें करते हो। अपनी शादी में मुझे जरूर बुलाना ताकि मैं तुम्हारी बीवी को तुम्हारी ये हरकतें बता सकू। कहूं कि भाभीजी इसे रात को बांध कर रखिएगा, नहीं तो साहब रात को मिस्टर इंडिया बन जाते हैं... यूं गायब", अंतिम शब्द कहते-कहते वह जोर से हंसा था और उसके पीछे मैं भी। 
    फिर पूरी अटारी ठहाकों से गूंज उठी। भरपूर हंस लेने के बाद मैने कहा, "यार कल रात के लिए सॉरी... देखो मैं सबसे माफी मांग चुका हूँ... प्लीज यार तुम भी माफ कर दो..."
   "चालो किया, लेकिन तुम इतनी बात तो समझो, तुम मेरे सबसे अच्छे और फास्ट फ्रेंड की अमानत हो मेरे पास। यदि तुम्हें कुछ हो जाएगा तो मैं उसे कैसे...."
    मैं उसे बीच में रोकते हुए बोला, "यार मैं समझ गया, जब से पीहू ने बताया कि रात में यहां जंगली जानवर भी घूमते हैं तब से मेरी जान हलक में अटकी पड़ी है..."
    पीहू ने एकदम से पूछा, "तो आप मृत्यु से डरते हैं...?"
    "अरे न जी...", मैंने लापरवाही से इंकार करते हुए कहा, "कौन कमबख्त है जो मरने से डरता है... सुना है ये जो जंगली जानवर होते हैं न बड़ी बेदर्दी से चीड़-फाड़ करते हैं। बड़ी ही बेरहम मौत देते हैं... बस इसी से डर लगता है..."
    "तो फिर आपको कैसी मृत्यु पसंद हैं...", उसने फिर पूछा।
    उसके प्रश्न को सुन सत्य बोला, "क्या पीहू तुम भी हद करती हो... ये कोई पूछने की बात है ? और फिर हम अपनी मृत्यु का चुनाव कैसे कर सकते हैं ? यह तो कुदरत करती है न ?"
   "नहीं, मेरा मतलब यदि हमें चुनाव करना पड़े तो...", पीहू भी कहां हार मानने वाली थी।
   सत्य ने उसे कुछ डांटते हुए कहा, "बस यार तुम अब चुप..."
   "अरे भई तुम लोग लड़ो मत... रुको सत्य, मैं बताता हूं, तो सुनो पीहू !...", मैं उसकी तरफ देखते हुए बोला, "यदि नियति मुझे मेरी मृत्यु का चुनाव करने दे तब मैं एक ऐसी मौत मरना चाहूंगा जिसमें मेरे प्रिय की प्रतिक्षा हो... एक आस हो उसके आने की... मेरी आंखे खुली हुई हों... और मेरे दिल की धड़कन आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जाए।  एक ऐसी मौत जिसमें जीवन का संगीत हो...जिसकी स्वर-लहरी अपने चरम पर पहुंचकर धीरे-धीरे शांत हो... उसके सभी सुर मेरे हृदय में समाहित होते चले जाएं... वीणा की ऐसी झकार जो तार टूटने के बाद भी कुछ देर तक गूंजती रहे... मैं जीवन का यही संगीत सुनते हुए अपने प्रिय की प्रतीक्षा में मृत्यु का वरण करूंगा... यूं समझ लो पीहू ! मैं एक हसीन और जवान मौत मरना चाहता हूँ...."
    "वाह!.. क्या बात है...", सत्य ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। फिर वह पीहू से बोला, "... लो मिल गया तुम्हारे टक्कर का... तुम्हारी इन बेजान किताबों का जीता जागता प्रतिरूप..."
   "अरे नहीं सत्य...", मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए आगे कहा, "... किताबें कभी बेजान नहीं होतीं। उनके हर पन्ने सांस लते हैं... मैं तो कहता हूँ उनके हर शब्दों में एक स्पंदन होता है... बस हम उन्हें महसूस कर सके..."
   इस बार पीहू ने सत्य की तरफ देख कुछ व्यंग्य से मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने सही कहा... अब मिला है मुझे मेरे टक्कर का... बोलो है न...?"
   सत्य मुझसे शिकायती लहजे में बोला। "यार ये एक्सप्लेनेशन देने की जरूरत थी क्या ?"
   मैंने चकित-सा दोनों को देखा, "मतलब...? क्या मैं कुछ गलत कह गया...?"
   "अरे नहीं, कुछ गलत नहीं कहा..."
  "स्योर न ? तो फिर चलो तुम आ गए हो तो इसी खुशी में एक-एक कप कॉफी हो जाए..."
   "कॉफी !! ... वो क्या है, हम लोग हमेशा चाय ही पीते हैं... तो काफी तो नहीं होगी...", पीहू ने मेरी तरफ देखते हुए कुछ संकोच से कहा।
   "हां यार... पीहू सही कह रही है... हम अक्सर चाय ही पीते हैं... तो सॉरी यार",  सत्य ने भी कुछ संकोच से कहा।
      मैंने सभी की शंकाओं का समाधान किया, "मेरे पास है... वो क्या है कि ज्ञान ने एक दुकान से घर के लिए कुछ समान लिया था और मेरे ही बैग में डाल लिया था। यहां आने के बाद मैंने देखा कि कॉफी का एक छोटा सा डिब्बा बैग में ही है, शायद निकालने के लिए रह गया हो। लेकिन पीहू ने अभी बताया है कि बाबा को पसंद नहीं है, सुबह और शाम दो बार ही वह भी तुम्हारी कृपा से इस घर में चाय बनने लगी है...?"
  इस समस्या का हाल पीहू के पास था, "कोई बात नहीं आज आपकी कृपा से बनेगी। बाबा से कह दूंगी की आपको कॉफी पीनी है, तब वह मना नहीं करेंगे..."
  "तो जाइए फिर बना कर लाइए ...", सत्य ने शिष्टता दिखाते हुए पीहू से कहा।
   पीहू को मैने बैग से कॉफी का डिब्बा निकल के दे दिया। वह जाने को पलटी कि सत्य भी कुर्सी से उठता हुआ बोल, "रुको पीहू... मैं भी आता हूँ...", फिर वह मेरी तरफ देखते हुए बोला, "बाबा से मिल लूं एक बार..."
   "जाओ भई, एक बार नहीं कई बार मिलो... इत्मीनान से मिलो और जी भर के मिलो... हम भी यहीं पर मिलेंगे...", मैने मुस्कुराते हुए कहा, "तखलिया...!"
   "जो हुक्म आलमपनाह ...", सत्य ने भी मुस्कुराते हुए कहा।
     लगभग पंद्रह बीस मिनट बाद दोनों एक साथ फिर हाजिर हुए, ट्रे सत्य के हाथ में थी। मैंने चित्रलेखा एक तरफ रखी और चारपाई पर पैर नीचे करके बैठ गया। कॉफी के साथ हंसी मजाक का दौर भी चल रहा था। लगभग 4 बजे सत्य उठता हुआ बोला, "मैं थोड़ा माइंस तक जाऊंगा, 6 के लगभग लौट आऊंगा..."
   मुझे जिस ढंग से बताया जा रहा था उससे मैं अंदाजा लगा सकता था कि इस बात का डिस्कशन उन दोनों में पहले ही हो चुका था, और यह जानकारी सिर्फ मुझे दी जा रही है, "ओके जाओ... हम इंतजार करेंगे... खुदा हिफाजत करें... "
   "थैंक यू... थैंक यू...",  कहता हुआ सत्य सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, पीहू भी पीछे-पीछे हो ली। मैं उठा और बुक वाली अलमारी के पास आ गया। वही मुझे एक स्टोरी कलेक्शन की बुक मिली। लेखक का नाम पढ़कर मैं चौंक उठा। अरे यह तो पीहू के पापा का नाम है। मैं उसे लेकर खिड़की के पास खड़ा होकर पढ़ने लगा। कुछ देर बाद पीहू आई तो उसने कन्फर्म किया कि यह स्टोरी कलेक्शन उसके पापा का ही है। मैंने प्रशंसा भरी नजरों से उसकी तरफ देखते हुए कहां, "ओह, तो आपके पिताजी लेखक थे...?"
   "हां पापा को लिखने और पढ़ने दोनों का शौक था। एक पब्लिकेशन कंपनी में असिस्टेंट एडिटर थे, तो स्वाभाविक था..."
  "मैं रख सकता हूँ...?"
  "मुझे खुशी होती... लेकिन मेरे पास एक ही कॉपी है... आप पढ़ लीजिए ले मत जाइयेगा..."
    "जी ठीक है...", फिर मैंने कुछ संकोच से कहा, "पीहू ! मुझे कुछ पैसों की जरूरत है, क्या है न, मैं अपना वॉलेट ज्ञान के ही घर में भूल आया हूं। जब वह लेने आएगा तो मै आपको दे दूंगा..."
   "अरे ! इसमें इतना संकोच कैसा, वैसे कितने चाहिए आपको..."
    "वन थाउजेंड... हां इतने में हो जाएगा...",
   "ओके मिल जाएंगे... लेकिन आप बुरा न माने तो..."
   "नहीं, आप पूछिए... क्या जरूरत है पैसों की... यही न ?"
  "नहीं ! लेकिन अब आप बता ही दीजिए..."
   मैने नजरे चुराते हुए कहा, "एक्चुअली मुझे शराब मंगानी है..."
   उसने आश्चर्य से कहा, "अभी है तो...? और फिर किससे मंगाएंगे... पहले बताया होता तो मैं सत्य से..."
   "मेरी मंगल से बात हो गई है... देखिए उसे..."
   "नहीं डाटूंगी... ओके ? बस इसीलिए चाहिए था... कि किसी और काम के लिए...?"
  "नहीं..."
   "वैसे मैं तो यह कहने वाली थी कि पैसे इस शर्त में दूंगी कि आप लौटाएंगे नहीं... आप हमारे मेहमान हैं और आपकी जरूरत का ध्यान रखना हमारा फर्ज है... मुझे बेहद खुशी है कि आपने संकोच नहीं किया...", पीहू ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
    "अच्छी बात है... लेकिन एक बात और... एक्चुअली बात नहीं है...  बल्कि इस दिल की एक आरजू है..."
   "आरजू ... वो भी दिल की... तो वह अवश्य पूरी होगी... कहिए...?", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
    मै उसे समझाते हुए बोला, "देखिए, मैं आज रात को यहां हूँ ... हो सकता है कल शाम को या फिर परसो ज्ञान मुझे लेने आ जाए और मैं चला जाऊं... फिर पता नहीं कब आना हो ... तो आज रात को आप, सत्य, मंगल, कमली, मतलब हम सभी एक छोटी-सी पार्टी यानी गेट टू गेदार करे..."
    "ये होल्ड ऑन... भूल जाइए ... इस घर में ये सब नहीं चलेगा...", उसने मुझे रोकते हुए कहा।
    "मै ये कब कह रहा हूँ कि इस घर में... मैं तो बगिया की बात कर रहा हूं... वही खाना बने, हम सब मिलकर बनाए... चुटकुले सुने, सुनाए। हंसी-मजाक, कुछ होश में कुछ बेखुदी में... मतलब फुल एंजॉय... समझ रही हैं न.?"
  "अच्छा ! तो आप यहां पार्टी करने आए हैं...", उसने आश्चर्य जताते हुए पूछा, " मै पूछ सकती हूं कि किस खुशी में ?"
  "अफसोस अब तक जिंदा हूँ, इस खुशी में समझ लीजिए... मैं कहना चाहता हूँ कि ये जिंदगी चार दिन की है, थोड़ी सी जी ली जाये...  बाकी कुछ नहीं रखा... एक दिन सब यहीं रह जाएगा...", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
   "नहीं, मेरी ऐसे ही अच्छी गुजर रही है... आप लोग एंजॉय कीजियेगा...  हो सकता है सत्य शामिल होना चाहे... उससे पूछ लीजिएगा..."
   मैने अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा, "चलिए कोई बात नहीं, आपकी जैसी इच्छा... पर एक बात कहें पीहू जी..?"
   "जी कहिए...?", उसने मेरी तरफ उत्सुकता से देखते हुए कहा।
   मैने भी उसकी तरफ देखते हुए संजीदगी से कहा, "पीहू जी, जिंदगी जीने के लिए होती है, गुजारने के लिए नहीं... उसमें तो समुंदर से उठती, गिरती, लहराती आपकी रेशमी जुल्फों की लहरों की तरह रवानी होनी चाहिए..."
     "हूँ ..! राइटर और फिलोस्फर, दोनों ? ठीक है... सोचेंगे।.लेकिन बाबा कैसे समझेंगे ? और उन्हें समझाएगा कौन ....?", पीहू ने चिंता जाहिर करते हुए कहा।
    "अरे और कौन ?  बिल्ली के गले में घंटी सत्य ही बांधेगा...", मैने हंसते हुए सुझाव दिया। 
   "ये मेरे बाबा को बिल्ली न कहिए। लेकिन सत्य तो लेट आयेगा... आप 6 के बाद ही मानिए... एक तरीका है... बाबा को आप कन्वेंस कर सकते हैं... अरे आप राइटर है ! "
   मैंने आपसे से कहां, "अरे अजीब बात है... मेरे राइटर होने का इससे क्या संबंध...?"
   उसने आत्मविश्वास से कहां, "है... एक अच्छे राइटर की इमेजनेशन पावर भी जबरजस्त होती है...सो जस्ट एश्यूम... मै आपकी प्रेमिका हूँ... और आप उसके साथ एक खूबसूरत शाम बिताना चाहते हैं... पार्टी करना चाहते हैं... और उसके लिए आप बाबा को कन्वेंस कर रहे हैं... अब सोचिए डायलॉग ..?"
   "ख़ाख सोचूं डायलॉग...? आपको अपनी प्रेमिका एश्यूम करने के लिए मेरी शक्ल-सूरत भी तो अच्छी होनी चाहिए ऊपर से बड़ी हुई दाढ़ी बिखरे बाल, पहले से ही मजनू नजर आ रहा हूं...", मैंने बात को टालने की कोशिश करते हुए कहा।
   "बस इतनी सी बात, जस्ट अ मिनट... मैं अभी आई....", कहते हुए वह सीढ़ियां उतरती चली गई। जब लौट कर आई तो उसके हाथ में एक प्लास्टिक का बॉक्स था मेरे सामने रखते हुए कहा "यह सत्य की सेविंग किट है...", फिर अलमारी से आईना उठाते हुए बोली, "और यह रहा आईना... कीजिए सेविंग। अब यह न कहिएगा की सेविंग करनी नहीं आती ?"
   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं कहूंगा, लेकिन इतने बड़े बालों का क्या करूंगा...?"
   "आप चिंता मत कीजिए, जो भी करना होगा मैं करूंगी...", उसने चारपाई से न्यूज़ पेपर हाथ में ले सीढ़ी की तरफ बढ़ाते हुए कहां।
   "अब इसे ले कर कहां जा रही हैं...", पीछे से मैने पूछा।
   वह फिर सीढ़ियां उतरते हुए बोली, "आप सेविंग कीजिए, मैं अभी आती हूँ..."
   मुझे लगभग दस मिनट सेविंग करने में लगे लेकिन इससे पहले ही वह एक दूसरा बॉक्स लेकर मेरे पास बैठ गई थी। मैंने पूछा, "अब इसमें क्या है...?"
   "हेयर ड्रेसिंग...", उसने मुस्कुराते हुए कहा। 
   "आपको यह भी आता है ?", मैंने आश्चर्य से पूछा। 
   "हां, बॉम्बे में रहने का कुछ तो फायदा उठाना ही था, वैसे मुझे लेडिस स्टाइल तो आती हैं... लेकिन मैं कोशिश करूंगी... ?", उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
   मैंने भी हंसते हुए कहा, "कोशिश ! जी मैं चूहा हूँ कि ये एक्सपेरिमेंट मुझे से शुरू होगा...?"
   "नहीं... यदि कुछ गलत हो गया तो घर पहुंचन से पहले सेट करवा लीजिएगा... यहां कौन देखेगा ?"
    "चलिए यह भी ठीक है... लेकिन पेपर लेकर कहां गई थीं..?", मैने अपनी सहमति देने के साथ प्रश्न किया।
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "जब नीचे सेविंग किट लेने गई थी तो बाबा ने मांगा था... उन्हीं को देने गई थी... वो क्या है न कि मैंने सुबह उन्हें बताया था कि आप कहानियां लिखते हैं... और पेपर में छपी भी है... तो उन्होंने कहा था कि मुझे भी देना.. मैं भी पढ़ूंगा..."
   "अरे वाह ! उनकी नजरों में मेरा पहला इंप्रेशन ठीक रहा..."
   "नहीं दूसरा... पहले तो कल शाम को था पर वह भी ठीक ही था...", उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
   लगभग दस मिनट और लगे और उसने मेरे चेहरे की कायाकल्प बदल दी। उसने मेरे बालों को काटा कम सेट अधिक किया। मैं हैरान था, यार इसे तो सब कुछ आता है। अंत में तौलिया को भिगोकर मेरे सामने करते हुए बोली, "लीजिए पहले चेहरा उसके बाद सर पोंछ लीजिए...",  और फिर थोड़ा सा हंसते हुए आगे बोली, "और यह रहे मेकअप के समान, क्रीम... पाउडर... लिपस्टिक जो भी लगाना हो सब है..."
   उसके कहे अनुसार मैंने अपने आप को तैयार किया और दोबारा आईने में देखा तो मैं अलग ही दिखा। पीछे से उसकी आवाज सुनाई दी, "अब लगते हैं न मेरे ब्वॉयफ्रेंड ? तो चले...?"
   "पीहू जी ! ये तो मुश्किल काम है ... लेकिन चलिए राइटर होने की सजा भी भुगत लूंगा ...", मैने मुंह लटकाए हुए कहा।
   "क्या !! मैं सजा हूँ ? ... थैंक्स कहिए कि राइटर होने से इतनी खूबसूरत लड़की को अपनी प्रेमिका एश्यूम करने का मौका मिल रहा है..."
   "जरा रुकिए... रुकिए ... मेरी वाली आपसे भी...", कहते-कहते मै रुक गए, मेरी नजरों में एक चेहरा आया और ठहर गया। 
   इधर पीहू ने बात पकड़ ली, "हां .. हां .. बोलिए... आप वाली..."
    मुझे झटका लगा, अरे ये मैं क्या कहने जा रहा था, यदि मेरी कहानी का आगाज हुआ तो इस शाम का अंजाम आंसुओं से भींगा होगा और इसलिए शुरुआत न हो तो ही बेहतर है। वैसे भी सत्य और पीहू की रोमांटिक और खुशियों से भरी प्रेम कहानी में, दर्द और आंसुओं में डूबी मेरी प्रेम कहानी का क्या औचित्य ? यदि हम दोनों के रास्ते अलग हैं, तो उनके माइलस्टोन भी अलग होने चाहिए। 
      मैंने बात बदलते हुए कहा, "अधिक खूबसूरत होगी... समझीं ? है नहीं...  होगी... तो चलिए तब तक आप से ही काम चलाते हैं।
   "हम से ही !!! दोस्त, मेरी इतनी इंसल्ट तो न कीजिए...", उसने मुस्कुराते हुए कहा। 
   "सॉरी, मेरा मतलब वो नहीं था...अब चलिए भी...", मैने उठते हुए कहा।
   मैंने सीढ़ियां उतरते हुए पूछा, "कुछ तो बताइए, क्या कहूंगा बाबा से ?"
    उसने लापरवाही से जवाब दिया, "मैं क्या जानू...? बॉयफ्रेंड आप हैं तो सोचिए आप..."
   जब हम आंगन में पहुंचे तो बाबा वहां नहीं मिले। उसी ने बताया कि शाम के वक्त वो अक्सर नीम के नीचे चबूतरे में बैठते हैं। आप वही जाइए और उन्हें कन्वेंस कीजिए। जब मैं वहां पहुंचा तो दखा कि नीम के चारों तरफ गोल घेरे में कच्चा चबूतरा बनाया गया था। एक छोटी चटाई बिछा के बाबा उसी में बैठे थे। उनके बगल में न्यूजपेपर और उसके ऊपर एक चश्मा रखा हुआ था। नजदीक पहुंचकर मैंने उन्हें  प्रणाम किया। उन्होंने पास ही बैठने का इशारा किया और मेरी कहानी की प्रशंसा भी की। कुछ औपचारिक बातों के बाद मैंने उनसे सीधे शब्दों में कहा, "बाबा एक कहानी की सिचुएशन है समझ में नहीं आ रहा है कि आगे कैसे बढ़ूं... क्या आप मेरी कुछ हेल्प करेंगे ?"
   उन्होंने अपना सर हां में हिलाते हुए कहा, "हां पूछो..."
   मैं यही तो चाहता था, मैंने भूमिका बनाते हुए कहा, "एक लड़का है जो एक अनजान-सी जगह, एक अनजाने से घर पहुंचता है। अनजान लोगों से मिलता है.. यूं कह लीजिए सबके लिए अजनबी है..."
    मैं आगे बढ़ता कि उन्होंने मेरी तरफ गहरी दृष्टि से देखते हुए कहां, "जैसे तुम...?"
   उनके इस अप्रत्याशित प्रश्न से मैं कुछ देर के लिए घबरा गया लेकिन जल्द ही अपने आप को संभालते हुए कहा, "हां... हां.. बाबा, जैसे मैं..."
    "अच्छा तो फिर आगे...?"
    बस यहीं पर मैं कुछ और घबरा गया, लेकिन कहानी को तो आगे बढ़ना ही था। मैंने अपने इरादे मजबूत किए, "उस घर में उसकी मुलाकात एक लड़की से होती है... मेरा मतलब वो दोनों भी एक दूसरे के लिए अजनबी ही है..."
    बाबा की पारखी नजर एक बार फिर मेरे चेहरे में गई। इस बार उन्होंने गंभीरता से पूछा, "क्या इस कहानी में, उस लड़की के बाबा और सत्य भी हैं..?"
   मुझे उनकी तरफ से इस प्रश्न की बिल्कुल आशा न थी। मै सर झुकाए सिर्फ इतना कह पाया, "जी..."
   "हूँ...", बाबा ने हुंकार भरी, "तो फिर अब आगे..."
    मैंने उसी तरह सर झुकाए हुए कहा, "कुछ नहीं..."
   "नही आगे कहो, कहानी को अधूरा नहीं छोड़ते हैं...?", बाबा ने उसी तरह गंभीर मुद्रा में कहां। 
   अब मेरे पास एक ही रास्ता था और वह था सच बोलने का। सीधे शब्दों में अपनी इच्छा जाहिर करने का, और मैंने वही किया, लेकिन अपनी राइटिंग स्किल के साथ, "बाबा ! अब आपसे क्या छुपाना, मैं सत्य के बेस्टफ्रेंड ज्ञान का दोस्त हूँ। उसे अपने माता-पिता के साथ एक शादी के कार्यक्रम में अचानक जाना पड़ा। तो मैं यहां सत्य के साथ चला आया। आप सभी से मुलाकात हुई, मुझे बहुत अच्छा लगा। सच पूछिए तो एक पल के लिए महसूस ही नहीं हुआ कि मैं एक अजनबी जगह में अजनबी लोगों के बीच में हूँ। आप सभी लोग बहुत अपने से लगे... हो सकता है कल या परसों मैं यहां से चला जाऊं। बहुत दिनों से शहर की भाग-दौड़ की जिंदगी जी रहा हूँ। यह गांव, यहां का माहौल, यहां की शुद्ध हवा, चारों तरफ हरियाली, खेत खलिहान, फसल देखकर अपने गांव की याद आ गई। मन में इच्छा जागी... क्यों न मैं, सत्य, मंगल, कमली, पीहू हम सभी इकठ्ठा मिलजुल कर रात का खाना बगिया में बनाए और वही खाएं, थोड़ा सा हंसी मज़ाक चुटकुले अंताक्षरी यही सब... बस"
   फिर मैं खामोश हो गया। कुछ देर बाद बाबा स्वयं बोले, "पीहू से पूछा... उसका क्या कहना है...?"
   "जी पूछा है, उसका कहना है कि बाबा जैसा भी चाहेंगे... यहां तक की उसने यह भी कहा कि लगा लो शर्त, बाबा कभी भी इजाजत नहीं देंगे... और मैंने लगा ली..."
    "अच्छा !! तो तुम चाहते हो कि पीहू शर्त हार जाए... और उसमें मैं तुम्हारा साथ दूं ?", उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए कहा।
    "नहीं बाबा मैं कभी नहीं चाहूंगा कि वह शर्त हार जाए..."
     "बेटा तुम्हारी बात मुझे समझ में नहीं आ रही ? तो फिर इजाजत किस बात की लेने आए हो...?", बाबा ने कुछ झुंझलाते हुए कहा।
    "बाबा ! पीहू की खुशी के लिए... क्योंकि मैं जानता हूँ, उसे अपने जीत जाने की खुशी उतनी नहीं होगी जितनी हार जाने में होगी... हां बाबा, मैं सच कह रहा हूँ... मुझे कल ही मंगल से मालूम पड़ा था कि आप लोगों पर क्या गुजरी हैं, कितने बड़े दुःख से होकर गुजरना पड़ा है... जरा सोचिए बाबा पीहू ने तो जीना ही छोड़ दिया है... शायद खुशी के ये छोटे-छोटे पल उसकी होठों में मुस्कुराहट वापस ला सके... और सच पूछिए उसका हंसता-मुस्कुराता चेहरा देखकर आपको भी बहुत खुशी होगी... बाबा सॉरी मैने मंगल से आप लोगों की निजी जिंदगी के बारे में पूछा..."
  मेरी बातें सुनकर बाबा थोड़ा सा गंभीर हो गए, "नहीं इसमें सॉरी की कोई बात नहीं... जिस घर परिवार के बीच में रह रहे हो उसके बारे में जानने का तुम्हें अधिकार है। और फिर इसमें छुपाने जैसी कोई बात नहीं हैं... यह तो सभी जानते हैं... लेकिन एक बात तुमसे कहता हूँ... मेरे जीवन में पीहू और ध्रुव के अलावा अब कोई नहीं है... यह सारी संपत्ति इन दोनों की ही है, मेरा कोई ठकाना नहीं, आज हूँ कल नहीं रहूंगा। इन बच्चों की खुशी ही मेरे जीवन में अहमियत रखती है... लेकिन उनकी सुरक्षा अभी भी मेरी जिम्मेदारी है... खासकर पीहू को लेकर। यह ठीक है बगिया अपनी है, मंगल है कमली है, सत्य है इन सब पर विश्वास है लेकिन उसकी सुरक्षा को लेकर मुझे चिंता रहेगी। इसलिए तुम लोग अपनी सुरक्षा को भी ध्यान में रखना। एक तो बस्ती से दूर घर है और बगिया भी यहां से कुछ दूर ही है। चोरी-डकैती का डर नहीं है, लेकिन कभी-कभी जंगली क्षेत्र होने के कारण जंगली जानवर भूले-भटके इस तरफ आ जाते हैं। इसलिए रात को पैदल मत लौटना..."
    मैंने उनकी सभी बातें खामोशी के साथ सुनी। जब बाबा खामोश हो गए तो मैंने उठाते हुए कहा, "जी बाबा.... तो हमें इजाजत है ?"
    "हां... पीहू को मेरे पास भेजना जरा, और ये क्या तुम्हारी वेशभूषा ही बदल गई... इसी तरह रहा करो ठीक लगते हो... अब तो खुश हो न...?"
    "जी...", मैंने कुछ शरमाते हुए अपने दोनों हाथ जोड दिए।
   "अब मैं तुमसे एक बात कहता हूँ... की यदि कभी भी पीहू की बेहतरी के लिए, उसकी खुशी के लिए मैं तुमसे कुछ कहूं तो तुम भी इंकार नहीं करोगे... ठीक है न ? अब जाओ..."
    "जी बाबा, मैं ध्यान रखूंगा..."
     यह कह मैं अंदर आ गया। आते ही पीहू से बोला, "पीहू जी ! बाबा बुला रहे हैं, मेरी क्लास खत्म हो गई है, अब आपकी शुरू होने वाली है..."
    उसने आतुरता से पूछा, "क्या हुआ... क्या कहा बाबा ने ?"
   "क्या कहा ? अरे वो यूं मान गए...", मैंने उसके चेहरे के आगे चुटकी बजाते हुए कहा।
    पीहू बाबा से मिलने गई और इधर मैं आंगन में रखी कुर्सी में बैठ गया। कुछ देर बाद वह वापस आई उसका चेहरा तमतमाया हुआ था, "आप जरा इधर आइए..."
     मैं उसका अनुकरण करते हुए कच्चे घर की तरफ आ गया। अकेले पाते ही उसने मेरी क्लास ली, "अपने बाबा से झूठ क्यों बोला..."
   मैंने आश्चर्य से कहा, "झूठ बोला ? नहीं तो, मैंने बाबा से तो कुछ झूठ नहीं बोला..."
    "मेरी और आपकी शर्त कब लगी थी...? चलिए यदि झूठ बोल ही दिया था, तो कम से कम मुझे बता ही देते... मैं किसी न किसी तरह से बात को संभाल लेती..."
   "ओह नो !! मुझे इतनी बड़ी मिस्टेक कैसे हो गई...?", मैं अपना सर पकड़ पछताते हुए बोला।
   "नहीं, जनाब को तो बहुत जल्दी थी मुझे भेजने की... बाबा कन्वेंस हो गए तो खुशी से पागल हो गए... होश तो रहा नहीं होगा...?"
   "सॉरी पीहू !! अब और जली-कटी मत सुनाइए... कहा न शर्मिंदा हूँ। तो अब... प्रोग्राम कैंसिल...?"
   "तो आपको क्या लगता है...? वैसे भी बाबा को झूठ से सख्त नफरत है...?", उसने कुछ गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए कहा। 
   "जी...तो ठीक है... मैं वापस बाबा के पास जाता हूँ, उनसे माफी मांगते हुए वहीं से बगिया निकल जाऊंगा... मंगल आएगा तो आप उसे बैग दे दजिएगा... झूठा साबित हो चुका हूँ न तो अब शायद ही लौट कर आऊं... और वैसे भी अब बाबा थोड़े न घुसने देंगे घर में... दो दिन वहीं मंगल के पास गुजार लूंगा... 
   "अच्छा ! तो आप जिंदगी गुजारेंगे... तो जायेगा कौन ? क्या कहा था आपने... हां...", फिर वह मेरी नकल करते हुए बोली, "पीहू जी, जिंदगी जीने के लिए होती है, गुजारने के लिए नहीं... उसमें तो समुंदर से उठती, गिरती, लहराती आपकी रेशमी जुल्फों की लहरों की तरह रवानी होनी चाहिए..."
   "जी याद है, अब क्या किया जा सकता है, सब गड़बड़ हो गई न...", मैं अफसोस जाहिर करते हुए बोला, "आपकी और सत्य की भी बाबा की नजरों में बहुत बेइज्जती हुई... बाबा भी क्या सोचे होगे... कि मुझ जैसे झूठे इंसान से आप लोगों ने दोस्ती की... सत्य को भी सॉरी कहना होगा, कह दूगा। आपको भी फिर से सॉरी कहता हूँ जी... चलता हूँ... नमस्ते...", मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए।
  उसने भी धीरे से कहा, "जी नमस्ते... हमें भी माफ कर दीजिएगा जी..."
   मैं जाने के लिए पलटा, एक कदम आगे बढ़ा भी कि तभी उसने पीछे से मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, "पूछेंगे नहीं जी कि हमने आपसे माफी क्यों मांगी..."
    यह पहली बार था कि उसने इतने अधिकार से मेरा हाथ पकड़ते हुए मुझे रोका और कुछ कहा था। मैं रुका और उसकी तरफ पलटा। उसने अभी भी मेरा हाथ पकड़ रखा था। मैं सावलिया निगाह से उसकी की तरफ देखते हुए खामोश खड़ा रहा। उसके चेहरे की गंभीरता ने पहले मुस्कुराहट का रूप धारण किया फिर एक वह एक दिलकश हंसी में तब्दील हो गई। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, लिहाजा आंखों में कुछ विस्मय लिए उसे एकटक देखते हुए उसी तरह खड़ा रहा। 
     कुछ देर हंस लेने के बाद उसने मुझे कुछ चिढ़ाते हुए कहा, "वाह क्या शक्ल बनाई है... पीहू जी मैं चलता हूँ ... सॉरी... नमस्ते... पक्के कहानीबाज हैं आप... इस तरह से दुखी मत होइए बाबा ने इजाजत दे दी है... एक्चुअली यू डन वेरी वेल..."
   मेरे चेहरे में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई मैं कुछ बोलने को हुआ कि उससे पहले उसने मुझे रोकते हुए कहा, "नहीं अभी कुछ मत पूछिए... आप अटारी में वापस जाइए, चित्रलेखा पढ़िए, मुझे कुछ काम फटाफट निपटाने हैं..."
    मैं मन में कुछ सवाल लिए अटारी में वापस आ गया। चित्रलेखा उठाई और उसी में डूब गया। लगभग आधे-पौन घंटे के बाद वह वापस आई। न्यूजपेपर को मेरे बैग में रखते हुए बोली, "चलिए, अब चलते हैं... रास्ते में बात होगी...
     उसने पीछे के दरवाजा अच्छे से बंद किया बेडरूम की कुंडी बाहर से लगाई। फिर हम दोनों बाबा के नजदीक से गुजरते हुए बगिया की पगडंडी पर आ गए। बाबा ने एक बार फिर से हम लोगों को सुरक्षित और सावधान रहने की चेतावनी दी। मैंने चलते हुए पीहू से पूछा, "बाबा ने आपसे क्या कहा...?"
    वह सोचने का अभिनय करते हुए बोली, "एडवांस में बाबा के शाम की पूजा की तैयारी कर दी...बाबा के लिए फटाफट डिनर तैयार किया... बाबा से कहा कि जब सत्य आ जाए तो बाइक से वही भेज दें... फिर वह 8 बजे आएगा और डिनर गर्म करके बाबा को खिलाएगा.. बाबा ने कहा कि पीहू तुम अपना ध्यान रखना... रात के समय किसी भी हालत में कोई भी खेत से घर तक पैदल नहीं आएगा। आना हो तो बाइक से या तो फिर वही रुकेगा। सत्य पीछे के दरवाजे में बहार से ताला लगा के जाएगा और लौटने पर वही से घर के अंदर आयेगा और अपने आने और जाने की सूचना तुरंत उन्हें देगा..."
   "क्यों क्या आप न लौटेगी ? नहीं, मेरे पूछने का अर्थ यह है कि अभी आपने कहा कि सत्य पीछे के दरवाजे से अंदर आएगा तो फिर आप कहां...?", जवाब के लिए मेरी नज़रें उसके चेहरे पर टिकी हुई थी। 
   "मैं वही बगिया में रुकूंगी, कल सुबह आऊगी... क्यों नहीं रुक सकती ?", उसने आश्चर्य जताते हुए पूछा।
   मैंने शिष्टता से जवाब दिया, "क्यों नहीं रुक सकती... आपकी बगिया है। और फिर मंगल हैं, कमली भी तो है... तो क्यों नहीं... बिल्कुल रुक सकती हैं..."
   "अच्छा यदि ये न हो तो मैं नहीं रुक सकती...?", उसकी आंखों में एक प्रश्न झलक रहा था। मैं समझ रहा था कि वह वास्तव में क्या पूछना चाहती है। मैंने बात की दिशा बदल दी, "एक और दिक्कत है न, चारपाई तो एक ही है...?"
   "तो इससे क्या...", वह मेरी खिंचाई करने के फुल मूड में थी।
   मैंने बात को हंसी में तब्दील करते हुए कहा, "जी वो क्या है फिर मैं कहां जाऊंगा... जी छोड़िए, एक रास्ता हैं... झोपड़ी के अंदर एक बड़ी-सी पटिया है, मैं उसी में लेट जाऊंगा... मंगल भी वहीं कहीं एडजस्ट हो जाएगा... सो नो प्रॉब्लम..."
   "हां सही कहा आपने... प्रॉब्लम तो तब हो जाएगी जब हम और आप एक ही चारपाई पर एक साथ लेट जाए... है न..."
    "जी...", मेरे मुख से अचानक निकल गया था, जिसे मैंने जल्दी से सुधारते हुए कहा, "नहीं... इसमें गलत क्या है... वैसे भी आप सत्य के साथ तो एक ही बेडरूम शेयर करती है न...", बस यहीं मुझसे गलती हो गई। इस बात के कितने अर्थ निकल सकते हैं, कहते समय मैं नहीं सोच पाया और जब बात मुख से निकल गई तो समझ में आया की कितनी बड़ी बात कह दी मैने।
     उसने अविश्वास से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "तो दिल की बात जुबां पर आ ही गई, है न ? तो आप कहना क्या चाहते हैं यह भी बता दीजिए..."
   "सॉरी मेरा मतलब वह नहीं है जो आप समझ रही हैं... और ना ही मैं आपको जज करने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि..."
   उसने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा, "यदि मैं सत्य के साथ एक ही बेडरूम शेयर करती हूँ तो मैं चरित्रहीन हूँ, क्योंकि अभी बाबा ने तो सिर्फ इंगेजमेंट की है। उसके साथ शादी तो हुई नहीं... तो फिर मैं किसी के साथ भी सो सकती हूँ,.."
   उसकी बात मेरे लिए असहनीय थी। मैं तेज से बोला, "प्लीज स्टॉप... यू हर्ट मी... बल्कि आप मेरा अपमान कर रही हैं..."
   "हां और आप मुझे फूलों की माला पहना रहे हैं...", उसके स्वर में शांतिपूर्ण व्यंगय था।
    "सॉरी पीहू ! मैं अपनी गलती मान रहा हूँ, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। क्योंकि इस बात के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं, और पहला अर्थ वही निकलता है जो आप कह रही हैं। मैं आपके चरित्र या किसी के प्रति फिजिकल होने की बात ही नहीं कर रहा हूँ। किसी के साथ एक ही बेडरूम या बिस्तर शेयर कर लेने का एकमात्र अर्थ यह कभी नहीं निकलता कि आप उसके साथ फिजिकली इंवॉल्व हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं निकलता कि आप नहीं हो सकते। यह तो सामने वाले के विश्वास की बात है। जिस सत्य और असत्य, पाप और पुण्य का निर्धारण हमारि अंतर्मन करती है, वही हमारे लिए सही है। ना तो मैं वह राम हूँ जो लोकलाज के डर से किसी सीता की अग्नि परीक्षा लूं और ना ही मैं वह धोबी हूँ जो किसी सीता के चरित्र पर संदेह करू। इसलिए मैं कहता हूं कि यदि आपकी अंतर्रात्मा को  किसी के साथ फिजिकल होने में कोई आपत्ति नहीं तो वही आपके लिए सही है, लेकिन यदि आपत्ति है और उसके बाद भी आप फिजिकल होते हैं तो फिर यह गलत है ? अपने आचरण को मर्यादित रखने के लिए कुछ लोगों ने कुछ नियम बनाए जिसका पालन कर राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम बन गए लेकिन किसी के प्रति अन्याय तो हआ ? और विडंबना की बात यह है कि इस अन्याय को छुपाने के लिए, उस पर पर्दा डालने के लिए कहानियां बनाई गई। मसलन सीता तो आग में निवासरत थीं और राम उन्हें वापस लाना चाहते थे। सीता प्रेग्नेंट थी और वह चाहते थे कि उनके बच्चों का जन्म जंगल की कठिन परिस्थितियों में हो और वह शक्तिशाली बने... बड़े-बड़े ऋषि मुनियों से शास्त्र और शस्त्र विद्या सीखे... इसलिए सीता का त्याग किया। उनके उदाहरण देकर समाज में वे व्यभिचार उत्पन्न न हो इसलिए सीता को वनवास दिया...और देखिए आज का कानून क्या कहता है, सौ अपराधी छूट जाए तो कोई बात नहीं लेकिन किसी एक निराप्रद को सजा नहीं होनी चाहिए...."
   अभी मेरी बात समाप्त भी नहीं हुई थी कि उसने बीच में रोकते हुए कहा, "उफ़ ! बस कीजिए... मैं समझ गई..."
    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "क्यों बोर हो गईं क्या...?"
   "नहीं सच पूछिए तो अच्छा लगा। बहुत स्पष्टवादी हैं आप। इतनी कम उम्र में इतनी गहरी सोच और इतना नॉलेज है आपको... सोचकर मैं हैरान हूँ..."
   "यही बात तो मैं आपके लिए भी कह सकता हूँ... अच्छा ये बताइए आपने मुझे हर्ट किया तो क्या सॉरी भी नहीं कहेंगी...?"
   उसने मुस्कुरा कर देखते हुए पूछा, "क्या सचमुच आप हार्ट हुए... क्या मैं जान सकती हूं क्यों ?"
    "हां क्यों नहीं, वह इसलिए कि आपने इनडायरेक्टली खुद को चरित्रहीन कहा...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया। 
   "चरित्र मेरा और यदि मैंने खुद को चरित्रहीन कहा या समझा तो इससे आपको क्या फर्क पड़ता है...?"
   "पड़ता है न, इसलिए दुख हुआ... मेरी गर्लफ्रेंड को कोई चरित्रहीन कहे यह मुझे बर्दाश्त नहीं..."
   "चाहे वह आपकी गर्लफ्रेंड ही क्यों न हो ?"
   "हां, उसे भी यह अधिकार नहीं है... जब मैं उसे नहीं समझता हूँ, तो वह खुद को समझने वाली कौन होती है... सो यू मस्ट बी सॉरी..."
   "किससे ? गर्लफ्रेंड से या उसके बॉयफ्रेंड से....?"
   "पहले गर्लफ्रेंड से, उसके बाद उसके बॉयफ्रेंड से भी..."
   "अच्छा मैं उसके बॉयफ्रेंड से सॉरी बोल देती हूँ, वह अपनी गर्लफ्रेंड को मेरी तरफ से बोल देगा, तो बॉयफ्रेंड सॉरी..."
   "इट्स ओके...", फिर दूसरे ही पल मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, "गर्लफ्रेंड ! पीहू तुमसे सॉरी कह रही है, उसे माफ कर दो.."
   अपना हाथ छुड़ा वह हंसते हुए बोली, "आप भी हद करते हैं, पीहू और गर्लफ्रेंड को अलग-अलग बना दिया...? तो फिर इस वक्त में कौन हूँ ? पीहू या आपकी गर्लफ्रेंड..? एक मिनट.. एक मिनट... मेरे दो नाम और भी हैं। एक स्कूल का, दूसरा कुंडली का... तो आप डिसाइड कर लीजिएगा कि आपकी गर्लफ्रेंड का नाम क्या है, ठीक ?"
   "ठीक है, बताइए नाम...?"
   "कुंडली का नाम देवप्रिया है और स्कूल का शचि... एक्चुअली कुंडली का नाम बाबा ने रखा... बॉम्बे के लिहाज से थोड़ा सा ओल्ड था... तो पापा ने सेम मीनिंग का दूसरा नाम स्कूल में लिखा दिया..."
   "अच्छा शचि तो देवराज इंद्र की पत्नी का नाम है न ? तो क्या देवप्रिया का मीनिंग भी वही है..?"
   "एक्जेक्टली तो नहीं... पर हां कह सकते हैं, अब आप बताइए कि अपनी गर्लफ्रेंड का नाम क्या रखना चाहेंगे..."
   मैंने हंसते हुए कहा, "तो फिर पीहू ठीक है... देवप्रिया कुंडली में ही अच्छा..."
   "लेकिन शचि क्यों नहीं...", उसने जिज्ञासा से पूछा। 
   "कहते हैं यदि किसी भी दो लोगों का नाम वर्णमाला के एक ही अक्षर से हो तो उनके बीच झगड़े बहुत होते हैं..."
    "अच्छा !! तो फिर सत्य का नाम भी तो एस से शुरू होता है..."
   शायद आपने ध्यान नहीं दिया है मैंने अल्फाबेट नहीं वर्णमाला कहां है श और स में अंतर होता है..."
   "ओह ! तो फिर ?"
   "फिर क्या... अब शचि और देवप्रिया दोनों ही मेरी गर्लफ्रेंड पीहू से सॉरी कहेंगी..."
   मेरी इस बात पर वह जोर से हंस पड़ी और उसके पीछे मैं भी। 
   "आप दिलचस्प इंसान है...", उसने हंसते हुए कहा। 
   "अंत में यह भी जोड़ देती... पहले क्यों न मिले...", मैंने भी हंसते हुए कहा।
   उसकी हंसी थम गई। मेरी तरफ देखते हुए उसने कहा, "हो सकता है, एकदिन यह भी कहूँ... या फिर कहने के लिए मजबूर हो जाऊं..."
    "मतलब ....?", मैंने भी संजीदगी से पूछा।
    "कुछ नहीं... आप आगे कहिए"
   "पीहू जी आप गोल-गोल घूमती हैं..."
   "नहीं घुमा रही गोल-गोल, सच में अब आप आगे कहिए..."
    "अरे आपने तो बताया ही नहीं कि शर्त वाली बात आपको बाबा से कैसे मालूम पड़ी..."
    "बताऊंगी, लेकिन पहले आप विस्तार से बताइए कि आपकी उनसे क्या बात हुई....?"
   "अच्छी बात है, चलिए मैं ही बता देता हूँ....", फिर मैं विस्तार से उसे सारी बातें बताई जहां हमें हंसना चाहिए हम हंसे। लेकिन जब मैंने उसे यह बताया कि अंत में बाबा ने मुझे क्या कहा तो उसके चेहरे की हंसी गायब हो गई। उसने मेरी तरफ देखते हुए मुझ से ही पूछा, "बाबा ने ऐसा क्यों कहा होगा..."
    "अब बाबा की तो बाबा ही जाने लेकिन इसमें बुरा क्या है ? आखिर उन्होंने आप की अच्छाई और खुशी के लिए ही तो कहा है, यदि आज न भी कहते तो भी मैं उनकी बात मानता...", मैंने उसे समझाते हुए कहा।
    वह अपनी बेचैनी जाहिर करते हुए बोली, "लेकिन पता नहीं क्यों मुझे अजीब सा लग रहा है..."
   "अब छोड़िए पीहू... आप भी बेवजह परेशान हो रही है... यह बताइए कि फिर आपको बुला के बाबा ने क्या कहा...?"
    वह थोड़ा सा मुस्कुराते हुए बोली, "वही सब जो आपने अभी बताया... शर्त का जिक्र भी किया.. फिर पूछा,. क्या तुम्हें हारने पर खुशी होगी ? मैं कुछ बोली नहीं, सर झुकाए चुपचाप खड़ी रही... जैसा की बचपन में किया करती थी... तो फिर वो खुद ही बोले, अब तुम बड़ी हो गई हो समझदार हो... यदि मन में कोई इच्छा हो तो कह दिया करो... अच्छा है... मेरी तरफ से इजाजत है..."
    फिर वही सब कहां, मंगल है, कमली है, सत्य है सभी हैं तो डरने की कोई जरूरत हैं नहीं। खासकर आपका ध्यान रखने के लिए कहा है की नई जगह है, अनजान है, उसका ध्यान रखना। उसे समझा देना कि बगिया से बाहर रात को न जाए, चुड़ैल भटकती है..."
   "क्या !!!", उसकी बात सुन कर मैं चौंकते हुए बोला, "सच में...?"
   "हां सच में... बाबा ने बताया है तो झूठ तो होगा नहीं... वो इतने सालों से यहां हैं, उन्होंने कभी न कभी तो देखा ही होगा..."
   "अच्छा !! तो फिर मंगल और कमली में भी देखा होगा उन्हीं से पूछूंगा... लेकिन कल रात जब मैं घर से भागा था तो मुझे कहीं नहीं दिखी...?"
   वह शरारत से मुस्कुराते हुए बोली, "क्या पता देखा हो या ना देखा हो पर आप रात को बगिया से बाहर मत जाना... कल नहीं दिखाई तो इत्तेफाक हो सकता है, और जरूरी नहीं कि यह इत्तेफाक बार-बार हो..."
    उसकी मुस्कुराहट देखकर मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, "मैं समझ गया, आप फिर गोल-गोल घूम रही हैं...?"
   "न, नहीं घूम रही गोल-गोल...", उसने दूसरी तरफ मुंह करके हंसते हुए कहा।
    "ठीक है, आपने कहा मैने मान लिया। अच्छा ये बताइए आसपास के खेत आपके हैं...?", मैने पूछा।
    "मोस्टली... घर के और बगिया के आसपास के सभी हमारे ही हैं... और उधर दक्षिण की तरफ के कुछ खेत दूसरों के भी हैं..."
     "अच्छा ! और एक कच्चा रास्ता जो बगिया से घूम के उत्तर की तरफ जाता है...?"
    "वो रास्ता उसी आदिवासी बस्ती और नदी की तरफ जाता है... यहां से लगभग तीन किलोमीटर दूर है... बीच में एक किलोमीटर का रास्ता जंगल से हो कर जाता है... मौका मिला तो कभी चलेंगे...", उसने मेरी तरफ देखते हुए बताया।
   "हां जरूर... मुझे आपकी बगिया बहुत अच्छी लगी... इतनी बड़ी और व्यवस्थित बगिया मैने पहली बार देखी... लगता है मंगल काफी मेहनत करता है..."
   "हां वो तो है... बारह महीने हर तरह की सब्जियां उगाता है... उन्हें बेचता भी है... हिसाब किताब का भी पक्का है... बाबा उस पर बहुत विश्वास भी करते हैं... वह भी बाबा का सम्मान करता है... उसकी वाइफ कमली से मिले...?"
    "नहीं मिला नहीं... बस दूर से देखा है..."
    "चलिए आज मैं मिलवाऊंगी... वह भी बहुत अच्छी स्वभाव की है...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
    "जब आप खुद इतनी अच्छी हैं तो जाहिर है आपके साथ भी अच्छे लोग ही होंगे...", मैने भी मुस्कुराते हुए कहा।
    "आप फ्लर्ट कर रहे हैं...?"
    "नहीं आप लोगों की सच्ची तारीफ कर रहा हूँ..."
    "अच्छा ! तो फिर ठीक है... वैसे यह कोई जरूरी नहीं... जानते हैं कभी-कभी हम भूल कर जाते हैं..."
   "भूल ! कैसी भूल...?", मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
     "यदि हम अच्छे हैं, सरल स्वभाव के हैं, तो सामने वाले को भी वैसा ही समझने की भूल..."
   उसकी इस बात पर मैं हंसा था, "ओह ! तो आपके कहने का अर्थ यह है कि यदि मैं अच्छा और सरल स्वभाव का हूँ, तो यह जरूरी नहीं कि आप भी हो...?"
    प्रतिउत्तर में उसने भी हंसते हुए कहा, "इसका ऑपोज़िट भी तो हो सकता है..."
    "हां वो तो है, क्यों नहीं हो सकता, बिल्कुल हो सकता है...", मैने भी हंसते हुए कहा। 
    इस बार उसने संजीदगी की से पूछा, "एक बात बताइए... आपने अटारी में कहा था कि आप शराब या सिगरेट के आदी नहीं है... यह केवल एक हफ्ते से पी रहे हैं... क्यों ?"
   "क्यों का क्या मतलब...?", मैंने पूछा।
   "मेरा मतलब जब ये आदत नहीं थी तो फिर ये बुरी आदत लगा क्यों रहे हैं...?",  इस बार उसने स्पष्ट रूप से जानना चाहा था।
    मैं चुप हो गया, क्या जवाब दूं। उसने फिर कुरेदा, "बताइए ?"
   तब तक मैं कहानी बन चुका था, "क्या है दस-बारह दिनों के लिए घूमने-फिरने निकला हूँ, तो बस लाइफ इंजॉय कर रहा हूँ..."
   "लाइफ इंजॉय करने के लिए क्या जरूरी है कि हाथों में भरा हुआ जाम हो, होठों में जलती हुई सिगरेट हो...?", उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
   मैंने कुछ लापरवाही से जवाब दिया, "पता नहीं, पर जब बात आपने शुरू की है तो बता दीजिए की क्या जरूरी होता है...?"
   "हाथों में पोएट्री बुक होनी चाहिए और गर्लफ्रेंड का साथ होना चाहिए... और हां यदि नशे की रूमानियत चाहिए तो अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ही बस थोड़ी-सी पीनी चाहिए..."
   "अरे पीहू जी, यदि गर्लफ्रेंड साथ में हो और खास कर उसकी आंखें आप जैसी खूबसूरत हों, आप जैसी पढी-लिखी, समझदार और जहीन हो, तो फिर छलकते पैमानों की जरूरत क्या...? तब हाथों में पोएट्री बुक की भी जरूरत नहीं, बस कलम होनी चाहिए। कविताएं तो खुद व खुद लिख जाएंगी... है न ?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए कुछ रोमांटिक अंदाज में कहा।
   "वाह ! क्या बात है... तो फिर हो जाए कुछ ?  मौसम भी है, दस्तूर भी, और साथ में गर्लफ्रेंड भी...", उसने मुझसे अधिक रोमांटिक होते हुए फरमाइश की।   मैंने बात को टालने के उद्देश्य कहा, "इन चलती रहों में...? चलिए बगिया में पहुंचकर फिर कुछ सोचेंगे..."
   "चलती हुई राहों में जिंदगी जीने का मजा ही कुछ और होता है... आप ही ने तो कहां है कि जिंदगी को गुजरा नहीं जीना चाहिए..."
    "बेशक ! तो फिर सुनिए, कुछ शब्दों की माला पिरोने की कोशिश कर रहा हूँ... वास्तव में यह कोई कविता नहीं अपनी गर्लफ्रेंड से कुछ सवाल हैं..."
   "यानी मुझसे... वॉव क्या बात है... तो फिर पूछिए...", उसने कुछ खुश होते हुए कहा। 
    "चलिए वहां बैठते हैं... मैं चलते-चलते कुछ थक गया हूं....", मैंने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा।
   "जी जरूर... आइए...", उसने पेड़ की तरफ बढ़ते हुए कहा। 
    पेड़ चलती राहों के नजदीक ही था। दूसरे ही पल हम उसके नीचे बैठे थे, "पीहू ! यह किसका पेड़ है ?"
    उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्या आपको न मालूम..?"
   "न... तभी तो पूछ रहा हूँ...?"
   "महुआ का... अरे इसी से तो शराब बनती हैं...?"
   "अच्छा मैं तो समझा था कि वाइन फ्रूट से बनती है..."
    "हां सही सुना आपने... महुआ से देसी शराब बनती है, और वाइन फ्रूट और ग्रेन से... एक हफ्ते से लगातार पी रहे हैं और यह भी न पता...?"
   "चलो छड़ो भी... जिससे भी बनती हो बनती रहे, हमें तो पीने से मतलब..."
    "हां सही है... अब पूछिए सवाल ..?", उसकी आंखों में उत्सुकता साफ झलक रही थी। 

   तेरी राहों का हमसफर नहीं हूँ मैं, 
   पर क्यूं तेरे साथ चलना चाहता हूँ।
   तेरे नैनों में सजी तस्वीर नहीं मैं,
   पर क्यूं इसमें बसना चाहता हूँ।
   तेरे दिल की धड़कन भी नहीं मैं,
   पर क्यूं तेरा दिल बन धड़कना चाहता हूँ।
   तेरे लबों की लजराती मुस्कान नहीं मैं,
   पर क्यूं तेरी हर खुशी बनना चाहता हूँ।

तेरे होने पर खुद के होने का गुमान होता है, 
तुझी में खोकर खुद को पाना चाहता हूँ  मैं।
अब कोई हसरत नहीं जिंदगी में तेरे सिवा, 
तेरी चाहत के दरिया में डूबना चाहता हूँ मैं।
भागते-भागते थक-सा गया जिंदगी से,
ठहर कुछ पल तेरे पास जीना चाहता हूँ मैं।

   मैं यह कविता पढ़ रहा था और सच पूछो तो जो दिल में आ रहा था कहता जा रहा था। मेरी निगाहें दूर क्षितिज पर टिकी हुई थी। लेकिन मैंने महसूस किया कि जैसे दो नजरे, दो निगाहें, दो खूबसूरत-सी आंखें बराबर मेरे चेहरे पर टिकी हुई मुझे देखे जा रही हैं। उसने मेरा हाथ धीरे से पकड़ते हुए कहा, "यह प्रश्न तो बॉयफ्रेंड को खुद अपने आप से पूछना चाहिए... लेकिन अंतिम लाइन पर मुझे ऐतराज है... कभी आपने सोचा है... उन प्रवासी परिंदों के बारे में जो दूर देश या प्रांत से आते है... उनमें से कुछ जोड़े होते हैं, तो कुछ अकेले आते हैं... और यहां आकर अपनी जोड़ियां बनाते हैं... उनके साथ जिंदगी जीते हैं... और फिर एक दिन उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं... पीछे जो यहां रह जाते हैं, उन्हें पुकारते हैं, अपनी सदाओं में याद करते हैं... रोते हैं, तड़फते हैं... फिर एक दिन उनके आंसू सूख जाते हैं... सदाएं खत्म हो जाती हैं। उनकी पुकार उनके दिलों में घुट के रह जाती हैं और इंतजार इतना लंबा होता है कि उसी इंतजार में एक दिन मर जाते हैं..."
     मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा, उसकी तरफ नहीं बल्कि सिर्फ उसकी आंखों में देखा, एक अजीब-सी बेचैनी एक अजीब-सा दर्द नजर आया, "पीहू ... ये क्या... ?"
    उसने अपने आप को संभालते हुए कहा, "कुछ नहीं दोस्त ! जो दिल में आया, जो लगा कहना चाहिए तो कह दिया... बुरा लगा हो तो सॉरी..."
   "नहीं पीहू, मुझे बुरा नहीं लगा और लगेगा क्यूं ? तुमने सच कहा... लेकिन कुछ परिंदे अपनी मर्जी से नहीं आते... उनकी किस्मत उन्हें ले आती है। एक अजनबी देश में, अजनबी लोगों के बीच और वही देश, वही अजनबी लोग एकदिन उसे अपने से लगने लगते हैं... इतने प्यारे लगने लगते हैं कि फिर उन्हें छोड़ कर जाने का दिल नहीं करता। लेकिन फिर शुरू होता है वहीं किस्मत का खेल.… और न चाहते हुए भी उन्हें एक न एकदिन जाना ही पड़ता है... लेकिन यह तो बताओ कि जो सवाल पूछे हैं उनके जवाब क्या हैं..?"
   उसके लबों में फिर से फीकी-सी मुस्कान दौड़ गई, "जवाब दे तो दिया... जवाब तो उसी के पास है न जिसने यह सवाल किया है... कभी बता सको तो मुझे भी बता देना... लेकिन क्या एक बात ध्यान दी... मैं आप से तुम हो गई..."
     "ओह सॉरी... तुम कह गया...", मैंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा। 
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "दिल से कहा न... तो फिर अफसोस कैसा... और सॉरी कैसी ? वैसे भी दोस्ती में दोस्त को आप कहना कुछ अजीब-सा नहीं लगता..."
   "तुम मुझे गोल-गोल घूमती हो...?"
   "अच्छा मैं गोल-गोल घूम रही...!! अब चलो चलते हैं...", उसने उठाते हुए कहा। 
   "वैसे पीहू एक शायरी मन में आ गई...", मैंने भी उठाते हुए कहा।
  "तो उसे मन से बाहर आने दो, इरशाद..."

   तेरी आंखों के छलकते पैमाने में नहीं, 
   मैं तेरी आंसुओं में डूबना चाहता हूँ ।
   तेरी जुल्फों में लहराती बेचैनियों को, 
   मैं अपनी बाहों में समेटना चाहता हूँ ।
   होंगे वो कोई और जो प्यार में होंगे तेरे,
   मैं तो तेरे गम में शरीक होना चाहता हूँ।
   
    "हां ये कुछ ठीक है...", उसने चलते हुए कहा।
    "अच्छा ! तो इससे पहले की फालतू थी... थैंक गॉड मैंने लिखी नहीं।... नहीं तो मिटानी पड़ती...", मैंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा।
   इस बार उसने तिरछी नजरों से मुझे देखते हुए कहा, "शायद तुम्हे मालूम नहीं मेरी मेमोरी बहुत तेज है, लिखी नहीं तो क्या हुआ... यहां लिख गई..."
   "अच्छा हुआ, दिमाग में छपी है, दिल में नहीं, नहीं तो मिटाना आसान न होता... क्यूं ?"
   "तुम दूसरों से सवाल बहुत पूछते हो, कभी कोई सवाल अपने आप से भी पूछो...", उसने कुछ इठलाते हुए कहा। 
   "न जी... दूसरों से कहां, मैं तो अपनों से पूछता हूँ... तो यह इल्जाम नामंजूर हैं मुझे..."
    "तभी तो अजनबी देश अजनबी लोग कहते हो हमें...?"
    "पीहू !! ...", मैंने उसे धीरे से पुकारा। 
     "हुं... बोलो...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
    "यदि तुम्हें यह महसूस न हो कि मैं फ्लर्ट कर रहा हूँ, तुमसे झूठ कह रहा हूँ, तो तुम्हारे इस सवाल का बहुत ही प्यारा-सा जवाब है मेरे पास...?"
    "प्यारा-सा जवाब है...!!", उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तो फिर कहो... बिना जजमेंटल हुए मैं सुनूंगी..."
    "मानता हूँ कि मैंने तुम्हें अजनबी कहा...लेकिन अजनबी बहुत प्यारे हो तुम मेरे लिए... तुम्हारा यह देश, तुम्हारे गांव की ये गलियां, तुम्हारी बगिया के आम की छांव, मीठे अमरूद का स्वाद, ये सब बहुत प्यारे लगने लगे मुझे। तुम्हारा घर, तुम्हारी अटारी, तुम्हारी ये निगाहें, तुम्हारे ये सवाल, तुम्हारी खामोशियां, समुंदर की लहराती हुई लहरों जैसे ये डार्क गोल्डन जुल्फे, तुम्हारी आंखों की ये गहराइयां, तुम्हारी कुछ नादानियां, तुम्हारी बहुत-सी समझदारियां...  तुमसे ताल्लुक रखती हर चीजों से मोहब्बत-सी होने लगी है मुझे..."
   "वाह !!! क्या कहने ... मुझसे जुड़ी हर चीजों से मोहब्बत होने लगी तुम्हें...? मैं तो यह पूछना चाहती हूँ, क्या बाबा से मोहब्बत है...?"
   "हां हैं..."
   "मंगल और कमली से...?"
   "जाहिर है, उनसे भी है..."
   "और सत्य से भी...?"
    "बेशक उससे तो ज्यादा है... आखिर वही तो लेकर आया है मुझे यहां। नहीं तो फिर सभी से कैसे मुलाकात होती... यह तो तुम्हें सबसे पहले पूछना चाहिए था...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "और मुझसे है... ?"
    "कहा तो... अजनबी बहुत प्यारे हो तुम मेरे लिए...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "अब बताओ... गोल-गोल कौन घूमता है ?", उसने सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछा। मैं खामोश हो गया। बातों की दिशा बदल दी, "ये तुमने कीट्स की पोयम व्हेन आई हैव फियर्स पढ़ी है...?"
   "नहीं... तुमने पढ़ी हो तो मुझे सुनाओ...", उसने जिज्ञासा से पूछा।
   "हां... अभी कुछ दिनों पहले एक मैगजीन में इसका हिंदी अनुवाद पढ़ा था... पूरा तो याद नहीं... कुछ लाइन्स याद हैं... वही सुनता हूँ...
     "जब मैं रात के तारों भरे चेहरे पर देखता हूँ,
      एक महान रोमांस के, 
      विशाल बादल जैसे प्रतीकों को,
      और सोचता हूँ कि मैं कभी उन्हें, 
      चित्रित नहीं कर पाऊँगा।
      किस्मत के जादू भरे हाथ से, 
      उनकी छायाओं को;
      और जब मैं महसूस करता हूँ, 
      क्षणभंगुर प्रिय,
      कि मैं तुम्हें फिर कभी नहीं देख पाऊँगा..."

   "यार तुम वो नहीं हो जैसे ऊपर से दिखते हो ! लिटरेचर से इतना इंटरेस्ट, इतना प्यार !!। तुम तो बिल्कुल डूब जाते हो... जब दिल से कुछ कहते हो, कोई पोयम सुनाते हो, तुम्हारी आवाज भी बदल-सी जाती है... तुम्हारी बाते सीधे दिल में उतरती हैं। कहां से सीखा दिल को लुभाना... कौन सिखा के फिर चला गया जिंदगी से...?", उसने प्रशंसा भरी नजरों से किंतु बेहद ही शांत मन से कहा था।
  मैंने भी उतनी शांति और सहजता से कहा, "मेरे प्रति तुम्हारा दृष्टिकोण ही मुझे विशिष्ट बनाता है, वरना ऐसी कोई बात नहीं... रही बात सिखाने की तो कोई हो तो बताएं... मै निराला जी एक कविता की कुछ  कहता हूँ... हो सकता उसी में जवाब हो...

   अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन,
   कवि का बढ़ जाता अनुराग,
   विरहाकुल कमनीय कंठ से,
   आप निकल पड़ता तब एक विहाग!...

   फिर मैने आगे कहा, "ये तुम भी सुनाओ न कुछ...?"
   "मैं...? क्या सुनाऊं... मैने तो कभी कुछ लिखा ही नहीं... पर एक पोयम स्कूल के समय पढ़ी थी, वो मुझे पसंद हैं... उसे हो सुनती हूँ...
    द वुड्स आर लवली, डार्क एंड डीप
    बट आई हैव प्रॉमिसेस टू कीप,
    एंड माइल्स टू गो बिफोर आई स्लिप
    एंड माइल्स टू गो बिफोर आई स्लिप...

      मैंने महसूस किया कि अंतिम लाइन कहते-कहते उसकी आंखें भर आई थी। एक अजीब-सा दर्द उसके चेहरे में, उसकी निगाहों में उभर आया था। प्रत्यक्षत: मैंने चौंकते हुए कहा, "अरे वाह !! यह पोयम तो हमारी भी टेक्स्ट बुक में थी... रॉबर्ट फ्रॉस्ट की है न ? आगे सुनाओ..."
   उसने मन को फिर से शांत किया और मुस्कुराते हुए कहा, "अभी नहीं... फिर कभी दूसरी सुनाऊंगी जो मुझे बहुत पसंद है..."
   "यू मीन फेवरेट...?"
   तिरछी नजर से देखते हुए उसने कहा, "हां..."
   इसी तरह बातों का सिलसिला चलता रहा और चलते रहे हम दोनों लगभग आधे घंटे बाद बगिया पहुंचे। पीहू ने मेरा बैग मंगल को देते हुए कहा, "इसे रख दो, और साइकिल सही है न तुम्हारी... ?"
     "सही है... क्यूं ?", मंगल बैग उसके हाथ से लेते हुए पूछा।
     "जो सर जी कहें, लेकर आओ ...", उसने सौ-सौ के कुछ नोट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "जल्दी जाओ फिर अभी घर भी जाना है... बाबा के पूजा पर बैठने से पहले... गाय को बांधना होगा... ये कमली कहां है...", फिर वो कमली को देख उसकी तरफ बढ़ गई।
   मैने मंगल से कहा, "देखो तो कितने है ..."
   "दस नोट है सर जी..."
   "ऐसा करना मिले तो विस्की लाना, नहीं तो वही तुम्हारी काली वाली रम... और देखो तीन ही लाना, और गांव में कोई किराना की दुकान हो तो कुछ नमकीन और एक पैकेट सिगरेट और माचिस ले लेना... और भी जो तुम ठीक समझो... अब जल्दी जाओ और आओ भी... "
     मंगल सायकल ले कर चला गया, कुछ देर बाद पीहू मेरे पास आई उसके हाथ में धुले हुए ताजे गाजर थे। मुझे देती हुई बोली, "लीजिए खाइए..."
   मै मड़ैया के अंदर गया। खाट में रखे बैग को खोला, वही पत्थर में दोनों कांच की गिलास भी रखी थीं। जैसे ही इत्मीनान से एक पैग बनाने वाला था कि वह सामने आ गई , "बस थोड़ी-सी..."
   "अरे पीना मुझे है, डिसाइड मैं करूंगा..."
   "नहीं पहला मैं ..."
   "तुम !!!..."
   "और नहीं तो क्या, आज पार्टी है... और इतने से काम न चले तो समझिए अपनी दोस्ती के नाम...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
   "तो ठीक, समझो अपनी दोस्ती के नाम..."
  "ओक... ये ! नशा तो नहीं होगा न...?", उसने मासूमियत से कुछ डरते-डरते पूछा।
   "बिल्कुल नहीं होगा, बस तुमको खुद से यही कहना है, यही एहसास दिलाना है... मैने नहीं पी..."
   "ओके .... ", 
   "क्या ...?"
   "मैने... नहीं... पी... ?"
   "हुं... ओके..."
    मै शराब कम और पानी अधिक मिलते हुए बोला, "इसे एक सांस में पीना है, मतलब बीच में रुकना नहीं है..."
   और फिर उसने एक सांस में खींच ली, "उफ़ कितनी कड़वी है... पता नहीं यार तुम पी कैसे लेते हो..."
   "कैरेट किस दिन के लिए हाथ में पकड़ रखे हैं, उसे खाओ...", मैने अपने लिए बनाते हुए कहा, "पीहू ! सत्य को तुम्हारा यूं पीना बुरा तो नहीं लगेगा...?"
   वह पत्थर में बैठते हुए बोली, "यूं.... से तुम्हारा मतलब ?"
  मैने गिलास खाली करते हुए कहा, "यूं से मतलब था बिना उससे पूछे, मेरे साथ..."
  "ओ कम ऑन... अब मुझे थोड़ी-सी और दो...", उसने अपने पास रखी गिलास मेरे सामने बढ़ा दी।
  मैने वहीं किया, शराब कम, पानी ज्यादा... और उसने फिर एक सांस में खींच ली। फिर अपने लिए एक पैग बनाया, और उसे ले कर मड़ैया के बाहर आ गया, "पीहू ! खाट बाहर निकाल लेते हैं... अभी काफी उजाला है... निकाल लोगी कि मैं कमली को आवाज दू..."
   "क्यों नहीं निकाल लूंगी...? कौन-सी मैंने पी रखी है... पी तो तुम रहे हो... चलो हटो किनारे...", उसने खाट उठाते हुए कहा।
    मैं किनारे हो गया और मन ही मन बोला, "शाबाश ! शागिर्द हो तो ऐसा !!"
   उसने खाट को निकला ही नहीं, उसके ऊपर दरी फिर चद्दर बिछाया। तकिया को सिरहाने, कंबल को पैर के पास रखा। अंत में मेरा बैग मेरे नजदीक रख दिया।
   "फिर मेरे पास सामने एक बड़े पत्थर में बैठते हुए बोली, "पार्टी में खाने की क्या व्यवस्था की जाए ... लिट्टी चोखा बनाए ... और मिक्स वेज हरी सब्जियों की... साथ में बढ़िया सलाद... सच में मजा आ जाएगा...?"
    मैने शिप लेते हुए कहा, "बिल्कुल सही है..."
    "चलो तो ठीक है मैं कमली को प्रोग्राम के बारे में सब समझा दूं ... और हरी ताजी सब्जियां तोड़ लाती हूँ... तुम आराम से बैठो... कुछ और दूं... ?"
    "हा एक जग पानी और...", मैं उसके हाथ से कैरेट छीनते हुए बोला, "और ये... तुम अपने लिए खेत से उखाड़ लेना..."
    वह एक जग पानी मुझे देकर चली गई। उसके जाने के कुछ देर बाद मंगल हांफता हुआ आया, "सर जी ज्यादा टाइम तो नहीं लगा ... बड़ी तेज साइकल चलाई ...", उसने झोला बिस्तर में रखते हुए आगे कहा, "सर जी! आप वाली नहीं मिली, वही काली वाली मिली है, तीन है, सात सौ की। सिगरेट, नमकीन और कुछ गरम मसले भी ले लिए। घर में खत्म थे।  कुल मिलाकर सात सौ अस्सी रुपए, और ये रहे बाकी के .. ", उसने बचे हुए पैसे बिस्तर में रख दिए। 
   "मंगल तुम काली वाली खोल लो... एक पैग जल्दी से लो... और पीहू की मदद करो, देखो वो सब्जी तोड़ रही हैं..."
   "अभी दूसरी क्यूं खोले सर जी ..? अभी तो कल वाली ..."
   "उसे वो दोनों पियेंगे..."
   "मतलब...?"
   "मतलब, सत्य और पीहू ..."
   "हे...", उसका मुंह फटा का फटा रह गया। 
  "हे... कहा था न कि तुम्हारा रिकॉर्ड जल्दी ही टूटने वाला है... मुबारक-ए-मंगल... तुम पीहू के सामने नहीं साथ में पीने वालो हो..."
  "हे...."
   "हे ... लेकिन किसी से कभी भी कहना मत... कसम मंगल... वो भी मां की... क्या है आज पार्टी है न। सब खाना-पीना यहीं होगा, मतलब फुल एंजॉय..."
   उसने रम का एक पैग खींचा, "राम-राम सर जी !! कभी नहीं.... ये तो कुछ मीठी-मीठी है..."
 "मीठी के चक्कर में ज्यादा न ले लेना... चढ़ती भयंकर है...", मैने उसे समझाते हुए कहा।
  "हे .."
   "हे ... ट्रिपल एक्स रम है, वो भी मिलिट्री वाली... अब जाओ..."
   "वह गया और जल्दी ही वापस आ गया, मैने पूछा, "क्या हुआ...?"
   "पीहू बिटिया ने घर जाने के लिए कहा है, गाय, बछड़ों की व्यवस्था करनी है... फिर जब भैया जी आ जाएं तो उनके के साथ ही आना है... सर जी अब मैं घंटे भर के लिए बुक... "
    "अच्छी बात है... पीहू ठीक ही तो कह रही है... तुम ऐसा करो पहले प्लेट में नमकीन निकाल लो, उसे खाओ फिर एक लार्ज खींचो और साइकिल से ही घर जाओ... लेकिन ध्यान रखना बाबा से दो नहीं पांच से दस कदम दूर..."
    मंगल ने वैसा ही किया। उसके जाने के कुछ देर बाद पीहू एक टोकरी में धुली हुई सब्जी, एक खाली टोकरी और दो चाकू ले कर आई और सामने पत्थर में बैठते हुए कहा, "लो अब कटवाओ साथ में, कमली चोखे के लिए इंतजाम कर रही है..."
    अब हम दोनों सब्जी काट रहे थे। मैने उससे पूछा, "जब चोखा बन रहा है तो मिक्स वेज की जरूरत क्या ? ..."
   "वो क्या है... देखो तुम हंसोगे तो नही...?"
   "बिल्कुल नहीं... तुम कहो तो ?"
   "मुझे सत्य के हाथ की बनी सब्जी खानी है .."
   "ओ .. हो...", मैने उसे छेड़ा।
   "वो क्या है कि वह मिक्सवेज अच्छी बनाता है...", उसने सत्य की तारीफ करते हुए कहा।
   "क्यों न बनाए... तुमने ट्रेंड जो कर दिया होगा...? रिश्ता भी तो है, पहले अजनबी का, फिर दोस्ती का, और अब...", मैने बात अधूरी छोड़ दी।
   "हां अब... ?", उसने मेरी तरफ उत्सुकता से देखते हुए पूछा।
  उसकी अधूरी बात को मैंने पूरा किया, "अब ? शायद इस जीवन से उस जीवन तक का..."
    "अब मैं क्या जानू क्या है... कभी बाबा से कहूँगी.. या हो सकता है एकदिन वो खुद ही समझ जाएं...", उसकी चेहरे में कुछ अजीब से भाव थे।
   "पीहू ! तुम्हे लग रही... अब मत पीना... देखो तुम कैसी गोल-गोल बातें कर रही हो...", मैंने उसे समझाते हुए कहा।
   "नहीं यार ! मुझे नहीं लगता... महसूस कर रही हूँ जैसी मैं अब होश में आई हूँ... ये बाबा ने मुझसे कुछ पूछा क्यों नहीं... तुम बताओ कोई भला ऐसे करता...", अंतिम के शब्द कहते-कहते उसकी आंखों में सितारे झिलमिला उठे।
   मैं इस पीहू को देख कर कुछ कुछ हैरान था। मैं जानता हूँ कि पीहू ने कुछ शराब पी जरूर है, लेकिन वह पूरे सेंस में है। उसकी अधूरी बात और छलक आए आंसुओं को देखकर मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका था कि इंगेजमेंट से पहले बाबा का पीहू से कोई कंसल्ट न करना उसे आज भी चुभ रहा है। लेकिन वह तो सत्य को पसंद करती है, शायद उससे प्रेम भी करती है, और इस हद तक कि वह उसके साथ एक ही बैडरूम में एक ही बेड शेयर कर सकती है, तो फिर यह सब बातें पीछे रह जाती हैं। अब इसका क्या दुःख। हो न हो बाबा का न पूछना उसे इसलिए बुरा लगा लग रहा है कि यह एक नारी के सम्मान का प्रश्न था, उसकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण फैसला उसकी मर्जी जाने बगैर नहीं किया जाना चाहिए था। अरे इतना तो अरेंज मैरेज में भी किया जाता है। फोटो दिखा कर ही सही, कम से कम पूछा तो जाता है। जरूर यही बात होगी। 
     मैंने उसे समझाते हुए कहां, "इट्स ओके यार, आखिर हुआ तो वहीं न जो तुम लोग चाहते थे। इसमें बुरा क्या हुआ ? आखिर वे तुम्हारे बाबा हैं, हो सकता है तुम दोनों के मन की बात उन्होंने पहले ही भांप ली हो... इसलिए पूछना जरुरी नहीं समझा... ? अब चलो पोंछ लो आंसू... दोस्त आपने इमोशन पर भी कंट्रोल रखना चाहिए..."
  मेरी बात पूरी होने से पहले उसने कहा, "दोस्त नहीं... गर्लफ्रेंड... अब एक बनाओ मेरे लिए..."
  "ये पीहू ! तुम पहली बार पी रही हो, अधिक तो नहीं होगी..."
   "अधिक !! अरे अभी मैने पी ही कहा है ..!!"
    "अरे हां, मै तो भूल गया था... लेकिन पहले तुम कुछ नमकीन खाओ... तब तक मैं बनाता हूँ..."
   वह प्लेट से नमकीन उठा कर खाने लगी। मै जनता था कि उसे कैसे ट्रीट करना है। मैने शराब कम और पानी ज्यादा मिलाया और उसे पकड़ा दिया, "सत्य को तुम सम्हाल लेना, मैं नहीं चाहूंगा कि नव-विवाहित जोड़े के विवाह-विच्छेद का का कारण मैं बनू ? ..."
   " ये क्या बोल गए जल्द-जल्दी..."
   "डाइवोर्स ... तलाक...", मैने उसे डराते हुए कहा।
   "अरे बाप रे !... यार पहले किसी से शादी तो हो जाने दो...", 
    "किसी से... मतलब नहीं समझा ?", मैंने आश्चर्य से पूछा।
    उसने मेरी दोनों आंखों को अपनी दोनों उंगलियों से प्वाइंट करते हुए कहा, "मतलब कैसे समझोगे बॉयफ्रेंड, स्टेट फॉरवार्ड देखना सीखो वो भी नजरों में। सिर्फ झूठ बोलने के लिए नजर से नजर मिलते हो ? अरे ! कभी सच जानने के लिए भी नजर मिला लिया करो ? खुद ही गोल-गोल घूमते रहते हो और इल्जाम मुझ पर लगाते हो... हु ?"
    मैं कुछ बोला नहीं बल्कि उसे चुपचाप सुनता रहा। उसने एक शिप लेते हुए आगे कहा, "बाबा तो हाथ की लकीरें पढ़ते हैं, माथा पढ़ते हैं, लोगों की कुंडली बनाते हैं, तब भी पूरा सच नहीं जान पाते। और तुम हो कि किसी की आंखों में किसी को भी देख लेते हो ? वंडरफुल !! यार तुम तो मेरे बाबा से भी बड़े ज्योतिषाचार्य हो... तुम्हें तो सम्मानित करना चाहिए... है न ? अच्छा बताओ मेरी आंखों में क्या दिखता है ? हां देखो मेरी आंखों में, क्या अभी भी सत्य दिखता है...?"
    लेकिन मैंने उसकी आंखों में नहीं देखा बल्कि आम के पेड़ की तरफ देखता रहा। कुछ देर बाद मैंने लापरवाही से कहा, "मुझे पता नहीं... लेकिन यह सवाल मुझसे क्यों ?"
     वह हंसते हुए बोली, "तुम पागल हो, बेवकूफ हो, ना समझ हो। अटारी में तो तुम दिखाई देते थे, अब क्या हुआ...? कितने कंट्रोवर्शियल हो तुम, बिल्कुल कन्फ्यूज्ड ? कभी सत्य को देखते हो तो कभी खुद को, ऐसा भी होता है क्या ? ये उधर क्या देखते हो, मेरे सवालों के जवाब दो ?", उसने अपनी हथेली से मेरा चेहरा अपनी तरफ घुमाते हुए कहा, "हां ऐसे, मेरी आंखों में आंखें डाल कर बात करो मुझसे... शरमाओ मत... क्या तुम्हें मेरी आंखे सुंदर न दिखाई देती..?"
    मैने मुस्कुराते हुए कहा, "हैं न... बहुत सुंदर है..."
   "ये हुई न बात...", वह खुश होते हुए बोली, "आओ चलो चलते हैं... आम के पेड़ तक वॉक करके आते हैं..."
   "चलो, लेकिन पहले इसे खत्म तो करो...", मैं खाट से उठते हुए बोला। 
    "चलते-चलते हो जाएगी...", वह भी खाट से उठाते हुए लापरवाही से बोली"
   "लेकिन हम वहां जा क्यों रहे हैं... क्या चुड़ैल से मिलने ? तो यहीं बुला लेती....?"
   उसने मेरी बात का कोई भी जवाब नहीं दिया। आम के पेड़ के नीचे पहुंचकर उसने चहरी के साफ पानी से हाथ और मुंह धोया। फिर चुनरी से मुंह पोछते हुए बोली, "तुम यही रुकना मैं अभी आई..."
    मैंने देखा कि वह अमरूद के पेड़ के बगल से निकलती हुई तार की बड़ी के नजदीक जा रही थी। मैंने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया और उसके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद वह लौट कर आई। मैंने उसकी तरफ देखा, मुझे आभास हुआ जैसे उसकी आंखों में आंसू तैर रहे हैं। मेरे मन में एक सवाल उठा, यह वहां क्या करने गई होगी ? मैने सोचा कुछ और दिख कुछ और रहा है। आखिरकार मैंने उससे पूछ ही लिया, "क्या हुआ पीहू ?..."
    उसने अपनी आंखों के कोर साफ करते हुए भराई आवाज में कहा, "कुछ नहीं..."
     चहरी के साफ पानी से उसने एकबार फिर मुंह धोया। फिर चुनरी से मुंह पोछते हुए बोली, "चलो वापस चलते हैं..."
    मैंने चहरी के ऊपर रखे हुए खाली गलास को
 उठाते हुए कहा, "हां चलो चलते हैं..."
     मैं उससे मजाक में यह भी कहना चाहता था कि मिल आई चुड़ैल से, लेकिन नहीं कहा पाया। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि इस वक्त इस तरह का मजाक करना बेहूदगी होगी। हम लोग धीरे-धीरे चलते हुए वापस खाट पर आकर बैठ गए। उसने कमली को जोर से पुकारा। मैं आगे कुछ और पूछ पाता कि कमली भागती-दौड़ती पास आ गई, "क्या हुआ..."
     "हुआ क्या ... आओ इस पत्थर में बैठो, देखो आज पार्टी में हम सभी इंजॉय करेंगे... ", फिर मुझसे बोली, "एक इसके लिए भी..."
   "एक क्या दो लो...", मैने रम का एक सामान्य पैग बनाया और उसकी तरफ बढ़ा दिया। उसने कुछ संकोच में गिलास ली और दूसरी तरफ मुंह करके पी गई।
  "ये अच्छी है... मीठी-मीठी है ..", वह पीहू से कह रही थी, "एक बार तुम्हारे मंगल चाचा नदी तीर से महुआ वाली लाए थे, इतनी कड़वी...! हे भगवान ...!! और बदबू ... पूछो मत ..."
   "हाय राम ! तो मंगल मेरे चाचा हैं, और मैं बचपन से मंगल ही कहती रही, मंगल ये करो, मंगल वो करो, मंगल यहां आओ, मंगल वहां जाओ ... मै कितनी बुरी हूँ न कमली चाची !! नहीं, तुम कमली ही ठीक हो, मंगल में चाचा सूट करता है, आज से नो मंगल, ओनली मंगल चाचा .. ठीक है न ?"
   "हां... आज से मंगल चाचा, हम सभी के...", मैं भी पीहू के स्वर में स्वर मिलते हुए गंभीरता से बोला। कमली ने कहा कि वह अभी सब्जी लेकर आती है, बात भी होती रहेगी और सब्जी भी कटती रहेगी।
   हंसी मजाक का दौर चलता रहा, सब्जी कटती रही। कमली ने इस बीच एक और पैग खींचा और फिर चोखा बनाने की तैयारी करने के लिए चूल्हे की तरफ चली गई। 
   तभी सत्य की बाइक की आवाज सुनाई दी। मैने देखा, बाइक की हेड लाइट के आगे-आगे मंगल सायकल चलता हुआ आ रहा था... पीहू गेट की तरफ भागी, मै पीछे से चिल्लाया, "जरा सम्हल के..."
    "तैयार रखना मैं अब पिऊंगी... समझे ?"
   कुछ देर बाद वो तीनों किसी बात पर तेजी से हंसते हुए मेरे पास पहुंचे। मेरे हाथ में जाम देख कर सत्य ने कहा, "तो पार्टी शुरू हो चुकी है... ", फिर वो मेरे पास चारपाई पर बैठते हुए बोला, "ये सही किया यार, कल संडे है, ड्यूटी की भी टेंशन नहीं... कभी-कभी लाइफ में ऐसे मोमेंट आने चाहिए... यार तुमने बाबा को राजी कर लिया... ये बहुत बड़ी बात है..."
    "ये सुनो!...", कमली की पुकार मंगल के लिए थी।
    "आया ...", कहता हुआ वह उसकी तरफ चला गया।
    "कैसे न कर पता, आखिर... राइटर है ?... और मेरा ब्वॉयफ्रेंड भी..."
   "अच्छा !! वेलडन पीहू !!!  क्या बात है !! इतनी जल्दी इसका प्रमोशन ..", सत्य ने हंसते हुए कहा।
   "अच्छा ये बताओ ...", वह सत्य को समझाते हुए बोली, "ये लड़का यानी बॉय है न ? और हम दोनों दोस्त हैं, तो ये हुआ न मेरा बॉयफ्रेंड और मैं इसकी गर्लफ्रेंड ? अब आगे तुम इसी से पूछ लो.. ?"
   सत्य ने मेरी तरफ देखते हुए इशारे से पूछा, "हूँ ..."
   "हूँ ...."
   उसने सिर हिलते हुए धीरे से फिर पूछा, "कितने ..."
   "एक के तीन... छोटे-छोटे..."
   "तब ठीक है ..."
  "ये तुम लोग क्या कोडवर्ड में बाते कर रहे हो... मेरी बुराई तो नहीं ?...", उसने कुछ गुस्सा जाहिर करते हुए पूछा था। 
  "अरे नहीं पीहू ! तुम्हारी बुराई भला क्यूं करेंगे... मै तो पूछ रहा था कि पार्टी में मेरी लिए भी कुछ है कि नहीं...?"
   "हाय ! ... तुम दारू पियोगे !! ..... गलत बात ? देखो मैने तो नहीं पी... कसम से टच तक नहीं की... और तुम पियोगे... वेरी बैड ..."
   "नहीं ... बिल्कुल नहीं ... ", सत्य अपने कान छूते हुए बोला।
   "लेकिन चलो पार्टी है न ... तो थोड़ी सी पी लो... लेकिन साथ में मै भी एक... प्लीज..."
    सत्य ने मेरी तरफ देखा, मैने उसे इशारा करते हुए कहा, " हां सत्य बस थोड़ी सी, कौन सा हम लोग शराबी हैं... बस इंजॉय के लिए थोड़ी-थोड़ी... ठीक है न...?"
    मैने दो पैग बनाए, एक कंसंट्रेट और एक बिल्कुल लाइट, "लो अब दोनों चीयर्स करो..."
    दोनों ने एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए चीयर्स किया और एक साथ खत्म भी, "यार पीहू तुमने बॉयफ्रेंड बनाया भी तो ऐसा जिससे कोई जलन नहीं  होती बल्कि प्यार आता है ...", वह उसके गाल में चिकोटी काटते हुए बोला। फिर उसके हाथ मेरी तरफ बढ़े तो मैने अपना गाल स्वयं उसकी तरफ करते हुए कहा, "यार चिकोटी क्यों, तुम तो पप्पी ही ले लो... ", वह मेरे गाल में प्यार से थपकी देते हुए मुस्कुरा दिया, "यार हुलिया बदल गया... जो भी हो अच्छे लग रहे हो..."
   पीहू बीच में बोली, "ये सब मेरा कमाल है..."
   "ओह ! थैंक्स मैडम जी... मेरे दोस्त का ख्याल रखने के लिए...", फिर सत्य एक जूते के लेस खोलते हुए कहा, "यार मैं थोड़ा हाथ-पैर धो लूं.."
    अगले ही पल पीहू ने दूसरे पैर के जूते की लेस खोलते हुए कहा, "मोजे अभी धो देती हूँ, सुबह तक सूख जाएंगे..."
   फिर उसने अपने पैर की स्लीपर उतार सत्य के सामने रखते हुए कहा, "तुम इसे पहन लो... "
   "लेकिन ये लेडीज, और फिर तुम... ?"
   "अरे मुझे नंगे पैर चलने की खूब आदत और प्रेक्टिस है... और ये लेडीज-जेंट्स क्या है ? सोसाइटी मॉडर्न हो गई है। अब यहां सब बराबर हैं। तुम पहनो और चलो पंप हाउस... मैं बोर चला देती हूँ... अच्छे से मुंह हाथ धो लेना..."
   "लेकिन पंप हाउस क्यों जाना, दो जग पानी में यहीं ही जाएगा ...", सत्य ने उसे रोकना चाहा। 
   "नहीं होगा... अब तुम चलो बस...", उसने गुस्सा जाहिर करते हुए कहा।
     "सॉरी यार, मै अभी आया ...", सत्य ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
    मैं कुछ बोलना इससे पहले पीहू ने मेरी तरफ कुछ अजीब सी नजरों से देखते हुए पूछा, "कंफर्ट नं ?"
     मै उसकी तरफ देख कर केवल मुस्कुरा दिया। दोनों साथ में पंप हाउस पहुंचे। एक तो उजली रात ऊपर से मंगल ने वहां भी एक बिजली बल्ब का इंतजाम कर रखा था। मैने अपने लिए एक पैग बनाया और दो तीन शिप लेने के बाद खाट में लेट गया। पंप हाउस से दोनों की अटखेलियां, हंसी-मजाक की आवाजे आ रही थी। विस्की अभी भी हॉफ से कुछ अधिक ही बची थी। कुछ देर बाद मैने बैग से पेन और एक डायरी निकाली और अधूरी पोयम को पूरा करने की कोशिश करने लगा।
    इधर मेरी पोयम पूरी हुई और उधर दोनों को हंसते- मस्कुराते अपनी तरफ आते हुए देखा। मैंने डायरी को  तकिए के नीचे दबा दिया। सत्य ने पास आते हुए कहा, "यार, पीहू ने अभी बताया कि तुम स्टोरी राइटर भी हो...? और आश्चर्य की बात कि तुम्हारी कहानी पेपर में छपती भी है !!
     "यार ! अप्रिशिएट कर रहे हो या डिप्रैस..?", मैंने हंसते हुए कहा, "वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि अखबार में छपी हुई कहानी को पढ़कर ही पीहू ने जाना है कि मैं छोटा-मोटा राइटर हूं... "
    " ओह ! वेरी गुड...?", उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
    "तुम लोग बैठो... बातें करो, तब तक मैं खाने की व्यवस्था देख कर आती हूँ ...", फिर उसने धीरे से मेरे कान में कहा, "ज्यादा मत देना, चढ़ जाएगी .."
     "ऊं... हूँ... बिल्कुल नहीं... तुम फिक्र न रहो...", मैंने उतने ही धीरे से उससे कहा। 
  जब वह चली गई तो सत्य ने मुझसे पूछा, "मैडम जी क्या कह के गई हैं...?"
  मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कह, "तुम्हारी फिक्र करके गई है, कहां है ज्यादा मत पिलाना ..."
   "अच्छा !... ज्यादा नहीं तो कम ही पिला दो यार...", उसने हंसते हुए कहा। तभी मंगल पास आया, "ये पीहू बिटिया को क्या हो गया ? पता नहीं कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही है ?"
   "अरे मंगल !! हुआ क्या ?", सत्य ने उत्सुकता से पूछा था। 
  "अभी मुझसे कहा कि मंगल चाचा ! जाओ उनको बुलाकर लाओ, आज उनके हाथ की सब्जी खानी है। अब मुझे समझ में नहीं आ रहा कि किसको ले जाऊं...", मंगल ने दुविधा में अपना सर खुजाते हुए कहा।
  "मंगल !! तुम्हें मंगल चाचा कहा !! ...", सत्य ने आश्चर्य से पूछा।
   "हां भैया जी... सुनकर मुझे भी अजीब लगा...", उसका सर खुजाना अभी भी जारी था।
   उनकी हालत देखकर मुझे तेजी से हंसी आई फिर अपने आप को सामान्य करते हुए कहा, "मंगल तुम अपनी व्यवस्था खुद बनाओ..."
    फिर मैंने सत्य के लिए एक पैग बनाया। और शिप करते हुए मैने "मंगल चाचा" और उसके मिक्सवेज वाली पूरी कहानी शेयर की। जब कहानी पूरी हो गई तो सत्य बोला, "ओह ! तो फिर मुझे जाना चाहिए..."
   "बिल्कुल... जाना चाहिए..."
   जब सत्य चला गया तो मैंने मंगल से कहा, "मंगल कुछ व्यवस्था हुई कि नहीं...?"
    मंगल अपने लिए कुल्हड़ में लिए मड़ैया के पत्थर में बैठा था, मेरी बात सुनकर वह नजदीक आकर मेरी खाट के पास रखे पत्थर में बैठ गया, फिर भावुकता से बोला, "जब पीहू बिटिया का जन्म हुआ मैं 12-13 साल का था सर जी... बहुत दिनों बाद इस घर में बिटिया हुई थी। बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया था। मुझे अच्छी तरह से याद है, दाऊ साहब ने दिल खोलकर दान-पुण्य किया था। आज जब मंगल चाचा कहा तो बड़ा अपना-सा लगा। बिटिया हमेशा खुश रहें..", अंतिम शब्द कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं थीं। 
    "शांत मंगल... रोते नहीं...", मैंने उसके कंधे में हाथ रखते हुए कहा।
   "यह तो खुशी के आंसू है सर जी ! इस दिल से यही दुआ निकलती है कि बिटिया हमेशा खुश रहें, देखिए तो दोनों की जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है...", मैने देखा दस कदम दूर पीहू और सत्य चूल्हे में एक साथ मिक्स वेज बना रहे थे। 
   "मंगल !! बताओ तो टाइम कितना होगा ?"
    वह चंद्रमा की तरफ देखते हुए बोला, "आठ के लगभग होगा....सर जी ! मै थोड़ा गरम मसाला दे कर आता हूँ...", मंगल ने अपना कुल्हड़ खाली करते हुए कहा। 
    मैने सत्य को आवाज लगाई, "बाबा का डिनर ..?" 
  सत्य पास आते हुए बोला, "बाबा ने आज पूजा जल्दी फिनिश कर ली थी। उन्हें खिला-पिला के, पीछे ताला लगा के आ रहा हूँ... सब इंतजाम कर के आया हूँ। दिक्कत की कोई बात नहीं..."
   "चलो तो ठीक है... उन्हें कोई कष्ट न होने पाए...", मैने गिलास धोई। एक नॉर्मल, एक लाइट बना के उसे देते हुए कहा, "जाओ चीयर्स करो, और देखो जरा मंगल को भेज देना ..."
   सत्य गया और मंगल आया, "मेरे लिए भी एक कुल्लड निकालो... देखो मेरे लिए भी मीठी वाली ही बनाना... और लाओ सलाद भी काट लेते हैं..."
   मंगल ने वैसा ही किया। सलाद काटते हुए मैने मंगल से कहा, मंगल खाने के लिए कैसे व्यवस्था करोगे। बर्तन हो जाएंगे ...?"
    चटाई है न, उसी को बिछा दूंगा ... आप तीनों उसी में बैठ जाइएगा। मेरे और कमली के लिए ये पत्थर ही बहुत है, और बर्तन भी हो जाएंगे... आप चिंता मत कीजिए..."
    मंगल ने सही कहा था, सब कुछ व्यवस्थित हो गया, फिर हममें से किसी ने नहीं पी... सिर्फ मिल-जुल कर डिनर की तैयारी की। देशी शुद्ध धी की महक, लिट्टी-चोखा, मिक्स वेज, ताजी सलाद और एक दूसरे के हृदय में एक दूसरे के लिए ढेर सारी आत्मीयता। खुला असमान, चंद्रमा की श्वेत धवन चांदनी से धुली हुई शांत रात और इस कहानी के चार किरदार आपस में हंसी-मजाक करते हुए डिनर का पूरा आनंद ले रहे थे। 
      पांचवा यानी इस कहानी का राइटर मैं; जो इस समय खुद एक किरदार था जो अपने अतीत की कुछ घटनाओं को आज की उज्ज्वल शांत रात में करवटें बदलते हुए देख रहा था। अतीत अर्थात हमारे जीवन का गुजरा हुआ कल: चाहे वह अच्छा हो, बुरा हो; चाहे खुशियों से भरा हो या आसुओं में मुस्कुराता हुआ हो, आपका पीछा कभी नहीं छोड़ता। और शायद इसीलिए मैं उनसे दूर भगाने की नाकाम कोशिशें नहीं कर रहा था, बल्कि उन्हें पूरी शिद्दत के साथ महसूस और आत्मसात् करता जा रहा था।
    डिनर समाप्ति के बाद जब मंगल मेरे बिस्तर को झाड़-झटक रहा था कि उसी समय मेरी डायरी चारपाई के नीचे गिरी जिसे पीहू ने उठा लिया, "ये क्या है  ?", कहते हुए डायरी को खोला, जिस पेज में पेन दबी थी वही पेज खुला और उसमें थी आज ही पूरी की गई वही कविता। रोशनी पर्याप्त थी, उसने कविता को ध्यान से पढ़ा, फिर मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "पूरी हो गई...?"
   "हां जो लिख सकता था, लिख दी... ?", मैने चारपाई पर बैठते हुए कहा था ।
    "सत्य इधर बैठो", उसने मेरे बगल में बैठते हुए सत्य को अपने पास बुलाया था। वह मेरी दूसरी तरफ  बैठते हुए पीहू से बोला, "क्या बात है..."
   "इसे पढ़ो ..", उसने डायरी उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "शैल ने लिखी है..."
    सत्य ने ध्यान से पढ़ा, "बहुत ही सुंदर ... वेरी गुड... वैसे इस पोयम की थीम्स क्या है... मतलब क्या ध्यान में रख के लिखा है...?"
    "थीम्स...? हूं .... कैसे बताऊं ..... ", मै कुछ सोचते हुए बोला, "हां तुम ऐसा समझो ... एक लड़का और एक लड़की मिलते हैं... दोनों के बीच प्यार होता है ... एक दूसरे से शादी भी करना चाहते हैं, लेकिन कुछ इश्यू के कारण लड़की को दूसरी जगह शादी करनी पड़ती है। लेकिन उस लड़की के दिल में उस लड़के के लिए हमेशा वही प्यार रहता है और जिसका एहसास उस लड़के को भी है। वह उसे धोखेबाज और बेवफा नहीं समझता है बल्कि उसके दर्द में, उसकी तकलीफ में खुद को शामिल पाता है, और फिर एक दिन वो लड़का उसी लड़की से मिलता है, और अपने दिल के जज्बातों को कविता में कहता है... यही सोच कर लिखा है.…"
    तभी मंगल पास आया, "सर जी! पी-पा लिया, खाना-पीना भी हो गया। अब कुछ प्रोग्राम हो जाए..."
   "क्या भई ! खिलाने-पिलाने के बाद मुजरा-उजरा करवाओगे क्या  ?", मैंने डरने का अभिनय करते हुए कहा। 
    "नहीं सर जी, कुछ चुटकुले, हंसी मजाक, गीत-गाना, शेरो-शायरी, ऐसे ही प्रोग्राम। अभी दस भी नहीं बजा होगा..."
  "बिल्कुल सही... ", सत्य ने मंगल का पक्ष लेते हुए कहा, "अभी साढ़े नौ बजे है... कुछ प्रोग्राम तो होना चाहिए... क्यों पीहू ?"
   "सही है... राइटर भी हमारे पास है...", पीहू ने भी सहमति दे दी।
    "एक मिनट... यदि पूरी महफ़िल के इंटरटेनमेंट का नारियल मेरे सिर पर फोड़ना है, तो गलत बात है। योगदान सभी का होना चाहिए...", मैंने पीहू की बात को बीच में काटते हुए कहा।
   शुरुआत मंगल और कमली से हुई। एक आदिवासी लोकगीत गाते हुए दोनों झूम के नाचे। डांस खत्म होने के बाद कमली ने कहा, "पीहू बिटिया गाना बहुत अच्छा गाती है, इनकी आवाज बहुत मधुर है...", फिर पीहू की तरफ देखते हुए बोली, "वही वाला गीत सुनाओ न...?"
     "कौन सा ? पूरबे पश्चिमवाँ से आयल जोगिया ?", पीहू ने गीत की पुष्ठि की, "कमली यह तो आदिवासी गीत है, तुम मुझसे अच्छा गाती हो, तुम्ही से तो सीखा है, तुम ही सुनाओ न...?"
   तभी सत्य बीच में ही बोला, "प्लीज पीहू , मेरे लिए..."
     अब पीहू के पास मना करने की कोई वजह नहीं रह गई। सत्य के हृदय में कोई इच्छा हो और उसकी पूर्ति पीहू के अधिकार क्षेत्र में हो और वह पूरी न हो, क्या कभी ऐसा हो सकता है ? कभी नहीं ।
     पीहू थोड़ी देर तक आंख बंद कर बैठी रही। शायद वह गीत को पूरी तरह से ध्यान कर रही थी। फिर उसने गाना शुरू किया,

पूरबे पश्चिमवाँ से आयल जोगिया,
पेड़ेतरे आय डेरा डाले।
सिरी किसुन बंसिया बजावे,
साब सखी सुनि आवे।
कवन गोरी हांसे,
कवन गोरी मुसुके।
एत बड़की त हांसे,
मझली गोरी मुसुके,
छोटकी त चील्ह निहार झपटे।
सिरी किसुन बंसिया बजावे।

     उसकी मनमोहन और मधुर आवाज में इस लोक गीत को केवल हम लोगों ने ही नहीं अपितु इस पूरी प्रकृति ने सुना। आसमान में अपना सफर तय करते हुए निशा पथिक और उसकी उज्जवल चांदनी ने सुना। चलती हुई हवाओ ने, बगिया के हर एक पेड़-पौधों ने सुना। सत्य के हृदय की प्रत्येक धड़कनों ने सुना। और ?... और एक राइटर की कलम ने सुना। 
       सत्य तो इतना आत्म विभोर हो गया कि उसने अपनी जेब से कुछ रुपए निकाले और पीहू पर न्योछावर कर कमली को पकड़ा दिए। फिर वह मेरे गले लगते हुए बोला, "ठीक हुआ जो ज्ञान ने तुम्हें मेरे साथ भेजा..."
     और एक राइटर अपने जीवन में अपनी मोहब्बत से दूर हो कर भी, अपने किरदारों में उसकी कशिश और महक को महसूस किया।
    अब सब की निगाहें मुझ पर थी, लेकिन मेरी सत्य पर, मैंने तीर की दिशा बदल दी, "देखो पीहू ! सत्य के कहने पर तुमने इतना अच्छा गीत सुनाया तो क्या अब इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है...? बताओ सत्य अब तुम क्या कर सकते हो .. हु ?"
    "एक्टिंग कर सकता हूँ। स्कूल के समय ड्रामा में कुछ रोल किये थे... चलो अभी तुमने जो उस लड़की और लड़के की कहानी बताई थी न, उसी का रोल करता हूं। क्यों पीहू साथ दोगी ...?"
   "लेकिन कैसे ... उस कहानी को तुम यहां कैसे प्ले कर पाओगे ...?", मैंने आश्चर्य से पूछा था।
   "तुम्हारी लिखी गई पोयम के द्वारा, अब तुम यह समझ लो कि मैं वह लड़का हूं और पीहू वह लड़की है। इसकी शादी किसी और से हो गई, लेकिन यह मुझे उतना ही प्यार करती है जैसा कि पहले, और मैं भी इसे उतना ही प्यार करता हूं जितना पहले। यह चेहरे के एक्सप्रेशन देगी और मैं तुम्हारी पोयम को पढ़ूंगा... ओके ?"
   "लेकिन मुझे तो एक्टिंग नहीं आती न ...!", पीहू ने विरोध किया। तब मैंने उसे समझाते हुए कहा बिल्कुल आसान है, मैं समझा देता हूं। यार तुम यूं चुटकी बजाते हुए कर ले जाओगी। बस तुम्हें सचमुच महसूस करना होगा उस लड़की को अपने अंदर ... चेहरे में एक्सप्रेशन अपने आप आ जएंगे। एक मिनट मैं अभी समझता हूँ, पहले तुम इसे पढ़ो,

तू हंसती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपने ग़म भी भूल गया हूँ,
जब से तेरी इन आंखों में,
तिरते आंसू देखे हैं।

    अब इसे इस तरह एक्ट करना है। जब तुम मुझसे नेचुरल कुछ हंसते-मुस्कुराते बात कर रही होगी तो सत्य पहली दो लाइंस पढ़ता हुआ तुम्हारे नजदीक आ रहा होगा, लेकिन जैसे ही तीसरी लाइन पढ़े तुम्हें धीरे-धीरे अपना फेस उसकी तरफ टर्न करना है। सत्य तुम्हारे और नजदीक आयेगा, तुम्हारे कदमों के पास बैठेगा और फिर तुम्हारी आंखों में देखता हुआ अंतिम की दो लाइन कहेगा। उस समय तुम्हें अपनी आंखों में, अपने चेहरे में वह एक्सप्रेशन लाना होगा जैसे वास्तव में तुम्हारी आंखें भर आई हों... ठीक ?
      "मतलब तुम मेरे हसबैंड और यह मेरा बॉयफ्रेंड...", कहते कहते वह सत्य की तरफ देख कर लजाते हुए रुक गई।
    "...नहीं मैं तुम्हारा हसबैंड नहीं तुम्हारा दोस्त हूं। तुमसे बातें कर रहा हूँ । तुम नैचुरली मुझसे हंसी मजाक में बाते कर रही हो बस... तो तैयार सत्य...? सीन समझ में आ गया ...", मैंने किसी कुशल डायरेक्टर की तरह उससे पूछा था। 
   "ओके सर.... गॉट इट...", सत्य में भी एक कुशल अभिनेता की तरह रिप्लाई दिया। 
    पूरा सेटअप तैयार कर लिया गया पीहू मेरी खाट पर मेरे नजदीक बैठ गई। सत्य पांच कदम की दूरी पर खड़ा हो गया। पीहू की पीठ सत्य की तरफ थी। लेकिन एक्शन कौन बोले ? उसका हल मैंने ही निकला। मैंने पीहू की चप्पल मंगल को पकड़ते हुए कहा, "तुम भईया जी के सामने खड़े हो जाओ और जैसे ही मैं हाथ दिखाऊं एक्शन करके एकदम से किनारे हट जाना... ठीक है"
     मैंने इशारा किया। मंगल ने दोनों चप्पल एक दूसरे पर तेजी से ठोकी और तेज आवाज में बोला एक्शन। पूरी बगिया चटाक की आवाज के साथ गूंज उठी। आवाज इतनी तेज थी कि एक पल के लिए हम सब सहम गए। लगा कान के पास कोई बड़ा फ़टाका फूटा हो। जब समझ में आया तो हंस-हंस के बुरा हाल था। सत्य, पीहू यहां तक कि कमली और मैं अपना पेट पकड़ जोर-जोर से हंस रहे थे। सिर्फ मंगल कुछ ही दूरी पर खड़ा यह सोच रहा था कि उससे ऐसी क्या गलती हो गई ? उसने तो सब कुछ सही किया था...
    जब हम पेट भर हंस लिए तो मैंने मंगल को अपने पास बुलाया। उससे चप्पल ली और उसे समझाते हुए कहा, "बिल्कुल धीरे से ठोकना है, ऐसे। कैसे ... ऐसे, ... और एक्शन तो तुमने ठीक कहा बस थोड़ा सा आवाज कम। ठीक है न...", मंगल ने किसी बंदर की तरह अपना सर हां में हिलाया।
     लेकिन पीहू तैयार नहीं हो रही थी, "यार इतनी कॉमेडी के बाद यह सीरियस सीन मुझसे नहीं होगा.…"
    "क्या पीहू ! आज तुम प्रूव कर दो कि तुम बॉलीवुड से संबंध रखती हो... यही तो एक्टिंग है, यही तो उसकी स्किल है...", लगभग पांच मिनट बाद सीन का सेटअप फिर से हुआ। पीहू और सत्य दोनों ने कमाल का अभिनय किया, सीन फर्स्ट टेक ओके।
    मैंने सत्य से पूछा, "अब किस लाइन में एक्ट करना है ?"
   लेकिन सत्य कोई जवाब देता इससे पहले पीहू बोल उठी, "डायरी इधर लाओ मैं बताती हूं ...", कुछ देर पढ़ने के बाद उसने कहा,  "यह लास्ट वाला ...."

तू प्यार किसी को करती होगी, 
तो फिर कैसे करती होगी, 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपना प्यार भूल गया हूँ,
जब से तेरे नयनों में,
खुद को बसते देखा हैं।
 
     मैंने पीहू से कहा, "अब इस सीन को तुम खुद ही डायरेक्ट करो, जो भी सोच कर तुमने इसे सिलेक्ट किया वह तुम सत्य को समझाओ..."
   "हूं देखो ... जस्ट फील मेरी इनसे शादी हुई है, मैं इन्हें प्यार देने की कोशिश करती हूँ लेकिन दे नहीं पा रही हूं... क्योंकि इन आँखों में... इन नजरों में तुम हो। मैं और शैल पास बैठे एक दूसरे से प्यार भरी बातें कर रहे होंगे, मेरा हाथ इनके कंधे में होगा और तुम उस तरफ से पोयम पढ़ते हुए आओगे और शैल के पीछे यानि मेरे ऑपोजिट बैठोगे। मेरी तरफ देखते हुए जब तुम अंतिम की तीन लाइन पढ़ रहे होंगे तब मेरी नजर इसकी तरफ से धीरे-धीरे हट कर तुम्हारी तरफ जाएगी और अंतिम लाइन में मेरी नजरों में तुम होगे... ओके समझ गए न..."
   "वंडरफुल !!! क्या इमेजिनेशन है... मानते हो न, मेरी पीहू बहुत इंटेलिजेंट है ? ... इस पोयम के लिए क्या सीन दिया है..."
     मैंने प्रशंसा भरी नजरों से सत्य की तरफ देखा था, "ऑफकोर्स ... आफ्टर ऑल शी इज योर ...!!"
   सेटअप किया गया, मंगल एक बार फिर तैयार। कहानी वही थी किरदार वही थे। लेकिन अभिनेता बादल गए। सत्य मेरे किरदार को निभाने जा रह है। लेकिन मैं और पीहू ? दो ऐसे किरदारों को निभाने जा रहे थे जो यहां से कई किलोमीटर दूर अपनी रियल लाइफ में न जाने क्या कर रहें होंगे। मेरी इस सोच ने, दिल से उठते इस प्रश्न ने... मुझे एक पल के लिए पागल और असमान्य कर दिया। मेरे हृदय की बात मेरे चेहरे में दिखाई देने लगी जिसे पीहू ने पढ़ लिया और पूछा, "आर यू ओके ..."
     "या ... ओके, लेट्स ट्राई ...", सहज होने की कोशिश करते हुए मैंने कहा।
    यह सीन भी बहुत ही नेचुरल और शानदार ढंग से पूरा हआ। सभी ने ताली बजाई। लेकिन मैं जड़ था। पीहू ने मेरे चेहरे के सामने चुटकी बजाने की नाकाम कोशिश करते हुए पूछा, "डायरेक्टर जी क्या हुआ, कमी रह गई हो तो दूसरा टेक लें...?"
       ख्यालों की दुनिया से बाहर आते हुए मैंने तकिया के पास से रखे हुए कुछ पैसे उठाए। सत्य को पीहू के पास बैठने को कहा, फिर दोनों पर न्योछावर करके मंगल को पकड़ा दिए। मंगल को भी उसके काम के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद कहा और इनाम के तौर पर एक नोट अलग से थमा दिया।
     अब बारी मेरी थी। मेरे दिल की बेचैनी हृदय की धड़कन सब कुछ एब्नार्मल हो चुकी थीं। मैंने बहुत कोशिश की मना करने की लेकिन मानने वाला कौन था। थक-हार कर मैंने अंत में कहा, "मैं भी एक्टिंग करूंगा और मैंने चुना दिलीप कुमार द्वारा अभिनित देवदास मूवी का एक सीन। जिसका डायलॉग मुझे हूँ-ब-हूँ याद था,  "कौन कमबख्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूं कि बस सांस ले सकू..."
    पीहू के द्वारा विरोध दर्ज किया गया, मुझे पसंद नहीं है। यह कौन सी बात है की प्यार में महबूबा से शादी न हुई तो शराब पी-पी के मर जाओ, अरे जिंदगी जीने के लिए और बहुत-सी वजहें होती हैं। ... और उसे कैसा लगेगा कि कोई उसकी याद में शराब पी-पी के मर गया ? वह तो जिंदा जी मर गई न ।आपकी पसंद मुझे अच्छी नहीं लगी..."
    "बात तो सही है....", सत्य ने भी पीहू का साथ दिया, "कोई अपना सुनाओ .."
    अब मैं उससे कैसे कहता कि मेरा किरदार तो तुमने निभा लिया मेरे दोस्त। और ईश्वर न करें की वास्तविक जीवन में मेरे किरदार को तुम्हे जीना पड़े। मैंने बात संभालने की कोशिश की, "तो चलो ठीक है, मैं इसे पॉजिटिव ढंग से रिप्रेजेंट करूंगा... ओके। मंगल! कांच वाली गिलास और ब्लैक वाली बॉटल तो लाना..."
    सत्य ने फिर विरोध किया, "अब ये क्या यार ...!",
   "रुको तो . ..", मैंने सत्य को समझाते हुए कहा, " फिलिंग्स लाने के लिए और सीन को परफेक्ट बनाने के लिए जरूरी है कि हाथ में कुछ हो..."
   मैने मंगल की तरफ देखा, "लाओ मंगल तुम... !"
   मंगल ने वही किया। मैने ग्लास में ट्रिपल एक्स रम फुल भरी, तीन चार घूंट पी तो अंदर जल रही आग को और आग मिली। मैं कुछ और असामान्य हुआ। एक पल के लिए सोचा कि मुझे क्या कहना है, फिर मैंने मंगल को समझाते हुए कहा, "इस सीन में मै और तुम हैं... तुम समझलो कि मेरे सेवक हो, मुझे बहुत चाहते हो... मै जिस लड़की को चाहता हूँ, उसकी कुछ दिनों पहले शादी हो गई है, उस गम में मैं कुछ दिनों से लगातार शराब पी रहा हूँ। तुम रोज देखते तो हो लेकिन मुझे रोकने की हिम्मत नहीं कर पाते हो। एक दिन तुम हिम्मत जुटा के मुझसे कहते हो ... हूँ ... क्या कहोगे ?", मै कुछ सोचते हुए बोला, "जब मैं गिलास को अपने होठों में लगाऊं और जैसे ही एक शिप लूं तब मेरा हाथ पकड़ कर कुछ उदास हो कहना, ... हां तुम बस ये कहना ... सर जी किसको भूलने के लिए इतना पीते है...  कह लोगे न ?"
     उसने हां में सर हिलाया।
    "सत्य इस बार एक्शन तुम बोलोगे ... और देखो मंगल जैसे ही सत्य एक्शन बोलेगा मैं धीरे-धीरे गिलास को अपने होठों की तरफ ले जाऊंगा और जैसे ही एक शिप लूं तुम्हें मेरा हाथ पकड़ कर यही कहना है। कहो तो एक बार ..."
   "सर जी किसको भूलने के लिए इतना पीते है ..."
   "शाबाश !!!" .... फिर मैंने सब की तरफ देखते हुए कहा, "दोस्तों ऐसे क्या देख रहे हो, इस सीन को मेरी निजी जिंदगी से को-रिलेट मत करो। आई एम राइटर, डायरेक्टर एंड अलसो अ गुड एक्टर..."
   सभी के चेहरे में मुस्कान वापस आ गई। और पीहू तुम,  मैं जो कुछ भी बोलूं जरा लिखते जाना। हो सकता है किसी कहानी में यूज कर लूं।
     सीन सेटअप हुआ।  मैने चारपाई के ऊपर पैर किए, तकिए में कोहनी टिका का बिल्कुल रिलेक्स लेट गया। एक हाथ में अधूरा जाम था।  सत्य ने एक्शन कहा और मेरे हाथों में पकड़ा प्याला धीरे-धीरे मेरे होठों की तरफ बढ़ा, मैने एक शिप ली। मंगल मेरी चारपाई के नीचे घुटने के बाल बैठते हुए मेरा हाथ पकड़ उदास स्वर में बोला,  "सर जी ! कि rसे भूलने के लिए इतना पीते हैं..."
    मंगल का पूछना था कि पांच साल पहले एक अधूरी कहानी का किरदार मेरे वजूद में सांसे लेने लगा। एक ऐसा किरदार जिसने 18 वर्ष की उम्र में एक लड़की को बेहद चाहा और उस लड़की ने अपने माता-पिता के सम्मान के लिए उसका त्याग किया। 
      फिर 23 की उम्र में उसकी शादी के मण्डप में पहुंचा... विवाह की सारी रस्में देखी... रोया... टूटा और फिर नियति उसे इस जगह ले आई। बाबा, सत्य, पीहू, मंगल और कमली जैसे किरदारों से मुलाकात हुई। 
     मैंने अपने चेहरे में अधूरी ख्वाहिश, टूटे-बिखरे अरमान, और अपनी मोहब्बत से दूर एक आशिक के दर्द को पैदा किया जो कि मेरे लिए बहुत ही आसान था। फिर मैं थके-हारे हताश शब्दों में कहता गया और पीहू लिखती गई, 
     "कौन कमबख्त है जो उसे भूलने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूँ कि उसे और शिद्दत से याद कर सकूं। मै तो पीता हूँ कि उसे अपने अंदर रोता हुआ महसूस कर सकूं...  इन चमकते हुए सितारों से कह सकूं कि इस दुनिया में तुमसे भी अधिक एक चमकदार सितारा है। यहां से उठ कर जाने की ताकत नहीं न.... बस इन्हें देखता पड़ा रहता हूँ... पीता रहता हूं। तब भी कुछ होश रह ही जाता है। होश से कह दो.... अब कभी होश न आने पाए...
     पीता हूँ कि... इन बहती हुई हवाओ को अपनी मुट्ठी में कैद कर, उन्हें चूम कर, फिर इन्हीं फिजाओं में छोड़ कर कह सकूं... कि जाओ उसकी रूह की चोट पर तुम मेरी तरफ से मरहम लगाना... इस दर्द को कोई महसूस क्यूं नहीं करता मंगल ?
      क्यूं सब कुछ बदल गया एक रात में.... वह शादी की राह पर चली... और मैं बर्बादी की राह पर। क्यूं किसी की मर्जी के बगैर बारात सजाती है ? क्यूं शहनाई गूंजती हैं ? किसी को उसकी आँखो के आंसू क्यूं न दिखाई दिए ? ... क्यूं उसकी पीड़ा को किसी ने महसूस न किया ? और जो महसूस कर सकता था न मंगल... उसे तन्हा एक कमरे में बंद कर दिया गया।.... मेरे ज़ेहन से वो क्यूं नहीं निकलती ?... क्यूं मेरे दिल से उसकी याद नहीं जाती....  मैं उसे क्यूं नहीं भूल सकता... हर पल उसकी याद क्यूं सताती है ?....  इन अश्कों में अब खुद का इख्तियार क्यूं न रहा... क्यूं बहते हैं इन आंखों से आंसू ...
      एक टूटे और जुदा हुए आशिक के दर्द को तू नहीं समझ सकता....  जिसे तूने चाहा तेरे साथ है न। और हम ? हम दूर... बहुत दूर इन महफिलों में हैं। जश्न-ए-महफिल क्या होती है, तू मुझसे पूछ मंगल... हां तू मुझसे पूछ...
 सुलगते हैं दिलों में अंगार, 
 जलते हैं कुछ हसीं ख्वाब,
 मुर्दे भी जहां सजते हैं, 
 पहन दुल्हन के पोशाक ...!
       चल ले चल मेरे भाई ... मुझे इन महफिलों से दूर.... कहीं ऐसी जगह... जहां मेरी रूह को सुकून मिल सके... चल ले चल मेरे भाई...  

      सभी चुप, एकदम शांत। मैंने उनकी तरफ देखते हुए अपनी दो फिंगर की कैंची चलते हुए कहा, "कट ..", परफॉर्मेंस अच्छी लगी हो तो ताली-वाली बजा दो यारों। ऐसे हाथ जोड़े सुन रहे हो जैसे सतनारायण की कथा कह रहा हूं।
     फिर सभी ने जोरदार ताली बजाई। 
  "थैंक्यू ... थैंक्यू ...", मै खाट पर सामान्य ढंग से बैठते हुए बोला।
   सत्य ने कहा, " व्हाट अ नेचुरल परफॉर्मेंस ,..."
  "थैंक्यू ... थैंक्यू अगेन...",  इसी बीच पीहू डायरी को मेरे नजदीक रख धीरे से मेरे सामने घुटने के बल जमीन पर बैठी और मेरा हाथ अपने हाथ में लेती हुई बोली, "मुझे नहीं लगा तुम एक्टिंग कर रहे थे..."
      "क्यों... ठीक से नहीं कर पाया क्या... दूसरा टेक... ? लेकिन वही सब बोलने के लिए तो अब डायलॉग रटने पड़ेंगे, क्यूंकि जो मन में आता गया बोलता गया था...  अब तो... खुद भी याद नहीं....
   उसने मुझे बीच में रोकते हुए कहा, "नहीं ... दूसरा टेक नहीं चाहिए ... एक्टिंग कुछ ज्यादा ही नेचुरल थी... अब समझ में आ गया कि तिरते आंसू क्या होते है, इससे अच्छा तो रो ही लिए होते बॉयफ्रेंड..."
     सत्य ने भी पास आते हुए कहा, "एक्टिंग तो हमने भी की लेकिन तुम्हारे बोलने के अंदाज ने तो हमारी भी आंखों में आंसू ला दिए दोस्त, और खुद देखो तुम्हारी भी आंखें कैसे भरी हुई हैं... क्या बात है दोस्तों से भी न कहोगे ?"
     "अरे यार ऐसा कुछ भी नहीं है, बस एक्टिंग थी... अब इसमें मेरी क्या गलती है कि मैं एक अच्छा एक्टर हूं ... क्यों मंगल ?", मैने हंसते हुए कहा।
   मंगल तपाक से बोला, "जी, सर जी..."
   "हां मंगल चाचा तुम तो कहोगे ही... उनके पक्के सुग्गा जो ठहरे... हां में हां मिलाने के लिए। फिर उसने विषय बदलते हुए कहा, "मुझे आपकी पोयम आपके मुख से सुननी है..."
   "बिल्कुल सुना दूंगा...", मैंने डायरी खोलते हुए कहा। 
   सत्य ने भी पीहू का पक्ष लिया, "हां बिल्कुल ... जिसने लिखा है उसके मुख से और अच्छी लगती है..."
    "ये क्या तुम ऊपर क्यों बैठ हो, इतने बड़े राइटर की बराबरी में बैठते हो ? शर्म नहीं आती ? आओ इधर बैठो मेरे पास...", उसने अपने बगल वाले पत्थर की तरफ इशारा करते हुए सत्य से कहा।
   मैने सत्य को कहा, "जाओ.... तुम वही अच्छे लगोगे..."
      मैंने अपनी डयरी में लिखी पोयम को फिर सभी के सामने पढ़ना शुरू किया। कविता के शब्दों के साथ-साथ मेरे चेहरे में आ रहे भावों को पीहू बड़े गौर से पढ़ने की कोशिश कर रहे थी। उसकी एक्स-रे नजरों से खुद को बचत-बचाता और दिल की बेचैनी को बीच-बीच में शराब के घूट में डुबोता मैं पढ़ रहा था...

तू हंसती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपने ग़म भी भूल गया हूँ,
जब से तेरी इन आंखों में,
तिरते आंसू देखे हैं।
X
तू शरमाती होगी तो कैसी लगती होगी,
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
खुद का रोना भूल गया हूँ,
जब से तेरे इन गालों में,
लुढ़के आंसू देखे हैं।
X
तू गाती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपने गीतों को भूल गया हूँ,
जब से तेरे ओंठो में,
विरह गीत सजते देखे हैं।
X
तू मुस्काती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी मुस्काने भूल गया हूँ,
जब से तेरे गालों के,
गढ़ों को भरते देखा हैं।
X
तू रूठी होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी  किस्मत भूल गया हूँ,
जब से तेरी किस्मत को,
तुझसे ही रूठे देखा हैं।
X
जागी होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी नींदें भूल गया हूँ,
जब से तेरी तकदीरों को,
गुम-सुम सोते देखा हैं।
X
तू सोती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी राते भूल गया हूँ,
जब से तुझको प्रिय-बाहों में,
रातों को जगते देखा हैं।
X
तू रोती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपना हंसना भूल गया हूँ,
जब से तेरे अपनों को,
तुझ पर हंसते देखा हैं।
X
तू प्यार किसी को करती होगी, 
तो फिर कैसे करती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपना प्यार भूल गया हूँ,
जब से तेरे नयनों में,
खुद को बसते देखा हैं।

     जब मैंने कविता पूरी पढ़ ली तो एक बार सभी ने फिर से ताली बजाई और मुझे प्रोत्साहित किया।
   "ओके तो तुम लोग अब चलो... जाओ आराम करो...", मैने सत्य से कहा।
    पीहू बीच में ही बोली, "तुम भी चलो... आराम से अटारी में सोना..."
उसके इतना कहते ही सत्य ने कुछ आश्चर्य से उसकी तरफ देखा, "पीहू... तुम..!!"
    पीहू ने उसकी बात बीच में काटते हुए कहा, "और नहीं तो क्या... देखो ठंड शुरू हो चुकी है... लग गई तो...?"
   सत्य ने भी अपनी सहमति जताते हुए कहा, "हां... हां... ये बात तो सही है... मै पीहू को घर छोड़ के आता हूँ..."
   "ख़ाख सही है...", मैंने इनकार करते हुए कहा, "उस बंद अटारी में मुझे नींद आने से रही... यहां देखो... क्या सुहाना मौसम है... चारों तरफ खुला-खुला ये आस्मां, ये चांद, ये सितारे... हल्की हल्की हवा... और देखो मुझे ठंड लगने से रही... इतना मोटा कंबल और कुछ लिहाज इस नाचीज़ शराब का भी तो कर लो..."
   "बस... बस...", सत्य ने मुस्कुराते हुए पीहू से कहा, "चलो पीहू... ये बुलबुल हमारे पिंजड़े में कैद होने से रहा..."
    गुड नाईट के साथ यह तय हुआ कि मेरी खाट मड़ैया के अंदर लगा दी जाए ताकि रात को ओस और ठंड से बचाव हो सके। कमली पास ही घर के अंदर सोएगी। और मंगल मेरे पास मड़ैया के अंदर, लंबे से पत्थर में। सत्य और पीहू बाइक से वापस घर जायेंगे। 
    जब कमली, पीहू और सत्य चले गए तो मैने मंगल से कहा, "बताओ मंगल कितना टाइम हुआ होगा ?"
   मंगल ने चंद्रमा की तरफ देखते हुए कहा, "ग्यारह और साढ़े ग्यारह के बीच होगा। सर जी आप भी भईया जी की तरह घड़ी पहना कीजिए न..."
   "मंगल तुम कहते तो ठीक हो, लेकिन ये सब बोझ लगता है यार, यूं कह लो साली ये जिंदगी बोझ लगने लगी है...",
   "अरे नहीं सर जी... ऐसा न कहिए ... क्या कमी है, पढ़े लिखे हैं, पैसा कमाते हैं ... और क्या चाहिए ..?", मंगल ने मुझे समझाते हुए कहा।
   "हां मंगल तुम ठीक कहते हो... और क्या चाहिए। अपना कुल्हड़ ला न ...", मैंने एक लार्ज अपने लिए बनाते हुए उससे कहा।
      "सर जी पहले मड़ैया के अंदर आपके सोने-पड़ने की व्यवस्था कर दूं ... उसके बाद। अब चलिए उठिए...", मंगल ने अधिकार पूर्वक मुझसे कहा।
    " नहीं मंगल, मुझे अंदर घुटन होती है यार, ... मुझे यही पड़ा रहने दे ... कौन सी बहुत ज्यादा ठंड है। और कम्बल है न ... बस थोड़ी देर मेरे पास बैठ...", 
    मंगल अपने कुल्हड़ के साथ मेरी खाट के पास बैठ गया। मैने बॉटल उसकी तरफ बढ़ाई और कहा, "जितनी इच्छा हो बना ले..."
      मंगल ने अपने लिए बनाई और दो घूट पीने के बाद बोला, "सर जी चंदा मामा कितने अच्छे लग रहे हैं न ?"
    मैंने भी अपने पैग से दो घूट लिए, आसमान की तरफ अर्धचंद्र को देखते हुए बोला, "हां बहुत प्यारे लग रहे हैं, और दूर उस सितारे को जरा देख, चंद्रमा की इतनी तेज रोशनी के बाद भी वह कैसे चमक रहा है... जानता है मंगल... वह मेरा सितारा है.... देख तो मुझे कैसे प्यार से देख रहा है... जैसे लास्ट एक्ट में पीहू ने सत्य की तरफ देखा था... वो लास्ट की पोयम क्या थी मंगल ?  देख मै ही लिखता हूं और मैं ही भूल जाता हूं यार... हां... हां याद आई...".
    मैने खोई-खोई सी आवाज में आगे कहा, "तू प्यार किसी को करती होगी... तो फिर कैसे करती होगी... हां मंगल... ये मंगल... बता  न... वो प्यार उसे करती होगी... तो फिर कैसे करती होगी... कैसे करती होगी मंगल... यूं कंधे में हाथ रख के... जैसे पीहू ने मेरे... नहीं... नहीं करती होगी... और करती भी होगी तो क्या ? हां मंगल...  तो क्या हुआ ? अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको... क्या मंगल ? अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको... अपना प्यार भूल गया हूँ मैं... जब से उसके नयनों में... फिर क्या था मंगल ?  हां... खुद को बसते देखा हैं... ", और फिर मैं जोर से हंस पड़ा, और दिल खोलकर हंसता गया।
     "मंगल ! जानता है ? जब वह हंसती थी न, तो उसके गालों में डिंपल पड़ते थे यार… यू नो डिंपल... अरे भई हंसने पर या... मुस्कुराने पर जो गालों  में गढ़े पड़ते हैं न... उसे कहते हैं डिंपल... लेकिन अब वह तो हंसना भी भूल गई... अब उसके गालों में डिंपल कहां पड़ते होंगे यार... भर गए होंगे न... मंगल यार तू सुन .... वो तो यहां है नहीं न... तो तू ही सुन... वो मुस्काती होगी तो कैसी लगती होगी... अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको... कैसे फर्क नहीं पड़ता मंगल ?उसके लबों से... उसके चेहरे से... उसकी हंसी चली गई यार... तो फर्क पड़ता है न... तो अब मैं भी नहीं मुस्कुराता....अब तो खुद की मुस्काने भूल गया हूँ... जब से उसके गालों के.... गढ़ों को भरते देखा हैं...
    "सर जी आपको लग गई है...", मंगल ने एक घूट पीते हुए कहा।
   "हे !  लग गई !!  जब पी तू रहा है तो मुझे कैसे लगेगी ? देख ! मै तो नहीं पी रहा... क्या तुझे नहीं मालुम मुझे शराब नहीं चढ़ती है... अरे देवताओं का वरदान है मुझ पर... देख अब पी रहा हूं... ", मैंने गिलास खाली करते हुए कहा, "और डाल..."
    "सर जी बिना पानी मिलाए एक गिलास पहले ही पी चुके हैं... अब रहने दीजिए... ", मंगल ने बड़े ही अपनत्व से कहा।
   "अच्छा ! बिना पानी मिलाए एक गिलास पी गया !! वेरी बैड... मंगल वेरी बैड... लेकिन कब ?  यार मुझे तो कुछ याद नहीं... अच्छा चल मान लिया... पी होगी... पर थोड़ी सी और दे न... ताकि मैं सो तो सकूं यार। अच्छा बता...  क्या स्लीपिंग टैबलेट्स का नाम सुना है ? ... अरे यार वही नींद की गोली... वही समझ कर दे दे... फिर मैं सो जाऊंगा..."
       मंगल ने फिर मेरी बात नहीं काटी। बॉटल को मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला, "जितना मन हो बना लजिए..."
     मैंने कांपते हाथों से अपनी आधी गिलास भरी ... फिर मंगल से बोला, "अब थोड़ा सा पानी तो मिला दे..."", मंगल जग से पानी डालने लगा, "अरे बस... बस... रुक, देखता नहीं छलक जायेगा... छलकाए जाम... आपके नाम... आपके होंठों के नाम... मंगल देखना तुम... आज से बहुत साल बाद ... एक दिन मैं अपने उस सितारे से मिलने जाऊंगा और फिर उससे पूछूंगा... बताओ मेरे दोस्त कैसे हो.... क्या हाल-चाल है ... सब ठीक न ? ... पीहू सही कहती है ... मुझे देवदास नहीं बनना है। मैं शराब पी-पी के नहीं मर सकता। वादा है तुझसे और अपने उस प्यारे सितारे से भी..."
     एक ही सांस में जाम खाली और मैं लेट गया। कुछ देर तक मेरी आंखों में वह सितारा चमकता रहा फिर रात के स्याह अंधियारों में कही खो गया...
     मंगल ओ मंगल सुन न... सो गया क्या... एक और बना न... अरे मुझे नहीं चढ़ेगी... देवताओं का वरदान है मुझ पर.... अच्छा चल मत बना.... लेकिन... लेकिन  सुन तो...
      सोती होगी तो कैसी लगती होगी... अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको....  हां मंगल अपनी राते भूल गया हूँ..... जब से उसको प्रिय-बाहों में... रातों को जगते देखा हैं। सुना न मंगल... अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको...", मै अर्ध-बेहोशी में बड़-बड़ा रहा था...
     " ... मंगल ! ... मंगल !!.... ओ मंगल !!! चल यार एक आखिरी सुन ले फिर परेशान नहीं करूंगा। क्या वह भी जाग रही होगी ? ... कैसी लगती होगी मंगल ? मैं तो उसे देख भी नहीं सकता... वो जागी होगी तो कैसी लगती होगी... अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको... देख मंगल मैं भी सोना भूल गया हूं... क्या किस्मत है यार हम दोनों की... उधर वह जाग रही होगी... और इधर मैं ! ... तुझे मालूम है मंगल किस्मत क्या होती है ? अरे वही यार मुकद्दर, तकदीर...
     ... हां याद आया... कहती थी... हमारा मिलना तक़दीर में नहीं था... अरे नहीं था तो नहीं मिले न...  तो क्या बड़ी बात हो गई  ?  है न मंगल ? कोई बड़ी बात नहीं हुई न ?... पीहू ठीक कहती है... नहीं है जिंदगी में तो न सही... तो क्या मैं शराब पी-पी के मरू ? जीने की और भी वजह हैं...
     लेकिन फिर भी मंगल ? अपनी नींदें भूल गया हूँ... जब से उसकी तकदीरों को....गुम-सुम सोते देखा हैं... सो गई उसकी किस्मत और... मेरी भी... मैं भी सो जाता हूं... और तू भी सो जा... गुड नाइट..
    रात के गुड नाइट की मॉर्निंग मेरे लिए सुबह सात बजे हुई। रात में व्हिस्की और रम का कॉकटेल हुआ, शायद इसलिए सुबह थोड़ा सा हैंगओवर अधिक महसूस हो रहा था। बाकी नींद पूरी हुई थी, क्यूंकि मैं बेसुध सोया था। कमली खेत में काम कर रही थी किंतु मंगल आसपास कहीं नहीं दिखा। मैं बिस्तर तह करके खाट के एक किनारे रख दिया। मेरा जूता और बैग मंगल पहले से ही मड़ैया के अंदर रख चुका था।
    मैंने मटकी से एक लोटा पानी निकाला और अच्छे से मुंह-हाथ धोया।  पिछले आठ दिनों में मैं इतना जान चुका था कि यदि रात की पूरी तरह उतारनी हो या फिर हैंगओवर को दूर करना हो तो सुबह थोड़ी - सी पी लेनी चाहिए। मैंने बैग खोल के देखा, विस्की और रम की अधूरी बॉटल बैग में ही थी और शेष मंगल की कस्टडी में होगी।  सबसे पहले मैंने अपना हैंगओवर दूर किया और मढैया से बाहर आ गया। मैंने कमली को आवाज़ लगाई और उसके आने पर मंगल के बारे में पूछा।  उसने बताया कि आज सब्जी वाले सब्जी लेने के लिए नहीं आए थे। फालतू में सूख जाती तो वह गांव की दुकानों में सब्जी सप्लाई करने के लिए गया है। वह खुद सुबह गाय बछड़ों का इंतजाम और घर की साफ सफाई करके पीहू के घर से आई है।
   तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपनी साइकिल के करियर में बड़ी सी टोकरी बंधे हुए आता दिखाई दिया। लगभग 14-15 साल का एक लड़का भी उसके साथ था। कमली उसे सब्जी तौल रही थी और बच्चा कभी मेरी तरफ तो कभी कमली और उस व्यक्ति की तरफ देखता। मैंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया, "ये कौन है तुम्हारे...?"
   उसने मासूमियत से जवाब दिया, "ददा..."
   "ददा... मतलब बड़े भाई ?"
   "नहीं... बाबू जी"
   "पढ़ते नहीं हो... मतलब स्कूल नहीं जाते ?"
   इस बार उसके ददा ने जवाब दिया, "जाता था साहब, इस साल आठवीं में सप्लीमेंट्री आ गया तो स्कूल छुड़वा दिया... वैसे भी नाम मात्र को पढ़ाई होती है। जब लड़के बोर्ड परीक्षा में फेल ही हो जाते हैं तो अब आगे काहे का पढ़ना-पढ़ाना..."
   "नहीं ऐसी बात तो नहीं है कि सभी फेल हो जाते होंगे। और मान लो किसी एक दो सब्जेक्ट में कमजोर है तो ट्यूशन लगवा दो... लेकिन इस तरह पढ़ाई छुड़वाकर अपने साथ सब्जी बेचवाना तो अच्छी बात नहीं है..?", मैंने उसे समझाते हुए कहा।
   "सब हम लोग आदिवासी बस्ती में रहते हैं, वहां कोई ट्यूशन पढ़ाने वाला कहां से मिले ? स्कूल ही 10 से 4 बजे तक रहते है। फिर गांव में भी जल्दी कोई पढ़ाने के लिए तैयार नहीं होता है... कुछ गरीबी तो कुछ जाति-पाति का चक्कर...", उसके स्वर में निराशा  झलक रही थी।
   "कुछ भी हो तुम पिता हो...और इसे अच्छी एजुकेशन देना तुम्हारा फर्ज है... इसका भविष्य खराब मत करो...", मैंने फिर समझाना चाहा।
    मेरी बात सुनकर वह अपनी भाषा में कुछ बड़बडाया जिसे मैं नहीं समझ सका, लेकिन चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बात पसंद नहीं आई थी। उसके जाने के बाद मैंने कमली को कहा कि तुम ऐसा करो मेरी खाट और मेरा यह बैग पंप हाउस के पास आम के पेड़ के नीचे रख दो। मैं वही नहाऊंगा। कमली ने वैसा ही किया। लगभग एक घंटे में मैं नहा-धोकर फुर्सत हुआ और बैग से एक मात्र साफ-सुथरे कत्थई कलर के पेंट और सफेद कलर की टी-शर्ट को पहनने के लिए निकाला। विस्की बॉटल में अभी भी एक चौथाई से कुछ अधिक थी मैने नीट ही दो घूट और ली, अब दुनिया पूरी तरह दिखने लगी। मैने कपड़े पहने और कल की तरह ही परफ्यूम डाला, तभी मंगल और पीहू को एक साथ आते हुए गेट पर देखा। मैं जब तक जूते पहनता दोनों पास आ गये।
     "गुड मार्निंग ...", पीहू ने पास आते हुए कहा। 
     "मॉर्निंग जी, कैसी हैं आप ?", मैंने कुछ मुस्कुराते हुए पूछा। 
      "फाइन... आज बड़े हीरो लग रहे हो क्या बात है, किसी से मिलने जाना है...?"", उसने जवाब के शरारत भी की।
   "नहीं मिलने तो नहीं जाना है, पर जनता था कोई खास शख्स मिलने आएगा इसलिए कुछ ढंग के कपड़े पहन लिए..."
   "अरे वाह ! सुबह-सुबह फ्लर्टिंग...?", उसने हंसते हुए कहा।
   "यही समझ लो वैसे इस तरफ कैसे आना हुआ...?", मैंने उसी तरह हंसते हुए पूछा।
   "कैसे आना हुआ !!  मतलब ? यह मेरी बगिया है... क्या नहीं आ सकती...?"
   "बिल्कुल आ सकती हो... सत्य नही है...?", मैने फिर पूछा।
   "वो सुबह छ: बजे आ के तुम्हे देख गया, सो रहे थे... इसलिए डिस्टर्ब नहीं किया... "
   "अच्छा ! और अब कहां है ?"
   "कल बताया था न कि घर के पास की नौकरी अच्छी भी और बुरी भी... अभी कुछ देर पहले एक ट्रक वाला मैसेज ले कर आया था कि मेजमेंट ने तुरंत बुलाया है... कोई ह्यूमन राइट्स का इशू है... जल्दी-जल्दी नाश्ता किया और चला गया... ", पीहू उचक्कर चहरी की दीवार में बैठी हुई बोली।
   "और बाबा तो होंगे न ...."
   "हां है, वो बेचारे कहां जाएंगे !... अभी जाऊंगी तो खाना बनाऊंगी ... तीन लोगों के खाना बनाने में कितना टाइम लगता है ... मुश्किल से आधा-पौन घंटा... अभी तो नौ भी नहीं बजे होंगे... जाऊंगी तो बनाऊंगी और गरमा-गरम खिलाऊंगी..."
   "मतलब आज मुझे खाने-पीने की व्यवस्था यही करनी पड़ेगी...", मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा। 
    "क्यों ? क्यों करनी पड़गी ! ", उसने आश्चर्य से पूछा था। 
   "अभी तो कहा न कि तीन लोगों के खाना बनाने में कितना टाइम लगता है... मैं तो चौथा हूँ...", मैंने हंसते हुए कहा। 
   "अरे! मैने तो और दिनों के परिपेक्ष में कहा था...", उसने भी हंसते हुए कहा।
   "परिपेक्ष !... वाह कितनी शुद्ध हिंदी !!... इसी खुशी में कंद-मूल-फल तो खिलाओ मंगल इन्हें...?"
   "अरे हां मंगल चाचा, सलाद के लिए गाजर, मूली, शलजम, हरी मिर्च, धनिया की पत्ती तोड़ देना, घर में खत्म हैं...", उसने याद करते हुए कहा।
    मंगल चला गया। मंगल के जाने के बाद उसने मुझसे कहा, "मंगल चाचा बता रहा थे कि कल आप नशे में बहुत रात तक बड़बड़ाते रहे, अपनी पोयम को पढ़ते रहे और हां किसी लड़की का भी जिक्र कर रहे थे .."
  "मै ? हो सकता है। यदि मंगल कह रहा होगा तो झूठ थोड़ी कह रहा होगा... लेकिन मैं किस लड़की का जिक्र कर रहा था ? मुझे तो याद नहीं... ", मेरे हृदय की धड़कने बढ़ गई।
   "अपने कोई नाम तो नहीं लिया, लेकिन उससे कह रहे थे, मंगल यहां मैं जाग रहा हूँ... वहां वह जाग रही होगी... वह हंसती थी तो उसके गालों में डिंपल पड़ते थे... हमारा मिलना किस्मत में नहीं था... पीहू ठीक कहती है, मुझे शराब पी-पी के नहीं मरना है... और भी बहुत कुछ बताया उसने... कौन है वह लड़की क्या नाम है उसका...", उसने मेरे चेहरे पर अपनी नजरें गढ़ाते हुए पूछा। 
   "ओह तो ये बात है...", मैंने मन ही मन अपने आप को धन्यवाद दिया कि नशे में होने के बाद भी मेरी जुबान पर उसका नाम नहीं आया। अब मुझे फटाफट कोई कहानी बनानी थी क्योंकि जो सामने बैठी है... वह कोई बेवकूफ और नासमझ लड़की नहीं है। यदि मुझे इसे विश्वास दिलाना है तो बात अंत में सिद्ध होनी चाहिए अर्थात प्रमाणित होनी चाहिए। 
     मैंने उससे कहना शुरू किया, "यदि ऐसे ही बोलूंगा तो कहोगी कि झूठ बोल रहा हूं, मानती हो न कि पीने के बाद इंसान झूठ नहीं बोलता ? देखो थोड़ा सा रात का स्ट्रेच भी है और थोड़ा सा हैंगओवर भी है। तो इजाजत हो तो मैं एक दो घूंट ले लेता हूं और फिर समझाता हूं ...", मैंने उसके हां या न बोलने से पहले ही जल्दी दो घूट लिए, दिमाग की बत्ती तुरंत जली। 
   "देखो ज्यादा नहीं ! क्या कहा था कल ? दिन को नहीं न...", वह मुझे डांटते हुए बोली, "अब बताओ क्या सफाई देनी है..."
    "सफाई !!! क्या मैं किसी कटघरे में खड़ा हूँ या फिर मैंने कोई जुर्म किया है कि सफाई दूं ... तुम कुछ इस तरह समझो यदि नशे में मैं तुम्हारा नाम ले सकता हूं तो यदि कोई लड़की होती तो क्या उसका नाम मेरी जुबान पर नहीं आता ? आता न ? इसलिए नहीं आया कि कोई लड़की है ही नहीं ... कल देवदास मूवी के सीन को जब मैं एक्ट करने वाला था तब तुमने कहा था न कि तुम्हे यह पसंद नहीं है... कोई किसी के लिए शराब पी-पी कर मर जाए, अच्छी बात नहीं है... तो एक्चुअली में कल मैं कैरेक्टर में ज्यादा घुस गया था, बहार निकल ही नहीं पाया... और रही कविता की बात, तो तुम्हारी और सत्य की परफॉर्मेंस जबरदस्त थी, मेरी कविता के शब्दों को इतना अच्छा एक्सप्रेशन और इमोशन दिया तुम दोनों ने कि मैं काफी प्रभावित था। ये सब घटनाएं सबकॉसियस माइंड में बैठ गई, और रिफ्लेक्ट हुई..."
      उसके चेहरे की प्रतिक्रिया देखने के लिए मैं रुक गया। वह विश्वास और अविश्वास के झूले में झूल रही थी। उसके दिमाग में मैं शंका के बीज बो चुका था, अब उसे हवा-पानी और धूप देने की जरूरत थी। मैंने आगे कहना शुरू किया, "अच्छा एक बात और... सबकॉसियस माइंड से वही बात या घटना रिफ्लेक्ट हो सकती है जो मनुष्य के जीवन में कम से कम एक बार अवश्य हुई हो। मेरे सबकॉसियस माइंड को आपका नाम मालूम था तो आपका नाम रिफ्लेक्ट हुआ, क्योंकि मैं आपको जानता हूं और उस लड़के-लड़की को नहीं जिसकी कहानी कल सुनाई थी, दिमाग को सिर्फ कहानी पता थी, नाम नहीं। क्योंकि मेरे वास्तविक जीवन से उसका कोई संबंध है ही नहीं। इसलिए मेरे सबकॉसियस माइंड ने  मंगल को पोयम से कनेक्टेड कहानी तो सुनाई लेकिन नाम नहीं लिया...  दिमाग को मालूम ही नहीं था... जस्ट सिंपल यार...  इटस साइंटिफिक फेक्ट..", मैं फिर रुका यह देखने के लिए कि फसल अच्छी हुई है कि नहीं।
  उसने खोए-खोए स्वर में कहा, "हां... यही हुआ होगा... !!"
    मैंने उसे फिर टोका, "हुआ होगा नहीं ... हुआ है, प्लीज करेक्ट इट..."
   तभी मंगल एक छोटे से झोले में सभी सामान लेकर हाजिर हुआ, "ले जाएंगी कि मैं पहुंचा दूं..?"
    झोला खोलकर देखते हुए उसने मंगल से कहा, "मिर्ची है न..."
   "हां है... क्यों ?", मंगल ने पूछा था। 
   "तुम्हारे सर जी को खिलानी है.... बहुत सुग्गा जैसे बोलने लगे है... और झूठ भी...", फिर उसने मुझसे पूछा, "कैरेट खाओगे..."
    "जी बिल्कुल..."
    उसने चार कैरेट निकाल के अपने हाथ में लेते हुए मंगल से कहा, "लो इस झोले को सर जी के बैग में ही एडजेस्ट करके डाल दो..."
   मंगल ने जैसे ही झोला खोला तो मुझे अचानक याद आया, "यार मगल कपड़े धोने वाली साबुन है क्या ? मेरे सभी कपड़े गंदे हो गए हैं सिर्फ एक जोड़ी यही बचा था, जो पहन रखे हैं... न हो तो कल वाले पैसे जो बचे होंगे उसी से लेते आना..."
     "मंगल चाचा तुम कपड़े बैग में ही रहने दो... वही घर में धूल जाएंगे ...", वह मेरे पास आते हुए बोली, "अब चले...?", और उसने मंगल के हाथ से बैग ले लिया और मुझे मेरे हिस्से की दो गाजर पकड़ा दीं।
    इस बीच मंगल ने मुझसे कहा, "सर जी, यहां के लोगों को ज्यादा बातें मत समझाइए, वो नहीं समझ पाएंगे..."
  मैंने आश्चर्य से पूछा, "किसकी बात कर रह हो...?"
   "अरे उसी आदमी की जो सुबह अपने लड़के के साथ सब्जी लेने आया था...?"
   इस बार पीहू ने पूछा, "क्या बात है मंगल चाचा ?"
   फिर मंगल ने विस्तार से सभी बातें बताई अंत में बोला, "जानते है वो आपको क्या सुना के गया है...?"
   "हां कुछ अजीब-सा कुछ कह रहा था लेकिन मुझे समझ में नहीं आया... तुम ही बता दो...?
   मंगल ने कुछ मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "उसके कहने का अर्थ था कि सभी लोग बड़ी-बड़ी बातें कहने के लिए हैं, करता कोई कुछ नहीं है... निठल्ले कहीं के..."
  पीहू ने कुछ गुस्से से कहा, "मंगल चाचा कल से उसे सब्जी देना बंद कर दो..."
   "नहीं मंगल...", मैंने उसे समझाते हुए कहा, "ऐसा मत करना। और पीहू जरा तुम ही सोचो... क्या उसने सचमुच कुछ गलत कहा है ? नहीं न ? कौन पिता चाहेगा कि उसका बच्चा आगे न पढ़े, लेकिन यहां का परिवेश, साधन का अभाव, गरीबी और पहले से चली आ रही अशिक्षा ही जिम्मेदार है। जब तक इस चक्र को नहीं तोड़ा जाएगा तो यह चलता ही रहेगा... अब चलो घर तरफ चलते हैं, कुछ ब्रेकफास्ट वगैरह करवाना है कि नहीं...?"
    मंगल हम लोगों को गेट तक छोड़कर वापस बगिया में चला गया। कुछ दूर चलने के बाद उसने मुझसे कहा, "कल कहा था न कि दिन में नहीं पीना है तो फिर क्यूं पी... अब  उसका भी कोई साइंटिफिक रीज़न है...?"
   "अरे यार तुम सवाल भी खुद ही करती हो और जवाब भी खुद ही दे देती हो...", मैंने गाजर चबाते हुए कहा, "बिल्कुल साइंटिफिक रीजन होगा... लेकिन वो मुझे नहीं मलूम। जस्ट प्रैक्टिकल की बात बता रहा हूँ, यह मान लो कि पिछले सात-आठ दिन का अनुभव है।जब रात को थोड़ा सा ज्यादा हो जाए तो सुबह थोड़ी सी ले लेना चाहिए... रात का नशा उतर जाता है.... यदि तुम्हें भी ज्यादा हो गई हो तो तुम भी..."
     "नहीं मुझे कोई ज्यादा नहीं हुई, लगता है कि मैं तुम्हारे साथ दो-चार दिन और रही न तो मैं भी शराबी बन जऊंगी...", उसने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए मेरी तरफ देखा।
     "शराबी नहीं शराबिनी ... प्लीज करेक्ट इट..."
     वह जोर से हंसते हुए बोली, "हा वही, लेकिन अभी तक तुमने मुझसे माफी नहीं मांगी...", 
     "माफी ? वह क्यों मांगू...?"
     "तुम्हें समझ में नहीं आता कि मैं तुमसे नाराज हूँ, कैसे बॉयफ्रेंड हो...", उसने दूसरी तरफ मुंह फेरते हुए कहा। 
    "अच्छा... अच्छा... अब समझा !! सुबह दो घूट पी ली, इसलिए नाराज हो... अरे जी, बॉयफ्रेंड नासमझ होते ही हैं, उनमें हसबैंड जैसी समझ कहां...? अब क्योंकि मुझे समझ में आ गया है तो लो... आई एम रियली... रियली... स्ट्रीमली सॉरी...", मैंने अपना एक हाथ दिल पर रखते हुए और दूसरे हाथ से कान पकड़ते हुए कहा। 
   "अच्छा एक बात बताओ क्या सच में तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है... या थी ?", उसने फिर मेरे चेहरे पर अपनी नजर रखते हुए पूछा। 
    "दूर...दूर... तक नहीं है जी... एक तुम ही बनी हो... हे भगवान कोई नजर न लगाए ", मैंने उसके सर की बलाए ली फिर असमान की तरफ चुटकी बजा दी, "छू..."
   "बलाए ले रहे हो या भूत भगा रहे हो... और मेरा मतलब उस टाइप की गर्लफ्रेंड से था...", उसने मुझे समझाने की कोशिश करते हुए कहा।
   "उस टाइप मतलब प्रेमिका... ? यार तुम यह बताओ तुम मेरे और मेरी कभी होने वाली प्रेमिका के पीछे क्यों पड़ी हो... कभी सत्य से भी पूछा था...?"
    "हां पूछा था... सच में, और उसने मुझे बताया भी... उसकी एक गर्लफ्रेंड थी, कॉलेज में ... थैंक गॉड उसने उसे डंप कर दिया...", हंसते हुए वह मुझसे बोली।
   "बेचारा डंप हो गया था और तुम्हें खुशी हो रही है... वेरी बैड थिंकिंग...", मैंने सीरियस होने का नाटक करते हुए कहा।
    "हां सही मे.... अब जरा तुम ही सोचो यदि उसने सत्य को डंप नहीं किया होता तो वह मुझसे कैसे मिलता ?  मुझे क्यों चाहता ?", उसने फिर मुझे घूरते हुए कहा।
    "हां यार... तुम कह तो ठीक ही रही हो... प्वाइंट तो है...", मैंने उससे सहमत होते हुए आगे कहा, "अच्छा तो इसीलिए तुम्हें लग है कि मेरी भी कोई गर्लफ्रेंड रही होगी जिसने मुझे डंप कर दिया और उसकी बेवफ़ाई में मैं शराबी बन गया...?"
    "हो सकता है, और नहीं भी। लेकिन तुम अच्छे हो, तुम्हें भला कौन डंप करेगा...!", उसने आत्मविश्वास से कहा।
     "अच्छा !! तो सत्य अच्छा नहीं है ? ..."
      "मैने कब कहा...?"
      "मतलब सत्य अच्छा है फिर भी उसे डंप किया गया ? मेरी सुनो तो अच्छे लोगों की किस्मत एक जैसी ही होती है, हो सकता है कल को मेरी कोई गर्लफ्रेंड हो मतलब प्रेमिका वाली और फिर वह मुझे छोड़ दे..."
   "नहीं करेगी... लगा लो शर्त... ", उसने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया था और मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अभी नहीं... वह देखो सामने वहां इस हाथ की जरूरत पड़ेगी... "
    उसने मेरे साथ सामने देखा, क्योंकि फसल की कटाई चल रही थी तो रास्ते में किसी ने फसल के कई गट्ठे रख दिए। चूंकि रास्ता अवरुद्ध हो गया था और आगे निकलने ने लिए खेत के अंदर से घुस के जाना पड़ेगा। अचानक पता नहीं उसे क्या सूझा, उसी महुआ के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा, "ये चलो न वहां कुछ देर बैठते हैं, क्या करेंगे इतनी जल्दी घर जा के...?"
   "यू मीन पोएट्री ट्री के नीचे...?", मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
   उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "पोएट्री ट्री ! मतलब...?"
   मैं उसी तरह हंसते हुए कहा, "जब से तुमने बताया कि... महुआ से शराब बनती है... तो उस पेड़ के नीचे बैठने से डर लगने लगा... यदि बैठा तो बिना पिए नशा होने लगेगा, और फिर मेरे मुख से शायरी, कविताएं, फिलासफी यही सब निकलेंगी और तुम बोर हो जाओगी...?"
   वह कुछ चहकते हुए बोली, "अरे यार, तो फिर चलो देर किस बात की... यह समझ लो मैं बोर होना चाहती हूँ..."
   फिर उसने मेरा हाथ पकड़ कर कुछ जबरदस्ती अपनी तरफ खींच लिया, "लेकिन चलते-चलते वह तो सुना दो जिसके लिए रात को सत्य बोल रहा था...?"
   "जो उसे ज्ञान के घर में सुनाया था...?"
   "हां, वही..."
   "तो सुनो, वो कोई पोएट्री नहीं जीवन की फिलॉसफी है। उसे पास्ट टेंस में सुनाई थी तुम्हें प्रेजेंट टेंस में सुनाता हूँ... 
   यह सफर है रूह से रूह का,
   जिस्म तो फ़कत एक बहाना है।
   सुरमई नदियों का बहते बहते, 
   एकदिन सागर में मिल जाना है।
मेरी कविता खत्म होते ही महुए का पेड़ आ गया। उसने तारीफ करते हुए कहा, "वाह ! देखा पोएट्री ट्री का कमाल... पास्ट से सीधे प्रेजेंट टेंस से मिला दिया...?"
  हम उसी जगह पर बैठ गए जहां कल शाम को बैठे थे। उसने बैठते हुए कहा, "तो चलो अब करो बोर मुझे...?"
   "लाओ बैग दो मुझे...", मैंने बैग अपनी तरफ खींच कर उसे खोला। अंदर एक चोर पार्टीशन था। उसमें कागज के छोटे-छोटे बहुत से टुकड़े रखे हुए थे। उन्हें निकलते हुए मैंने कहा, "पीहू पिछले कुछ दिनों से जो भी मन में आता था, तो ऐसे ही कागज के टुकड़ों में लिख लेता था। उन्हें अब एक जगह कलेक्ट करके लिखना है। पहले तुम्हे पढ़ कर सुनाता हूँ, फिर कुछ सुधार करना है। तुम हेल्प करोगी ?
    "वाह ! पहले मुझे सुनाओ जब लिखेंगे तो उसे जहां पर जरूरत होगी सुधार लेंगे...", उसने अपनी सहमत देते हुए मुझसे कहा..."
     "हां तो सुनो..", मैंने कागज का एक टुकड़ा खोलते हुए कहा।

  राधा-सी प्रीत तुम्हारी, 
  मैं भी मोहन सा तरसा हूँ।
  कदंब डाल के झूलों में, 
  मैं भी तेरे साथ का झूला हूँ।
  तुम हो मेरी प्रीत तपस्विनी, 
  मैं भी देवों-सी किस्मत लाया हूँ।

    उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "माय गॉड ! क्लासिकल यार... अभी तक कहां छुपा के रखी थी..."
   "अभी तुम सुनो बाद में बताऊंगा...", मैंने दूसरी पर्ची खोलते हुए कहा।

उठती देख घटाओं को, 
   जब मन मयूर नाचा होगा। 
गहरी काली अंखियों में, 
   तब सावन भी घिर आता होगा। 
जड़ों में कंपित शरीर तुम्हारा, 
   जब कामाग्नि में जलता होगा। 
नर्म मुलायम बिस्तर में भी,
   हृदय संताप तो सहता होगा। 
सुदूर गांव की अमराई में, 
   जब प्यारी कोयल जागी होगी। 
कोयल की हर कूक हृदय में,
   हृदय हूक बन चुभती होगी। 
जब विरह अग्नि में तुम जलती होगी, 
   शीतल पुरवाई तब भी तो चलती होगी। 
हो कर भी ना होगी तुम उसकी, 
   हर मौसम, मैं साथ लिए जो फिरता हूं।

    "सो नाइस, सो क्लासिकल यार ! सचमुच तुम्हारी हैं...", उसने मुझे अविश्वास से देखते हुए पूछा 
    "लिखी मैंने है, लेकिन मेरी नहीं हैं...", मैने कहा।
   "मतलब... मैं समझी नहीं...", उसने उसी आश्चर्य से पूछा।
   "बताऊंगा पहले कुछ और सुना लो... फिर तुम से कुछ पूछूंगा भी.…", मैंने तीसरी पर्ची खोलते हुए कहा।

साहिलों पर आकर मौजे,
किसे चूमती है? 
दरिया कोई खुद-ब-खुद, 
अपनी प्यास, क्यूं बुझाता नहीं ? 
   ये जो प्यासे हैं दरिया, 
   ये जो प्यासी है मौजे, 
   ये जो प्यासे हैं लब,
   किसके लिए ? 
   आंगे बढ़ कोई समुंदर क्यूं,
   इनकी प्यास बुझाता नहीं ?
 गर निकलता अपनी मंजिल की तलाश में,
 तो अपनी दास्तां वही लिखता मेरे दोस्त ।
 पर यह तो है तुम्हारी यादों का सफर। 
 मिलते हैं मील के पत्थर। 
 उन्हीं पत्थरों पर,
 दो दिलों के निशां छोड़ता हूं। 
    जो कभी गुजरो किसी मंजिल की तलाश में, 
    हां तब तुम्हें ये निशां मेरी याद दिलाएंगे। 
    हमारी वफा, हमारी बेवफाई की, 
    दास्तां तुमको सुनाएंगे। 
रहेंगे जब तक ये मोहब्बत के रास्ते, 
चलते रहेंगे राही, गुजरते रहेंगे मुसाफिर। 
अपने सीने पर लिए निशां, 
मील के पत्थर तब भी यही रहेंगे।

जो काजल बह आया अखिओं से,
कोई भग्न हृदय या स्वप्न उदास।
दिनकर भी उलझा है विधु से,
ले अलको में नवीन सुप्रभात ।
सृष्टि नियम बंधे हैं शायद तुमसे,
जो जगी हो, अबतक प्रिय के साथ।
या फिर जागे बीते स्वप्न हृदय के,
ले पूरा होने का सकल्प तुम्हारे साथ।

मुकम्मल होती जिंदगी तो,
  मुकम्मल होती प्यार की यह दास्तां।
मुकम्मल होती वजह तो, 
  मुकम्मल होती हमारी राहें जुदा। 
किंतु ऐसा हो न सका, 
ये मेरे हमदम ! ये मेरे दोस्त।
है अधूरी-सी जिंदगी, 
अधूरी दिल की दास्तां।
गुजरते हैं इस दिल से, 
बस यादों के कारवां।।

मंगल गीतों के बीच तुम्हे, 
खुद को आंसू पीते देखा था  
बेजान समुंदर की लहरों में, 
तूफानों को उठते देखा था। 

आबाद महफिलों में छोड़ तुम्हें, 
जब मैं आगे बढ़ आया था।
कर अनसुनी पुकार तुम्हारी, 
तब खुद मैं भी तो रोया था। 
प्रेम पथिक का दोषी बन,
अब तुम्हें अलविदा मैं कहता हूं।

शशि रस हो तुम इस जीवन की, 
देवालय की पावन प्रांजली मूरत-सी।
उपल हृदय कैसे बन सकती तुम, 
नित्य यामिनी की तुम मेरी सहचर।

मेरी नादां बचकानी हरकत पर, 
जब खुद तुम आहत होती थी। 
चुनरी से ढक सर अपना तब, 
ईश्वर से क्षमा याचना जो करती थी। 
नयन मूंद, भूल सब एक पल को, 
ना जाने क्या-क्या बातें करती थी।
कही अनकही उन बातों को अब मैं,
अपनी कविता से सजदे करता हूँ।

निपुणता से जीते इस जीवन में, 
नादानी के उन एक-एक लम्हों को, 
तुम अपने जीवन में तरसी होगी। 
यादों के झिलमिल आंगन में, 
रख सर तुलसी के उस पौधे को, 
क्या फिर तुम सजदा करती होगी? 
तुम्हारी इस नादां हरकत को, 
अब मैं अपनी यादों में जीता हूं।।

जीवन पथ पर चलते चलते, 
जब तुम थक-सी जाती होगी। 
अपनों की ही कुछ बातें जब, 
तुमको चुभ-सी जाती होंगी। 
कर बीती बातों को याद तुम, 
मुझसे ही तो बातें करती होगी। 
नयन मूंद कांधे पर रख सर, 
मेरे संग-संग तुम भी तो रोती होगी। 

दिनभर जलता सूरज अब भी, 
पश्चिम में धीरे-धीरे ढलता होगा।
आजाद परिंदों के झंडों का, 
वापस घर को जाना होता होगा। 
अरुण लालिमा ले इन गालों से,
शामें कुछ ऐसे ही तो ढलती होंगी।
पर अदम्य प्यास भर आंखों में अब, 
तुम किसका रास्ता देखा करती होगी।
चातक-सी अंखियों में प्यास लिए मैं, 
अब स्वाति नक्षत्र को खोजा करता हूं।

तुमको भी अखरा होगा, 
इस जीवन का यह सूनापन। 
जिन कोनों से छुपकर तुमने, 
चुपके-चुपके मुझको देखा होगा। 
जानी पहचानी आहट के, 
बंद तिजोरी का वह खालीपन, 
अनजानी-सी आहट पाकर भी, 
जब तुमने दरवाजा खोला होगा। 
हर हिचकी याद दिलाती होगी, 
जब तुम्हें याद मैं करता हूं।

अखियां तो भर आती होंगी, 
जब मुझे इग्नोर तुम करती होगी। 
मेरी मायूसी भी याद आती होगी, 
जब बिंदास हंसी तुम हंसती होगी। 
आह! मेरी मोहब्बत कैसे भूली होगी, 
जब उसे माय लव तुम लिखती होगी।
दे दिलासा अपनी मजबूरी का जब,
दोहरा जीवन तुम जीती होगी।

    "अरे वाह ! हिंदी के साथ अंग्रेजी शब्दों का भी मिक्सअप... बढ़िया, बेहतरीन... सॉरी, आगे सुनाओ...अब नहीं टोंकूंगी...", उसने कहा।
   "नहीं... ऐसी कोई बात नहीं। तुम जब चाहो रोक सकती हो, कोई सजेशन देना चाहो तो दे सकतो हो... इसीलिए तो तुम्हें सुना रहा हूँ कि तुम इसे और बेहतर बनाने में मेरी मदद करो..."

ना जाने कितने सपने टूटे होंगे, 
ना जाने कितने अरमाँ रुठे होंगे। 
तुम गुजर गई, मैं बीत गया, 
जब जब तुमने यह सोचा होगा।
मेरी जान, जान पर जान बन आती होगी, 
जब मेरी जान उसे तुम कहती होगी।
मजबूर हालातों की सूली पर चढ़, 
सारी वफाएं हम पर ही तो हंसती होंगी।
उन मरहूम वफाओं का मातम, 
अब अपने गीतों में मैं गाता हूं।

त्याग समर्पण का यह जीवन, 
जब एक पल को तुम ठहरी होगी। 
निकट नीर निधि के रहकर भी जब, 
सुधा बूंद एक जीवन को तरसी होगी।
अनंत पथ पर मौन खड़ी तुम,
हृदय निस्वास, अव्यक्त वेदना बरसी होगी।
मैं भी विचलित जीवन पथ पर,
जब अश्रु बिंदु बन बह निकली होगी।
विभूषित आलोकित जीवन पथ पर,
सिसकी बन तुम्हारी, मैं भी रोया करता हूं।

दूर कहीं रह कर भी जब तुम, 
मेरे गीतों को सुनती होगी। 
चिर शांत हृदय सागर में भी, 
जज्बातों की लहरें तो उठती होंगी। 
भीड़ भरी दुनिया से दूर कहीं, 
तन्हाई के एक-एक पल को, 
तुम भी तो खोजा करती होगी। 
ढलती शामों को कर याद, 
निज एकांत के उन लम्हों में, 
एक पल को तुम भी तो रोती होगी।
बेचैन उदासी के उन लम्हों को, 
अब मैं अपनी कविता में लिखता हूं।

गुजरे जीवन के एक-एक पल को, 
जब खुद के अंदर तुम जीती होगी।
ले पुलकित प्रफुल्लित इस मन को,
संतृप्त हृदय कोठरी जा तुम बैठी होगी।
इस एकाकी जीवन के सुने पल में,
तुम मुझको अपना सहचर पाती होगी।
निर्मोही मन के इस अप्रिय प्रीतम को,
तब तुम जी भर के देखा करती होगी।

मिले तुम्हे मुक्कमल जहां, मेरे बगैर भी।
मिले तुम्हे मुक्कमल खुशी, मेरे बगैर भी।
  कभी तुम मुझे खोजना,
  अपनी मुकद्दस दुआओं में,
  तो कभी मैं खोजता फिरुगा,
  तुम्हें यूं ही चलते-चलते,
  इन्ही  वीरां रास्तों में।
कभी जज़्ब होंगे जो आंसू,
तुम्हारी निगाहों में,
तब रोएगा यह आसमा भी,
बन सावन की घटाओं में। 
   जब कभी उठेगी कोई बेचैनी,
   तुम्हारे दिल के किसी कोने में।
   जब खुलेगी कोई,
   बंद तिजोरी यादों की।
  जब कभी बहेगी कोई पुरवाई,
  फिर बिना किसी मौसम के।
  जब कोई सिहरन सी उठेगी,
  तुम्हारे बदन में।
  हां तब तुम समझना,
  मैं तुम्हारे दामन को छूकर,
  बस गुजर गया।
जब तुम्हें शिकायत होगी
इस जमाने से,
जब कभी रुसवा होंगे
तुम्हारे जज्बात भरी महफ़िल में।
जब तुम्हारे कदम रुक जाए
चलते-चलते कुछ डगमगाए से।
हां तब तुम समझना,
मैं तुम्हारा दामन पकड़ कर वहीं खड़ा हूँ...

   जब सारी पर्चियां खत्म हो गई, मैं चुप हो गया। कुछ देर तक खामोश रहा तो उसने स्वयं पूछा, "यह क्या है यार ? यह तो पूरी कहानी-सी लगती है... इतना सब कुछ कब सोच लिया, कल ?"
    "नहीं, अभी नहीं। तुमसे झूठ क्यों बोलूं ? कुछ दिनों से सोच रहा था, अभी जब ज्ञान के साथ एक शहर से दूसरे शहर घूम रहा था... वो क्या हैं न कल जिन कविताओं में तुमने और सत्य ने एक्ट किया और जो कहानी बैकग्राउंड के लिए समझाई थी, उसे ही तुमसे लिखवाने की सोच रहा हूँ, उसी में इन्हें यूज़ करना है। लंबी है... लेकिन तुम लिख सकती हो..."
   "हां बिल्कुल...", वह पूरे उत्साह के साथ बोली, "तुम बोलते जाना मैं लिखती जाऊंगी... मैं बहुत फास्ट लिखती हूँ...?"
   उसके इस बचपने पर मुझे हंसी आ गई, "नहीं मेरा मतलब यह नहीं है, मैं तो चाहता हूँ, मैं तुम्हें कहानी की थीम्स और उसके बारे में कुछ बातें बता दूं और फिर तुम स्वयं लिखो इन पोएम्स को छोड़कर बाकी शब्द तुम्हारे होंगे समझ लो एक नॉवेल लिखनी है..."
   वह चकित-सी मेरी तरफ देख के बोली, "मैं लिखूंगी !! अरे यार आज तक एक छोटी सी कहानी नहीं लिखी और तुम सीधे नॉवेल लिखवाने वाले हो मुझसे... मैं तो समझी कि महर्षि व्यास तुम हो और मुझे सिर्फ गणेश जी का रोल प्ले करना है..."
   उसकी बात सुनकर मैं फिर मुस्कुराया, "इसमें तुम्हारा फायदा भी है...?"
    "मुझे पैसे दोगे.... कितने...?", वह तपाक से बोली।    "जितने तुम चाहो... मैं तो दूसरे फायदे की बात कर रह था..."
   "मैं भी मजाक कर रह थी... हां तो दूसरा फायदा क्या होगा मुझे...?"
    यह कहानी फर्स्ट पर्सन में लिखनी है, मतलब जैसे मान लो एक लड़का एक लड़की से मोहब्बत करता है और वह अपनी कहानी अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। अपनी फिलिंग्स के साथ-साथ उसे उस लड़की की फिलिंग्स को भी प्रस्तुत करना है... जैसे कोई अपनी आत्मकथा लिखता है, उसी स्टाइल में उसे अपने प्यार की कहानी लिखनी है... हां तो मैं बात कर रहा था फायदे की, अब जरा सोचो एक लड़के की फिलिंग्स को लिखना है और लिखने वाला कौन है, एक लड़की ? तो फिर उसे एक लड़के की फिलिंग्स को रिप्रेजेंट करने के लिए एक लड़का न बनना पड़ेगा ? एक लड़का क्या सोचता है प्यार के बारे में, कैसे रिएक्ट करता है, अपनी प्रेमिका के बारे में क्या-क्या धारणाएं बनता है, प्रेम उसके लिए क्या है। इन सभी एहसासों को जीना पड़ेगा। यानी जब तुम कलम उठाओगी तो फिर तुम तुम न रहोगी..."
   "ओ माई गॉड... इतना सब कुछ करना पड़ेगा..? मेरे अकेले की बस की बात नहीं है, यदि तुम साथ रहो तो मिलजुल कर प्रयास कर सकते हैं। यह तो सचमुच बहुत ही फैंटास्टिक स्टोरी होगी... लेकिन यदि उसमें यूज़ होने वाली कविताएं इतनी डीप हैं, तो टेलिंग स्टाइल भी उतना ही सेंसिटिव होना चाहिए न... क्या मैं कर पाऊंगी...?"
   "क्यूं नहीं... तुम हनुमान जी हो जो कभी स्वयं अपनी ताकत नहीं पहचानते थे... लेकिन तुम चिंता मत करो मैं जामवंत बनाकर तुम्हें याद दिलाऊंगा...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहां, "मजाक नहीं कर रहा..."
   "मैं समझ रही हूँ.... वैसे कहानी का कोई नाम सोचा है...?", उसने गहरी नजरों से देखते हुए कहा था।
   "हां... माइलस्टोन...", मैने मुस्कुराते हुए कहा।  
   "माइलस्टोन... यह कैसा नाम हुआ...?"
   "कहा नं, यह सफर है रूह से रूह का... और जब सफर होगा तो माइलस्टोन तो मिलेंगे ही। जब दो प्यार करने वाले मिले, पहला माइलस्टोन। हंसे, मुस्कुराए एकदूसरे को समझा, दूसरा माइलस्टोन। प्यार की राहों में बढ़ते हुए सपने सजाए, तीसरा मइलस्टोन। फिर सपने टूटे, जुदा हुए, चौथा माइलस्टोन। यहां तक तो सब साझे के माइलस्टोन थे। जब रहे जुदा हुई तो दोनों के अपने-अपने मइलस्टोन... यानी जब तक यह जीवन है, तब तक न जाने कितनी यादों के माइलस्टोन हैं मिलेंगे..."
   वह कुछ देर तक मुझे आपलक देखती रही, फिर संगीदगी से बोली, "तुम्हारी यह कविताएं सुनकर मुझे तुम्हारे स्तर के बारे में मालूम पड़ा... इस उम्र में इतनी गहरी सोच और उसके प्रेजेंटेशन की इतनी अच्छी शैली। ईश्वर से और कितने वरदान मिले हैं तुम्हे ? अब ज्यादा तारीफ करूंगी तो सोचोगे मैं झूठी हूँ, इसलिए अब नहीं करूंगी... लेकिन इतना कहती हूँ... अब जाना की मुझे तुम्हारा इंतजार क्यों था..."
   उसकी बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, "मेरा इंतजार था... यह तुम क्या कह रही हो... देखो अब मैं कुछ नहीं समझा...?"
   "वो बाद में... पहले एक बात पूछती हूँ... बुरा तो नहीं मानोगे...", उसके चेहरे में कुछ संकोच झलक रहा था। 
    "नहीं... तुम पूछ लेना... लेकिन पहले ये सुनो... और चाहूंगा कि थोड़ा-सा ध्यान से सुनो..., मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
    "ठीक है सुनाओ...", उसने भी मुस्कुराते हुए कहा।

चिर वियोगिनी प्रीत तुम्हारी,
प्रेम योगेश्वर क्षणभंगुर काया,
कल्प वृक्ष, चिर शांत हृदय,
स्थिर मन की विस्तृत छाया।
अस्तांचल में अस्त सूर्य से,
ले रश्मि किरण बन मृदुल चांदनी,
निशा पथिक सुने अंबर में,
विचलित अब कुछ शरमाया।
तुम अलसाई जब प्रिय बाहों में, 
डूब नेत्र-नीर मैं अकुलाया।
प्रिय बाहों में अब छोड़ तुम्हें, 
विधु संग आगे बढ़ जाता हूं।

   "कविता तो अच्छी है, और सच पूछो तो बहुत अच्छी लगी मुझे... लेकिन मुझे क्यों सुनाई...?", उसने कुछ आश्चर्य जताते हुए पूछा, "कहना क्या चहते हो...?"
    "कुछ नहीं अब तुम पूछो क्या पूछना है ? मैंने तो इसलिए सुनाई की बस यही रह गई थी...", फिर मैं थोड़ा सा हंस पड़ा।
    "तो पूछ लूं... सच ? बुरा तो नहीं मानोगे और पूरी ईमानदारी से जवाब दोगे ?", उसने रहस्यमई नजरों से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "कहा न, बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगा और ईमानदारी से जवाब दूंगा... अब चलो पूछ भी लो, ज्यादा सस्पेंस मत क्रिएट करो..."
   "अच्छा तो यह बताओ मैंने जिंदगी में पहली बार कल पी थी, नशे की कुछ रुमानियत भी थी...  तो तुमने मेरे बारे में क्या सोचा ?", उसने संकोच से पूछा था। 
    "पीहू !!...", मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, "तुम्हारा हाथ इसलिए पकड़ रहा हूँ कि तुम महसूस कर सको कि मैं जो कह रहा हूँ पूरी ईमानदारी और सच्चाई से कह रहा हूं... तुम पूछना कुछ और चाहती हो लेकिन पूछ नहीं पा रही हो, मैं तुम्हें बताता हूँ.... डायरेक्टली तुम यह पूछना चाहती हो कि कल तुम नशे में थी और तुमने सत्य के साथ एक ही रूम शेयर किया तो मैंने तुम्हारे प्रति क्या धारणा बनाई ? लेकिन नहीं, तुम मुझसे यह नहीं पूछना चाहती हो, क्योंकि तुम्हें अच्छी तरह से मालूम है कि मैं तुम्हारे बारे में क्या सोचता हूँ। तुम तो यह जानना चाहती हो कि सत्य और तुम्हारे रिलेशन को लेकर मेरी क्या फीलिंग है ? कल तुमने इसी जगह पूछा था कि क्या मैं सत्य से भी प्यार करता हूँ, और जिस अंदाज में तुम उसे कल रात आम के पेड़ के नीचे एकांत में लेकर गई और मेरी नजरों से देखते हुए पूछा, "कंफर्ट नं ?", तभी मैं समझ गया था...?"
    उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "जब समझ गए हो तो बता भी दो...?"
    "तो सुनो, मैं सत्य के बारे में जानता ही कितना हूँ ? यदि तुम दोनों साथ हो तो यह तुम दोनों की व्यक्तिगत चॉइस हैं। और रही बात अनकंफर्ट महसूस करने की तो हां करता हूँ... लेकिन उसकी वजह किसी भी प्रकार की जलन नहीं है और न ही तुम्हारे प्रति उदासीनता है।.... पीहू ! अब मैं जो कहता हूं तुम ध्यान से सुनो, मान लिया कि मुझे तुमसे प्यार हो गया... मैं तुम्हें बहुत चाहने भी लगा हूँ, तो सिर्फ इस वजह से मैं सत्य से जलन रखूँ, ये मेरे व्यक्तित्व के खिलाफ है... अल्टीमेट तब तो मुझे तुम्हारी खुशियां और भी अजीज होंगी। मेरे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि मैं क्या चाहता हूँ, मेरे लिए यह महत्व रखता है कि तुम क्या चाहती हो.. सीधे से अर्थों में कहूं कि यदि तुम सत्य को पसंद करती हो तो फिर मेरे लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि मैं भी तुम्हे प्यार करता हूँ और मैं तुमसे क्या चाहता हूँ... अर्थात मेरे लिए तुम्हारी इच्छा और पसंद ही सर्वोपरी होगी और हमेशा रहेगी..."
   "तुम्हे दुःख भी न होगा...", उसकी नज़रें अभी भी मेरे चेहरे में टिकी थीं।
   मैने लिखी कविताओं की पर्चियां जो अभी भी मेरे हाथ में थी, मैंने उन्हें अच्छे से तह किया और उसे देते हुए बोला, "लो रखो अपने लॉकर में सम्हाल के... अच्छे से पढ़ना, जहां महसूस करो तो करेक्ट कर देना..."
   "लॉकर में...?", उसने आश्चर्य से पूछा था। 
   प्रतिउत्तर में मैं कुछ बोला नहीं बस धीरे से मुस्कुरा दिया। 
  "ओह ! तो फिर उधर मुंह करो...", उसने  भी मुस्कुराते हुए कहा।
   "वो भला क्यूं..."
   "लॉकर सामने नहीं खुलता है... अब चलो उधर मुंह फेरो..."
   मैंने धीरे से चेहरा दूसरी तरफ घूम लिया और धीमी आवाज में एक गीत गुनगुनाने लगा, "दम भर जो उधर मुंह फेरे... ओ चंदा... मैं उनसे प्यार कर लूंगी... बातें हजार कर लूंगी..."
   कुछ देर बाद उसने शोखी से कहा, "कर लिया... अब मुंह इधर कर सकते हो... लेकिन तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया..."
    मैने सर झुकाए हुए जवाब दिया, "दुःख वाली बात का ? तो एक इत्तेफाक ही है कि मैंने इसका जवाब पहले ही दे दिया था... तुम अलसाई जब प्रिय बाहों में... डूब नेत्र-नीर मैं अकुलाया... अब चले"
    उसने उठते हुए कहा, "हां... चलो... लेकिन याद रखना... आज तुम जो मुझे इतना परेशान कर रहे हो न, एक दिन मैं भी तुम्हें रुलाऊंगी...."
   मैंने भी उठते हुए कहा, "जमाने ने रुलाया.. तो. ठीक है तुम भी रुला लेना.… तुम्हारे लिए तो हम हंसते-हंसते रो भी लेंगे.. उफ़ भी न करेंगे... पर देखना सम्हाल के.. मुझे रुलाने के लिए कहीं तुम्हें मुझसे अधिक न रोना पड़े..."
    जब हम उस जगह पहुंचे तो उसने अपना दाहिना हाथ खुद मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने चलते हुए उससे कहा, "यदि कोई किसी को छोड़ दे तो मेरी समझ से उससे नाराज़ हो कर उसे बददुआ नहीं देनी चाहिए..."
   "क्यों ...?"
    "यार कोई किसी को यूं ही नहीं छोड़ता, होती हैं सबकी अपनी-अपनी मजबूरियाँ..."
   "कैसी मजबूरियां...?"
   "मेरी समझ से यदि कोई किसी को छोड़ने का फैसला लेता है तो उसकी कोई न कोई वजह होतो हैं। जैसे कि उसने जो आपसे एक्सपेक्ट किया, आप उसे पूरा नहीं कर पाए। यह कि उसे आपसे बेहतर मिल गया, या उसके सामने कोई बहुत बड़ी मजबूरी आ गई, या फिर दोनों को कोई गलतफहमी हो गई। कुछ गलती आपकी कुछ उसकी, दोनों ही एडजस्ट नहीं कर पाए।
      बेवफाई या रॉन्ग चॉइस भी कह सकते हैं न...?", उसने पूछा।
    "हां, जरूरी नहीं कि आपकी पहली पसंद सही ही हो... तो आपको अपनी आगे की लाइफ को ध्यान में रखते हुए खुद फैसला लेने का हक़ है..."
     "जरूरी तो नहीं ... दूसरे से अच्छा तीसरा न मिले और तीसरे से अच्छा चौथा ? मिल गया तो...?", उसने तर्क दिया।
    "हु मिल गया तो ?... तो यदि संभव हो वही सही"
   उसने शिकायती लहजे में कहा, "यार कितने प्रैक्टिकल हो तुम ? इमोशंस है भी या नहीं ? राइटर कैसे बन गए ? लेकिन कहीं न कहीं तो रुकना होगा न, नहीं तो रिश्ते कैसे बनेंगे ?"
    "कहा न कि यदि संभव हो, जहां रुकने में आपको भलाई समझ में आए तो रुक जाना चाहिए..."
   "और ...?"
   "और क्या, अब किसी की मजबूरी को क्या नाम दिया जा सकता है ? यदि आपको अंदाजा था की इस तरह की कोई मजबूरी सामने आएगी और फिर भी आप ने किसी से मोहब्बत की, उसे अपना होने का एहसास दिलाया तो आप दोषी हैं, और यदि सचमुच अचानक ही कोई मजबूरी सामने आई है तो फिर यह तो मुकद्दर की बात है..."
    "मतलब ? मैं समझी नहीं .."
     "ओके, लेटस मी ट्राई टू एक्सप्लेन विद एग्जांपल ... यदि तुम्हे पूरा विश्वास होता कि तुम्हारे और  सत्य के बीच के रिश्ते को बाबा कभी स्वीकार नहीं करेंगे... और फिर भी तुम सत्य को एहसास कराती कि तुम उससे प्यार करती हो, और बदले में उससे भी उसी तरह का प्यार चाहती और फिर एक दिन तुम सत्य से कहती कि बाबा नहीं मानेंगे और उसे छोड़ देती तो यह गलत होता। मानता हूँ कि प्यार होना या न होना हमारे हाथ में नहीं होता। लेकिन उसका इजहार करना तो अपने हाथ में होता है न ? यदि आपको किसी रुकावट की अशंका हो तो आप उसे बेशक एकतरफा प्यार कर लीजिए लेकिन उसे अपने प्यार में शामिल मत कीजिए..."
   "और ... गलतफहमी के बारे में ...", उसने कुछ मुस्कुराते हुए और मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "अब छोड़ो भी, तुम मुझसे ज्यादा समझदार हो, सब जानती..."
   "नहीं... बिल्कुल नहीं कहूंगी कि मैं कुछ नहीं जानती... बहुत इनोसेंट होने का ढोंग नहीं करूंगी।  लेकिन हर इंसान का दृष्टिकोण अलग-अलग होता हैं न ? तो जिस बात को शुरू किया है उसे पूरा करो ..."
   मैंने कुछ मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा, " ग़लतफहमी होने का कारण है एक दूसरे के प्रति विश्वास का न होना और कम्युनिकेशन गैप। कभी-कभी घटनाओं और परिस्थितियों को देखकर हमारे अंदर अविश्वास की भावना जागती है, जैसे कि हम दोनों ने सत्य के सामने एक दूसरे को बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड कहा। उसने इसे कैजुअल लिया... मतलब हंसी मजाक में। 
      लेकिन इस वक्त वह तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में देखकर तुम पर पर अविश्वास करें और वह सचमुच मुझे तुम्हारा बॉयफ्रेंड मान ले और यह गांठ वह अपने अंदर ही लिए रह जाए, तुमसे कोई बात न करें, तो यह कम्युनिकेशन गैप हुआ और इसी से अविश्वास फलता-फूलता हैं... जबकि हम दोनों की नजरिया साफ है, मुझे सहारे की जरूरत है और मित्र होने के नाते मुझे सहारा देना तुम्हारा धर्म है। यदि यह बात बिना कहे सत्य समझ जाए तो इसे कहेंगे विश्वास..."
     "वाव !! क्या बात है !! मैं इसीलिए कहती हूं कि तुम अपनी उम्र से कहीं ज्यादा मेच्योर्ड हो। इतनी मैच्योरिटी आई कहां से ?"
    "अरे कोई फिलासफी नहीं और न ही कोई मैच्योरिटी है। यह रियल लाइफ है, बहुत कुछ देखता-सुनता रहता हूँ। अब बात वही हो गई न कि शादी नहीं हुई तो क्या हुआ, बारातें बहुत सी देखी हैं... और फिर लेखक होने के लिए प्रगतिशील चिंतन और जिंदगी के प्रति निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है..."
   उसने कुछ देर तक खामोश रहने के बाद मुझसे कहा, "मेरे जीवन का भी एक सच है... पहले सत्य के प्रति मेरे मन में जिज्ञासा थी कि आखिर ये लड़का कौन है, क्यूं पेड़ के नीचे दिन भर खड़ा रहता है ? पहले ही दिन उस बरसती हुई रात में बाबा की जानकारी के बगैर मैने उसे रोक लिया, सोचा इसके साथ कहीं कोई दुर्पघटना न हो जाए। उस रात मुझे एक सच्चा दोस्त मिला।  उससे अपने सारे दुःख बाट लिए।  उससे लिपट कर रोई और साथ में ही सो गई... पता नहीं उस वक्त उसने मेरे प्रति क्या धारणा बनाई होगी ? लेकिन उसने कोई ऐसी-वैसी हरकत करने की कोई कोशिश नहीं की। इस तरह एक अजनबी मेरा दोस्त बन गया, ऐसा दोस्त जिसे मैं अपने दिल की सभी बातें शेयर कर सकती हूँ... फिर दूसरे दिन अचानक बाबा ने उसका तिलक कर कन्यादान का मंत्र पढ़ दिया... मैं बाबा को रोकना चाहती थी और रोका भी... लेकिन बाबा ने मुझसे कहा, यही हम दोनों की नियति है... लगता है कि उस रात उसके रुकने की बात को शायद बाबा ने जान लिया था, तभी उन्होंने ऐसा किया..."
   मैंने शंकित मन से पूछा, "तुम्हे क्या लगता है..."
   "पता नहीं... लेकिन बाबा ने मुझसे कोई बात क्यूं नहीं की...?"
    "तो क्या तुम सत्य से...?"
   "नहीं... नहीं... ऐसी कोई बात नहीं... मैंने उसे स्वीकार कर लिया क्योंकि बाबा का फैसला था। मेरा भी कहीं न कही उसके प्रति लगाव था। फिर  हम साथ रहने लगे। अब एक ही बेडरूम शेयर करते हैं... बातें करते हैं... एकदूसरे का दुख-सुख बांटते हैं... मैं उसकी कंधे पर सर रख निश्चिन्त सो भी जाती हूँ... सामाजिक तौर पर हमारी शादी भले न हुई हो...लेकिन मैं बंधनों में बांध गई न। एक ऐसा बंधन जो शायद जन्म-जन्मांतर का होता है... फिर भी दोस्ती के आगे के किसी भी रिश्ते के लिए उसकी तरफ मेरे कदम क्यूं नहीं उठते...?"
   मैने उसे समझाते हुए कहा, "शायद इसलिए कि सहजता से प्राप्त कोई वस्तु या व्यक्ति की कीमत हम समझ नहीं पाते। यही सत्य से पहले तुम्हे प्यार होता, फिर उससे विवाह के लिए तुम्हे स्ट्रगल करना पड़ता, बाबा को मनाना पड़ता, जमाने से लड़ना पड़ता तब शायद तुम्हारे सामने ये प्रश्न न उठता... और एक बात बताऊं... जन्म-जन्मांतर की कोई अवधारणा नहीं, यदि होती तो कुछ रिश्ते डाइवोर्स पेपर में न बिखरते... रिश्ते का मतलब ही होता है एडजेस्टमेंट... जो निभा लिया तो चल गया। नहीं निभा सके तो टूट गया... एक अच्छे दोस्त होने के नाते मैं कहता हूँ, ज्यादा मत उलझाओ अपने आप को... लाइफ सिंपल है... ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड मत करो... और वैसे भी सत्य हैंडसम है, क्वालिफाइड है, कल्चरड भी है... कमी क्या है...?"
   "ये सब हो तो प्यार हो जाता है...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा था।
    "प्यार के लिए जरूरी न सही लेकिन कुछ हद तक होता भी है। हम सबसे पहले यही सब देखकर तो किसी इंसान के प्रति आकर्षित होते हैं न? फिर उसके साथ समय बिताना चाहते हैं। उसकी पसंद, नापसंद, जिंदगी के प्रति उसका दृष्टिकोण, उसका स्वभाव इन सब के बारे में तो बाद में ही जानते हैं न ? प्यार का संबंध माइंडसेट से होता है, जो धीरे-धीरे आपकी इमोशन से जुड़ता चला जाता है, और यह बॉन्ड जितना पक्का होगा हम उसके साथ उतनी ही सहजता से जीवन जी सकते हैं।
    "मैं नहीं मानती...", उसने मेरी बात का खंडन किया, "... किसी के साथ सहजता से जीवन जी लेने को प्यार नहीं कह सकते..."
    यह जानते हुए भी कि पीहू सच कह रही है, मैं उसके सामने उसकी इस बात का समर्थन नहीं कर सकता था। एक मित्र होने की नाते उसे और उलझाना उचित नहीं लगा। मेरा कर्तव्य था कि मैं उसे किसी भी उलझन से बाहर निकाल ले जाऊं, शायद इसीलिए उसदिन मैं खामोश रहा।
   तभी सामने से सत्य आता हुआ नजर आया। पीहू का हाथ मैंने अभी भी पकड़ रखा था। सत्य पगडंडी पर खड़ा होकर पीहू से बोला, "पीहू जरा संभल के अच्छे से..."
    कुछ देर में ही हम दोनों सत्य के पास पहुंच गए। मैंने उसका हाथ छोड़ दिया। सत्य ने पीहू के हाथ से मेरा बैग अपने हाथ में लेते हुए पूछा, "आर यू ओक ? मैं बाइक ले आऊं घर से... ?"
   "नहीं यार... बचा ही कितनी दूर है... चलो पैदल ही चलते हैं। हां... पीहू बता रही थी की फैक्ट्री में अचानक ह्यूमन राइट्स का कोई इशू हो गया है... "
    "हां यार ... कुछ मजदूरों ने कंप्लेन कर दी है कि माइंस में कुछ बेसिक सुविधाओं का आभाव है... एक टीम आई हुई है। दोपहर को माइंस का इंस्पेक्शन भी करेगी। तब तक मुझे जाकर मजदूरों को समझाना है कि मैनेजमेंट उनकी असुविधाओं को दूर करने की कोशिश कर रही है, तब तक वे कोई गलत बयान न दे... नौकरी के दस पचड़े होते हैं यार, अब क्या बताऊं। पीहू चलो जल्दी से खाना-पीना बनाओ, मुझे फिर माइंस जाना है, सॉरी यार मैं तुम्हें सही ढंग से कंपनी नहीं दे पा रहा हूं... पीहू तुम ध्यान रखना..."
     पीहू ने सत्य की तरफ मुस्कुराते हुए देखा, "ठीक है... ", फिर एक पल के लिए मेरी तरफ देखा जैसे उसकी नज़रें मुझसे पूछ रही थीं, "तुम्हे कोई एतराज तो नहीं..."
    पांच मिनट में ही हम तीनों घर पहुंच गए। पीहू ने फटाफट खाना बनाया। उसने सच कहा था, उसे रसोई घर में आधे घंटे से अधिक नहीं लगा और खाना बनकर तैयार हो गया। रोटी-सब्जी, दाल-चावल, सलाद, अचार-पपड़, सभी कुछ। 
   कुछ देर बाद टहलने के लिए हम लोग कच्चे मकान के पीछे आ गए और टहलते-टहलते उस शीशम के पेड़ के नीचे भी पहुंचे। मैंने सत्य की थोड़ी-सी खिंचाई करते हुए कहा, "तो जनाब इसी पेड़ के नीचे से उस खिड़की के दीदार होते थे... ?"
    "खिड़की के भी और खिड़की वाली के भी... लेकिन ये रुको ! यह सब तुम्हें कैसे मलूम ...!! ओ .. हो तो तुम्हारी गर्लफ्रेंड ने बताया है...?", सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा। 
    "अरे यार कोई गर्लफ्रेंड नहीं है मेरी... दोस्त है, वह तो यूं ही हम लोग हंसी-मजाक में एक दूसरे को कहते रहते हैं। तुम कोई गलतफहमी न पाल लेना...", मैंने अपनी सफाई पेश करनी चाही।
   "अरे कैसी बातें करते हो यार... मैं जानता हूं... लेकिन मुझे खुशी भी है यदि उसने तुम्हें बॉयफ्रेंड बनाया तो एक्चुअल में प्रमोशन तो मेरा ही हुआ न। कम से कम मुझे हसबैंड की श्रेणी में तो रखा होगा... मुझसे न सही तुमसे तो स्वीकार किया... यार मैं सारी उम्र तुम्हें उसका बॉयफ्रेंड मानने के लिए तैयार हूँ, बशर्ते तुम उसे मेरी वाइफ बना दो। किसी भी तरह से उसे शादी के लिए कन्वेंस कर लो... देखो यार मैं जानता हूँ, मुझसे प्यार तो बहुत करती है... लेकिन पता नहीं क्यों मुझसे सीधे स्वीकार नहीं करती।... हम लोग एक ही बेडरूम शेयर करते हैं। एक दूसरे के प्रति भले ही फिजिकल न हो, लेकिन बिल्कुल पति-पत्नी की तरह रहते हैं, बातें करते हैं, एक दूसरे का दुख-दर्द समझते हैं। खुद स्वीकार करती है कि जब मैं उसके साथ होता हूँ, तो वह बिल्कुल निश्चिंत और गहरी नींद सोती है। सच कहता हूं, एक नींद में उसकी सुबह होती है। बाबा को ऐतराज नहीं, न मेरे घर वालों को होगा। फिर भी पता नहीं शादी के नाम पर वह खामोश हो जाती है। फिर मैं सोचता हूं चलो हो सकता है एकदिन उसका इरादा बदल जाए। जब मुझसे प्यार करती है तो शादी किसी और से तो करेगी नहीं... इतना तो मैं जानता हूँ..."
    मैने दोनों की बाते सुनी और यह मेरे लिए चकित करने वाली बात थी। अभी तक मैंने सत्य और पीहू की बीच के संबंध को एक ही दृष्टिकोण से देखा था यह बात सही है कि उनके बीच कोई फिजिकल रिलेशन नहीं है लेकिन यह बात तो केवल वे दोनों ही जानते हैं न, बाबा तो नहीं ? और यदि मैं दोनों पर विश्वास करूं तो तीसरा व्यक्ति मैं हूँ जो इस बात को जान गया हूं... 
    यह कैसे संभव हो सकता है ? न तो बाबा इतने मॉडर्न दिखाई दे रहे हैं और न ही सत्य और पीहू कैरक्टरलेस हैं !! और भविष्य में भी पीहू की तरफ से सत्य को सिवाय प्यार या फिर दोस्ती के किसी भी अन्य संभावित संबंध की कोई सिक्योरिटी नहीं है ! फिर भी सत्य उसके साथ है, इस आशा के साथ कि कभी न कभी पीहू का हृदय परिवर्तित होगा और वह मान जाएगी !!!
       मैं अब खुद उलझ के रह गया, और मेरे पास मेरे ही सवालों के कोई जवाब नहीं थे, तो सत्य को क्या रास्ता दिखाता ? प्रत्यक्षत: मैंने उसे समझाते हुए कुछ सच कुछ झूठ कहा, "कोई बात नहीं यार होगी कोई उसकी वजह, और मैं पूछूंगा भी तो क्या पूछूंगा ? जब वह तुम्हें बताने के लिए तैयार नहीं है, जबकि वह तुम्हें बेइंतहा प्यार करती है, तो फिर यह बात मुझसे कैसे शेयर करेंगी ? ... और जब तक वह कोई बात शेयर नहीं करती है तब तक मैं उसे कैसे कन्वेंस कर पाऊंगा ? ... फिर भी सत्य मै पूरी ईमानदारी से कोशिश करूंगा... ईश्वर पे विश्वास करो,... सच कहता हूं तुमसे..."
    वह मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया, "थैंक्स यार, आई विश कि उसे कन्वेंस करने का कोई न कोई रास्ता निकल आए... चलो तुम अटारी में आराम करना और मैं अब माइंस निकलता हूँ, शाम को मुलाकात होगी। 
    सत्य अंदर चला गया, शायद पीहू और बाबा को अपने जाने की सूचना देने के लिए: और मैं धीरे-धीरे अटारी की सीढ़ियां चढ़ने लगा। चित्रलेखा पूरी हो चुकी थी। मैने शेक्सपियर की ओथेलो उठाई और बिस्तर में लेट गया। लगातार पढ़ता रहा। ओथेलो की पत्नी डेंसडेमोना और इयागो के षड्यंत्र के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी, विश्वास और अविश्वास की परिधि निश्चित कर रही थी। कुछ देर पहले मैंने जो पीहू से अविश्वास और कम्यूनिकेशन गैप की बात कही थी यह नाटक उसे सही साबित करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश कर रहा था। लगभग डेढ़ घंटे बाद पीहू मेरा बैग उठाए अटारी पर आई। 
     "क्या पढ़ रहे हो बॉयफ्रेंड...", उसने मुस्कुराते हुए पूछा और धम्म से कुर्सी में बैठ गई, मैंने महसूस किया जैसे उसकी सांसे तेज चल रह थी।
     "ओथेलो पढ़ रहा हूं और यह बताओ गर्लफ्रेंड, कौन सा मैराथन दौड़ के आई हो, जो इतना हांफ रही हो...", मैंने मजाक में उससे पूछा।
   "उसने हांफते हुए ही कहा, "अरे यार कुछ नहीं बस ऐसे ही घर के काम थे, मैंने सोचा निपटा लिया जाए फिर तुम्हारे साथ बैठते हैं..."
   मैने उसे डांटते हुए कहा, "लगातार इतना काम क्यों करती हो... देख नहीं रही ठीक से सांस भी नहीं ले पा रही हो तुम..."
    "पूरी पढ़ ली ?", उसने सांस लेते हुए मुझसे पूछा। 
    "नहीं पूरी तो नहीं पढ़ी पर आधे तक पहुंच गया हूं। .... अब क्या है न, मेरी इंग्लिश तुम्हारी जैसी तो अच्छी है नहीं, तो समझ-समझ के समझना पड़ता है। पढ़ने में टाइम लगेगा...", मैंने बुक की तरफ देखते हुए उससे कहा। 
   "आराम से पढ़ लेना यार, न पढ़ पाओ तो ले जाना; मैं सत्य से कह के दूसरी मंगा लूंगी। मैंने भी अभी नहीं पढ़ी है... अब इसे किनारे रखो। चलो कुछ बातचीत करते हैं। हो सकता है कल ज्ञान भैया आ जाएं और तुम चले जाओ... फिर न जाने कब मिलना हो... "
   मेरे लिए मौका था। मैंने सत्य से जो कहा था, उसे पूरा करने का, "मिलना क्यों नहीं होगा ? अरे जब तुम दोनों की शादी होगी मतलब समाज के सामने, तो क्या मुझे इनवाइट न करोगी ?"
   "शादी होगी !! यह किसने कह दिया ? क्या सत्य ने ?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
  "अरे सत्य मुझसे क्यों कहेगा ?  बाबा को भी कोई आपत्ति नहीं तो फिर...?"
      मैंने उसकी शादी की बात की और इधर पीहू खामोश और इतनी खामोश कि कुछ देर तक कोई बातचीत नहीं। मैंने ही बात को आगे बढ़ाया, "ये गर्लफ्रेंड !! बात क्या है, कुछ तो कहो ? हो सकता है मैं कोई... ?"
    "सब तो बता चुकी और क्या बताऊं, फिर भी यदि हुई तो जरूर बुलाऊंगी... ठीक ?", उसने मुस्कुराते हुए कहा। 
    इस तरह से उसने संभावित किसी भी वार्ता को एक ही क्षण में समाप्त कर दिया। मेरे लिए दुविधा की बात यह थी कि न तो मैं पीहू से कह सकता था की सत्य से मुझे कौन सी जिम्मेदारी सौंपी है, और ना ही सत्य को सच बता सकता था कि किस तरह पीहू ने संभावित किसी भी वार्ता को समाप्त कर दिया है। यदि मैं ऐसा करता हूँ तो निश्चित ही सत्य के हृदय को ठेस पहुंचेगी। यदि वह किसी भी संभावना में जीना चाहता है तो फिर मैं उसे कैसे रोक लूंगा।
    मैं बिस्तर से उठा और खिड़की पर आ गया। खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने उससे पूछा, "पीहू ! तुम खामोश क्यों हो... ?"
    पीहू मेरे पास आई और मेरे बगल में खड़ी हो गई। मेरे साथ बाहर देखते हुए बोली, "तुमने कहा था कि यदि हमें किसी रुकावट की आशंका हो तो किसी को अपने साथ रिश्ते में नहीं लाना चाहिए ? एकतरफा प्यार करो लेकिन उसे अपने प्यार में शामिल न करो ? अब मान लो यह गलती किसी से हो जाती है तो फिर वह क्या करें ? क्या इस गलती को सुधारने का कोई रास्ता है ? "
    "नहीं ...", मैंने सपाट लहज़े मे कहा, "कुछ गलतियों को नहीं सुधर जा सकता और न ही उनके लिए कोई मुआफी होती है, ऐसे गुनाह, साधारण गुनाह नहीं, गुनाह-ए-अजीम कहलाते हैं, इनकी सजा मिलती हैं, और केवल गुनाह करने वाले को नहीं, उसे भी मिलती है, जिसके प्रति गुनाह होता है..."
   "कैसे ..?", उसने अपनी नजर मेरे चेहरे में टीका दी।
   "कभी-कभी इंसान को उसकी मासूमियत की सजा मिलती है। देखा जाए तो दोनों ही मासूम है। एक ने अपने प्रेम का इजहार किया यह उसकी मासूमियत ही है। यदि दूसरे ने उसके प्रेम को स्वीकार किया है तो यह निश्चित है कि वह भी उससे प्रेम करता था, तभी तो उसने स्वीकार किया। दोनों ही एक दूसरे से अपने प्रेम का प्रतिफल चाहते हैं, जो कि किसी भी दृष्टिकोण से गलत नहीं स्वाभाविक है। 
    यह जानबूझकर सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया अपराध नहीं है, लेकिन फिर भी ऐसे गुनाहों की सजाएं ही मिलती हैं। वे जीवन भर एक दूसरे को नहीं भूल पाते। हां दुनिया को दिखाते रहेंगे सब ठीक है, लेकिन अंदर से कुछ भी ठीक नहीं होता है।  एक कसक, एक टीस हमेशा रहती है। कुछ दृढ़ इच्छा शक्ति के होते हैं और इसे पार्ट आफ लाइफ समझ कर स्वीकार कर लेते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ कुछ कमजोर इच्छा शक्ति के भी होते हैं। जो या तो सुसाइड कर लेते हैं या फिर देवदास बन जाते हैं...", मैंने अंत में उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा था, "जो कि तुम्हें मंजूर नहीं...?"
     " हुं .... वो तो है .... मान लो तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा फेज आए तो तुम क्या करोगे ?", उसने पूछा।
     मैंने कुछ सोचते हुए और फिर उसकी तरफ देखते हुए कहां, "उस वक्त मैं तुम्हें याद करूंगा और देवदास बनने से बच जाऊंगा क्योंकि ये मेरी गर्लफ्रेंड को मंजूर नहीं..."
  "और मैं न रही तो ? ... तो फिर किसे... ?", प्रश्न पूछते हुए उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। 
   "ये इधर देखो.… पीहू... देखो मेरी तरफ.… ", मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसका फेस अपनी तरफ टर्न करना चाहा, लेकिन वह इस तरह जड़ खड़ी रही कुछ देर बाद उसने अपने आंसू पोछे। मेरा हाथ अभी भी उसके कंधे पर था। उसने धीरे से मेरे हाथ के ऊपर अपना हाथ रखते हुए कहा, "सॉरी..."
     मैंने शांत मन से कहा,  "क्या बात है पीहू तुमने कल भी सत्य से यही कहा और आज मुझसे कह रही हो। किस दर्द को तुम अंदर ही अंदर जी रही है मुझे न कहेगी ?"
    इंसान की नियति और मन पढ़ने का रास्ता उसकी आंखों से होकर जाता है इस बार उसने मेरी तरफ देखा उसकी उदासी, उसकी करूणा उसकी आंखों में दिख रही थी। वही आखें जिसमें कल मैं दिखा था।आज मैं वहां नहीं था, थी तो उसके अंदर की पीड़ा, उसका दर्द, उसकी करुणा जो एक बार फिर पिघल कर आंखों से निकलने के लिए तैयार थी। मैं खुद को रोक न पया। उसके गाल पर अपनी हथेली रखते हुए धीरे से कहा, "पीहू ! यह क्या ? आखिर तुम किस दर्द को अंदर ही अंदर जी रही हो, जो तुम्हारी आंखों में मुझे दिखाई देता है लेकिन तुम मुझसे कह न पा रही...?
    हम दोनों की हाइट लगभग एक थी। उसने अपना चेहरा मेरी तरफ कुछ और घुमाया मेरी आंखों में झांकते हुए हल्के से मुस्कुरा कर कहा, "जब से पूरे परिवार की मृत्यु एक ही हाथ से में हुई है तब से पता नहीं क्यों मुझे भी लगता है कि एक दिन मैं भी जल्द ही मर जाऊंगी। कभी-कभी मन बहुत घबराता है बेचैन होता है रोने को बहुत दिल करता है..."
    मैंने उसे समझाते हुए कहा, "ऐसा नहीं होता है, तुम बेवजह घबरा रही हो बल्कि है तो अच्छी चीज है तुम्हारे पास मौका है हर दिन अपनी तरह से जिंदगी जीने का..."




     मैं उसका मित्र हूं। यदि उसके दर्द को कम नहीं कर सकता तो मेरा फर्ज बनता है कि मैं उसका ध्यान वहां से हटा दूं और मैंने यही करने की कोशिश की।
   "पीहू ! थोड़ा-सा पानी ला दोगी.… प्यास लगी है... और टाइम क्या हो गया होगा...?"
     "प्यास तो मुझे भी लगी है, रुको... नीचे से मैं पानी भी लाती हूँ और घड़ी भी देख कर आती हूँ। ... ऐसा करो तुम भी क्यों नहीं चलते ?... मैं तुम्हें अपना घर दिखाती हूँ...", उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा।
      "ठीक है... चलो चलते हैं...", मैंने सीढी की तरफ इशारा करते हुए कहा।
     "वह मेरे आगे थी, और मैं उसके पीछे। सीढ़ी के पहले पायदान में पैर रखते हुए उसने मुझसे कहा, "दिक्कत हो तो मेरा हाथ पकड़ लो..."
   "नहीं कोई दिक्कत नहीं होगी एक तरफ दिवाल है न, उसी का सहारा ले लूंगा, तुम उतरो...", मैंने उसे समझाते हुए कहा। 
   हम नीचे आए बाबा तख्त में सो रहे थे। सबसे पहले उसने मुझे पानी पिलाया और खुद भी पिया। फिर रसोई घर दिखाते हुए कहा, "ये किचन है, जानते हो शैल, सत्य बहुत अच्छा कुक है। सब्जियां तो बहुत ही लजीज बनता है... और भी बहुत सारी चीज बना देता है... बाबा से छुप के। वो क्या है न बाबा को पसंद नहीं है कि पुरुष खाना बनाए।  कहते हैं मर्दों का खाना बनाना उचित नहीं है। बस इसी प्वाइंट पर वे बहुत ट्रेडिशनल हैं..."
      वह मुस्कुरते हुए यह सब बातें मुझसे शेयर कर रही थी। मैंने किचन को ध्यान से देखा। सभी चीज अपनी जगह पर साफ-सुथरी रखी हुई थी। मैंने प्रशंसा भरे शब्दों में कहा, "वेरी गुड... तुमने रसोई बहुत अच्छे से मेंटेन कर रखी है... रसोई ही क्यों पूरे घर को..."
   "थैंक्स, वैसे भी मैं बहुत सफाई पसंद हूँ। थोड़ी-सी भी गंदगी हो जाए तो जब तक मैं उसे साफ नहीं कर लेती मुझे चैन नहीं पड़ता है..."
   "वाह !! यदि तुम मुस्लिम होती तो मैं तुम्हारा नाम सफीना बेगम रखता...", फिर मैं जोर से हंसने को हुआ कि उसने झट से अपने हाथ से मेरा मुंह दबाते हुए रोका, "देखते नहीं बाबा सो रहे हैं..."
    चूंकि उसने मेरा मुंह दबा रखा था तो मैं कुछ बोल तो सकता नहीं था। मैंने अपना सर हां में हिलाया,  और हाथ से इशारा किया कि छोड़ो।
   "ओह सॉरी !! ...", उसने अपना हाथ मेरे मुख से हटाते हुए धीरे से कहा।
      "क्या यार दम घोट के मार डालने का इरादा है...?", मैंने तेज-तेज सांस लेते हुए कुछ नाटकीय अंदाज में कहा।
     "सॉरी कहां न, .... अब चलो पूजा घर दिखाती हूं...", फिर मैं उसके पीछे-पीछे चल दिया।
      हमने पूजा घर को बाहर से ही देखा क्योंकि बिना हाथ पैर धोए पूजा घर में प्रवेश करना वर्जित था। पूजा घर को भी काफी अच्छे से मेंटेन किया गया था। देवी मां की एक चमकदार मूर्ति थी, शायद किसी महंगी धातु की बनी थी।
      फिर वह मुझे लेकर बड़े मम्मी-पापा के कमरे में आई। एक बड़ी पलंग, लकड़ी का बना हुआ सोफा, जिसे तांत से बीना गया था, एक तरफ डबल बेड, उसके बगल से बड़ी आलमारी, दिवाल कवर्ड और सामने की दिवाल पर दो फ्रेम में फोटो। एक फ्रेम में बड़े मम्मी-पापा और दूसरे फ्रेम में ध्रुव की फोटो। वह कमरा भी साफ-सुथरा था। 
    उसी के जस्ट ऑपोजिट गैलरी के दूसरी तरफ उसके मम्मी पापा का कमरा था। परसों की रात मैंने इसी कमरे से पीहू और सत्य की आती हुई आवाजें सुनी थी। कमरे में पहुंचते ही मुझे अंदाजा हो गया कि दोनों कमरे की बनावट एक जैसी है। ठीक उसी तरह रैक, अलमारी, बेड, सोफा, ड्रेसिंग टेबल और सामने फ्रेम में फोटो। इन दोनों कमरों को देखकर कहीं से नहीं लग रहा था कि यह ग्रामीण परिवेश का बेडरूम होगा। दोनों ही बेडरूम काफी बड़े थे, सामान्य से कहीं ज्यादा। एक तरफ की दिवाल में अंदर की तरफ खुलती हुई बड़ी-बड़ी दो खिड़कियां। इस कमरे को देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया कि यह बेडरूम अभी उपयोग में लाया जा रहा है। क्योंकि इस कमरे के सोफे में कवर लगे थे और गद्दियां भी पड़ी हुई थी। 
     मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने इस कमरे की तारीफ करते हुए कहा, "पीहू ! लगता नहीं यह किसी गांव में रहने वाले व्यक्ति का बेडरूम है... "
    "सही कहते हो, लगभग बीस साल पहले बड़े पापा ने यह पक्का घर बनवाया था। मुंबई में रहते थे न, तो सोच भी उनकी उसी तरह थी..."
   "मंगल बता रहा था कि तुम्हारी एजुकेशन भी तो मुंबई में ही हुई है न...?"
    "हां, पापा भी बड़े पापा के साथ वहीं रहते थे, एक पब्लिशिंग कंपनी में सब एडिटर थे... वहां भी अपना घर था। हम सभी साथ रहते थे..."
   कुछ देर बाद हम कच्चे घर की तरफ आ गए। अटारी के जस्ट ऑपोजिट तरफ बने हुए कच्चे कमरे की तरफ इशारा करते हुए उसने बताया कि इसमें गाय बछड़ों के लिए भूसा और कुछ खेती में यूज होने वाले सामान रखें हुए हैं।
    फिर हम बाहर गौशाला के पास आ गए। मैने उसे भी अंदर से देखा, वह भी काफी साफ-सुथरा दिखा। उसी ने बताया, "इसकी साफ सफाई की जिम्मेदारी कमली और मंगल चाचा की है। जब कभी वो नहीं आ पाते तो मैं या फिर सत्य कर लेते हैं। अरे अब तो सत्य गाय दुहना भी सीख गया है, पहले उसे नहीं आता था..."
    "तुम्हे आता है...?"
    "और नहीं तो क्या... उसे मैने ही सिखाया है...", उसने गर्व से कहा। फिर गौशाला के द्वार पर एक जगह स्थिर खड़ी हो खिड़की की तरफ देखने लगी। जब कुछ देर उसी तरह स्टेच्यू बनी रही तो मैने पूछा, "क्या देख रही हो...?"
    "देख रही हूँ कि मैं यहां से सत्य को खिड़की में कैसी दिखी होऊंगी... जानते हो उस बरसाती शाम में सत्य ठीक इसी जगह खड़ा था... जब ऊपर मै खिड़की बंद करने आई तो...
     "उसे देख कर तुम रुक गई थी, फिर तुमने इशारे से पूछा..."
    "अरे तुम को तो सब मालूम है..."
    "क्यों नहीं होगा, कल ही तो तुमने बताया था... याद करो..."
     ये तुम सुन-सुन के बोर तो नहीं हो रहे हो ?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
   "नहीं... बिल्कुल नहीं... बल्कि तुम और डिटेल में बताओ, हो सकता है, एक दिन मैं ही एक कहानी लिख दूं ..", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
    "अरे वाह ! हम धन्य हुए... तुम लिखोगे तो पक्का अच्छा ही लिखोगे..."
    "नहीं मैंने तो यूं ही कह दिया था। कहानी तो तुम लिखोगी, डायरी वाली बात भूल गई क्या ?"
    "हां याद है... डायरी मैं लिखूंगी और उसे पढ़ कर कहानी तुम लिखना। जो इतनी अच्छी पोयम लिख सकता है, जो अपने दर्द के साथ सामने वाले के दर्द को भी महसूस कर सकता है, वो नहीं लिख सकेगा, तो फिर कौन... ? वैसे मेरी कहानी का नाम क्या रखोगे ?"
    "बच्चा पैदा हुआ नहीं और उत्सव की तैयारी !! पहले लिख तो जाने दो... वैसे मुझे नहीं लगता कि किसी की रियल लाइफ पर कुछ लिखना चहिए... एक सामान्य लाइफ में एडवेंचर, थ्रिल, फाइट, ड्रामा कहां होता है...?"
    "प्यार तो होता है न... ये बॉयफ्रेंड ! ठीक है जो तुमने कहा मान लिया, लेकिन ऐसी कहानियां या कविताएं हमेशा के लिए होती हैं, क्यों कि प्यार की फीलिंग किसी भी देश, परिवेश, यहां तक कि कलचक्र से भी परे होती है, हर युग में... इसलिए कहती हूँ फेमस होने के लिए नहीं जो तुम्हें पसंद आए वो लिखना… अपने लिए लिखना...", उसने समझते हुए कहा।
   "तुम ठीक कहती हो..."
   "और देखो यदि कभी मेरी कहानी लिखना तो उसका टाइटल अजनबी रखना... समझ लो इसी शर्त पर परमीशन दे रही हूँ..."
   "बिलकुल.... और तुम्हे डेडिकेट करूंगा .."
   "नहीं, मुझे नहीं... अपने पैरेंट्स को... इस तरह मैं समझूंगी की मेरे मम्मी-पापा को भी है..."
   "एक बात और पीहू, मैने अभी तक जो भी कहानियां लिखी हैं, फर्स्ट पर्सन में लिखी हैं, यानी कहानी का मुख्य किरदार अपनी कहानी खुद कहता है... तो मैं पीहू बन कर लिखूं या सत्य ...?"
    "अच्छा ऐसा है !! तो तुम सत्य बन कर लिखना। 
    "इस तरह लिखने पर तो कहानी में तुम अजनबी बन के रह जाओगी..."
    "अच्छा तो ऐसा करना जब तुम्हें ऐसा महसूस होने लगे तो तुम खुद एक किरदार बन जाना... वेरी सिंपल,. तुम तो अच्छी तरह से जानते हो न मुझे...?"
   "कहां जनता हूँ, बस कुछ-कुछ समझने लगा हूँ...", मैने हंसते हुए कहा।
   "अरे !... ये तो और अच्छी बात है न, अपने किरदार को जानने से अच्छा समझना होता है, तभी तुम उसे अच्छे से लिख पाओगे...", उसने भी हंसते हुए कहा।
   "चलो शीशम के पेड़ के पास, वहां से भी देख लो कि सत्य को तुम कैसी दिखाई देती रही होगी..."
  "ओह ! वेरी गुड सजेशन....", फिर वह भागती हुई गेट तक पहुंची।
   "रुको यार... मैं तो ऐसे ही मजाक...", मैने उसे रोकना चाहा।
    लेकिन वह गेट खोलते हुए बोली, "अरे आओ भी..."
    अगले ही पल हम दोनों शीशम के पेड़ के नीचे खड़े थे। वह एंगल बदल-बदल कर, कभी एड़ी उठा-उठा कर खिड़की की तरफ देख रही थी, "शैल ये तो काफी दूर है, मै यहां से सत्य को एक परछाई की तरह ही दिखती रही होऊंगी, है न ? तभी तो मैं सोचूं कि खिड़की में इतनी सुंदर लड़की को देख कर भी उसने एक बार भी हाय-हेलो का इशारा तक न ..."
   "हां दूर तो है, लेकिन स्पष्ट न दिखने की और भी वजह हैं .... जैसे खिड़की में छड़, अटारी के अंदर बाहर की तुलना में कम उजाला..."
   "लेकिन वो तो मुझे स्पष्ट दिखता था..."
   "देखो मैं समझाता हूं। एश्यूम, सत्य तुमसे दस कदम की दूरी पर खड़ा है, और तुम चलनी अपने फेस के सामने कर उसे देख रही हो...
    "जैसे करवा चौथ में देखते हैं...", उसने मेरी पूरी मदद करते हुए कहा।
    "बिल्कुल... तो तुम्हें सत्य जितना स्पष्ट दिखेगा तुम सत्य को नहीं दिखोगी... अब समझ लो खिड़की वही चलनी है..."
   "साइंटिफिक रीजन... है न ?"
   "या साइंटिफिक रीजन...", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
    तभी सत्य की बाइक आती हुई दिखाई दी। हमें पेड़ के पास खड़े देख कर उसने अपनी बाइक वहीं पर खड़ी कर दी, "अरे ! तुम दिनों यहां क्या कर रहे हो...?
    "कुछ नहीं यार, पीहू देख रही है कि तुम उसे यहां से कैसे देखते रहे होगे... एक मिनिट रुको... मुझे करेक्ट करने दो... एक्चुअली यहां से ये देख रही है कि वो खिड़की पर कैसी दिखती रही होगी... "
   "मतलब ... अरे जब ये यहां है तो वहां कैसे दिखेगी...", सत्य ने फटे मुंह से पूछा था।
   "मतलब तुम अब इसी से पूछो....", मैंने उनके बीच से एक किनारे हट पीहू की तरफ इशारा किया।
   "वो सब बाद में... सत्य आओ तुम यहां खड़े हो जाओ ...", और उसने जबरन सत्य की बाह पकड़ कर अपनी जगह खड़ा किया फिर वहां से भागती हुई बोली, "मै खिड़की से जब तक इशारा न करूं तब तक यहीं खड़े रहना..."
   "अरे ... पीहू !! देखो मुझे अभी... फैक्ट्री भी... ", लेकिन पीहू ने एक न सुनी वह धर की तरफ भागी। सत्य ने मुझसे मुस्कुराते हुए पूछा, "भई ये सब क्या है... ये कौन सी सनक चढ़ गई इसे..."
   "कुछ नहीं… उसकी वही जाने... तुम बस खिड़की की तरफ देखते रहो...", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
   "तुम भी यार .... मिले हुए हो ...", उसने भी मुस्कुराते हुए कहा था।
   "वो .... देखो... देखो...', मैने खिड़की की तरफ इशारा किया।
   खिड़की में एक लड़की का साया उभरा। फिर खिड़की की छड़ पकड़े कुछ देर तक खड़ा रहा। फिर उसने आने का इशारा किया।
   "चलो , कटघरे से बारी हुए...", सत्य ने मुझसे कहा।
     हम दोनों अटारी पहुंचे। मैं और सत्य चारपाई पर बैठे और वह सामने कुर्सी पर किसी मास्टरनी की तरह।
   "अच्छा सत्य ! तुमने मुझे खिड़की में खड़े देखा न...?", उसने पूछा और मैं समझ गया, क्लास हेज बीन स्टारटेड।
   "हां ... देखा  ..."
   "मै कैसी लगी...?", वह बीच में ही सत्य की बात काटते हुए बोली।
   "अच्छी ... बहुत ही सुंदर ... लाजवाब ..."
   "जैसे कुछ डिस्क्राइब करो न ?", वह शोखी से कुछ रूठने का अभिनय करते हुए बोली।
   सत्य खुश। वह भला ऐसा मौका कहां छोड़ने वाला था, "इस सूट में तुम बहुत ही प्यारी बहुत ही खूबसूरत लग रही थी... 
   "और...?"
   "ये तुम्हारा दमकता हुआ चेहरा, सूरज की किरणों से और भी दमक रहा था..."
   "और...?"
   "तुम्हारे कान के टप्स की चमक चन्द्रमा को भी लज्जित कर रही थी..."
   "अच्छा !! और जी...?", वह कुछ लजाते हुए बोली।
    "और ये खुले हुए बाल और भी रेशमी लग रहे थे"
    "हाय !! और...?", वह कुछ और लजाते हुए बोली।
    "और...? हां ... ये तुम्हारी गहरी बादामी आंखे लगा कि मैं इनमें डूब ही जाऊं..."
    उसकी ये बातें सुनकर मुझे तेजी से हंसी आ रही थी। मैने अपनी हथेली से अपना मुंह दबा लिया था। सत्य ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्या हुआ, मैने कुछ गलत..."
    "ऊं हु ... गो ऑन ...", मन ही मन बोला, "बेटा तुम आज पिटोगे..."
   "अरे हां ये दुपट्टा तो ऐसे ...
    "चुप ... बिल्कुल चुप ... झूठे ...  वहां पर खड़े इंसान को खिड़की के पीछे खड़े इंसान की शक्ल तो अच्छे से दिखती न होगी, और तुम्हे मेरा दुपट्टा, कान के टप्स और तो और ये बादामी आंखे भी दिख गई। .... और इधर आओ ...", फिर उसने सत्य को खाट से उठा खिड़की के पास खड़ा करते हुए कहा, "कहा से आ रही सूरज की किरणें, बताओ ? और आएंगी कैसे तीन बज गए है, सूरज आंगन की तरफ पहुंच रहा है... समझे... तुम एक नंबर के झूठे हो..."
   फिर वो गुस्सा दिखाते हुए मुंह लटका के उदास कुर्सी में बैठ गई। सत्य ने मेरी तरफ देखा, मैने उसे आंखों ही आंखों में कुछ इशारा किया कि तुम कुछ देर चुप हो कर बैठे रहो बस। 
    लेकिन .... वह किसी राइटर का किरदार नहीं बल्कि पीहू का सत्य था। पीहू गुस्से में हो तो वह चुप रह लेगा। लेकिन पीहू उदास हो, रूठी हो और सत्य चुपचाप बैठा रहे, यह नहीं हो सकता था।
     वह पीहू के सामने घुटने के बल बैठ गया। फिर उसने उसकी दोनों हथेली अपने हाथ में ले उसकी तरफ देखते हुए बोला, "पीहू ... देखो मेरी तरफ ... देखो तुम्हे लगता है न कि मैने तुमसे झूठ बोला है… तो देखो मेरी आंखों में।... देखो क्या इन आंखों में तुम न दिखाई देती हो ..? मैने तुम से कुछ भी झूठ नहीं कहा... तुम मुझसे कितनी भी दूर रहो... इन नजरों में तुम हमेशा रहती हो... और जो नजरों में रहेगा वो हमेशा स्पष्ट ही दिखाई देगा। ... फिर भी यदि तुम्हे ऐसा लगता है कि मैने तुमसे झूठ कहा तो प्लीज माफ कर दो ? ... देखो मैं कान पकड़ कर माफी मांगता हूं... प्लीज पीहू ... "
    "हां सत्य कह लो अभी पास हूँ... नजदीक हूँ... तो हूँ तुम्हारी आंखों में.... जिस दिन दूर हो जाऊंगी तो उस दिन..."
    "नहीं पीहू ! चाहे तुम मुझसे कितनी भी दूर रहो इन नजरों में तुम्हारी ही तस्वीर होगी..."
   "चाहे मैं...", फिर पीहू ने सत्य की आंखों में देखते हुए एक झटके में पूछा,  "मर ही क्यों न जाऊं...?"
   उसका पूछना था कि सत्य के चेहरे के भाव बदल गए। उसके मुखड़े की चमक कहीं खो सी गई। आंखे फटी की फटी रह गईं। वह किसी पत्थर के बुत की तरह उसका हाथ पकड़े उसी तरह जड़ बैठा रहा।
     शरीर में कोई हलचल नहीं, हृदय में कोई स्पंदन नहीं। एक ऐसा शख्स मेरी नजरों के सामने था जो शायद सांसे लेना ही भूल गया था। उसकी ये हालत देख कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पूरे बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। मेरी छठी इंद्री ने होने वाली किसी अनहोनी का आभास कराया। मैं उठा, सत्य के पास बैठते हुए उसके कंधे में धीरे से हाथ रखते हुए उसे पुकारा, "सत्य ! ..."
    उसके चेहरे के भाव एक बार फिर बदले। अब उसके चेहरे में मासूमियत थी, वो मासूमियत धीरे-धीरे करुणा में बदलती जा रही थी, और जब चेहरे में न समा सकी तो आंखों से एक धार बन के बह निकली।
     जब कोई इंसान इस तरह बिना हिचकी लिए बिना सिसकारियां लिए रोता है तो समझना चाहिए कि कोई इंसान नहीं एक देवता रो रहा है। मैने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की "हे भगवान ! इन आंसुओं के सैलाब से पीहू को बचाना..."
     "सत्य तुम यहां से उठो, छोड़ो इसका हाथ...", कहते हुए मै उसके हाथ से पीहू का हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगा। 
    "तुम रहने दो शैल, ये जानती है और समझती भी है... कि इसकी मौत की बात सुन कर मेरी क्या हालत होती है... फिर भी ये अक्सर मरने की बातें करती रहती है... तो सुनो पीहू !! अब तुम सुनो... और जरा ध्यान से सुनो..."
    अंतिम शब्द सुन मेरी आत्मा कांप गई। मैने उसे एक बार फिर रोकने की नाकाम कोशिश की, "अब कुछ नहीं सत्य... प्लीज चुप हो जाओ... बेवकूफ मत बनो ... प्लीज...  रुक जाओ..."
   लेकिन सत्य ने मेरे बात सुनी ही नहीं, वह आगे बोला, "... अब इस जन्म में तुम मर कर देख ही लो कि मेरी इन आंखों में तुम्हारी सूरत रहती है कि नहीं। .... तुम्हारे बिना कैसे जीता हूँ।  तुम्हे हर पल हर लम्हे याद रखता हूं कि नहीं... यह भी देख लेना। ... और जब तुम्हें यकीन हो जाए, तुम्हारी परीक्षा में पास हो जाऊं तो मिल लेना किसी जन्म में। ... लेकिन एक वादे के साथ उस जन्म में मै तुम्हे छोड़ कर जाऊंगा... और मेरे इस जन्म के दर्द को तुम अपने उस जन्म में महसूस करना... यदि दो जन्मों में भी बात न बने तो ये चक जन्म-जन्मांतर तक चलता रहे... मै उसके लिए भी तैयार हूँ...."
     "सत्य !!!...", उसके कंधे को झंगझोरते हुए हताश स्वर में बोला, "तुमने ये क्या किया सत्य, ये क्या हो गया तुमसे ?.... ओह ! ... बेवकूफ तुमने खुद अपने ही आप को कई जन्मों के लिए श्रापित कर लिया और ... और अपने साथ इसे भी। मै यहां आया ही क्यों ?"
    मै खाट से टिक कर आंखे मूंदे कुछ देर चुपचाप बैठा रहा। कुछ देर बाद जब मैने आंखे खोली तो देखा पीहू की गोद में सत्य का सर था और पीहू के दोनों हाथ सत्य के कंधे पर। सत्य रो रहा था, और पीहू किसी पत्थर की बुत की तरह भावशून्य बैठी थी। उसके खुले हुए बाल खिड़की से आती हवा से धीरे धीरे उड़ रहे थे। सत्य हिचकियां ले-ले कर सुबकते हुए उससे बार-बार सॉरी कह रहा था।
      मै उठ कर खिड़की के पास आ गया। छड़ पकड़ कर बाहर देखता हुआ कुछ पल वहीं खड़ा रहा। दोनों अभी भी उसी तरह बैठे थे। इसी खिड़की की इन्हीं छड़ों को पकड़े हुए कुछ देर पहले मैने पीहू से कहा था, " कुछ गुनाह, गुनाह नहीं, गुनाह-ए-अजीम होते हैं, जिनकी कोई मुआफ़ी नहीं...",
     और वो गुनाह इन दोनों मासूमों से हो गया। अब कुदरत यानी नियति तो पूरी ईमानदारी से अपना खेल खेलेगी। 
      सत्य तुम्हारे राइटर ने तुम्हे चुपचाप कुछ देर बैठने का इशारा किया था न ? काश ! मान लिया होता तो शायद.... नियति को कुछ और मंजूर होता। उसे तुम्हारी जुबान का सहारा तो न मिलता। 
     पर शायद तो शायद ही होता है न, वो होता कहां है। नियति तो अपना खेल खेल चुकी थी, वह अपने आपको कभी भी दोषी सिद्ध नहीं होने देती, वह सदैव हमारा ही सहारा लेती है।
      और गर्लफ्रेंड तुम !! कहती थी न कि अपनी उम्र से अधिक मेच्योर्ड दिखता हूँ मैं ?... तो काश ! तुमने भी कुछ मैच्योरिटी दिखाई होती। अपने मृत्यु की बात क्यों छेड़ी बावजूद इसके कि तुम्हें अच्छे से मालूम था कि तुम्हारी मृत्यु की बात सुनकर सत्य पर  क्या गुजराती है। तो लो अब तुम भी बन जाओ हमेशा-हमेशा के लिए मेच्योर्ड....!!
    और मैं ? मै तो राइटर हूँ ... नियति जो लिखवाएगी वही लिखूंगा। होनी तो हो चुकी थी, लेकिन इस राइटर को अपने इन दो किरदारों को लेकर आगे तो बढ़ना ही था। क्यूकि इस कहानी का ये अंजाम नहीं, इसे तो अभी और सफर तय करना था। मै सत्य और पीहू के पास घुटने के बल बैठ गया। धीरे से सत्य की पीठ में हाथ रखते हुए बोला, 
      "इट्स ओके ... मै भी तुम दोनों से सॉरी कहना चाहता हूँ... काश कि मैं यहां न आया होता तो शायद तुम दोनों एकदूसरे को यूं हर्ट न करते। इसके लिए तुम दोनों मुझे माफ कर दो... प्लीज। और मेरे कहे पर तो बिल्कुल मत जाना, अरे यार ये कहानी-कविता पढ़-पढ़ के दिमाग पागल हो गया है। कुछ भी कह देता हूं। एक्चुअली में यार लिटरेचर की किताबों ने मुझे कुछ-कुछ साइको कर दिया है। ... अब देखो 21वीं शादी आने वाली है, और मैं बाते श्राप की कर रहा हूँ, ऐसा कहीं होता है, नहीं न ? ये गर्लफ्रेंड ! तुम भी तो कुछ कहो। अपने बॉयफ्रेंड की कुछ तो सिफारिश कर दो कि मुझे माफ कर दें ,.. प्लीज"
   पीहू ने मेरी तरफ देखा, मुझे महसूस हुआ जैसे उसकी नजरें मुझसे पूछ रही हो कि क्या करूं। जब मैं उसी तरह खामोश रहा तो उसने शांत मन से कहा,  "हूं... और नहीं तो क्या सत्य! हम इक्कीसवीं सदी में पहुंचने वाले हैं, ये श्राप-वराप कुछ नहीं होता। मैने बुरा नहीं माना। मैं भी तुम्हे दिल से सॉरी कहती हूँ, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। अब मेरे ब्वॉयफ्रेंड को भी माफ कर दो। अब देखो तुम्हे अपनी होने वाली वाइफ की कसम..."
    "हां सत्य ये कलजुग है यार, यहां अब श्राप का नाम बदल कर शराब कर दिया गया है, और वो लगने के लिए नहीं लगाने के लिए बनी है ... कहो तो निकालू ? बैग में है ... हूँ ... बोलो ..?", मैंने उसे थोड़ा सा गुदगुदाते हुए कहा। 
    "तुम्हें माफ कर दूंगा, लेकिन इससे कहो एक बार फिर बोले ...", सत्य ने उसकी गोद में उसी तरह सर रखे हुए किसी बच्चे की तरह ज़िद की।
     "हां ... बिल्कुल ... एक बार क्या अनंतबार कहेगी ....", मैने पीहू की तरफ देखा था।
    "बिल्कुल नहीं कहूंगी..."
    "तो मैं किसी को माफ नहीं करूंगा....!", उसने रूठने का अभिनय करते हुए कहा।
    पीहू थोड़ा सा गुस्से से बोली, "अब ब्लैकमेल कर रहे हो तुम..."
  मैंने कुछ खीझने का अभिनय करते हुए कहा, "यार पीहू ! तुम भी हद करती हो, अब एक बार कहो या सौ बार कहो, बात तो वही है न ? तो कह क्यों नहीं देती हो...?"
   उसने समझौता करते हुए कहा, "मेरे होने वाले प्यारे हसबैंड ...मेरे पूज्य पति-परमेश्वर। अब देखो उठो भी। अपनी होने वाली वाइफ को और मत परेशान करो ... प्लीज ..."
    कभी इसी गांव की पगडंडियों में चलते हुए आखिरी दिन मैंने पीहू से कहा था, "करुणा से भरे हृदय में यदि किसी के लिए प्रेम जागृत होता है तो वह बहारों के मौसम की रूमानियत में डूबे हुए प्रेम से अधिक स्थाई और स्वार्थ-रहित होता है। हम उसके दुःख और संताप को हरने की कोशिश करते है, अपना सर्वस्व त्याग कर उसकी खुशी चाहते हैं, यही तो है प्रेम का मूल आधार। इस तरह हम प्रेम के उस अंतिम मुकाम पर होते हैं, जहां आज तुम खड़ी हो पीहू। मेरे लिए अनगिनत त्याग करने के द्वंद से लड़ती हुई..." 
    आज समझ में आता है कि उसने वह त्याग तो उसी दिन कर दिया था।
    सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा, "जाओ शैल तुम्हे माफ किया... और थैंक्स भी..."
   "सॉरी तो समझ में आया लेकिन यह थैंक्स किस बात का ...", मैं आश्चर्यचकित था।
   "याद करो, शीशम के पेड़ के नीचे मैंने तुमसे कुछ कहा था, एक्चुअली मैं तुमसे मांगा था, और तुमने कहा था कि तुम पूरी ईमानदारी से कोशिश करोगे... कंग्रॅजुलेशन तुम्हारी कोशिश कामयाब हुई...", वह मेरी तरफ देख कर थोड़ा सा मुस्कुराया था।
   "क्या !!", मैं चौक गया, "लेकिन मेरी इसमें..."
   उसने मुझे बीच में रोकते हुए गले लगा लिया, "थैंक्स यार... सचमुच सब कुछ तुम्हारे होने से ही हुआ..."
    पीहू ने मेरी तरफ देखा। उसकी नजरें मेरी नजरों से आ मिलीं, जैसे पूछ रही हों, "क्या वादा किया था तुमने...", मैने नज़रे झुका ली। सत्य कुछ मुस्कुराते हुए बोला, "ओह याद आया ! मैने भी तुमसे एक वादा किया था निभाऊंगा...ऑफकोर्स मेरे दोस्त ! फॉरएवर .... मरते दम तक...", 
   फिर वह खड़ा होते हुए बोला, "यार आज तो जश्न होगा ... कल तुमने बाबा को मनाया था आज मैं मनाऊंगा... और देखो पीहू,  खबरदार जो आज तुमने मेरे दोस्त को चाय पिलाई तो.... मैं तो कहता हूं तुम दोनों ही मत पीना। शैल खोल लो ढक्कन और इंजॉय करो। आफ्टर ऑल यू आर बॉयफ्रेंड ऑफ माय बिलव्ड... और डार्लिंग तुम भी साथ दो..."
   सत्य खुशी से पागल हो रहा था। यह सब कुछ मुझे बहुत ही अजीब लग रहा था। कभी मैं पीहू की खामोश नजरों को देखता तो कभी सत्य की बेहिसाब खुशी को।
     सत्य ने पीहू को गले लगाते हुआ कहा "थैंक यू पीहू... थैंक यू। आज तुमने जीवन की सबसे बड़ी खुशी दे दी मुझे...  तुम मेरी धर्मपत्नी हो और रहोगी। और मैं सिर्फ तुम्हारा रहूंगा, हमेशा-हमेशा के लिए..."
     सत्य के पीछे मैं चारपाई पे टिक कर जमीन पर ही बैठा रहा। पीहू बराबर मुझे देखती जा रही थी। अचानक उसके होठों में हल्की सी मुस्कान आ गई, शायद फीकी मुस्कान। 
   कौन कहता है कि सिर्फ राइटर अपने किरदारों को लिखते हैं। कभी-कभी किरदार भी अपनी कहानी खुद ही लिख लेते हैं। सत्य, जिसे अभी कुछ देर पहले दर्द में डूबे रोते हुए देखा, अब खुशी से पागल होते देख रहा था। लेकिन पीहू के होठों की खामोश फीकी मुस्कान उस पल मेरे लिए रहस्य बनके रह गई थी।
     "पीहू मैं अभी फैक्ट्री गया और आया ... जरूरी न होता तो न जाता ... लेकिन तुम चिंता मत करना। मैं अभी गया और अभी लौट कर आया। अब मैं जाऊं ?", उसने पीहू से जाने की इजाजत मांगी।
   "चलो नीचे तक मैं भी चलती हूँ ..."
       मैंने रम का एक सामान्य पैग बनाया और उसे लेकर खिड़की के सामने खड़ा हो गया। धीरे-धीरे शिप लेते हुए बाहर देखने लगा। कुछ देर बाद ही सत्य को बाइक स्टार्ट कर फैक्ट्री की तरफ जाते हुए देखा। पीहू उसे गेट तक छोड़ वापस लौट रही थी कि उसकी निगाह ऊपर मेरी तरफ पड़ी और मैने अपनी ग्लास उसे दिखा मुस्कुराते हुए कहा, "चीयर्स..."
   वह अटारी की सीढ़ियां चढ़ते हुए कुछ उलाहना देते हुए बोली, "बस तुम्हें तो पीने का बहाना चाहिए न ? अभी दिन भी नहीं डूबा और तुम शुरू हो गए !! पहले ये बताओ तुमने सत्य से क्या वादा किया था..."
  मैने नज़ारे चुराते हुए कहा, "देखो लड़ो मत, मैने कोई वादा नहीं किया था, हां ये जरूर कहा था कि मैं कोशिश करूंगा कि तुम सत्य से शादी करने के लिए मान जाओ... लेकिन इस तरह मानोगी, नहीं जानता था। देखो ये होनी थी, जो हो गई। इसमें मेरा कोई दोष नहीं..."
    "ओह ! अब समझी, तो तुम इसलिए मुआफी मांग रहे थे !! ... अब चुप क्यों हो कुछ बोलो... मिस्टर एक्टर...", उसके स्वर में तल्खी थी। लेकिन उसने एक रास्ता दिखा दिया था, एक्टिंग का। मैने वही करने की कोशिश की... किसी उजड़े और बर्बाद आशिक की तरह नाटक करते हुए मैं बोला...
    "तो कह पीहू कह। मैं और क्या करता ? ...मेरी गर्लफ्रेंड की शादी मेरी ही नजरों के सामने हो गई, वह किसी और की हो गई, और मैं ? मैं कुछ न कर सका...  सिर्फ़ देखता रहा ? ऐसे आशिक का मर जाना ही बेहतर है... उसे डूब जाने दे इन शराब के प्यालों में... मिटा लेने दे उसे अपनी हस्ती इस जमीं से... ताकि हम फिर मिल सके किसी रूहानी दुनिया में, या फिर किसी और जन्म में... जहां इस जमाने की बंदिशे न हों। हो किसी गांव की नई पगडंडियां, हों खूबसूरत गलियां। एक नया सूरज... एक नया चंद्रमा। इसी तरह ढलती हुई एक नई शाम... एक नई सुहानी रात।, जहां हमारी मोहब्बत फिर से परवान चढ़े, जवान हो।  पीहू! ओह पीहू !!! यह तूने क्या किया रे ? पल भर के लिए अपने इस बॉयफ्रेंड के बारे में न सोचा !! कैसे जिएगा वह तेरे बिना ? हाय मैं कहा जाऊं... तेरी ये बेवफाई देखने से पहले मैं मर क्यों न गया ?"
    आशा थी डांट पड़ेगी। लेकिन नहीं, वह मुझसे दो कदम आगे निकली। मेरी आशा के विपरीत उसने घुटने के बल बैठते हुए एक हाथ अपने दिल के पास और दूसरा हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, " ऐ मेरे दिलबर !! तू सच कहता है, मैं तेरी महबूबा कहलाने के लायक ही न रही, लेकिन मेरी जान मुझे किन हालातों में यह फैसला लेना पड़ा, तू क्या जाने ? ... यह फैसला लेने से पहले तेरी इस दिलरुबा को कितनी बार मरना पड़ा, तू क्या जाने ? इसे या तो मैं जानू या मेरा रब जाने। ... तू सच कहता है... चल मुझे भी मिटा लेने दे अपनी हस्ती इस ज़माने से... ताकि हम मिल सके फिर किसी रूहानी दुनिया में... इस आस्मां के पीछे... चांद सितारों की दुनियां में। जहां न होंगी जमाने की बंदिशे... न होंगी ये रुस्वाइंया। केवल हम होंगे... और होगी हमारी मोहब्बत। ऐ मेरे लुटे आशिक ! दे मुझे भी ये जहर का प्याला... इसे पीकर मैं भी तेरी बाहों में दम तोड़ना चाहती हूँ..."
     "ये नौटंकीबाज बस बहुत हुआ... अब उठो...", मैने अपनी हंसी रोकते हुए  कहा।
   "ऐ मेरे महबूब ! मेरी मासूम मोहब्बत को फरेब न समझ... नौटंकी न कह... कहीं ऐसा न हो कि तुझे दोज़ख की आग में जलना पड़े..."
  "उठो भी यार, मज़ाक छोड़ो...", मैने खीझते हुए कहा।
   "हाय ! मेरे दिलबर को मेरी पाक-संजीदा मोहब्बत मज़ाक नजर आती है ? या खुदा ! अब नहीं बर्दाश्त होता... मुझे फ़ौरन उठा ले इस जहां से...", इस बार वह उसने अपने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए फरियाद की।
    "तो ले पी ! मेरी महबूबा पी इस जहर के प्याले को, मेरे साथ पी। दोनों ही इस दुनिया को कहें अलविदा..."।
   "ऐ मेरे बर्बाद आशिक ! जरा ठहर... मुझे आखरी बार सजदा कर लेने दे, तब तक तू इस ज़हर को अकेले न पी। मेरे लिए भी ज़रा बचा के रख... ये मेरे महबूब मुझे पल भर की मोहलत दे...", फिर वह अपने चेहरे में उसी तरह के भाव लिए सीढ़ियां उतर गई। मैं समझ गया कि वह बाबा के पूजा की तैयारी करने गई है। 
    इस तरह पीहू ने मेरे ही रंग में रंग कर, मेरे ही अंदाज में अपने दिल की बात भी मुझसे कह दी। उसी पल मुझे समझ आ गया था कि इन्हीं राहों में चलते हुए उसने सच कहा था, ""किसी के साथ सहजता से जीवन जीने को प्यार नहीं कह सकते..."
    मै वापस खिड़की की तरफ मुंह फेर कर खड़ा हो गया, फिर अनयास ही मैने ज़ाम खाली कर गिलास एक तरफ फेक दी। अब ये दर्द की इंतहा थी कि दोनों हाथ से खिड़की की छड़ पकड़े मैं चुप चाप रो रहा था। बंद कमरे में कैद उसी लड़के की तरह, न कोई हिचकी न कोई सिसकी। कुछ देर रो लेने के बाद खुद के लिए मन में घृणा जागी, "लालची इंसान कही के, मातम मना रहा, दुआ दे उसकी मोहब्बत सलामत रहे..."
     उसकी मोहब्बत तो सलामत रही लेकिन वह स्वयं न रही। काश ! उस दिन रब से उसके होने की दुआ मांगी होती।
    लगभग आधे घंटे बाद वह वापस आई थी। तब तक मैं ओथेलो के कुछ और पन्ने पढ़ चुका था। उसके हाथ में सलाद और नमकीन की प्लेट थी। मेरे सामने छोटे से टेबल में रख कुर्सी में बैठते हुए बोली, "अब लाओ दो..?"
   "क्या ...?", मैंने अनजान बनने का अभिनय करते हुए पूछा।
   "ज़हर... मेरे महबूब ! जहर ..."
   "बाबा जान गए तो...?"
  "नहीं जानेंगे ...? वो पूजा घर में घुस गए हैं। अब एक घंटे से पहले बाहर नहीं निकलेंगे। तब तक सत्य आ जाएगा और फिर वह सब संभाल लेगा .."
   "बाबा से साजिश ! वह भी फुल प्रूफ !!", मैंने बैग खोलते हुए कहा। 
   "अरे ! तुम्हारी गिलास तो तुम्हारे पास थी कहां गई ... ?", 
    मैने एक कोने में पड़ी गिलास की तरफ इशारा करते हुए कहा, "फेक दी... अब ये जहर और नहीं पिया जाता पीहू !"
   "कौन सा जहर ? शराब का... या फिर जिंदगी का...?"
   मैं कुछ नहीं बोला, उसी तरह सर झुकाए बैठा रहा। वह उठी और गिलास को उठा के टेबल में रखते हुए बोली, "दोस्त तुम्हीं कहते हो न कि जिंदगी चार दिन की होती है... तो मन में कोई गिल्ट मत रखो... सच कहती हूँ... जब सत्य ने तुम्हे थैंक्स कहा तभी मैं समझ गई थी कि उसने तुमसे क्या मांगा होगा... मेरी कल की बात याद करो... मैने कहा था न कि हम जैसा खुद होते हैं कभी कभी सामने वाले को भी उसी तरह समझ लेने की भूल कर लेते हैं... बस यहीं गलती कर जाते है... रही बात जहर पीने की... तो मैं भी हूँ न तुम्हारा साथ देने के लिए... सो बॉयफ्रेंड चीयरअप... बनाओ जाम... लेकिन मेरी गिलास... रुको मैं लेकर आती हूँ ...", वह कुर्सी से उठते हुए बोली।
   "नहीं गर्लफ्रेंड बैठो, तुम्हारी भी हमारे पास है...", मैने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा। 
   "तुम्हारे पास दो ग्लास कैसे ?"
   "एक ज्ञान की और एक मेरी, दोनों बैग में थी तो चली आई मेरे साथ..."
   "ओह...? 
    उसके लिए मैंने व्हिस्की का एक छोटा सा पैग बनाया और अपने लिए रम का। उसने मेरे पैग की तरफ इशारा करते हुए पूछा था, "यह मीठी वाली है न ?"
    "हां ... "
    "तो यही वाली मुझे भी दो..."
    "मीठा जहर बहुत खतरनाक होता है, बहुत तड़पा- तड़पा के मारता है..."
    "एक झटके में सब कुछ खत्म हो जाए... तो मरने का मज़ा ही क्या...", उसने अपनी गिलास उठते हुए कहा।
   मैने दो घूट ली फिर पीहू की तरफ प्रशंसा भरी नजरों से देखते हुए कहां, "यार तुम्हें तो कमाल की उर्दू आती है... और कहती हो उर्दू नहीं आती...?"
    "जानते हो यह सब मेरे बॉयफ्रेंड का असर मुझमें हो रहा है... तारीफ करनी हो तो उसकी करो...", फिर उसने एक सांस में गिलास खाली कर दी।
    "कर लेंगे यार उसकी भी कर लेंगे। पहले तो तुम यह लो ..",. मैंने एक नॉर्मल पैग उसे बनाते हुए कहा, "अब आराम से...रिलैक्स हो के..."
     "ठीक... अच्छा ! तुमने सच कहा न कि ये श्राप- वारप कुछ नहीं होता है ?"
     "बिल्कुल सच कहा है... वो क्या है न पीहू !! मैंने अभी कुछ दिन पहले देवयानी और कच्छ की कहानी पढ़ी है, तो वही सब मेरे दिमाग में था। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता...", मैंने उसे कन्वेंस करते हुए समझाया, "तुम ज्यादा मत सोचो... "
   "तुमने देवयानी और कच्छ की कहानी पढ़ी ! वॉव !! तुम्हे भी पौराणिक कहानियों में इंटरेस्ट है... चलो कोई तो अपना-सा मिला...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
   "मतलब तुम्हे भी पसंद है ?", मैने आश्चर्य से पूछा।
   वह उत्साहित होते हुए बोली,  "बहुत... बचपन से सुनती आई हूँ... मेरे पास तो बहुत सी बुक्स भी रखी हैं..." 
   "ये सुनो...", फिर वह एक झटके से बोली जैसे उसे कुछ याद आया हो, "तुम्हारी शर्ट कोहनी के पास से फटी क्यों है ?  एक मिनिट... एक मिनिट, अपनी कोहनी तो दिखाओ..."
    उसे कब मेरा इंतजार करना था। वह उठी और मेरा हाथ पकड़ उठते हुए बोली, "ये तुम्हे चोट लगी है ? हे भगवान ! तुमने बताया क्यों नहीं..?", वह थोड़ा-सा इमोशनल होते हुए बोली।
   "अरे कुछ नहीं, थोड़ी सी खरोच आ गई थी बस... अब बिल्कुल ठीक है। देखो ज्यादा कुछ नहीं है, बस ऊपर ही थोड़ा सा लगा है, कोई गहरा घाव थोड़ी हुआ है..."
    "सही कह रहे हो न ? नहीं तो बोलो फर्स्ट एड बॉक्स रखा हुआ... मैं लाती हूं और पट्टी कर देती हूं..."
    "अरे नहीं पीहू ठीक हूँ, और वैसे भी परसों लगी थी, अब तो लगभग ठीक हो गई है। एक्चुअली में परसों रात को जब मैं यहां से बगिया जा रहा था तो एक जगह झाड़ी से उलझ के गिर गया था। वहीं थोड़ी-सी लग गई, फुल बाह की शर्ट थी तो इसलिए ज्यादा असर नहीं हुआ। जो कुछ होना था शर्ट का हुआ...", मैंने बात को हंसी में उड़ते हुए कहा था..."
   "सच बताओ, कोई दिक्कत तो नहीं न ?"
   "होती तो मैं कल ही न बता देता ?"
    "कहीं तुम्हे बुरा तो नहीं लगा था ? वो क्या है न कि हमे बाद में फील हुआ था कि हमे तुम्हारे साथ कुछ और टाइम एक्सपेंड करना चाहिए था। और वैसे भी टाइम ही क्या हुआ था... तुम्हें यूं अकेले नहीं छोड़ना चाहिए था ...", वह कुछ भावुक होते हुए मुझसे कह रही थी।
     "वास्तव में तुम सच्ची और अच्छी इंसान हो जो इतना अच्छा सोचती हो वरना क्या जरूरत है किसी अजनबी के बारे में इतना सोचने की ?..."
     "नहीं बॉयफ्रेंड ! तुम मेरे लिए अजनबी नहीं हो...", उसने पूरी ईमानदारी और अपनत्व से मेरी तरफ देखते हुए कहा।
      "यह अब महसूस हो रहा है न, जब हम लोगों ने एक दूसरे के साथ टाइम एक्सपेंड किया, अपनी फिलिंग्स शेयर की... एक दूसरे को समझने की कोशिश की... एक दूसरे पर विश्वास किया... पहले दिन तो कोई खास परिचय हुआ ही नहीं था। बल्कि मैंने तो रुडली बात की ..."
       "हां ...!! मुझे तो नहीं लगा था... और वैसे मैने भी कौन-सी फूलों की माला पहना दी थी...", कहते-कहते वह हंस पड़ी। फिर अपनी गिलास खत्म करते हुए बोली, "तुम भी खत्म करो और चलो मेरे साथ नीचे, बाबा के लिए जल्दी से खाना बना दूं ... तुम रसोई घर के दरवाजे के पास कुर्सी में बैठना, यहां अकेले क्या करोगे..."
    "चलो तो ठीक है चलते हैं... ", मैंने भी अपनी खत्म करते हुए कहा। 
    अनायास ही उसने पूछा, "ये तुम्हे तो एक्टिंग आती है, तो एक और एक्ट करोगे मेरे साथ...?"
  "हां... कुछ-कुछ तो आती ही है, कल तो देखा ही है तुमने ?"
   "तभी तो कह रही हूँ... करोगे ?"
   "चलो कर लूंगा, जिंदगी एक ड्रामा ही तो है...?"
   "तो ठीक, सपोज तुम सत्य की जगह पर हो जिसे मैं अक्सर अजनबी कहतो हूँ... एक रात हम दोनों इसी अटारी में रात भर साथ रहे...? और अब उस रात की सुबह है। वह जा रहा है... मैं उसे पीछे से पुकारती हूँ। इसके आगे के डायलॉग तुम्हे खुद सोच कर बोलने हैं... कर पाओगे...?"
   "शायद हां, लेकिन पहले यह बताओ... क्या तुम दोनों में प्यार...?", मैने उसकी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा था।
  "नहीं बिलकुल नहीं...अभी तक तो मुझे नहीं हुआ... लेकिन तुम्हे यानि सत्य को हो गया है... अब ऐसी एक्टिंग करो कि मुझे भी तुमसे हो जाए..."
   "मुझसे...?"
   "हां... नहीं मेरा मतलब सत्य से..."
   "हुं... मतलब पीहू और सत्य दोनों अब कैरेक्टर्स हैं.. और हम दोनों एक्टर्स... तो फिर ठीक है... तुम सोच लो क्या बोलना है, क्योंकि शुरुआत तुम्हें ही करनी है...?"
  "सोच लिया... तुम सीढ़ियां उतारो..."
   मैने वही किया। पीछे से उसने पूछा, "अजनबी ! अब कब आओगे ?"
    अटारी की सीढ़ी से स्टेप-डाउन होते मेरे कदम रुक गए। मैंने उसकी तरफ कुछ मुस्कुराते हुए देखा फिर कुछ मजाकिया अंदाज में पूछा,  "अभी भी अजनबी...? हूं...? तो फिर बताओ ऐसा और क्या करूं कि...?"
   "धत् ! " , उसने कुछ लजाते हुए मुझे डाटा, " अब आगे एक शब्द भी नहीं..."
     मैं उसे मुस्कुराते हुए देख रहा था। लेकिन वह संजीदगी से पहली सीढ़ी पर आ के बोली, "तुम्हें अजनबी कहना अच्छा लगता है, जानते हो क्यूं ? क्योंकि मैं चाहती हूँ कि तुम हमेशा मेरे लिए अजनबी बन के रहो। जब भी मैं तुम्हें देखूं तो एक नए अंदाज से देखूं। तुम्हारी छुअन में मुझे हर बार नयापन महसूस हो। चाहे तुम जितनी बार मेरा हाथ पकड़ो, मुझे हर बार यही महसूस होना चाहिए कि जैसे पहली बार किसी लड़के ने किसी लड़की का हाथ पकड़ा हो। जब भी तुम मुझे गले लगाओ तो हर बार तुम्हारे दिल की एक नई धड़कन सुनाई दे। जब भी तुम मुझे अपनी बाहों में समेटों तो मुझे वही नयापन, वही एहसास होना चाहिए जैसे कि कल रात हुआ था..."
   मैंने दीवार पर पीठ टिक अपना दाहिना हाथ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "तो फिर आओ मेरे पास... थाम लो एक बार फिर मेरा हाथ, और महसूस करो मोहब्बत की वही रूमानियत... वही कशिश... वही नयापन..."
     उसके कदम एक स्टेप डाउन हुए, और उसके हाथ मेरे हाथ को बस छू रहे थे, "जानते हो जैसे-जैसे हम एक दूसरे के करीब आते-जाते हैं, एक दूसरे को जानने-पहचाने लगते हैं, तो हम मन और शरीर से एकदूसरे से उतने ही दूर होते चले जाते हैं। इसलिए कहती हूं तुम हमेशा मेरे लिए अजनबी बनकर रहना..."
    मैंने थोड़ा सा हाथ और आगे बढ़ा उसकी उंगलियों को पकड़ कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "जाते हुए इस अजनबी को कोई निशानी मिलेगी... जिसे वह ताउम्र महसूस कर सके...?"
     जवाब में उसने कुछ कहा नहीं बल्कि सीढ़ी के उसी पायदान पर ठीक मेरे सामने खड़ी हो गई जिस तरह से मैं खड़ा था। एक पैर स्टेप-अप, दूसरा स्टेप-डाउन। मेरी पीठ अभी भी दीवाल पर टिकी हुई थी और हम दोनों के चेहरे ठीक एक दूसरे के आमने-सामने थे। उसने धीरे से अपना दाहिना हाथ मेरे कंधे पर रखा और बाया हाथ मेरे माथे को सहलाता हुआ, बालों से उलझता हुआ मेरे सर के ठीक पीछे तक पहुंचा था। 
     मैं नहीं जानता कि वह मुझ पर झुक रही थी या मुझे अपनी तरफ झुका रही थी। मेरी सांसे तेज हो गई, दिल की धड़कने बढ़ गई। उसने संजीदगी से कहा, "हम कोई सौदागर नहीं और न ही हमारा दिल सौदाई है... तुम्हारी मोहब्बत पर तो हम बे-मोल बिक जाने को तैयार हैं अजनबी... लेकिन पहले हमे अपनी मोहब्बत का एहसास तो कराओ..."
   "हम भी कोई सौदागर नहीं और न ही हमारा दिल सौदाई है। तुमने सच कहा, अजनबी बनकर जब हम एक दूसरे के इतने करीब हो सकते हैं तो फिर किसी रिश्ते-नाते की जरूरत ही क्या ? हम अजनबी ही सही। क्या एक अजनबी से मोहबत नहीं हो सकती..."
   और कुछ देर बाद मुझे महसूस हुआ जैसे किसी लड़की ने किसी लड़के के होठों को पहली बार छुआ हो। अपने शरीर पर उसकी हर एक छुअन मुझे नई लग रही थी। उसके कर्ली बालों की उलझन, उसके शरीर की खुशबू, उसकी सांसे, उसकी निगाहें, उसके लज़राते होठ... फिर उसने वो किया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मेरे होठों में अपनी एक अंगुली रख धीरे से उसे चूम लिया, "अब हमारे पास हमारा बचा ही क्या जो तुम्हें दे सके... जो कुछ तुम्हारा है, बस वही तो दे सकते हैं..."
   उस पल मुझे बिल्कुल नहीं लग रहा था कि मैं कोई एक्टिंग कर रहा हूं। मैने उसकी हथेली को हाथ से पकड़ अपने गाल में रखते हुए कहा, "सच कहता हूँ पीहू, हम दोनों ताउम्र एक दूसरे के लिए अजनबी बन कर रहेंगे... सभी रिश्ते-नातों से दूर फिर भी एक दूसरे के होकर रहेंगे... इस बात से भी बेखबर की यह जमाना हमें क्या समझे... क्या इलज़ाम दे... हम इस जिंदगी को एक साथ जिएंगे... तुम जब भी मुझे पुकारोगी... मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगा... पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो..."
    "ये रुको...", उसने मेरे छलक आए आंसुओं को पोंछेते हुए कहा, "बस करो... तुम भी... अब ये आंसू क्यूं...?"
    तब मुझे भी होश आया कि यह तो एक एक्टिंग हैं, मैंने थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा,  "सो सॉरी !! लगता है कैरेक्टर में बहुत ही डीपली इन्वॉल्व हो गया या फिर कह लो स्क्रिप्ट की डिमांड थी...?"
  उसने मेरा हाथ थामे हुए सीढ़ियां उतरते हुए कहा, "आराम से... जरा सम्हाल के... तुमने तो मुझे भी इमोशनल कर दिया... तुम एक्टिंग करो न तो तुम्हे गिलस्रीन की भी जरूरत न हो..."
   सीढ़ी के आखिरी पायदान से उतरते हुए मैंने उससे कहा, "तो ठीक है न... इमोशनल हो जाना कौन सी बुरी बात है ? आंसुओं से आँखें साफ हो जाती हैं... देखो तो आज ठंड कुछ बढ़ गई है... है न ?"
   "हुं... तो ?", उसने पलट कर मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "यदि हो सके आज शाम के लिए कुछ गर्म कपड़े दे दो... यही समझ लो मेरी एक्टिंग का प्रश्रमिक दे रही हो ?", मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "बस...! इतनी सी बात !!...", कहते हुए वह अपने कमरे में घुसते हुए बोली, "आ जाओ..."
   जब मैं उसके पीछे-पीछे कमरे में पहुंचा तो उसने अपने कवर्ड से एक शाल निकल कर मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "इसे ट्राई करो...?"
   डार्क येलो कलर की लेडीज शाल देख कर मुझे हंसी आ गई, "मैं ये ओढ़ूंगा...?"
   "क्यों ? नहीं पसंद है..?", उसने आश्चर्य से पूछा।
   "नहीं...बात पसंद की नहीं है... लेकिन ये तो लेडीज है न... सत्य का कोई हॉफ स्वेटर हो तो वही दे दो ?", मैने उसी तरह हंसते हुए कहा।
   "नहीं उसका नहीं... तुम्हे ओढ़ना है... और बात ठंड से बचने की है... कौन सा मिस्टर यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने जाना है... लो रखो...", उसने भी हंसते हुए कहा।
   "अच्छा... तो ठीक है... जब अटारी में चलेंगे तो ले लेंगे, अभी इसे यहीं रहने दो...", मैंने उसे बेड में रखते हुए कहा।  तभी मेरी नजर बेड में रखे एक एल्बम पर गई, शायद कबर्ड से कपड़े निकलते समय उसने उसे बेड पर रख दिया होगा, मैने पूछा "ये एल्बम है...?"
    वह बोली, "हां फैमिली एल्बम है...?"
     मैने पूछा, "मै देख सकता हूँ...?"
    "हां क्यों नहीं... बैठो", वह बेड में बैठते हुए बोली मैं भी उसके साथ बैठ गया। परिवार के सभी सदस्यों की फोटो थी उसने एक-एक करके सभी से परिचय कराया। जो अब हमारे बीच नहीं थे, हम उन्हें तस्वीरों में देख रहे थे।  एक 15 -16 साल के लड़के की ट्रॉफी लिए हुए फोटो थी, उसकी तरफ इशारा करते हुए मैंने पूछा, "ये तुम्हार छोटा भाई है...?"
  उसने संक्षिप्त किंतु गमगीन स्वर में कहा, "था..."
   मैने देखा उसका छोटा भाई वाकई बहुत स्मार्ट लगता था। क्रिकेट खेलते हुए, फुटबॉल खेलते हुए, बैडमिंटन खेलते हुए और स्कूल फंक्शन में ट्रॉफी लिए हुए। वह उसकी एक-एक तस्वीर को बहुत गौर से देख रही थी। 
      "तुम्हारा भाई वाकई बहुत ही स्मार्ट और सुंदर था, शायद तुमसे भी अधिक। इतने सारे गेम !! लगता है पक्का एथलीट था। देखो, लगता है उसने कई ट्रॉफी जीती हैं यार..."
      भाई की तारीफ ने उसके सब्र के बांध को तोड़ दिया। वह दोनों घुटनों के बीच अपना चेहरा छुपा के रो पड़ी।
    पता नहीं उसे इस तरह रोते देख मेरे दिल में भी एक अनछुआ-सा दर्द जगा। मैने उसके दोनों कंधे को पकड़ उसके सर के ऊपर अपना सर रख खुद रो पड़ा। एक पल के लिए यह भी न सोचा कि मेरी इस हरकत से वह मेरे बारे में क्या सोचेगी। बस उसे रोता देख मेरा भी रोने को दिल किया और मैं भी उसके साथ रोता रहा। कुछ देर बाद जब होश आया तो मैं उसे दिलासा देते हुए बोला,
     "मत रोओ पीहू ...जो गुजर गया वह अब लौट कर नहीं आएगा, हम लाख आंसू बहा ले, तड़प ले, चाहे कुछ भी कर ले। हम उसे बस याद कर सकते हैं। उसके लिए दुआ मांग सकते हैं कि ईश्वर उसे सदगति दे..."
     कुछ देर बाद वह शांत हुई, फिर मुझसे बोली, "जानते हो, एक बार हम दोनों ही मम्मी-पापा के सामने इस बात पर लड़ गए की सबसे अधिक सुंदर और स्मार्ट कौन दिखता है। पापा ने कहा जैसे इंसान को अपनी दोनों आंखें, दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों कान सुंदर लगते हैं, दोनों एक समान प्यारे हते हैं, इस तरह संतान होती हैं। चाहे एक हो, चाहे दो हो, चाहे इससे अधिक हों, सभी सुंदर और प्यारे लगते हैं। तो यह फिजूल के सवाल बंद करो और जाकर पढ़ो। 
     हम दोनों भाई-बहन स्टडी रूम में आ गए। तब उसने अचानक मुझसे कहा, दीदी जब तुम्हारी शादी हो जाएगी न तब मैं अपने जीजाजी से यही सवाल तुम्हारे सामने पूछूंगा, और देखना वो यही कहेंगे कि मैं तुमसे अधिक सुंदर और स्मार्ट हूँ... तब उसकी उम्र 14 और मेरी 17 साल थी.... आज जब तुमने उसकी तारीफ की, मुझसे भी अधिक सुंदर और स्मार्ट कहा, तो उसकी यह बात मुझे याद आ गई...", यह सब कहते-कहते एक बार फिर पीहू की हिचकी निकल गई, और मैं पीहू को केवल देखता रह गया।
    कुछ देर बाद भारी माहौल को हल्का करने के उद्देश्य से मैंने उसे छेड़ा, "अपने बारे में नहीं पूछा...?"
   "तुमने बताया ही नहीं ..…?", वह संकोच से बोली।
    "अब इसमें बताना क्या, पापा स्मार्ट, मम्मी ब्यूटीफुल... भाई हैंडसम तो तुम क्यों न होगी...? तुम्हारी सुंदरता मुझे आकर्षित करती है, और तुम्हारी विचारधारा सम्मोहित...तुम्हारा जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण मेरी जिंदगी को प्रभावित करता है...", मैंने अपनी बातों की प्रतिक्रिया उसके चेहरे में देखनी चाही।
   उसके चेहरे में हल्की सी मुस्कान आ गई, "उफ़ ! बस करो, कितनी तारीफ करोगी मेरी... मुझे कहीं गुरूर न हो जाए..."
   मैने उसकी तरह ही मुस्कुराते हुए कहा, "गुरूर नहीं तुम्हारा आत्मविश्वास तुम्हे दे रहा हूँ... इंसान को अपनी खूबियों का, अपनी सुंदरता का लाख स्वबोध हो, लेकिन कोई दूसरा इंसान जब बोध करता है, तारीफ करता है, तो उसका अपने स्वबोध पर विश्वास कई गुना बढ़ जाता है..."
   "तुम क्या हो यार... सचमुच !! मासूम और डीसेंट तो हो ही... अच्छे इंसान भी हो... लेकिन तुम जिंदगी को कितनी बारीकी से ऑब्जर्व करते हो... सच कहती हूँ, बहुतों के मुख से अपनी तारीफ सुनी लेकिन तुमने जिस अंदाज में की, आज तक किसी ने नहीं की... सच कहूं तो दिल को लुभा लेना जानते हो..."
    मैंने थोड़ा-सा और मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारा मतलब फ्लर्टबाज नंबर वन...?"
  उसने कुछ लजाते हुए कहा, "नहीं मेरा मतलब यह नहीं, मैं तो यह कहना चाहती हूँ कि तुमने मेरी विशेषताओं को महज तीन दिन में पहचान लिया, और किसी-किसी के साथ महीनों-सालों रह जाए तो भी नहीं जान पाता..."
    "तुम हीरा हो तुम्हारी चमक दूर से दिखाई देती है...", मैने कहा।
    "अच्छा !! और तुमने वो चमक पहचान ली...?"
   "हां..."
   "कैसे...?"
   "क्योंकि एक हीरा कभी मेरे पास भी था... अब चले...?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
  उसने स्थिर निगाहों से कुछ देर मुझे देखते रहने के बाद संजीदगी से पूछा, "एक बात बताओ... क्या मैं सचमुच तुम्हें सम्मोहित करती हूँ...?"
   "हां, लेकिन सचमुच से तुम्हारा क्या मतलब ? क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि मैने तुमसे झूठ कहा ?", मैने पूछा।
    उसने मेरी नजर से अपनी नजर मिलते हुए कहा, "नहीं लगता न इसलिए तो पूछ रही हूँ..."
   "ओह ! अब समझ में आया तुम तो एक अच्छी डॉक्टर तो बन गई लेकिन मैं शायद एक अच्छा मरीज न बन पाया..."
   इस बार उसे हंसी आ गई, "अब इसका भी अर्थ समझा दो...?"
   मैंने उसे समझाते हुए कहा, "देखो, एक मानसिक रोगी का इलाज करने के लिए कभी-कभी मनोचिकित्सक मरीज को सम्मोहित करता है, यदि तुम्हें लगता है कि मैं सम्मोहित नहीं हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम एक अच्छी मनोचिकित्सक नहीं हो... तो अब क्या किया जाए ?", मैंने कुछ देर सोचते रहने का अभिनय किया फिर एकदम से बोला, "हां.. तुम जादूगरनी बन जाओ और काला जादू करो मुझ पर... हां यही ठीक रहेगा..."
   "तुम जैसे मरीज मिल जाए ना तो अच्छा खासा डॉक्टर पागल हो जाए... चलो अब ? रोते हुए को हंसा देते हो, हंसते हुए को रुला देते हो, बड़ी कलाएं आती हैं तुम्हें...", फिर उसने शिकायती लहजे में कहा, "एक्टिंग तो हमने भी की थी ? हमें तो कुछ भी न मिला...?"
   मैंने मुस्कुराते हुए कह, "रिहर्सल मेरे साथ कर लिया, फाइनल टेक सत्य के साथ लेना तो उससे खुद-ब-खुद मिल जाएगा... अब बाहर चले ?"
   "चलो...", उसने भी मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन क्या वह यही डायलॉग बोल पाएगा जो तुमने बोले हैं...? उसे तो लिख कर देना पड़ेगा...?"
   "अरे नहीं... क्या पता इससे भी खूबसूरत और अच्छे तरीके से बोल जाए... आफ्टर ऑल मैंने भी कौन-सा सोच-समझ के बोला है... जो मन में आता गया बोलता गया..."
   "तभी तो इतनी अच्छे थे... सोच-समझ कर तो फैसले लिए जाते हैं, प्यार तो दिल से किया जाता है... है न ?"
   मैंने हंसते हुए कहा, "प्यार ? शायद..."
   उसने कुछ रूठने का अभिनय करते हुए कहा, "उफ़ तुम्हारा यह शायद... कभी तो इस इंडिफिनिट वर्ड से बाहर आओ..."
    हम बैठक में आ गए। बाबा पूजा करने में व्यस्त थे। उसने एक थाली में एक छोटी सी लौकी और चाकू मुझे पकड़ते हुए कहा, "तुम इसे छिलो और काटो, मैं तब तक दाल चढ़ा देती हूँ, फिर दो चार रोटियां बना देती हूँ, उसके बाद सब्जी बना दूंगी, सब्जी पकेगी तब तक दाल फ्राई हो जाएगी..."
     हम दोनों ही अपने-अपने काम पर जुट गए। जब लौकी कट गई तो मैंने कहा, "पीहू मैं थोड़ा जाऊं..?"
    "अभी नहीं, यहीं बैठो, ...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
    "वो क्या है... एक्चुअली...", जब कह न पाया तो स्कूल के छोटे से बच्चे की तरह पीहू को बाएं हाथ की  कनिष्ठिका दिखा दी। 
  वह अपनी हंसी रोकते हुए बोली, "बाथरूम ? वो उधर है..."
   मैं बैठक से आंगन में आ गया। देखा कि बाथरूम के पास तार में मेरे धुले हुए कपड़े सूख रहे थे। बाथरूम के ऊपर सप्लाई की एक टंकी रखी हुई देखी और अंदर नल, शावर इत्यादि की पूरी सुविधा थी। मैंने लौटते समय अपने सूखे हुए कपड़े तार से निकाल लिए। रसोई के दरवाजे के सामने उन्हें पीहू को दिखाता हुआ बोला, "इसकी क्या जरूरत थी... इसी लिए तुम दोपहर को हॉफ रही थी... हूँ ?"
     "नहीं न... और ये कौन सा बड़ा काम था, दो जोड़ी कपड़े धो लिए तो कौन सा एवरेस्ट चढ़ लिया। वो तो ऐसे ही कभी-कभी थकान लगती है...", वह लापरवाही से बोली थी। 
    मैने धीरे किंतु सख्त लहजे में उसे डांटते हुए कहा, "देखो गर्लफ्रेंड! ज्यादा काम मत किया करो। अपने आप को रेस्ट भी दिया करो..."
    वह मुस्कुराते हुए धीरे से बोली,  ,"और डांटों न, अच्छा लगता है..."
   मैने कहा, "अजीब ही हो यार तुम भी !! सच कह रहा हूं, कहीं ऐसा न हो की दिल की कोई बीमारी लग जाए..."
   "वो तो कब की लग चुकी बॉयफ्रेंड ! वह भी लाइलाज...", वह लापरवाही से बोली।
   "मतलब !!!"
   "मतलब ?", फिर वह थोड़ा सा मुस्कुराते हुए बोली, "समझा करो बॉयफ्रेंड..."
    "ओह !... समझ गया...", मेरी नजरों के सामने सत्य का चेहरा आ गया।
    "तुम इन्हें इसी कुर्सी में रख दो... तुम अटारी में चलो, ओथेलो पढ़ो... मै दस मिनट में आती हूँ..."
    मै स्वेटर ले के वापस अटारी में आ गया। उसे बैग में रख लिया फिर एक पैग बनाया और एक शिप ले कर उसे चारपाई के सिरहाने रख दिया। फिर अलमारी से ओथेलो उठाई, बल्ब और पंखे का स्विच ऑन कर आराम से बिस्तर में लेट कर पढ़ने लगा। वह दस मिनट नहीं बल्कि आधे घंटे बाद आई। उसके हाथ में मेरे तह किए गए कपड़े थे, मैंने ध्यान से देखा उनमें इस्त्री की जा चुकी थी।
    "तो इसलिए टाइम लगा... तुम्हें कितना भी समझा लो लेकिन तुम करोगी अपने मन का ही... अब बैठो रिलैक्स हो के..."
    "हाय ! मरजावां... बॉयफ्रेंड हो तो तुम जैसा !! कितना ध्यान रखते हो अपनी गर्लफ्रेंड का ?", मेरा बैग खोलकर मेरे कपड़े रखते हुए उसने कहा।
    "पीहू ! अभी मैंने ओथेलो पूरी की है। सोच रहा था, क्या ऐसा भी होता है ? इतना अविश्वास कि कोई किसी की जान ले ले ?"
    "यह दुनिया है बॉयफ्रेंड यहां कुछ भी हो सकता है... और होता रहेगा, वैसे स्टोरी क्या है ?",  सामने कुर्सी पर बैठते हुए उसने पूछा।
     मैं नहीं चाहता था कि आज की शाम ख़राब हो। मैंने कहा, "कुछ नहीं यार ऐसे ही, तुम तो पढ़ ही रही हो न, तो पढ़ लेना..."
    "हां यार वही मैं भी सोच रही हूँ ....", उसने अपनी खाली गिलास की तरफ इशारा करते हुए कहा, "आज की शाम इन किताबों को रहने ही देते है, लाओ दो मैं इसे अलमारी में रख दूं..."
    मैंने उसकी गिलास में थोड़ी सी व्हिस्की डालते हुए पूछा, "बाबा की पूजा अभी भी चल रही है...?"
   "हां बस थोड़ी देर में खत्म हो जएगी... लेकिन अभी तक सत्य नहीं आया, एक घंटा तो हो गया होगा न... ? ", उसने चिंतित स्वर में मुझसे पूछा।
    "हां बल्कि मेरे ख्याल से ज्यादा। आता होगा, तुम फ़िक्र न करो। आने-जाने में भी तो टाइम लगता है न, और कुछ समय फैक्ट्री में लगेगा... मान के चलो अधिक से अधिक आधा घंटा और..", 
    पीहू में एक दो घूंट और पिया फिर गिलास को किनारे रखते हुए कहां, "टेलीफोन लाइन गांव तक तो आई है... लगता है बाबा से कहकर घर में भी एक टेलीफोन लगवा लेते हैं। लेकिन लाइन की ही दिक्कत है, गांव से काफी दूर घर है न..."
     मैं उसकी बेचैनी समझ रहा था। ध्यान बांटने के लिए मैने उससे यूं ही पूछा, "अच्छा पीहू ये तो बताओ, एक जवान लड़की को सबसे अधिक किस बात से डर लगता होगा ?"
   उसने कुछ सोचते हुए जवाब दिया, "भूत से...?"
   "नहीं..."
   "पाबंदियों से...?"
   "नहीं... और ?"
   "दिल टूटने से ... ये तो पक्का है... क्यों ?"
   "नहीं... ये भी नहीं...", मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
    उसने खीझते हुए कुछ गुस्से से कहा, "तो फिर अब तुम्ही बताओ... मुझे नहीं मालूम"
    "सिंपल यार, बुढ़ापे से... वो भी ऐसे बुढ़ापे से, जब लड़ने के लिए कोई न हो, गुस्सा जाहिर करने के लिए कोई न हो... तो और भी...", फिर मैं हंस पड़ा।
   इसने मुझे चिढ़ाते हुए कहा। "हे...हे... हे... बंद करो, इस बात से किसे न डर लगेगा...? क्या एक जवान लड़के को नहीं लगेगा कि उससे बात करने के लिए कोई अपना उसके पास न हो ? फिर चाहे वह उस से कितना भी लड़ाई-झगड़ा करे... एक समय बाद सब आगे बढ़ जाते हैं। पंछी के बच्चे तक घोसला छोड़कर उड़ जाते हैं... तब वही रह जाती है जो एक कप चाय के लिए पूछती है... जो तुम्हारे मन की बात समझती है, सुनती है... समझे बड़े आए ज्ञानी...?"
   "बिल्कुल... आई फूली एग्री... नाराज़ न हो.. मैं तो ऐसे ही..."
   उसने मेरी बात टालते हुए कहा, "रुको मैं आती हूँ...",  फिर वह सीढ़ियां उतरते  हुए बोली, "देखतो हूँ कि बाबा की पूजा खत्म हुई कि नहीं..."
   फिर कुछ देर बाद भागती हुई आई, "अब क्या करूं ? बाबा की पूजा भी खत्म हो गई है, वो अभी भी नहीं आया ? और मैंने थोड़ी सी पी भी ली है..."
    मैंने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया, "तुम एक मिनट बैठ जाओ और जो मैं बोलता हूँ वह ध्यान से सुनों... तुम्हारे बिहेवियर से बिल्कुल नहीं लग रहा है कि तुमने किसी भी प्रकार का नशा किया है ? सो जस्ट रिलैक्स। रही बात स्मेल की तो अपने कमरे में जाओ और कोई बढ़िया सा परफ्यूम डाल लो, और बाबा से दो-चार कदम दूर ही रहना वैसे भी इंग्लिश है, देसी नहीं जो दूर से महकेगी .... "
    "मैं जानती हूँ कि यह देसी नहीं है, लेकिन फिर भी यार सत्य आ जाता तो अच्छा रहता न ... रुको मैं देख कर आती हूँ ...", वह कुर्सी से उठते हुए बोली। लेकिन तभी बाहर बाइक की आवाज सुनाई दी वह झट से खिड़की पर जाकर खड़ी हो गई, "आ गया... सत्य आ गया... अब वह सब संभाल लेगा। मुझे अब चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है... ", फिर उसने अपना बचा हुआ पैग उठाए और पी गई, "मै अभी आई..."
   मैने भी अपने लिए एक छोटा-सा बनाया और खिड़की पर आ खड़ा हुआ, बाहर देखा तो दंग रह गया।  सत्य के साथ ज्ञान भी था। बाइक दो थीं। पीहू, सत्य और ज्ञान गौशाला के पास खड़े आपस में बातें कर रहे थे। शायद सत्य पीहू का इंट्रोडक्शन ज्ञान से करवा रहा था। कुछ देर बाद तीनों अटारी में पहुंचे। 
     "मेरी जान ! कोई दिक्कत ?",  ज्ञान मुझे गले लगाते हुए बोला, "मेरे बगैर सुसाइड करने की तो नहीं सोच रहा था...?"
    "अबे साले ! तेरे लिए !! वह भी सुसाइड ? किसी जनम में ट्राई तक न करूं, मरने की तो छोड़...", मैने उसे कस कर गले लगते हुए कहा। 
    "हां यार ! अपनी किस्मत उसके जैसी कहां... ", उसने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा। ज्ञान के जस्ट पीछे पीहू खड़ी थी और उसके बगल से सत्य। ज्ञान के इस कथन ने पीहू के चेहरे के भाव बदल दिए। उसने तपाक से पूछा, "किसके जैसी ज्ञान भैया ?"
    उसकी नजर मेरे चेहरे पर गढ़ी थी। यार ज्ञान क्या कर दिया तूने ? मैने धीरे से ज्ञान के पीठ में चिकोटी काटी। वह समझ गया। उसने पीहू की तरफ पलटते हुए कहा, "अरे बहुत फनी स्टोरी है बाद में बताऊंगा, पहले पानी-वानी तो पिलाई, प्यास लगी है..."
    फिर वह मेरे हाथ से गिलास लेते हुए बोला, "ला तब तक इसी से काम चलता हूँ..."
    सत्य ने पीहू को इशारों से कुछ कहा फिर ज्ञान से बोला, "यार तुम दिनों आराम से बैठो, मै अभी आया, थोड़ा बाबा से मिल लूं ..."
   दोनों चले गए। मैने ज्ञान से पूछा, "मौसी जी के यहां से कहां कब लौटा ?"
   "बस समझ ले दो घंटे पहले... आया और बाइक उठाकर सीधे चला आया... सोचा कहीं तू बोर न हो रहा हो ... यार तूने तो पहले से ही महफिल जमा ली है।.चल भई मेरे लिए भी बना... शादी के काम कर-कर के थक गया। और बता सत्य कैसा लगा...?", उसने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।     
    मैंने दोनों के लिए पैग बनाते हुए बिल्कुल गंभीर मुद्रा में कहा, " कौन सत्य ? बहुत ही सुंदर, सुशील, ज्ञानी, समझदार। सोचता हूँ प्रपोज कर दूं...", 
    वह हंसते हुए और मुझे हॉस्टल की फेमस गाली देता हुआ बोला, "साले.... (बीप), तो कर देना चाहिए था न, किसका इंतजार कर रहा था..."
   "तेरा ...  (बीप), सोचा कहीं तू भी इंटरेस्टेड न हो ? पहला हक तो तेरा ही बनता है न ? तेरा तो फास्टफ्रेंड जो ठहरा, हम तो स्लो वाले हैं न ..? ", मैंने उसी के अंदाज में कहा। 
   ".... (बीप), तो ये बोल न कि जलन हो रही है ..?", वह अपना पैग खींच नमकीन खाता हुआ आगे बोला, "तो इरादा क्या है ?"
      "मतलब ?"
      "चलने का ? .."
       "तो चल न, मै कौन सा मायके में हूँ जान ..? जब कहे चल दूंगा .. देख बैग भी तैयार है ... अरे यार जाने से याद आया, मेरा पर्स तेरे घर में पैंट की जेब में ही रह गया है ? कुछ पैसे लिए हैं .... "
    "हां लिए हैं न .... कितने चाहिए ...?"
    "एक हजार ..."
     ज्ञान ने 500 के दो नोट मेरी तरफ बढ़ते हुए पूछा, "कुछ खरीदना है क्या ?"
    "खरीद लिया... पैसे पीहू से लिए थे, उसे लौटने हैं...", मैने बताया।
    "पीहू से !! उससे क्यों लिए, सत्य से ले लेता ? ... वो भी क्या सोच रही होगी...?"
    "एक ही बात है न..."
    "एक ही बात है !! मतलब ?", ज्ञान ने चकित-सा पूछा।
    उससे अधिक आश्चर्य मुझे हुआ। यदि सत्य ज्ञान का बेस्टफ्रेंड है तो ज्ञान को मालूम होना चाहिए था। लेकिन नहीं है, अर्थात सत्य ने उसे कुछ ज्यादा अभी तक नहीं बताया !! तो कुछ कारण होगा। यह उनकी निजी जिंदगी है और यदि किसी भी कारण से मेरे सामने आ गई तो अब मेरा फर्ज बनता है कि इस बात को मैं अपने तक ही रखूं । वैसे भी दोनों बेस्टफ्रेंड है, जब शेयर करना चाहेंगे तो कर ही लेंगे। 
       लेकिन बात तो यह भी है न कि सत्य ने ज्ञान को कुछ न कुछ तो पीहू के बारे में बताया ही होगा। तो फिर किस स्तर तक ? जब तक यह न जान लूं तो ज्ञान से दोनों के संबंध के बारे में कुछ भी कहना गलत होगा। 
     मैंने उसके हाथ से रुपए लेकर अपनी जेब में डालते हुए बोला, "ज्यादा तो मुझे भी नहीं मालूम है, पर मुझे ऐसा लगा, और देख मैं गलत भी हो सकता हूं। वैसे भी जब मुझे पैसे की जरूरत थी तो सत्य घर पर नहीं था, तो उसी से मांग लिए। लौटा दूंगा यार... सिंपल...”
     "लेकिन यार एक बात कहता हूं, जो भी पूछना हो या शंका ही जाहिर करनी हो तो उसमें मेरा नाम कहीं भी नहीं आना चाहिए ... वो क्या है न कि मान ले बात गलत साबित हुई तो मेरा इंप्रेशन खराब हो जाएगा... यह उनकी निजी जिंदगी है।"
    "ठीक है, तो तैयार न ? अभी चलेंगे तो अधिकतम नौ बजे तक घर पहुंच जायेंगे..."
    "अरे कहां जा रहो हो यार...", पीछे से सत्य आते हुए बोला।
     "कही नहीं बस घर जाने की बात कर रहा था..."
    ज्ञान की बात पूरी भी ना हुई थी कि सत्य बोल उठा, "आज कोई कहीं नहीं जा रहा.... समझे !  साले स्कूल के बाद हॉस्टल में रहने लगा। कभी-कभार ही आता था। और अब जब इतने दिनों बाद एक साथ में टाइम बिताने का मौका मिल रहा है तो तू जाने की बात कर रहा है। और वैसे भी तेरे आने से पहले आज रात की पार्टी निश्चित हो गई थी... तो अब जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है..."
    "पार्टी !! और वह भी तू दे रहा है ? भई कौन सी खुशी में ...?", ज्ञान ने आश्चर्य से पूछा। 
   "तू आम खा न यार, गुठलियां क्यों गिर रहा है,? तुझे पार्टी से मतलब है कि उसकी वजह से ...?"
   "चल फिर भी तेरी पार्टी मुझे अटेंड नहीं करनी। साली पार्टी क्या होगी सब सूखा-सूखा होगा ? वैसे घर में बता के नहीं आया हूँ रुकने के लिए। चिंता करेंगे... ", ज्ञान ने सत्य को समझाना चाहा।
    "बस इतनी सी बात... चल अभी। गांव से मैं फौरन फोन करता हूं। बात करता हूँ आंटी से... और रही बात सूखी-सूखी की तो समझ सब गीली-गीली होगी...", फिर सत्य मेरी तरफ देखते हुए बोला, "तुम ज्ञान के साथ बाइक में बगिया निकल जाओ। मैं थोड़ा महान लूं और बाबा को डिनर करवा के पीहू के साथ लगभग एक घंटे से आ रहा हूँ..."
    "अबे ! बाबा से तो मिला.... थोड़ा तो उनकी भी बंदगी कर ली जाए न...", ज्ञान कुर्सी से उठता हुआ बोला।
    "एक मिनिट ...", मैंने बैग से परफ्यूम निकला और ज्ञान के ऊपर स्प्रे करते हुए बोला, "हो सके तो दो कदम दूर से ही, ज्यादा गले मिलने की जरूरत नहीं है ... अब जा मेरे मुन्ने राजा..."
     ज्ञान सत्य के साथ नीचे चला गया। बाहर अंधेरा हो गया था और साथ में अर्धचंद्र जी मुस्कुराने की कोशिश करने लगे थे। मैंने बैग खोल, सभी सामन को सेट करके रखने लगा। तभी मुझे कुछ याद आया। मैने डायरी के दूसरे पन्ने में उसी कविता की कॉपी की।
     कुछ देर बाद ज्ञान आया, "बहुत जल्दी दुकान समेट ली मेरी जान, एक-एक हो जाए फिर चले !"
   मैं बैग से वापस रम की बॉटल और दोनों गिलास निकल लिए और उसके सामने रखते हुए कहा, "ले बना ले..."
      ज्ञान पैग बनाने में जुट गया और मैं उठकर खिड़की के पास आ गया। छड़ पड़कर बाहर देखने लगा। सामने गौशाला उसके पीछे से गुजरती कच्ची मुरूम की सड़क और उसके उस पार शीशम का पेड़। ये सभी चंद्र की मृदुल स्निग्ध ज्योत्सना में धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे।
    "ओ राइटर ! कहां खो गया, ले पकड़...", ज्ञान ने मेरी तरफ गिलास बढ़ाते हुए कहा। मैंने उसके हाथ से गिलास थाम लिया और खिड़की के ऊपर रख दिया। ज्ञान कुर्सी पर जाकर दोबारा बैठ गया। मैं कुछ देर तक यूं ही खिड़की के पास खड़ा रहा, बाहर देखता हुआ। फिर मैंने धीरे से गिलास उठाई और खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर उसे धीरे-धीरे उड़ेल दिया।
   "ओए ! यह क्या किया !! छोड़ दी क्या !!!", ज्ञान कुर्सी से उठकर मेरे पास आते हुए बोला। 
   मैं उसकी तरफ देख कर मुस्कुराया था, "नहीं यार, कभी न पीने की कसम नहीं खाई है, लेकिन आज अपने आप से दो वादे किए हैं ?"
    "वादे!! कैसे वादे ?", उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
     पता नहीं क्यों मेरा रोने का मन कर रहा था और मैं पूरी ईमानदारी के साथ रोना चाहता था। मैंने ज्ञान को कसकर गले से लगाते हुए कहा, "कभी सुसाइड करने की कोशिश नहीं करूंगा। और दूसरी मैं कभी देवदास नहीं बनूंगा..."
   ज्ञान ने भी मुझे कसकर गले लगाते हुए कहा, "थैंक यू यार !! साले तूने तो मेरी जान ही ले ली थी... अब मैं निश्चिन्त हुआ... अब चले ?"
   "हां ... चल लेकिन एक मिनट", मैने अपना बैग खोला, डायरी निकाली। उसके चार पन्ने फाड़े, उन्हें अच्छे से तह किया फिर उस रैक के पास पहुंचा जहां पर पीहू की बुक्स रखी हई थीं। "सांसों की डोर", उठाई और तह किए कागज को बुक्स के उन्हीं पन्नों के बीच दबाया जिसकी एक कविता मैंने पहले दिन पीहू को सुनाई थी -
    औरों का धन सोना चांदी,
    अपना धन तो प्यार रहा, 
    दिल से जो दिल का होता है, 
    वह अपना व्यापार रहा।
     फिर दूसरे पेज में ज्ञान के द्वारा दिए गए पैसे दबा दिए। ज्ञान बराबर मेरी हरकतें देखा रहा था। मुझे पैसे बुक्स में दबाते देख वह बोला, "डायरेक्ट हाथ में दे देना, पता नहीं वह बुक पढ़ती भी है या नहीं ?"
    "मैं जानता हूं सीधे वह कभी नहीं लेगी। और रही बात पढ़ने की तो विश्वास कर वो पढ़ेगी... "
    "और डायरी के पन्ने ? देख...", फिर वह मुझसे दो कदम पीछे हटते हुए बोला, ".... देख मेरी बात को आदर्वाइज़ मत लेना... यदि कोई लव एंगल हो तो मैं पीहू से बात..."
   मैंने उसे घूर कर देखा, "इसीलिए पहले ही दो कदम पीछे हट गया था न...?"
   "देख उन दोनों का वैसे भी मुझे कुछ क्लियर नहीं समझ आ रहा है, यदि कुछ होता तो सत्य मुझसे जरूर कहता ... समझ रहा है न ?"
    "हूँ... बिलकुल समझ रहा हूँ। और देख यदि पार्टी में पीने के बाद तूने ऐसी-वैसी कोई भी हरकत की या कुछ भी दोनों से कहने की कोशिश की तो समझा ले इस दुनिया में या तो मैं रहूंगा या फिर तू ..."
    "हां... हां ठीक है न... वैसे एक बीच का भी रास्ता भी है, तलाक का...", वह मुस्कुराते हुए बोला।
   "तलाक का ? किस के तलाक का...?", मैने आश्चर्य से कहा।
   "यार तलाक का नहीं तो ब्रेकअप का...?", ज्ञान की होठों में रहस्यमई मुस्कान थी। और उतने ही आश्चर्य से मैंने पूछा, "ब्रेकअप... तलाक.... ये सब क्या बोल रहा है..?"
   उसका सर कुछ तेज हो गया, "और नहीं तो क्या बोलूं ? जब मैं तेरी आंखों में उसके लिए प्यार देख सकता हूँ.... तो कैसे मान लूं कि उसने न देखा होगा.. देख तू ओवर थिंकिंग कर रहा है... जिंदगी बहुत सिंपल और सपाट है... तू उससे पूछ तो एक बार कि वह क्या चहती है..."
  मैंने उसे बीच में रोकते हुए कहा, "प्लीज यार, अपनी आवाज धीरे कर... वह मेरे बारे में ऐसा कुछ भी नहीं सोचती है... और क्यों सोचेगी... बता तू ? सत्य मुझसे कही अधिक स्मार्ट और हैंडसम है, पढ़ा लिखा है, फैक्ट्री में जॉब करता है, फिट और तंदुरुस्त हैं... और कुछ बात तो होगी न कि वह दोनों पिछले चार-पांच महीने से एक साथ रह रहे हैं, तो मैं क्यों दीवार बनूं ?  और फिर ज्ञान.... जरा सोच... यदि मुझ में कोई कमी न होती तो क्या उसने मुझे छोड़ होता ?"
   वह मेरे करीब आया, मेरे आंसू पूछते हुए बोला, "तुझमें कोई कमी न थी, न है। तू अपने आप को अंडर एस्टीमेट कर रहा है... क्या पता तेरे पास या फिर तेरे अंदर ऐसी कोई बात हो जो उसे पसंद हो, जो उसे सत्य से कभी न मिल सकेगी। तू बात तो कर एक बार। यदि तुझे कोई संकोच हो रहा है तो कह मैं पूछता हूं उससे...?"
     मैंने ज्ञान को सख्ती से मना करते हुए कहा, "नहीं... न तो तू बात करेगा और न ही मैं करूंगा... अब मेरे अंदर कोई आत्मविश्वास बचा ही नहीं और क्या कहूंगा, पीहू आई लव यू...? या फिर, बताओ तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं...? यदि किसी ने मुझसे दो-चार हंस बोलकर बातें कर ली, मेरी बात सुन ली, कुछ अपनी सुना दी तो उसके सर पर प्यार का बोझ रखकर मैं बठ जाऊं...? न यार ये मुझसे न होगा। देख सत्य ही उसके लिए बेस्ट चॉइस है... मान लिया कि आज पीहू को सत्य से प्यार न भी हो,  कल को हो सकता है न ? जब बाबा ने स्वीकार कर लिया और उसके घर वाले भी पीहू को पसंद करते है, उन्हें भी कोई एतराज नहीं... और उन दोनों के बीच मैं अपने प्यार की शहनाई बजाऊं... मेरी अंतरात्मा मुझ पे हंसेगी ज्ञान ! ... इसलिए कहता हूँ...  किसी को बिना कुछ जताए, बिना कुछ स्वीकार किए यहां से चले जाना ही बेहतर है... मैं तो कहता हूं कि तू आज न जाने के लिए कैसे मान गया, कह तो मैं सत्य से बात करता हूँ ?  चलो निकल चलते हैं आज ही ?"
    "एक मिनट रुक क्या सत्य के घर वाले जानते है...? उन्हें मंजूर है....? यकीन नहीं होता यार मुझे...!! एक मिनट, तू पीहू के बारे में मुझे सब कुछ बता..."
   "और क्या जानना है तुझे....?", मैंने आश्चर्य से पूछा था। 
    "पूरा फैमिली बैकग्राउंड, फैमिली मेंबर्स, प्रॉपर्टीज, रिलेशंस जो कुछ भी तू जनता है..."
   "तुझे क्या हो गया है...?", मैंने उसे रोकते हुए पूछा। लेकिन उसने एक न मानी। मैं पीहू के बारे में जितना जानता था धीमी आवाज में उसे बता दिया।
   "ओह ! तो बात ये है... करोड़ों की प्रॉपर्टीज के केवल दो ही मालिक ? वही मैं सोचूं यार कि सत्य के घर वाले कैसे मान गए...!!", ज्ञान कुछ देर ठहरने के बाद बोला, "सुन सत्य की बड़ी बहन का कॉलेज में एक लड़के के साथ अफेयर था... पढ़ने-लिखने में कॉलेज टॉपर, देखने-सुनने में अच्छा लेकिन जाति अलग थी... सामान्य परिवार से भी था। सत्य की दीदी ने बहुत कोशिश की लेकिन तब तो सत्य के पापा-मम्मी नहीं माने और न ही बड़े भाई साहब ही माने...? सोच क्यूं ? यदि वे इतने ही मॉडर्न हैं तो क्यूं न माने ? देख सत्य के बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, लेकिन उसके घर वाले एक नंबर के लालची इंसान हैं। मेरा दोस्त है, कई बार घर आया गया हूँ, मुझे सब मालूम है... उन्हें पीहू की एजुकेशन और सुंदरता से कोई मतलब नहीं उन्हें इस प्रॉपर्टी से मतलब है... समझा ? और कौन जाने किसी के दिल की बात ? यही लालच यदि सत्य में हो तो ? इसलिए कहता हूँ, जज्बाती होकर नहीं अच्छे से सोच समझ कर फैसला कर... पीहू के मन की बात पहले जान ले। मैं तो कहता हूँ पूछ ले उससे एक बार, फिर कोई निर्णय ले...? दोनों टीनएजर्स नहीं है कि शादी नही कर सकते। यदि पीहू अभी तक तैयार नहीं है तो फिर बात कुछ और भी हो सकती है..."
      मुझे उसकी बात सुनकर कुछ हंसी आ गई , तू उसका कैसा बेस्ट फ्रेंड है, एक बार तो बेचारे का ब्रेकअप हो ही चुका है, अब दोबारा करवाना चहता है..."
    ज्ञान फिर मुझे समझाते हुए बोला, "उसका बेस्टफ्रेंड हूँ, इसीलिए कह रहा हूँ। और रही बात ब्रेकअप की तो मैं अच्छी तरह से जानता हूँ उसका कभी भी किसी के साथ कोई अफेयर नहीं था..."
   ज्ञान की बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, "लेकिन यार उसने तो खुद पीहू से बताया था कि एक लड़की और उसके बीच कुछ दिन तक लव अफेयर चला था... आखिर वह पीहू से झूठ क्यों बोलेगा ?"
    ज्ञान थोड़ा सा हंसते हुए बोला, "जैसे तलाक होने के लिए पहले शादी जरूरी हैं। इसी तरह ब्रेकअप होने के लिए पहले प्यार होना जरूरी है।मैं जानता हूँ, उन दोनों के बीच केवल मिलना-जुलना था वो भी एक कॉलेज में पढ़ने के कारण ? हो सकता है पहले वह लड़की कुछ इंटरेस्टेड भी रही हो लेकिन बात प्यार तक पहुंची ही नहीं थी। उस लड़की ने कोई ब्रेकअप नहीं किया था। जब वह समझ गई होगी कि यह उसके टाइप का नहीं है तो उसने अपना नजरिया चेंज कर लिया होगा, बस। बात सिर्फ इतनी है। अब इसे सत्य ब्रेकअप समझे या प्यार समझे...?"
   "लेकिन जहां तक मैं समझता हूँ कि वह पीहू से शादी करना चाहता है..."
   "लेकिन दोनों के बीच पहले प्यार तो होना चाहिए। यदि है तो मैं तुझे खुद अपने साथ लेकर यहां से चला जाऊंगा। लेकिन यदि नहीं है, और सिर्फ इसलिए कि कहीं सत्य को बुरा न लगे और तू यहां से पीहू को छोड़ के चला जाए, यह मैं नहीं होने दूंगा..."
   "यार तुझसे कौन बहस करे... मैं तुझसे सच कहता हूँ, जिससे मोहब्बत की मेरी जिंदगी से चला गया, इसलिए अब हिम्मत नहीं पड़ती यार, वो मेरी दोस्त ही अच्छी... तू मेरा फैमिली बैकग्राउंड जनता हैं, मेरी मां से भी मिला है, करोड़ों की दौलत का लालच मुझे नहीं.… लेकिन तब भी तुझसे कहता हूँ, मैं सब कुछ पीहू के लिए छोड़ने के लिए तैयार हूँ। शायद प्यार, मोहब्बत, इश्क इन सभी परिभाषाओं से मैं दूर आ चुका हूं। और सिर्फ इतना जानता हूँ कि मैं उसके साथ खुश रह सकता हूँ, उसके साथ जिंदगी जी सकता हूँ... लेकिन जरा सोच, क्या वह मेरे साथ खुश रहेगी अपनी जिंदगी अच्छे से जी पाएंगी ? और जो तू आज सत्य के लिए कह रहा है, कल को यही बात किसी और के दिमाग में आ सकती है न ?"
    ज्ञान बैग की चेन बंद करते हुए बोला, "तेरे बारे में कोई नहीं सोचेगा। कम से कम पीहू को तो नहीं सोचने दूंगा... क्या मैं तुझे जानता नहीं हूँ... और मुझे विश्वास है, जितना मैं तुझे जनता हूँ, उससे कम पीहू भी नहीं जानती होगी... देखा नहीं जब मेरे मुंह से अनजाने में सुसाइड की बात निकल गई थी तो उसने कितनी बेचैनी से पूछा था.. वो तो तेरे इशारे के कारण मैने बात बदल दी... देख आज तक मैंने किसी से प्यार नहीं किया लेकिन किसकी आंखों में किसके लिए क्या है यह मैं अंदाजा लगा सकता हूँ। कभी-कभी इंसान खुद भी नहीं जान पता कि वह किसी को किस हद तक प्यार करता है। शायद आज पीहू भी ना जानती हो कि उसे तुझसे प्यार है या नहीं... लेकिन जिस दिन भी उसे एहसास होगा तो देखना उसकी नजरों में नहीं, उसके पूरे वजूद में तू ही तू दिखाई देगा... और तब पीहू ही नहीं पूरी दुनिया देखेगी..."
   "यार ज्ञान ये तेरा बेस्ट डायलॉग है, क्या मैं किसी कहानी में यूज़ कर लूं ?", मैंने ज्ञान को छेड़ते हुए कहा। 
   "कहानी की दुनिया से बाहर आकर भी देख, कहीं ऐसा ना हो कि आज हंस रहा है और एकदिन तू ही सबसे अधिक रोए... कहानी लिखता है क्या अपनी जिंदगी की कहानी से कुछ नहीं सीखा तूने..?"
   "नहीं यार, बहुत कुछ सीखने को मिला है, सुनना चाहता है तो सुन...", मैने बैग से बॉटल निकल एक घूट पीने के बाद आगे बोला, "अपनी कहानी से ही मैने सीखा है मेरे दोस्त कि प्यार की राह में एक साथ चलने के बाद, बिना कुछ कहे अचानक किसी को छोड़ देने का दर्द क्या होता है। जिन्हें हम अपना समझते हैं और यह मानते हैं कि यह हमारी खुशी चाहते हैं, वही लोग एकदिन झूठे, मान, अभिमान और सम्मान के लिए हमसे त्याग मांग लेते हैं, यह जानते हुए भी कि इस त्याग के बाद इस इंसान के पास कुछ नहीं बचेगा। अपनी चाहतों से दूर जाकर एक नई दुनिया बसाने का दर्द क्या होता है ? मैं सब जानता हूँ ज्ञान...", मैने दो तीन घूट पीने के बाद फिर दृढ़ इरादे से बोला, "यार,  सत्य तेरा बेस्ट फ्रेंड है न, तो वह जरूर तेरी बात मानेगा ...? उससे बात कर, चल चलते हैं न आज ही..."
   "चल ठीक है... मैं बात करूंगा... अभी तो यहां से चले...", ज्ञान बैग लेकर सीढ़ियों तक पहुंचा। उसके कहने पर मैं भी उसके पीछे चला तो पहली बार मेरे कदम कुछ-कुछ डगमगा रहे थे। अभी तो अपनी क्षमता की एक चौथाई भी नहीं पी तो फिर ये क्यूं ? सीढ़ियां उतरने के लिए मैंने जैसे ही ज्ञान के कंधे का सहारा लिया सामने एकदम से पीहू आ गई। उसने ज्ञान से कहा, "आप इन्हें छोड़िए... बैग लेकर नीचे जाइए.…"
    "नहीं पीहू, मैं ठीक हूँ... उतर जाऊंगा... मैने थोड़ी-सी पी जरूर है लेकिन मैं नशे में नहीं हूँ..."
    उसने मेरा बया हाथ अपने बाएं कंधे पर और मेरी पीठ के पीछे से अपना दाहिना हाथ घुमा कर मेरे दाहिने हाथ की बाजू को पकड़ते हुए कहा, "जानती हूँ... तुम्हे देवताओं का वरदान है... मैं तो इसलिए सहारा दे रही हूँ कि बल्ब फ्यूज होने से सीढ़ियों में अंधेरा है...",  सीढ़ियों की चौड़ाई सामान्य से अधिक थी। दो नहीं बल्कि तीन आदमी एक साथ चढ़ और उतार सकते थे।
   ज्ञान तेजी से सीढ़ियां उतर दरवाजा पार कर गया था। पीहू का सहारा लिए उसके पीछे मैं भी उतर रहा था, "पीहू ! ये अंधेरा कितनी अच्छी चीज होती है न... ?"
   उसने पूछा, "क्यों...?"
   मैंने कुछ हंसते हुए कहा, "ये न होता तो तुम्हारा यूं सहारा न मिलता, ये नजदीकियां कहां नसीब होती..."
   "फिर एक्टिंग कर रुलाना चाहते हो या रोना चाहते हो...?", उसने शांत स्वर में धीरे से कहा।
   "नहीं जी... रोए तुम्हारे दुश्मन.... मैं तो अपनी गर्लफ्रेंड को हंसना चाहता हूँ... वैसे सत्य होता न तो बेचारा जल जाता...", मैंने धीरे से बोलने का अभिनय किया, "अच्छा हुआ कि नहीं है..."
   लेकिन उसने संजीदगी से कहा, "काश ! वो होता..."
   मैंने आश्चर्य से पूछा, "मतलब..."
   "नहीं समझोगे... ध्यान से कदम रखना... आखरी पायदान है..."
   "अच्छा !!...", मैंने भी उतनी ही संजीदगी से कहा, "हम तो समझे कि पहला है..."
    "गलत नहीं हैं जना
ब....", उसने समझाते हुए कहा, "जब हम चढ़ेंगे न, तो यह आखिरी पायदान ही पहला पायदान होगा..."
   "वाह ! वंडरफुल !! क्या बात है... गोल-गोल घुमाना कोई तुमसे सीखे...!!! आई लव यू सो मच...", बोल तो गया लेकिन जैसे ही आभास हुआ मैने खुद को सुधारना चाहा, "सॉरी, आई लव योर थाट सो मच... वैसे ये सत्य है कहां...?"
   उसने शिकायती लहजे में कहा, "अब कौन घुमा रहा है गोल-गोल... ज्ञान भैया आप मेरी सुनिए... इधर आइए..."
    ज्ञान के आने पर उसने कहा कुछ नहीं बस अपने हाथ जोड़ दिए। एक दूसरे की आंखों ने एक दूसरे से कुछ कहा जिसे मैं नहीं समझ पाया। फिर उसने ज्ञान से कहा, "आप लोग चलिए... मैं सत्य के साथ पीछे आ रही हूँ...", वह बोली थी।
   मैं बाहर आ गया और वह अन्दर चली गई। ज्ञान ने बाइक स्टार्ट की। मैं बैग को अपनी गोद में रख पीछे बैठ गया। ज्ञान ने पूछा, "रास्ता तो मालूम है न ?"
    "हां थोड़ा आगे से बाएं तरफ की पगडंडी पर उतार लेना ...", मैं ज्ञान को समझाते हुए बोला। 
  "ये ज्ञान ! उसने तुम्हारे सामने हाथ क्यों जोड़े...?", मैने पूछा लेकिन ज्ञान ने मुझे सिर्फ इतना कहा, "हम आज नहीं चलेंगे... समझ गया न"
   हम लोग खूब लड़ते हैं, झगड़ते हैं, एक दूसरे से चाहे किसी भी प्वाइंट में लाख असहमत हों, लेकिन हम दोनों में से किसी ने यदि यह कह दिया, "समझ गया ना", तो उसके बाद कोई बहस नहीं होती है।
   कुछ ही देर बाद हम दोनों बगिया के गेट पर खड़े थे बाइक की रोशनी देखकर मंगल भागता हुआ आया, "सर जी ! आप आ गए ? ", फिर ज्ञान की तरफ देख मेरी तरफ देखा।
    "इनका नाम ज्ञान है। मेरे और तुम्हारे भैया जी के बहुत अच्छे दोस्त। देखो मंगल इनके आने की खुशी में आज भी कल की तरह पार्टी होगी। तुम्हारे भैयाजी और पीहू भी आ रहे हैं ..", और फिर हाथ से इशारा करते हुए पूछा, "अपने दोनों नन्हे-मुन्हें सुरक्षति तो हैं न...?"
    "बिल्कुल सर जी ! ज्ञान भैया आप बाइक को अन्दर ही लेते चलिए, मड़ैया के पास ही खड़ा कर दीजिएगा ..."
     "ठीक है मंगल, तुम गेट बंद कर आओ ... "
     कुछ देर में मंगल सामने खड़ा था, "मंगल एक और चारपाई का इंतजाम हो सकता है क्या ?"
    "सब हो जाएगा ... पहले आप दोनों इसमें बैठिए...", उसने मड़ैया से खाट बाहर निकलते हुए कहा।  फिर कमली के साथ बगिया के पास ही बने अपने घर गया। जब लौटा तो एक खाट, दो प्लास्टिक की कुर्सी और एक टेबल का इंतजाम हो गया था। 
    उसने सभी को व्यवस्थित रूप से बिछाया। टेबल को लगभग सेंटर में रखते हुए बोला, "सर जी एक मिनट और..."
    कुछ देर में एक बड़ी थाली में कटी हुई सलाद और एक प्लेट में कल की बची हुई नमकीन रखते हुए बोला, "अब सर जी...?"
    "हां कुल्हड़ कितने है...?"
    "पर्याप्त हैं ..."
     "ठीक है, अभी तुम अपने लिए ले कर आओ ..."
     अगले ही पल वह अपने लिए एक कुल्हड़ और एक बोतल रम की लेकर हाजिर हो गया। तीन पैग बने और खत्म भी हुए। मंगल सलाद खाते हुए बोला, "सर जी! खाने पीने में क्या इंतजाम किया जाए ...?"
     "रुको ! भैया जी को आ जाने दो फिर डिसाइड करते हैं..."
    "तब तक सर जी थोड़ी-थोड़ी और हो जाए ..?"
    "आवश्य हो जाए ..."
     दूसरा बना तो लेकिन उससे पहले ही सत्य और पीहू आ गए थे। सत्य को देखकर ज्ञान ने मंगल से कहा, "मंगल एक और..."
      लेकिन सत्य ने मंगल को रोक दिया और फिर ज्ञान से बोला, "यह सब तो चलता रहेगा यार, चलो पहले गांव चलकर तुम्हारे घर फोन कर लेते हैं... और मंगल देखो घर से कुछ सामान लाया हूँ, खाने पीने के लिए। लो पकड़ो यह झोला और आगे पीहू से समझ लेना,. चलो ज्ञान ..."
    ज्ञान ने अपनी गिलास खाली की और उठता हुआ बोला, "चलो..."
    दोनों चले गए। मंगल ने पीहू से पूछा, "आज क्या बनाया जाए...?"
     पीहू मेरी ही खाट में मेरे बगल से बैठते हुई बोली, "चावल धो के दस मिनट भिगो के रख दो। फिर उसके बाद पकाने के लिए चढ़ा देना। सब्जी क्या-क्या है ?"
   "सभी हरी सब्जियां हैं...", मंगल ने जवाब दिया।
   "तो ले आओ ... पहले सब्जी काट लेते हैं फिर जब चावल पक जाएगा तो उसका पुलाव मैं बनाऊंगी अपने तरीके से। मंगल चाचा ! तुम कमली का ध्यान रखना उसे कोई दिक्कत न होने पाए। बराबर उसके साथ में रहना..."
     मंगल के जाने के बाद मैंने सलाद और नमकीन के प्लेट की तरफ इशारा करते हुए उससे कहा, "पीहू कुछ खाओ न..."
      उसने सलाद खाते हुए मुझसे पूछा, "बॉयफ्रेंड ! कल जा रहे हो...?"
     उसकी आवाज में मुझे एक अजीब सा सूनापन महसूस हुआ। एक अनकही-सी उदासी। चेहरे में किसी अपने से बिछड़ने का दर्द। उसके मन के अंदर ही अंदर कुछ चल रहा था जिसे वह बार-बार अपनी फीकी मुस्कान के पीछे छुपा लेना चाहती थी।  वह सलाद के एक टुकड़े को उठाती, उसे ध्यान से देखती, फिर मुंह में डाल धीरे-धीरे चबाने लगती। उसने अभी तक एक बार भी पीने की कोई फरमाइश नहीं की। मैं उसके इस मौन को तोड़ना चाहता था। 
     तभी मंगल हरी सब्जियां और चाकू मेरी खाट पर रखते हुए बोला, "सर जी सलाद और काट दूं ? खत्म हो रही है...?"
    "हां जरूर...", मैंने मंगल को इशारों ही इशारों में एक गिलास भी लाने को कहा।
    मंगल अपना काम पूरा कर वापस कमली के पास चला गया। मैने पीहू की तरफ भरी हुई गिलास बढ़ाते हुए कहा, "लो..."
    वह गिलास से एक-एक शिप लेते हुए लगातार कुछ सोचती जा रही थी। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, "पीहू क्या सोच रही हो...?
  वह अपनी आंखों के कोर साफ करते हुई बोली, "कुछ नहीं... बस ऐसे ही रोना आ रहा है... अच्छा ! ये बताओ तुमने सुसाईड के लिए कौन सा तरीका इस्तेमाल किया था..?"
     फिर उसने गिलास रख दिया। चाकू उठा उसे अपनी कलाई में फेरते हुए बोली, "ये वाला ... या फिर ज़हर... या स्लीपिंग टैबलेट्स... हु.. कौन सा वाला...?"
    मैने उसकी नजरों से नजर मिलते हुए कहा, "सुसाईड!!! और मैं ? मैं क्यूं करने लगा ?"
    "मुझसे झूठ बोलते हो...", इस बार वह अपने चेहरे में दोनों हथेली रख रो पड़ी।
     मैंने उसके कंधे पर हाथ रख समझाने की कोशिश की, "नहीं पीहू सच, ऐसी कोई बात नहीं...", लेकिन उसने अगले ही पल मेरा हाथ अपने कंधे से झटक दिया। फिर मेरी हिम्मत नहीं हुई।
      खुद पर नियंत्रण पाने में उसे कुछ समय लगा। फिर उसने शांत मन से मुझसे कहा, "बॉयफ्रेंड! आज तुमसे मैं अपने लिए कुछ मांगना चाहती हूँ, दोगे ?"
    "हूं .... कहो !"
    "पहली .... जब तक तुम यहां हो, मेरे साथ रहोगे। वही करोगे जो मैं कहूंगी, बिना कोई सवाल पूछे। ... दूसरी तुम्हारी जिंदगी के हसीन और यादगार पल की एक्टिंग करना चाहती हूँ। तुम उसकी स्क्रिप्ट अभी लिखोगे, इसी वक्त। जब तक मैं सब्जी काट रही हूं..."
      फिर उसने अपने लिए व्हिस्की का और मेरे लिए रम एक पैग बनाया। फिर मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा "चीयर्स ..."
       मैंने भी उसी के अंदाज में कहा, "इस बगिया के नाम, इन पेड़ पौधों के नाम, बहती हुई इन हवाओं के नाम, इस जमीं और आसमां के नाम, इस चंद्रमा के नाम, असंख्य सितारों के नाम, कमली और मंगल के नाम ...", फिर दोनों ने एक साथ पी और खाली गिलास टेबल पर रख दिया, फिर अपने-अपने काम पर जुट गए।
     "पीहू ! दो सीन लिख रहा हूं, एक रोमांटिक, दूसरा थोड़ा-सा सेड। तुल सिलेक्ट कर लेना .... तुम्हे जो पसंद लगे..."
     "ओके...", फिर वह सब्जी काटने में व्यस्त हो गई और मैं स्क्रिप्ट लिखने में। बीच-बीच में एकदूसरे को देखकर मुस्कुरा देते। 
      गहरे बादामी कलर का सलवार सूट जो उसकी आंखों से मैच करता था, चंद्रमा की इस खूबसूरत चांदनी रात में उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहा था। मैंने प्रशंसा भरी नजरों से उसे देखते हुए कहा, "तुम्हारा यह सूट तुम पर बहुत अच्छा लग रहा है "
    "अच्छा ! बहुत जल्दी ध्यान दिया...? तीन साल पहले पापा ने बर्थडे पर गिफ्ट किया था... सत्य को भी बहुत पसंद है, अच्छा है न ?"
   "हां सचमुच बहुत अच्छा लगता है... वैसे भी गोरे लोगों को डार्क कलर ज्यादा खिलता है... रंग-रूप और उभर कर सामने आता है..."
   "तुम्हें तो डायरेक्ट, राइटर और एक्टर के साथ-साथ
 कॉस्टयूम डिजाइनर भी होना चाहिए था...", वह हंसते हुए बोली।
    "था नहीं... हूँ... प्लीज करेक्ट इट..."
   लगभग 15 मिनट में उसका काम पूरा हुआ और मेरा भी।
    "लाओ देखूं तो क्या लिखा ? ", उसने मेरे हाथ से डायरी लेते हुए कहा। फिर उसे ध्यान से पढ़ने लगी। 
  पहले सीन को पढ़ने के बाद उसका चेहरा कुछ उदास हो गया। उसकी उदासी को दूर करने के लिए मैने उसे दूसरा सीन पढ़ने के लिए कहा। 
   "वॉव!! क्या रोमांटिक सीन है, बॉलीवुड की किसी रोमांटिक मूवी जैसा... क्या सचमुच... हूँ ?"
   "हूँ... लेकिन थोड़ा सा एक चेंज है.... किस, वो यहां नहीं... यहां था...", मैने इशारे से कुछ सकुचाते हुए बताया।
    "क्या सच में ...!! यू मीन... नॉट ऑन द फॉरेहेड बट ऑन द लिप्स... वह भी जस्ट एट्टीन में...!! वॉव।देखो... देखो तो कैसे शरमा रहे हो... तो फिर चेंज क्यों किया...?", उसने पूछा।
    "बस ऐसे ही...", मैने सर झुकाए हुए कहा।
कुछ देर तक मेरी तरफ वह देखती रही जैसे मेरे अंदर चल रहे जज्बातों को पढ़ना चाहती हो फिर अचानक उसने कहा, "थोड़ा थकान लग रही है, मैं लेट जाऊं ?"
  "यार ये भी कोई पूछने वाली बात है... तुम आराम से लेट जाओ, मैं कुर्सी में...", मैं उठ के कुर्सी में बैठना चाहा तो उसने मेरा हाथ पकड़ के वही बैठे रहने के लिए कहा, "तुम बैठे रहो.. मैं तुम्हारे पीछे पैर फैला लूंगी... तुम्हे कोई दिक्कत तो..."
    "अरे कैसी बात करती हो... कोई दिक्कत नहीं होगी... तुम आराम से अपने पैर फैला कर लेट जाओ..."
   उसने वैसा ही किया। उसकी नज़रें आकाश में टिम-टिमाते असंख्य सितारों पर टिकी थीं। कभी वह उनको देखती तो कभी मेरी तरफ देखकर थोड़ा सा मुस्कुरा देती। उसे देख मैं भी मुस्कुरा देता। मैंने पूछा, "क्या देख रही हो इस तरह...?"
      उसने भी मुस्कुराते हुए कहा, "देख तो तुम भी रहे हो, पहले तुम बताओ...?"
    "मैंने सच बात कह दी तो कहोगी फ्लर्ट कर रह हूँ...?"
    "नहीं कहूंगी अब बोलो भी..."
   मैंने उसी तरह मुस्कुराते हुए और उसे देखते हुए कहा, "मैं तो देख रहा था कि आसमान के चांद का रंग आज फीका क्यों है, अब समझ में आया कि आज उसका मुकाबला धरती के इस चांद से जो हो रहा है..."
   "क्या पहले न होता था...?"
   "होता रहा होगा लेकिन अधूरा, आज तो खुले आसमान के नीचे आसमान की तरफ देखते हुए ये धरती का चांद जो उसे देख रहा है..."
   "आसमान के चांद के पास ऐसा क्या नहीं है जो इस धरती के चांद के पास है...?"
   "बहुत-सी चीज़ें नहीं है उसके पास। उसके पास दिलकश मुस्कुराहट नहीं, गहरी बदामी आंखें नहीं, गुलाबों की सुर्खी लिए हुए लाजरते लब नहीं, वो रुख़सार नहीं जिनमें डिंपल पड़ते है, ये शर्म-ओ-हया नहीं, उसके पास धड़कता दिल नहीं, ज़िंदगी की रवानी नहीं, ये डार्क गोल्डन स्विडिश कर्ली जुल्फे भी तो नहीं... और बताऊं ? ... उसके पास गोल्डन झुमके नही, पैरों में चांदी की पाजेब नहीं, गले में मोतियों की माला नहीं, हाथों में मैरून कलर के कंगन नहीं, बदन से लिपट यह रेशमी चुनरी नहीं... उसके पास संगमरमर सा बदन नहीं...", फिर उसकी उंगली पड़कर उसके हाथ को ऊपर उठाते हुए कहा,"उसके पास ये हीरे की अंगूठी भी तो नहीं..."
    उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देख कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "हे !! तुम्हें कैसे मालूम कि यह अंगूठी हीरे की है... नकली भी तो हो सकती है..."
     मैंने उतने ही विश्वास से कहा, "मालूम है, नहीं हो सकती। जानता हूँ तुम्हारे पास सब असली है, कुछ भी नकली नहीं..."
    "पूछोगे नहीं किसने दी...?", उसने उत्सुकता से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
   "जब अनुमान लगा सकता हूँ कि सत्य ने दी होगी इंगेजमेंट में, तो क्यों पूछूं..?", मेरे होठों में शरारती मुस्कान थी। लेकिन इस मजाक से उसका चेहरा तमतमा गया। गालों की सुर्खी और बढ़ गई, "तुम्हारी सी सत्य पर आकर ही क्यूं अटक जाती है... तो यह अनुमान क्यों न लगा पाए कि इंगेजमेंट की अंगूठी इस फिंगर में नहीं पहनी जाती है..."
    "सॉरी... मैंने तो मजाक में कहा था..."
    "अच्छा तो बड़े मजाकिया हो तुम ! तो सभी बातें भी मजाक में ही कहीं होंगी  ?", उसने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। 
   "नहीं वो सब तो सच था... अच्छा चलो बताओ किसने दी है यह डायमंड रिंग..."
    उसने फिर गुस्से से कहा, "कॉलेज के जमाने में एक बॉयफ्रेंड था उसी ने दी थी..."
    "पीहू कहां न.. सॉरी अब बात भी दो..", मैंने अपने दोनों कान टच करते हुए कहा। 
   "भैया ने... जब उनकी सर्विस लगी थी, तब उन्होंने रक्षाबंधन आने पर अपनी छः महीने की सेविंग से खरीद कर दिया था...", वह गर्व से बोली।
    "वाह पीहू !! मतलब तुम्हारे भैया तुम्हें बहुत प्यार करते हैं..."
    "हां, लोगों के कहने के लिए हम लोग कजन है... हमारे कुल में बहुत दिनों बाद कोई लड़की हुई थी... इस कारण से भी सभी लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं...",  कहते हुए उसकी आंखें भर आईं, "जैसे हमारे कुल को किसी का श्राप लगा हो, बेटियां होती है नहीं थी, हमारी परदादा की एक बहन थी जो 6 महीने तक जीवित रही फिर इसके बाद मर गईं थीं..."
     जब उसे अंदाजा हुआ कि इन बातों से माहौल और गमगीन हो जाएगा तो उसने बातों की दिशा बदल दी, "तुम रोमांटिक कहानी क्यों नहीं लिखते हो, अभी जिस ढंग से तुमने मेरी तारीफ की तो आई थिंक तुम रोमांटिक कहानी बेहतर लिख सकते हो..."
     रोमांटिक कहानी लिखने का अर्थ जानती हो पीहू क्या होता है, खाली कैनवास पर एक खूबसूरत तस्वीर बनाना, एक चेहर जो खयालों में हो या फिर नजरों के सामने... सच में एक दिन लिखूंगा... लेकिन आज लिखने से डरता हूँ। मैं जानता हूँ कि ऐसी रोमांटिक और सच्ची कहानियों का अंत आंसू में भींगा होता है... अभी तो ऐसी कहानी जीना चाहता हूँ जिसमें दर्द हो, आंसू हो, प्रतीक्षा हो, लेकिन जुदाई न हो..."
    उसने संजीदगी से कहा,  "तुम्हारी भावनाएं निश्चल है। इसलिए तुम्हारे शब्दों का संसार भी इन सितारों से भरे आसमान की तरह विहंगम हैं... जहां हर सितारा अपनी पूरी क्षमता के साथ जगमगाता है... हर शब्द अपनी कहानी खुद कहते हैं... एक रोमांटिक कहानी जो किसी भी कालचक्र से परे होती हैं... जहा बिहोह के बाद भी किरदार एक दूसरे के मन में बसते है..."
    मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया था, "अब बताओ ! रोमांटिक कहानी कौन बेहतर लिख सकता है...?"
   उसने कुछ हंसते हुए कहा, "देखो तो... सितारों भरा यह आसमान कितना अच्छा लगता है ? यह सितारों की दुनिया कितनी मनमोहक है ?"
   "लेकिन मुझे डरावनी लगती है...", मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
   "वो भला क्यूं...?", उसने आश्चर्य से पूछा था। 
   "पता नहीं क्यों, पर लगती है... चलो छोड़ो इन बातों को कोई दूसरी बात करो...", मैंने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
   "कहानीकार तो तुम हो, कोई छोटी-सी कहानी सुनाओ न प्यारी-सी, सुंदर-सी..."
   उसके इतना कहते ही मेरे विचारों में एक आंधी चली कुछ पुरानी स्मृतियों ताजा हो गई। कभी-कभी जिंदगी भी किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है एकदम विपरीत। आज कहानी सुनाने वाला मैं था और सुनने वाला...? क्या इन पांच वर्षों में समय चक्र घूम कर वापस अपने उसी स्थान पर पहुंच गया ?
   "क्या सोचने लगे...?", उसने पूछा।
   "कुछ नहीं, सोच रहा था कौन सी कहानी सुनाऊं.?",  मैंने अपने मन के भावों को छुपाते हुए कहा, "चलो एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं...

   एक आसमान के दो तारे,
   एक दूजे को लगते थे प्यारे।
   एक दिन दोनों कुछ करीब आये,
   देख एक दूजे को फिर मुस्काये।
   जब दिल में आता, बातें कर लेते,
   मन करता एक दूजे को बस छू लेते।

   "ऐसे..?", उसने अपनी हथेली मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
  मैने भी मुस्कुराते हुए उसकी हथेली को छूते हुए कहा, "हां ऐसे..."
   "फिर क्या हुआ ...?", उसने पूछा।

   एक आसमान के दो तारे, 
   एकदूजे को लगते थे प्यारे,
   दोनों ने मिलकर एक सपना देखा, 
   एक दूजे के संग-संग रहना देखा।

    "वाव... !! दोनों ने एक साथ रहने का सपना भी देखा !!!...", उसने आश्चर्य जताते हुए कहा।
    "और नहीं तो क्या...", मैने कहा, "इक-तरफा मोहब्बत थोड़ी न थी..."
  "क्या दोनों साथ-साथ रहे ?", उसने पूछा।
  "दुनिया तो दुनिया होती है पीहू, फिर चाहे वो इंसानों की हो या फिर देवताओं की.. या फिर इन सितारों की...", मेरे होठों में फीकी मुस्कान थी।
   "मतलब ....?"
   "तो फिर आगे सुनो....

   उनके नजदीकी आकर्षण से,
   मन में उठती लहरों से,
   दिल की सच्ची बातों से, 
   कुछ और करीब आने से, 
देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की ये दुनिया,
झूठे, मक्कार, फरेबी लोगों की दुनिया।
ये सूर्य, चन्द्र, ग्रहों, उपग्रहों की दुनिया।
   सबने नियम बिगड़ते देखें,
   नियम विरुद्ध थी उनकी बातें, 
   कोई फिर कैसे माने ?
सब मिलकर जा प्रभु से बोले,
इनके कृत्यों से ब्रह्माण्ड हैं डोले।
   दूर करो अब इन दो तारों को,
   प्रेम में पागल इन दो न्यारों को।
   ये छेड़ रहे स्थापित नियमों को।
दोनों सृष्टि नियंता से जा बोले,
प्रभु हमको एक-संग रहने दें।
तब सहृदय प्रभु दुनियां से बोले,
   अरे! नादानों कुछ तो सोचो,
   इनके मध्य का प्यार तो देखो। 
   बंधे हैं सृष्टि नियम इसी से सारे,
   सच्चे प्रेम के आगे हम भी हारे।
किसीने न सुनी प्रभु की बातें, 
दुनियां से अब प्रभु भी हारे।
एक आसमान के दो तारे, 
एकदूजे को लगते थे प्यारे।
    मैं खामोश हो गया। कुछ देर के बाद उसने कहा, "फिर क्या हुआ..."
   "फिर क्या हुआ... हां पीहू, फिर क्या हुआ... क्या हुआ...", मैने उसकी तरफ देखते हुए खोए-खोए स्वर में बोला जैसे मैं पीहू से नहीं खुद से पूछ रहा हूँ...
   "ये क्या हुआ..?", उसने एक हाथ मेरे कंधे में रखते हुए कहा।
   मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ फेरते हुए कहा, "सच पीहू! मुझे कुछ नहीं मालूम... नहीं मालूम मुझे कुछ..", 
   "ये सुनो...", उसने धीरे से मेरे हाथ पर अपना दूसरा हाथ रखते हुए कहा, "चेहरा फेर लेने से आंसू नहीं छुपते... इरादे मजबूत करने से आवाज का कंपन कम नहीं होता... कहानी अधूरी नहीं छोड़ते हैं दोस्त ! इसे पूरा करो और मुक्त हो जाओ अपने दर्द से... मैं तुम्हारे साथ हूँ..."
     मेरी नज़रें दूर कहीं आसमान पर टिकी थी। उस वक्त मुझे समझ में नहीं आया कि मैं अपने आप को सामान्य और संयत कैसे करूं... मेरा पूरा शरीर कांप रहा था... और उसने उतनी ही मजबूती के साथ मेरा हाथ पकड़ कर रखा था...मैने उसी कांपती आवाज में आगे कहा...
थे जो एक आस्मां के दो तारे, 
एकदूजे को लगते थे प्यारे।
प्रभु ने दोनों के बीच विभाजन रेखा खींची,
एक रेखा से दोनों की दूरी निर्धारित कर दी।
किंतु अन्याय नियति सहन ना करती,
देखो ! वह तो दंड प्रभु को भी देती। 
क्रुद्ध नियति ने कर दिया फैसला,
तू भी पियेगा जीवन की ये हाला।
जा हर युग में होगी यही कहानी, 
यही रेखा होगी तेरी भाग्य निशानी।
तुम भी नियति भाग्य छले जाओगे।
तुम भी अपने प्रिय से दूरी पाओगे।
जो तुमने खींची एक विभाजन रेखा,
क्या इनके मध्य के प्रेम को न देखा।
जो छल किया इन दो तारों से,
जाओ अब हर युग में तुम भी,
छले जाओ किस्मत की लकीरों से।
नियति श्राप पाकर प्रभु मुस्काए, 
सौभाग्य, जो हम भी प्रेमी बन पाए।

    "तो अपनी प्रिय से जुदा होने का एक अर्थ यह भी है...", पीहू ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   मैंने मुश्किल से अपना चेहरा उसके चेहरे की तरफ किया। मेरा पूरा शरीर सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। मुख से आवाज नहीं निकल रही थी। बड़ी मुश्किल से मैं बोल पाया, "हां पीहू ! यही तो है देवत्व का अभिशाप। यदि प्यार में दूरियां मिले तो समझ लो ईश्वर का कुछ अधिक ही अंश है आपमें... यह तो नियति भाग्य के द्वारा खींची गई विभाजन रेखा है... अब शायद तुम समझ गई होगी कि क्यूं मुझे इन सितारों की दुनिया से डर लगता है। महसूस होता है जैसे इन्हीं का महा - अभिशाप लगा है मुझे... किन्हीं दो सितारों को जुदा करने का श्राप भोग रहा हूँ मैं भी... भटक रहा हूँ एक श्रापित जीवन लिए... इसलिए अब डरता हूँ कि... मैं किन्हीं दो सितारे की विभाजन रेखा का कारण न बनूं..."
     उसने उतनी ही आत्मीयता से मेरे आंसू पोछे फिर मुझे अपनी तरफ खींच कर गले लगा लिया और विश्वास भरे शब्दों में कहा, "प्लीज चुप हो जाओ... रोते नहीं... विश्वास करो मेरा, नहीं बनोगे... और ना ही मैं तुम्हें बनने दूंगी... याद करो  मैंने तुमसे क्या कहा था ? मुझे बच्चे बहुत पसंद है... तुम बिल्कुल बच्चों की तरह हो... तुम्हारा मन बहुत ही निर्मल और साफ है... शायद इसीलिए मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ... मैं नहीं मानती कि तुम्हारा जीवन श्रापित है... यदि है भी तो जब भी इस धरती से मैं जाऊंगी अपने साथ ले जाऊंगी... संभालो अपने आपको... तुम्ही कहते हो न अधिक भावुक होना अच्छी बात नहीं होती..."
   उसके शब्द सुनकर मैं चौंक गया, एक झटके से उसे छोड़ कर कुछ तेज आवाज में बोला, "पीहू ! ये तुमने क्या कहा... इस धरती से जाने की बात करती हो... यदि मेरे श्राप से मेरी मुक्ति तुम्हारा धरती को छोड़कर जाना है, फिर मुझे नहीं चाहिए कोई मुक्ति... हां पीहू ! फिर कौन मुझे इस तरह से गले लगाएगा... तब तो जीवन जीना मेरे लिए और भी मुश्किल हो जाएगा..."
   मेरे इतना कहते ही उसने फिर से मुझे अपनी बाहों में समेट लिया, "अच्छा नहीं कहूंगी... भूल हो गई...", फिर उसने कमली को आवाज दी। उसके पास आने पर उसने जग कमली को देते हुए कहा, "जरा पानी लेते आओ..."
   फिर उसने मुझे अच्छे से मुंह धुलाया और खुद भी धोया। चुनरी से मेरे मुख को पोंछा, माथे में बिखरे बालों को अपनी उंगलियों से पीछे की तरफ संवारा, फिर मेरा चेहरा अपनी तरफ करते हुए बोली, "अब मुस्कुराओ... देखो तो हंसते-मुस्कुराते कितने अच्छे लगते हो....शायद ज्ञान भैया और सत्य आ रहे हैं..."
      यही तो मित्रता की खबसूरती हैं। उसमें आपको हर रिश्ता मिल जाता है। उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि यदि इस समय मेरी मां होती तो यही करती। मैंने धीरे से खुद को उससे कुछ दूर किया और पलट कर देखा। गेट पर ज्ञान और सत्य दिखाई दिए। उसने डायरी मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "अभी इसे अपने पास रखो..."
      मैने डायरी को कल की तरह तकिया के नीचे दबा दिया। इन सबके बीच कमली हमारे पास ही खड़ी थी, उसकी नज़रें मुझ पर कम और पीहू पर अधिक थी।उन दोनों के पास आने पर मैंने पूछा, "बता दिया घर में ?"
   "हां,  दोपहर तक की मोहलत मिली है। यार इन गेस्ट से तो परेशान हूँ मैं। शाम को कल गेस्ट आएंगे मम्मी ने कहा दोपहर तक पहुंच जाना... पर जान ! रात अपनी है... पर क्या बात है... पैमाने खाली रखे है ....", ज्ञान सामने कुर्सी में बैठता हुआ बोला।
    "तुम लोगों का इंतजार था... "
    "तो इंतजार खत्म हुआ। महफिल सजाई जाए... मा-बदौलत जश्न शुरू हो...", ज्ञान ने हुक्म जारी किया।
   "जी आलमपनाह ! ....", मैने दो पैग बनाए और दोनों के सामने रख दिए।
   "लेकिन इतना टाइम कहां लगा दिया...?", मैने उत्सुकता से पूछा। 
    इसबार जवाब सत्य की तरफ से आया, "टेपरिकॉर्डर लेने घर चल गया था, देखा सेल डेड थे, तो फिर गांव की दुकान चले गए...", 
    फिर उसने टेपरिकॉर्डर और कुछ कैसेट्स निकालकर टेबल पर रखते हुए कहां, "सोचा पार्टी में म्यूजिक न हो तो अधूरी लगती है ...?"
     "चलो तो फिर लगाओ कोई .... मै अभी आती हूँ...", पीहू उठते हुए बोली।
   ज्ञान ने एक कैसेट लगाई। एक रोमांटिक गीत बज उठा, "छलकाए जाम... आइए आपकी आंखों के नाम... आपके होठों के नाम..."
    वाह... वाह... के साथ महफिल शुरू हुई। तीन दोस्त, चार जाम, तीन खाली हो रहे थे और भर रहे थे। लेकिन एक खाली कुछ उदास उसी तरह रखा हुआ था। कुछ देर में मंगल आया, "भईया जी... चावल पक गया, रोटियां बन रही है..."
    "तुम अपना कुल्हड़ लाओ और हां कमली के लिए भी... ", मैने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा फिर उसके लिए दो लार्ज पैग देते हुए बोला, "इंजॉय..."
    तभी पीहू ने मुझे पुकारा, "ये! आओ तुम्हे सब्जी बनाना सिखाऊं..."
   आठ-दस कदम पर ही दो चूल्हे जल रहे थे। एक में रोटी बनने की तैयारी हो रही थी। दूसरे में पीहू की कढ़ाई चढ़ी थी, तेल गरम हो चुका था। चूल्हे के पास रखे पत्थर में मै बैठते हुए बोला, "चलो तो सिखाओ "
     "क्या ..?"
    "अरे... तुमने ही तो अभी बुलाया है..", मैंने आश्चर्य से कहा।
    "इसमें सीखने जैसा कुछ नहीं, देखते जाओ और सीखते जाओ। मैंने तो तुम्हें अपने पास बातें करने के लिए बुलाया है... मेरी गिलास कहां है... ", उसने पूछा।
    "वहीं रखी है.... रुको मांगता हूँ... ", फिर मैं मंगल को पास बुलाते हुए समझाया कि उसे क्या करना है। वह सब्जी बना रही थी और मैं देख रहा था। बीच-बीच में शिप और बातों का दौर भी। 15 मिनट में सब्जी पक गई, उसने सब्जी को कढ़ाई से एक दूसरे बड़े बर्तन में निकाल उसे खाली कर लिया। 
   "पीहू कोई जोक सुनाओ न... थोड़ा बहुत तो हंसा दो... फिर ये रात दोबारा इस जीवन में आए न आए..."
     "अच्छा जोक, बहुत शब्द से याद आया, कॉलेज में एक फ्रेंड ने सुनाया था, समझने वाला जोक है, ध्यान से समझना... एक बार एक सीधे-साधे लड़के ने एक मॉर्डन लड़की से अपने प्रेम का इजहार करते हुए कहां, "हे प्रिये ! मैं तुम्हें बहुत-बहुत प्यार करता हूँ..." तो उस आधुनिक लड़की ने उससे कहा तो बताओ प्रिय, प्यार करोगे कि बहुत-बहुत करोगे...", मैंने बस सुना मेरे चेहरे में कोई रिएक्शन ना देखकर उसने कहा, "नहीं समझ में आया ? अकेले में दो-तीन बार सोचा जब समझ में आयेगा तो अकेले में हंसना...
     फिर उसमें दोबारा कढ़ाई आग में चढ़ाई। थोड़ा सा देसी घी गरम होने की छोड़ दिया। तभी मैं जोर जोर जोर से हंसने लगा। उसने भी हंसते हुए कहा, "अब जा के समझ आया... तुम तो नीरा बुद्धू हो..."
    जीरा, हरी मिर्च, थोड़ी सी कटी हुई प्याज, और भी कुछ मसालों के साथ मिक्स वेज को अच्छे से भून लिया फिर पके हुए चावल को अच्छी तरह से उनमें मिक्स किया। थोड़ी देर बाद हल्दी और नमक मिक्स कर उसे धीमी आंच में पकने के लिए छोड़ दिया। 
     "चलो ! ... अब कमली और मंगल चाचा देख लेंगे ..", हम दोनों सत्य और ज्ञान के पास आ गए। यहां महफिल सबाब पर थी। टेपरिकॉर्डर में 1942 का गाना प्ले हो रहा था, "भीगी भीगी रुत में..."
   मंगल मुझसे धीरे से बोला, "सर जी ! कमली को ये वाली बहुत पसंद आई, थोड़ी सी और दे दूं ..?"
    मैने उसे बॉटल देते हुए कहा, "ध्यान रखना, ये मीठा जहर हैं, आराम से...."
    थोड़ी देर बाद खाने का दौर शुरू हुआ। कल की तरह ही चटाई बिछाई गई। देशी धी, हाथ की बनी रोटी, मिक्स वेज और ढेर सारी सलाद और अंत में गरमा-गरम चावल का पुलाव एक अलग ही स्वाद। हम सभी ने कमली और पीहू के खाने की तारीफ की, खास कर पुलाव की। टेप रिकॉर्डर में रोमांटिक गाने लगातार बज रहे थे।    
    खाने के बाद बर्तन और चटाई समेटे गए। फिर कल की रात की तरह कुछ करने का तय हुआ। इस बार मैंने मंगल और कमली को आदिवासी गीत पर नहीं बल्कि दिल मूवी के गीत पर नचाया। "नाच मेरी जान जरा दम दमा दम"। पहले कमली और मंगल दोनों ही तैयार नहीं हो रहे थे, "अरे सर जी कैसे ! "
    "अरे कैसे क्या, जैसे बने वैसे... कुछ नहीं, कमर मटका-मटका के कमली के आसपास थोड़ा सा डांस करना है बस... "
    "आओ मंगल मै समझता हूँ... तुम सॉन्ग प्ले करो...", ज्ञान मंगल के गले में बाह डालकर उसे कुछ दूर ले जाकर समझने लगा, फिर उसने कमली को भी अपने पास बुलाया और उसे भी कुछ समझाया दोनों ने बड़ी मुश्किल से अपनी सहमति दी। गाना बजा, दोनों ने डांस किया और मैं इस बात से एग्री कर गया की ज्ञान चाहे तो एक अच्छा कोरियोग्राफर बन सकता है। 
   अब सभी ने ज्ञान की तरफ देखा, उसने मेरे, पीहू और सत्य की तरफ देखते हुए बोला, "यार तुम लोगों को कल का अनुभव भी है, इसलिए पहले तुम लोग। तुम लोग को देखकर मैं भी लास्ट में कुछ ना कुछ कर ही लूंगा ",
   "सत्य ने मेरी तरफ देखा क्यों राइटर कोई स्क्रिप्ट है मेरे लिए ... हम तो ठहरे अभिनेता, एक्टिंग ही करेंगे ..."
   "ऑफकोर्स ! उस पोयम को एक्सटेंड करके एक कहानी लिखने की सोच रहा हूँ। दो सीन मेरे दिमाग में भी है और डायरी में भी लिखें है। सिलेक्ट कर लो उनमें से कोई एक। लेकिन हां एक सीन तुम्हारा है, और एक सीन मेरा है... पीहू तुम भी देख लो...", मैंने अपनी डायरी सत्य की तरफ बढ़ते हुए कहा।
   दोनों में कुछ डिस्कशन हुआ फिर सीन नंबर 2, एक्ट के लिए फाइनल हुआ। एक्ट सभी के समझ में आए और इसलिए मुझे इसकी बैकग्राउंड स्टोरी सभी को बतानी जरूरी थी। 
    "तो दोस्तों ! यह कहानी है दो नादान मोहब्बत करने वाले दिलों की। दोनों ही टीनएज में ही एक दूसरे से मोहब्बत कर बैठे। नायिका अर्थात कहानी की हीरोइन, नायक अर्थात कहानी के हीरो के गांव में मेहमान बन के आई। तो सीन ये है कि हीरोइन, हीरो से मिलने के लिए उसके घर आ रही थी कि रास्ते में बरसात होने लगी और वह एक गाने को गुनगुनाते हुए इस बरसात में डांस करने लगी। कहानी का हीरो अपने घर में दरवाजे के पास खड़ा हुआ उसके डांस को देख रहा फिर उसके बाद क्या हुआ यह दोनों एक्टिंग करके और डायलॉग बोलते हुए हम सभी को दिखाएंगे ...", फिर मैं पीहू और सत्य दोनों को सीन के डिटेल और इमोशंस के बारे में बताया। सीन का सटअप किया जाने लगा, एक साफ सुथरी तौलिया मैने अपने बैग से निकाल कर निर्धारित जगह पर रखवा दी।
     मंगल ने बल्ब को ऐसी जगह लगाया कि उसकी रोशनी हीरो और हीरोइन के फेस पर अच्छे से पड़ सके। अब बारी थी गाना सेलेक्ट करने की। पीहू ने 1942 मूवी का वही गाना सेलेक्ट किया। मैंने पीहू को समझाने की कोशिश की कि इसमें हीरो को नहीं भींगना है। लेकिन उसने ज़िद की कुछ भी करो गाना यही होना चाहिए। मैंने सत्य को अपने पास बुलाया और उसे समझाते हुए बोला, 
    "देखो यार पीहू को यही गाना चाहिए तो इसलिए थोड़ा-सा स्क्रिप्ट में चेंज करना है अब यह समझ लो कि तुम दोनों बाहर घूमने निकले हो और अचानक पानी बरसने लगता है और इस गाने में तुम लोग डांस करते हो, तभी तुम्हें यह मड़ैया दिखती है। पीहू को भीगने से बचाने के लिए उसका हाथ पकड़ कर उसे मड़ैया की तरफ भी ले जाते हो। लेकिन पीहू तुम्हारा हाथ छुड़ाकर फिर बाहर आ के डांस करने लगती है। फिर जहां पर जेंट्स को गाना हो वहां तुम मड़ैया के द्वार से ही थोड़ा डांस करते हुए चेहरे का एक्सप्रेशन दो। जरूरत पड़ने पर पीहू तुम्हारे पास आएगी कुछ स्टेप करेगी और फिर बाहर निकल जाएगी। अब यही हो सकता है...", फिर मैंने ज्ञान को अपने पास बुलाते हुए कहा, "ये कोरियोग्राफर तू भी तो कुछ हेल्प कर अपने बेस्टफ्रेंड की ...?"
     टेप रिकॉर्डर में गाना बजाया गया और तय किया गया कि कितने में सत्य को पीहू के साथ डांस करना है और कहां पर मड़ैया के द्वार पर थोड़ा-थोड़ा डांस के स्टेप करने के साथ चेहरे के एक्सप्रेस देना है। किस स्टेट को वे दोनों मड़ैया के द्वार के सामने ही फॉलो करेंगे। इत्यादि।
 स्क्रिप्ट के मुताबिक मुझे मड़ैया के अंदर रहना है और लास्ट में अपीयर होना है, अर्थात बल्ब की रोशनी की ज़द में सत्य के पीछे से आना है।
    एक्शन के साथ ही टेप रिकॉर्डर में पीहू का पसंदीदा गाना बजा।
"रिमझिम रिमझिम
रुमझुम रुमझुम
भींगी भींगी रुत में 
तुम हम, हम तुम ...
        सत्य और पीहू ने शुरू के स्टेप फॉलो करते हुए मड़ैया के द्वार तक पहुंचे। फिर सत्य पीहू को ले मड़ैया की द्वारा की तरफ भागा। लेकिन पीहू उसका हाथ छुड़ाकर  बाहर ही डांस करने लगी और जब सत्य की बारी आती तो वह द्वार के पास से ही डांस करता चेहरे के एक्सप्रेशन दे रहा था।
     जैसे ही गाना खत्म हआ, पीहू भाग कर मड़ैया के द्वार पर खड़े सत्य के पास उसका हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई। फिर उसकी आंखों में देखती हुई मासूमियत से बोली, " देखते नहीं, मैं भीग गई ... "
     सत्य ने भी उसकी आंखों में देखते हुए और मड़ैया के बांस में लटकी तौलिया निकाल उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "तो बरसती हुई बारिश में डांस काने का शौक तो तुमने ही पाल रहा है न, तो और कौन भीगेगा ? अच्छा चलो भींग गई हो तो लो पोंछ लो ..."
      पीहू ने उससे कुछ और सटते, कुछ तुनकते हुए कहा, "अब जब टावेल दे ही रहे हो तो तुम्हीं पोंछ दो न, देखते नहीं मेरे बाल गीले हो गए हैं ? "
    सत्य ने मुस्कुराते हुए उलाहना दिया, "गीले हो गए तो मैं क्या करूं? बरसात में भीगने के लिए मैंने कहा था क्या ?"
    तब पीहू भोलेपन से बोली, "मुझे अच्छा लगता है न... प्लीज..."
     सत्य जब उसी तरह मुस्कुराता खड़ा रहा तब उसने कुछ प्यार से डांटते हुए कहा, "अब तुम पोंछ भी दो, ज्यादा भाव मत खाओ ... "
      सत्य ने उसके सर में तोलिया डालकर धीरे-धीरे बाल सुखाने शुरू किए। धीरे धीरे उसके हाथ पीहू के सुंदर से चेहरे के पास पहुंचे। 100 वॉट के बिजली के बल्ब की रौशनी उसके चेहरे में पड़ रही थी। 
    सत्य की हथेलियों के बीच उसका चेहरा उसी तरह जगमगा रहा था जैसे सूरज की किरणें पा चंद्रमा खिल उठता है।  उसके खुले हुए केश, सुंदर गोरा-सा मुखड़ा जो सत्य की नजरों के सामने था उसे सत्य अपलक देख रहा था। 
    "क्या ... ऐसे क्यूं देख रहे हो...", पीहू ने सत्य की आंखों में देखते हुए धीरे से पूछा।
     सत्य ने उसे छेड़ा, "देख भी रहा हूं और सोच भी रहा हूं..."
     "क्या...?"
     "यही कि तुम कितने साल की होगी ..?"
     पीहू ने जवाब दिया, "सेवनटीन की, और तुम ?"
     सत्य ने हंसते हुए कहा, "सिक्सटीन का ... "
     वह भी हंसी थी,  " झूठे कहीं के, 12th पास हो और अभी भी सिक्सटीन के ?"
   सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा चलो मान लो एटीन का, तुमसे एक साल बड़ा, बस न ?"
     "हूं...",. कुछ लजाते हुए पीहू ने अपनी नज़रें नीचे कर ली।
     सत्य ने पीहू के चेहरे को थोड़ा अपने पास खींचा। उस पर झुका, उसके होंठ पीहू के होठ के बिल्कुल नजदीक थे, पीहू की आँखें बंद, होंठ अध-खुले। फिर अगले ही पल सत्य ने पीहू के माथे को धीरे से चूमते हुए कुछ मजाकिया लहजे में पीहू से बोला, "चलो पीहू छोड़ दिया, नाबालिग हो न..."
    सत्य का इतना कहना था कि पीहू लजाते कुछ सकुचाते सत्य की बाहों में समाते हुई बोली, "बदमाश कहीं के ...", सत्य पीहू को सीने से लगाए रोमांटिक अंदाज में उसी तरह खड़ा था।
    फिर मड़ैया के अंधेरे कोने में खड़ा मैं उजाले में उनके नजदीक आया और साथ ही बैकग्राउ की आवाज दी,
     "मोहब्बत की दुनिया में समझदारियों का कोई मोल नहीं होता। वैवाहिक रिश्ते के लिए उम्र और मैच्योरिटी का होना जरूरी हो सकता है किंतु प्यार करने के लिए नहीं। किसी को सच्चे मन से स्वीकार करना, अपनी उज्जवल और पवित्र भावनाओं में उसे स्थान देना ही पर्याप्त है। इन गुजरते हुए लम्हों में कोई दुनियादारी नहीं। यहां तो हैं दो पवित्र मन जिन्होंने अपनी अंतरात्मा से एक दूसरे को अपना मान लिया है..."
    मेरी आवाज के साथ सीन कट हुआ। सभी ने जोरदार ताली बजाई। ज्ञान भागता हुआ मेरे पास आया, मेरे हाथ को चूमते हुए बोला, भाई क्या सीन लिखा, मान गया कि तू राइटर है। मेरी आंखें छलक आने को थीं, मैने बड़ी मुश्किल से उन्हें रोक रखा था। सभी मेरी लिखावट को और पीहू सत्य की अदाकारी की प्रशंसा कर रहे थे। इन सबसे दूर पीहू की नजर बार-बार मेरे दर्द की तीव्रता का अनुमान लगाने की कोशिश कर रही थी। अपने हृदय में बसी एक मूरत से मैने पूछा, "कहो जी ! कैसी लगी रिक्रिएशन और एक्टिंग ...?"
   "ठीक थी ... लेकिन हमने इससे अच्छी की थी ..", मूरत ने मुस्कुराते हुए और अपनी आंखों में मेरे लिए दुनिया जहान की मुहब्बत लिए हुए कहा।
    "अरे पागल हो क्या ? वो एक्टिंग थोड़े न थी... चलो दूसरा सीन देखना ... उस सीन में मै एक्टिंग कर रहा हूँ ...", मैने भी मुस्कुराते हुए कहा।
    "अच्छा ...! तुम कर रहे हो !! तो देखो तब तो एक्टिंग ही करना ..."
     "हूँ ... जलन !! ...
     "हूँ... तो क्या ?  मेरा हक है .... तो जाओ करो एक्टिंग ... मै भी देखूंगी कि कितने बड़े एक्टर हो ...?", उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा।
     इस सीन की पृष्ठभूमि समझाते हुए मैने बताया, "अब मानलो हीरो का नाम सत्य और हीरोइन का नाम पीहू है। सत्य और पीहू से बीच किसी बात पर शर्त लगी थी और सत्य वह शर्त जीत गया था। बदले में सत्य ने पीहू से उसकी मोहब्बत के साथ शादी का प्रस्ताव भी रखा। पीहू ने स्वीकार किया कि वह हृदय और आत्मा से उसका वरण करती है, किंतु यदि किसी वजह से सशरीर उसके पास नहीं रह पाती तो सत्य उसे दोषी नहीं समझेगा और उन दोनों के प्यार में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 
     फिर दोनों एक दिन दोपहर को ऐसे घर में मिलते हैं, जहां पर पीहू के रिश्ते में एक बूढ़ी नानी रहती हैं। दोनों हंसी-खुशी समय बिता रहे होते हैं कि तभी इसकी बड़ी बहन चार बातें सुनते हुए वहां से उसे ले जाती है। उसी दिन शाम को फिर से उनकी मुलाकात उसी घर के आंगन में हुई। पीहू अपनी नानी के बाल संवारने के बाद सत्य के पास ही उसकी चारपाई पर आ कर बैठती है। इस सीन में उसके आगे की बात है। फिर मैने पीहू को उस सीन के इमोशन के बारे में कुछ और बाते सलझाई। महसूस करो, ये कहानी तुम्हारे जीवन से गुजर रही है, तभी एक्ट अच्छा होगा।
     लाइट के अनुसार लोकेशन का सेटअप किया गया। जब सीन का सेटअप हो गया तो ज्ञान ने एक्शन कहा।
      एक्शन के साथ पीहू कुछ मुस्कुराते हुए शीशा कंघी ले मेरे बगल में बैठ गई।
      मैंने सर झुकाए हुए धीरे से पूछा, "तो हो गई नानी की कंधी ?"
     उसने हां में धीरे से सिर हिलाते हुए कहा, "हुं..."
     "क्या हुआ ... दोपहर दीदी गुस्से में लग रही थी …. बहुत डांट पड़ी क्या ?", मैंने कुछ मुस्कुराते हुए और उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
    उसने उसी तरह धीरे से शांत स्वर में कहा, '"हां डांट तो पड़ी। मुझे खोजते हुए वह सबसे पहले तुम्हारे घर तक ही पहुंची थी। जब नहीं मिली तो फिर यहां आई थीं ..."
      "ओह ! बड़ी दूर-दृष्टि रखती हैं... तो फिर तुम्हें यहां दोबारा नहीं आना चाहिए था...", मैंने उससे कहा।
    "मैं जानती हूं कि तुम ऐसा क्यों कह रहे हो। यही डर है न कि वह फिर आ जाएंगी ? तो आने दो, वैसे भी मैं कौन-सा तुमसे छुपकर मिल रही हूँ, और फिर मैं क्यों डरूं, क्या इसलिए कि मैं तुमसे प्यार….?"
    "नहीं मेरा मतलब यह नहीं पीहू, मैं तो इतना चाहता हूं कि मुझे लेकर तुम बदनाम न हो.... तुम्हें कोई कटघरे में न खड़ा करें .... कोई तुम्हें उलाहना न दे ", मैंने उसे समझाना चाहा।
    "जानते हो सत्य, पहले मैं भी यही सब सोचती थी। लेकिन आज उनके व्यवहार ने मेरा नजरिया बदल दिया। आखिर हमने किया क्या था ? एक साथ कुछ पल ही तो गुजारे थे। वह भी अकेले नहीं, मेरी नानी मेरे साथ थी। और घर ले जाकर मुझे सबके सामने इस तरह से पेश किया जैसे मैं तुम्हारे साथ बिस्तर में...
      आगे के शब्द पीहू की जुबान पर घुट के रह गए। आंखें छलक आने को थी। फिर उसके होठों में एक फीकी सी मुस्कान आ गई, " छोड़ो यार जाने दो, जो बीत गया उस पर मिट्टी डालो… हम भी ना जाने किन बातों को लेकर बैठ गए..."
    फिर पीहू ने अपने हाथ में पकड़ा शीशा मेरे चेहरे के सामने किया और अपना चेहरा थोड़ा-सा मेरे चेहरे के नजदीक ला मुस्कुराते हुए बोली, "ये देखो न... हमारी जोड़ी कितनी अच्छी लगती है... है न ?"
       मैंने उसे लगभग डांटते हुए कहा, "हटाओ यार क्या करती रहती हो ... ", मैंने उसके हाथ में पकड़ा हुआ आईना छीन कर दूसरी तरफ रख दिया और कुछ खीझते हुए धीरे किंतु मजबूत इरादे लेकर बोला था, " कौन सी जोड़ी ... कैसी जोड़ी ?"
       फिर मेरी आँखें खुद-ब-खुद भींगने लगी। आवाज में कंपन आ गया, "..... क्यों सपनों में जीती हो पीहू,  इससे बाहर आओ.... यह तुम्हारी काल्पनिक दुनिया है। वास्तविक दुनिया में आकर देखो ... हम दोनों का कोई सह-अस्तित्व नहीं, और यह बात तुम मुझसे बेहतर जानती हो...",  यह कहते हुए मेरी आंखों से आंसू बह निकले। फिर मैने अपने गालों में लुढ़क आए आंसुओं को धीरे से पोछ आगे कुछ उलाहना भरे स्वर में कहा, "क्या नाटक करती रहती हो .... बंद करो यार यह सब... मुझसे इतना ही प्यार होता तो पहले ही एक वचन न ले लिया होता..", मेरे स्वर और मुस्कुराहट में उपहास था। 
    उसकी चंचलता एक पल के लिए चेहरे से गायब हो गई। मेरी तरफ गहरी दृष्टि से से देखते हुए बोली, "सत्य!  यदि तुम्हें मंजूर नहीं, तो मैं अपना वचन वापस ले सकती हूँ ... तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ। जब तुम्हे अपने हृदय में बसाया... अपनी आत्मा तक दे दी ... मन से तुम्हें अपना सर्वस्व मान लिया तो फिर इस शरीर में क्या रखा है ? तुम इसे जब चाहो पा सकते हो, तुम्हें रोकूंगी नहीं। लेकिन जरा इस बात का ध्यान रखना कि यदि कहीं कोई है, जिसे केवल मेरा यह शरीर मिलेगा, और वह भी इसे मुकम्मल नहीं पा सकेगा, तो सोचो उस पल क्या होगा ? क्या मैं उससे कभी नजरे मिला पाऊंगी ?"
   मै उसकी तरफ देखते हुए बोला, "नहीं चाहूंगा कि तुम कहीं भी, किन्हीं भी हालातों में किसी से नजरे चुराओ, तुम्हारी नजरें झुके पीहू। मैं तो यही चाहूंगा कि तुम हमेशा नजरें उठाकर बातें करो, मेरी मोहब्बत किसी के सामने शर्मिंदा न हो। लेकिन तुम भी मुझे गलत मत समझो। .... मुझे तुम्हारा शरीर नहीं चाहिए.... मुझे तो तुम चाहिए.... हां तुम चाहिए.... इस जीवन में तुम्हारा साथ चाहिए... इसके लिए जरूरी है कि तुम मुझे स-शरीर मिलो एक रिश्ते में मिलों। .... बात सिर्फ इतनी सी है, मैं तुम्हारे साथ यह जीवन जीना चाहता हूं...  तुम्हारे बगैर गुजरना नहीं...", मै फिर रो पड़ा।
     पीहू भी मेरे कंधे में सर रख रो पड़ी। आंसुओं का प्रबल वेग, अपनी सारी सीमाओं को तोड़ लेने के लिए व्याकुल था। मैंने रोते हुए उसे अपनी बाहों में समेट लिया। फिर उसे दिलासा देते हुए कह रहा था, "पीहू ! चुप हो जाओ ..… शायद यही हमारी नियति है… अब इस भ्रम में मुझे ही जीने दो तो अच्छा है.… कम से कम तुम तो बाहर आ जाओ। ... ये आंसू तो मेरे हिस्से के हैं... कम से कम तुम तो इन्हें न बहाओ...", मैं हर एक वाक्य को पूरा करते-करते अंत में खुद ही रो पड़ता था, मेरी आवाज कांप-सी जाती।
    जो भावनाओं के अधीन हो तो शायद वो एक अच्छा इंसान तो हो सकता है, किंतु एक अच्छा अभिनेता नहीं। एक अच्छा अभिनेता तो वह है जो अपनी निजी भवनाओं को नियंत्रित कर सिर्फ उतना ही अभिनय करता है जितना कि उसके किरदार के लिए जरूरी है। इस एक्ट के अंत में मुझे खुद को मजबूत दिखाते हुए पीहू को दिलासा देना था। लेकिन मैं तो खुद अपनी निजी भावनाओं के अधीन हो रो रहा था। उस दिन मैंने जाना कि मैं एक अच्छा अभिनेता नहीं हूँ।
   इसलिए मेरे सभी दिलासे उसकी मासूम-सी हिचकियों के रास्ते बन रहे थे। उसका सर अभी भी मेरे कंधे पर लुढ़का हुआ था। सीन ये था कि मुझे कस के पकड़ के वह भी रो ही रही थी। जब भी खुद को रोकने का प्रयास करती हिचक पड़ती, और फिर और जोर से मुझसे लिपट जाती। उसके शरीर के साथ मेरी आत्मा और शरीर दोनों ही कांप जाते।
तभी बैकग्राउंड में सत्य की आवाज़ आई। वह हम लोगों के पीछे टहलता हुआ कह रहा था ....

आसान नहीं था ये सब होगा, 
किंतु नियति भाग्य यह होना था।
दे दिलासा इस कोमल मन को,
मर्यादाओं पर मिट जाना था।

    दुनिया के सामने पीहू बहुत ही मजबूत बनी रही। कभी किसी से कुछ नहीं कहा। लेकिन आज सत्य के शब्दों ने उसे आहत किया। कोई गैर सितम करें तो इंसान मन को समझा लेता है, गैर था, उसने किया तो किया !!!
      लेकिन जब कोई अपना ही सितमगर हो जाए  जो बहुत प्रिय हो, जिसे आपने अपनी अंतरात्मा में बसा रखा हो, तब ? 
     वह हमारे पीछे आ कर खड़ा हो गया और झुक कर हम दोनों के कंधे में हाथ रख कुछ गमगीन आवाज में आगे बोला...
      "हृदय रोता है, सिसकियां लेता है। आंसुओं का सैलाब उमड़ता है। और देखो तो, तब सहारा भी उसी सितमगर की बाहों का ही मिले। उसी के कंधे पर सर रखकर रोना पड़े !! उफ !!! ये ईश्वर ये कैसी नियति है इन दोनों की - 
स्वप्न सुंदरी बन क्यों, अब छलती है यह माया। 
जैसे प्रेम, प्रेम न हो,  हो जैसे चंदा की छाया। 
पाकर अतुलित जीवन निधि,
आह! फिर मैंने तुमको क्यों खोया..."
    फिर सीन को सत्य ने कट किया। उसके द्वारा भावपूर्ण बोली गई अंतिम पंक्ति मेरी आत्मा में गूंज गई, "आह ! फिर मैंने तुमको क्यों खोया ...", खुद को रोने से रोकने की कोशिश में मेरी हिचकी निकल गई। मुझे कहीं से प्रतीत नहीं हो रहा था कि यह केवल एक एक्ट है। महसूस किया कि कालचक्र का पहिया घूम कर फिर से उसी बिंदु पर आ गया है जहां पर यह घटना पहली बार घटी थी। अपनी सभी संवेदनाओं और भावनाओं के साथ..."
     किंतु यह क्या पीहू अभी भी मेरे कंधे में सर रखे क्यों हिचकी ले रही है, मैं उसे रोक क्यों नहीं पा रहा हूँ? सत्य धीरे से पीहू के बगल में आकर बैठ गया फिर उसने पीहू को अपनी बाहों में समेटे लिया, "पीहू चुप, देखो सीन कट हो चुका है ... पागल हो क्या ? हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा ... बस चुप हो जाओ प्लीज..."
    इस सीन के कट होने के बाद भी किसी ने ताली नहीं बजाई। शायद इसलिए कि एक बेहतरीन अदाकारा अपने कैरेक्टर से बाहर अभी तक नहीं आ पाई। वह तो अभी भी सत्य के सीने में सिमटी  लगातार रोए जा रही थी। मै चारपाई से उठा मंगल के पास पहुंचा और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीरे से बोला, "मंगल एक बना... ऊं हु... मना मत करना मंगल..."
     मै मड़ैया के अंदर पत्थर में आ कर बैठ गया। मेरी अंतरात्मा में बैठी मूरत मुझ पर उपहास से हंस पड़ी, " कर ली एक्टिंग ...? करा ली न हंसी .…? बहुत बड़े एक्टर बनते थे ..?"
     पीछे से मंगल आया उसने वही किया जो मैने कहा था, और मैने भी वही किया जो मैं कर सकता था।  सत्य और ज्ञान पीहू को चुप करने की कोशिश कर रहे थे। कुछ देर बाद ज्ञान मेरे पास आया, "यार ये तूने क्या किया ? तीन दिनों में इसे कुछ जाना-समझा नहीं था क्या ? इतनी इमोशनल है तो अपनी कहानी का ये सीन उससे क्यों करवाया ?
    मैं उठा, ज्ञान के कंधे में अपना हाथ रखते हुए कहा, "इसलिए कि इनकी कहानी का अंजाम भी मेरी कहानी की तरह न हो ... उस दर्द को अभी महसूस कर ले तो अच्छा है। दोनों आज ही समझ जाए तो बेहतर है... और रही बात पीहू के चुप होने की तो आ मै करता हूँ चुप... "
    मै उन दोनों के पास पहुंचा, "गर्लफ्रेड ! महसूस हुआ न कि बिछड़ना, छोड़ देना, भूल जाना जितना आसानी से हम कह देते है, समझ लेते हैं, वास्तव में उतना आसान होता नहीं है ? ... कुछ फैसले हमे ही लेने पड़ते हैं... उन्हें किस्मत के हवाले नहीं छोड़ सकते... खुद गलती कर के सीखे इससे बेहतर है कि हम दूसरों के द्वारा की गई गलती से सीख ले..."
    "अब उठो भी.… ", मैने सत्य को पलक झपका के इशारा किया, "एक-एक हो जाए यार, तुम्हारी नेचुरल एक्टिंग के लिए... है न सत्य ..देखो हम दोनों ऐक्टर्स के बीच एकमात्र तुम ही तो क्लासिकल अभिनेत्री हो। यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हमारी तो दुकान ही बंद हो जाएगी न ? यार समझा करो ...प्लीज "
     उसने अपने आंसुओं को पोंछाते हुए मेरी तरफ थोड़ा सा मुस्कुरा कर देखा, मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "मंगल ! पांच बनाओ..."
     जब कमली पर मेरी निगाह गई तो अभिनेता राजेश खन्ना के अंदाज में बोला, " .... पांच नहीं ... छः बना रे..."
     दूसरी खाट फिर से बिछाई गई। सेंट्रल टेबल फिर से रखी गई। और उसमें सजे छः कुल्हड़। 
      "सर जी !  ज्ञान भैया ने तो कुछ किया ही नहीं...", मंगल ने हम लोगों को याद दिलाते हुए कहा।
     "मंगल ! ओ मंगल !! तुझे याद है रे पगले !! ... फसा दिया न ?", मंगल के गले में हाथ डालते हुए ज्ञान बोला।, "ठुमका लगाऊं क्या... ? "
    "लगा लीजिए भैया जी ! आप से अच्छा भला कौन लगाएगा ...", मंगल भी मजाक के मूड में आते हुए बोला। 
      चीयर के साथ सभी ने अपने-अपने कुल्हड़ उठा लिए। ज्ञान में टेबल पर रखी एक कैसेट उठाई और उसे प्ले कर दिया, "बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा.... सलामत रहे यह दोस्ताना हमारा ..."
     और इस गाने को वह हम सभी के चारों तरफ हाथ में जाम लिए धूम-घूम कर एक्ट कर रहा था। बीच में उसने सत्य को भी कुर्सी से उठा लिया। गाना समाप्ति पर दोनों गले लगे। हम लोगों ने जोरदार तालियां बजाई। बातचीत का दौर चल रहा था कि तभी पीहू ने ज्ञान से कहा, "ज्ञान भैया ! ... थोड़ा इधर आइए... "
     ज्ञान उसके पास पहुंचा तो दोनों पंप हाउस और मड़ैया के बीच के खाली रास्ते पर बात करते हुए टहलने लगे। कमली घर गई। मंगल पंप हाउस की तरफ खेतों में पानी की व्यवस्था देखने चला गया।
      और इधर मैं और सत्य पीहू को लेकर चर्चा कर रहे थे। सत्य पीहू की एक-एक विशेषताएं बता रहा था। उसकी योग्यता, उसका नजरिया, पढ़ाई के प्रति रुचि इत्यादि। और अंत में उसने बताया कि पीहू ने प्राइवेट ग्रेजुएशन करने के लिए उसके बार-बार कहने पर फॉर्म भी भरेगी। लगभग पन्द्रह मिनट बाद ज्ञान हम लोगों के पास पहुंचा और पीहू उसी तरह टहलती रही..."
     "क्या बात है ज्ञान कौन सा सीरियस डिस्कशन चल रहा था ?....", सत्य ने ज्ञान की तरफ देखते हुए पूछा। 
     "कुछ नहीं यार बस सामान्य चर्चाएं चल रही थी। हाल-चाल, मेरी एजुकेशन, मेरे और इसके बारे में, कब दोस्ती हुई, कैसे हुई, यही सब। .... मुझसे पहली बार मिली है न, तो जिज्ञासा समझ लो...", ज्ञान ने उसे समझाते हुए कहा। 
    "मेरे बारे में कुछ कहा...?", सत्य ने रुकी-रुकी सांसों से पूछा। 
     "उसने तो नहीं पूछा लेकिन मैंने उससे जरूर पूछा था..."
    "क्या .... क्या पूछा था ..?"
     ज्ञान उसके पास से हट कर हंसते हुए बोला, "यही कि सत्य आपके यहां... पेइंग गेस्ट है क्या ?... " 
      "साले तेरी तो...", सत्य ने उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए बोला।
       "साले क्या ? हूँ... क्या साले ? अबे तुम दोनों के बीच सीन क्या है ? बताएगा ? ... न उसने कुछ कहा,  न तू बता रहा !! भई माजरा क्या है ? न घोड़ी छोड़ रहा, न बारात सजा रहा ? ....", एक तो ज्ञान का शुरूर, दूसरा दोस्त के लिए फ़िक्र। दोनों की मिली- जुली प्रतिक्रिया थी उसके चेहरे में।
     मैने ज्ञान को शांत रहने का इशारा किया। जिस पर वह और बौखला गया। मुझसे बोला, "बचपन से साथ हैं यार !! एक ही स्कूल में पढ़े हैं दोनों। रास्ते चलते बेस्टफ्रेंड नहीं बना है। साले की फ़िक्र होती है... लेकिन ये क्या जाने... तू तो लिख कर दिल की बात निकाल देता है... ये क्या करेगा... बेस्टफ्रेंड कहता है। अबे मत कह... चलेगा, लेकिन दोस्त की तरह बात तो शेयर कर लिया कर ? सात महीने से कुल तीन बार अपने घर गया ! जनाब, घर कोई लंदन में नहीं है, अभी चले न तो डेढ़ घंटे से अधिक नहीं लगेंगे... ठीक है यहां पीहू और बाबा को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन तेरे घर में पड़ेगा... भाई कोई दिक्कत हो तो बता मै बात करू...?"
     लेकिन सत्य की तरफ से कोई जवाब न मिला तो वह पीहू की तरफ चला, "ठीक है... न बता... मैं उसी से पूछता हूँ... देखता हूँ कैसे नहीं बताती...?"
    सत्य जल्दी से उठा और ज्ञान को जबरन कुर्सी में बैठाता हुआ बोला, "बताता हूँ न यार ... लेकिन सुबह... देख अभी टाइम हो गया है। अभी आराम से सो... सुबह मिलते हैं... शैल मै चलू ?"
     मैने हां में सर हिला दिया। वह मंगल के पास गया, उससे कुछ बोला फिर पीहू से थोड़ी देर खड़ा बाते करता रहा। कुछ देर बाद पीहू ने हम दोनों को हाथ हिला कर बाय का इशारा किया और दोनों बगिया के गेट की तरफ चल दिए। मंगल मेरे पास आया। ज्ञान के लिए मड़ैया के अंदर बिस्तर बिछाया। ज्ञान गुड नाइट कह के सोने चला गया।
       "कितना टाइम हुआ होगा मंगल ? अपने चंदा क्लॉक से पूछो तो ?", मैने कहा।
      "साढ़े दस के आस-पास होगा सर जी ...", फिर उसने इशारा किया। मैने हां कर दिया। वह दो कुल्हड़ भर लाया। खाट के नजदीक पत्थर में बैठता हुआ बोला, "कल कितने बजे जाएंगे सर जी ..?"
      "पता नहीं, कल की कल देखेंगे ? लेकिन हां, शायद दोपहर के पहले ही निकल जाएंगे...", मैने शिप लेते हुए कहा।
     "सर जी कभी इस तरफ आना हो तो यहां जरूर आइएगा... आप के साथ तीन दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। आपकी बहुत याद आएगी... पीहू बिटिया और भइया जी भी आपको बहुत याद करेंगे...", मंगल थोड़ा-सा भावुक होते हुए बोला।
    "मै भी मंगल..! यार देख बैग में सिगरेट होगी, जला न ? एक-एक पीते हैं...", मैने बात बदल दी।
   मंगल खेत में पानी की दिशा मोड़ता जा रहा था ताकि सभी पौधों को पानी बराबर मिल सके। मै उसे और सूनी रात में सफर कर रहे मून क्लॉक को बहुत देर तक देखता रहा।
   सुबह आठ बजे मंगल ने उठाया, "सर जी ! उठिए... ज्ञान भैया तो नहा-धो कर भइया जी के साथ गए, मुझसे कह गए हैं कि आपको उठा दूं ? आप भी तैयार हो जाइए... मैने एक खाट और आपका बैग आम के पेड़ के नीचे रख दिया है... चलिए..."
    मै उठा और मंगल के साथ पंप हाउस के पास आ गया। मंगल पानी, तोलिया, कपड़े इत्यादि की व्यवस्था कर चला गया। स्नान करने के बाद मैंने कपड़े पहने और बैग को सिरहाने रखकर आराम से लेट गया और मंगल का इंतजार करने लगा कुछ देर बाद मंगल हाजिर हुआ, , "रेडी सर जी ?"
    "हां तैयार हूं और बताओ क्या करना है, क्या कह गए हैं तुम्हारे ज्ञान भैया ?"
    "मुझे तो कुछ और कह कर नहीं गए हैं, आते होंगे..."
     "चलो तो ठीक है तब तक मैं यही इंतजार करता हूं.... ", मैं उसी तरह लेटे हुए बोला।
    "सर जी, कुछ खाने के लिए ले आऊं ? मतलब कंद, मूल, फल और शाम का पुलाव भी बचा है। कहिए तो उसे भी गरम करवा कर के ले आता हूँ ...", मंगल ने पूछा।
   "मंगल पहले अमरूद तो तोड़ो। आज खाने का मन है, और हां तुम्हारे खेत की ताजा गाजर तो और भी मीठी है... फिर पुलाव का देखेंगे... ये ! खराब तो नहीं हुआ होगा ?"
     "अरे नहीं सर जी अभी 10 बजे हैं, रात को ठंड पड़ने लगी है न, मैने तो अभी थोड़ा-सा खा के भी देखा है। रुकिए अभी मै अमरूद और गाजर लता हूँ...", 
     कुछ देर में मंगल सारा इंतजाम करके वापस आ गया, "बनाऊं सर जी ?"
    "हूँ .... अपने लिए बना लो... मै नहीं...", मैंने अमरूद खाते हुए कहा। 
     "क्यों सर जी ? ..."
     "इच्छा नहीं है... तुम  लो..."
     मंगल ने बैग से निकाली अपने लिए बनाई, और वही खाट के पास बैठ कर पीने लगा। मैंने अपनी बैग से वही अखबार निकाला जिसमें मेरी कहानी छपी थी। उसमें और भी लघु कथाएं, कविता एवं अन्य सामयिक खबरें थीं। मैं उन्हें पढ़ने लगा।
      "अरे पीहू बिटिया...",  मंगल ने आश्चर्य से कहा, "सर जी पीहू बिटिया आ रही हैं... मै अभी आता हूं..."
     मैने देखा पीहू गेट से कुछ ही दूरी पर थी। मंगल भागता हुआ गेट तक पहुंचा। मैं उसी तरह लेटा अखबार पढ़ता रहा। कुछ देर बाद मंगल और पीहू एक साथ पहुंचे। मंगल ने मुझे पुकारा, "सर जी !"
     मैने ध्यान दिया तो देखा मंगल के हाथ में झोला था। मैं चारपाई पर उठकर बैठ गया। वह मेरे पास आती हुई बोली, "जी नमस्ते !"
    "जी नमस्ते ! आप पीहू ?", मैने मजाक में पूछा।
    "जी पीहू... और आप...?", उसने भी मजाक किया। 
     "जी मैं सत्य के दोस्त का दोस्त हूँ.... मुझे यहां छोड़ कुछ देर में आने के लिए कह कर गया है... अभी तक आया नहीं। क्या आपको मालूम है कहां गया होगा...?"
     "ओह ! तो आप सत्य के भी दोस्त हुए न ? उसने मुझे बताया था... वो तो अपने एक और दोस्त के साथ माइन्स गए है... आपका खयाल रखने के लिए मुझे कह गए हैं...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
     "तो रखिए खयाल...", मैने भी मुस्कुराते हुए कहा।
    "मंगल चाचा ! जाओ सर जी के लिए पानी और सलाद ले आओ, इन्हें ब्रेकफास्ट करना है..."
     मंगल चला गया। मैने कहा, "बैठो पीहू ! बहुत हो गया मजाक...", मैने उसे अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कहा।
    वह मेरे पास बैठते हुए बोली, "कुछ याद आया...?"
    "क्या... हमारी पहली मुलाकात ?"
    "हां... ", वह अतीत में खोती हुई बोली।
    "हां याद है... मैं उसे कैसे भूल सकता हूँ...", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
    "क्यूं... क्यूं नहीं भूल सकते...?", उसने उत्सुकता से पूछा।
     "बताऊंगा... पहले तुम बताओ पहली मुलाकात में तुमने मेरे प्रति क्या सोच बनाई थी..."
     "मतलब मैने क्या धारणा बनाई थी...? तो सुनो, देख कर ही अजीब लगा था। बिखरे-उलझे बाल, बढ़ी दाढ़ी, एक हाथ में सुलगती सिंगरेट, दूसरे हाथ में बुक, सिरहाने शराब की बॉटल, अधूरा जाम। सत्य के ऊपर गुस्सा भी आ रहा था कि न जाने किसे ले आया है ! दिल कह रहा था कि मैं तुमसे कह दूं, ये मिस्टर ! फौरन अपना सामान समेटों यहां से और निकलो .... लेकिन फिर सोचा की चलो सत्य के दोस्त हो तो कुछ बर्दाश्त कर लेती हूँ ..."
       "अभिमानी.... एरोगेंट....  है न...?", मैं हंसता जा रहा था और मेरे साथ वह भी हंस रही थी।
      "अब तुम बताओ ....?", उसने एक अमरूद को दांतों से कटते हुए मुझसे पूछा।
     मैने मुस्कुराते हुए उसे बताया, "मैं घबरा गया था... हां सच। तुम ही सोचो शराब और सिंगरेट.. और ऊपर से अचानक एक लड़की सामने आकर खड़ी हो गई ! देखते ही लगा कि ये चेहरा जाना पहचाना है। समझ न आया कि क्या करू, कैसे और क्या बात करूं !! लेकिन सच कहूं तो तुम्हारे बारे में कोई गलत धारणा बन ही नहीं पाई। हां पहले यहां का परिवेश देखकर एक देहाती, सीधी-साधी, कम पढ़ी-लिखी लड़की होने का अनुमान लगाया था। लेकिन तुम्हारी पर्सनालिटी मेरी इस धारणा का विरोध कर रही थी और फिर जैसे-जैसे बातें होती गई तो अंदाजा हो गया कि मैं गलत हूँ... जब तुम ने जावा का इतिहास तक बता दिया तो और भीगी बिल्ली की तरह सहम गया। तुम्हारे जवाबों से मैं इतना प्रभावित हुआ था कि मुझे कुछ-कुछ डर भी लगने लगा। तब मैने तुम्हे ध्यान से देखा था ..."
     "ध्यान से देखा ? ... मतलब .…?", उसने उत्सुकता से पूछा। 
    "मेरा मतलब मनोवैज्ञानिक दष्टिकोण से... ", मैने उससे कहा।
    "यार कुछ तो डिटेल में बताओ न ... प्लीज ?"
    "मैने तुमको चुपके-चुपके देखा किंतु बड़े ध्यान से। तुम्हारे बाल खुले हुए लेकिन पीछे क्लिप लगाकर सलीके से संवारे गए थे। तब अनुमान लगाया कि तुम आधुनिक तो हो लेकिन तहजीब वाली भी हो...
     "ओह ! और ..."
     "दुपट्टा सही जगह पर था... मतलब लड़की में संस्कार हैं.... कान के टप्स आधुनिक किंतु छोटे-छोटे थे... सलवार सूट की फिटिंग ज्यादा चुस्त नहीं थी... पांव की चप्पल महंगी जरूर लग रही थी, किंतु कलर ज्यादा भड़कीला नहीं था। ... चेहरे की ब्यूटीनेस नेचुरल लगी, यानी मेकअप का ज्यादा रोल नहीं था। और बातचीत का लहजा और ज्ञान का कुछ प्रदर्शन तो पहले ही हो चुका था ....
     "अच्छा !! इतना तुमने चुपके-चुपके देखते हुए देख लिया !! और मुझे हवा तक न पड़ी !!! वॉव ...... क्या बात है ... फिर ..."
      "फिर... मेरी नजर इस चमकती हुई डायमंड रिंग में गई, अंत में मैंने निष्कर्ष निकला की लड़की खानदानी, रहीश, आधुनिक और प्रतिभा संपन्न है, जिसमें फैशन और आधुनिकता का दिखावा नहीं है। ये गांव की साधारण लड़की के लक्षण नहीं हो सकते.... इसकी पूरी डेप्थ जाने बिना अपना एटीट्यूड दिखाने का मतलब है.... आ बैल मुझे मार। तो फिर मैं बैकफुट पर आ गया... "
       मेरी बात सुन कर वह हंसती जा रही थी, "ओह गॉड! ... तुम ने मेरा ड्रेस-सेंस देखकर मेरे बिहेवियर का अनुमान लगाया !! बड़े दिलचस्प इंसान हो यार..."
     "अच्छा ! और जो भी पी थी न, वो सब की सब डर के मारे उतर गई थी। तुम्हारे जाने के बाद दो पैग और पीना पड़ा..."
      तभी मंगल चटाई, पानी, सलाद, एक थाली में गर्म पुलाव और कुछ साफ- सुथरे खाली बर्तन ले कर हाजिर हो गया। उसने आम के पेड़ के नीचे ही चटाई बिछाई, फिर सभी खाने-पीने का सामान व्यवस्थित रखा।
    "पीहू ! क्या बनाया है...?"
     "दाल-चावल, रोटी-सब्जी और सैंडविच के साथ टमाटर की तीखी चटनी, सत्य और ज्ञान भैया सुबह ही सैंडविच और थोड़ा सा दाल-चावल खा के माइन्स चले गए.... ह्यूमन राइट्स वाले केस में..."
     "और बाबा ? ...", मैने पूछा।
     "उनकी इच्छा आज सिर्फ दाल-रोटी खाने की थी... एक सैंडविच भी खाई फिर बोले जाओ शैल को भी खिला आओ... फिर दोपहर को जब सत्य आ जाएगा तो साथ में खाना खा लेगा...", उसने थाली में सैंडविच निकाल कर रखते हुए कहा।
     "आज तुमने नहीं पी ?", उसने मंगल को एक प्लेट में सैंडविच और चटनी निकाल कर देते हुए पूछा।
   "नहीं...!"
    "क्यूं....?"
    "क्यूं क्या... मन नहीं किया... तो नहीं पी...", मैने लापरवाही से जवाब दिया।
    "आज हैंगओवर नहीं था...?", उसने फिर पूछा।
    "सच बताऊं... सुबह थोड़ा-सा महसूस हुआ... बैग में है भी... एकबारगी मन किया भी... लेकिन फिर सोचा... ऐसा कब तक चलेगा...? रोक लिया अपने आपको, और फिर ...", कहते कहते मैं रुक गया।
     "और फिर ...?"
     "तुम भी तो नहीं चाहती न कि मैं देवदास की तरह पीते-पीते एकदिन मर...."
     "मर्रे तुम्हारे दुश्मन ... खबरदार अब जो सोचा भी तो... लो खाओ...", उसने सैंडविच का एक शिरा चटनी में डुबो कर मुझे देते हुए आगे कहा, "नहीं कहती कि तुम कसम खा लो न पीने की.... कभी पीना हो तो एंजॉय के लिए, रिलेक्स होने के लिए... इसके आदी मत बनना... "
     "जो हुक्म ! ...ये तुमने ब्रेकफास्ट किया...", मैने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
    और उसने मुस्कुराते अपना सर इंकार में हिलाया।
    "यार तुम मुझे सत्य से पिटवाना मत... कहेगा मैं नहीं था तो अपनी गर्लफ्रेंड का ध्यान भी न रख पाए... चलो उठाओ एक ...?", मैंने उस पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा।
    "एक नहीं दो खाऊंगी.... और तुम्हारे साथ रिलेक्स हो कर पिऊंगी भी...", उसने सैंडविच उठाते हुए मंगल से कहा, "मंगल चाचा ! सर जी का बैग तो उठाना..."
    "लेकिन पीहू बाबा और सत्य क्या सोचेंगे...?"
    "बाबा खाना खा चुके... अब वह आराम करेंगे... उनसे सामना होगा नहीं और सत्य तो जानता ही है ",  उसने सैंडविच खाते हुए कहा।
    मंगल ने बैग उठाकर उसके सामने रख दिया। उसने कहा, "चाचा खोलो बैग और निकालो सब कुछ..."
   मंगल ने बैग खोल के रम और व्हिस्की की दोनों बॉटल और गिलास रख दिया। उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "लो बनाओ..."
   मुझे आश्चर्य हो रहा था। कल तक जिसे मेरा दिन को पीना मंजूर न था, आज सुबह सुबह मेरे साथ पीना चाहती है !! मैने रोकना चाहा, "मेरे ख्याल से ये..."
   उसने मेरी बात बीच में काटते हुए कहा, "ठीक नहीं ? यही कहना चाहते हो न ? "
    "सच पूछो तो हां... इतनी सुबह सुबह पीने से लिवर डैमेज होता है... क्या करूं 12th में कैमेस्ट्री भी पढ़ी है न...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "अब समझ में आया न कि जब कोई तुम्हारा अपना तुम्हारी नजरों के सामने ही खुदकुशी करने की कोशिश करें तो कैसा लगता है...?"
   एक बार फिर मैंने उसकी तरफ देखा और सचमुच गहरी दृष्टि से देखा। मुझे बात कुछ दूसरी समझ में आई। उसका चेहरा उसकी आंखें मुझसे कोई दूसरी कहानी ही बयां कर रही थी। अब मैने उसे रोकना उचित नहीं समझा। यह तो तय था कि मैं उसका अहित नहीं होने दूंगा, हो इससे पहले मैं किसी भी हद से गुजर जाऊंगा। लेकिन कोई ऐसी बात, कोई ऐसा ग़म है जो वह मुझसे बांटना चाहती है। 
     मैने उसके लिए एक व्हिस्की और अपने लिए रम का बनाया। भारी हो गए माहौल को हल्का करने के उद्देश्य से बोला, "छोड़ो यार मजाक कर रहा था, अल्कोहल ही तो है, कौन सा जहर है!! थोड़ा डायलूट पियेंगे... और क्या...?"
    फिर मंगल की तरफ सवालिया नजर से देखते हुए पूछा, "तुम्हारे लिए किसमें ...?"
    सवाल पूछना था कि मंगल तेजी से मड़ैया की तरफ भागा। 
    "यार ! तुम्हारे हाथ तो बिल्कुल लड़कियों जैसे हैं ... पतले-दुबले तो तुम हो ही और हाथों की फिंगर भी तो देखो, वो भी ... तुम्हारी तरह पतली-दुबली और लंबी है !!"
   "चलो तुम्हें कुछ तो पसंद आया ... मुझमें ...?", मैंने अपनी सैंडविच खत्म करते हुए उससे कहा। 
    "यह पूछो कि तुममें क्या पसंद नहीं आया ..", उसने भी अपनी सैंडविच खत्म की। फिर पूछा, "एक सांस में न...?"
    मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही उसने अपनी ग्लास खाली कर दी, और उसके पीछे मैने भी। तब तक मंगल भी आ चुका था। मैंने उसे इशारा किया वह समझ गया। उसने अपनी कुल्हड़ भरी। मैने एक सैंडविच उसकी तरफ बढ़ा दी। वह सब ले कर पंप हाउस की तरफ चला गया।
     पुलाव की थाली आगे करते हुए मैने पीहू से कहा, "पुलाव खाते हैं पहले, ठंडा हो रहा है ..."
     "हूं ... ठीक है ...तुम भी लो ", हम साथ ही पुलाव और ताजी सलाद खाने लगे।
     "पीहू ! तुम खाना स्वादिष्ठ बनाती हो...", मैने उसकी तारीफ करते हुए दूसरा बनाया।
    "अब रिलेक्स हो कर न ...?", उसने पूछा।
    "हूँ... एक-एक शिप ... ऐसे ..", मैने डेमो देते हुए कहा।
     वह हंसी थी, "तुम मुझे शराबी बना दोगे ..."
     मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, "शराबी नहीं ... शराबिनी... करेक्ट इट .."
    "हां वही .... शराबिनी ! ...  ऐसे-ऐसे शब्द तुम्हारे दिमाग में आते कहां से हैं...", उसने जोर से हंसते हुए पूछा।
     "आफ्टरऑल, आई एम ए राइटर ...", उसके साथ मैं भी जोर से हंसने लगा।
    "बॉयफ्रेंड .... रुक जाओ न .... देखो आज  नहीं? ... कल नहीं रोकूंगी... कल चले जाना...?"
     "हे बालिके ! मुझे मोह माया के इन सांसारिक बंधनों में न बांध... जाने दे। .... ", मैंने किसी तपस्वी की भांति कहा, "संसार है एक नदिया ... सुख-दुख दो किनारे हैं... न जाने कहां जाएं... हम बहती धारे हैं... "
   "तू कल चला जाएगा तो मैं क्या करूंगी .... तू याद बहुत आएगा तो मैं क्या करूंगी ...", उसने भी गीत से ही जवाब दिया।
    "कल नहीं आज ... करेक्ट इट ..."
    "नहीं कल...", उसने अपना पैग खत्म करते हुए कहा। फिर खुद ही तीसरा बना लिया। मैने रोकने की कोशिश की, "आराम से पीहू... आराम से..."
    वह सूफियाना अंदाज में बोली, "सुना नहीं क्या... आराम... हराम है...?"
    "ये सैंडविच कौन खत्म करेगा ...?"
    "वो तो खत्म होगी ही। पहले सलाद ... देख नहीं रहे कितनी ढ़ेर सारी बची है... मंगल चाचा ! तुम भी ले लो... कहां चले गए ?", फिर वह मेरे कान के पास बोली जैसे कोई रहस्य हो, "मंगल चाचा को अधिक नहीं देना है... कहीं लग न जाए ..."
    "ओह हां !... बिल्कुल नहीं देना है...", मैने सहमति से अपना सर हिलाते हुए कहा।
    मंगल खाली कुल्हड़ लिए प्रकट हुआ। मैने कहा, "मंगल ! सलाद तुम भी खाओ... बहुत बची है..."
    मंगल ने एक नजर रम की बॉटल में डाली और फिर मेरी तरफ देखा। मैने आंखों के इशारे से उसे शांत रहने के लिए कहा। उसकी प्लेट में सलाद डालते हुए बोला, "मंगल तुम कमली को भूल गए ... जाओ उसे दे कर आओ ...", मैने उसके कुल्हड़ को भर दिया। मंगल समझ गया। 
    "जी सर जी ..."
    "अब जाओ ...", मैने सलाद खाते हुए कहा।
    मंगल अपनी प्लेट और कुल्हड़ ले कर किनारे हो गया। वैसे भी वह पीहू का लिहाज करता था। मैने दो घूट ली फिर पीहू से बोला, "पीहू ये दो सैंडविच बची हैं, चलो ईमानदारी से इसे उठाओ ..."
    "एक बेईमान इंसान मुझे ईमानदारी की सीख दे रहा है। अपने बारे में सब कुछ छुपा ले और हमारे बारे में सब कुछ जान ले... नॉट फेयर", उसने थोड़ा-सा गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए कहा। 
    "मैं तुम्हें क्या बताता ? और अब बताने के लिए कुछ बचा भी नहीं।  तुम्हारी हंसी-खुशी की जिंदगी में अपनी दर्द भरी दास्तां क्यूं  सुनता ? और फिर यह सोचो कि कहीं तुम्हारे मन में भी आ गया होता कि तुम्हारी सहानुभूति पाने के लिए मैं यह सब बता रहा हूँ, तो गलत होता न ? इसलिए खामोश रहा। लेकिन ज्ञान ने कल रात को सब कुछ बता ही दिया... है न ?
    "हूँ .... वैसे क्या नाम है उसका ..?"
     "सॉरी नहीं बता सकता... खुद से वादा किया है कि अब इस जुबान पर उसका नाम कभी न आयेगा...", मैने शिप लेते हुए कहा।
    "इतनी नफरत करते हो उससे...", उसने गौर से मेरी तरफ देखा।
     "नहीं, नफरत नहीं करता... सच पूछो तो कर ही नहीं सकता। और क्यों करूं ? उसका क्या दोष ?"
    "तो तुम्हें किस बात की सजा मिली ?", उसने हमदर्दी से पूछा। 
    "केवल मुझे ही नहीं उसे भी मिली। और परसों दोपहर को तुमसे कहा था न, कि सजाएं तो मेरा मुकद्दर है, कोई क्या कर सकता है ...?", मैने उसे याद दिलाते हुए कहा।
    "तो फिर उसका नाम क्यूं नहीं बताते ...", उसने फिर पूछा।
    "बात आदत की है, ये आदत छोड़ना चाहता हूँ... और वैसे भी... एक गीत है न... जिस दिल में बसा था प्यार तेरा, उस दिल को कभी का तोड़ दिया, बदनाम ना होने देंगे तुझे, तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया... ", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
  "ज्यादा मत मुस्कुराओ... ये मुस्कुराहटें झूठी और फीकी नजर आती है मुझे... अब दूसरे का लिखा नहीं कुछ अपना सुनाओ...", उसने सैंडविच खाते हुए कहा।
  मैं भी एक बाइट लेते हुए बोला, "अपना सुनाऊं...? पुराना तो कुछ है नहीं। नया ही बनाना पड़ेगा। तो चलो दिल की बात कहता हूँ...
  कोई पूंछे कि दुल्हन बनाकर किसे ले गया,
  वो शख़्स तो आज भी मेरे दिल में रहता है।
  शब-ए-ज़फ़ाफ़ में वह किसे बेनकाब करेगा,
  उसका जलवा निगाहों में आज भी रहता है।
       "ओह! क्या गहराई है यार !... ये कंप्यूटर-वैम्पुटर छोड़ो... तुम शायर बन जाओ... सच कहती हूँ..."
    "मैं शायर बन जाऊं ? न जाने कितने शायरों को भटकते देख रहा हूँ  ... पैसे-पैसे के लिए मोहताज देखा है। न बाबा, अपनी कंप्यूटर साइंस ही अच्छी है, जो कम से कम रोटी तो देती है। हां .... यदि तुम मुझे अपने यहां नौकरी में रखने का वादा करो तो सोच सकता हूँ..."
   "नौकर !! कैसी बात करते हो बॉयफ्रेंड... बराबर का हक है।  छोड़ो यार... मिस्टर सत्यप्रकाश की मालिका-ए-आलिया के दिल पर इकलौती तुम्हारी बादशाहत होगी...", उसने अपना जाम मेरी तरफ दिखाते हुए कहा। 
   "ये होल्ड ऑन... चढ़ गई क्या... ?"
   "कमबख्त इन प्याले में कहां इतना दम... हमें तो  घायल तुम्हारी शायरी करती हैं... अच्छा यह बताओ तुम इतनी बेफिक्री से घूम रहे हो, शायरी, कविताएं, कहानियां लिखते हो, तो जरूर रईस खानदान के होगे। करोड़ों की दौलत होगी तुम्हारे पास। और बात नौकरी की करते हो ! यहां तक कि मेरे यहां भी नौकर बनने को तैयार हो !! क्या छुपा रहे हो बॉयफ्रेंड ?
   मैंने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नहीं गर्लफ्रेंड ! पैसे रूपए की बात की जाए तो मैं इतना भी अमीर नहीं हूँ... हां पुरखों द्वारा अर्जित संपत्तियों होगी लेकिन कभी उनका वैल्यूएशन नहीं किया... लेकिन मैं खुद को अमीर मानता हूँ, यदि न होता तो पीहू आज मैं तुम्हारे पास ना बैठा होता... इंसान की कीमत, उसकी दौलत, चंद सोने या चांदी के सिक्के नहीं होते बल्कि वे लोग होते हैं, जिनके साथ वह खड़ा होता है। जो उसके साथ होते हैं, जो उसके पास होते हैं... तुम जैसी गर्लफ्रेंड और ज्ञान जैसा दोस्त होना कोई मामूली बात नहीं हैं..."
   "वाह ! क्या बात हैं। लेकिन तुम मुझे इतना सरप्राइज क्यों करते हो...? जिंदगी के प्रति जो तुम्हारे थॉट्स हैं... वो क्या कहते हैं... हां नज़रिया, मुझसे इतने मैच क्यों करते हैं ? कभी-कभी तो मैं इतना हैरान हो जाती हूँ कि महसूस होता है, जैसे खुद से बात कर रही हूँ। खुद से ही सवाल करती हूँ और जवाब भी खुद ही देती हूँ... ऐसा क्यों ?
    "शायद इसलिए कि हमारे माता-पिता, हमारी परवरिश, परिवार के अन्य सदस्य, हमारा फ्रेंड सर्किल, हमारे टीचर्स, यह सभी हम दोनों को लगभग एक जैसे ही मिले होंगे आखिर इन्हीं का प्रभाव तो हमारी शख्सियत में होता है, हमारी सोच में होता है।... अब मान लो कि हमारे बच्चे हुए तो हो सकता है उनमें भी इसी विचारधारा का प्रभाव हो..."
    "हमारे बच्चे ?", उसने मेरी बात काटते हुए आश्चर्य से पूछा। 
   "हां हमारे बच्चे... ओह नो... सो सॉरी यार... मेरा मतलब था तुम्हारे बच्चे और मेरे बच्चे..."
   उसने मेरी बात फिर से बीच में काटते हुए कहा, "बात तो एक ही है न... तुम्हारे बच्चे और मेरे बच्चे... मतलब हमारे बच्चे..."
  "अरे नहीं... मेरा मतलब है तुम्हारे बच्चे अलग और मेरे बच्चे अलग... अब समझ में आया...?"
   "नहीं आया, यह कैसी असंभव सी बात करते हो ? तुम अकेले बच्चे पैदा कर लोगे और मैं भी कर लूंगी क्या ? ये कैसे होगा...? 46 क्रोमोसोम चाहिए होता है न ? 23 स्त्री के और 23 पुरुष के ? तभी तो बच्चा होता है न ?"
    "अरे यार, तुम लूप में मत फसाओ ? अच्छा चलो इस तरह से समझो, तुम्हारे बच्चे जिनका पिता मैं नहीं, और मेरे बच्चे जिनकी मां तुम नहीं... मतलब अलग-अलग... आप क्लियर हुआ ?"
   "नहीं हुआ...", इस बार वह खीझते हुए कुछ जोर से बोली, "इसीलिए मैं कहती हूं कि तुम बहुत कन्फ्यूज्ड पर्सन हो... अच्छा बताओ तुम मेरे बॉयफ्रेंड हो न और मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड ?"
  "हां तो फिर..?", इस बार मैं सावधान था। 
  " तो फिर !! वही तो मैं पूछ रही हूँ... जब मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ, तुम मेरे बॉयफ्रेंड हो, तो हमारे बच्चों के मां-बाप अलग-अलग कैसे हो सकते हैं ?"
    " वही तो मैं कह रहा हूँ, इतनी देर से समझाने की कोशिश भी कर रहा हूँ कि हम दोनों बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड हैं न कि हसबैंड-वाइफ...", इस बार मेरे होठों में एक विजेता की मुस्कान थी।
   "महाभारत पढ़ी है...", एक अप्रत्याशित प्रश्न।
   "नहीं, पढ़ी तो नहीं, लेकिन देखी जरूर है, सीरियल आता था न.... लेकिन अब महाभारत से इस टॉपिक क्या संबंध...?"
  "हैं... कर्ण और खुद वेदम व्यास का जन्म याद करो... ये कौन-सा हस्बैंड-वाइफ की संतान थे। उनके माता-पिता भी तो बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड ही थे। और क्या पांचो पांडवों के पिता महाराज पांडु थे ? अब बताओ, है कोई जवाब ?"
    मैंने हंसते हुए कहा, "नहीं है... मैं समझ गया, जैसे प्रेम के लिए किसी रिश्ते के होने की जरूरत नहीं... उसी तरह बच्चों के होने के लिए भी नहीं... लेकिन यार ये बताओ तुम्हे अभी भी याद है...?"
    "क्या...?"
    "यही 23-23 क्रोमोजोम वाली बात... बड़ी तगड़ी रही होगी तुम्हारी बायोलॉजी...?"
   "और नहीं तो क्या ? मैंने बताया न कि मेरी याददाश्त बहुत तेज है... मैंने नाइंथ क्लास में पढ़ी थी और तुमने...?"
    "आई थिंक 10th क्लास में हां 10th क्लास थी... वो क्या है न मुझे तो इसलिए याद है कि 10th क्लास में साइंस सब्जेक्ट का बायोलॉजी पार्ट एक मैडम पढ़ती थी.... लड़के बहुत शरमाते थे... एक बार उन्होंने पूछा कि पीरियड्स क्यों आते हैं... जानते सभी थे, लेकिन बताने के लिए कोई तैयार नहीं था। सभी एक दूसरे का मुंह देख रहे थे..."
   "अच्छा फिर...?"
   मैं गर्व से बोला, "फिर क्या था मैंने बताया था..."
   उसने मेरी पीठ ठोकते हुए कहा, "वाह मेरे बहादुर बॉयफ़्रेंड... बहुत खूब... लेकिन हमारे यहां ऑपोजिट था। हमें बायोलॉजी एक सर पढ़ाते थे... स्टूडेंट तो उनकी भी खिंचाई कर लिया करते थे... एक बार क्या हुआ कि एक बार सर बोर्ड में मेन्स रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स का डायग्राम बना रहे थे तो पीछे से एक लड़के ने कहा, सर लेंथ कम है... थोड़ा-सा और बड़ा कीजिए...", यह बताते हुए वह जोर से हंस पड़ी और उसके साथ मैं भी। हम लोग कुछ देर तक पागलों की तरह हंसते रहे। फिर उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकते हुए कहा, " अरे सुनो, अभी और आगे भी है... सर ने उसे यह कहते हुए देख लिया और अपने पास बुलाया फिर उसका कान पड़कर बोले चल खोल अपनी पेंट... क्लास को डायरेक्ट एक्सप्लेन करता हूँ..."
   अपनी बात खत्म करते-करते हम फिर उसी तरह पागलों की तरह हंसने लगे, "ओ गॉड वो भी क्या दिन थे...", कुछ देर तक हम फिर पागलों की तरह हंसते रहे। मैंने देखा कि हंसते-हंसते उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। मैंने उसे रोकते हुए कहा, "अब बस भी करो पीहू ! देखो आंखों में आंसू तक आ गए हैं..."
   कुछ देर बाद बड़ी मुश्किल से वह अपनी हंसी रोकते हुए बोली, "आज जी भर के हंस लेने दो बॉयफ्रेंड... पता नहीं कल को ये दिन लौट कर दोबारा न आए ? चलो आज तुम्हारे साथ हंसने में आंसू तो निकल रहे हैं.. क्या पता कल को तनहा रोना पड़े और ये भी न निकले... तब क्या करूंगी...? तुम्हारे तिरते आंसू वाली कविता सा जीवन जीना पड़े...?"
   मैने उसके कंधे में सहृदयता से हाथ रखते हुए कहा, "ये क्या पीहू ! क्यूं रोना पड़ेगा ? तुम इसी तरह हंसते हुए जिंदगी जीना ? "
   कुछ देर बाद वह सामान्य होते हुए बोली, "यार तुम सही कहते हो। तो अब महफिल जम गई तो जम गई... अब रुकनी नहीं चाहिए...", उसने आम के पेड़ के तने में अपनी पीठ टिकाते हुए कहा।
     मैं जानता हूँ कि पीहू नशे में नहीं बल्कि एक अलग जोन में है, और इस जोन में मै उसका इकलौता हमसफर हूँ...
बुझते चिरागों से महफिल रौशन नहीं होती,
टूटे दिलों से आशिया सजाया नहीं करते।।
     "अभी यह नहीं,  कोई फर्क नहीं पड़ता, अभी तो उसकी कोई कड़ी बनाओ ...", उसने मुझे रोकते हुए कहा। 
    "यार तुमने मुझे ऑल इंडिया रेडियो के फरमाइसी नगमों का प्रोग्राम समझ रखा है क्या ?... ये वाला नहीं वो वाला कर रही हो ", मैंने दिखावटी गुस्सा जाहिर करते हए कहा ... तो चलो सोचने दो ...
जब तेरे बदन को वह छूता होगा,
फिर तुझको कैसा लगता होगा।
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
इकबार तुझे छूने पर,
तेरी सांसों को रुकते देखा है।
    "वाह ... क्या बात है ... गो ऑन...", उसने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा। 
उसके खयालों में जब तू आती होगी, 
तो फिर तुझको कैसा लगता होगा। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको। 
मेरे ख्यालों के आने पर,
तुझको लुटते देखा है।
       "अरे मार डाला यार ! क्या गहरी बात कह दी... वाह... वाह...", उसने अपना हाथ दिल के पास रखते हुए कहा, "... उसके ख्यालों तक पहुंच गए और वहां उसको कैसा लगता होगा !! क्या गहराई ...वाह... इसी तरह का एक और हो जाए...",
     "जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि ... नहीं सुना ? जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती, वहां एक शायर के ख्याल पहुंच जाते हैं..."
     "तो आगे इसी तरह का  सुनना है... तो जरा सोचने दो... हां तो गौर फरमाइए...
उसकी बाहों में जब तू जाती होगी,
तो फिर तुझको कैसा लगता होगा। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको। 
मेरी बाहों में आने पर,
शीशे-सा पिघलते देखा है।
    "हा... हा ... हा ... अब तुम रूको, बस करो", वह जोर से हंसते हुए बोली, "मै नहीं चाहती कि तुम्हारा मर्डर हो जाए, कहीं 'उसके'... 'उसने' सुन लिया न, तो बच्चे तुम गए काम से..."
     "हां यार तुमने सही कहा ...", मैंने डरने का अभिनय करते हुए कहा, "जबकि ऐसा तो कुछ था ही नहीं ... झूठे आरोपों को मैं खुद ही सिद्ध कर रहा हूं...", फिर उसके साथ में भी जोर से हंस पड़ा।
    "चलो एक-दो मेरी तरफ से... "
     "रुको ... रुको ... एक मिनिट .... जो हों गईं हैं उनको पहले लिख लेते है...", उसने बैग से पेन और मेरी डायरी निकलते हुए कहा।
    लिख लेने के बाद उसने कहा, "हां.... अब अगली हो जाए... तुम्हारी तरफ से...
उसके संग जब तू होती होगी,
तो फिर कैसे होती होगी। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको। 
तेरी दिल की धड़कन में,
खुद को धड़कते देखा है।

अब कौन कहां पर होगा,
तो फिर कैसा होता होगा। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको। 
अपनो की ही चौखट पर,
जब दोनों को मरते देखा है।

     "तुम निहायत भी बेहूदा इंसान हो...", उसने अपनी गिलास खाली करते हुए कहा, "बंद करो अपनी बकवास... रुलाते हो... सच कहा था तुमने... मुझे शराबिनी बना दोगे...", फिर उसने गिलास को खुद से दूर फेक दिया।
     "जब बर्दाश्त नहीं, तो सुनती क्यों हो...?", मैने हंसते हुए उसे चिढ़ाया।
     "कल के एक्ट में तुम दोनों के दर्द को फील कर के मैं रोई थी, ये सब हो के गुजरा है तुम्हारी जिंदगी से... वो भी इतनी कम उम्र में...?"
    "नहीं यार सिर्फ कहानी का एक पार्ट था... वो क्या कहते है... हां इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक है...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
    "तुम और तुम्हारी कहानी। तुम ही जानो, कौन सच्ची कौन झूठी... ",  उठते हुए उसने कहा।
      "ये अब कहां चल दी ...?", मैंने टोंका।
     वह चुपचाप आम के पेड़ से कुछ दूर जहां पर खेत खत्म होता था और तार की बाउंड्री थी, जाकर चुपचाप खड़ी हो गई और दूर तक देखने लगी। अचानक मुझे उस शाम की याद आई जब मैं पहली बार उसके साथ इस बगिया में आया था। तभी मंगल मेरे पास आया। मैंने उसी से पूछा, "मंगल ! वहां पर खड़ी पीहू क्या देख रही है ?"
    मंगल ने कुछ गमगीन स्वर में बताया, "जी... वो दूर टीन-शेड  देख रहे हैं न ? यह इनके खानदान का पुश्तैनी शमशान घाट है। सभी का अंतिम संस्कार यही हुआ है। लगभग तीन साल पहले यहीं पर पांच लाशे एकसाथ जली थी... जब कभी पीहू बिटिया यहां आती हैं तो कुछ देर वहीं खड़ी बस टीन-शेड की तरफ देखती रहती हैं..."
    यादें ! दुःखद यादें !! जिससे हम दूर भागना चाहते हैं लेकिन भाग कहां पाते हैं !!! यदि मैं उसका मित्र हूँ, तो इस वक्त मुझे उसके पास जाना चाहिए, और मैं उसे दिलासा देने के लिए गया। मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा, उसका पूरा शरीर कांप रहा था।  उफ़ ! कोई ऐसे भी रोता है भला...!!! मैं उसे सिर्फ इतना पूछ पाया,  "गर्लफ्रेंड ! यहां धूप में क्यों ? ठंड लग रही है क्या ?"
     उसने पलटते हुए कहा, "नहीं... बस ऐसे ही..." 
     उसकी आंखों से झर झर आंसू बह रहे थे। मैं खुद को रोक न पाया। यह पहली बार था जब मैने उसके चेहरे को अपनी दोनों हथेली के बीच ले कर उसके आंसू पोछे थे। निःशब्द उसे गले से लगाया। उसका पूरा शरीर उसकी सिसकियों से, उसकी हिचकियों से रह-रह के कांप उठता और मैं उतनी ही आत्मीयता से उसकी पीठ सहलाता रहा। इस दौरान मेरी भी आँखें भीग रही थीं लेकिन मैने उससे एक बार भी चुप होने के लिए नहीं कहा। एक लब्ज़ भी नहीं। वह अभी भी लगातार सिसकती जा रही थी, "ये सब क्या हो गया... क्यूं हो गया... आई मिस माई फैमिली... तुम कुछ कहते क्यूं नहीं... कोई दिलासा क्यूं नहीं देते... यही कह दो... इट्स ओके पीहू...", 
    यह कहते हुए वह मेरे कदमों के पास जमीन पर बैठ गई। मैं भी उसके सामने जमीन पर बैठ गया और एक छोटी बच्ची की तरह उसे अपने अंक में समेटते हुए भीगे स्वर में इतना ही कह सका, "नहीं पीहू ! इट्स नॉट ओके... इट्स नॉट ओके..."
  तीन वर्षों से उसके हृदय में जमा दर्द आंसू बन पिघल रहा था। मंगल आ उसके पीछे खड़ा हुआ, शायद कुछ बोलना चाहता था, लेकिन मैंने इशारे से उसे मना कर दिया। वह वापस आम के पेड़ की तरफ चला गया। मैने पीहू को जी भर रोने दिया। उसके दर्द मुझे अपने लगे... वह मुझे अपनी लगी... उसके साथ मैं भी रोता जा रहा था। जब दर्द के सारे आंसू बह कर मेरे कंधे में सूख गए, मैं उसे उसी जगह पर ले आया।
    हम चटाई में पुनः आकर बैठ गए। लेकिन इस बार मैं आम के पेड़ पर टिक कर बैठा था और वह मेरी जगह पर। उसने एक और प्याले की फरमाइश की मैंने चुपचाप उसे थोड़ी सी बनाकर दी। उसने पीने के बाद मुझसे कहा कि मैं अपने पैर सीधे करू। और मेरे घुटने के पास अपना सर रखकर वह लेट गई। 
    "बॉयफ्रेंड !! तुमने अभी नौकरी की बात की थी न, तुम नौकर नहीं मेरे दोस्त बनकर रह जाओ। तुम्हें यहां कोई कमी नहीं होगी। कभी बाबा से कुछ नहीं मांगा। तुम कहोगे तो तुम्हारे लिए सैलरी भी मांग लूंगी... और सच मानो बाबा बिना कुछ पूछे दे भी देंगे। विश्वास करो मेरे पास रुपए-पैसे, जमीन-जायदाद ये सब इफरात है... लेकिन मन की बात कहने के लिए मेरे पास सत्य के सिवाय और कोई नहीं। 
     लेकिन उसकी भी अपनी कुछ मजबूरियां हैं। नई-नई नौकरी है न... तो काम में बहुत बिजी रहता है। बेचारा फैक्ट्री, माइनस, मेरे घर और अपने घर के बीच भागत-दौड़ता रहता है। बाबा से बात करो भी तो कितनी करो... हादसे के बाद वह स्वयं आधे सदमे में हमेशा रहते हैं। ये बॉयफ्रेंड ! मैं मजाक नहीं कर रही हूँ बताओ न तुम्हारी सैलरी कितनी है...  तुम्हें उससे ज्यादा दूंगी..."
     "और मुझे क्या करना होगा ...?", मैने उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
     "ज्यादा कुछ नहीं... बस मेरे दोस्त बनकर मेरे पास रहना.... जब थक जाऊं तो इसी तरह मुझे अपनी शायरी, कविता, गीत और अपनी कहानियां सुनना... और कभी-कभी मेरे साथ बैठ कर पीना भी। जब तक मेरी सांस चलती रहे उसकी डोर थामे तुम हमेशा मेरे आस-पास ही रहना...
   "कहीं तुम्हारे हसबैंड को मेरा यहां रहना अच्छा न लगा तो ...?", मैंने मुस्कुराते हुए उससे पूछा था।
   "क्यूं न अच्छा लगेगा ? ...", पीछे से सत्य ने कहा। रास्ते की तरफ मेरी पीठ थी तो उसे आता हुआ मैं नहीं देख पया था। 
     मैंने पलट कर उसकी तरफ देखते हुए पूछा, "अरे  सत्य ! कब आए ? और ज्ञान कहां है... तुम्हारे साथ दिखाई नहीं दे रहा...?"
    "वो बाबा के पास बैठा है... मै तो तुम लोगों को खाने के लिए बुलाने आया था... ", पीहू अभी भी उसी तरह लेटी थी। उसने पीहू के सर पर हाथ फेरते हुए पूछा, "पीहू ! तुम ठीक हो न ?"
    "हुं... सत्य तुम आ गए... मै थक गई हूँ ... थोड़ी सी पी भी ली है....नींद आ रही है... मै सो जाऊं...?", उसकी आवाज कुछ भारी हो रही थी। व्हिस्की के चार पैग अपना असर दिखा रहे थे। सत्य ने सवालिया निगाह से मेरी तरफ देखा। मैंने सब कुछ नॉर्मल होने का इशारा किया।
    "देखो यह सो गई, इसे उठा कर तुम चारपाई पर लिटा दो... हम दोनों ने पर्याप्त खाना खाया है... मुझे और खाने की इच्छा नहीं है। जाओ तुम और ज्ञान खाओ... तब तक मैं इसके पास हूँ... और देखो बाबा को इस तरफ मत आने देना... "
    सत्य ने उसे गोद में उठाकर चारपाई पर अच्छे से लिटा दिया और उसकी चुनरी ऊपर से ओढ़ाते हुए बोला, "ठीक है... मै जा रहा हूं... अभी कुछ देर बाद फैक्ट्री भी जाना है, मैं ज्ञान को अपने साथ ले जाऊंगा... और हां आज तुम लोग नहीं जा रहे हो... कुछ नहीं... ज्ञान को मैं देख लूंगा..."
    मै उसी तरह कुछ उदास आम के पेड़ में टिका उन दोनों को देखते हुए बैठा था। सत्य भी उसी तरह मेरे पास आकर बैठ गया। उसने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, "यार ! इसने ज्यादा परेशान तो नहीं किया...?"
    मैंने उसे सभी कुछ डिटेल में बताया। यह भी कि टीन-शेड की तरफ देख कर वह कैसे अपसेट हो गई थी। सत्य चुपचाप सुनता रहा, फिर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, "इसने कम उम्र में बहुत कुछ सहन किया है... मैं भी इसे प्रॉपर टाइम नहीं दे पा रहा हूँ... मुझे इस बात का कभी-कभी बेहद अफसोस होता है। अपने आप को दोषी भी समझ लेता हूँ... कुछ समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं कि यह हमेशा खुश रहे..."
    मैने उसे समझाते हुए कहा,  "प्रत्येक इंसान की जिंदगी में एक ऐसा फेज आता है, जब वह अपने कामकाज और कैरियर को लेकर व्यस्त हो जाता है, यह कोई गलत बात नहीं है। पर कोशिश करो यार कि इसे समय दे सको... ये सिर्फ तुम्हारी है... इसका ख्याल रखना... ", उससे कहते हुए मेरी भी आंखों के कोर भींगने लगे। 
    "सत्य मेरे कंधे में हाथ रखते हुए कहा, "काश ! तुम जैसा दोस्त इसके पास हमेशा के लिए रहे... "
    "देखो सत्य, जो मुमकिन नहीं तो उस पर बात करने का कोई अर्थ नहीं... मैं तुमसे यथार्थ की बातें करूंगा। ये प्रॉब्लम तुम दोनों को ही मिलकर सुलझानी है... कोई तीसरा आएगा तो मतभेद निश्चित है... लेकिन मुझे तुमसे कुछ और भी कहना है... कहना क्या है... यह समझ लो एक कन्फेशन करना है...", मैं उसकी तरफ देखते हुए बोला।
    "कन्फेशन ! कैसा कन्फेशन...?", उसने कुछ आश्चर्य से मेरी तरफ देखा था।
   "मैंने आज पहली बार अपनी फैमिली को याद कर पीहू को जार-जार रोते देखा... कुछ इस तरह की मैं अंदर से हिल गया... तुमसे कह नहीं सकता... वो वहां खड़ी थी... पूछने पर मंगल ने बताया कि वह टीन शेड की तरफ क्यों देख रही है। मैं तो उसे दिलासा देने के लिए उस तक गया था... लेकिन मैं उससे एक बार भी नहीं पूछा पाया कि तुम यहां क्यों खड़ी हो... शेड की तरफ क्यों देख रही हो। फिर जब मैने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख तो महसूस हुआ जैसे उसका पूरा शरीर, पूरा अस्तित्व कांप रहा था। आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी... जब मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने उसके आंसू पोछे, उसे गले से लगाया और खुद भी रोया। हम बहुत देर तक एक दूसरे के कंधे पर सर रखकर रोते रहे... पता नहीं क्यों मुझे महसूस हुआ जैसे उसके दर्द मेरे अपने दर्द हैं, उसके हर एक आंसू मेरे कंधे पर जज़्ब हो के वापस मेरी ही आंखों से निकल रहे थे... क्यूं सत्य, ऐसा क्यूं हुआ...?"
   सत्य ने शांत हृदय से कहा, "वो इसलिए कि तुम एक अच्छे इंसान हो। तुम्हारे अंदर अपनों के दुख को महसूस करने की संवेदनाएं हैं। तुम्हारा अंतर्मन, तुम्हारा ह्रदय पीहू के लिए निर्मल और पवित्र है, मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। तुमने तो उसके हृदय संताप को दूर करने के लिए अपने गले से लगाया, उसके आंसू पोछे तो फिर तुम्हे किसी कन्फेशन की जरूरत नहीं, और फिर क्या मैं पीहू को नहीं जानता ? 
     अच्छा चलो मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ, जिस शाम हम पहली बार एक दूसरे से मिले जोरों की बरसात हो रही थी। मैं तो बरसात में भी फैक्ट्री लौट जाना चाहता था लेकिन पीहू ने रोक लिया, बावजूद इसके कि वह बाबा से पहले ही कह चुकी थी कि मैं जा चुका हूँ, जानते हो क्यों ? इसे डर था कि कहीं रास्ते में मुझे कुछ हो न जाए और वह जिंदगी भर इस पछतावे में रहे कि काश उस दिन उसने मुझे न जाने दिया होता। शायद जिंदगी में पहली बार एक अच्छे काम के लिए ही सही लेकिन इसने बाबा से झूठ बोला होगा... उस दिन शायद पहली बार यह मुझसे लिपट कर इसी तरह रोना चाहती रही होगी लेकिन मैं उसे सिर्फ दिलासा ही दे पाया था। 
    मुझे अच्छी तरह से याद है कि उसने बताया था कि गौशाला के पास ही उसकी पूरी फैमिली की डेथ बॉडी रखी गई थी। तब से वह इसी अटारी में सोती है। उसे महसूस होता था कि जैसे उन सभी की आत्माएं यहीं कहीं भटक रही है। मेरे आने से उन्हें मुक्ति मिली। यह सब सुनकर एक बार तो मेरी ही आत्मा कांप गई। पूरी अटारी में चारों तरफ अधेरा था। एक ही बिस्तर में होने के बावजूद मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। मेरे मन में अजीब-अजीब से ख्याल आ रहे थे। यदि यह सच है तो एक अजनबी को उसके साथ एक ही बिस्तर में देख कर पता नहीं ये आत्माएं कैसा व्यवहार करें। सच कहूं तो कुछ देर के लिए डर लगा था फिर सोचा, यदि पीहू पास में है तो फिर कैसा डर, फिर मैं भी सो गया।
     फिर दूसरे दिन ही बाबा ने एक अजनबी को अपनी पीहू सौंप दी... लेकिन उस दिन मैंने इसकी आंखों में असमंजस के भाव देखे थे। आश्चर्य हो रहा है न, लेकिन सच यही है। उसने मुझे अपना एक अच्छा दोस्त माना, अपने दिल की हर बात मुझसे कहीं, अपने हर दुख दर्द मुझसे साझा किए... हो सकता है एक दिन मुझे यह प्यार भी करती... मुझे आई लव यू भी कहती और मैं उससे कहता... लेकिन उसके बाबा ने उसे एक रिश्ते का नाम दे दिया और वह इंकार न कर सकी... अनजाने में ही सही हमने इससे एक अच्छा दोस्त छीन लिया...
   पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगता है कि उस दिन मेरे रुकने की खबर बाबा को हो गई थी और उन्होंने यही समझा कि हम दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे, एक दूसरे से प्यार करते थे। इसके प्यार के सम्मान के लिए बाबा ने हम दोनों को एक रिश्ते में बांध दिया। पता नहीं दूसरे दिन मेरी कुंडली में उन्होंने क्या देखा, मैं नहीं जानता, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह भी आभास होता है कि बाबा ने पीहू को उसके झूठ बोलने की सजा दी... उस समय इसके हाव-भाव से मुझे बिल्कुल नहीं महसूस हुआ की बाबा ने इतना बड़ा निर्णय लेने के पूर्व इससे कोई बात की रही होगी या उससे कोई कंसल्ट किया होगा, बस मंत्र पढ़ गए..."
    सत्य की बातें सुनकर मुझे आश्चर्य के साथ-साथ उसके लिए मन में सहृदयता भी जाग रही थी, "नहीं सत्य यह तुम्हारा वहम भी हो सकता है... आखिर क्या कमी है तुममें... चाहे कुछ भी हो मैंने तुम दोनों की नजरों में एक दूसरे के लिए प्यार देखा है... और वैसे भी यह जिंदगी है मेरे दोस्त, यदि बड़े बुजुर्गों की माने तो ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए करता है... निश्चित ही इसमें पीहू की भलाई ही छुपी होगी..."
    सत्य मेरी बात से कुछ असहमत होते हुए बोला, "क्या सचमुच तुम राइटर हो... और यदि हो तो तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए... जानते हो पीहू के पापा भी एक लेखक थे। एक पब्लिशिंग कंपनी में सबएडिटर का काम भी करते थे, पीहू ने बचपन से ही अपने इर्द-गिर्द लिटरेचर ही बिखरा हुआ देखा... उसे पढ़ा और उसकी समझ उसके विचारों में एक गहरी संवेदना ने जन्म लिया। मेरे ख्याल से वह भी अपने पिता से काफी प्रभावित थी। जैसा कि अक्सर होता ही है कि एक लड़की अपने पति में या फिर अपने प्रेमी में अपने पिता की तलाश करती हैं..."
   "अच्छा !!!...", मैंने आश्चर्य से बोला, "ऐसा क्या...?"
   "हां यार सच कह रहा हूँ...", सत्य कुछ हंसते हुए बोला, "पहले मैं भी कहां जानता था। यह मनोविज्ञान उसकी किसी लिटरेचर बुक की कहानी में ही पढ़ने को मिला था..."
  "ओह ! तो क्या पढ़ा...?"
  "यही कि एक लड़की या औरत के जीवन में उसके दो ही पसंदीदा पुरुष होते हैं, एक उसका पिता और दूसरा उसका बेटा... बाकी सबका का बीच में आना और जाना है..."
   उसकी यह बात सुनकर मुझे हंसी आ गई, "थैंक यू यार, यह बताने के लिए, और यह समझाने के लिए भी कि जिससे प्यार करो कभी उसके पिता की बुराई मत करो..."
   "हां बिल्कुल और उसके बेटे की भी। यह भी समझ लो कि एक लड़की उसी से प्रेम करना चाहेगी जिसमें उसे अपने पिता की छवि दिखाई देती हो... पर यह कोई सिद्धांत नहीं है इसका अपवाद हो सकता है। यह तो पिता पर डिपेंड करता है कि वह खुद कितना अच्छा पिता, पति और पुत्र है... अब मैं चलूं... ज्ञान वेट कर रहा होगा, सोच रहा होगा मै कहां गायब हो गया...?"
   मैंने उसका हाथ पकड़ कर जबरन बैठाते हुए कहा, "यार बैठो अभी... चले जाना। पहली बार तो हम लोग शांति से एक दूसरे से बात कर रहे हैं और सच पूछो मुझे बहुत अच्छा लग रहा है... तुम्हारी स्पष्टवादिता और सुलझे हुए विचार तो सुनकर मैं तुमसे और भी प्रभावित हो गया हूँ... लेकिन यह बताओ... कहते हो लिटरेचर में कोई खास रुचि नहीं... फिर भी इतनी गहरी बातें ? "
   सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा, "यह जो सो रही है न, सब इसी का प्रभाव है। पहले मै ऐसे थोड़े न था, इसी ने मेरे अंदर इस सोच को जन्म दिया। हल्के-फुल्के ढंग से बहुत गहरी बातें बोल जाती है... इसे उसके सरनेम से जज करने की कोशिश मत करना। पीहू का परिवार वास्तव में सुसंस्कृति और ज्ञान से परिपूर्ण परिवार रहा है। उसे जो विरासत में मिला, उसने आत्मसात किया। ऊपर से यह जितनी कठोर और अभिमानी दिखती है न, अंदर से वास्तव में उतनी ही कोमल है। बहादुर इतनी की बेखौफ मेरी बांह को तकिया समझ कर निश्चिंत सोती हैं... और सबसे बड़ी बात कि वह इंसानी जज्बातों की कद्र करती है। वह किसी को बंधन में नहीं बधती और इसलिए वह भी चाहती होगी कि उसे भी कोई किसी बंधन में न बांधे... प्यार क्या है, क्या नहीं है मैं नहीं जनता, और सच पूछो तो अब जानना भी नहीं चाहता हूँ... उसकी सारी परिभाषाएं मुझे इसके चेहरे में दिखाई देती है... या कह लो इसी में ही दिखाई देती हैं। कभी वक्त ने इससे एक अच्छा दोस्त छीना था... तुम्हारा उसकी जिंदगी में आना उसी एक अच्छे दोस्त की कमी को पूरा करना है। यही तुम्हारी नियति है... और इसीलिए जब वह तुम्हारे साथ होती है तो मैं निश्चित रहता हूँ... फिजिकल ही नहीं तुम कभी इमोशनली भी उसे हर्ट नहीं करोगे, वो क्या कहते हैं, हां... एब्यूज नही करोगे... तो इसलिए तुम मेरी तरफ से निश्चिंत रहो कि मैं तुम्हें ले कर कोई गलत धारणा बनाऊंगा..."
   सत्य की बातें और उसकी सोच मुझे प्रभावित कर रही थी मैंने उससे कहा, "पीहू लकी है...?"
   वह भी थोड़ा सा हंसते हुए बोला, "क्या इसलिए कि मैं उसके जीवन में हूँ... या फिर इसलिए कि वह मुझसे प्यार करती है...? तो मैं तुम्हें बताता हूँ, लकी तो मैं हूँ कि वह मेरे जीवन में है और मैं उससे प्यार करता हूँ... कभी-कभी मैं उसके विचारों की गहराई उसकी फिलासफी को नहीं समझ पाता हूँ... लिटरेचर में भी मुझे कोई खास इंटरेस्ट नहीं है... हां कभी-कभी मेरा भी मन करता है कि मैं भी उसके साथ कोई लिटरेचर की बुक पढ़ूं... लेकिन वही बात... कभी अपने आप को लिंक नहीं कर पाता। लेकिन उसे जिंदगी में आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूँ... दुआ करो कि मुझे कामयाबी मिले..."
   "तुम्हारी कामयाबी के लिए मेरी दुआओं की जरूरत नहीं सत्य..."
    "है मेरे दोस्त... और सच पूछो तो बहुत जरूरत है... सिर्फ तुम्हारी दुआओं की नहीं बल्कि तुम्हारे साथ की भी... तुम क्या जानो... तुम तो मेरी अधूरी शख्सियत का वो हिस्सा हो जो मुझे पूर्ण बनाता है... इसीलिए मैने कहा कि तुम कोई तीसरे नहीं हो...", फिर वह उठते हुए आगे बोला, "अब चलूं यार, लंच के बाद फील्ड में भी जाना है। और हां, बाबा दोपहर को आराम ही करते है... सोचेंगे पीहू अटारी में होगी... शाम को मैं जल्दी आ जाऊंगा... तब तक तुम इसका ध्यान रखना... क्योंकि हो सकता है, इसे मुझसे उतनी संजीदगी से प्यार हो न हो, लेकिन मुझे तो है न ?", यह कहते हुए सत्य जाने के लिए उठा। 
   मैने कुछ हंसते हुए कहा, "यार तुमने तो एक हमनाम गीतकार का एक पुराना गीत याद दिला दिया... दोस्त दोस्त न रहा... प्यार प्यार न रहा..."
   "ये जिंदगी हमे तेरा एतबार न रहा...", गीत के आगे की लाइन पूरा कर मुस्कुराते हुए सत्य चला गया। उस दिन क्या पता था कभी मैं उससे यह भी न पूछ पाऊंगा, "अमानते मैं प्यार की... गया था जिसको सौंप कर... मेरे दोस्त तुम न थे, तो कौन था... तुम्ही तो थे..."
    लेकिन उस दिन मैं उससे और भी बहुत कुछ पूछना चाहता था, लेकिन उसे रोक न सका। पूछता भी तो क्या पूछता... उसने तो सब कुछ कह दिया... और जो नहीं कहा वो कहना जरूरी भी तो नहीं था। फिर भी मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था, "यदि सत्य की बात सही मान लूं कि मेरा और उसका पीहू की जिंदगी में आना हम दोनों की नियति है... तो फिर पीहू की नियति क्या है...?"
   मुझे उस दिन सत्य के व्यक्तित्व में पीहू की तरह ही शालीनता और विचारों में गंभीरता नजर आई। खुद को बहुत अधिक ज्ञानी तो नहीं मानता लेकिन मैं कुछ हद तक चेहरा पढ़ सकता हूँ, और उस वक्त मैंने सत्य की नजरों में, उसके चेहरे में जो पढ़ा उससे मुझे कहीं भी यह आभास नहीं हुआ कि पीहू को मेरे द्वारा गले लगाने और उसके आंसू पोंछने से उसे कोई एतराज हुआ होगा। नहीं बिल्कुल नहीं। और मैं यह भी जानता हूँ कि हमारे बीच की बातचीत को वह पीहू से कभी नहीं कहेगा। मैने सत्य को प्रेम की उन्हीं ऊंचाइयों पर खड़ा हुआ पाया जहां पर हम अपने प्रिय की खुशी चाहते हैं, और उसकी एकमात्र वजह है यह लड़की जो इस समय बेखबर-सी निश्चिंत सो रही है। 
    लेकिन क्या उस दिन मेरा कन्फेशन पूरा था ? मैं तो अपनी पूरी फीलिंग छुपा गया था। पर इसकी जरूरत भी क्या थी। यह तो मेरी अपनी फीलिंग है, जिनका कन्फेशन मुझे उससे करना होगा जिसके लिए हैं। मै पेड़ की जड़ में सर रख वहीं चटाई पर लेट गया। कुछ देर बाद मंगल पास आया, "सर जी ! कुछ और चाहिए...?"
    "हां मंगल, देखो अमरुद और तोड़ो, मीठे हैं, और हां... थोड़ा सा नमक लेते आना..."
   थोड़ी देर बाद मंगल थाली में अमरूद, नमक और चाकू लेकर हाजिर हो गया। अमरूद काट कर थाली में रखते हुए बोला, "ये इस बगिया के सबसे मीठे अमरूद हैं... लीजिए..."
    मैंने एक टुकड़ा मुंह में डाला फिर उसे चबाते हुए बोला, " वाकई मीठे हैं... तुम भी खाओ न..."
     मेरे साथ अमरूद खाते हुए मंगल ने पूछा, "सर जी! बिटिया को ज्यादा हो गई क्या ? इतनी क्यों पिला दी...?"
     मैंने उसके सवाल का जवाब देते हुए कहा, " नहीं अपने आप से थक गई है, और फिर मंगल कभी-कभी पूरी तरह होश में आने के लिए बेखुदी की हद पार करना जरूरी होता है..."
    "मतलब... ?",  मंगल ने आंखें फैलाए हुए मुझसे पूछा।
     "इसका मतलब मुझे खुद भी नहीं मालूम... बस ऐसे ही बोल दिया...", मैंने उसकी तरफ देख कर थोड़ा-सा हंसते हुए आगे कहा, "चलो एक-एक बनाओ... और हां कम-कम, जेंटलमैन की तरह..."
     पीहू निश्चिंत सो रही थी और हम दोनों एक-एक शिप लेते हुए अमरूद खा रहे थे। कुछ देर बाद मेरी भी आँखें बोझिल होने लगी। सोने से पहले मैंने मंगल से इतना कहा, "मंगल हम दोनों का ध्यान रखना..."
     कितना सोया पता नहीं चला। किसी ने मेरे चेहरे में पानी के छींटे मारकर मुझे जगाया, "उठो भी कितना सोते हो... ज्यादा पी ली क्या...?"
    मैं उठा तो देखा बगल में पीहू बैठी अमरूद खा रही है। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे ? यह सवाल तो मुझे करना चाहिए था..."
   "तो करो किसने रोका है... लेकिन पहले उठो तो...", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
   मैं उठा और जग में रखे पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोते हुए चारों तरफ देखा। धूप अभी भी तेज थी... अर्थात शाम न तो हुई थी और न ही जल्दी होने वाली थी... मैं उसके बगल में आ के बैठ गया।
       उसने पूछा,  "तुम्हारा उपनयन संस्कार हुआ है ?"
प्रश्न अप्रत्याशित था विषय वस्तु से अलग जिसकी कल्पना नहीं की थी। मैंने आश्चर्य से पूछा, " उपनयन संस्कार .... मतलब ?"
   "मुंडन वगैरह ...!!!"
   "ओह, मुंडन ..... हुआ होगा बचपन में, मुझे याद नहीं .... लेकिन पूछा क्यूं ?", मैंने आश्चर्य से पूछा।
    प्रतिउत्तर में उसने मेरे बाल की तरफ इशारा कर कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "देखो तो कितने बड़े हैं, कैसे हवा में फ़ुरुर-फ़ुरुर उड़ रहे हैं... बड़े बाल रखने का शौक है...?"
   "नहीं ऐसे ही, थोड़ा आलसी हूँ... कटवाना भूल जाता हूं, तुम्हें पसंद नहीं...?"
    उसने फिर मुस्कुराते हुए मेरी आंखों में झांकते हुए कहा, "ऊं  हूँ ..."
     "ठीक है पसंद नहीं तो कटवा लेंगे... अब ठीक ?"
      "किसने कहा कि मुझे पसंद नहीं...?"
     "अभी तो तुमने ही ....!!!", मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा।
      "... तुम बिल्कुल बुद्धू हो इतना भी नहीं समझते यदि पसंद ना होते तो मैं खुद ही न काट देती ? थोड़ा सेट करवा लिया करो... तुम पर अच्छे लगले हैं...", उसने तिरछी निगाह से देखते हुए मुझसे कहा।
    "ठीक है जी...", मैंने हंसते हुए कहा। 
    "जी क्या... और दाढ़ी किस खुशी में रखते हो...? क्या ये भी शौक है...?", अब लहज़ा शिकायती हुआ।
    "खुशी में नहीं गम में कहिए जी..."
    "तो फिर रिमूव करवा लिया करो... तुम खुश अच्छे लगते हो... अच्छा एक बात पूंछू... सच-सच बताओगे...?", उसने कुछ संजीदगी से पूछा था।
     मैं कुछ बोला नहीं, बस उसकी तरफ देखता रहा। कुछ देर बाद वह मुझे डांटते हुए बोली, "उफ़ ! मेरी तरफ नहीं, उधर देखो..."
   "क्यों..?"
    "तुम्हारी सूरत ही ऐसी है... फिर मैं कुछ न पूछ पाऊंगी...", फिर उसने एक झटके से पूछा, "ये तुम इतने इनोसेंट क्यूं हो...?"
   "यही पूछना था...?", मैंने मुस्कुराते हुए आगे कहा, "वो शायद इसलिए कि मैं तुम्हारा ही अक्स हूँ, मुझमें तुम खुद को देखती हो... नहीं पीहू ! मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ... तुम्हारी नजरे खुद इतनी मासूम हैं कि मैं भी तुम्हे तुम्हारे जैसा ही दिखता हूँ..."
   "तो फिर बताओ मेरे दोस्त ! क्यूं एक दिन हमारा ही अक्स हमसे जुदा हो जाता है...? क्यूं हम चाह कर भी उसे रोक नहीं पाते... उसे खुद से दूर जाने देते हैं...", आगे वह कुछ न कह सकी, उसने एक झटके से अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
   मेरा अंतर्मन चीख उठा, "पीहू ! प्लीज चुप हो जाओ... मत पूछो मुझसे ये सवाल.. नहीं है मेरे पास इनके कोई जवाब... यदि होते तो मेरे हाथों में शराब के छलकते पैमाने न होते... इस दिल में बेचैनी न होती... इन आंखों में आंसुओं का सैलाब न होता... एक अजनबी की तरह दर-ब-दर न भटक रहा होता...", ये दिल की बेचैनी थी या गुजरे हुए लम्हों की टीस, इतना कहते-कहते मैं थक-सा गया। सांसे फूलने लगी। लाख कोशिशों के बाद भी मैं अपने आंसुओं को न रोक सका। 
   उसने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया तब मुझे एहसास हुआ, ये मैने क्या कह दिया। वह तो मुझसे सवाल पूछते ही रो पड़ी थी तभी तो उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया था। अब तो दोनों की आंखें भरी हुई थी, कौन किसके आंसू पोछे। मैने उसे गले से लगा लिया और इतना ही कह पाया, "सॉरी..."
   वह कुछ उदासी से बोली, "नहीं सच कहते हो तुम, सबके अपने-अपने गम... सबकी अपनी-अपनी खुशियां, है न ? यह सवाल तो मैंने खुद अपने लिए पूछा था..."
   "मैने कहा न सॉरी... सत्य तुमसे दूर कभी नहीं जाएगा...", मैने उसे दिलासा देते हुए कहा।
   मेरे इतना कहते ही उसकी पकड़ ढीली हुई उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "सत्य ...!!"
   "हां सत्य... उसी के लिए तो...."
    मेरी बात अधूरी रह गई। उसके लबों में फीकी सी मुस्कान दौड़ गई, "क्या तुम्हे मैं न दिखाई देती ? काश ! जिंदगी के किसी मोड़ पर मैं भी तुम्हें समझा सकू, अजनबी !! कितने प्यारे हो तुम मेरे लिए..."
   मैंने उसे समझाना चाहा, "पीहू ! पागल मत बनो..."
   लेकिन उसने मेरी बात बीच में ही काट दी, हंसते हुए बोली, "अब जाने भी दो यार... पागल तो हो गई... लेकिन तुम्हे क्या फर्क... बनाओ मेरे लिए भी..."
   "सो सॉरी पीहू.. सच कहती हो तुम। सबके अपने-अपने दुख और सबकी अपनी-अपनी खुशियां होती हैं... हम खुद में ही डूबे रहते हैं। कहां देख पाते हैं सामने वाले को, उसे भी कोई दुख हो सकता है, कोई तकलीफ हो सकती है... कुछ हद तक हम स्वार्थी होते हैं न, शायद मैं भी हूँ... वैसे टाइम क्या हुआ होगा ?"
   "टाइम की बहुत फिक्र हो रही है तुम्हे...? तो सुन लो... आज तो नहीं जाने दूंगी तुम्हे...", उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा।
   "न पीहू ! अब जाने दो... अब तो खुद से डर लगने लगा है। अपनी चाहतों से... अपनी ख्वाहिशों से ! रुका तो न जाने तुम्हारे लिए कौन सी मुसीबत खड़ी हो जाए...? भागता तो आया ही हूँ, कभी अपने आप से... तो कभी अपनों से... एक बार फिर सही... क्या फर्क पड़ेगा...?"
    उसने मेरी बात बीच में ही काट दी, "फर्क पड़ेगा, इसलिए कहती हूँ अब मत भागो अपने आप से और न ही अपनों से। एक पल के लिए कहीं ठहरना भी सीखो। मानती हूँ कि जिंदगी चलते रहने का नाम है लेकिन उसे जीने के लिए हमें अपनों के साथ ठहरना पड़ता है, रुकना पड़ता है... उनके साथ हंसना पड़ता है, उनके साथ रोना भी पड़ता है..."
   "अपनों के साथ न ? लेकिन मेरा कौन अपना है यहां...?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "हां सच कहते हो, कौन है तुम्हारा यहां ? किसके लिए रुकोगे ? तो फिर जाओ... खुद को अजनबी कहते हो न, अब हमे भी मान लो ?"
   कुछ लम्हों को हम जीते नहीं हैं, बस जीते चले जाते हैं... बिना कुछ सोचे, बिना कुछ समझे, किसी से कुछ भी कहते चले जाते हैं। ... शायद दिल के अंदर जो बातें, जो अरमान छुपे होते हैं, वे खुद-ब-खुद बाहर आते चले जाते हैं। ...उन पर फिर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है... ऐसे ही कुछ लम्हे हम दोनों जी रहे थे... दिल की बातें जुबान पर आई... यही सोच कर मैं कुछ हैरान कुछ परेशान हो गया। मुझे टॉपिक बदलना चाहिए... इसका एक ही रास्ता था फ्लर्ट यानी मजाक, मैंने वही करना चाहा...
     "कौन कमबख्त है जो यहां से जाना चाहता है, मैं तो इसलिए जाना चाहता हूं कि फिर से लौट कर यहीं वापस आ सकूं... फिर से इन्हीं वादियों में तुम से मिल सकूं... और इस दुनिया से यह कह सकूं कि दुनिया में सबसे हसीन गर्लफ्रेंड मेरी है... और तुमसे... तुमसे कह सकूं कि...", यहीं पर आकर मैं रुक गया। उसने कुछ देर तक इंतजार किया, जब मैं कुछ न बोला तो उसने खुद ही पूछ लिया, "हां आगे बोलो... कह सकूं कि... ?"
     "हां... कह सकूं कि... अब जाने भी दो न, देखो अभी कुछ नहीं सूझ रहा है... जब दिमाग में जाएगा तो बता दूंगा..."
    "अच्छा तो तुम दिमाग से सोचते हो...?"
    "सभी सोचते हैं मैडम ! सारा खेल इस दिमाग का ही है... दिल तो बेचारा यूं ही बदनाम है...", मैंने किसी दार्शनिक की भांति कहा।
     "लेकिन मैने तो दिल का नाम ही नहीं लिया ?  लो अमरूद खाओ...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
     "बहुत खा चुका, अब तुम खाओ..."
     उसने एक बाइट लेते हुए पूछा, "ज्यादा हो गई थी मुझे...?"
     "नहीं तो, बिल्कुल भी नहीं, ज्यादा तो मुझे हो गई थी... सत्य आया था, उसी ने तुम्हें चारपाई पर लिटाया था...", मैंने व्यंग्यात्मक लहजे मे कहा।
    "हूं। सुन रही थी... लेकिन शायद नशे के कारण आंखे बोझिल हो रही थी... तेज नींद आ रही थी... इतना सुना कि आज तुम नहीं जा रहे तो फिर निश्चिंत होकर सो गई... और जब नींद खुली तो देखा तुम सो रहे हो..."
     "खतरनाक हो यार, मतलब नशे में बेहोश समझ कर हम तुम्हारे खिलाफ कुछ बोल भी नहीं सकते...", मैंने हंसते हुए कहा।
     "कभी जुर्रत भी न करना...", उसने मेरी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "वैसे मुझे तुम्हें थैंक्स कहना है..."
    "चलो कह दो और बता भी दो कि क्यों कहना है...", मैंने उसकी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
   "मुझे खुदगर्ज बनाने के लिए... आश्चर्य हो रहा है न ? देखो ! मैं समझाने की कोशिश करती हूँ, शायद तुम समझ जाओ... तुम पिछले तीन दिनों से यहां पर हो तो यहीं पर हो। तुम्हारे लिए पूरी दुनिया सिर्फ यहीं पर सिमट के रह गई है। तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसके बाहर क्या हो रहा है। जब मन पड़ता है खाते हो, जब मन पड़ता है पीते हो। तुम हो, तुम्हारे गम है, तुम्हारी बची-कुची कुछ खुशियां हैं, और जिनके बीच हम लोग भी हैं... लेकिन सिर्फ उतने ही जितना कि तुम चाहते हों। यानी कि तुम सब कुछ भूल कर इस पल को जी रहे हो। जीवन के प्रति तुम्हारा यह दृष्टिकोण देखकर मुझे खुशी भी है और डर भी।
    "डर !! वो भला क्यूं?", मैंने पूछा। 
    "जहां तक मैं समझ रही हूँ, तुमने अपनी मर्जी से एक रिश्ता बनाना चाहा था, जो किन्हीं भी कारणों से नहीं बन पाया। तो अब यह तय है कि तुम जल्दी नए रिश्ते नहीं बनाओगे और ना ही उन पर विश्वास कर पाओगे... अब तुम सिर्फ अपनी जिंदगी जीना चाहोगे। इसीलिए मैने तुमसे कल विश्वास के साथ कहां था कि यहां से जाने के बाद तुम कभी भी यहां पर अपनी इच्छा से आने की कोशिश नहीं करोगे। तुम जहां भी जाओगे वहीं के होकर जीने की कोशिश करोगे। तुम्हे अब किसी की इतनी याद नहीं आएगी कि तुम उसे मिलने की कोशिश करो। अब तुम्हें कोई बंधन स्वीकार्य नहीं होगा... कर ही नहीं पाओगे। हो सकता है कल को शादी भी कर लो, पत्नी भी आ जाए, बच्चे भी हो जाएं... तो भी तुम सिर्फ अपनी जिंदगी जीना चाहोगे..."
     "क्या मतलब है ? क्या मैं उनसे प्यार नहीं करूंगा ? गलत हो तुम...", मैने उसका विरोध किया। पता नहीं क्यूं मुझे उसकी बात अच्छी नहीं लग रही थी।
   "तो फिर तुम अपने आप को ही नहीं जान पाए... जानती हूँ कि सुनने में तुम्हें बुरा लग रहा होगा और काश कि मैं गलत साबित हो जाऊं... अब जो भी तुम्हारे जीवन में प्रतिरोध उत्पन्न करेगा उससे तुम दूर भागना चाहोगे। चाहे वह प्रतिरोध तुम्हारी भलाई के लिए ही क्यों न हो। अभी मैं रोक लगा दूं.... यह नहीं करना है... वह नहीं करना है, तो तुम मुझसे भी दूर भागने की कोशिश करोगे... और सिर्फ तुम्हारे लिए कोई अपनी जिंदगी क्यों एडजेस्ट करेगा ? वह भी तो अपनी जिंदगी जीना चाहेगा न ?"
     "तो इसमें नई बात क्या है ? यह तो सभी चाहते हैं...", मैने जानना चाहा।
    "हां लेकिन तुम अपनी पूरी आजादी चाहोगे, सिर्फ अपने शर्तों पर जीवन जीना चाहोगे ? सामाजिक बंधन और रिश्ते अपना फर्ज समझ कर निभाओगे... लेकिन सदैव के लिए उनसे नहीं जुड़ पाओगे... और यदि मेरी बात का आज विश्वास नहीं हो रहा है तो कल को मैं रहूं या न रहूं तुम एक बार इसी जीवन में उसके पास जा कर देख लेना जिसे तुम आज बहुत चाहते हो... लेकिन अभी तुरंत नहीं। अभी गुजरने दो बहुत से साल, उसे जीने दो अपनी जिंदगी... फिर उसके बाद जाना..."
   "फिर क्या होगा... ", मेरे अंदर की उत्सुकता जाग रही थी। 
     "आज मैं क्या बताऊं तुम खुद ही देख लेना...", उसकी आवाज में एक रहस्य था। 
    "ठीक है, एक दिन मैं जाऊंगा, यह तो मैंने पहले ही सोच रखा है। लेकिन फिर भी तुमने कुछ तो सोचा होगा कि क्या होगा...", मैने पूछा।
    "होगा यह कि तुम एक आध्यात्मिक प्रेम यानि स्पिरिचुअल लव पर विश्वास कर रहे होंगे और वह तुम्हारे अंदर इसी सांसारिक प्रेम को देखने की कोशिश करेगी। तुमसे रिश्ते बनाने की भी कोशिश करेगी, तुमसे वह उसी तरह का प्रेम चाहेगी जिसे उसने खुद बीच राह पर कभी छोड़ा था, इस बात से बेखबर कि उसने तुम्हें अनजाने में ही सही बदल दिया है। उसे तुम्हारी कविताओं, शायरी, कहानियों की गहराई उसके दर्द समझ नहीं आएंगे। जिन्हें मैं आज हृदय से, उनके मीनिंग को समझ कर वाह-वाह कर रही हूँ, उसे यह सब बहुत आर्डिनरी लगेंगी..." 
    "ये आध्यात्मिक प्रेम क्या होता है ?", मैंने पूछा। 
    "एक ऐसा प्रेम जो फूल से नहीं उसकी खुशबू से होता है... जो सूरज से नहीं उसकी गर्मी से होता है.... जो चंद्रमा से नहीं उसकी शीतलता से होता है.... जो बादल से नहीं उसकी बारिश से होता है.... जो हवा से नहीं उसकी रवानी से होता है... जो ज्ञानी से नहीं उसके ज्ञान से होता है.... जो दीप से नहीं उसके उजाले से होता है.... जो व्यक्ति से नहीं उसके व्यक्तिव से होता है। अर्थात जो व्यक्तिपरक नहीं सार्वभौमिक है... यानी कि ऐसा प्रेम जो होने के कारण से नहीं, होने से होता है..."
    "हूं.... वाह !!! फिर ..?", मैने आगे जानना चाहा।
    "लेकिन वह तुम्हारे अंदर के इस आध्यात्मिक प्रेम को नहीं समझ पाएगी। जो जिंदगी वह आज तुम्हारे साथ जी सकतीं थी, वहीं जिंदगी कल को तुम्हारे साथ जीना चाहेगी। और जब उसकी यह इच्छा पूरी नहीं होगी तो तुम पर तरह-तरह के आरोप लगाएगी। ऐसा माहौल पैदा कर देगी कि तुम खुद ही उससे दूर हो जाओ... और इसका दोषी भी वह तुम्हें ही सिद्ध करेगी। अप्रत्यक्ष रूप से वह तुम्हें यह जताने की कोशिश करेगी की देखो मैं तो अपनी वफाएं निभा रही हूँ लेकिन तुम ही बेवफा की तरह मुझसे दूर भाग रहे हो। इस तरह से उसने तुम्हारे साथ जो आज किया है, कल के दिन उसे सही साबित करने की कोशिश करेगी। तुम्हें जताएगी कि इसी तरह तो मैने भी कभी मजबूर होकर तुम्हें छोड़ा था।
    मैं कहना यह चाहती हूँ कि उसने तुम्हारे साथ जो कुछ भी किया उससे तुम इतने मासूम बन चुके हो कि उसकी ये चालाकियां तुम बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। और अंत में तुम उसके पास से खुद ही भाग आओगे... यह हकीकत है, जिसे आज मैं देख रही हूँ, लेकिन तुम नहीं देख पा रहे हो..."
    "लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये सब होगा…", मुझे उसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
    "मैं ये नहीं कहती कि ये बदलाव आज ही होगा, वह आज तुम्हारे जैसे ही होगी, लेकिन धीरे-धीरे उसमें ये बदलाव आएंगे, या यूं कहो कि उनका आना तय है... तुममें भी आयेंगे... लेकिन ये बदलाव सकारात्मक होंगे और उसका परिस्थितिजन्य या अपराधबोध से ग्रस्त...
     इसीलिए कहती हूँ अपने आप को यूं बर्बाद मत करना। खुद को बिजी कर लेना। ... और सुनो ! प्रेम के मामले में अब तुम हमसे कहीं आगे निकल चुके हो। अब तुम्हारे हाथ में या तो जाम होगा या फिर कलम। चुनाव तुम्हे करना है। इसीलिए कहती हूँ, किसी भी जज्बात में आकर अपनी कलम छोड़ने का इरादा कभी मत करना। जब तक यह तुम्हारे हाथ में है तो तुम हो, तुम्हारा वजूद है। जिस दिन ये कलम नहीं होगी तो खत्म समझना अपने आप को...", उसके चेहरे में एक गहरी मुस्कान थी। 
     उसकी रहस्यमय बातें सुनकर मैं हैरान था, "ये ! तुमने दर्शनशास्र या मानोविज्ञान भी पढ़ा है क्या...?"
    "हां पढ़ा है... लेकिन इस प्रेडिक्शन के लिए ये जरूरी नहीं है...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
   "तो फिर कैसे जाना...?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा था।
    उसने इस बार संजीदगी से कहा था, "उस वक्त जाना और साझा जब जब मैं रोई, रो मैं रही थी और आंसू तुम्हारी आंखों से भी बहे। तुमने मुझे गले लगाया... मेरे आंसू भी पोछे... लेकिन कहां कुछ नहीं... कोई और होता तो कहता, चुप हो जाओ, प्लीज मत रोओ, और भी बहुत कुछ कहता। लेकिन तुमने कुछ नहीं कहा। तुमने मेरे दर्द को महसूस किया, उसे आत्मसात किया, या यूं कह लो उसे अपने अंदर ही समाहित कर लिया। एक पल में ही तुमने मेरे हृदय के दर्द को अपने हृदय में उतार लिया। मेरे सभी आंसुओं को पी गए और फिर वहीं आंसू तुम्हारी आँखों से बह निकले। मैं दावे के साथ कह सकती हूं यह वही कर सकता है जो इस तरह के आध्यात्मिक प्रेम को जीना सीख गया हो..."
   "नहीं पीहू, पता नहीं तुम क्या सोच रही हो, ऐसा कुछ भी नहीं है... और उस वक्त तुमसे क्या कहता.. हुं ? क्या ये कहता चुप हो जाओ पीहू... मैं तुम्हारे दर्द को समझता हूँ ? कि ये कहता... चुप हो जाओ पीहू... जो हो गया उसे भूल जाओ...? सब झूठ होता न ? मेरी जिंदगी से एक इंसान गया... उसी के दर्द को लिए भटक रहूं... उसे ही नहीं भूल पा रहा हूँ। तुमने तो एक ही पल में अपने पूरे परिवार को सदैव के लिए खोया... तो तुम्हारे दर्द को समझना मेरे बस की बात नहीं थी... और न ही तुम्हारे लिए भूलना आसान होगा... तुम्हें गले लगा कर उन्हें महसूस कर सकता था और वही मैंने किया। 
    उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "शायद सच कहते हो... जब समझ न सके तो महसूस कर लिया... मुझे गले लगा के खुद ही रो पड़े... और मेरी आंखों से बहने वाली गंगा के तीव्र प्रवाह को आत्मसात करते चले गए... है न ?"
     मैं चुप था।
    "तुम्हारी गर्लफ्रेंड हूँ यार, अब तो मेरी बात मान लो... ", उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
      "ये रुको, तो तुम सत्य के साथ ऐसा नहीं करोगी न...?", मैंने उसे रोकते हुए पूछा, "वह भी तो तुमसे रिश्ता बनाना चाहता है...? तुम्हें एक सामाजिक रिश्ते में पाना चाहता है ?"
      "मैं उसे हर बंधन से मुक्त रखना चाहती हूँ...", उसने बात अधूरी छोड़ दी।
    "हां बोलो ? रुक क्यों गई..."
     "अब क्या मतलब कहने का... मान लिया न, बना लिया न रिश्ता, पहले बाबा के सामने मान लिया था... अब उसके, तुम्हारे, मंगल, कमली और ज्ञान भैया के सामने भी। लेकिन तब भी मैं यही चाहूंगी कि वह मुझसे किसी भी रिश्ते और बंधन से मुक्त रहे... अब चलो इन भारी भरकम बातों को छोड़ते है दोस्त। कुछ हल्की-फुल्की और हसी-मजाक की बाते करते हैं। कैसे बॉयफ्रेंड हो, गर्लफ्रेंड सामने है और तुम फ्लर्ट तक नहीं कर रहे हो...?"
     "वो क्या है मुझे आता ही नहीं... कभी किया ही नहीं...", मैने हंसते हुए कहा।
    "मै सोचती हूँ कि मैं तुमसे शादी कर लूं ... करोगे ?", उसने कुछ शरमाते हुए पूछा।
   "शादी... मुझसे !!..", मुझे आश्चर्य हो रहा था।
   "क्यों  ? नहीं कर सकते.. मैं तुम्हे पसंद नहीं...", उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
    उसकी यह बात सुनकर मैं कुछ असहज हो गया, क्या कहूं क्या ना कहूं, मेरे मुख से इतना ही निकला, "तो फिर सत्य ... और फिर मुझसे ही क्यों...?"
     "वो इसलिए कि शादी इज बर्बादी, और तुम ऑलरेडी बर्बाद हो... तो फिर सत्य को क्यूं बर्बाद करूं...", फिर वह जोर से हंस पड़ी।
    "ओह ! तो मजाक किया जा रहा है...?", मैने भी हंसते हुए कहा।
    "नहीं फ्लर्ट करना सिखा रही हूँ...", वह फिर हंसी।
     लेकिन इस हंसी में मै शामिल न हुआ। मै चुप रहा। उसकी तरफ बहुत ही अपनत्व और प्यार से कुछ देर तक देखता रहा। उसने भी मुझे ध्यान से देखा। 
     "यूं मेरी तरफ क्यूं देख रहे हो ?", इस बार उसने गंभीरता से पूछा।
      उसी तरफ मासूमियत से उसकी आंखों में झांकता हुआ मै बोला,  "पीहू ! काश सत्य के आने से पहले मैं तुम्हारे जीवन में आया होता,  काश कि तुम पहले मिली होती..."
    "वो भला क्यूं ...?"
    "तो मैं यूं दोबारा बर्बाद तो न हुआ होता... लेकिन चलो अभी भी देर नहीं हुई। यदि सत्य को अपना दोस्त मानती हो तो फिर कोई बात नहीं... यदि सचमुच अपना हसबैंड मान लिया है तो डाइवोर्स ले लो और यदि प्यार करती हो तो ब्रेकअप कर लो... जानती हो क्यूं.... ताकि मैं तुम्हें प्रपोज कर सकूं... तुम मेरे लिए बहुत खास हो...और जानती हो तुम्हारी खासियत क्या है...? ", मैने उससे प्यार से पूछा।
    "नहीं... ", उसने अपनी नजरें नीचे कर कुछ लजाते हुए कहा।
    "तुम्हारी शख्सियत !! तुम्हारे चेहरे और व्यक्तित्व की कशिश। तुम्हारा ज्ञान, जिंदगी के प्रति तुम्हारा दष्टिकोण। तुम्हारी मासूमियत, सागर से भी गहरी ये खूबसूरत आँखें, जिसमें मुझे पूरी कायनात दिखती है। दिल करता है बिना सेफ्टी किट के इनमें कूद जाऊं और हमेशा-हमेशा के लिए डूब जाऊं... और फिर इन होठों की मुस्कान बन तुम्हारे पूरे चेहरे में छा जाऊं। तुम्हारे डार्क स्वीडिश गोल्डन कर्ली और सिल्की हेयर्स में खुद को कुछ इस तरह उलझा लूं कि फिर दुनिया की कोई ताकत मुझे सुलझा न सके। तुम्हारे ये गुलाबी होठ, इनसे छलकते पैमानो को होठों से छू कर दुनियां भुला दूं... अपनी जिंदगी सवार लूं। हंसते समय तुम्हारे गालों में पड़ने वाले इन डिंपल्स में फॉल इन लव की फीलिंग को महसूस कर लूं... ", मै उसी तरह मासूम सूरत लिए उसकी हथेली को अपने दिल के ऊपर रखते हुए आगे बोला, "पीहू सुनो... मेरे दिल की हर एक धड़कन सुनो, पीहू... पीहू...पीहू... कहती है न ? प्लीज इसे मेरी एक्टिंग समझने की भूल न करना। ये तुम भी तो देखो न मेरी तरफ... और बताओ कि मेरी पीहू इतनी सुंदर और इतनी अच्छी क्यों है...?"
    लेकिन वह खामोश उसी तरह बुत बनी बैठी रही। उसके चेहरे में लाज की लाली, और दुनिया-जहान की शर्म-ओ-हया सिमट आई। मैंने उसे धीरे से पुकारा, "पीहू !..."
    लेकिन वह उसी तरह खामोश सर झुकाए बैठी रही। मैने उसकी ठोडी में उंगली रख उसके चेहरे को ऊपर उठाया। अब उसका चेहरा ठीक मेरे सामने था। इतने करीब से मैं उसे पहली बार देख रहा था। उसकी नजरें अभी भी नीचे थीं। बोझिल पलके शर्म से कुछ और बोझिल हो गई थीं। मैने उसे फिर धीरे से पुकारा, "पीहू!!...", इस बार मेरे स्वर खुद-ब-खुद कांप-से गए। इस बार उसने अपनी पलके उठाई, कुछ पल के लिए मेरी आंखें उसकी आंखों से जा मिली। मुझे एहसास हुआ कि सचमुच उसकी इन आंखों में सागर-सी गहराई है। मेरी नज़रें उसके चेहरे से नहीं हट रहीं थी। उफ़ ! मुझे यह क्या होता जा रहा है ? उसकी सुंदरता का निर्मल प्रवाह मेरी आंखों से उतर दिल की गहराइयों में क्यूं समाता जा रहा है ? दिल की धड़कने उतनी ही तेजी से क्यूं बढ़ती जा रहीं हैं, धक... धक... धक...
    मैं उसे यूं ही देखते बैठा रहा फिर अचानक होश आया। अगले ही पल मैंने निर्णय ले लिया था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं धीरे से मुस्कुराते हुए बोला, "इसे कहते है फ्लर्ट करना... जो तुमने किया था न... उसे लतीफा सुनना कहते हैं..."
   उसका चेहरा बता रहा था कि जैसे उसे विश्वास नहीं हो रहा है। उसका हाथ अभी भी मेरे दिल पर था। उसने कहा, "लेकिन तुम्हारे दिल की धड़कन तो कुछ और कहती है... जरा खाओ मेरी कसम कि तुम फ्लर्ट कर रहे थे...?"
    मैं चुप। अब क्या बोलूं ? कुछ देर बाद उसने ही मुस्कुराते हुए कहा, " ये सीरियस मत हो... मैं भी फ्लर्ट करने की कोशिश कर रही हूँ..." , फिर वह मेरे पीठ पर जोर से मारते हुए बोली, "और कितने बदमाश हो तुम... कितनी ऊंचाई पर ले जाकर धक्का देते हो...? कभी तुम्हारे पैरेंट्स से मिली न तो तुम्हारी शिकायत करूंगी। देख लेना... कान पकड़ के सॉरी न बुलवाया तो मेरा नाम पीहू नही..."
   "वो तो मैं अभी भी कह सकता हूँ...", मैने अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा, "सॉरी पीहू..."
     जब कुछ देर हम हंस लिए तो माहौल सचमुच हल्का हो गया। उसने कहा, "तो माय डियर बॉयफ्रेंड ! मुझे एक पल, एक लम्हे की वैल्यू समझाने और दिखाने के लिए एक बार फिर थैंक्स। एक्सेप्टेड न?"
    "एस, एक्सेप्टेड ... तो ?", मैंने सावलिया निगाह से उसकी तरफ देखते हुए पूछा। 
    "तो फिर खोलो बॉटल ! हो जाय एक-एक...कितना तरसाते हो यार तुम...", उसने बैग की तरफ देखते हुए कहा।
    "जरूर, क्यों नहीं...", मैने बैग अपनी तरफ खींचते हुए कहा।
    "ये अमरूद बहुत मीठे हैं न ...?", उसने एक अमरूद के चार टुकड़े करते हुए पूछा।
    "जी ज़रूर, तो क्या इन्हें भी फ्लर्ट करना होगा...?", मैने मुस्कुराते हुए पूछा। 
     "मतलब मैं मीठी हूँ...?", उसने अपने दोनों घुटनों पर अपना चेहरा रख कुछ तिरछी नजरों से मुझे देखते हुए पूछा।
     "हो सकता है ! ... सत्य से पूछना पड़ेगा... कल तो सोने को मिला न होगा... नई-नई शादी जो हुई है...?", मैने उसी तरह मुस्कुराते हुए पूछा।  
     "हां सच !!… पहली बार सत्य गहरी नींद सो रहा था और मैं काफी देर तक जागती रही... सोचती रही...", उसने आसमां की तरफ देखते हुए कहा।
   मैने व्हिस्की का एक छोटा-सा पैग उसकी तरफ बढ़ाते हुए फिर पूछा, " क्या ? ..."
    "सच कहूं तो ज्ञान भैया से जब तुम्हारे बारे में पता चला तो..."
    "गर्लफ्रेंड अब छोड़ो उन बातों को... ", मैने चीयर्स करते हुए आगे कहा, "लेकिन तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिये था। सो बैड... पति की बाहों में बॉयफ्रेंड के सपने !! तो समझो डाइवोर्स पक्का..."
   वह हंसते हुए बोली, "अच्छा ! ... तो फिर बताओ कौन नहीं देखता ? और जो ऐसा बोलता है न बॉयफ्रेंड, तो समझना वह या तो बहुत ही झूठा है या फिर उसका जीवन निरर्थक है..."
    मैंने आश्चर्य से पूछा, "अब इसका क्या अर्थ हुआ...?"
   उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, " तुम्हारी कल की बात को ही आगे बढ़ाती हूँ... जब कोई इंसान या उसकी यादें चेतन से उतर कर अवचेतन में पहुंच जाती है तो वह स्वप्नदर्शी होती हैं। यदि आपके जीवन में कोई ऐसी यादें नहीं हैं तो आप स्वप्न देख ही नहीं सकते... फिर स्वप्नरहित जीवन का क्या अर्थ, तुम ही बताओ ? रही बात डाइवोर्स की तो उसकी वजह स्वप्न देखना नहीं हो सकता... बल्कि उसे हकीकत बनाने की इंसानी ज़िद हो सकती है..."
    मैंने उसे बीच में रोकते हुए कहा, "यह तो दोहरा जीवन जीना हुआ न ? अपने ही देखे हुए स्वप्न को पूरा करना क्या गलत है ?"
   "तुम समझे नहीं ! सोच समझ कर लिए गये निर्णय स्वप्न नहीं विचार होते हैं, जो सही और गलत हो सकते हैं। लेकिन स्वप्न तो वह परिदृश्य होता है जो अधूरी इच्छा, अधूरी कमना से जन्म लेता है, जिन्हें कभी न कभी सही और गलत के डर से अधूरा छोड़ दिया जाता है। फिर वही इच्छाएं अवचेतन में कैद हो जाती हैं, और एक सुखद स्वप्न के रूप में अपने होने का एहसास कराती हैं। लेकिन जिनके बारे में हम स्वयं तो जानते हैं लेकिन दुनिया नहीं जानतो, यदि उन यादों को गुनाह मान कर हम भुलने की कोशिश करे तो भी वो मिटती नहीं हैं, वरन् अचेतन मस्तिष्क में कैद हो जाती हैं... फिर हम उनका स्वप्न भी नहीं देख पाते... और शायद इसे ही कहते हैं स्वयं को जीते जी मार लेना...!"
   मैने उसकी गहरी और रहस्यमई आंखों में देखता हुआ बोला, "तो क्या मैं भी तुम्हारे जीवन का वही एक अधूरा स्वप्न हूँ..."
   "शायद ... लेकिन हां, जिसे मैं स्वयं के मारने के बाद भी मरने नहीं दूंगी... ये सुनो ! बहुत हुई फिलॉस्फी.... मुझे कैरेट्स खानी है..."
    वह अपना जाम खत्म कर उठते हुए बोली, "क्या शराबियों की तरह धीरे-धीरे पी रहे हो ?... खत्म करो और आओ मेरे साथ..."
    "कहां...", मैने अपना पैग खत्म करते हुए पूछा।
    "फॉलो मी... ओह नो सॉरी... आओ साथ चलते हैं...", उसने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा।
    हम दोनों साथ ही खेत में घुसे। उसने कुछ गाजर और चुकंदर उखाड़े, कुछ ककड़ी, कुछ खीरे भी तोड़े। कुछ मैने पकड़े कुछ उसने। पंप हाउस के पास आए उन्हें अच्छे से धोया फिर चटाई में आ गए। उसने एक-एक कर सलीके से काटे और थाली में मिक्स कर फैला दिए, "थोड़ा सा नमक डालो न ..."
     "पीहू ! एक बात पूछूं ... बुरा तो नहीं मानोगी ..?", मैने सलाद में नमक मिक्स करते हुए बोला।
     "नहीं... तुम पूछो तो... तुम्हारे लिए सौ खून माफ है ब्वॉयफ्रेंड !", उसने नजाकत से कहा।
    "तुमने इससे पहले कभी ड्रिंक किया था..."
    "नहीं बिल्कुल नहीं... स्कूलिंग फिर डेढ़ साल कॉलेज बॉम्बे में ही की... वहां ये सब आम बात थी... बहुत कम उम्र में लोग मेच्योर्ड और समझदार हो जाते हैं। दुनिया भर का नॉलेज हो जाता है। शराब, सेक्स, ये सब बहुत कॉमन होता है... मैंने नजदीक से देखा है। यूं कह लो थ्योरी पढ़ी है, कभी प्रैक्टिकल नहीं किया...", उसने बड़ी आसानी से मुझे समझा दिया। 
    थोड़ी देर में आधी से अधिक सलाद खत्म हो चुकी थी, हमने दूसरा पैग बनाया।
   "बाबा के पूजा की तैयारी फिर खाना बनाना होगा, तो तुम जरा सम्हल के...", मैंने उसे समझाना चाहा। 
   "हुं ... मुझे शराब नहीं चढ़ती मंगल, देवताओं का वरदान है मुझ पर... यही कहते हो न मंगल से...", फिर हम जोर से हंस पड़े।
    "तो चले...?", उसने पूछा। 
    "कहां...?"
    "घर... और कहां...?"
   "बाबा के पूजा का टाइम हो गया क्या ..?", मैंने सूरज की तरफ देखते हुए पूछा। 
   "अभी तो बहुत टाइम है... लगभग एक घंटे..", उसने जवाब दिया। 
   "तो फिर अभी रुकते हैं...", मैंने पेड़ के तने में अपनी पीठ टीका के पैर फैलाते हुए कहा। 
   "तो फिर तीसरा बनाओ... मै अभी आई...", कहते हुए वह कुछ दूर दूसरे पेड़ की तरफ चली गई। उसके आते-आते तीसरा बन चुका था।
    मैंने भी उठते हुए कहा, "मैं भी आता हूँ..."
    "हूं..! तुम भी !! ... पहले कहां होता, साथ ही चलते...", उसने हंसते हुए कहा। 
    "तुम भी ! लगता है धीरे-धीरे असर कर रही है...", मैंने कुछ शरमाते हुए कहा।
   हम कुछ देर बाद फिर एक साथ बैठे थे। मैंने उसे समझाते हए कहा, "मैं फिर से कह रहा हूँ... तुम उतनी ही पीना जितने में फ़ाउल न हो..."
   "तुम बना रहे हो न, तो नहीं होऊंगी, विश्वास है मुझे। हां यदि खुद बना कर पी रही होती तो हो सकती थी..."
      सूरज अपना सफर तय करते-करते नदी के तीर तक पहुंच चुका था। एक खूबसूरत शाम ढलने को थी। अमरूद के पेड़ों में पक्षियों के झुंड के झुंड हमारे साथ अमरूद का आनंद ले रहे थे। दोपहर में कुछ तेज चल रही हवा मंद-मंद पुरवाई में तब्दील हो चुकी थी। सामने सलाद की थाली, हाथों में जाम, दो छोटे-छोटे पैग का हल्का-हल्का शुरूर। कुछ आध्यात्मिक, दार्शनिक, और मनोवैज्ञानिक बातों के साथ-साथ बहुत-सी हंसी-मजाक की बातें। एक दूसरे के प्रति हृदय में अटूट विश्वास लिए हम दोनों, दुनिया से बेखबर बेफिक्र इन पलों को एक साथ जी रहे थे। इस तथ्य को पूरी तरह नकारने की कोशिश करते हुए कि प्यार एक ही बार होता है। उस पल यहां न तो कोई कहानी थी, न कोई किरदार, और न ही कोई राइटर। 
    सच!! पीहू ने न कोई रोक लगाई और न ही कोई वादा लिया या कसम दी, बल्कि आसान शब्दों में उसने मेरी पूरी जिंदगी को परिभाषित कर दिया था। शायद इसीलिए उसके न रहने पर मैंने मंगल से कहा था...
   "सीप टूट के बिखर गई मंगल... लेकिन उससे जो मोती निकला न, उसकी चमक ने मेरा जीवन उजालों से भर दिया... उसके मुझे वो बना दिया जो शायद मैं कभी न बन पाता। उसने अपनी कलम मुझे दे दी और कहां लिखो हमारी कहानी... कहानी नियति की... यह मुझ पर उसका क़र्ज़ है... और एक न एकदिन मुझे ये कर्ज़ चुकाना होगा मंगल..."
     "ज्ञान ! देखा तो जिंदगी हो तो इन जैसी !! बेफिक्र, न कोई टेंशन, न कोई भाग-दौड़ ....", पीछे से आते हुए सत्य की आवाज सनाई दी, "क्या बात है दोस्तों फुल एंजॉय !!!... काश मेरी भी किस्मत तुम्हारे जैसी होती। ... ब्रोकन हार्ट, बगल में मरहम लगाने के लिए एक नई गर्लफ्रेंड... सामने जाम... ये खुशनुमा ढलती शाम... आह ! क्या सीन है !! "
      फिर वह हम दोनों के सामने घुटने के बल बैठ एक हाथ दिल पर और दूसरा हाथ हमारी तरफ करते हुए बोला, "यार इस हरे-भरे दिल को भी इस महफिल में शामिल करो, कि सिर्फ ब्रोकन हार्ट ही एलाऊ हैं..."
     मैंने भी मजाक में अपने दोनों हाथ उसकी तरफ फैलाते हुए कहा, "नहीं मेरे दोस्त ! वेलकम !! ये सच है कि सोने को चमकने के पूर्व आग में तपना पड़ता है, लेकिन मेरी किस्मत की बात तुम न करो तो बेहतर है... तुम हरे-भरे ही बहुत प्यारे और चमकदार सितारे हो..."
  ज्ञान खाट में बैठा हुआ बोला, "ये क्या नौटंकी मचा रखी है ? अबे साले ! देवताओं का वरदान तुझे मिला होगा... इसे नहीं !! अपना नहीं तो कम से कम इसका तो ख्याल रखा होता...?"
    "मेरे भाई मत रोक, मुझे जी लेने दे आज। क्या पता ये पल, ये लम्हे, ये शामें कल हो न हो। यहां तक कि हम भी कल हो न हों...", मैंने किसी बूढ़े दार्शनिक की भांति कहा।
   "हां ज्ञान, अब कोई ज्ञान की बात नहीं होगी...", सत्य ने मेरी गिलास में रम भरते हुए कहा, "मै तो थक गया भाई, थोड़ा रिलेक्स होना चाहता हूँ... ", वह पीहू की गोद में सर रख लेट गया, "भाई ! तुम कुछ सुनाओ..."
    "जो हुक्म ...", मैने अदब के साथ सुनना शुरू किया।
  तेरी रातों का जीता - जागता स्वप्न हूँ मैं, 
  तेरी बेचैन फरेबी वादों की जरूरत हूँ मैं।
   "अ... हा !! क्या बात है ....", उसने शिप लेते हुए कहा। 
मैं तेरी कहानी का हिस्सा नहीं,
फिर भी तेरे होने का गुरुर हूँ मैं।

तेरी बातें, तेरा चेहरा,
न भूल पाऊंगा कभी।
ये प्यार की कशिश, 
चेहरे की ये रूमानियत।
लाख मोहब्बतें सही,
मुस्कुरा के कह देना तेरा, 
ऐसी तो कोई बात नहीं।
क्यों तुझ पर यकीन नहीं आता,
कैसे कह दूं तुझसे मोहब्बत नहीं।
जज्बात जो कभी तुझसे मिले,
अलविदा कहना आसान तो नहीं ।
   "ओ हो .... अरे पीहू ! कुछ सीखो अपने बॉयफ्रेंड से... एक अंतिम हो जाए...", सत्य रोमांटिक होते हुए बोला।
    मैने उसके हाथ से अधूरा जाम ले एक शिप लेते हुए आगे कहा...
जो गुजर रहे हैं हमारे बीच ये पल... 
उन्हें सजदे करने का मन करता है! 
मैं जानता हूँ कि तू खुद मान जाएगी,
पर क्यूं तुझे मनाने को दिल करता है।
यह भी कि तू मान जाए गर,
फिर तुझसे रूठ जाने को मन करता है।
      "देखा ज्ञान ! ये दुनिया का पहला इंसान है जो हसबैंड के सामने उसकी बीवी को फ्लर्ट कर रहा है...", सत्य ने हंसते हुए ज्ञान की तरफ देख कर कहा।
    "और बेचारा हसबैंड कुछ नहीं कर पा रहा...", ज्ञान ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, "संभल के भाई ... कहीं ऐसा ना हो कि यह पीहू को लेकर भाग जाए और तू देखता रहे..."
   "एक तो भगाई न गई मुझसे और अब इसे लेकर भागूंगा ? तू भी ज्ञान... यार कुछ तो कॉमन सेंस यूज कर लिया कर...", मैंने पीहू की तरफ इशारा करते हुए कहा।
    "इतनी भी इंसल्ट न करो बॉयफ्रेंड ! और वैसे भी तुम्हें भगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी ..", फिर वह चुटकी बजाने की असफल कोशिश करते हुए बोली, "तुम यूं एक इशारा करना बस, मैं खुद ही चल दूंगी..."
    "एक चुटकी तो बजाई न गई और भाग जाने की बात करती हो...", फिर मैने एक चुटकी बजते हुए कहा, "ये... ऐसे बजती है..."
   उसने दो-तीन बार कोशिश की लेकिन नहीं बाजी, तब उसने आंखों मारते हुए पूछा, "ऐसे तो चलेगा न..."
    उसकी इस हरकत से मुझे हंसी आ गई, "अब देख लो सत्य, कौन फ्लर्ट कर रहा है...", मैंने मासूमियत से उसकी तरफ देखते हुए कहा।
     सत्य मुझे देखकर मुस्कुराया, "यही तो जिंदगी है मेरे दोस्त। ...पीहू ! फिलहाल अभी तो घर चलना चाहिए। बाबा के पूजा का टाइम हो रहा है...", 
    "अरे हां !! लेकिन पूजा की तैयारी तुम करना मैं खाना बनाऊंगी.... अब चलो उठो मेरी गोद से... बच्चे की तरह पड़े हुए हो..."
       सत्य ने उठते हुए ज्ञान से पूछा, "तुम लोगों को यहीं रुकना है कि चलना है...?"
      "तुम दोनों जाओ ...", ज्ञान ने मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा, "हम दोनों यही रहेंगे .... क्यों, है कि सब खत्म ?"
     "है न ये जो बची है, रम अपने लिए .... एक और है...  मंगल के पास रखी है। व्हिस्की पीहू के लिए है... लेकिन आज का प्रोग्राम है क्या... ?", मैने सत्य की तरफ देखते हुए पूछा, "आज बिल्ली के गले में कौन घंटी..."
    "मैं बांधूंगी... ", पीहू ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखो... सब्जी मै घर से लाऊंगी.... रोटियां गरमा-गरम चूल्हे की...."
    "और.... पुलाव भी... वो तुम लाजवाब बनाती हो...?", मैने फरमाइश की।
     "ओके... डन... ज्ञान भैया... इन्हें ज्यादा पीने मत दीजिएगा... अब चलो सत्य.... हम लोग आते हैं..."
    दोनों चले गए। ज्ञान मेरे पास उसी जगह बैठ गया जहां कुछ देर पहले पीहू बैठी थी। अपने लिए एक पैग बनाते हुए बोला, "पीहू को तेरी इतनी फिक्र क्यों है ?"
    "मुझसे क्या पूछता है, उसी से पूछ लेता ?", मैंने उसकी तरफ देखते हए कहा।
    "बात तो सही है.... चल उसी से पूछूंगा..."
     "ये दिमाग खराब हो गया है क्या...? तू भी हद करता है। दोस्त मानती है... इसलिए फिक्र करती है। और तुझे उसकी आंखो में सत्य के लिए जो प्यार है, नहीं दिखता ? बड़ा आया पूछने वाला... चल मेरे लिए भी बना..."
    "तू खुद ही बना ले...", ज्ञान ने बॉटल मेरी तरफ खिसकाते हुए कहा, "लेकिन ज्यादा नहीं..."
    "हूं... वैसे भी... अब थक गया हूँ यार... लेकिन चलना तो पड़ेगा... और यदि रुक भी जाऊं तो ये दुनिया तो नहीं रुकेगी न...? कहीं न कहीं पीहू सच कहती है... यदि उसे भूलना आसान नहीं तो कलम ही क्यों न उठा लूं ... "
      "हां ... अब तुझे मूव ऑन करना चाहिए...", ज्ञान ने मुझे समझाते हुए कहा।
     "सच है ज्ञान ! लेकिन किसी को भूलना, भूल कर आगे बढ़ना जितना आसान समझ में आता है न, वास्तव में होता नहीं है... जिस तरह आज पीहू को अपनी जिंदगी में शामिल करके सत्य सपने देख रहा है, वैसे ही एक सपना मैंने भी देखा था। विवाह के प्रत्येक वचन में अपनी स्वीकृत देने से पूर्व जिस तरह मेरी तरफ देखती, मुझे लगता जैसे मुझसे इजाजत मांग रही हो... उसकी मां को डर था कि यदि मैं कुछ देर और उसके सामने बैठा रहा तो कहीं उनकी बेटी जज्बात की रौ में बह के बगावत न कर दें... 
    और उन्होंने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। मुझे उसके सामने से हटाकर उसी के कमरे में उसकी यादों के साथ कैद कर दिया। मैं रोता रहा, सिसकता रहा। अपने आंसुओं से उसकी ही तकिया भिगोता रहा। मुझे तकलीफ इस बात की नहीं है कि केवल मेरे सपने टूटे बल्कि तकलीफ इस बात की है कि सपने उसके भी तो टूटे। वो सपने हम दोनों के साझा सपने थे...  हम दोनों ही एक दूसरे से कभी नफरत नहीं कर पाएंगे और इसलिए दोनों के लिए मूव ऑन करना मुमकिन ही नहीं। सारी उम्र दिखावा करने की बस कोशिश करेंगे।
     रही बात पीहू कि तो सच कहता हूं तुझसे, यदि वह ऑलरेडी सत्य के साथ कमिटेड न होती तो मैं उसे खुद ही प्रपोज करता।  उससे कहता, तुम मुझे पति के रूप में नहीं हमेशा बॉयफ्रेंड के रूप में रखना। मेरी एक अच्छी दोस्त बन के मेरे साथ रहना।  हां ज्ञान ! एक पल में मैं स्वार्थी बन जाता, यदि वह ऑलरेडी कमिटेड न होती तो कहता, जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ। अब तुम ही एक वजह हो जीने की। उसके सामने घुटने के बल बैठ उसे मांगता..
   कहता, मै भटका हुआ मुसाफिर हूँ, टूटा हूं, बिखरा हूं, मुझे अपनी बाहों का सहारा दे दो। उससे कहता कि मुझे किन्ही रस्मों की जरूरत नहीं है, बस तुम मेरे पास रहो। हर सुबह खिलते हुए फूलों में, ढलती हुई शामों में, रात्रि की नीरवता में। मेरी हर खुशियों में, मेरी हर उदासियों में...
     उसके साथ जिंदगी जीता। इस समय मेरी नजर में वही एक लड़की है जो मुझे समझती है और मुझे संभाल सकती है। लेकिन अब उससे जाहिर करना मतलब उसे हर्ट करना होगा। जनता है ? तुम लोगों के आने के पहले वह मुझे यही सब समझा रही थी.... शराब मेरी कमजोरी न तो कल थी... और न ही आगे होने दूंगा। मेरी तो सबसे बड़ी कमजोरी है, मेरी अपनी भावुकता और खुद के जज्बातों के आधीन हो जाना..."
       ज्ञान ! अब इससे अधिक क्या कहूं तुझसे। कैसे बताऊं कि आज मेरे जीवन में पीहू की क्या अहमियत है, वह मेरे लिए कितना मायने रखती है। यदि बीच राह में प्यार छूट जाए तो एक निस्वार्थ रिश्ता मात्र मित्रता का होता है। वही आपको बचा सकता है। हम दोनों से बेहतर और कौन जान सकता है। नहीं तो क्या जरूरत थी तुझे मेरे पास आने की ? क्या जरूरत थी दस दिनों तक अपने सब काम-धाम छोड़ मेरे साथ रहने की ? "
     मंगल हमारे पास आते हुए बोला, "सर जी ! समेट लूं ? "
    मैने भरा हुआ जाम उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "हां समेट लो ..."
   "लेकिन ये तो आपने अपने लिए...", मंगल ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा।
    "मेरी अभी इच्छा नहीं... पीहू और सत्य को आ जाने दो... चल ज्ञान उठ...", मैने ज्ञान की पीठ ठोकते हुए कहा।
   "आज तो हमें चलना था न ? तू रुक कैसे गया ?", मैंने चलते हुए उससे पूछा।
    "यार सत्य ने ज़िद की... और गेस्ट का भी आना कैंसिल हो गया तो सोचा रुक ही लेते हैं...", ज्ञान ने मेरा बैग थाम रखा था और पीछे मंगल खाट, चटाई और दरी पकड़े हुए चला आ रहा था। 
     "तो कल चलना है ?... "
     "हां ... दोपहर तीन बजे तक निकल चलेंगे... अभी मै बाइक अंदर कर लेता हूँ..."
     मै हाथ-मुंह धो के बाहर मड़ैया के बाहर ही खाट पर कुछ रिलेक्स हो के लेट गया। 
     "तो बाबू साहिब ! किसी को भूलने आए थे, उसे भूले तो नहीं, किसी की नई यादें ले कर जा रहे हैं....?", ज्ञान मुझे छेड़ते हुए बोला। 
    "यार सर दर्द कर रहा है... और तुझे मजाक की सूझ रही है ...?", मैने सर पर हाथ फेरते हुए कहा। 
     "पीना है तो नॉन स्टॉप पीना है, न सुबह न शाम देखना है ? सर दर्द नहीं होगा तो और क्या होगा ? मेरी मान तो अपने मन के अन्तर्द्वन्द को हटा और जो भी कहना है कह दे उससे...", ज्ञान मुझे समझाते हुए बोला, "मै तेरे साथ हूँ..."
      "कह दूं ...? एक अच्छे-खासे साधारण और साफ-सुथरे संबंध को कॉम्प्लिकेटेड कर दूं ? जानते हुए कि वह तो मुझे अपना बेस्ट फ्रेंड मानती है, इतना की बॉयफ्रेंड कहने में भी कोई हिचक नहीं ? मै यह भी जानता हूँ कि शायद सत्य मेरी फीलिंग को समझेगा, मुझ पर कोई आरोप नहीं लगाएगा। लेकिन फैसला तो पीहू को ही करना होगा न ? एक दोस्त को दो-राहे पर लाकर खड़ा कर दूं ? नहीं ज्ञान ! फ्लर्ट करना, हंसी मजाक करना एक अलग बात है, लेकिन सीरियसली कुछ भी कहना गलत होगा। बेहतर है मैं अपने रास्ते जाऊं। शायद मेरी मंजिले मेरे रास्ते अलग है और उन राहों में मुझे अकेला चलना होगा ..."
      "अंतरात्मा और दिल का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है, जानता है ? न कह पाने का दर्द... और मैं नहीं चाहता कि तू यहां से अब कोई दर्द लेकर जाए। इसलिए कहता हूँ कि अपराध ही सही, लेकिन तुझसे हुआ तो है न ? तो उसे सच्चे मन से स्वीकार कर, तुझे मुक्ति मिलेगी... हो सकता है न कहने का दर्द, कह लेने के दर्द से कहीं अधिक दर्दनाक हो, तो फिर क्या करेगा ?",  फिर वह मंगल को पुकारते हुए बोला, " मंगल ! भाई इधर तो आना तुम्हारे सर जी को तुम्हारी जरूरत है ..."
     "जी सर जी... ", अगले ही पल मंगल हाजिर। 
     "बनाओ मंगल, आखरी बार तुम्हारे हाथ के जाम हो जाए, कल की रात न जाने कहां गुजरे..."
    मंगल ने तीन कुल्हड़ निकाले। 
    "क्या मंगल इतना कम ? ये साकी क्या तेरे मयखाने में शराब न रही, कम से कम पैमाना तो भर दिया होता। हमें अधूरे जाम पीने की आदत नहीं... वैसे आज की तैयारी क्या है ? पीहू बिटिया तुम्हारी कुछ कह कर गई हैं ? ", मैंने कुल्हड़ खाली करते हुए पूछा।
     "जी सर जी ! रोटियां बनेगी और पुलाव भी। और एक बात कह कर गई हैं, सर जी को कम पिलाना, हो सके तो न पिलाना...", मंगल ने धीरे से कहा ताकि ज्ञान न सुन सके। 
   "अच्छा मंगल तुझसे भी !!  तो बंद कर। क्यों पिला रहा है... चल थोड़ी सी और दे... और अपने लिए भी... चावल रख दे, तब तक वही पके। रोटियां तो बाद में बनेगी ?. तो मंगल तुम पहले ये इंतजाम करो फिर आओ। और हां सुनो थोड़ा सा कमली का भी ध्यान रखना। अकेले-अकेले नहीं ... हां ..."
     आधे घंटे बाद मंगल फिर हाजिर हुआ। मैंने कहा, "मंगल ! थोड़ा-सा सर दर्द कर रहा है। कोई इलाज है...?"
    "हां सर जी है.... मेरे पास एक आयुर्वेदिक तेल है उसी को ठोकता हूँ माथे में...", मंगल उठते हुए बोला।
  कुछ देर बाद वह तेल की सीसी लेकर हाजिर हआ और मेरे सर पर तेल ठोकते हुए बोला, "देखिएगा सर जी, बस दस मिनट में सिर दर्द गायब हो जाएगा..."
    वह धीरे धीरे सर दबाते हुए बोला, "सर जी ! हम लोगों की सुध आयेगी ?"
   "क्यों नहीं मंगल... क्यों न आएगी ? जब भी सर दर्द करेगा, कभी पीने का मन होगा... तो तुम याद आओगे...", मैने मुस्कुराते हुए कहा। 
    "क्या सर जी ! आप भी !! यही रह जाइए न... फिर देखिएगा हम लोग कितनी सेवा करते हैं...", मंगल कुछ शरमाते हुए बोला। 
     "मंगल देखो तो वो सामने सत्य आ रहा है क्या ? तुम भाग के जाओ और दो कुर्सियां ले आओ..."
   मंगल उठा और मड़ैया के अंदर से कुर्सियां निकाल बाहर खाट के नजदीक रख दी। इस बीच सत्य और पीहू नजदीक पहुंच गए, "मंगल चाचा ! ये सब्जी का टिफिन रख दो... और चावल रख दिए न ...? अरे इन्हें क्या हो गया...?"
    सत्य नजदीकी कुर्सी पर बैठता हुआ बोला, "क्यों भई क्या हो गया ? अच्छा खासा तो छोड़ के गए थे अभी !! ..."
     "कुछ नहीं यार, थोड़ा सर में दर्द था... मंगल मसाज दे रहा है, काफी आराम मिला है..."
    "क्या बॉयफ्रेंड ! तुम भी न जाने कौन-कौन से नए रोग लगा लेते हो... मंगल चाचा तुम उठो और चावल देखो .. ", वह कुर्सी को मेरे सिरहाने रख उसमें बैठते हुई बोली, "ये बताओ मेरे जाने के बाद पी कितनी...?"
    "कुछ ज्यादा नहीं, बस थोड़ी सी ... सोचा सर दर्द ठीक हो जाएगा ..."
    उसने अपने दोनों मुट्ठी में मेरे माथे के बाल समेटे और कुछ तेजी से खींचा।
   "ये क्या करती हो, दर्द हो रहा है मुझे ...", मैंने कुछ डांटते हुए कहा। 
    "तुम्हारे तो सर के पूरे बाल उखाड़ लेने चाहिए... काम ही जो ऐसा करते हो...?", उसके भी स्वर में मेरे लिए डॉट थी। उसने वही प्रक्रिया आठ-दस बार की। और मैंने महसूस किया जैसे मेरे सर का दर्द ठीक हो रहा है। सत्य में हंसते हुए कहा, "जरा संभल के ! बेचारे का बाल मत उखाड़ लेना !!"
    कुछ देर बाद मैं पूरी तरह से रिलैक्स था। मैने पीहू को थैंक्स कहा, "थैंक्स ! लेकिन मेरी इतनी सेवा मत करो गर्लफ्रेंड कि मुझे तुमसे मोहब्बत हो जाए... हो गई तो मुश्किल हो जाएगी... कहीं तुम दोनों की लव स्टोरी में ट्राइंगल न बन जाए... ?"
     "अरे भई ! ऐसा न करना !! मेरी एक ही बीबी है... मै कहां जाऊंगा...", सत्य ने एक कुल्हड़ मेरी तरफ और दूसरी पीहू को देते हुए कुछ घबराने का अभिनय करते हुए कहा।
     "हां यार तुम सही कहते हो... देखो अभी-अभी तो जरा संभले हैं और फिर बर्बाद होने की बातें करने लगे... छोड़ो यार मैने तो मज़ाक किया है...", मैने लापरवाही से कहा।
    "कोई मुझसे नहीं पूछेगा ?", पीहू ने मुझे रोकते हुए कहा। 
    "हां सत्य ! बिल्कुल सही कहा इसने... फैसला तो इसे ही करने दो...", ज्ञान उसकी बात से एग्री करते हुए बोला। 
     "अरे यार तुम मेरे दोस्त हो या दुश्मन. वेरी बैड...", सत्य ने अपनी घबराहट को हंसी में छुपाने का प्रयास करते हुए कहा।
    "यार सुन, शादी में लड़के और लड़की दोनों की मर्जी पूछी जाती है... कभी मुसलमानो की शादी नहीं देखी क्या... दोनों से पूछा जाता है, कुबूल है..?", ज्ञान ने तर्क दिया।
   ज्ञान की बात सुनकर सत्य ने अपना तर्क दिया, "हम मुसलमान थोड़ी हैं...?"
    "नहीं हैं तो मन मानी कर लेंगे...,? और यार हिन्दुस्म की बात करता है न ? उसमें तो और एक कदम आगे की व्यवस्था है... कभी स्वयंवर हिंदुओं में ही हुआ करता था। जहां लड़की को अपना वर स्वयं चुनने का अधिकार था..? देख मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदि कोई बात अच्छी है, सच्ची है, तो उसे अपना लेना चाहिए फिर चाहे वह किसी भी धर्म की या समाज की हो...", फिर ज्ञान ने पीहू की तरफ देखते हुए कहा, "तुम बोलो पीहू... आई एम विद यू..."
    पीहू ने मेरी तरफ देखा। सत्य कभी मेरी तरफ देखता तो कभी पीहू की तरफ। मेरा दिल तेजी से धड़क उठा। क्या जरूरत थी ज्ञान को बीच में कूदने की ? वह भी इतनी लंबी-चौड़ी परिभाषाओं के साथ ? क्या जरूरत थी पीहू के हाथों में वरमाला थमाने की ?कितना भी समझा लो लेकिन करेगा अपने मन की!! मैंने पीहू की तरफ देखा और उसकी आंखों में देखते हुए मन ही मन बोला, नहीं... नहीं... पीहू नहीं... ज्ञान की किसी भी बात में मत उलझना।
    तभी पीहू बोली, "ये फैसला तो मेरी नियति ने पहले ही कर दिया है तो अब मैं क्या बोलूं ज्ञान भैया, पर आपसे एक बात सच कहती हूँ, आपने जो अभी कहा न कि पीहू मैं तुम्हारे साथ हूं, उसने ध्रुव भैया की दूरी को बहुत कम कर दिया या यूं कह लीजिए मिटा दिया। थैंक यू भैया....", अंतिम के शब्द कहते-कहते हुए बहुत भावुक हो गई।
   पीहू की आंखों में आंसू आए और मैं यूं ही बैठा रहूं यह कभी नहीं हो सकता था, और न ही उस दिन हुआ ? इस बात से बेखबर की यह लम्हा, यह पल हमारी जिंदगी को निर्धारित कर सकता है, मैंने उसे गले से लगाते हुए कहा, "प्रत्येक इंसान का सच या झूठ उसकी अंतरात्मा में होता है पीहू, और जरूरी नहीं कि उसे कहा जाए... कुछ फैसले हमारी नियति निर्धारित करती हैं..."
   सत्य ने बीच में आते हुए कहा, "और वो फैसला कब का हो चुका है...  है न पीहू ? ये तुम्हारा बॉयफ्रेंड है, और मैं तो तुम्हारा हसबैंड..."
    नियति अर्थात प्रकृति जिससे संपूर्ण पृथ्वी संचालित है, और यदि इससे परे कोई दुनिया है तो फिर उसकी नियति क्या होगी ? 
   "हां सत्य, तुमने ठीक कहा, फैसला तो हो चुका है। इसलिए कहता हूँ,  इसे कभी दुख मत देना,  खुश रखना... नहीं तो उस दिन किसी नियति के नहीं मेरे गुनहगार होगे, यह हमारे प्रिय दोस्त की बहन है... मेरी दोस्त है..."
   सत्य ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "नहीं मेरे दोस्त, मैं इसे खुश रखूंगा। इसलिए नहीं कि इसने ज्ञान को ध्रुव के स्थान पर रखा, बल्कि इसलिए कि यह तुम्हारी गर्लफ्रेंड है।
    मैं सत्य के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, " थैंक यू..."
   फिर मैंने पीहू से कहा, "पीहू ! जब मैं जाऊं तो तुम्हारी आंखों में कोई आंसू नहीं होनी चाहिए.… वह क्या कहते हैं... पुष्पा ! आई हेट टियर्स..."
   और एक मिलजुली हंसी के साथ बात खत्म हो गई। नई बातों का नया दौर शुरू हुआ, दूसरी बॉटल खुल चुकी थी। तय ये हुआ कि आज पुलाव सत्य और पीहू बनायेंगे। रोटियां मंगल और कमली। सलाद मैं और ज्ञान काटेंगे। चावल पक चुका था। पुलाव में डाली जाने वाली हरी सब्जियां जैसे शिमला मिर्च, गोभी, आलू इत्यादि पहले से ही मंगल काट चुका था। सत्य और पीहू दोनों पुलाव बनाने में जुट गए। मैने मंगल से व्हिस्की की बॉटल सत्य के पास रखवा दी। अब हम और ज्ञान दोनों अकेले थे।
   "तो कह दिया न ...?", मैने  ज्ञान ने पूछा।
    उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "तेरे लिए नहीं, बल्कि दोनों के लिए कहना जरूरी था !! यदि आज मैं न कहता तो हो सकता है एकदिन वक्त पीहू से कहता, और तब वह सत्य से वो सब न कह पाती, जो आज सबके सामने कहना जरूरी था, और तूने अपने आप को सजा क्यूं दी ? दूर जाने का फैसला क्यूं लिया ?", ज्ञान ने मेरी तरफ गहरी दृष्टि से देखते हुए पूछा।
     मैंने गहरी सांस लेते हुए लापरवाही से कहा, "कभी-कभी प्यार को साबित करने के लिए, उसके और नजदीक जाने के लिए उससे दूर जाना पड़ता है... और फिर सजाएं तो मेरा मुकद्दर है मेरे दोस्त..."
     सत्य ने चूल्हे की आग को तेज करते हुए पूछा, "ओ राइटर जी ! बैठे-बैठे क्या सोचा जा रहा है ?"
     "यही कि कल गर्लफ्रेंड को अलविदा कैसे कहूंगा... उसके रोने में पाबंदी तो लगा दी लेकिन खुद को कैसे रोक पाऊंगा..."
    "तो दोनों रो लेना मेरे भाई,.. ये तो नेचुरल है.", सत्य ने दूर से ही कुछ तेज आवाज में कहा।
    मैंने अपने हाथ में पकड़े जाम को उसकी तरफ दिखाते हुए कहा, "ठीक कहा..."
    थोड़ी देर बाद सत्य हम दोनों के पास आते हुए बोला, "ज्ञान थोड़ा चल, घर तरफ चलते हैं। कुछ सामान लाना है...", फिर वह पीहू की तरफ देखता हुआ बोला, "मैं दस मिनट से आ रहा हूं। पुलाव के साथ अचार और रोटी के साथ घी अच्छा लगेगा... तब तक तुम यहां देखना..."
  मैं मंगल को आवाज़ लगाई,, " यार तब तक सलाद दो... लाओ काट लेते है."
      मंगल थाली में चाकू और सलाद के लिए सामान लेकर हाजिर हो गया।
     "मंगल चाचा ! तुम दोनों कुल्हड़ भर लो और कमली के पास जाओ मैं काट लूंगी...", पीहू ने मंगल को लगभग आदेश देते हुए कहा। मंगल चुपचाप कांच की दो गिलास मेरे बगल में रख दी। मैने उसके दोनों कुल्हड़ भरते हुए कहा, "पानी अपने हिसाब से डाल लेना... ठीक है न"
   "जी सर जी...", कहता हुआ वह चला गया।
    मैंने एक गिलास उठाई उसे पानी से अच्छी तरह से धोया फिर उसमें थोड़ी सी व्हिस्की डाली लेकिन जैसे ही पानी मिलाने के लिए मैंने जग उठाया उसने रोक दिया, "मैं मिक्स कर लूंगी..."
    "कल तो रोने के लिए पाबंदी लगा ही दी। आज तो नहीं है न ...?", उसने मेरे पास बैठते हुए पूछा।
     मैंने कोई वाद-विवाद नहीं किया। पानी का जग और व्हिस्की की गिलास दोनों ही उसकी तरफ खिसका दिया। पहले तो उसने जग उठाया लेकिन कुछ सोच कर दोबारा रख दिया। फिर अगले ही पल उसने एक सांस में गिलास खाली कर दी। जाम खत्म होते ही उसने बहुत ही कड़वा सा मुंह बनाया और अपना गला पकड़ कर अपना सिर अपनी ही गोद में रख लिया। मैंने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा, "नीट पीने की क्या जरूरत थी.... रिलेक्स, इट्स ओक..."
      "नो, ....नो ....नो ... इट्स नॉट ओके !!", वह मुझे डांटते हुए पहले से अपेक्षाकृत तेज आवाज में बोली, "इट्स नॉट ओके ... इट्स नॉट ओके", फिर उसने मेरी बाएं हाथ की हथेली अपने दोनों हथेली में ले कर फिर अपना चेहरा अपनी गोद में उसी तरह रख लिया। उसका चेहरा उसकी गोद में। उसका क्रोध तो शांत हो गया किंतु जो करुणा जागी वह उसे रुलाने के लिए काफी थी। उसने सुबकते हुए आगे कहना शुरू किया, "तुमने सुसाइड करने की कोशिश की... इट्स नॉट ओके। तुम मर सकते थे... इट्स नॉट ओके। फिर हम नहीं मिलते... इट्स नॉट ओके। आज तुम मेरे पास नहीं बैठे होते... इट्स नॉट ओके। और आज फिर अपने आप को मार के जा रहे हो... इट्स नॉट ओके। तुमने यह सब मुझसे छुपाया ... इट्स नॉट ओके। तुम कल चले जाओगे... इट्स नॉट ओके। और मैं जानती हूं कि फिर तुम कभी यहां आने की कोशिश नही करोगे... इट्स नॉट ओके। कल के बाद मैं तुम्हें फिर कभी नहीं देख पाऊंगी... इट्स नॉट ओके... और तुम कहते हो इट्स ओके !! .…. व्हाय... टेल मी व्हाय ?तुम एक नंबर के झूठे इंसान हो। इतने कि तुम किसी की आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोल सकते हो ! तुम किसी को भी धोखा दे सकते हो... और मुझसे कहते हो, इट्स ओके ? तुम्हारे लिए किसी के जज्बातों की कोई अहमियत नहीं। तुम निहायत ही खुदगर्ज इंसान हो जो सिर्फ अपनी जिंदगी जीता है, और मुझसे कहता है, इट्स ओके...!!! मैं इनकार करती हूँ,.. इट्स नॉट ओके।
     मैंने अपना सर झुकाते हुए कहा, "हां पीहू... तुम सच कहती हो... इट्स नॉट ओके...जब इल्जाम सच हों तब उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए...मैं तुमसे क्या कहता पीहू, क्या बताता तुम्हे ? अब जबकि खुद मुझे वह सब कुछ एक सपना-सा नजर आता है। इस जीवन में तुम लोगों से मिलना लिखा था और भी बहुत कुछ लिखा होगा जो आगे आएगा, जिसे मैं आज नहीं जानता। लेकिन इतना जरुर जानता हूं कि आज जो पल जो लम्हे गुजर रहे हैं, वो कभी दोबारा नहीं आएंगे। अब यह हमारे ऊपर है कि हम उन्हें हंसते-मुस्कुराते जीना चाहते हैं या फिर आंखों में आंसू लिए ? कल तो हमें रोना ही है। तुम क्या समझती हो तुमसे जुदा होना मेरे लिए आसान है, नहीं होगा, फिर भी जाना तो होगा न ? कुदरत ने जिस काम के लिए हम दोनों को एक एकदूसरे से मिलाया, शायद वह काम अब पूरा हुआ। अब जुदा होना ही सही होगा..",
     मैं कहता जा रहा था, वह सुनती जा रही थी। और उसके कुछ आंसू उसकी हथेली से होते हुए मेरी हथेली को भिगो गए। मैंने उसे डांटा, ,"पीहू तुम मुझे कमजोर कर रही हो... वादा करो मेरे जाते समय तुम रोओगी नहीं..."
  "वादा !! करते नहीं हो लेकिन लेते बहुत हो...", उसने कहा। अपने प्रिय के गम में जब आंसू सूख जाते हैं, कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करें तब इंसान वह करता है जिसमें मन बहल जाए... थोड़ी देर के लिए ही सही जिंदगी की जी ली जाए...
      उसने दो फुल पैग बनाए।  मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा "चीयर्स, गुजरते हुए इन लम्हों के नाम, गुजरती हुई इस रात के नाम, आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होती इस जिंदगी, के नाम... शैल और पीहू के नाम..."
    मैने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं, चीयर्स, पीहू और शैल के नाम...लेडी फर्स्ट.. प्लीज करेक्ट इट..."
    उसने भी मुस्कुराते हुए कहा, "क्या फर्क पड़ता है यार? कौन पहले, कौन बाद में। रहेंगे तो दोनों ही न ?"
    "मैं जानता हूँ पीहू कि यहां रुक जाना मेरी नियति नहीं, फिर भी पता नहीं क्यों यहीं रुक जाने को मन करता है। तुम्हारे ही पास ठहर जाने को ये दिल कहता है। ऐसा क्यूं होता है कि कभी-कभी हम अपने जज्बातों के इतने आधीन हो जाते हैं कि दिमाग के द्वारा लिए गए सभी फैसले हमे गलत नजर आते हैं, इस दिल को नमंजूर होने लगते हैं...मेरे हृदय से बार-बार यह आवाज क्यों आ रही है कि मैं कह दूं ज्ञान से कि मुझे अब कही नहीं जाना है। मुझे यहीं रहने दो मेरी पीहू के पास... मैं भी ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ, गुजारना नहीं..."
   "ये रुको ! क्या कहा तुमने अभी... मेरी पीहू !!..", उसने प्यार से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "हां कह दिया न... लेकिन यह भी कहा न, कभी-कभी इंसान अपने जज्बातों के अधीन हो जाता है... सॉरी !", मेरे आंसू उसे दिखाई न दे इसलिए मैंने चेहरा दूसरी तरफ करते हुए कहा। 
   "सॉरी !!  जब से आए हो तो देख रही हूँ मैं, कई बार बोल चुके हो इस शब्द को... लेकिन जब अपने मन और हृदय की बात किसी से कही जाए तब नहीं बोलना चाहिए... यह गलत है..."
      फिर उसने मेरा चेहरा अपनी हथेली से अपनी तरफ करते हुए कहा, "मैं जानती हूँ और समझती भी हूँ  कि बेवजह कोई रोता नहीं किसी के लिए... "
    "नियति पीहू नियति ! तुम्हारी ? सत्य की ? मेरी ? या फिर हम तीनों की ? कौन जाने किसकी ? तीन अजनबी एक दूसरे से मिले... एक दूसरे को जाना-समझा... एक साथ वक्त बिताया लेकिन..."
     "लेकिन... क्या ?", उसने पूछा। 
      "यही कि अब एक को जाना पड़ेगा और शायद यह जरूरी भी है। जानती हो पीहू ! अब तक भागता ही रहा हूँ मैं... कभी यादों से... कभी खुद से... कभी अपनों से... कभी यार-दोस्तों से... तो कभी रिश्तों से। लेकिन पता नहीं क्यूं अब और भागने को जी नहीं करता। कभी-कभी सोचता था मेरी और सत्य की किस्मत एक जैसी ही है। दोनों का प्यार पास होकर भी बहुत दूर है। पर अब सोचता हूँ कि सत्य का प्यार तो उसके पास ही है न। ठीक है आज कोई रिश्ता नहीं है, आई मीन सामाजिक तौर पर। तुम लोग का संबंध भी फिजिकल नहीं है, लेकिन तुम दोनों एकदूसरे के साथ हो, पास हो। भावनाओं का संबंध तो है न। तुम उसके सुख-दुःख में उसके पास हो, वह तुम्हारे पास है। 
    और मैं ?  होकर भी किसी का नहीं हूँ... यह मेरी नियति है। और शायद यही वजह है कि मैं अब हर पल, हर लम्हे को जीता हूँ... कभी होश में तो कभी बेखुदी में। तुम सोचती होगी कि मैं तुमसे यह सब क्यों कह रहा हूँ... है न ?"
    "नहीं ... पर तुम बता दो, अब मैं भी जानना चाहूंगी ..?", उसने मेरी तरफ मासूमियत से देखते हुए पूछा।
   "दो वजह से। पहली, जो आज हमारे पास सहजता से उपलब्ध है उसकी कीमत हमें आज समझ में नहीं आती, लेकिन उसके दूर चले जाने पर उसकी कीमत समझ में आती है। मैं अभी तक एक संभावना पर टिका हुआ था कि वह मेरी है, कहां जाएगी मुझे छोड़कर। एक न एक दिन वह मेरे पास आएगी... एक आस थी तो उसकी कमी इतनी महसूस नहीं हुई। लेकिन जब उसे अपनी इन आंखों से पराया होता हुआ देख लिया तो आज उसकी कीमत समझ में आती है। यदि वह नहीं आ सकती थी, उसने एक कठोर फैसला लिया भी था तो भी, तो मैं तो उसके पास जा सकता था न ? मैंने एक बार भी उससे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की ? यदि वह कमजोर पड़ गई थी तो मुझे उसका आत्मबल बनना था, न कि उसे यूं ही बीच में छोड़ देना चाहिए था..."
     "और दूसरी बात...?", उसकी नज़रें अभी भी मेरे चेहरे पर थी। 
    "दूसरी बात खुद अपने लिए कह रहा हूं। पूरी ईमानदारी के साथ कह रहा हूं। जब हमें किसी से मोहब्बत होती है, प्यार हो जाता है, तो वास्तव में प्यार उसकी पर्सनेलिटी, उसकी ब्यूटीनेस, उसके बिहेवियर, उसकी हैबिट्स इन सभी से होता है। इसलिए तुमसे मिलने के बाद मैं अब यह मानता हूं कि प्यार जीवन में एक ही बार, एक ही व्यक्ति से नहीं होता .... ऊं हु... कोई और दूसरा क्वेश्चन मत करना प्लीज .... यहां बात लॉयल्टी कि भी नहीं है। जब वह व्यक्ति आपके जीवन में हो ही ना तो फिर कैसी लॉयल्टी ?,"
    "यह तो अच्छी बात है, इसी को तो मूव ऑन करना कहते हैं न ?"
    "नहीं ! किसी के प्यार को भूलकर उससे नफरत करना और फिर उससे दूर चले जाना इसे मूव ऑन करना कहते हैं। यदि मुझे इस जीवन में मेरी पसंद की पर्सनेलिटी, ब्यूटीनेस, बिहेवियर, हैबिट्स किसी में मिली तो मैं अपनी पूरी इंटेंसिटी के साथ उससे प्यार करूंगा, और इसके लिए मुझे किसी को भूलना जरूरी नहीं... लेकिन हां मुझे उसकी कोई कमी भी महसूस नहीं होगी..."
    "तो फिर जो लोग कहते हैं कि प्यार एक ही बार होता है... ?"
    "मेरी समझ से गलत है... और इसका प्रमाण मेरे पास है... और शायद इसीलिए मैं तुम्हारी और सत्य की कहानी नहीं लिख पाऊंगा.... "
    "वो क्यों..?", उसने पूछा।
   "वो इसलिए कि मेरी जिंदगी के अनुभव ने मुझे बता दिया है कि प्यार एक एहसास है। इसे किसी व्यक्ति विशेष से नहीं जोड़ना चाहिए। यह किसी भी ऐसे व्यक्ति से हो सकता है जिसका व्यक्तित्व, सुंदरता, व्यवहार, आदतें आपको पसंद हों। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह विवाहित है या अविवाहित, किसी के साथ कमिटेड है या नहीं। और शायद इसीलिए इसका किसी वफ़ादारी से भी कोई संबंध नहीं है। अगर आप किसी से प्यार महसूस करते हैं तो फिर करते हैं,  इसमें कौन सी बड़ी बात है। यह आपकी अंतरात्मा की पसंद-नापसंद का सवाल है, फिर इसकी चिंता क्यों करें कि कौन क्या सोचेगा..."
    उसकी खामोश और स्थिर निगाहें अभी भी मेरे चेहरे में थी। मैने चुटकी बजाते हुए पूछा, "मेरी बातों से मुझे जज कर रही हो ...?"
    "हां भी और ... नहीं भी ! कितनी पर्सनालिटी एक साथ जीते हो तुम !! कभी बच्चों की तरह मेरे साथ हंसते हो। तो कभी बेपरवाह इंसान की तरह शराब में डूब जाते हो, फिर तुम्हे किसी की फिक्र नहीं ? तो कभी एक दिलकश आशिक की तरह बातें करते हो, मुझे फ्लर्ट करते हो ? तो कभी मुझे रुलाते हो, खुद भी रोते हो ? तो कभी अपनी उम्र से कहीं अधिक मैच्योरिटी की बातें करते हो ? आखिर तुम हो कौन?" 
     "जो भी हूँ तुम्हारा हूँ...  बॉयफ्रेंड ... मन लो या दोस्त  ? और रही बात मैच्योरिटी की तो वह तुमसे ही ज्यादा मिली। याद है तुमने आध्यात्मिक प्रेम की बात की थी ...?"
     "हूँ... याद है, एक ऐसा प्रेम जो फूल से नहीं उसकी खुशबू से होता है...?"
    "एग्जेक्टली ! फूलों की खुशबू,  सूरज की गर्मी, चंद्रमा की शीतलता, दीप का उजाला, ये सब एक एहसास ही तो होते हैं... अच्छा बहुत हो गई आध्यात्मिक और दार्शनिक बातें, अब एक भालू सुनो... तो गौर..."
    "व्हाट!! भालू...?", उसने आश्चर्य से पूछा, "एक मिनिट, ये भालू सुनने की चीज है...?"
   "हां यार बिल्कुल ... शेर तो सभी सुनते हैं ...", मैने भोलेपन और कुछ लापहरवाही से कहा, "लेकिन तुम भालू सुनो..."
   वह जोर से हंसी थी, "माय गॉड ... भालू !! हु... तो सुनाओ ... इरशाद ....
     मैने शराब से भरा प्याला उसकी तरफ बढ़ाते हुए सुनाया....
     साकी अभी तो अधूरा जाम बाकी है,
     तन्हा ज़िंदगी की ये शाम बाकी है।।
     "वह ... वाह क्या बात है ...", सत्य ने पीछे से आते हुए कहा "भाई एक बार फिर से... अभी हमने अच्छे से गौर नहीं फरमाया..."
     सत्य और ज्ञान सामने कुर्सी में बैठ गए। सत्य ने मंगल को पुकारा, "मंगल ! आओ भाई, ये झोला किनारे रख दो, और तुम भी महफिल में शामिल हो जाओ और कमली क्या कर रही है ? कमली पुलाव जलना नहीं चाहिए, चलाते रहना ..."
    मंगल में आज्ञा का पालन किया। सभी के लिए जाम बना। कमली का उसके पास पहुंचा दिया गया। फिर सत्य ने मुझसे कहा, "हां तो शायर भाई... जाम भी है, साकी भी है, मौसम भी है, तो इरशाद की जाए..."
     "बिल्कुल हो जाए... ", मैने एक शिप लेते हुए कहा,
साकी अभी तो अधूरा जाम बाकी है,
तन्हा ज़िंदगी की ये शाम बाकी है।
तू डाल मेरे पैमाने में थोड़ी-सी और,
अभी मयखाने में शराब बाकी है।
अभी दिख रहा है ये ज़माना कुछ और
पिला नज़र से अभी तो होश बाकी है।
   "एक मिनिट.. ", पीहू बैग से डायरी निकलते हुए बोली, "मुझे पहले लिखने दो..."
   मैने सत्य को कुर्सी से उठ कर अपनी जगह आने का इशारा किया। मै कुर्सी में बैठते हुए बोला, "मंगल तुम्हारे इस सलाद से काम नहीं चलने वाल, जाओ दो प्लेट में पुलाव भी लेते आओ..."
     मंगल ने दो प्लेट में पुलाव और चम्मच ला के रख दिया। जब पीहू मेरी डायरी में लिख के फुर्सत हो गई तो सत्य ने उसके मुंह में एक चम्मच पुलाव डालते हुए पूछा, "टेस्ट करो कैसा बना है...?"
    "ये मिस्टर ! बनाया मैने है, टेस्ट तुम करो और बताओ कैसा बना है... ?", उसने हंसते हुए कहा।
    सत्य ने टेस्ट किया, "वाह !! क्या बात है... यार पीहू तुम्हारा तो हाथ चूमने का मन करता है..."
   "तो रोका किसने है...", ज्ञान पीहू की तरफ इशारा करते हुए आगे बोला, "बेगम साहिबा पास ही हैं, बादशाह हसरत पूरी करें..."
     इसी के साथ पीहू ने बड़ी नजाकत से अपना हाथ सत्य के सामने कर दिया।
   "आई ऑब्जेक्ट माय लॉर्ड ! ", मैने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा, "वाइफ के बॉयफ्रेंड के सामने एक हसबैंड को इसकी इजाजत नहीं होनी चाहिए..."
    ज्ञान ने किसी जज की भांति अभिनय किया "ऑब्जेक्शन ओवररूल्ड..."
   इतना सुनते ही सत्य ने पीहू का हाथ चूम लिया। मैने ज्ञान की तरफ देखते हुए कहा, " आई हर्टेड माय लॉर्ड..."
     उसने मेरे कुल्हड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा, "दो घूट और..."
     "या रब! एक आशिक के कहर से इनको बचाना, अब मेरी शायरी में वो दर्द पैदा कर कि ये महफ़िल आंसुओं में डूब जाए ... "
तू भी चाहती है जुदा होना पर तू कहेगी नहीं, 
तू निभा अपनी वफाएं हम बेवफा ही सही...
तू अपनी मोहब्बतों की कीमत तो मांगेगी नहीं,
जो अजनबी बन गए हम मुझे लौटा तो सही।
मैं जानता हूँ कि तू मुझसे कुछ कहेगी नहीं,
ज़रा देख मेरी तरफ मैं तुझे पढ़ तो लूं सही।
जा खत्म हुई आशिकी कोई शिकवा नहीं,
तू निभा अपनी वफाएं हम बेवफा ही सही...
    ज्ञान उपहास से बोला, "बेटा तुम्हारी इस शायरी से तो आंखों में आंसू तो आए नहीं, कुछ और ट्राई करो.…"
    "ये बेदर्द जमाना क्या जानेगा आशिक का हाल, जब उसकी महबूबा ने ही छोड़ दिया बदहाल ...", चेहरे में भरपूर मायूसी लाने की कोशिश करते हुए मैंने आगे कहा, "ये दुनिया ... ये महफ़िल... मेरे काम की नहीं...  इंजॉय करो मैं अभी आया..."
    मै कुर्सी से उठ कर एक तरफ चला तो पीछे से पीहू ने मजाकिया लहजे में कहा, "मैं भी आऊं क्या...?"
   फिर पीछे से सभी की हंसी सुनाई दी, मैंने भी पलटते हुए बड़ी नजाकत से कहा, "जरूर बेगम साहिबा ! बादशाह ने तो अपनी हसरत पूरी कर ली अब आप ही पीछे क्यूं रहें..."
    महफिल फिर ठहाकों से गूंज गई।
    मिलियंस वाट का नाइट बल्ब आसमान में धीरे-धीरे अपना सफर तय कर रहा था। उसकी दूधिया शांत रोशनी में मंद-मंद बहती शीतल हवा में इस कहानी के राइटर ने महज तीस-चालीस कदम की दूरी से पीहू और सत्य को एक साथ एक ही चारपाई पर बैठे हुए देखा। उसकी स्मृतियों में पांच वर्ष पूर्व सितारों से भरे आसमान के नीचे इसी तरह श्वेत स्निग्धा ज्योत्सना में अपने गांव के घर के आंगन में बैठे हुए दो टीनएजर्स नजर आये। उस दिन भी कुछ इसी तरह की रात थी...
      खुले स्वच्छ आकाश में अपनी निर्मल दूधिया चांदनी बिखेरता हुआ पूर्ण चंद्रमा हल्की-हल्की ठंडी हवा, झिलमिल सितारों ने एक रोमांटिक कहानी की पृष्ठभूमि तैयार की थी। एक ऐसा रंगमंच सजा जिसमें दो किरदार अपने जीवन के हसीन लम्हों को एक साथ जी कर जुदा हो गए। एक ऐसी अनकही-सी कहानी की शुरुआत हुई जिसकी परिणिति सजी हुई बारात और एक विवाह मंडप में चंद रस्मों, रिवाजों, मंत्रों और सात वचनों से हुई। एक अपनी मंजिल को चली, और दूसरा ? कभी दोस्तों के कंधों का सहारा लेता हुआ, अपनों के दुख-दर्द को महसूस करता हआ, उनकी खुशी में शामिल होता है, तो कभी खुद को शराब के नशे में डुबोता हुआ आज भी कहीं भटक रहा है। 
     मैने हरी घास में बैठते हुए ज्ञान को इशारा किया। वह मेरा कुल्हड़ और पुलाव का प्लेट ले कर मेरे पास आया, "जब वहां सब इंतजाम था तो यहां क्यों ?"
     "प्राइवेसी, ... मेरी जान प्राइवेसी ? दिन भर तो सत्य अपने काम में व्यस्त था, अब इस सुहानी रात में उसे पीहू से कुछ रोमांटिक बातें कर लेने दे यार ! ", मै पुलाव खाते हुए बोला।
    "अच्छा ! तो कुर्बानी दी जा रही है ... तो चल चीयर्स...", ज्ञान ने हंसते हुए कहां।
    "हां यही समझ ले ! आफ्टरऑल शी इज माय गर्लफ्रेंड... चीयर्स...", मैने भी उसकी हंसी का साथ दिया। 
    हम लोगों को यूं हंसते देख पीहू ने कहां, "मुझसे डिस्टेंस बॉयफ्रेंड ! .... हु ? कौन से चुटकुले सुनाए जा रहे हैं ?"
    "अरे! कुछ नहीं ! तुम लोग लगे रहो... वैसे भी वेजिटेरियन नॉट अलाउड हेयर...", हम फिर हंस पड़े।
     "यार कल तो चले ही जाओगे... तब तक तो साथ रह लो...", सत्य ने शिकायत की। 
   "बस एक मिनिट अभी आया...", फिर मैंने ज्ञान से कहा, "चल जल्दी खत्म कर, बादशाह का फरमान जारी हो चुका है... तामील न हुआ तो कहीं सजा-ए-मौत का हुक्म जारी न हो जाए...", एक बार फिर हम दोनों जोर से हंसे।
   कुछ ही देर में हम दोनों अपनी-अपनी कुर्सी में बैठे थे। सत्य ने कहा, "ज्ञान आज इस राइटर की कहानी सुनाओ यार ? तूने बस मुझे उड़ते-उड़ते बताई है... तुझे तो हॉस्टल में डिटेल में बताई होगी न ? जरा हम भी तो सुने... क्यों ?"
     "ऑब्जेक्शन माय लॉर्ड ! ", मैने सख्त प्रतिरोध किया, "इट्स माई पर्सनल लाइफ। नो वन हेज राइट टू लिसन टू इट। दिस ब्यूटीफुल एंड रोमांटिक नाइट शुड नॉट बी वेस्टेड इन लिसनिंग टू द स्टोरी ऑफ टू इनोसेंट टीनएजर्स..."  
    ज्ञान ने फिर से जज का रोल निभाया, "ऑब्जेक्शन एक्सेप्टेड .. ! ओनली रोमांटिक थिंग्स आर अलाउड... प्लीज प्रोसीड "
    "थैंक्स यू मी लार्ड...", मेरे चेहरे में विजयी मुस्कान थी, "किंतु बादशाह सलामत निराश न हों, उनकी बेगम साहिबा ने कल रात को हॉनरेबल जज साहब से पूरी स्टोरी जान ली है। कृपया वे तन्हाई में उनसे सुन लें..."
   "ओके ...", सत्य ने सर झुकाते हुए कहा, "तो हमारी पीहू की सुंदरता के बारे में कुछ हो जाए ... एक नए अंदाज में ... क्यूं ?"
    "तो शुरुआत तुम्हीं करो सत्य ...", मैने कहा, "पीहू के चेहरे को ध्यान से देखो और किसी एक अंग मेरा मतलब आईज, नोज, लिप्स, चिक्स, हेयर, ईयर किसी एक के बारे में विद रीजन जो तम्हें सबसे अधिक पसंद हो उसके बारे में कहो ?"
    सत्य ने पीहू को ध्यान से देखा, "जब पहली बार इसे नजदीक से देखा तो मेरे ख्याल से नोज, आई लाइक सो मच। एंड रीजन... ये कि पूरे चेहरे की सुंदरता इसी पर डिपेंड करती है, जो चेहरे को और आकर्षक बनाती है... अब तुम बताओ ?"
    "आई फूली एग्री विद यू ... ये तो तुमने सही कहा, चेहरे का यही एक पार्ट है जो ईश्वर किसी-किसी को सुंदर देता है... अब मुझसे पूछा है तो मुझे इसकी झील से भी अधिक गहरी बादामी आँखें पसंद हैं, और इतनी पसंद हैं कि इनमें कूद जाने का मन करता है ... वो भी बिना सेफ्टी किट के...", दिल फेक आशिक बनते हुए मैने कहा।
     "सम्हाल के भाई, तैरना तो आता है न ? ...", सत्य ने हंसते हुए कहा।
    "कौन कमबख्त है जो इनमें तैरने के लिए कूदेगा? मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों में डूब जाऊं... मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों को एक नया स्वप्न दे सकूं... मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों को अपनी सूरत दे सकूं... मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों में हमेशा हमेशा के लिए कैद हो सकू.... मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों में मेरी सूरत से सिवा किसी और की सूरत न दिखाई दे...  मै तो इसलिए कूदूंगा कि इन आँखों में..."
     "रुक जा भाई, रुक जा।  'उसकी' शादी हुई है, वो मरी नहीं है ? इस दुनियां में अभी भी है, अपना न सही इस पीहू का तो ख्याल कर। इसे जिंदा रखना है मेरे भाई !!..", ज्ञान ने मुझे रोकते हुए संजीदगी का भरपूर अभिनय करते हुए कहा। सत्य और पीहू ठहाका मार के हंसे।
    "ओ मंगल ! अपने मून क्लॉक को देख के बता तो टाइम कितना हुआ होगा ?", मैने अपना कुल्हड़ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
     उसने कुल्हड़ भरी और फिर चंद्रमा की तरफ देखते हुए कहा, "सर जी नौ बज गए होंगे ..."
   "आर्यभट्ट के बाद तू ही सबसे बड़ा गणितज्ञ और खगोलशास्त्री है... देखा सत्य तुम्हारी ये रिस्टवॉच जो काम करती है वहीं काम मंगल के लिए ये चंदू...!! लेकिन मंगल एक बात बताओ ? ... अंधियारी पाख में कैसे पता लगते हो ? "
    "तारों को देख कर सर जी..", मंगल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
     "गुड ... वेरी गुड ...", फिर मैने आधी से अधिक कुल्हड़ एक सांस में खाली करते हुए ज्ञान से बोला, " हां तो मिस्टर ज्ञान प्रकाश !  आप क्या कह रहे थे... हूं ... ? सुना न नौ बज गए ? वहां डिनर चल रहा होगा... फिर ... थोड़ा सा हसी-मजाक होगा ... फिर आई लव यू ... आई लव यू टू होगा .. मेरी जान मुझे कितना प्यार करते हो या करती हो ... वगैरह-वगैरह... लेकिन फिर...? मैं बताऊं... रूक्मणी ! ....रुक्मिणी !! ... शादी के बाद क्या-क्या हुआ... कौन जीता कौन हारा... खिड़की से देखो जरा...."
    "घटिया इंसान ...", ज्ञान ने ज़ोर से पेरी पीठ में मुक्का मारते हुए आगे कहा, "कैसी सोच है तेरी... "
    "आप ठीक कहते है ज्ञान भैया ...", पीहू ने ज्ञान का साथ देते हुए कहा, "वेरी चीप... ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए..."
    "हाय मार डाला इस कमीनें ने लेकिन पीहू ! ", मैने आश्चर्य से कहा, "तुम से ये उम्मीद न थी..."
    "नहीं इस बात में मै तुम्हारा साथ नहीं दे सकती ! कभी नहीं ...", पीहू ने लगभग डांटते हुए मुझसे कहा, "जो गलत है तो फिर गलत है..."
    "मेरा मतलब नहीं समझ रहे हो तुम लोग...", मैने सफाई पेश की, "मै कहना चाहता हूँ कि यदि ऐसा होता है तो बुरा क्या है ? कोई कब तक रोएगा यार किसी को याद कर के ? जीवन पथ पर आगे तो बढ़ेगा न ? किसी न किसी पल में सब कुछ भूल कर रिलैक्स होना चाहेगा, अपना फर्ज निभाना चाहेगा ? मै कहां कह रहा हूँ कि ये सब गलत है, नहीं होना चाहिए ? कल को यदि मैं शादी करूंगा तो यही सब मै भी तो करूंगा न ? लेकिन उसे लेकर जो सपने मैने देखे उनका क्या ?... तो क्या बुरा हुआ कि मैने पीहू की आंखो की तारीफ की ? न पीहू, फ्लर्ट नहीं किया तुम्हे, बल्कि सच कहा है। तुम्हारी आँखें सुंदर हैं तो हैं, मै कहूं या न कहूं। और फिर आंखे ही क्यों पूरा व्यक्तित्व ही खूबसूरत है ? यदि मैं पीहू के व्यक्तित्व और उसकी सुंदरता से प्रभावित हूँ... और कुछ देर के लिए यह भी मान लो मुझे पीहू से प्यार हो गया है तो भी, उसे या फिर सत्य को पीहू और मेरी जान लेने की क्या जरूरत है... बताओ मुझे ? हां सत्य तुम कहो ? क्या है ?"
     "बात तो सच है...", सत्य ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, "हम भावनात्मक रूप से, रिश्तों से, संबंधों से एक दूसरे से जुड़े जरूर रहते हैं, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हम सभी एक इंडिविजुअल हैं। हमारी व्यक्तिगत पसंद या नापसंद हो सकती है... बस रिश्तों में दूरियां न हो..."
     "नहीं सत्य प्रश्न ये नहीं है कि कौन किससे दूर होता है ? यहां प्रश्न सेल्फ एक्सेप्टेंस का है ? क्या हम खुद स्वीकार कर पाते है ? नहीं ? हम बेवफा कहलाए जाने के डर से इतनी वफाएं निभाते चले जाते हैं कि खुद अपनी जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं ? लेकिन यदि मैं स्वीकार करता हूँ तो इसमें किसी को क्या एतराज ? उससे मोहब्बत हुई तो स्वीकार किया, किसी और से होगी तो भी करूंगा। फिर यह सामने वाले के ऊपर है कि वह स्वीकार करता है या नहीं... इससे मेरी मोहब्बत में कोई फर्क नहीं पड़ता..."
    पीहू ने कहा, "शिकायतें प्यार का ही एक हिस्सा है, तुम उसे डॉट रहे हो, बुरा भला कह रहे हो लेकिन दर्द से आंखे तुम्हारी ही भर रही हैं... मै तो ये सोचती हूँ कि तुम दोनों से ऐसा कौन सा गुनाह हो गया कि इतनी बड़ी सजा मिली...?"
      मैने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, "कुछ नहीं पीहू !  गुनहगार होते तो अच्छा था, बेगुनाह रह गए... शायद यही गुनाह हो गया हम दोनों से... वो कौन-सा गीत है...? हां याद आया... चाहा था बनूं प्यार की राहों का देवता... मुझको बना दिया है गुनाहों का देवता। इसीलिए मेरे जीवन का ये सच दोस्तों में मैने सिर्फ ज्ञान से शेयर किया है, और तुम से मैं हर बात छुपाना चाह था। मै यहां कौन-सा हमेशा के लिए रुकने आया था। एक दिन तो जाना ही है न ? और कहीं एक पल के लिए तुम ये सोच लेती कि सहानुभूति पाने के लिए या तुम्हारा ध्यान अपनी तरफ लाने के लिए ये मैं कोई झूठी कहानी सुना रहा हूँ... तो मेरी क्या वैल्यू रह जाती... ? इसलिए जब दूसरे दिन तुमने पूछा था कि तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है जो तुम्हें शराब पीने से रोके... तो समझ में नहीं आया कि मैं क्या कहूं... यह कहूं कि वो मुझे छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए किसी और की हो गई ? फिर बात उठती... कौन थी... क्या हुआ... क्यों छोड़ा ? क्या-क्या बताता। इसलिए बात को खत्म करने के लिए कह दिया कि तुम हो न गर्लफ्रेंड जो रोक रही हो..."
   "इतना सब दिल में लिए तुम जिंदगी जी रहे हो ? वो भी सिर्फ तेईस साल की उम्र में !! सुन के बहुत दुख हुआ यार ...", सत्य ने पूरी सहानुभूति रखते हुए कहा।
    "नहीं सत्य ये कोई बड़ी बात नहीं है ? इससे भी कहीं ज्यादा बड़े दर्द को दिल में लिए लोग जी रहे हैं।अब तो मैं यही चाहूंगा कि वह खुश रहे, जो सपने हमने एक साथ देखे थे वो सपने हमसे जुदा ही सही लेकिन पूरे हों... चीयर्स यारों अब इतना सेड-सेड न हो जाओ, इट्स ओके...दुनिया है... होता है... मंगल तू क्या कर रहा है भई... बना इन लोगों के लिए भी... इन्होंने मरे कुत्ते थोड़े न घसीटे हैं..."
    "चीयर्स तो होगी मिस्टर राइटर ...", पीहू ने कहा, "बट इट्स नॉट ओके..."
  "अब ज्ञान की बारी ..!!", मैने ज्ञान की तरफ देखते हुए कहा।
     "मै तो इनका लक्ष्मण हूँ, सीता मैया के चरण के सिवा और कहीं नजर जाती ही नहीं...", ज्ञान ने दोनों हाथ जोड़ पीहू को प्रणाम करते हुए कहा, इसके साथ ही जो ठहाके गूंजे तो पूरी बगिया हिल गई।
    इसी बीच सत्य बोला, "बहुत हुई फिलासफी। गेम को आगे बढ़ते हैं। तो मान लो राइटर कि तुम हम दोनों पर एक रोमांटिक कहानी लिख रहे हो और तुम्हे मेरी पीहू से प्यार हो गया... जस्ट एश्यूम। लेकिन तुम्हें यह नहीं मालूम कि इसे तुमसे है कि नहीं, और तुम अपनी फिलिंग्स पहली बार इसे लिख कर देना चाहते हो, तो क्या लिखोगे ? यह रही तुम्हारी पेन और डायरी अब लिखो और खुद को प्रूफ करो कि तुम एक राइटर हो ! तुम्हारे पास 15 मिनट है, ठीक है ?"
    "हां ठीक है, लेकिन एक शर्त के साथ कि इससे तुम दोनों के बीच के संबंध में कोई फर्क नहीं आएगा... तुम कभी भी और किन्हीं भी परिस्थितियों में हमे जज नहीं करोगे.. और यदि करोगे तो कला कौआ काट खाए... बोलो मंजूर ?.", मैने खाली कुल्हड़ मंगल की तरफ बढ़ाते हुए उसे भरने का इशारा किया।
   "वादा, बिल्कुल कोई फर्क नहीं आएगा...", सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा।
   "तो फिर ठीक है, चलो पीहू तुम भी क्या याद करोगी कि कोई था जिसने हॉफ बॉटल रम पीने के बाद तुम्हें प्रेम पत्र लिखा था... झूठा ही सही ? मंगल क्या कर रहा है, भर जल्दी !! एक राइटर को अपने ही कैरेक्टर से प्यार करने का मौका मिल रहा है !!"
     मैने दो तीन घूट लेने के बाद सत्य से कहा, "तुम लोग एंजॉय करो ... लेकिन यार ये तो खत्म होने वाली है, ज्ञान क्या कर रहा है लेकर जा मंगल को... तू अपना काम कर, मैं अपना..."
    "हां यार ये बात तो सही है ...", मंगल को साथ चलने का इशारा करते हुए ज्ञान कुर्सी से उठ गया।
  मैंने सत्य से कुछ मुस्कुराते हुए फिर कहा, "तुम लोग इंजॉय करो, मुझे लिखने के लिए कुछ माहौल चाहिए, एकांत चाहिए, आफ्टरऑल राइटर भी एक इंसान ही होता है कोई मशीन नहीं !!", फिर मैं सत्य के पास आया और उसके कान में धीरे से कहा, "इंजॉय योर्स पर्सनल मोमेंट... मैं कुछ देर रुक के आऊंगा..."
  फिर मैं एक फिल्मी गीत गुनगुनाते हुए उनके पास से चल पड़ा, "पल भर के लिए हमे कोई प्यार करता... अरे झूठा ही सही..."
   मैं वहां से टहलते-टहलते पंप हाउस के पास आ गया। आकाश में मिलियंस वाट का और पंप हाउस में हंड्रेड वाट का बल्ब। 
      उजाला पर्याप्त था। मैं अपनी डायरी और पेन लेकर उसी आम के पेड़ की जड़ में बैठ गया जहां शाम को मैं और पीहू एक साथ बैठे थे। मैने आँखें बंद की, अपने आपको समेटा। कुछ ही देर बाद मेरी बंद आंखों में वही दृश्य था, एक बार फिर मैं पीहू के साथ हूँ... और शाम उसी तरह ढल रही है...
     सूरज अपना सफर तय करते-करते नदी के तीर तक पहुंच चुका है। अमरूद के पेड़ों में पक्षियों के झुंड के झुंड अमरूद का आनंद ले रहे है। दोपहर में कुछ तेज चल रही हवा अब मंद-मंद पुरवाई में तब्दील हो चुकी है। सामने सलाद की थाली, हाथों में जाम, दो छोटे-छोटे पैग का हल्का-हल्का शुरूर है। कुछ आध्यात्मिक, दार्शनिक, और मनोवैज्ञानिक बातों के साथ-साथ बहुत-सी हंसी-मजाक की बातें हो रही हैं। एक दूसरे के प्रति हृदय में अटूट विश्वास लिए दोनों, दुनिया से बेफिक्र इस एक लम्हे को एक साथ जी रहे हैं। अब यहां न तो कोई कहानी है, न कोई किरदार, और न ही कोई राइटर। 
   यहां तो हैं दो जवां धड़कते दिल... और दोनों के दिल की धड़कन एकदूसरे से बहुत कुछ कहना चाहती है... लेकिन बहुत-सी बातों के बीच वो बात नहीं कह पा रहे हैं, जो वास्तव में एक दूसरे से कहना चाहते हैं। कुछ देर बाद उस लड़की ने उस लड़के से कहा, "ये पैर फैलाओ न ... मुझे लेटना है .."
    उस लड़के ने वैसा ही किया। अब वह लड़का इतना तो समझता है कि यूं ही कोई लड़की उसके पैरों को तकिया समझ कर नहीं लेट सकती, इसकी नजरों की कशिश सिर्फ दोस्ती नहीं हो सकती... और वह लड़की भी समझती है कि एक लड़का जो अपने दिल के सारे राज उससे कह गया उसके लिए वह खास है। लेकिन कहने की पहल कौन करे... आखिर कौन ? 
     इस तथ्य को पूरी तरह नकारने की कोशिश करते हुए कि जिन्दगी में प्यार एक ही बार होता है, उस लड़के ने उस लड़की के सर पर धीरे से हाथ फेरते हुए, उसके बालों को सुलझाते हुए प्यार से बोला, "मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ..."
     उस लड़की ने अपनी आंखें बंद किए हुए ही किंतु धड़कते दिल से इजाजत दी, "हां कहो न, मै सुन रही हूँ .. लेकिन बात सच्ची होनी चाहिए ..."
       उस लड़के ने मुस्कुराते हुए किंतु संजीदगी से कहा, "बात सच्ची है, लेकिन मुझे कहना चाहिए या नहीं इस सच को अब तुम ही निर्धारित करना..."
     फिर वह लड़का कहता गया और वह लड़की सुनती गई।
    लगभग आधे घंटे बाद मुझे ज्ञान की आवाज सुनाई दी, "ओए राइटर ! कहां मर गया ? टून्न हो गया क्या बे ?
    "आ रहा हूँ...", मैं एक हसीन ख्वाब से जागते हुए बोला। 
   "अबे साले वहां क्या कर रहा है...  सचमुच का राइटर बन गया क्या.... जहांपनाह ने पंद्रह मिनट का टाइम दिया था... दुगना हो गया होगा... चल जल्दी से दरबार में हाजिर हो...", फिर उसने दूर से ही बोतल दिखाते हुए कहा, "चला आजा मिल गई..."
    कुछ देर बाद जब मैं पहुंचा तो महफिल फिर से जम चुकी थी। और किसी बात पर सभी जोर-जोर से हंस रहे थे। मैंने पूछा, "क्या हुआ भई, कौन-सा चुटकुला सुनाया गया ? जरा हम भी तो सुने ?"
    "क्या यार तू इतना मूर्ख होगा मैंने सोचा भी न था...", ज्ञान कह रह था, "इस साले सत्य को मैं बचपन से जानता हूं... पहली कक्षा से बारहवीं तक हम लोग साथ-साथ पढ़े हैं। देख तुझे कैसे कुछ देर के लिए दूर कर दिया और दोनों खुद कैसे इंजॉय कर रहे हैं... और तू हॉस्टल में रहकर तीन सालों में क्या सीखा बे ? देर करने की सजा यह है कि अब तू बनाएगा ?"
    मैंने मुस्कुराते हुए सत्य की तरफ देखा, " मंजूर, यदि साजिशन मुझे हटाया गया तो अच्छी बात है... यदि हमारी उपस्थिति किसी के काम की नहीं तो चलो अनुपस्थित ही सही, काम तो आई ! ... लेकिन पहले सेवक को सर्व की जाएगी ... एनी ऑब्जेक्शन ? "
   मैने पहले मंगल और कमली के लिए बनाया। दूसरी बॉटल का ढक्कन खुल चुका था।
   पीहू ने पूछा, "मिस्टर राइटर ! तुम तो मुझे लव लेटर लिखने गए थे न ? तो फिर पढ़ के सुनाओ ?"
    सत्य ने बीच में टोंका, "अरे यार लिखा हो तब न सुनाए... वो तो हमे कुछ पल के लिए अकेला छोड़ना चाहता था डार्लिंग... ताकि हम कुछ एंजॉय कर सके...", फिर वह मेरी तरफ देखते हुए बोला, "क्यों सच कहा न...?"
     मैंने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा, "हां यार... मैने सोचा था चलो एकाध कविता ही लिखूंगा... लेकिन पर्याप्त उजाला ही नहीं था, क्या लिखता... बैठे-बैठे वहीं सो गया था..."
   पीहू ने अविश्वास से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "मुझे यकीन नहीं आता..."
    "अब ये कौन सी बात हुई... यदि लव लेटर लिखना होगा तो सत्य लिखेगा न तुम्हे... मैं क्यूं लिखूंगा... मुझे तुमसे प्यार थोड़ी न हैं..."
   पीहू कुछ गुस्से से बोली, "तो फिर दिखाओ अपनी डायरी...? अभी इसी वक्त..."
    सत्य ने बीच में आते हुए कहा, "पीहू तुम्हे लग गई है क्या...चलो अब खाना हो जाए, सभी को भूख लगी है यार..."
   "हां पीहू !!", मैने भी उसे समझाते हुए कहा, "देख लेना डायरी... अभी खाना खाते हैं..."
   फिर पीहू कुछ नहीं बोली। उसने बॉटल उठाई, अपने लिए एक बनाया। मैने उसकी तरफ कुछ गुस्से से देखा। उसने भारी आवाज में मुझे ही डांट दिया, "क्या टुकुर-टुकुर देख रहे हो, सब तुम्हारी गलती है, सोचा था चलो यदि एक राइटर मुझे लव लेटर लिखेगा तो उसमें अच्छे-अच्छे शब्द होंगे, मेरी कुछ तारीफ होगी... तुमने मेरा दिल तोड़ दिया यार.... अच्छा ये बताओ कभी उस लड़की के लिए लिखा था... जानती हूँ... नहीं लिखा होगा... तभी तो उसने तुम्हे छोड़ कर..."
   सत्य ने उसे बीच में टोंका, "क्या पीहू ! जो मन में आ रहा है बोलती जा रही हो... कुछ तो सोच समझ के बात करो..."
    "तो इससे कह दो... मुझे गुस्से से न देखे... मुझे शांति पूर्वक पीने दे...", उसके चेहरे में मेरे प्रति अभी नाराजगी झलक रही थी।
   उसकी बात सुन उसके भोलेपन पर हंसी भी आई और उसके प्रति प्यार भी जाग। मेरे होठों में वही फीकी सी मुस्कान आ गई, "नहीं सत्य, इसे मत रोको, यह सच कह रही है... यदि लिखा होता तो क्या इस तरह उसने मुझे छोड़ दिया होता... और हो सकता है इसीलिए तुम्हे भी न लिखा हो..."
    ज्ञान जो अभी तक चुपचाप सुन रहा था, उसने मेरे कंधे में हाथ रखते हुए कहा, "बस जाने दे..."
    मैने धीरे से उसके हाथ को अपने कंधे से अलग किया और पीहू के नजदीक बैठते हुए अपने लिए एक छोटा सा बनाया फिर उससे बोला, "मैं भी तुम्हारे गम में शरीक हूँ, लेकिन ये बस आखिरी। अब तुम देवदास न बनो... सॉरी विथ प्लीज..."
    मंगल को पुकारा गया उसने सारी व्यवस्था की। पीहू-सत्य चारपाई में, ज्ञान-मैं चटाई बिछा के ज़मीन में। टेबल कुर्सी में मंगल-कमली को हम सभी ने जोर देकर बैठाया। शुरू में वो दोनों तैयार नहीं थे, मैने कहा। "देखो मंगल अब तुम पीहू के चाचा हो... बैठना तो पड़ेगा..."
  डिनर के साथ ही कुछ हंसी मजाक का दौर भी चल रहा था। 
    "जानता है सत्य ! ये इतना कमीना है कि पूछ मत...", उसका स्पष्ट इशारा मेरी तरफ था। मैं समझ गया इसे कुछ-कुछ लग गई है, "ये साला ! एक दिन हॉस्टल के कमरे में रात को दो बजे अपनी दुःख भरी कहानी सुना कर इतना रोया...इतना रोया... कि पूछ मत। साला खुद तो रोया, मुझे भी रुलाया... और इतना रुलाया कि... कुछ पूछ मत... फिर साला मुझे कुछ इस तरह चुप करा रहा था कि...
    "कुछ पूछ मत...", सत्य से बीच में ही रोक कर हंसते हुए कहा।
     "अबे नहीं न यार... देख मै बताता हूँ ... जनता है मुझसे बोला कि चुप हो जा प्लीज... देख अब  ग्लिसरीन खत्म हो गई है... चुप हो जा, रात को मिलेगी नहीं... सुबह जब मिल जाएगी न तो कंटिन्यू करेंगे... ठीक अब चुप हो जा..."
      एक बार फिर महफिल ठहाकों से गूंज उठी। ज्ञान उसी तरह मासूमियत से आगे कह रहा था, "साला इतना कमीना है... रोते हुए इंसान को हंसा दे, और हंसते हुए इंसान को रुला दे... और साला मरने चला था... ", कहते-कहते ज्ञान भावुक हो गया।
      तब मैदान में मुझे कूदना पड़ा, "अबे साले देख रात अभी भी है, ग्लिसरीन अभी भी नहीं मिलेगी। सुबह कंटिन्यू करेंगे... जब जानता है कि मैं तुझे रोता हुआ नहीं देख सकता हूँ, तो फिर क्यों मेरे साथ रोया था... और कमीना मुझे बोलता है ?"
    फिर थोड़ी-सी हंसी का माहौल बन गया। ज्ञान ने वार्निंग देते हुए पीहू से कहा, "ये सीता मैया ! तुम तो हंसो ही मत ... ऊं हु ... बिल्कुल नहीं।... इसकी लाल डायरी में न जाने कितने आंसू छुपे होंगे ?...  ये सत्य ! भगवान की कसम खा के कह रहा हूँ, इसे मत पढ़ने देना... नहीं तो... ", फिर वह खुद ही जोर से हंस पड़ा, "चलो तब तक मैं भी कुछ हंस ही लेता हूं..."
    ज्ञान की यह बात मेरे दिल को चुभ गई। सही तो कह रहा है, अपने दिल के जज्बात अब पीहू से क्यों कहूं ? आज तक जिन आंसुओं का बोझ मैं उठाता आ रहा हूं, क्या कम है ? मैंने देखा मेरी लाल डायरी चारपाई के सिरहाने में अभी भी रखी हई है! एक पल में मैंने तय किया कि मुझे करना क्या है ? 
     डिनर समाप्त हुआ। पीहू ने अपना कुल्हड़ उठाया। मेरी निगाह पड़ी, मैंने आंखों के इशारे से मना किया। उसने गुस्से से मेरी तरफ एक उंगली उठाई, उसके होठ हिले "चुप...", 
    मैने भी उसी के अंदाज में कहा, "बस एक .."
    सत्य और ज्ञान किसी बात में एकदूसरे से उलझे थे। उनका ध्यान पीहू की तरफ नहीं था। उसने कुल्हड़ फुल भरी और बिना पानी मिलाए ही तीन चार घूंट पी लिया।
    मैने उसके हाथ से कुल्हड़ छीनते हुए कहा, "लाओ खाली कुल्हड़ मुझे दे दो..."
   फिर मैने बॉटल और कुल्हड़ दोनों ही उस जगह से हटा दिए। वह फिर कुछ नहीं बोली, निढ़ाल जैसे खुद से थकी-हारी हो चारपाई में लेट गई।
     बर्तन समेत कर कमली और मंगल धुलने के लिए ले गए। ज्ञान और सत्य एक दूसरे से बात-चीत कर रहे थे। अपनी डायरी बैग में डाल फिर मैं भी सत्य और ज्ञान की महफिल में शामिल हो गया। 
     हमारे बीच हल्का-फुल्का हंसी मजाक कुछ पुरानी यादों की बातें हो रही थी। आधे घंटे बाद मंगल जब वापस आया तो उसने नोटिस किया कि पीहू सो गई है। सत्य ने उसे उठाने की कोशिश की लेकिन उसकी आँखें नहीं खुली। वह गहरी नींद सो चुकी थी।
    ज्ञान ने सत्य से कहा, "यार एक तो रम और फिर आज दोपहर से ही शुरू है, खाने के बाद नशा तेजी से बढ़ता है... इसे आराम से सो लेने दे...आधे घंटे बाद उठाते हैं..."
    सत्य ने ज्ञान की बात मान ली। लेकिन आधे घंटे बाद भी पीहू नहीं उठी। रात को साढ़े दस से ऊपर हो रहे थे। पीहू इसी तरह गहरी नींद सो रही थी। अंत में सत्य ने एक रास्ता निकाला, "देखो मैं जा रहा हूँ.... बाबा सुबह पांच बजे उठ जाते हैं। किसी भी हालत में उन्हें पीहू की इस हालात के बारे में पता नहीं होना चाहिए। मैं सुबह कह दूंगा कि तुम तीनों मॉर्निंग वॉक में बगिया की तरफ गए हो... फिर मैं उनकी पूजा की तैयारी कर के आ जाऊंगा... "
    मैं उसे बीच में रोक कर कुछ कहना चाहता था। लेकिन सत्य ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "डोंट बी गिल्टी ! मैं सपने में भी नहीं सोच सकता हूँ कि तुम इसका बुरा चाहोगे... अब मुझे रोक कर तुम मुझे गिल्ट महसूस मत कराओ... प्लीज। .ज्ञान चलो मेरे साथ... मंगल देखो अब तुम पीना मत... होश में रहना। सर जी और पीहू का ध्यान रखना। 
     फिर मंगल ने दूसरी चारपाई मड़ैया के अंदर बिछाई ... सत्य ने पीहू को उठा कर मड़ैया के अंदर वाली खाट में लिटा दिया। उसे अच्छे से कंबल ओढ़ा के माथे को चूमते हुए बोला, "गुड नाइट पीहू... सुबह मिलते हैं...", फिर उसने मुझसे कहा, "अपना और इसका ध्यान रखना ?"
    "देखो सत्य बात विश्वास या आविश्वास करने की नहीं है। मैं अभी भी कहता हूँ कि तुम्हें रुकना चाहिए, मैं और ज्ञान चले जाते हैं। अटारी में चुपचाप सो जाएंगे। तुम सुबह पांच बजे आ जाना... बाबा को कहीं से पता नहीं चलेगा..."
    "तुम नहीं जानते बाबा भी वृद्ध हो चुके हैं, उन्हें भी रात को कब क्या जरूरत पड़ जाए... मै रहूंगा तो सब मैनेज कर सकता हूँ...  यदि कहीं से भी बाबा को पीहू की इस हालात के बारे में भनक पड़ी तो जिंदगी भर यह उनसे नज़रें नहीं मिला पाएगी... तुम समझ रहे हो न...", वह पीहू की चप्पल उठाते हुए मुझसे बोला। 
   "ये सीता मैया की चरण पादुका क्यूं मेरे भाई...", ज्ञान ने आश्चर्य से सत्य से पूछा। पीहू की चप्पल दरवाजे के सामने देखकर बाबा समझ जाएंगे की पीहू मेरे साथ है तो वह कमरे में कभी नहीं आएंगे। और सुन तू कमरे में चुप ही रहना, बात मत करना। और बाहर तो बिलकुल मत निकलना..."
    "अब सोऊंगा की तुझसे बात करूंगा चल...", फिर उसने मंगल से कहा, "मेरे बाइक की चाभी रखो, कोई इमरजेंसी हो तो आ जाना... मैं अटारी में रहूंगा वही से आवाज दे देना..."
     दोनों चले गए। मंगल ने मेरा बिस्तर लगाया, सर की तरफ का आधा भाग मड़ैया के अंदर और दूसरा भाग मड़ैया के बाहर। वजह कि सुबह ओस पड़ती है, और थोड़ा पास रहकर पीहू की हालत पर भी बराबर नजर रखी जा सकती है। मैने पीहू के कुल्हड़ को उठा एक शिप लिया। मंगल ने ललचाई दृष्टि से मेरी तरफ देखा, मुझे उसकी क्षमता का अंदाजा था... मैंने अपना बैग खोला, थोड़ी सी रम उसके कुल्हड़ में और डाली फिर सिगरेट जला के चारपाई पर पांव झूला कर बैठते हुए मंगल से पूछा, "मंगल ! जंगली जानवर तो अंदर नहीं आते ? मतलब शेर, भालू, चीता जैसे खतरनाक जानवर...?"
     "नहीं सर ! कभी-कभी आसपास के जंगलों में दिखाई दे जाते हैं लेकिन इस तरफ नहीं आते हैं ... आप चिंता न करे, मैं हूँ न..." 
    "हां, वो तो तुम हो ही... चलो इसे खत्म करो और चुपचाप सो जाओ और देखो घोड़े बेच के मत सोना। कुछ-कुछ जागते भी रहना !", मंगल बड़ी-सी पटिया में अपना बिस्तर बिछा के लेट गया। मैंने धीरे-धीरे अपनी खत्म की, सिगरेट को अच्छे से बुझाया। देखा, पीहू बिल्कुल निश्चिंत सो रही है। 
    मै उसके पास गया, उसे देख कर लगा कि जैसे एक छोटी सी बच्ची सो रही हो। उसे अच्छे से कंबल ओढ़ा के फिर मै भी आ के लेट गया। थोड़ी देर बाद मेरी भी आंखें बंद हो गई। लगभग तीन:बजे मंगल ने मुझे जगाया, "सर जी उठिए .."
   "हूं... क्या हुआ...", मैंने अपनी आंखें खोलने की कोशिश करते हुए पूछा। 
    "पीहू बिटिया कुछ बड़बड़ा रही हैं ..."
     "अच्छा...", मैं चारपाई से उठते हुए बोला, "रुको, मै देखता हूँ..."
     दोनों ही पीहू की चारपाई के पास पहुंचे। उसने बिल्कुल एक छोटी-सी बच्ची की तरह अपना कंबल एक तरफ फेंक दिया था। जैसे एक छोटा-सा बच्चा गर्मी और बेचैनी के कारण अपनी ओढ़नी हाथ-पांव चलकर एक किनारे कर देता हैं। उसका पूरा शरीर पसीने से भींगा हुआ था। मैने मंगल को अपने बैग से टॉवेल निकालने के लिए कहा। उसके माथे और गले से पसीना पोछा फिर उसी टॉवल से उसे हवा करने लगा। उसे कुछ राहत महसूस हुई, लेकिन अभी भी उसकी आंखें बंद थी। वह मुझे सत्य समझ के लगातार कुछ न कुछ-कुछ बड़बड़ा रही थी।
      मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की, "सॉरी सत्य, रियली... सॉरी... मैने ज्यादा पी ली न ?  लालची हो गई थी... स... सारी जिंदगी को...एक ही पल में... ज... जी लेने की कोशिश की न... मेरा बॉयफ्रेंड अच्छा है... जानते हो... क ...क्यूं ..?  वह मुझे कभी भी ज्यादा नहीं पीने देता... वह... स...सब मैनेज कर... ल...लेता है... मेरा दिल रखने के ल...लिए थोड़ी सी शराब में ढ... ढेर सारा पानी मिला के दे देता है... और वह समझता है क...कि मैं कुछ भी नहीं समझती हूँ... लेकिन म...मैं सब समझती हूं सत्य... उससे कुछ कहती नहीं... जानती हूँ न...  कि वो मेरे अच्छे के लिए... क...करता है... वो तो तुम्हारे कहने से जब... मैंने तुम्हारे साथ पी... थ ...थोड़ी ज्यादा हो गई... वो होता तो नहीं पीने देता... ये सत्य... सच में उसने कुछ लिखा होगा क्या...?
     मैने धीरे से कहा , "नहीं... पीहू ! वो क्यूं लिखेगा... जो लिखना होगा... मै लिखूंगा न...", मेरी आंखों से आंसू बह निकले।
   "तो चलो... अ...अच्छा हुआ... यदि लिखता तो मुझे पढ़ना भी पढ़ता न.. पता नहीं... क्या कुछ लिख देता... बड़ा ... र... राइटर समझता है न अपने आपको... पर मुझे क्यों ऐसा  ल... लगता है कि उसकी नज़रें... क.. कुछ कहती सी हैं.... मैं सब समझती हूँ...  लेकिन नहीं पूछ पाती। डर लगता है न... कहीं उसने ऐसा-वैसा कुछ कह दिया तो !! ...वैसे तुम बताओ वो क्या कहना चाहता होगा मुझसे ? ... प....पर तुम भी क्या जनोगे... ? ब... बट टुनाइट... ही... ह.. हार्ट मी... उसे कुछ तो लिखना... आई हेट हिम... बट... म मैने भी तो उसे हार्ट किया न... त तो बदला... प पूरा..."
     "हां पीहू !  तुमने सच कहा... मैं भी क्या जानू ? पता नहीं अपने आप को क्या समझता है... ठीक किया तुमने बदला ले लिया..., उसके माथे में फिर से उभर आई पसीने की बूंदों को पोछता हुआ मैं प्यार से बोला..."
  वह आगे कह रही थी, "लेकिन सत्य अ आई.. हार्ट हिम ! सत्य... वो...  बहुत अच्छा इंसान है...", उसने अपनी बाहें फैलाते हुए कहा, "... तुम्हारी पीहू उसे बहुत ....बहुत .... पसंद करती है ... इतना ",
    फिर उसने यही बात बारी-बारी से अपने सभी फैमिली मेंबर से कही। उसकी बातों और भावुकता में कभी सत्य होता तो कभी बाबा, तो कभी उसके बड़े पापा। वह लगभग अपने सभी फैमिली मेंबर से बात कर रही थी। सभी से उसकी बातों का अंत एक ही वाक्य से होता, "वह बहुत अच्छा इंसान है... मैं उसे बहुत-बहुत पसंद करती हूँ...", 
      इस तरह डायरेक्टली वह मुझसे बात न करते हुए भी मेरे बारे में अपनी फिलिंग्स को अपनो से कह रही थी। उसकी ये बात सुन कर मंगल मेरी तरफ देख कर कुछ मुस्कुरा देता।
     उसकी निश्चल भावना को महसूस कर मेरे हृदय से उठी हूक मेरे गले तक आ रुक गई। न रोने की कोशिश में मेरी हिचकी निकल गई! 
   "सर जी...", मंगल धीरे से बोला, "सर जी ! ये तो आपको भइया जी समझ रही हैं..."
    मैंने इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहा। 
   "सत्य... लेकिन कल वह... ह...हम सब को छोड़कर यहां से ... द ... दूर .... ब...बहुत दूर चला जाएगा... फिर तुम देख लेना... वो कभी वापस नहीं अ...आएगा... लेकिन कभी ... उ... उसकी गर्लफ्रेंड मिली न तो मैं उसे बहुत डांटूगी.… तुम भी डांटना... क्यूं .. छ...छोड़ा उसे ?  मै होती न ... तो ... उसे... क...कभी नहीं छोड़ती... वह.… ब...बहुत बुरी है... उसने मेरे बॉयफ्रेंड का दिल... त तोड़ा न ... भगवान उसे कभी सुखी नहीं..."
    "न पीहू... न। ऐसा नहीं कहते... उसकी कुछ न कुछ मजबूरी रही होगी। उसे यूं बद्दुआ मत दो...", मैने उसे बीच में रोक समझते हुए कहा।
   "स... सॉरी सत्य ... त...तुम कहते हो तो... न...नहीं देती... प... पर उसने गलत किया…", वह फिर चुप हो गई।
   अब मुझे एक ही डर लग रहा था कि कहीं शराब की गर्मी उसके दिमाग में न चढ़ जाए। मैने मंगल से कहा, "मंगल ! तौलिया को पानी से भीगों के लाना जरा..."
    मंगल ने तौलिया भिगो के मुझे दिया। उसकी हालत देख वह कुछ सहमा हुआ था, "सर जी ! आप कहें तो मैं जा के भइया जी को बुला लाता हूँ...?"
   मैने गीली तौलिया से उसके माथे को अच्छी तरह से पोंछते हुए कहा, "देखते हैं मंगल, सत्य देखेगा तो हो सकता है वह खुद परेशान हो जाए... इसलिए अभी रहने दो... अच्छा ये बताओ... तुम्हारी बगिया में नींबू तो होंगे न... जाओ तोड़ के जल्दी लाओ..."
   "जी सर जी ... बस यहीं बगल में है... मैं अभी लाया...", मंगल भागता हुआ ही गया और भागता हुआ ही लौट कर वापस आया। एक कुल्हड़ में पानी डाल कर नींबू और थोड़ा सा नमक मिलते हुए बोला, "ठीक है न सर जी...?"
    "हां... अभी एक किनारे रख दो...", अंदरुनी रूप से मैं भी काम विचलित नहीं था, लेकिन अपने इस विचलन को मंगल के सामने जाहिर नहीं कर सकता था। मन ही मन में निश्चय किया मुझे हिम्मत से काम लेना होगा और मैं वही कर रहा था। मैं ठंडे पानी से तौलिया को भिगोकर उसके माथे, उसके गले, उसकी बांह, उसकी हथेली और उसके पांव को पोंछ रहा था। कुछ देर बाद ही उसे आराम मिलना शुरू हो गया। इस बीच मंगल बराबर मुझे तौलिया गीली कर देता रहा।
    जब इस कहानी को मैंने लिखने का फैसला लिया था तो अपने अंदर के राइटर को एक वचन दिया था कि जो भी लिखूंगा सच लिखूंगा। इसलिए अब लाग- लपेट से दूर यथार्थ की बातें लिखने जा रहा हूं। मुझे अब यह भी परवाह नहीं कि मेरे बारे में आपकी धारणा क्या होगी या आप मुझे कैसे जज करेंगे !! 
    जीवो की किसी भी प्रजाति में जिसमें नर और मादा होते हैं तो उनके बीच अट्रैक्शंस होना एक प्राकृतिक, स्वाभाविक और ननैसर्गिक लक्षण है, और मनुष्य प्रजाति भी इससे अछूती नहीं है। एक स्त्री का रूप, लावण्य, अदाएं और ज्ञान पुरुष को सदैव लुभाता हैं, अपनी ओर आकर्षित करता हैं। उसके चित्त में प्रेम और काम का संचार करता है। और यदि एक स्त्री में ये सभी खूबियां चरम पर हों तो उसके प्रति आकर्षण भी अद्वितीय और अपने सर्वोच्च शिखर पर होता है। 
     यदि ऐसा न होता तो मेनका द्वारा किसी विश्वामित्र की तपस्या भंग न होती। यदि ऐसा न होता तो देवी अहिल्या का सतीत्व न टूटता और गौतम ऋषि से उन्हें शिला बनने का अभिशाप न मिला होता और खुद देवराज इंद्र के चरित्र में भी दाग न लगता।
     यदि ऐसा न होता तो असुर मोहिनी के सौंदर्य से ग्रसित न होते और अमृत का पान वो भी कर पाते। यदि ऐसा न होता तो ब्रह्मचर्य का प्रतीक माने जाने वाले ऋष्यश्रृंग उर्वशी के सौन्दर्य से मोहित होकर अपना ब्रह्मचर्य न तोड़ते।
   यदि ऐसा न होता तो दमयंती के स्वयंवर सभा में स्वयं वरुणदेव, इंद्रदेव, अग्नि तथा यमदेव भी शामिल न हुए होते। यदि ऐसा न होता तो इन्द्र की सभा में उर्वशी के नृत्य के समय राजा पुरुरवा उसके प्रति आकृष्ट न हुए होते और उन दोनों को मृर्त्यलोक में वैवाहिक जीवन जीने का श्राप न मिला होता। 
   यदि ऐसा न होता तो ऋषि पराशर एक मछुआरे की कन्या सत्यवती के प्रति आकर्षित न होते और महाभारत काव्य के रचयिता वेदम व्यास का जन्म भी न हुआ होता। यदि ऐसा न होता तो शांतनु उसी सत्यवती पर मोहित न हुए होते और उनके पुत्र देवव्रत को आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा न लेनी पड़ती और कालांतर में वे भीष्म न कहलाते। 
और अंत में ...
     यदि ऐसा न होता तो देवमाता अदिति से प्राप्त चिरयौवन के वरदान, ज्ञान, युद्ध कला के कौशल इत्यादि से सुशोभित सत्यभामा से श्रीकृष्ण प्रभावित न होते और पारिजात के वृक्ष धरती लोक में न आते।
    केवल पौराणिक काल में नहीं, हर कालखंड में, हर युग में उदाहरण और भी हैं। लेकिन जो अब मैं लिखने जा रहा हूं उसे प्रमाणित करने के लिए इतने तथ्य पर्याप्त हैं। 
   लगभग दस-पंद्रह मिनट के लगातार प्रयास के बाद उसकी बेचैनियां कम हुई। उसका शरीर स्थिर हुआ। हम दोनों ने चैन की सांस ली। मुझे अंदरुनी रूप से विश्वास हो गया था कि अब वह किसी भी खतरे से बाहर है। मैंने एक बार फिर उसके चेहरे को अच्छे से पोंछते हुए मंगल से बोला, "मंगल ! ... मेरी बैग में देखो तो जरा... एक धुली हुई टी-शर्ट होगी, जरा निकलना तो..."
    मंगल ने आश्चर्य से पूछा, "पहनाएंगे...?"
   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे नहीं ! ... देखते नहीं, इसके बाल, कुर्ते की बांह और गला पानी से कुछ भींग गया है... सूखे कपड़े से पोछना है... तुम ले आओ.... इस तौलिया को झटक कर सूखने के लिए डाल दो..."
   मंगल ने टी शर्ट लाकर मुझे दी। मैंने उसके दो फोल्ड किए और उसके माथे और बालों से पानी सुखाने लगा। अभी तक मेरा पूरा ध्यान उसकी बिगड़ती हालत पर लगा था। 
    लेकिन अब मैं घटित होने वाले किसी भी दुर्घटना से परे केवल उसे देख रहा था। यह सच है कि पीहू अर्ध-चेतन अवस्था में है। बेखुदी के इन लम्हों में उसे मेरे स्पर्श कितने और कैसे महसूस हो रहे होंगे, नहीं लिख सकता। लेकिन मुझे तो पूरी शिद्दत से हो रहे थे। मै उसकी चारपाई पर उसके नजदीक उसकी कमर के पास बैठा था, उसका स्पर्श तो था ही। माथे और बालों से पानी सुखाते समय जब कभी वह करवट बदलने की कोशिश करती तो मेरे हाथ उसके गालों से टकरा जाते, और कोहनी उसके सुकोमल अंगों को छू जाती तो इस मन में एक तरंग उठती, और दिमाग में हजार बिजलियां कौंध जाती। 
    इसी बीच मैंने महसूस किया कि उसकी तकिया नीचे की तरफ खिसक कर कंधे से कुछ नीचे आ गई है, जिस कारण उसे अच्छे से सर रखने में कठिनाई महसूस हो रही थी। मैंने मंगल से कहा, "मंगल ! ... तकिया ठीक करनी पड़ेगी, देखो नीचे खिसक आई है..."
  "जी सर जी... आप थोड़ा सा इन्हें ऊपर उठाइए... मैं ठीक करता हूँ..."
   मैं उसके सर की तरफ थोड़ा-सा और खिसक आया। उसके दोनों हाथ उसके पेट में रखे फिर झुक कर बाए हाथ से सर को और दाहिने हाथ से उसकी पीठ को सहारा दे कुछ अपनी तरफ खींच लिया। 
   मंगल ने तकिया खींचने का प्रयास किया जिसका कुछ भाग अभी भी उसके कंधे में दबा हुआ था। वह कुछ जोर लगाता हुआ बोला, "सर जी... थोड़ा सा और ऊपर..."
    मैने अब उसे पूरी तरह अपने बाजुओं में समेट अपनी तरफ खींच लिया। मंगल ने तेजी के साथ तकिया खींची। झटके से खींचने के कारण तकिया उसके हाथ से छिटक कर जमीन पर जा गिरी। 
  "क्या मंगल तुम भी !! चलो अच्छे से झटक कर धूल साफ कर दो..."
    मंगल तकिया को लेकर थोड़ा बल्ब की रोशनी की तरफ चला गया और उसमें लगी धूल को अच्छे से झाड़ने लगा। उसी क्षण पीहू ने अधखुली आंखों से एक क्षण के लिए मुझे देखा, फिर उसकी आंखें बंद हो गई। उसने मेरे कंधे में रखे अपने बाएं हाथ से मेरे दाहिने गाल को सहलाते हुए महीन और मादक स्वर में कहा, "आई लव यू..."
    मैं जानता था कि उसके द्वारा कहे गए ये शब्द मेरे लिए न थे !! मैं एक पल के लिए भूल गया कि वह मुझे सत्य समझ रही है, मुझे लगा उसके ये शब्द मेरे लिए हैं। बस वही एक पल था जब मेरे मन में चोर जगा।
     मेरी बाहों के घेरे उसके कंधे और पीठ में कसने लगे। उसका सुंदर, आकर्षक और सलोना चेहरा मेरे चेहरे के बिल्कुल नजदीक था। उसकी गर्म सांसे मेरे चेहरे से टकरा रही थी और अधखुले होठ मेरे होठों के नजदीक थे। अचानक उसने मुझे अपनी तरफ खींच कर गले से लगा इस तरह महीन स्वर में कहां, "आ.. आई लव यू... स.. सो मच..."
      नशे की रूमानियत हम दोनों में थीं। फर्क सिर्फ इतना था कि मैं होश में था और वह बेखुदी में। इसलिए उसका अपराध क्षम्य था, लेकिन मेरा नहीं। मेरे जीवन की यह दूसरी घटना थी और उसके जीवन की पहली होकर भी नहीं थी। क्यूंकि मैं अच्छी तरह से जानता था कि इस रात की, इन लम्हों की, कल को उसके पास कोई स्मृति नहीं होगी। फिर भी यह तो चोरी हुई न ? 
    बेशक पीहू के प्रति मेरे हृदय में आकर्षण मात्र नहीं है, उससे कहीं ज्यादा संवेदनाएं है। मै उसे चूमना चाहता हूँ, अपनी बाहों में समेट उसे गले लगाना चाहता हूँ, मै भी उससे आई लव यू कहना चाहता हूँ। लेकिन तब, जब वह पूरे होशो-हवास में हो, लेकिन इस तरह चोरी-चुपके नहीं। मैने उसे धीरे से खुद से अलग किया फिर मैने उसके माथे को चूम रोते हुए धीरे से कहा, "मी टू..."। भावनाओं के इस प्रबल वेग में वह खो गई... अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर रख उसने मुझे अपनी तरफ खींचते हुए गले से लगा लिया। 
    मेरी आंखों से लुढ़के हुए आंसू उसके माथे में जा गिरे। अचानक मुझे अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ। बोध हुआ कि यदि मंगल ने हमें इस हालत में देख लिया तो क्या होगा ? मेरे साथ-साथ पीहू भी उसकी नजरों में गिरेगी। मैंने उसे खुद से अलग करना चाहा लेकिन उसकी बाह मेरी पीठ पर अभी भी कसी हुई थी। 
    उफ़ मै क्या करूं ? क्या मैं देवराज इंद्र बन जाऊं और इस अहिल्या से छल कर जाऊं। यदि मैं अपने हृदय में मित्र भाव से या फिर मान लीजिए प्रेम भाव लेकर ही सही उसके माथे को चूम लूं, करुणा से या दिलासा देने के लिए उसे गले लगा लूं तो हो सकता है यह जुर्म न हो। लेकिन मन में काम भाव लिए उसके होठों को चूमने की बात तो दूर उसे मात्र छू भी लूं तो निःसंदेह जुर्म है, यह उसके साथ सेक्स करने के बराबर होगा। ऐसा गुनाह फिर जिसकी कोई मुआफी नहीं होगी। उस वक्त मैं जो कर सकता था मैने वही किया। प्रेम की भावना शाश्वत है उसे तो मैं अपने हृदय से नहीं निकाल पाया था, लेकिन "मी टू" कहते हुए जो मेरी आंखों से जो आंसू बहे उसने मेरी कामवासना को धो दिया। वैसे भी काम की भावना क्षणिक होती है, उसे नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ पल के लिए मैने अपनी आँखें मूंद ली। उसकी तरफ से मैंने अपने मन को साफ और उज्जवल किया। प्यार से अपनी बाहों में भरते हुए पूरी ईमानदारी के साथ मैने उससे कहा, "मुझे भी तुमसे प्यार है पीहू, मैं जानता हूँ मैं तुम्हारे जीवन का सत्य नहीं लेकिन झूठ भी तो नहीं। मैं तो तुम्हारे जीवन का प्यार हूँ, जो या तो होता है या फिर नहीं होता है... लेकिन मैं हूँ..."
     पीहू जो हमेशा सत्य के साथ ही सोती रही, आज उसके पास नहीं है, और इस परिस्थिति में उसके अवचेतन मस्तिष्क ने मुझे सत्य के रूप में प्रतिरूपित कर लिया तो कोई नई बात नहीं। अर्ध-बेहोशी की अवस्था में उसका अवचेतन मस्तिष्क अपना काम कर रहा था तो मुझे भी अपना काम करना चाहिए। फिर मैंने उसे खुद से दूर करने की कोशिश नहीं की। मैं उसे अपनी बाहों में लिए बैठा रहा जब तक की मंगल पास नहीं आ गया।
      मंगल ने उसके सिरहाने में तकिया रखते हुए कहा, "अब लिटा दीजिए सर जी..."
     "नहीं... पहले वो कुल्हड़ में रखा नींबू पानी देना...", मैने कुल्हड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा। अगले ही पल मंगल ने कुल्हड़ मेरे हाथ में पकड़ा दिया।
     कुल्हड़ को उसके होठों से लगते हुए मैने धीरे से उसे पुकारा, "पीहू ! चलो ये पानी पी लो... तुम्हे अच्छा लगेगा..."
   उसका एक हाथ मेरे कंधे में और दूसरा हाथ मेरी पीठ में था। सर अभी भी मेरे सेने में लुढ़का था। उसने अपनी आंख बंद किए हुए ही कुल्हड़ से धीरे-धीरे पानी पिया।
    मैने अपनी टी शर्ट की तरफ इशारा करते हुए मंगल से कहा, " मंगल !... इसे तकिया के ऊपर बिछा दो..."
   मंगल ने वैसा ही किया और साथ में पूछ भी लिया, "सर जी ! आप रो क्यों रहे हैं..."
   मैने खुद ही अपने आंसुओं को पोंछते हुए धीरे से कहा, "तुम्हारी पीहू बिटिया ने तो हमारी जान ही निकल ली, मै सत्य को क्या कहता, उसे अपना कौन-सा मुंह दिखाता... ये बेफिक्री और खुशी के आंसू हैं मंगल..."
    
    जब वह सो गई तब हम दोनों भी अपनी-अपनी जगह पर आकर लेट गए। मैं भी सो जाऊं इससे पहले एक प्रश्न आपके लिए छोड़ रहा हूँ...
    यदि अहिल्या के साथ देवराज इंद्र ने छल से शारीरिक संबंध बनाए तो इसमें अहिल्या का क्या दोष ? फिर उन्हें अपने पति से पत्थर होने का श्राप क्यों मिला ? दोषी इंद्र जिसने यह अपराध संज्ञान में किया, अहिल्या तो स्वयं छली गई थी। कुछ विकल्प मै दे रहा हूं आप चुनाव कर सकते हैं ....
   कहीं इसलिए तो नहीं कि सती होने के बावजूद अहिल्या अपने शरीर में पराए पुरुष के स्पर्श को महसूस न कर पाईं ?
   कहीं इसलिए तो नहीं कि अहिल्या और इंद्र दोनों ने कूट रचित तरीके से स्वयं गौतम ऋषि के साथ छल किया हो ? जिससे आहत होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या का परित्याग किया, और जिसका बोध होने पर स्वयं अहिल्या पत्थर की मूरत बन गई ?
    कहीं इसलिए तो नहीं कि वास्तव में छल का प्रभाव इतना व्यापक था कि एक नारी को अपने पति और पर-पुरुष के स्पर्श में भेद न महसूस हो सका हो और उसने खुले मन से उसने उसके साथ काम का सुख भोगा हो, और गौतम ऋषि का अहंकार अहिल्या को छमा ही न कर सका हो और अपनी पत्नी को दूषित, कलंकित मानकर उनका हृदय घृणा से भर गया हो ?
    ऑप्शन और भी दे सकता हूँ, लेकिन नहीं। अब आगे आप पर छोड़ता हूँ। आप कोई भी धारणा बना सकते हैं, कोई भी दष्टिकोण स्वयं को दे सकते हैं।
    यदि मैं अपनी कहूं तो गौतम ऋषि और अहिल्या के बीच प्रेम था ही नहीं, सिर्फ एक रिश्ता था, पति-पत्नी का। हम अपने प्रिय को पत्थर बन जाने का श्राप कैसे दे सकते है ? और मान लो कि अपराधबोध से ग्रस्त हो स्वयं अहिल्या ने खुद को पाषाण बना लिया तो उसके प्रायश्चित कर लेने के बाद भी ऋषिवर उसे क्षमा न कर सके ? उस पत्थर को अपने हृदय से लगा उसमें फिर से जीवन का संचार न कर सके ? और फिर स्वयं करूणानिधान को उन तक आना पड़ा। 
    ऐसा प्रेम, संबंध या फिर रिश्ता जिसमें करुणा के भाव न हो अपूर्ण है। करुणा-भाव के बिना क्षमा संभव नहीं। यदि ऐसा न होता तो शायद सच्चे मन से प्रायश्चित कर लेने के बाद हमे ईश्वर भी क्षमा न करे। लेकिन वह हमें क्षमादान देता है, क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है। 
   और जिस प्रेम में करुणा हो, उसके प्रति आप कोई अपराध कैसे कर सकते हैं ? कभी नहीं। जो प्रेम मेरे हृदय में पीहू के प्रति है, उसमें श्रृंगार से अधिक करुण रस की प्रधानता है। और शायद यही कारण है कि लाख विषम परिस्थितियों में भी मैं पीहू के प्रति कोई अपराध कर ही नहीं सकता... सोच भी नहीं सकता। तो फिर किसी चोर को चोरी कैसे कर लेने देता ? यही सब सोचते हुए मुझे भी नीद आ गई।
      सुबह छः बजे मंगल ने फिर जगाया, "सर जी ! उठिए सुबह हो गई ... देखिए ! पीहू बिटिया अभी भी सो रही हैं ... भैया जी भी अभी तक नहीं आए... "
    मै उठा पहले खुद अच्छी तरह से मुंह धोया, फिर उसके सिरहाने बैठते हुए बोला, "ओए गर्लफ्रेंड ! उठो सुबह हो गई है...", लेकिन जब वह इस तरह पड़ी रही तो मैंने तेजी से कंधे में थपकी दी, "उठो जी ... देखो साक्षात सूरज देवता गुड मार्निंग कह रहे हैं... मंगल ! एक लोटा पानी तो लाना..."
    पानी का नाम सुनकर वह तेजी से उठकर बैठ गई, "ये पानी क्यों... मै उठ गई न !!"
    "हां वो तो मैं देख ही रहा हूं...", मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "पानी तो मुंह धोने के लिए मंगा रहा हूं..."
      "हा  ?... मुंह धोने के लिए ?.... तो फिर फिर ठीक है...", मंगल ने पानी दिया और उसने अच्छे से अपना चेहरा धोते हुए पूछा, "सत्य कहा है ... कहीं दिख नहीं रहा है... और ज्ञान भैया भी नहीं दिख रहे..."
    "शांत बालिके ... शांत ", दोनों कल रात ही घर चले गए हैं आते ही होंगे।
   "क्या !! सत्य कल रात को ही.... ? तो मुझे क्यों नहीं ले गया...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए आश्चर्य से पूछा।
   "वो इसलिए कि कल रात तुम फुल टाइट थी... होश ही नहीं था... घर कहां से जाती...?", मैने मुस्कुराते हुए कहा। हम दोनों ने रात भर पहरेदारी की है... तुम्हे तो कुछ याद नहीं होगा..?"
     "नहीं ! ... ओह !! तभी मैं कहूं कि मेरा सर थोड़ा-थोड़ा भारी क्यों लग रहा है... ", उसने अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा।
   "इसे कहते हैं , हैंगओवर होना ... अब समझी न ? ...रुको ...", फिर मैंने गिलास में थोड़ी सी बनाकर उसकी तरफ बढ़ाया, "लो ! उतारो हैंगओवर... अब देख क्या रही हो जहर को जहर ही मारता है... लो तुम्हारे मिस्टर जी की बाइक आ रही है जल्दी करो... लो पकड़ो... नहीं तो पूरा दिन अपना सर पकड़े बैठी रहोगी...", फिर उसने वही किया जो मैने कहा।
   मैने फिर उसे अच्छे से कुल्ला कर मुंह धोने के लिए कहा। उसने वैसा ही किया। मैने सिरहाने में रखी अपनी टी-शर्ट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो पोंछ लो..."
    "ये किसकी है... क्या तुम्हारी है ... लेकिन मेरी चारपाई में...?", उसने टी-शर्ट अपने हाथ में लेते हुए आश्चर्य से पूछा।
   मैने मुस्कुराते हुए कहा, "लंबी कहानी है बालिके ... दरअसल हुआ ये कि..."
    इसी बीच मंगल अमरुद और गाजर लेकर हाजिर हो गया। 
    मैंने उसे गाजर पकड़ते हुए कहा, "लो पहले इसे खाओ... कल रात को खाना भी ढंग से नहीं खाया है... कहानियां-वहांनियाँ तो चलती रहेंगी...", मैने बात बदलते हुए कहा।
    "नहीं पहले थोड़ी सी और दो... जल्दी करो...", इस बार मैंने वह किया जो उसने कहा। 
     अब वह नार्मल थी। हम दोनों बाहर की खाट में बैठ गए। उसके एक हाथ में अभी भी टी-शर्ट थी और दूसरे हाथ में अमरूद। सत्य ने पास आते हुए आश्चर्य से कहा, "वाह ! सुबह-सुबह अमरूद ... क्या बात है... सब ठीक तो है न ?"
    "अरे भइया जी कहां सब ठीक है, सर जी को रात भर परेशान किया..." मंगल बोला।
    "हे मंगल ! तुम्हारा मंगल हो, अब तुम चुप रहो आगे की दास्ता हम बयां करते हैं... पीहू जी जरा आप भी गौर फरमाइएगा... तो सत्य ये तीन बजे उठी, कुछ बडबडा रही थी। पूरी ओढ़नी छोटे से बच्चे की तरह किनारे फेंक दी थी... पूरा शरीर पसीने से तरबतर था। मैंने इसी टी-शर्ट से पसीना पोंछा और आधे घंटे तक हवा करते रहे, मैडम जी को बहुत गर्मी लग रही थी। अब भई रम है, हर कोई नहीं पचा पाता न...", मैंने जान-बूझकर स्टोरी को शार्टकट में बताया।
     "और सर जी वो जो बडबडा रही थी कि मेरा बॉयफ्रेंड ....", मंगल कुछ उतावला होते हुए बोला।
     मैंने उसके कंधे पर तेजी से हाथ रखकर रोकते हुए कहा, "मंगल ! शांत वत्स ! मै सब बता रहा हूँ न !! ... नहीं इसमें मैं बुरा क्यों मानूंगा... तो सत्य ये आपकी मैडम जी ये समझ रहीं थी कि तुम इनके पास बैठे इनकी सेवा कर रहे हो... और कल रात इन्होंने अपने बॉयफ्रेंड की भरपूर शिकायत अपने हसबैंड से की... हे भगवान ! सुनने से पहले धरती क्यों न फट गई... आसमान मुझे खा क्यों न गया..", मैंने अपने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाकर फरियाद की।
     "मैने तुम्हारी बुराई की ! हो ही नहीं सकता !! नहीं मानती मै !!! ...", पीहू ने मेरी तरफ आंख दिखाते हुए कहा। मंगल फिर से कुछ बोलना चाहता था। मैंने उसे कुछ तेज नजरों से देखा, और वह समझ गया। 
    "जी आप तो नशे में थीं... तो आपको तो कुछ याद होगा नहीं... पर मैने बुरा नहीं माना... तो सत्य ये यह कह रहीं थीं कि मेरा बॉयफ्रेंड बहुत ही बुरा है, इसने मुझे बहुत शराब पिलाई है... सत्य इसे अब मत रोकना... कुछ दिन और रहा न तो मुझे यह शराबी.... नहीं... नहीं... क्या कहा था मंगल ? अरे हा... शराबिनी बना देगा... ये तुम्हारे पीठ पीछे मुझे क्या-क्या कहता रहता है... तुम क्या जानो !  सोच लो सत्य.... इतना बड़ा एलिगेशन लगाया मुझ पर ?", मैंने अपना हाथ सीने में रख उसकी तरफ देखते हुए नाटक किया।
    "ये बहुत हुआ नाटक... अब एक लफ्ज़ भी नहीं... सत्य तुम इसे रोकते क्यूं नहीं ? मैने ऐसा नहीं कहा है, आई मीन मैं ऐसा कुछ कह ही नहीं सकती। जब आज तक मेरे दिमाग में ऐसा कोई खयाल आया ही नहीं, तो मैं नशे में ही सही... कह ही नहीं सकती... तुम इसका विश्वास मत करना सत्य..."
    "हां भईया जी !! नशे में आदमी क्या कुछ बोल जाए, नहीं विश्वास करना चाहिए...", इनडायरेक्टली मंगल मेरा पक्ष लेते हुए बोल रहा था। 
   "होल्ड ऑन मंगल... भई तुम चुप रहो... ", फिर मैने धीरे से लगभग उसके कान के पास कहा, "ज्यादा ओवर एक्टिंग करने की जरूरत नहीं है..."
       सत्य जोर से हंसा था, साथ में मंगल और मैं भी। लेकिन दो शख्स बिल्कुल नहीं हंस रहे थे। वे बराबर मुझे घूरे जा रहे थे। सत्य ने उसी तरह हंसते हुए कहा, "अब चले पीहू ... जब तक बाबा पूजा कर के उठेंगे तब तक तुम फ्रेश हो लेना..."
   पीहू ने मुझे फिर देखा, लेकिन इस बार उसकी आंखों में करुणा दिख रही थी। दोनों चल पड़े। मैंने पीछे से पुकारा था, "ओए मैडम जी ! मेरी टी-शर्ट तो देते जाइए..."
     उसने पलट कर उतनी ही तेज आवाज़ में कहा, " खा नहीं जाऊंगी... चिंता मत करो, धुल के लौटा दूंगी..."
    दोनों के जाने के बाद मैने ज्ञान से पूछा, "आज चलना है न..."
  "नहीं सोचता हूँ दो तीन दिन और रुक लूं ... और सुन दो दूनी चार का पहाड़ा किसी और को पढ़ाना मुझे नहीं... कल रात क्या हुआ मुझे पूरी बात बता..."
     मैं फिर अभिनय करते हुए कहा, "ज्ञान ! मेरे दोस्त !! क्या मुझ पर ऐतबार न रहा... हाय राम ! इससे पहले मैं मर क्यों न गया..."
    "मुझसे नौटंकी नहीं... समझा ? ", उसने कड़ी निगाह से मुझे देखते हुए कहा, "चल अब शुरू हो जा..."
     मैंने कल रात को पूरी घटना ज्ञान को बताते हुए अंत में बोला, "मैं तो डर ही गया था ज्ञान... यदि कल उसे कुछ हो जाता तो...", कहते हुए मेरी आंखें भर आई।
     ज्ञान मेरी तरफ देखते हुए बोला, "मैं तुझे इसीलिए तो मना करता रहता हूँ कि उसे मत पिलाया कर... एक तो लड़की ऊपर से जिसने पहले कभी शराब छुई तक न हो... लेकिन तू कहां समझता है...?"
    "मैं खूब समझता हूँ ज्ञान, उसकी लिमिट मैं जानता हूँ। कल सत्य के साथ उसने ज्यादा पी ली थी...  उसे उसकी लिमिट्स का अंदाजा नहीं हुआ होगा..."
   "ये होल्ड ऑन !! क्या कहा... तू पीहू को सत्य से अधिक समझता है ? जानता है उसकी लिमिट्स के बारे में...? ये तुझे क्या होता जा रहा है..."
   "हो गया न यार, .... अब क्या करू ...",  मैने बैग से बॉटल निकालते हुए कहा।
    ज्ञान ने टोंका, "अब ये क्या... ?"
    "हैंगओवर है यार, थोड़ी सी पी लेने दे... देख तुझे रुकना है तो रुक लेकिन मुझे कस्बे तक पहुंचा दे। मैं वहां से कोई साधन पकड़ कर शहर पहुंच जाऊंगा, उसके बाद मुझे बस मिल जाएगी। पर मैं अब यहां नहीं रुकूंगा... ",  फिर मैंने ग्लास की शराब एक सांस में पी ली... और दूसरा बनाने लगा।
    "इस बार हो सके तो पानी मिला लेना... वैसे रुकेगा क्यों नहीं... ?", उसने गहरी दृष्टि से मुझे देखते हुए पूछा। 
   मेरे होठों में फीकी सी मुस्कान आ गई, "मुझसे बेहतर तू जनता है, मेरे दोस्त ! अभी कुछ देर पहले पीहू का हैंगओवर उतारने के लिए थोड़ी सी शराब देते हुए कहा था, जहर को जहर ही मारता है...
   "तो ...?", ज्ञान ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए कहा।
   "तो अब वह जहर मैंने पी लिया... रही बात पानी मिलाने की तो सारी उमर पानी ही मिलाना है, लेकिन आज इस जाम को नीट ही पीना है... न यह कभी मत सोचना कि मैं यहां से शराबी बन के लौट रहा हूँ, जो वादा तुझसे और उससे किया है सारी उम्र निभाऊंगा... "
     हम दोनों के अलावा एक तीसरा शख्स भी वहां पर था और वह था मंगल। मैंने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। एक फुल जाम उसके लिए बनाया, "लो मंगल ! चुप रहने की रिश्वत दे रहा हूं... ये जाम तुम्हारे और कमली के नाम। उम्र में छोटा हूं लेकिन ईश्वर से तुम्हारे लिए प्रार्थना करता हूँ कि तुम दोनों की जोड़ी सलामत रहे। अपनी पीहू बिटिया का और सत्य भैया का ध्यान रखना। मंगल के एक हाथ में जाम था लेकिन उसका सर मेरी गोद पर आ गया, शायद उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। 
    ज्ञान उठते हुए बोला, "मंगल तुम अपनी खत्म करो और मेरे लिए भी एक बना दो, मेरे दोस्त की बर्बाद किस्मत के नाम... अब सोचता हूँ मंगल, मैंने इसे सत्य के साथ भेजा ही क्यूं..."
   "नियति यानी डेस्टिनी मेरे दोस्त ! जिसे न तो तुम रोक सकते थे और न ही मैं। इसे तो होना ही था। लेकिन चलो अच्छा हुआ। कहा न जहर को मारने के लिए जहर ही चाहिए होता है, जहर पीने के बाद अमृत पीने का कोई अर्थ नहीं निकलता है, वह आपको जीवित नहीं कर सकता..."
    मैने चारपाई पर पीहू के द्वारा आध खाए अमरूद को उठा कर मड़ैया से बाहर आ गया। कमली रोज की तरह मुझसे कुछ दूर पर ही खेत में जुटी थी। मैने पुकारा, "ओए कमली डार्लिंग ! "
   उसने पलट कर देखा, और थोड़ा सा मुस्कुरा दी। मैने भी मुस्कुराते हुए कहा, "लव यू..., ये मैं नहीं मंगल कह रहा है...", मैने मंगल की तरफ इशारा करते हुए कहा।
     ज्ञान अपना जाम ले कर मेरे बगल में खड़ा हो गया, "हे विचित्र प्राणी ! पहले से ही बता दिया करो कि अगला सीन हंसने का है या रोने का, आदमी कुछ तो प्रिपेयर हो जाया करें ..."
   "चल स्नान-ध्यान करते हैं...", मैने कहा।
  मंगल ने एक चारपाई पंप हाउस के पास बिछा दी। हम दोनों वहीं तैयार हुए। तभी सत्य आते हुए बोला, "तो तुम लोग रेडी न... चलो ज्ञान ब्रेकफास्ट करने के बाद थोड़ा सा माइंस चलना है, शैल घर में आराम करेगा..."
    "देखो यार मैं कहीं नहीं जाने वाला... मै बस फल-फूल खाऊंगा... और फिर यहीं आराम करूंगा..."
     "ठीक है ... भूख लगे तो मंगल को घर भेज देना ? वह खाना ले आयेगा ...", सत्य ने मुझसे कहा।
   "ठीक है, वैसे जरूरत नहीं पड़ेगी ...? लेकिन ज्ञान चलना कब तक है ..?", मैने पूछा।
   "लौट के बताता हूँ ....", वह जाते-जाते पीछे पलट कर बोला।
    मंगल खेत में कमली के साथ काम कर रहा था। काम के बीच-बीच में किसी न किसी बात में दोनों हंसी-ठिठोली भी कर लेते। मैं सिरहाने बैग रख लेट गया। कुछ देर बाद ही मुझे नींद आ गई। जब जगा तो पीहू को पांव की तरफ बैठे देखा, "हो गईं नींद पूरी..."
   "नहीं मैं तो ऐसे ही... लेकिन तुम कब ..."
   "उठो मुंह धो लो ...", उसने जग मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "कैसी लग रही हूँ .... हु देखो ?"
    मुंह धो लेने के बाद मैंने उसे ध्यान से देखा, "व्हाइट जींस के साथ मेरी व्हाइट टी शर्ट जिसमें डार्क ब्ल्यू और रेड कलर के वर्टिकल पैटर्न, उसी पैटर्न से मैच करती कॉलर, पहन रखी थी। मैने तारीफ करते हुए कहा, "बहुत ही अच्छी लग रही हो, बिलकुल डिफरेंट और मॉर्डन लुक ... वाह !! जींस और  टी-शर्ट में पहली बार देख रहा हूँ न  ... लेकिन ये जेंट्स टी-शर्ट...?"
     उसने मजाकिया अंदाज़ में कहा, "हां ... मैने सोचा कि तुम्हे वापस तो करनी ही है... तो पहन ही जाऊं..."
    मैने उससे दुगुने मजाकिया अंदाज़ में कहा,  "अच्छा जी... तो लाइए..."
   उसने आश्चर्य से पूछा, "क्या ...?"
   "मेरी टी शर्ट ...?"
    "हां लो न ....", लेकिन जैसे ही मेरी बात के अर्थ उसे समझ में आए तो उसके हाथ रुक गए। अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा कर हंसते हुए कहा, "ओह ! कितनी स्टुपिड हो गई हो मैं आजकल... ये तुम जब से मिले हो न, मुझे पागल कर दिया है..."
   मैने उसे प्यार से देखते हुए कहा, "ये सुनो !  मुझसे अधिक तुम पर अच्छी लगती है... मेरी मां ने अपने लिए कभी चूड़ियां तक न खरीदी होंगी, लेकिन एक फेरी वाले से मेरे लिए यह टीशर्ट खरीदी थी... उनका आशीर्वाद समझकर अब अपने पास रखो... जब कभी तुम्हें मेरी बहुत याद आए तो पहन लिया करना..."
   "अच्छा !! जानते हो बाबा भी आज कह रहे थे कि बहुत दिनों बाद तुमने इस तरह के कपड़े पहने है ... यह भी कहा कि यह टीशर्ट मुझ पर बहुत अच्छी लगती है..."
    मैने फिर हंसते हुए मजाक किया, "कहीं ऐसा तो नहीं... आज फिर जीने की तमन्ना है... आज फिर मरने का इरादा है..."
   "बिल्कुल... यही बात है ...", फिर वह भी जोर से हंस पड़ी। 
    कुछ देर हंस लेने के बाद उसने संजीदगी से कहा, "मुझे तुमसे कुछ बात करनी है ...", 
    मैने कहा, "हां कहो ..?"
    वह संजीदगी से बोली, "देखो,  यदि मैं यह कहूँ कि मैं कल रात सोते समय पूरे होश में थी... मुझे सब कुछ याद है कि मैंने क्या कहा, तो तुमसे झूठ बोलना होगा... लेकिन तुम सच-सच बताना क्या मैंने वही सब कहा जो तुमने सुबह बताया है ?", उसकी नज़रें मेरे चेहरे में थीं। 
   "अरे नहीं ! ऐसा कुछ नहीं है... सुबह तो बस ऐसे ही मजाक में कहा... पर हां, कल रात तुम मुझे सत्य समझ के कुछ-कुछ बातें कर रही थी... बातें क्या बड़बड़ा रही थी। कुछ मेरी समझ में आया भी और कुछ नहीं भी... रही मेरी बात, तो मेरे बारे में कोई खास बात नहीं की, बल्कि तुम सत्य को कितना प्यार करती हो अपनी फिलिंग्स उसे ही बता रही थी ... और हां कल तुमने अपने सभी फैमिली मेंबर से भी बात की है .."
    " सच में ! मैंने कल रात तुम्हें सत्य समझ कर बातें की ! ... और सभी फैमिली से !! चलो तो ठीक है...  नशे में ही सही कुछ अच्छा काम हो गया मुझसे... लेकिन मैंने तुम्हारे बारे में क्या कहा... ?"
     "ज्यादा कुछ नहीं... बस सभी से यही कहा कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड अच्छा इंसान है...", मैंने मुस्कुराते हए कहा। 
   उसने मेरी नजरों से नजर मिलाते हुए पूछा, "अच्छा ! मैंने बस इतना ही कहा ?...", 
      मैंने भी उसकी नजर से नजर मिलाकर बात कही, "हां... बस इतना ही... सच में..."
     कुछ देर तक वह मुझे देखती रही फिर उसने झट से मेरा हाथ अपने सर पर रखते हुए कहा, "खाओ मेरी कसम... और खबरदार जो तुमने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा..."
   मैंने भी उतनी ही तेजी के साथ अपना हाथ उसके सर से हटाते हुए कहा, "खबरदार जो ऐसी बात कभी की तो...."
    "तो फिर मुझे सच जानना है... पूरा सच...", उसकी नज़रें अभी भी मेरे चेहरे पर थी। मैं इस कश्मकश में था कि सच कहूं या ना कहूं। 
   "छोड़ो न पीहू... अब कुछ नशे में कोई कुछ कह जाए तो..."
    उसने मुझे सख्ती से बीच में ही रोकते हुए कहा, "मुझे तुम्हारी फिलासफी नहीं सुननी है, मुझे सच सुनना है... कहो..."
   मैंने अपनी नज़रें झुकाए हुए उसे पूरी बात बता दी, "तुमने सत्य से कहा कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड एक अच्छा इंसान है... और तुम उसे बहुत-बहुत पसंद करती हो... इतना...", फिर मैंने अपनी दोनों बाहें फैला दी।
   मेरा इतना कहना था कि वह खिलखिला कर हंस पड़ी फिर उसने भी अपनी दोनों बाहें फैला कर मुझसे पूछा, "सच में... मैंने कहा इतना..."
   मैंने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा। उसकी इस अदा पर मुझे भी हंसी आ गई। मैंने भी हंसते हुए कहा, "नहीं इतना नहीं थोड़ा सा और फैलाव न..."
    उसने भी मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ पूरी तरह से फैला दिए और मुझसे कहा, "इतना न, कि कुछ और ? अब देखो तो हाथ भी नहीं फैल रहे हैं..."
    "नहीं बस हो गया... इतने में तो पूर आसमां समा जाए..."
    उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, "तो क्या, मेरे प्यार को इतना काम समझा हैं..."
   मैं भी उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, "न जी, बिल्कुल नहीं... सत्य के लिए तुम्हारा प्रेम तो इतना विस्तृत है कि संपूर्ण ब्रह्मांड समा जाए..."
    "बस बस अब आगे कहो... हमेशा राइटर्स स्किल जताने की जरूरत नहीं होती है...", उसने मुझे बीच में रोकते हुए कहा। 
  "पीहू कल रात तुम्हारी हालत देखकर मैं सचमुच बहुत ही डर गया था... यदि तुम्हें कुछ हो गया होता तो मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाता... मैं पीता हूँ तो क्या हुआ, लेकिन तुम मत पिया करो। और वैसे भी मैंने तुमसे वादा किया है न कि मैं देवदास नहीं बनूंगा। उस समय मुझे लगा यदि शराब की गर्मी तुम्हारे दिमाग में चढ़ गई तो न जाने क्या हो जाएगा... इसलिए ठंडे पानी से तुम्हारे माथे में पट्टी करता रहा, तुम्हारे हाथ, पांव को गीले तौलिया से पोंछता रहा। जब थोड़ी देर बाद तुम्हारी बेचैनियां कम हुईं, शरीर का ताप कम हुआ तो हम दोनों ने राहत की सांस ली थी..."
   "मंगल चाचा ने भी देखा ...?"
   "हां उसने मेरी पूरी मदद की। वो तुम सभी का बहुत सम्मान करता है... वह तो सत्य को बुलाने के लिए जाने वाला था... मैंने ही रोक दिया था..."
   "तुमने ठीक किया... लेकिन तुमने मेरी इतनी सेवा की... माथा और हाथ तो ठीक है... मेरे पांव तक पोछे... यार तुमने तो मुझे भगवान के सामने भी गुनहगार बना दिया... पता नहीं कौन सा नर्क भोगना पड़े…?"
   "ये तुम क्या कह रही हो, हां मानता हूँ कि हिन्दू प्रथा में पत्नी के पैर नहीं छूने चाहिए... लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि पत्नी किसी तकलीफ में हो और आप इस प्रथा को लिए बैठे रहें... तुम समझ रही..."
   उसकी नज़ारे मेरे चेहरे में टिकी थीं, होठों में हल्की मुस्कान थी, "नहीं समझी रही न, थोड़ा और डिटेल में समझाओ..."
    "...अच्छा तो सुनो... इसे ऐसे समझो...", मैं उसकी तरफ देख उसे समझाने की कोशिश करने जा ही रहा था कि अचानक उसकी हल्की मुस्कान के अर्थ मुझे समझ में आ गए, यानी कि मेरे दिमाग की ट्यूबलाइट देर से ही सही लेकिन जली। मुझे हंसी आ गई, "यार मैं भी पागल हूँ, मैं कौन-सा सत्य हूँ कि तुम नर्क में चली जाओगी... बॉयफ्रेंड तो पैर दबा सकता है न... तो तुम बेफिक्र रहो..."
    "अच्छा तो ठीक है, तो अब मैं मान लेती हूँ कि हसबैंड से बेहतर बॉयफ्रेंड होता है। कभी सत्य को समझाओ यही, उसे तो बस हसबैंड बनना है…", उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा।
   "वो भी क्या करे, उसकी भी फैमिली है, यह समाज है, एक लड़की के साथ सारी उम्र रहना है तो यह भी जरूरी है... लेकिन यहां बात रिश्ते की नहीं आपसी समझ की है। और फिर हम  हसबैंड-वाइफ के रिलेशनशिप में रह कर भी अपने संबंधों को एक अच्छे दोस्त या फिर ब्वॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड जैसा रख सकते है, यह तो हम पर निर्भर करता है न ...", मैंने उसे समझाते हुए कहा।
   "तो अपनी कहो, और पूरी ईमानदारी से कहो... क्या तुम ऐसा कर पाओगे ... आई मीन तुम्हारा ईगो...", उसने पूछा।
   मैने उन्मुक्त और दृढ़ता के साथ जवाब दिया, "एक तो शादी करने का ख्याल मन में है नहीं... सच कहता हूँ। पर किस्मत की कौन जाने... यदि हुई तो उसके कहने या जताने की बात तो दूर, यदि मुझे आभास भी हो गया कि उसे तकलीफ है तो उसके पैर दबाने में भी मुझे कोई संकोच नहीं होगा..."
     फिर मैने हंसते हुए कहा, "और ये बात तुम्हे इंप्रेस करने के लिए नहीं कह रहा हूँ... यदि कभी शादी हुई तो तुम मेरी वाइफ से पूछ लेना... और मुझे नहीं लगता कि सत्य की विचारधारा भी मुझसे अलग होगी... तो यदि कहीं इस डर से तुम शादी..."
   "नहीं यार वो बात नहीं है... लेकिन मान लो कभी तुम्हारी वाइफ ने तुम्हारे पैर छूने की कोशिश की तो क्या तुम उसे रोकेंगे ?", उसने संजीदगी से पूछा था।
   "नहीं ... यदि उसे ऐसा करने पर कोई खुशी मिलती है तो मैं उसे नहीं रोकूंगा... बल्कि ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि उसकी हर चाहत पूरी हो... लेकिन ये तुम मुझसे क्यों पूछ रही हो...", मैने उसे सवालिया नजरों से देखते हुए पूछा था।
    "ऐसे ही, लेकिन मैं चाहूंगी कि तुम ये बात याद रखना... और हां तुम्हारी टी-शर्ट मेरे बिस्तर में कैसे आई ..?"
    फिर मैने उसे आगे की सभी बाते बताई। उसने शोखी से मुस्कुराते हुए पूछा, "अच्छा ! तुमने मुझे अपनी बाहों में थाम रखा था... और मैंने तुमसे आई लव यू कहा ? वाॅडरफुल ! क्या रोमांटिक सीन रहा होगा यार... सोच कर ही मेरे बदन में अजीब सी हलचल होने लगी... देखो ?", कहते हुए उसने अपनी हथेली मेरे सामने कर दी, "प्यार में डूबे दो पंछी एक दूसरे की बाहों में... वाव !! क्या सीन रहा होगा..."
   "हां पीहू ! शायद कोई तीसरा देखता तो यही समझता... इसीलिए कहते हैं न कि कभी-कभी आंखों का देखा भी झूठ होता है... जब तुमने सारी बातें मुझसे सत्य समझ कर की तो यह भी उसी के लिए ही कहा होगा न ... मेरे लिए थोड़े ही...?"
    "हो सकता है... और नहीं भी... तुम्हे क्या महसूस हुआ था ?", उसने मेरे चेहरे में अपनी नजर रखते हुए कहा। मैं सर झुकाए हुए बोला, "मुझे ? पता नहीं..."
   कुछ देर बाद उसने बात बदलते हुए कहा, " सॉरी... मेरी वजह से कल तुम्हें बहुत परेशान होना पड़ा... लेकिन मैं यह सोचती हूँ की कल यदि आखिरी में मुझे पीने से तुमने न रोका होता तो न जाने क्या हालात बनते ? मैंने सत्य के साथ कुछ ज्यादा ही पी ली थी..."
   "हां पीहू ! जब तुम ठीक से खाना नहीं खा रही थी तो मैं समझ गया था कि तुम्हें ज्यादा हो गई है, इसलिए मैंने तुम्हें और नहीं पीने दी..."
   "अब मैं क्या कहूं... बस तुम्हारे सामने शर्मिंदा हो सकती हूँ...", उसने शर्मिंदगी जाहिर करते हुए कहा।
   "नहीं पीहू !! ... आगे मैं तुमसे जो कहने वाला हूँ, उसे सुनकर शायद तुम ऐसा न समझो... पाँच साल पहले एक ऐसी ही रात थी... हम दोनों में एक शर्त लगी कि रात को कोई नहीं सोएगा। जो सो गया वह शर्त हार जाएगा। सितारों से भरे आसमान के नीचे उसने मुझे कुछ कहानियां सुनाई, फिर थककर कुछ देर आराम करने के लिए मेरे पैरों में अपना सर रख लेट गई। कुछ देर बाद उसे नींद आ गई। सुबह होने से पहले मैं उससे कहना चाहता था कि तुम अपनी चारपाई पर चली जाओ... मैं उसे जगाने के लिए उस पर झुका था। पहली बार मैंने उसे इतने नजदीक से देखा। चुनरी की ओट से झलकता उसका चेहरा... उसका रूप, रंग, उसकी सुंदरता, उसका यौवन देखकर मन में एक चोर जागृत हुआ था... और मैंने दुपट्टे की ओट से उसके होठों को धीरे से किस कर लिया था... जब कल तुम मेरी बाहों में थी वही चोर फिर से जागृत हुआ..."
    "यूं मीन... फिर...", उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया था।
   "नहीं... नहीं... पीहू!  ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, मेरा विश्वाश करो। यदि किसी अच्छे इंसान से अनजाने में या फिर परिस्थितियों के कारण कोई जुर्म हो जाता है... तो उसका बोध होते ही वह जिस आग में जलता है... उस आग में मैं जल चुका था।  एक पल के लिए मुझे लगा कि तुम्हारे 'आई लव यू' शब्द मेरे लिए हैं, और शायद इसीलिए मन में एक क्षण के लिए ये ख्याल आ गया था..."
   वह कुछ देर तक सोचती रही फिर गहरी सांस लेते हुए बोली, "तो कहानी यह है कि एक लड़के की बाहों में एक खूबसूरत लड़की है, जैसा कि मैं खुद को मानती हूँ... जो बेखुदी में उसे आई लव यू कहती है। और जहां तक मैं समझती हूँ कि वह लड़का उस लड़की को पसंद भी करता है, और शायद मन ही मन उसे चाहने भी लगा है... एम आई राइट ?"
    मैंने कोई जवाब नहीं दिया, चुप ही रहा। सांस लेने के बाद उसी ने आगे कहना शुरू किया, "फिर उस लड़के के मन में उस लड़की को किस करने की लालसा जागी... चाहता तो कर भी लेता... किसी और को क्या स्वयं उस लड़की को भी खबर न होती... लेकिन उसने ऐसा नहीं किया..."
    फिर उसने मेरी तरफ तेज नजरों से देखते हुए एक झटके में कहा, "बेवकूफ समझा है मुझे...? मैं कैसे मान लूं ? बोलो... है कोई प्रूफ...?"
    "तो तुम्हे मेरी बात का विश्वास नहीं !! ...", मैने अविश्वास से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
   "नहीं ! बात विश्वास या अविश्वास कि नहीं... अदालत प्रूफ मांगती है...", उसने गंभीरता से कहा।
    "अच्छा !!! तो यहां अदालत लगी है... मैं कटघरे में और तुम जज हो... वाह !! लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी अदालत तो ऊपर वाले की होती है न...?"
    उसके इस बदले अंदाज को देखकर मेरी आँखें भर आई, "लेकिन जरा ठहरो... मेरे पास एक प्रूफ है... कभी उसके कहने पर भी मैंने उसकी सच्ची कसम तक न खाई, डरता था कि कहीं उसे कुछ हो न जाए... लेकिन आज तुम्हें यकीन दिलाने के लिए मैं उसकी कसम ..."
    उसने फुर्ती से अपनी हथेली मेरे होठों में रखते हुए कहा, "क्या बच्चों जैसी हरकतें करते हो... मजाक भी नहीं समझते क्या ? चल दिए कसम खाने ? तुम्हें तो एक थप्पड़ मारना चाहिए..."
    फिर उसने मेरे आंसुओं को पोंछते हुए कहा, "और देखो तो जैसे आंसू पलकों में ही रखे रहते हैं..."
   यदि आपकी आंखों को पता पड़ जाए कि उससे बहने वाले आंसुओं को पोंछने वाला उसके नजदीक कोई है तो फिर वो कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। वही हालत मेरे आंखों की हो रही थी।
    वह मेरे नजदीक खिसक हाई और मेरे चेहरे को अपने कंधे में रखते हुए बोली, "रियली आई एम सो सॉरी... प्लीज पीहू को माफ कर दो... है विश्वास तुम पर, और सच मानो खुद से ज्यादा है ! मुंबई में मैंने बहुत कुछ देखा है दोस्त। वहां प्यार मोहब्बत एक खेल है, ऊंची सोसाइटी, ऊंचे लोग, सिर्फ पैसे की कीमत है। इंसानों की कीमत नहीं है... न इंसानी जज्बातों की कीमत है। तुम जैसे राइटर्स की कहानी से जज्बातों से भरी मूवी बना देते हैं... लेकिन वास्तव में वहां की ऐसी लाइफस्टाइल नहीं है... मैं जानती हूँ तुम वैसे नहीं हो... नहीं तो जरा सोचो ऐसा मौका कौन छोड़ता है...?  क्या मैं इतनी बेवकूफ हूँ, क्या मैं इतना नहीं समझती कि यदि तुम झूठे होते तो तुम इस घटना का जिक्र तक न करते..."
   मैं चुपचाप सुन रहा था। उसने आत्मीयता से मेरे आंसू पोंछते हुए आगे कहा, "और यदि मान लो परिस्थितियों के आधीन तुम ऐसा कर भी गए होते और यदि तुम मेरे सामने स्वीकार कर लेते तो भी मैं तुम्हें तहे दिल से माफ करती... और यह बात हम दोनों के बीच में ही रहती... तुम्हे किसी के सामने शर्मिंदा नहीं होने देती। मैं तुम्हारी फीलिंग समझ सकती हूँ। एक लड़की जिसे तुम पसंद करते हो तुम्हारी बाहों में आकर तुम्हें आई लव यू कहे और तुम उसे एक किस भी न कर सको..."
    "रुको पीहू !"... मैने उसे बीच में रोकते हुए कहां, "मैंने तुम्हें किस किया था, होठों में न सही.. तुम्हारे माथे को चूमा था..."
  यह सुनकर उसने मुझे गले से लगा लिया, "ये तो बहुत अच्छा किया... चलो इस बहाने पापा-मम्मी का दुलार भी मिल गया...थैंक्स..."
   फिर उसने अपनी नजरें अपने पैर में रखते हुए धीरे किंतु आत्मविश्वास के साथ कहा, "कभी तुमने ही कहा था कि अवचेतन मस्तिष्क में वही रह सकता है जो कम से कम एक बार जीवन में गुजारा हो या जिसके बारे में हमने कभी न कभी सोचा हो। तो इस तरह तुम्हारे बारे में जो कुछ भी कहा वह सच ही हुआ न ? फिर भी सही गलत जो कुछ भी कहा है, तो तुम उसे अब सच ही समझना... वैसे भी कहते हैं न कि नशे में इंसान सच कहता है। यदि कोई बात बुरी लगी हो तो सॉरी ... माफ कर देना... अब तो जा ही रहे हो... कोई उदासी या दुख ले के मत जाना... कोई रोमांटिक कहानी लिखना तो उसमें लीड कैरेक्टर का नाम पीहू रखना... मै पढ़ूंगी... तो तुम याद...", उसके स्वर की उदासी अब आंखों की नमी के रूप में झलकने लगी थी। कंठ अवरुद्ध हो गया।
     उसकी उदासी और आंखों की नमी देख मुझे अपनी कविता की कुछ पंक्तियां याद आईं थी...
तू प्यार किसी को करती होगी, 
तो फिर कैसे करती होगी, 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपना प्यार भूल गया हूँ,
जब से तेरे नयनों में,
खुद को बसते देखा है....
     यदि सामने वाला भावुक हो जाए तो उससे कहीं अधिक भावुकता मेरे अंदर समा जाती है। मैने भी उसकी पीठ में हाथ फेरते हुए कहा, "नहीं पीहू, तुमसे भला क्या गलती हो सकती है ? तुम्हारी भावनाएं तो निश्चल और पवित्र हैं, एक पल के लिए मेरी ही भावनाएं दूषित हो गई थी जिसके लिए मैं जिंदगी भर शर्मिंदा रहूंगा..."
   वह मुझसे अलग हो कुछ मुस्कुराते हुई बोली, "ये पछतावा तुम अपने मन में कभी न पालना... जो हुआ उसमें हम दोनों बराबर के हिस्सेदार हैं.. अब चलों यार, छोड़ो इन बेवजह की बातों को। हम दोनों ही एकदूसरे को मुआफ़ करते हैं... आखिर हम जवां दिल हैं.. कुछ भूले लाज़मी हैं... न हुई तो पता नहीं लोग क्या समझे... सो रिलैक्स... कूल डाउन... लेकिन एक मिनट... एक मिनट... जहां तक मुझे याद है... कल तुमने मेरे लिए एक लव लेटर लिखा था न... मुझे वह लेटर पढ़ना है...", उसने मेरा बैग उठाते हुए कहा।
    "नहीं... रुको... पीहू रहने दो प्लीज... देखो मैंने कल रात कोई खत नहीं लिखा था तुम्हारे लिए...", मैने उसे रोकना चाहा।
   लेकिन तब तक मेरी डायरी उसके हाथ में आ चुकी थी। दूसरे ही क्षण उसने उस पेज को मुझे दिखाते हुए कहा, "तो फिर यह क्या है... कहते हो नहीं लिखा ? तुम किसी की आंखों में आंखें डाल कर भी झूठ बोल सकते हो न ? ...  मैं जानती हूँ। तो बोलो,  मेरी आंखों में आंखें डालकर एक झूठ और बोलो.... लो पढ़ो, मैं सुनना चहती हूँ...",
   "मेरा पढ़ना जरूरी नहीं है... लिखा तो है... तुम खुद ही पढ़ लो...?", मैंने शांत मन से कहा।
   "नहीं .... पढ़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा ...", उसने दृढ़ता से कहा, "मैं सुनना चाहती हूँ, वो भी तुम्हारी आवाज में। एक बार लिखे हुए शब्द झूठे हो सकते हैं, लेकिन जुबान से निकले शब्दों की इंटेंसिटी उनकी सच्चाई को बयां करती है..."
    "तो फिर तुम शायद भूल रही हो कि मैं एक अच्छा एक्टर भी हूँ...", मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
    जवाब में वह भी थोड़ा सा मस्कुराई, "तो चलो फिर यही सही। आज देखती हूँ तुम कितने बड़े एक्टर हो ?... तो चलो एक्टिंग ही सही... मुझे यह भी मंजूर है..."
     मैने पढ़ना शुरू किया, वह गाल में अपनी हथेली रखे ध्यान से सुनती रही। मैने पूरी कोशिश की थी कि मेरे लिखे शब्दों के भाव मेरे चेहरे में न आने पाए, और मैं कुछ हद तक कामयाब भी रहा। लेकिन उसने पूछा, "ये खत तुमने कल की शाम को याद करके लिखा है न ..?"
    "हां ... जब कल शाम को हम इसी आम के पेड़ के नीचे बैठे थे। लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रही हो...", मैने उसके चेहरे में देखते हुए पूछा।
   "वो इसलिए कि...", वह उठते हुए बोली, "चलो इस जीवन का आखिरी एक्ट मैं तुम्हारे साथ करना चाहती हूँ... अब उठो..."
    मैने एतराज किया, "देखो खत पढ़ना था तो पढ़ दिया न... अब एक्टिंग की क्या जरूरत है...?"
    "है न ! ... अब सीधे से उठ जाओ नहीं तो मुझसे मार खाओगे...", इस बार उसने मेरा हाथ पकड़ जबरन चारपाई से उठा लिया।
    कुछ देर में ही सारा सेटअप उसी तरह था। एकदूसरे से सट के पेड़ पर टिक कर बैठे। 
     उसने मेरे एक कंधे पर अपनी बांह रखते हुए नर्म लहजे में पूछा, "बॉयफ्रेंड ! अब कहो भी...?"
    "अब क्या कहूं पीहू... धीरे-धीरे सब तो कह दिया... और फिर अब कुछ भी कहने में डर-सा लगने लगा है...", मैने उसकी तरफ तिरछी नजरों से देखते हुए कहा।
     उसने भी मेरे चेहरे की तरफ मासूमियत से देखते हुए पूछा, "डर !! ... कैसा डर बॉयफ्रेंड ?"
   मैंने आसमान की तरफ देखा, फिर गहरी सांस लेते हुए बोला, "हां पीहू डर... ब्रोकन हार्ट है न ! कहीं तुमसे जुड़ गया... तुमसे प्यार हो गया तो ?"
    "तो अब तक न हुआ...?", उसने अपना चेहरा मेरी नजरों के ठीक सामने करते हुए पूछा।
    मैने उसकी आंखों में आंखें डाल कर संजीदगी से कहा, "न... नहीं हुआ..."
    इस बार वह कुछ हंसते हुई बोली, "मैने कहा था न कि तुम किसी की आंखों में आंखें डाल कर भी झूठ बोल सकते हो ? लेकिन अब तो मेरा भी ब्रोकन हार्ट हो गया...", फिर उसने आह भरते हुए आगे कहा, "हाय ! इतनी खूबसूरत और टैलेंटेड लड़की से तुम्हे अब तक प्यार न हुआ...? तो इतने दिनों तक फ्लर्ट और एक्टिंग ही करते रहे...?"
    मै चुप था बस उसकी गहरी बादामी आँखों में देखता रहा, "क्या सोच रहे, लो हाजिर है तुम्हारी फिल्म की नायिका... अब करो एक्टिंग... "
    मैने अपनी नजरें झुका ली। 
    "कैसे एक्टर हो... अब कहां गई एक्टिंग स्किल ? बोलो...?", उसने प्यार से पूछा।
     मै फिर भी चुप था। उसने अपने दोनों हाथ मेरे कंधे में रख धीरे से अपना माथा मेरे कंधे में रख दिया। अगले ही पल मुझे महसूस हुआ जैसे भावनाओं का प्रबल वेग मेरे कंधे से टकरा के मेरे अस्तित्व को हिला गया। 
    "न ... पीहू ! ये क्या ... पीहू बस ... ?", उसकी प्रबल भावनाओं का वेग मेरी वाणी को कंपित कर गया।
     "मै कहां रो रही हूँ... बस एक्टिंग कर रही हूँ...", उसने अपने आप को रोने से रोकने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा।
     कुछ देर बाद मैंने उससे कहा, "तुमने सच कहा था कि यदि मैं यहां से एक बार गया तो फिर लौट के कभी न आऊंगा... जिंदगी ने मुझे ठगा है पीहू... कभी किसी ने वचन लिया कि यदि फिजिकली मेरे पास न रह पाई तो भी मैं उसे कोई इल्जाम न दूं। कभी मिलने के लिए जीवन भर न मिलने की शर्त ! और अब ?... न मिलने की शर्त पर मिलने की आस... उफ़ ! बताओ ऐसे आध्यात्मिक प्यार का मैं क्या करूंगा जो मेरी खुशियां, दुख, दर्द बांटने के लिए मेरे पास ही न हो...?  एक ऐसा रिश्ता जो बारिश और पपीहे के बीच होता है... एक ऐसा रिश्ता जो चंदा और चकोर के बीच होता है... यही सब कहा था न ? हो कर भी वे एक दूसरे के कभी नहीं होते ... क्या करूंगा मैं ऐसे रिश्ते का ?"
   बोल मैं रहा था और मेरे हर एक शब्द में रो वह रही थी, "तुम सत्य को अजनबी कहती हो... जबकि सच यह है कि तुम्हारी कहानी का अजनबी पात्र मैं हूँ। वह तुम्हारा अपना है तो उसे पूरे मन से अपनाओ। कल को तुम्हें बहका देने का इल्जाम मुझ पर लगे... तुम बेवफाई के ताने सहन करो... मेरा दोस्त अपने ही बेस्ट फ्रेंड के सामने शर्मिंदा हो... इससे बेहतर है कि अब मैं तुम्हारे लिए फिर से अजनबी बन जाऊं..."
    जब दिल में जज्बातों की आंधी चलती है तब एक पल के लिए हम लोक-लाज, मान-मर्यादा, वफ़ा- बेवफा जैसे शब्दों को भूल जाते हैं। हमें सिर्फ इतना याद रहता है कि इस एक इंसान के साथ बीत रहे पल हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, और हम उसे खोने से डरते हैं। वही हालत मेरी हो रही थी। मैं इस पल को पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ जीना चाहता था। उसके साथ रोते हुए मैने उसे अपनी बाहों में समेट हृदय से लगा लिया। सब कुछ भूल कर कि यदि सत्य और ज्ञान आ गए तो क्या होगा... मंगल और कमली ने देख लिया तो क्या होगा... ?
    बेखबर इस बात से भी की यदि इन पेड़-पौधों ने, इनमें बैठे परिंदों ने, सूरज की रौशनी ने, बहती हुई हवाओ ने, यानी कि इस पूरी प्रकृति ने और अंत में हमारी नियति ने भी यदि हमारे खिलाफ गवाही दे दी तो अंजाम क्या होगा... मैने भींगी आवाज में कहा, "... बेखुदी में ही सही पीहू... तुमने मुझले एक सच कहा था कि... मैं अर्थात तुम्हारा बॉयफ्रेंड एक अच्छा इंसान है... और तुम उसे बहुत-बहुत पसंद करती हो। ठीक हुआ कि कल रात तुम सत्य के साथ घर न गई। यदि उसके सामने तुमने ऐसा कुछ कहा होता तो न जाने वह क्या समझता ? मैं जानता हूँ कि ऐसा कहने पर कोई बुराई नहीं लेकिन जिसे हम प्यार करते हैं न... उसे खोने से डरते हैं। मैंने कहा न,  मैं अपनी किस्मत के द्वारा ठगा गया इंसान हूँ। किसी ने एक पल में मुझे छोड़ा है। हो सकता है, उसके लिए यह निर्णय लेना मुश्किलों से भरा रहा हो, लेकिन मुझे तो कुछ पता ही नहीं था कि मुझे छोड़ा क्यों जा रहा है। 
    तब भी किस्मत के इस फैसले को मैंने मंजूर किया, रो लिया, तड़प लिया लेकिन उससे कभी कोई सवाल नहीं पूछा। तुम्हारे हृदय की बात जानते हुए वही व्यवहार यदि मैं तुम्हारे साथ करूं तो गलत होगा न ?  जिस दर्द से मैं गुजरा हूँ, उसी दर्द से मै तुम्हें गुजरने दूं ? बताओ ये कैसे होने दूं ? 
   हां पीहू ! तुम मुझसे कहो न कहो लेकिन मैं तुम्हारे हृदय की बात जान कर भी अंजान बना रहूं, और मैं भी तुमसे न कुछ कहे, न कुछ बताए तुम्हे छोड़ कर चला जाऊं ! ये कैसे करू ? मै यह भी जानता हूँ कि तुम सत्य के साथ एक ही बेडरूम शेयर करते हुए भी उसके साथ फिजिकल नहीं हो, यदि होती भी, तो भी मेरी चाहत में कोई फर्क नहीं होता। 
     इसीलिए मैंने डायरी में जो भी लिखा है, वह सच है। हू-ब-हू उसी तरह तो नहीं कह पाऊंगा ... लेकिन मेरी प्यारी पीहू अपने हृदय की बात निश्चल भावनाओं के साथ आज तुमसे कहता हूँ,
      मै जनता हूं कि हम दोनों ही नहीं जानते कि हमें एकदूसरे से कितना और किस हद तक प्यार है... यह भी पता नहीं कि यह प्यार है भी या नहीं... पर इतना जरूर पता है कि यह प्यार से किसी भी तरह कम भी नहीं... यदि ऐसा न होता तो तुमसे जुदा होने की सोचने पर भी मेरी रूह क्यूं कांप जाती है ? क्यूं एक पल के लिए मेरी सांसे रुक-सी जाती हैं ? अपनी सारी भटकन को छोड़ अब क्यूं तुम्हारे ही पास ठहर जाने का दिल करता है ? 
    मुझे ऐसा क्यूं महसूस होता है कि जैसे तुम्हारे साथ गुजरने वाली हर शाम-ओ-सुबह, ये सूरज, बहती हुई हवाएं, ये धरती, ये आसमान, ये मौसम, ये बहारें, आकाश में उड़ते हुए असंख्य परिंदे, ये सभी हमारी मोहब्बत की गवाही दे रहे हैं...
      क्यूं चाहता हूं कि मेरी हर एक सांस, दिल की हर एक धड़कन, मेरे हर एक जज्बात तुमसे बार-बार कहें, आई लव यू पीहू ! ... आई लव यू ... मुझे तुमसे प्यार है और बे-शुमार है।
     क्यों मेरा भी दिल कहता है कि तुम भी मुझे अपनी बाहों में ले कर मुझे गले से लगा लो और फिर अपने दिल की हर बात मुझसे कह दो। प्यार से मेरे माथे को चूम कर तुम भी कहो, मै भी तुम्हे बे-शुमार प्यार करती हूँ...
     भले ही हम एक दूसरे से कोई वादा न करें और न ही अगले जन्म में फिर मिलने की कोई आरजू रखे। बस इसी जीवन को एकदूसरे के साथ तो जी ले। मै तुम्हारे होठों की मुस्कुराहट, तुम्हारे गालों की सुर्खी, तुम्हारी नजरों की कशिश, तुम्हारे बालों की भीनी-भीनी खुशबू, इन सभी को अपने पूरे वजूद में हर एक पल महसूस कर सकूं....
      ... मैं इस धरती पर तब तक रहूं जब तक कि तुम मेरे साथ रहो। इस जीवन की हर एक शाम-ओ-सुबह, मै तुम्हारे साथ जी लूं... तुम्हारी आंखों में डूब कर इस दुनिया की सबसे बेहतरीन प्रेम कहानी तुम्हारे दिल के कागज़ में लिखूं। पूरी शिद्दत के साथ तुम्हें गले लगा कर, तुम्हारे दिल की धड़कनों को महसूस कर, तुम्हारे कानों में इस दौर का सबसे अच्छा रोमांटिक गीत गुनगुना लूं। तुम्हारी सांसों की गर्मी, तुम्हारे लहज़े की नरमी को समेट कर इस दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता तुम्हारे लिए लिखूं... दिल के कैनवास पर कभी न मिटने वाली तुम्हारी सूरत को सहेज कर रख लूं।
      जीवन में प्यार एक ही बार होता है इस भ्रम से दूर जाना चाहता हूँ... हां, अब तुम्हारे साथ जीना भी चाहता हूँ और तुम्हारे ही साथ मरना भी चाहता हूँ...
     हर एक लम्हा जीना चाहता हूँ, जिसमें तुम हो। ... कहो पीहू ! क्या तुम नहीं चाहती ?... क्या तुम नहीं चाहती कि मैं तुम्हारे पास ही रह जाऊं ?... और तुम मेरी गोद में अपना सर रख के ढलती हुई शामों को देखा करो, उसे महसूस किया करो ? बोलो पीहू...  कुछ तो कहो...?
      आज क्यों मेरे सब्र का बांध टूट गया ? क्यूं ये मोहब्बत इंसान को इतना मजबूत बना देती है कि फिर दुनियों की कोई भी बंदिश उसे रोक नहीं पाती ?
      जैसे कि आज मैं खुद को न रोक पाया और तुमसे अपने दिल की सारी बातें कह दीं..!! अपने दिल की सच्ची बातें तुमसे कह देना यदि तुम्हारी नजरों में कोई गुनाह है तो फिर समझ लो यह गुनाह हो गया मुझसे !और मेरी इस आत्म-स्वीकृत को मौन होकर सुन लेने से यदि तुम किसी पाप की भागीदार बन गईं हो तो वह पाप भी मैं अपनी सर लेता हूं, और तुम्हारी तरफ से हर एक सजा के लिए मैं तैयार हूँ..."
   "नहीं... नहीं...", इस बार पीहू का सब्र टूट गया। उसने अपनी हथेली से मुझे चुप कराते हुए कहा, " नहीं... ऐसा नहीं कहते...", फिर अगले ही पल उसने भी कस कर मुझे गले से लगा लिया।
     पीहू ! ... मानवीय संवेदनाओं से परे यदि कोई दुनिया होती है तो वह दुनिया देवताओं की है, और ईश्वर साक्षी है कि हम देवता नहीं। इसलिए हमारी भावनाएं प्रबल होती हैं, हम महत्वाकांक्षी, लालची और कुछ हद तक स्वार्थी भी होते हैं।
    आज मैंने ज्ञान से कहा था कि जहर को जहर ही मारता है। प्यार में टूटे हुए दिल को एक प्यार से भरा दिल ही जोड़ सकता है। सच में पीहू... तुम बहुत प्यारी हो.... तुम्हारी भावनाएं निश्चल है... यहां तो लोग अपनों के दर्द को नहीं समझते हैं... लेकिन तुमने एक अजनबी के दर्द को समझा। 
     किसी से कमिटेड होने के बावजूद उसे अपने बॉयफ्रेंड का दर्जा दिया। गलत होने पर उसे डांटा और उसके आंसू बहने पर उसे गले लगा खुद भी रोई ! तुमने एक खूबसूरत दोस्ती का एग्जांपल मेरे सामने रखा और मैंने क्या किया...? तुमसे ही प्यार कर लिया !!"
    उसने उसी तरह मेरे कंधे पर अपना सर रख रोते हुए कहा, "किसने किससे मोहब्बत की तुम क्या जानो, मै क्या जानू ! लेकिन तुम्हारी एक बात मुझे बहुत ही अच्छी लगी कि तुम स्वीकार करते हो... इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए होती है, यह हर कोई नहीं कर पाता... और एक एग्जांपल तो तुम्हारे सामने ही है..."
     उस पल दिल में आया कि पूछ लूं कि कौन-सा एग्जांपल ? लेकिन यह पूछना मुझे बेमानी लगा। सब कुछ जानते हुए, महसूस करते हुए यह पूछना उसकी संवेदनाओं को ठेस पहुंचाना होता। लिहाजा मै चुप ही रहा।
      कुछ देर बाद मैने बात बदलते हुए कहा, "चार दिन पहले एक टूटा-बिखरा इंसान तुम तक आया और जरा देखो आज जब तुमसे दूर जा रहा है तो देवत्व का अभिशाप ले कर... हां पीहू... देवता बनकर तुमसे दूर हो जाना मेरे लिए किसी अभिशाप से कम नहीं..."
    "मैं तो तुम्हें रोक रही हूँ न ? जाने की जिद तो तुम्हारी है... तुम्हारे यहां रुकने से भला किसी को क्या एतराज होगा ?  क्वालिफाइड हो, तुम्हे सत्य की फैक्ट्री में या स्कूल में जॉब भी आसानी से मिल जाएगी। इतना बड़ा घर है... शादी करो, अपने परिवार के साथ ही रहो... हम सभी एक अच्छे दोस्त की तरह रहेंगे...?", उसने आशा भरी नजरों से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
    "नहीं पीहू... अब ये संभव नहीं होगा... एक दूसरे के मन में जो फिलिंग्स है, उसे जान लेने के बाद तो यह कभी भी संभव नहीं हो पाएगा। दो-चार दिन का रुकना तो ठीक है, लेकिन ... लेकिन हमेशा का रुकना तुम्हारी जिंदगी तबाह करेगा...
      मैं सत्य पर कोई इल्जाम नहीं दे रहा हूँ, बल्कि यह तो मानवीय स्वभाव है। कभी न कभी वह हमारे रिश्ते को शक के दायरे में लाएगा... और इसमें उसकी गलती भी क्या होगी ? बताओ ? एक बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड एक दूसरे के अच्छे दोस्त कितने दिनों तक बने रह सकते हैं ?  किसी न किसी पल हम खुद को नहीं रोक पाएंगे जैसे कि अभी न रोक पाए ? यदि मान लो सत्य यह सब देख और सुन रहा होता तो क्या केवल इसे महज एक्टिंग समझ कर भूल जाता ? भले ही वह हमसे कुछ न कहता, कोई सफाई न मांगता लेकिन उसके मन में एक गांठ पड़ जाती... और फिर धीरे-धीरे न जाने कितने गांठे पड़ती जाती...
    यह भी जानता हूँ कि आज सत्य ऐसा नहीं है... तो फिर उसे ऐसा बनने पर हम क्यूं मजबूर करें ? उसे तो मैं कल रात ही समझ गया था जब उसने तुम्हे लगभग बेहोशी की हालत में मेरे पास छोड़ दिया और बाबा का ध्यान रखने चला गया था ... इतना विश्वास वहीं इंसान कर सकता है जिसके अंदर स्वयं छल-कपट न हो... तुमने सही और बेहतर इंसान को चुना है... मेरी बात मानो, उससे विवाह करो, एक सुखी जीवन जिओ और मुझे अलविदा कहो। लेकिन जाने से पहले मैं तुमसे एक सवाल पूछूंगा। जवाब दोगी न ?
      अपने आंसू पोछ मेरे हाथों को पकड़ते हुए उसने पूछा, "मान लो मेरे पास तुम्हारे सवाल का कोई जवाब न हुआ तो क्या तुम मुझसे हमेशा के लिए रूठ जाओगे...?"
    "नहीं, इसमें रूठने जैसी क्या बात है ? यदि तुम्हारे पास जवाब न हो तो मत देना... और ये हमेशा के लिए क्या...? मैं तो पल भर के लिए भी न रूठूं..."
   और ये पहली बार हुआ कि उसने मेरा चेहरा अपनी दिनों हथेली में ले मेरे माथे को धीरे से चूम लिया। कुछ देर तक उसी तरह मेरे माथे में अपना सर झुकाए रोती रही। उसकी आंखों से टपकाने वाले हर आंसू मेरी पलकों में बिखरते रहे। एक बार फिर उसने मुझे कस कर गले से लगा लिया। उसी तरह सिसकते हुए कहा, "तुम मेरी नियति बनाकर मेरे पास आए, और यह मेरी भूल है कि मैंन तुम्हें अपनी किस्मत समझ लिया..."
     उसका हृदय किसी कपोत के हृदय की तरह धड़क रहा था। शरीर निढाल थका हुआ मेरे ऊपर बिखरा पड़ा था। मैने उसे समेट के अपने बगल में बैठाया। उसका सर मेरे बांए कंधे में लुढ़का हुआ था। ज्ञान ने सच कहा था कभी-कभी न कह पाने का दर्द कह देने के दर्द से अधिक होता है। अब पीहू ने भी उस दर्द से मुक्ति पा ली।। 
   माहौल कुछ गमगीन और भारी हो गया। उसे हल्का करने के उद्देश्य से मैने एक तरफ रखे बैग को उठाते हुए कहा, "पीहू ! इट्स ओक, हमसे कुछ गलत नहीं हुआ, हम किसी के दोषी नहीं, किसी के अपराधी नहीं और न ही हमने कोई जुर्म किया... मैंने कहा है न पीहू मानवीय संवेदनाओ से परे यदि कोई दुनिया होती है तो वह दुनिया देवताओं की दुनियां होती है, और सच मानो हम देवता नहीं। हम इंसान हैं, इसीलिए हमारे जज़्बात हमारी भावनाएं होती हैं..."
   उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "जानती हूँ, इसीलिए मैं भी किसी अपराधबोध से ग्रस्त नहीं हूँ..."
      "लेकिन जब तक साथ हैं तो कुछ हंस ले... मुस्कुरा ले... जी ले... कल का क्या पता...", मैने उसकी तरफ एक जाम बढ़ते हुए कहा, "टेक इट एंड जस्ट रिलेक्स..."
   हमें सामान्य होने में कुछ वक्त लगा, "अरे हां तुम वो गीत सुनाओ न..."
   उसने पूछा, " कौन सा... पूरबे पश्चिमवाँ से आयल जोगिया...?"
   "हां ...", मैने मुस्कुराते हुए कहा, "... पेड़ेतरे आय डेरा डाले ... जैसे कि मैं .. है न ?"
   उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "हां,  तुम पर तो बिल्कुल फिट बैठता है... जब से आए हो... यहीं तो डेरा डाले हो..."
     "अच्छा चलो सुनाती हूँ ... लेकिन पहले ये मुझे दो... तुम अपने लिए दूसरा बना लो...", वह मेरे हाथ से अधूरा जाम लेते हुए बोली।
    "सम्हाल के... ज्यादा हो जाएगी... आराम-आराम से पीना..."
    "शिप लेते हुए न ... चाय की तरह ?", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
    "हां ... बिल्कुल", मैने उसकी ग्लास में अपने लिए बनाते हुए कहा।
    उसने एक शिप ली फिर अपनी आंखे मूंद ली, जैसे वह खुद अपने आप को समेट रही हो। और फिर एक बार इन फिजाओं ने उसके मधुर कंठ से यह लोकगीत सुना ... पूरबे पश्चिमवाँ से आयल जोगिया, पेड़ेतरे आय डेरा डाले...
     आज उसके स्वर में एक अलग ही मिठास थी। आज वह किसी महफ़िल में नहीं, किसी को सुनाने के लिए नहीं, बल्कि खुद अपने लिए गा रही थी। उसके कंठ से निकले इस लोकगीत के हर एक लफ्ज़ हवा में तैर रहे थे, जैसे प्रकृति के सभी वाद्य यंत्र की ध्वनियां स्वतः ही गीत को लयबद्ध कर रही हों। गीत के स्वर उठते ठहरते, फिर जहां गिरना होता गिरते भी, और फिर उठते, और अंत में आ कर ठहर गए। मै उसे मंत्रमुग्ध अपलक देख रहा था। पूरे गीत गाते समय उसकी आंखें बंद ही रहीं। गीत समाप्ति के बाद उसने आंखें खोल किंतु नज़रे झुकाए हुए ही मुझसे पूछा, "कैसा लगा ...?"
   उसके पूछने पर मेरा स्वप्न टूटा, "वंडरफुल ! फैंटास्टिक !! लब्ज़ नहीं मेरे पास  ... कैसे बयां करूं..."
   उसने इसी तरह नज़रें झुकाए कुछ शरमाते हुए पूछा, "उस रात तो इतनी तारीफ न की थी, सिर्फ ताली बजा के रह गए थे ? "
   "सच कहूं तो उस दिन से भी अच्छा आज लगा मुझे ...", मैने संजीदगी से कहा।
    "वो भला क्यूं ...", उसने आश्चर्य जताते हुए पूछा।
    मैं कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, "शायद इसलिए कि तुमने आज अपने आप को आत्मसात कर अपने लिए ये गीत गाया। हृदय से, पूरे मनयोग के साथ स्वयं के लिए किया गाया कार्य सर्वोत्तम परिणाम देता है, और खुद को भी आत्मसंतुष्टि के सर्वोच्च बिंदु पर स्थापित करता है..."
    "लेकिन मैने पढ़ा है और लोगों से सुना भी है कि... परमार्थ के लिए किया गया कार्य सर्वोच्च होता है..."
    "हां सहमत हूँ, बस मेरी तरफ से इतना और जोड़ लो... लेकिन तब जब निस्वार्थ भाव से, स्वयं से प्रेरित होकर, स्वयं के लिए समझ कर किया जाए... वह परमार्थ अधिकतम संतुष्टि देता है..."
    "तुम अलग ही लेबल के इंसान हो...", उसने गहरी दृष्टि से मुझे देखते हुए कहा। 
   मैंने भी उसे उसी की तरह देखते हुए कहा, "बिल्कुल नहीं... इस शराब की बोतल में चिपके हुए लेबल की तरह हम दोनों का लेबल भी एक ही है... बस जाम अलग-अलग हैं..."
   उसने हंसते हुए कहा, "मतलब... दो जिस्म मगर एक जान हैं हम... तो फिर चलो चियर्स..."
   मैने भी मुस्कुराते हुए कहा, "चियर्स... इक दिल के दो अरमान हैं हम..."
   हम कुछ देर तक अमरूद, गाजर खाते रहे, बाते करते रहे पीते रहे। फिर उसने फरमाइश की, मै अपने पैर सामने की तरफ अच्छे से फैला लूं ताकि वह अपना सर टिका के आराम से लेट ले। मैने वैसा ही किया और वह मेरे पैरों को तकिया समझ के लेट गई। मै एक हाथ से उसके बालों में कंघी करता जा रहा था और उदास मन से एक-एक घूट पीता भी जा रहा था।
     वह बाएं तरफ करवट लिए हुए अपने दाहिने हाथ की बड़ी उंगली से जमीन में बिखरी हल्की धूल में कुछ लिखने लगी। मैने देखा अंग्रेजी में सत्य लिखा था। फिर उसने एस को छोड़ कर बाकी के अक्षर मिटा कर शैल लिखा। फिर कुछ देर तक देखने के बाद उसे फिर सत्य कर दिया। मै गौर से चुपचाप देख रहा था।
    कुछ देर बाद उसके माथे पर आए बालों को पीछे करते हुए मैने धीरे से पुकारा, "पीहू !..."
   "हूँ... ", उसकी आवाज से पता चल रहा था कि वह अर्ध-निद्रित अवस्था में है।
    मैंने आम के पेड़ के तने में अपनी पीठ टीका ली। खुद को समेटने की कोशिश में मेरी आंखें खुद-ब-खुद बंद हो गई। मैने उसी तरह शांत और धीरे स्वर में कहा, 
    "यदि सजाएं ही मेरा मुकद्दर है तो एकबार फिर से यही सही... अब उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत रखता हूँ... किस्मत ने बहुत कुछ छीन कर तुम तक पहुंचाया है... दिल कहता है अब तुमसे दूर न रह पाऊंगा।  तुम अपनी सारी वफाएं निभाओ... सत्य के साथ सदैव हंसते-मुस्कुराते जिंदगी जियो... लेकिन तुम्हे गले से लगा के मैं रो सकूं इतना हक तो दे दो मुझे...जब भी जीवन पथ पर चलते-चलते मैं थक जाऊं, कोई दर्द मुझे बेचैन कर दे तो तुम मेरे आंसुओ को पोछना, मुझे गले लगा लेना। और जब तुम थक जाओ तो मेरे पैरों को तकिया समझ कर इसी तरह थोड़ी देर के लिए आराम कर लेना। यदि तुमसे जुदा हो जाना मेरी नियति है, तो सच कहता हूँ, मैं अब इसे बदलना चाहता हूँ... बस एक अजनबी का तुम इतना-सा साथ दे दो... उसे इतना ही प्यार कर लो... 
    कुछ देर तक मैने इंतजार किया लेकिन कोई जवाब न मिला। उसकी तरफ ध्यान से देखा, वह सो चुकी थी। उसने कितनी बातें सुनी कितनी नहीं, मैं नहीं जानता। लेकिन न कह पाने के दर्द से मुझे भी मुक्ति मिली। 
    मेरे होठों में एक सजीली मुस्कान आ गई, मैने झुक कर उसके सर को धीरे से चूमते हुए कहा, "पीहू ! आई लव यू। मुझे तुमसे प्यार है, और बेशुमार है..."
    जैसे ही मैंने सर उठाया तो मंगल को पंप हाउस के पास अपनी ही तरफ देखते खड़ा पाया। मैंने इशारे से उसे अपने पास बुलाया। 
     पास आकर उसने इशारे से पूछा, "सो गई क्या ?", मैने अपना सर हां में हिलाया फिर रम की बॉटल की तरफ इशारा किया। वह समझ गया। दो पैग बना वह मेरे पास बैठ गया। अचानक उसने जमीन की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा, "सर जी ! आपका नाम किसने लिखा ? क्या आपने ?"
  मैंने देखा और देख कर मैं चौंक गया। जमीन पर मेरा नाम लिखा था। लेकिन पीहू ने तो अंत में सत्य लिखा था, फिर ये शैल कब हो गया ? क्या जब मैं उससे बात कर रहा था तो उसने फिर से मिटा कर मेरा नाम लिखा या फिर मुझे पहले ही देखने में कोई धोखा हुआ था ? नहीं... नहीं... मुझे अच्छी तरह से याद है कि उसने मेरे सामने ही मेरा नाम मिटा कर सत्य का नाम लिखा था। तो फिर क्या उसने मेरी सभी बातें सुनी और एक शब्द में उनका जवाब लिख दिया ?
     लेकिन मैंने मंगल के सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझा बल्कि मैंने उसे फिर से पीहू की मिलती जुलती राइटिंग में सत्य कर दिया। 
     मैने पेड़ पे टिक कर आराम से बैठते हुए मंगल से कहा, "मंगल, इसका ध्यान रखना... इसे जीवन में कोई तकलीफ न होने पाए.… और यदि हो तो मैं तुम्हें अपना पता दे कर जाऊंगा... तुम मुझे बस एक लेटर लिख देना, चाहे तो सिर्फ इतना... सर जी आ जाइए... मै आ जाऊंगा..."
   "जी... सर जी..."
    पीहू मेरे पैर में सर रख गहरी नींद सो रही थी। मेरा हाथ अभी भी पीहू के सर पर था और मैं धीरे-धीरे उसके बालों को सहलाते हुए मंगल से कह रहा था। मेरे हर शब्द आंसुओं में भीगे हुए थे,
     "एक बात और मंगल... जो मैं शायद तुम्हारे भइया जी से न कह पाऊं... जब ये उदास हो तो किसी न किसी बहाने तुम इसे इसी आम के पेड़ के नीचे ले आना... इसी तरह चटाई बिछा देना... और बगिया के मौसमी फल आम, अमरूद, जो भी हों खिलाना... हमने एक साथ जो पल गुजारे हैं... उनकी याद दिलाना... और कहना... पेड़ की जड़ को सर जी के पैर समझ कर... सो लीजिए... तो तुम देखना मंगल... ये अपने सारे दर्द, सारी उदासी, सारी थकन भूल कर इसीतरह सो जाएगी... लेकिन तुम इसके आस-पास ही रहना... अकेला मत छोड़ना... "
    मेरी बात सुन मंगल भी भावुक हो उठा, "जी... सर जी... और यदि आपको याद कर हम खुद-ही उदास हो गए तो... क्या करेंगे ?"
   "जब से आया हूँ मंगल ... तुमने बड़ी सेवा की... इसी तरह तुम अपनी पीहू बिटिया की भी सेवा करना, और मैं समझूंगा कि तुमने मेरी सेवा की... इस जन्म के ऋण को मैं... अगले जन्म में तुम्हारे बेटे के रूप में तुम्हारी सेवा कर के चुकाऊंगा... अब इस जन्म में तो नहीं चुका पाऊंगा मंगल..."
     "अरे न सर जी .... इनकी सेवा करना तो मेरा धर्म है, और रही आपकी सेवा की बात तो आप इनके दोस्त हैं, भैया जी के दोस्त हैं, तो आपकी सेवा कैसे न करता ? और फिर जब पीहू बिटिया आपको इतना चाहती हैं, तो हम लोग क्यों नहीं चाहेंगे ?  इंसान जिसे चाहता है, उसकी सेवा करता है, उसके सुख-दुख को अपना समझ बांटता भी है...", मंगल कहते-कहते रुवासा हो गया। 
    मंगल कोई बहुत बड़ा दर्शनिक नहीं, एक कम पढ़ा-लिखा किंतु बेहद ही सवेदनशील और समझदार व्यक्ति हैं। उसे दोस्ती और चाहत के अर्थ मालूम हैं, और शायद इसलिए उसने इन शब्दों की गहराई की व्याख्या एक वाक्य में की, "इंसान जिसे चाहता है उसकी सेवा करता है, उसके सुख-दुख को अपना समझ उन्हें बांटता भी है...", उसने यह नहीं कहा कि पीहू मुझसे मोहब्बत करती है या प्यार करती है, या फिर मैं उसका बेस्टफ्रेंड हूँ या बॉयफ्रेंड हूँ। न... उसने ऐसा बिल्कुल नहीं कहा।
       उसने तो साधारण शब्दों में बता दिया कि वह आपको चाहती है। अब इसका अर्थ मैं कुछ भी निकल सकता हूँ, क्योंकि मैं पढ़ा-लिखा और छोटा-मोटा लेखक भी हूँ, और कह सकता हूँ कि चाहत और प्रेम में फर्क होता है। और ऐसे कई फर्क मैं आपको लिखकर भी बता सकता हूँ...
     किंतु अब सवाल यह उठता है कि पढ़ा -लिखा और ज्ञानी व्यक्ति प्रेम को कैसे परिभाषित करेगा ? यह तो उद्धव का काम है, तो उसे करने दो। कृष्ण और राधा का काम था एकदूसरे के लिए रोना, और वह कुछ देर पहले हम कर चुके थे। तो मैं अब क्यों किसी चक्कर में पड़ूं और व्याख्या करूं किसी प्रेम की ?
     मैं यह भी जानता हूं कि मेरे जीवन में इस चाहत की सरिता का उद्गम पीहू नहीं बल्कि कोई और ही है। प्रारंभ में इस सरिता का प्रवाह निर्मल स्वच्छ और स्वार्थ रहित था। धीरे-धीरे गंगोत्री से निकली पतली-सी धारा का विस्तार होता गया। एकदिन वह ऐसे मुकाम पर पहुंची जहां पर अवनति के रूप में एक भयंकर जलप्रपात बना। ऊंचाइयों से गिरी इस सरिता ने कोहराम मचा दिया। दंभ और अभिमान से खड़ी बड़ी-बड़ी चट्टानों से जा टकराई। बूंद-बूंद टूटी और बिखरी और लगा कि अपना अस्तित्व ही गवां देगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ, बिखरी बूंद-बूंद फिर से इकट्ठा हुई और अब एक शांत, स्निग्ध, निर्मल और आज मनमोहक रूप धारण कर मेरे घुटने से थोड़ा-सा ऊपर अपना सर कर रख आराम से सो रही है।
    मैंने धीरे से मुस्कुराते हुए मंगल से बोला, "हां मंगल ! तुम सच कहते हो, तुम्हारी पीहू बिटिया मुझे चाहती तो हैं...नो डाउट। जिसने जीवन में कभी शराब छुई न हो पीने की बात तो दूर है, मेरे कहने पर पी... जब-जब मैंने पी तो इसने भी मेरे साथ पीने की जिद की... जानते हो क्यों  ?  ताकि मैं इसे छोड़ सकूं... वो क्या कहते हैं ? हां... देवदास न बन सकूं..."
   "एक बात है सर जी .... मै ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं, लेकिन पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि इन्हें आपके साथ की जरूरत है... आप कुछ दिन और रुक जाइए न ? मत पीजिएगा शराब तो ये भी न पियेगी... हम में से कोई न पियेगा...", मंगल मासूमियत और अपनत्व के साथ बोला।
    "मैने तुमसे पहले भी कहा था न मंगल, मै शराबी नहीं। पीना मेरी कमजोरी थी, और ये जो सो रही है न, ये मेरी ताकत है। और यह भी जान लो, बिना मांगे मुझे ईश्वर से एक वरदान मिला है और वह है त्याग करने का ... मैं जब चाहूं जिसे चाहूं त्याग सकता हूँ। इसलिए मैं कभी भी किसी को छोड़ने और किसी को अपनाने का वादा नहीं करता। अब बिना वादों के, बिना शर्तों के मुझे यह जीवन जीना होगा, यही मेरी नियति है... 
     और रही बात रुकने की... तो जितने दिनों तक और रुकूंगा मोह-प्रीत के बंधन उतनी ही मजबूती से बंधते चले जाएंगे। फिर दोनों के लिए त्याग करना मुश्किल होगा। मैं एक खत्म हुई कहानी को फिर से शुरू नहीं कर सकता मंगल... फिर वही अंजाम... फिर से एक लग्न मंडप...",  उफ़ ! मैं मंगल से क्या कहने जा रहा था... मुझे क्या हो गया है...?
       मैंने बात बदल दी, "मंगल ! देखते नहीं खत्म हो गई है.... बनाओ"।
    "सिगरेट भी लेंगे सर जी ?", मंगल ने पूछा।
    "नहीं, ये सो रही है... सोते हुए व्यक्ति के पास बैठकर स्मोकिंग करना उसके लिए हार्मफुल होता है, और यदि तुम्हें पीनी हो तो तुम भी दूर जाकर पीना...", मैने उसके हाथ से गिलास लेते हुए उसे समझाया। वह अपनी गिलास और सिंगरेट ले कर पंप हाउस के पास चला गया। इधर पीहू ने करवट बदली, अब उसका चेहरा मेरी तरफ था। 
     पत्तों से छिटक कर आती सूरज की सुनहरी धूप का एक गोल धब्बा उसके चेहरे में इधर से उधर नाच रहा था। अपनी सुनहरी कांति से उसके चेहरे को सजा रहा था। हवा की गति के साथ हिलते-डुलते पत्ते और उनके साथ ही उसके चेहरे में चेंज होती उस धब्बे की पोजीशन, ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे डांसिंग फ्लोर पर एक सुंदर नृत्यांगना का नृत्य चल रहा है। कभी वह उसके होठों की सजीली मुस्कान बन छा जाता, तो कभी माथे की बिंदिया बन चमक जाता। कभी उसके कोमल गालों से टकरा के रिफ्लेक्ट हो जाता, तो कभी फिर से चंचल बच्चे की तरह वापस आकर उसके कान के गोल टप्स की चमक को कई गुना बढ़ा जाता। तो कभी उसकी बोझिल पलकों को इस तरह चूम जाता कि उसकी नींद में कोई बाधा न हो।
     कौन कमबख्त ऐसे दृश्य को छोड़कर शराब के पैमाने पीना चाहेगा। मैंने जाम एक तरफ रख दिया और मंत्रमुग्ध-सा उसे देखता रहा। 
    चलती शरारती हवा का मंद झोका जब कभी उसके सुनहरे रेशमी केशो को उसके चेहरे पर बिखेर देता, तब मैं बड़ी हिम्मत जुटा कर अपनी तर्जनी से उसके चेहरे को उन सुनहरी घटाओं से मुक्ति दिला देता। मुझे महसूस हो रहा था जैसे संपूर्ण प्रकृति उसके मासूम और सुंदर चेहरे से खेल रही है। प्रकृति अर्थात हमारी माँ, और एक माँ अपने बच्चों से खिलवाड़ न करें तो फिर किससे करें ? 
    उफ़ ! रूप और ज्ञान का इतना सुंदर और अदभुत संगम !! इस डर से मैंने नजर फेर ली कि कहीं उसे मेरी नजर न लग जाए।
   जब कभी अमरूद का लुफ्त ले रहा कोई गुस्सैल सुग्गा स्वाद पसंद न आने पर टे-टे कर चीख पड़ता। तब मेरी क्रोधित नजर उसकी तलाश करती, और मैं मन ही मन उसे डांटता, "चुप  ! देख नहीं रहा पीहू सो रही है, यदि स्वाद पसंद नहीं तो क्यों खा रहा है ? चल उड़ जा यहां से..."
    कुछ देर बाद मुझे भी झपकी आ गई।  कुछ देर तक मैं गहरे अंधकार में रहा। चेतना शुन्य, मन में कोई विचार नहीं, बस सांसे चल रही थी। कितनी देर तक मुझे पता नहीं चला, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता मेरी चेतना वापस लौटी। मैं गहरे अंधकार से बाहर आया। आंखें अभी भी बंद थी, लेकिन मन में चारों तरफ उजाला ही उजाला फैल रहा था। 
     उस उजाले में धीरे-धीरे एक आकृति स्पष्ट हो रही थी जिसके कंठ से निकलते मधुर स्वर और होठों में अंग्रेजी पोयम के खूबसूरत लब्ज़ कुछ इस तरह सज रहे थे जैसे एक मासूम परिंदा तिनके-तिनके को जोड़कर अपना घोंसला बनाता है। शब्दों के कहने का अंदाज और मधुर स्वर उनके भावों को कई गुना बढ़ा देते।
      और इन सब के साथ ही बढ़ जाती मेरे हृदय की धड़कन, एक स्वप्न जो मेरे अंतर्मन में चल रहा था। कुछ शब्दों के अर्थ मुझे समझ में आए और कुछ के नहीं लेकिन उनके भाव मेरे अंतर्मन और हृदय की गहराइयों में उतरते जा रहे थे। कुछ देर बाद जब सब कुछ शांत हो गया, बहती हुई रागनी का सुरीला प्रवाह  रुक-सा गया तब मैने धीरे-धीरे अपनी पलकें उठाई। वह उसी तरह लेटे हुए मुझे निर्मेष देख रही थी। पल भर के लिए हम दोनों की नजरे आपस में मिली, मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "सो लिया...?"
    "हूँ... मैं तो पहले ही उठ गई थी, लेकिन तुम्हें देखती पड़ी रही... कैसे बच्चों की तरह कहीं भी सो लेते हो...", उसने मेरी आंखों में झांकते हुए कहा।
   "अच्छा !! तो तुम कौन-सा फूलों की सेज में पड़ी हो ?, मैंने हंसते हुए पूछा था।
    पल भर के लिए मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, फिर उसी तरह मुस्कुराते हुए बोली, "फूलों की सेज में भी इतना सुख नहीं मिलेगा, तुम क्या जानो..", कहते-कहते वह रुक गई।
    "वैसे भी पीहू... सोते समय मैंने एक अजीब-सा स्वप्न देखा.... मैने देखा.... मेरी चारों तरफ उजाला है, बहुत तेज रोशनी और उस रोशनी में एक परछाई एक सुंदर-सी इंग्लिश पोयम गुनगुना रही है... कुछ समझ में आया कुछ नहीं भी। लेकिन पोयम बहुत अच्छी थी... आई डू नॉट लव दे... हां कुछ इसी तरह की..."
    वह हंसते हुए बोली, "अरे वाह !! कांग्रेचुलेशन... तो लेडी नॉर्टन तुम्हारे सपने में आईं ?"
   मैंने आश्चर्य से पूछा, "अब ये लेडी नॉर्टन कौन हैं...?"
    उसने रहस्यमई अंदाज में मुझसे कहा, "अरे, नहीं जानते !! कीट्स को जानते हो और लेडी नॉर्टन को नहीं... वहीं जिसकी ये पोयम हैं..."
   "ओह !!  तो पोयम तुम गा रही थी...?"
    उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया "गा नहीं गुनगुना रही थी... और क्या करती तुम तो सो रहे थे... कभी तुमसे वादा किया था न कि अपनी फेवरेट पोयम सुनाऊंगी... तो लो पूरा किया..."
   "ओह !! बट दिस इज नॉट फेयर !! मैं तो सो रहा था न... तुमने चीटिंग की... एक बार फिर सुननी पड़ेगी...?"
    "नहीं अभी नहीं ...", और अगले ही पल मेरा हाथ पकड़ मेरी कलाई अपनी नजरों के सामने करते हुए पूछा, "टाइम कितना... ओह ! सॉरी। वो क्या है न कि सत्य रिस्ट-वॉच पहनता है तो मेरी आदत पड़ गई है...क्या तुम रिस्टवाच नहीं पहनते...", फिर वह धीरे से मुस्कुरा दी।
      मैंने भी उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बात नहीं, पहनता हूँ, लेकिन ट्रेन में सफर के वक्त कहीं गिर गई... कोई बात नहीं जी... मेरे पास रिस्टवॉच न सही, लेकिन चलता-फिरता एक टाइम क्लॉक है... लेकिन ये क्या... तुम मुझे टरका रही हो... तो देखो ज्यादा भाव मत खाओ... एक दिन मैं भी इंग्लिश पोयम लिखूंगा... चाहे एक ही क्यों न लिखूं... लेकिन लिखूंगा... वो क्या कहते हैं... हां लेडी नॉर्टन से भी अच्छी..."
    "ओह ! मैं इंतजार करूंगी... लेकिन किसके लिए लिखोगे ? मेरे लिए...?"
   मैने मुस्कुराते हुए सर हां में हिलाया "हुं... बिल्कुल तुम्हारे लिए... तुम्हे इंग्लिश पोयम पसंद है न ? लेकिन मैं कुछ ज्यादा ही बोल गया... उनसे अच्छी न सही... लेकिन अच्छी लिखूंगा... लेकिन नॉर्टन ये पोयम किसके लिए लिखी रही होगी..."
    उसने सरलता से कहा, "मेरे लिए ... ताकि मैं तुम्हें सुना सकूं... तुमसे कह सकू.... आई डू नॉट लव दे..."
   मैने शिकायती लहजे में कहा, "तुम मुझे गोल-गोल घूमती हो। लेकिन ये बात तो सच है कि तुम सत्य से बेहद प्यार करती हो... देखो तभी तो जमीन में सत्य का नाम लिखती हो..."
   उसने लिखे हुए नाम को ध्यान दे देखा फिर मेरी तरफ कुछ मुस्कुरा के देखते हुए कहा, "एस तो मेरा लिखा हुआ है, लेकिन उसके बाद की राइटिंग मेरी नहीं हैं... अब कहो कौन और किसे गोल-गोल घूमता है... हां बोलो ?"
    मैं उसकी बात सुन दूसरी तरफ देखने लगा।
    वह उठ कर बैठ गई। उसकी नजर एक तरफ रखे मेरे शराब के पैमाने पर गई, "इससे क्यों गुस्सा हो...", फिर उसने उठा कर दो घूंट लिए और शेष मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहां, "लो खत्म करो... चलो अब उठो, एक जगह चलना है..."
     "चलना है !! कहां चलना है ?", मैंने चकित-सा उससे पूछा।
  उसके कदम पंप हाउस की तरफ बढ़े। मैने पीछे से पुकारा, "पीहू !!..."
  वह पलटी, प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। मैने इंकार में सिर हिलाया। वह फिर बढ़ीं। दो कदम चलने के बाद वह स्वयं पलटी, प्यार से पूछा, "क्या है..."
   मैने कहा, "क्या हुआ... इस बार तो मैने नहीं पुकारा..."
    वह पलट कर फिर चली, दो कदम बाद फिर पलटी, "अब कह भी दो क्या है... परेशान न करो... क्यूं पुकारते हो बार-बार...?"
  उसकी हरकत देखकर मेरे होठों में मुस्कान आ गई। मैं कुछ बोला नहीं बल्कि उसे सिर्फ देखता रहा। इसबार वह पलटी नहीं... चेहरा मेरी तरफ और कदम पीछे की तरफ, उलटे पांव। मैं देखता रहा, जब वह पंप हाउस के नजदीक पहुंचने को हुई, मैने जोर से कहा, "ये रुको... सम्भल के... पीछे पंप हाउस है... नहीं दिखाता...?"
   उसने मुस्कुराते हुए इंकार में कहा, "ऊं हुं... कुछ नहीं दिखता... सामने तुम हो तो फिर पीछे क्यूं देखूं...?"
   "मैने कहा न... रुको.…", मैं जोर से बोला।
    मैने गिलास एक तरफ फेक सीधे उसके पास पहुंचा, "क्या नादानी करती हो... एक ही बार तो बुलाया था..."
    वह शोखी से कुछ हंसते हुए बोली, "अरे वाह ! मेरे लिए जाम की कुर्बानी दे दी !!"
   उसकी इस बात पर मुझे भी हंसी आ गई, "हां यार सच !! मुझे खुद यकीन नहीं हो रहा... वैसे तुम क्या करने जा रही हो...?"
     वह चहरी के पानी से अपना मुंह-हाथ अच्छे से धोते हुए बोली, "आओ... तुम भी धो लो..", मैंने देखा मंगल पंप हाउस से कुछ दूर खेत पर झुका हुआ कुछ कर रहा था। मैंने आवाज दी और अपने पास आने का इशारा किया। उसके आते ही मैंने पूछा, "मंगल टाइम कितना हुआ होगा...?"
    "बारह के लगभग होगा सर जी..", मंगल सूरज की पोजीशन देखता हुआ बोला।
    "ओह ! तो ये हैं तुम्हारा चलता-फिरता टाइम क्लॉक...", उसने हंसते हुए मुझसे कहा। 
    हम दोनों खाट पर आकर बैठ गए। मैंने फिर एक बार पूछा, "तुमने बताया नहीं..."
   उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्या ?"
   मैंने मुस्कुराते हुए फिर पूछा, "यही कि तुम्हारी लेडी नॉर्टन ने ये पोयम किसके लिए लिखी होगी... और एक मिनट... तुमने मुझे क्यूं सुनाई...? और यदि सुना ही दी... तो एक बार फिर सुनाओ... वो भी हिंदी में विद मीनिंग समझाते हुए..?"
    "यार तुम कितना सवाल पूछते हो... रही बात फिर से सुनाने की तो तुम खुद ही कभी पढ़ लेना। पूरी लाइफ बची है यार पढ़ने को..."
   "यार पीहू देखो, लाइफ की बात मत करो। ये पीहू ! फिर से सुनाओ न प्लीज, वो भी मीनिंग के साथ... मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं है न... प्लीज..."
  "ठीक है सुना दूंगी ... लेकिन अभी नहीं... प्लीज...", उसने कुछ उदासी से कहा।
     "अरे नहीं, प्लीज मत कहो...अच्छा ठीक है फिर कभी...", मैने उसे बीच में ही रोकते हुए आगे कहा, "अच्छा !! तो फिर यही बताओ... चलना कहां है...?"
    उसने अपनी दाहिने हाथ की सबसे बड़ी उंगली से इशारा करते हुए कहा, "वहां चलना है..."
   मैंने देखा उसका इशारा टीन-शेड की तरफ था। एक पल के लिए मैं चकित रह गया। क्योंकि यदि मंगल की माने तो अब तक पीहू इसी बगिया से ही टीन-शेड को देखती आई है, देख कर रो भी लेती है। लेकिन सत्य के दो-तीन बार काफी जोर देने पर भी उसने वहां जाने से इनकार ही किया था। तो फिर आज यह चमत्कार कैसे ? आज तो वह खुद ही जिन यादों से भागती आई थी वहां मुझे लेकर जा रही है !! क्यों ? लेकिन उस वक्त मैंने कोई सवाल-जवाब करना उचित नहीं समझा। धीरे किंतु आत्मविश्वास से कहा, "तो फिर चलो..."
     यदि बगिया के मेन गेट से जाते तो घूम कर जाना पड़ता, लेकिन उसने एक शॉर्टकट रास्ता निकाला। हम दोनों तार की बाड़ी के दो तारों के बीच से घुसे। इस काम में मंगल ने हमारी मदद की। अब लगभग हमें तीन सौ मीटर का फसला ही तय करना था। 
     सूरज सर पर था किंतु धूप की गर्मी तेज न थी। कुछ देर बाद ही हम उस टीन-शेड के पास पहुंचे जिसे मैं भी पिछले चार दिनों से दूर से ही देखता आया था। मेर हृदय भी रोया, आंखों से आंसू निकले। तो यही वह स्थान है, जहां एकदिन एक ही परिवार के पांच सदस्यों की चिताएं एक साथ जली थी। बाबा और ध्रुव को छोड़कर पीहू के जीवन के सारे संबंध यही राख हो गए थे। हवाओं में एक अजीब सी शांति थी। आस-पास तीन-चार पेड़ थे जो दूर से ही उस टीन-शेड को छाया देने की लगातार नाकाम कोशिशों में लगे थे।
      मैंने पीहू की तरफ देखा उसका पूरा बदन सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। उसके पांव टीन-शेड के अंदर जाने के लिए नहीं उठ रहे थे। वह घुटने के बल वही प्रवेश डेहरी के सामने बैठ गई, फिर उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर सभी को प्रणाम किया। उसके आंसू लगातार बह रहे थे। वह सिसकियां ले रही थी। उसके समीप उसी तरह बैठकर मैने भी सभी को प्रणाम किया। जो आंसू पीहू की आंखों में शेष रह गए, मेरी आंखों से बह निकले। कुछ देर रो लेने के बाद जब पीहू का मन हल्का हुआ तो उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए आद्र कंठ से कहा, 
     "बड़े पापा सॉरी ! आप से बिना पूछे, बिना बताएं इसे अपना बॉयफ्रेंड बना लिया, इसे आप से मिलवाने ले आई हूँ। प्लीज मिल लो इससे, देख लो इसे। देखने में अच्छा है न ? स्वभाव भी अच्छा है। पढ़ा-लिखा भी है। लेकिन शराब पीने लगा है... कभी-कभी हद से ज्यादा पी लेता है... बड़े पापा ! मैं आपसे झूठ नहीं बोलूंगी... मैंने भी इसके साथ पी है... ये पीने के बाद किसी से गाली-गलौज नहीं करता... कभी किसी को भला-बुरा नहीं कहता... किसी से लड़ता-झगड़ता भी नहीं है... बस अपनों से अपने दिल की बात कहता है... रोता बहुत है... और ऊपर से झूठ बोलता है कि एक्टिंग कर रहा हूँ... और हां बड़े पापा कोई भी इल्जाम लगाओ तुरंत स्वीकार कर लेता है... किसी भी बात पर थोड़ा सा डांटो तो फौरन सॉरी !  दिल का अच्छा है, लेकिन कभी-कभी इतना चुप हो जाता कि मैं हर्ट हो जाती हूँ..."
    पीहू हाथ जोड़कर किंतु सर उठाकर अपने बड़े पापा से मेरी बात कह रही थी। मैं हाथ जोड़कर सर झुकाए सुन रहा था।
     "बड़े पापा जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी तो आप हंसकर पूछा करते थे न कि मैने किसी को बॉयफ्रेंड बनाया कि नहीं... आप यह भी कहते थे कि तेरा बॉयफ्रेंड मुझे पसंद आना चाहिए,  हां तेरा दूल्हा तेरे पापा चुने तो चल जाएगा, तो देखो बड़े पापा तब तक नहीं बनाया था किसी को.... सचमुच। अब बना लिया है... लेकिन मैं इसकी पहली गर्लफ्रेंड नहीं हूँ, इसकी पहली गर्लफ्रेंड की शादी हो चुकी है, शायद उसी को भूलने के लिए पीता है और कहता है, क्या कहता है ...", फिर उसने बिना मेरी तरफ देखे बिल्कुल धीरे से कहा, " ये बताओ न क्या कहते हो... बोलो चुप मत रहो... बड़े पापा सुनना चाहते हैं...?"
     मैंने उसी तरह अपना सर झुकाए धीरे से डायलॉग संस्कृत के श्लोक की तरह सुनाया। किंतु उसने फिर टोंका, "धीरे से नहीं तेज से बोलो... और अच्छे से पूरे इमोशन के साथ..."
     फिर मैंने इस अंदाज से कहा जिस अंदाज और आवाज से उस रात कहा था, "कौन कमबख्त है जो उसे भूलने के लिए पीता है, मैं तो पीता हूँ कि उसे और शिद्दत से याद कर सकूं..."
    "सुन लिया न बड़े पापा ? आवाज भी ठीक-ठाक ही है न ? अब आप ही फैसला कीजिए कि इसे बॉयफ्रेंड बनाए रखूं या छोड़ दूं ...? ये तुम भी तो कुछ कहो न...?" इस बार उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
  "म...मैं...मैं क्या कहूं...?", मैंने धीरे से पूछा।
  "कुछ भी... जो दिल में आए...", उसने भी धीरे से कहा।
    मैंने पीहू की तरफ देखते हुए फिर पूछा, "सचमुच कुछ कहना है...?"
   इस बार उसने कुछ गुस्से से, तेज और कड़ी नजरों से देखा।
   "ओक... ओके... नाराज़ मत हो...", फिर मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर कहना शुरू किया, 
    "बड़े पापा ! आप सभी को प्रणाम... और छोटे भाई तुम्हे बहुत-बहुत प्यार...",  मेरे इतना कहने पर पीहू की हिचकी निकल गई। 
     "देखा छोटे भाई ! तुम्हारी दीदी कितना प्यार करती हैं तुमसे... आई थिंक यदि तुमने मुझे दीदी का बॉयफ्रेंड मान लिया न तो बड़े पापा जरूर पसंद कर लेंगे... है न बड़े पापा ? अब अपने बारे में क्या कहूं... बस यही समझ लीजिए कि अपनी शाख से टूटा एक पत्ता पूरी तरह सूखने से पहले आपकी हरी-भरी बगिया में पहुंच गया। उसे नई जिंदगी मिली। बड़े पापा आप भी जानते हैं और मैं भी अब जान गया हूँ कि पीहू कहना क्या चाहती है... आप सभी को खोने के बावजूद न तो इसने आत्महत्या करने की कोशिश की और ना ही किसी बुरी चीज को अपनाया। 
      आप लोगों को हमेशा याद रखा। बाबा की सेवा करती है, दिन-रात उनका ख्याल रखती है। यदि इसने मेरे साथ कभी पी है तो इसलिए कि मैं इस बुरी चीज को छोड़ सकूं... और सच पूछिए बड़े पापा यही बात इनडायरेक्टली समझाने के लिए मुझे यहां तक लेकर आई है... यह कोई देवलोक नहीं धरती है... इंसानों की बस्ती है... लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, रिश्ते बनते हैं, टूटते हैं। हम जन्म लेते हैं और एक दिन मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही तो यहां का सच है... और इस सच से हम कितना दूर भागेंगे ? भाग ही नहीं सकते... है न बड़े पापा...?
     मैं तो यहां से कल ही जाने वाला था, लेकिन आप लोगों से शायद मिलना लिखा था, तो नहीं जा पाया... अब आप सभी से मिल लिया तो दिल को तसल्ली हो गई। आप सभी पीहू का ध्यान रखिएगा मेरी गर्लफ्रेंड है न ... इतना तो मांग ही सकता हूँ।  
       और हां पापा ! पीहू ने अपने लिए एक दूल्हा पसंद किया है, बिलकुल फर्स्ट हैंड। मै भी मिला हूँ... बहुत ख्याल रखता है इसका... आपको भी जरूर पसंद आएगा। पीहू जल्दी आप लोगों से मिलवाने लाएगी। आप सभी अपना आशीर्वाद दीजिएगा...
     और भाई तुम ! कहते हैं आत्माएं पवित्र होती हैं, देव-रूप होती है, इसलिए नहीं कहूंगा कि तुम झुक कर प्रणाम करना। लेकिन हां, उसे अपने गले से लगाना जैसे द्वारचार की पूजा में एक भाई अपने बहन के होने वाले सुहाग को गले से लगा, हृदय से उसे अपनाता है। उसी तरह तुम भी उसे अपना बनाना। 
     और मम्मी आप ! आप आरती की थाल सजाना, उसका स्वागत करना... उसके हाथों में कलश-दीप रखना। और पापा आप... पूरे विश्वास के साथ अपनी पीहू का कन्यादान करना। वह आपकी बेटी के साथ सदैव आप लोगों के आसपास ही रहेगा... आप लोग भी हमेशा उसे देखना और अपना आशीर्वाद बनाए रखना ... और हां बड़े पापा आप मेरी फिक्र न करना, इसने झूठा कहा कि मैं इसका बॉयफ्रेंड हूँ...
      यह तो यूं ही हंसी मजाक में मेरा दिल रखने के लिए कह रही है...  इसका कोई बॉयफ्रेंड है ही नहीं। मैं तो इसका दोस्त हूं, एक अच्छा दोस्त। शायद इसलिए मुझे बिखरने से बचाने के लिए इसने मेरे साथ कुछ एक्टिंग कर ली, और देखिए तो एक्टिंग करने का इल्जाम मुझ पर लगती है !!
    और बड़े पापा, यदि ये सच है भी, तो भी क्या हुआ ?  क्या पीहू दोषी हो गई .या बेवफा हो गई ? या फिर आप लोग की नजरों से गिर गई ? किसी को जिंदगी देना गुनाह तो नहीं है न ? यह कार्य तो एक पवित्र आत्मा ही कर सकती है... वही इसने भी किया... आप लोगों की संतान है, आप लोगों के ही गुण है इसमें न ?
   और हां पापा ! मुझे इसकी एक शिकायत भी करनी है...", मेरा इतना कहना था कि पीहू ने मुझे फिर कड़ी नजर से देखा। मैंने उसकी तरफ देखते हुए निडरता से कहा, "नहीं मैं तो कहूंगा... हा तो पापा ये पीहू है न इसे बड़ा सफ़ीना बेगम बनने का शौक है। एक तो इतना बड़ा घर और ऊपर से पूरे घर का काम करना, वह भी नॉनस्टॉप। कहीं भी थोड़ी सी भी गंदगी देखी, कचरा देखा तो जब तक साफ न कर लेगी इसे चैन नहीं पड़ता... इतना भाग दौड़ करती है की दिल में इसके सांस ही नहीं समाती... सभी का ख्याल रखती है लेकिन अपना नहीं रखती...", शिकायतें तो और भी करना चाहता था लेकिन इसी बीच उसने मेरे बांह में जोर से चिकोटी काटी और धीरे से कहा, "चुप... अब नहीं..."
    चिकोटी इतनी तेज थी कि मैं दर्द से कराह उठा, "उफ़ ! देखा पापा... देख न अपने... यह कैसे चिकोटी काट कर चुप करा रही है... ?"
    उसने मासूम सी सूरत बनाते हुए सफाई दी, "नहीं पापा, मैने कोई चिकोटी नहीं काटी..."
   "नहीं काटी...!!", मैने अपनी बांह सामने करते हुए कहा, "देखिए पापा.… किस तरह लाल निशान पड़ गया है..."
   "नहीं पापा ये झूठ बोलता है...", उसने और दृढ़ता से कहा।
    "मैं झूठ बोलता हूं !! अरे झूठी तुम हो... सभी ने देखा... मम्मी ने, भाई ने सभी ने... पापा ने... चाहो तो पूछ लो...?"
   "जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो मैं क्यों पूछूं... है न बड़े पापा... वो देखो बड़े पापा ने तो नहीं देखा..."
  अंत में मैंने मायूसी से कहा, "क्या बड़े पापा आप भी, ले लिए न अपनी बेटी के पक्ष में ? कर दी न पार्शियल्टी... तो ठीक है... एक गुमराह अजनबी बन के आया था और अब एक अजनबी की तरह ही जा रहा हूँ। इजाजत दीजिए ... आप सभी को हृदय से प्रणाम... अब चलता हूँ..."
     मैंने सर जमीन पर झुकाया और फिर उठकर खड़ा हो गया। पीहू का हाथ पकड़ उसे भी उठाया फिर उसी तरह ले कर चल पड़ा, "अब चलो पीहू..."
     "लेकिन...", वह कसमसाते हुए पीछे पलट कर तेज आवाज में बोली, "ये झूठ बोलता है बड़े पापा... यह कोई अजनबी नहीं... ये मेरा बॉयफ्रेंड है..."
     "बस करो पीहू...", मैने उसे लगभग डांटते हुए कहा। लेकिन उसने मेरी एक न सुनी। झटक कर अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ा लिया और ज़मीन में उसी तरह बैठ कर अपने दोनों हाथ घुटने में रख रो पड़ी, "तुम बहुत ही निर्मोही और खुदगर्ज इंसान हो... जो किसी की फीलिंग को नहीं समझता है... सिर्फ अपनी जिंदगी जीता है..."
    उसके कंधे पर हाथ रख उसके सामने उसी तरह घुटने के बल बैठते हुए मैने शांत मन से कहा, "नहीं पीहू ! मुझे तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मंजूर है सिवाय इसके... ये सच है कभी अपने के लिए जीने लगा था... लेकिन तुमसे मिलने के बाद अपनों के लिए जीना सीख लिया... सीख लिया कि यदि आपकी कोई व्यक्तिगत फिलिंग्स किसी दूसरे इंसान की फिलिंग्स को हर्ट करें तो उसे छुपा लेना चाहिए... उसकी अभिव्यक्ति आवश्यक नहीं। जब तुम दोपहर को सो रही थी तो मंगल ने मुझसे एक बहुत ही सुंदर बात कही कि तुम मुझे चाहती हो इसलिए मेरे दुख--दर्द बांटती हो, अपना समझती हो, तो अब इस चाहत को कोई नाम न दे तो बेहतर है...
   उसने सिसकते हुए मेरे कंधे में अपना सर रखते हुए कहा, "तुमने कहा तो मान लिया... लेकिन तुम वादा करो... एकबार ही सही... तुम मुझसे मिलने जरूर आओगे ..?", फिर उसने अपूर्व आशा भरी दृष्टि से मेरी तरफ देखा। मैंने उसके बाएं गाल में अपने दाएं हाथ की हथेली रखते हुए कहा, "मै अब किसी से कोई वादा नहीं करता... या यूं कह लो करने लायक बचा ही नहीं... लेकिन इन सभी पुण्य आत्माओं को साक्षी मान कर तुमसे एक वादा करता हूँ। एक बार ही सही, तुमसे मिलने जरूर आऊंगा लेकिन तुम्हारी शादी के बाद.... शादी पर भी नहीं। एक वादा तुम भी मुझ से करो, यह एक दुर्घटना थी जो घटित हो चुकी है, उनकी दुखद यादों से बाहर आओ, जीवन में आगे बढ़ो। तुम्हें यूं एक लम्हे में ठहरे देखकर इन्हें भी कोई सुखद अनुभूति नहीं होगी। इनकी भी आत्मा को कष्ट होता होगा। अभी कुछ देर पहले जो पेड़ के नीचे कहां है उस पर ध्यान देना। बाबा का ध्यान रखना, जब मन करे तब विवाह करना, और जो भी करने की इच्छा हो वह करना, लेकिन एक जगह रुके मत रहना, आगे बढ़ते रहना। अब संभालो अपने आप को और चलो...", मैने उसके आंसू पोछे, उसे उठाया और उसका हाथ पकड़ आगे बढ़ता गया। टीन-शेड की पुण्य आत्माएं पीछे से हमे आशीर्वाद देती रही...
    जब हम लौट कर आए तो मंगल को इंतजार करते पाया। वह भाग कर बाड़ी के पास आया। एक तार को कस के ऊपर उठाया ताकि हम दोनों आसानी से झुक कर अंदर आ सके।  चटाई उसी तरह बिछी थी, वह पेड़ की जड़ में सर रख निढाल-सी पड़ गई। मुझसे अधिक वह थकी हुई लग रही थी। आँखों के बचे-कूचे आंसू उसके गालों में लुढ़क आए। उसके हृदय की धड़कन किसी कपोत के हृदय की भांति धुक-धुक चल रही थी। उसकी यह हालत देखकर मेरे हृदय में भी अथाह करुणा जागी। 
     मैं खुद को उसके पास बैठने से न रोक पाया। उसके माथे को सहलाते हुए बोला, "प्लीज चुप हो जाओ... मै जानता हूँ... कुछ मैने तो कुछ यादों ने तुम्हें दुख पहुंचाया है ... मैं कोई नादान बच्चा नहीं जो कुछ समझ न सके लेकिन मैं भी करूं तो क्या करूं... अच्छा अब जो तुम कहो वही करूंगा, लेकिन प्लीज चुप हो जाओ..."
    अपने माथे पर रखी मेरी हथेली को उसने कस के पकड़ कर उसमें अपना चेहरा छुपा लिया। कुछ देर में ही वह रो पड़ी। उसके गर्म आंसुओं से मेरी हथेली भींगने लगी। मैं उसे जितना चुप कराने की कोशिश करता उसकी सिसकियां उतनी ही बढ़ती जाती, "न पीहू... प्लीज चुप हो जाओ... तुम कमजोर हो गई तो देखो मंगल का क्या होगा... और सोचो जरा तुम्हें इस हालत में देखकर सत्य का क्या होगा...  बाबा पर क्या गुजरेगी... "
     कुछ देर बाद उसने अपने आप को संयत किया। फिर बड़ी ही शांतिपूर्वक किंतु शिकायती लहजे में मुझसे कहा, "हां... सब की बात करना, लेकिन अपनी न करना... हां ! तुम्हे क्या फर्क पड़ेगा...  मैं चाहे हंसू या रोऊं... अजनबी हो न ? किसी अजनबी को हमारे दुःख तकलीफ से क्या वास्ता... अब तो जा भी रहे हो...?"
   "हां ...", मुझे मेरी ही आवाज बहुत दूर से आई हुई प्रतीत हुई।
    "तो तुम जाओगे ही...?"
    "कहा न अब जैसा तुम चाहो...", मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
   "भूल तो न जाओगे..."
   "नहीं... कभी नहीं... एक बात कहनी थी...?"
    "हां बोलो..."
     मैंने उसकी तरफ देखते हुए कांपती आवाज में कह सका, "पीहू ! तुमसे मोहब्बत है... और बेशुमार है...", 
     उसने संजीदगी से किन्तु सिसकते हुए पूछा, "तुम एक्टिंग तो न  कर रहे...?"
   मेरी आँखें भींग आईं,  "न... बिलकुल नहीं... तुम सच कहती हो मुझे एक्टिंग आती ही नहीं है। मैं इतना अच्छा एक्टर नहीं हूँ कि अपने करेक्टर के लिए रो सकूं... मैं जब भी रोया या हंसा तो खुद के लिए... या फिर मान लो कि इस कहानी का मैं भी एक करेक्टर ही हूँ और शायद अब एक्टर भी... लेकिन हो सकता है इस कहानी का राइटर न बन पाऊं... लिखा तो इन आंसुओं को जस्टिफाई करना होगा। तुम मेरे लिए क्यों रोई ... मैं तुम्हारे लिए क्यों रोया.... यह बताना पड़ेगा। और यदि केवल सत्य बन कर लिखा तो कहानी अधूरी रह जाएगी।  बहुत से इमोशन कहानी में आ ही न पाएंगे, क्योंकि केवल इन्हें गुजरता हुआ मैने या फिर तुमने देखा है, महसूस किया है। हम दोनों अजनबी बन के रह जाएंगे। यदि मैने अपने हाथ में कलम ले ली तो फिर मुझे पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ लिखना होगा... और यदि लिख दिया तो तुम मुझसे बेहतर जानती हो कि क्या हो सकता है या हो जाएगा... इसलिए अब यह काम तुम ही करना। 
      अपनी कहानी खुद लिखना... जब कलम तुम्हारे हाथ में होगी तो तुम जितना चाहो मुझे लिख सकती हो, और चाहे तो न भी लिखना। अपने जीवन के ये चार दिन इस कहानी से बाहर निकाल कर फेक देना।... सोच लेना कि तुम्हारे जीवन में यह करेक्टर कभी आया ही नहीं..."
   उसने कुछ मुस्कुराते हुए जिसे हम फीकी मुस्कान कह सकते है, मुझसे कहा, "यदि तुम्हें अपने जीवन से बाहर निकाल दिया तो फिर इस कहानी में बचेगा क्या ? कभी कुछ लिख ही न पाऊंगी। तुमने 23 साल की उम्र में इतनी सेंसिटिव कहानी लिखी... जिसे पढ़कर मैं खुद रो पड़ी !! लगा ही नहीं कि मेरे हमउम्र लड़के ने ये कहानी लिखी है। तुम्हारी शायरी, तुम्हारी कविताएं, जब सुनती हूँ, तो मेरी अपनी लगती हैं...  तो लिखने की प्रेरणा तो तुमसे ही मिली... लिखूंगी, एकदिन अपने दिल की बातें लिखूंगी। लेकिन अपनी कहानी नहीं लिखूंगी... यह तुम पर उधार रही... चाहे इस जन्म में लिखना... चाहे दूसरे... मैं इंतजार करूंगी... लेकिन पूरी लिखना... जो सच है वो लिखना... आज जब हमने एकवदूसरे से सच स्वीकार कर ही लिया तो एक सच तुम्हे और बताती हूँ। 
    पहले दिन जब अटारी में मैं, सत्य और तुम खाना खाने साथ बैठे थे तो मैंने तुम्हें जानबूझकर इग्नोर किया था... और कोशिश की थी कि सत्य भी तुम्हें कोई अटेंशन न दे। उस रात जब तुम पानी की तलाश में अटारी से नीचे आए थे तब हम दोनों तुम्हारे बारे में ही बात कर रहे थे। मैने सत्य से कहा था कि वह शराब पीता है, बाबा जान गए तो पता नहीं क्या सोचे। घमंडी भी है, पता नहीं अपने आप को क्या समझता है। तुम ऐसा करो कि उसे कल अपने कंपनी वाले क्वाटर में रख दो। 
    लेकिन सत्य ने मजबूरी जाहिर की कि तुम उसके बेस्टफ्रेंड के दोस्त हो, ऐसे कैसे अकेला छोड़ दूं। तब मैंने कहा, तो फिर ठीक है, लेकिन घर में रुकने के लिए कभी मत कहना, बगिया में ही पड़े रहने दो। जानते हो मैंने ऐसा क्यों कहा था ? तो सुनो मैं बताती हूँ...
    ... जिस सुबह तुम आए उसके तीन दिन पहले की वह शाम मैं कैसे भूल सकती हूँ। तुम्हारे आने से पहले ही कुदरत ने मुझे तुम्हारे आने का आभास करा दिया था। उस दिन मैंने दोपहर दो बजे तक काम किया। पूरा घर नीट एंड क्लीन किया। मन में एक अजीब-सी हलचल मची हुई थी, जैसे कोई आने वाला है। बाबा से डांट भी खाई। दोपहर को थोड़ा सा बुखार भी आ गया लेकिन मैं थकी नहीं, काम करती रही। फिर अटारी में जाकर चुपचाप लेट गई। लेकिन लिखा न, मन में एक अजीब सी हलचल मची हुई थी। थोड़ा-सा सो लेने के बाद जब शरीर कुछ हल्का हुआ तो खिड़की पर आकर खड़ी हो गई। महसूस हुआ जैसे मुझे किसी का इंतजार हो। यहां तक की मुझे सत्य के आने का भी आभास नहीं हुआ। मैं बेखबर उस तरह बाहर ताकती खड़ी रही। 
   सत्य ने मुस्कुराते हुए पूछा भी कि मुझे क्या हुआ... कहां खो गईं हूँ ? उसके आने का आभास भी न हुआ...?
   मैने कहा, "नहीं... लेकिन पता नहीं क्यों लग रहा है जैसे मैं किसी का इंतजार कर रही हूँ, जैसे कोई आने वाला है... देखो तो मेरा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है... कौन आने वाला है सत्य...?"
   सत्य ने मुझे समझाते हुए कहा था कि अरे मुझे आना था और देखो मैं आ गया। तुम्हारी तबीयत नहीं ठीक है न इसलिए बेचैनी लग रही है, और मन में इस तरह से ख्याल आ रहे हैं। तुम आराम करो...
    उसी रात मैंने एक स्वप्न देखा, "मैंने देखा, शाम का वक्त है... मैं अटारी में हूँ, किसी ने मुझे अपने गले से लगा रखा है... मैं लगातार रोती जा रही हूँ... मेरे साथ वह भी रो रहा है... फिर अचानक मुझे छोड़ अटारी की सीढ़ी उतरता जा रहा है... मैं रोती-सिसकती उसे पीछे से पुकार रह हूँ... लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक बार पलट कर मेरी तरफ देखा... और फिर वह सीढ़ियां उतरता जा रहा है, और मैं उसे उतारते हुए बस देखे जा रही हूँ....
    तब सत्य ने आश्चर्य से पूछा था कि मुझे कोई चेहरा तो दिखा होगा न... कौन था...?
    मैंने खुद ही बात बदलते हुए कहा था कि कुछ स्पष्ट नहीं दिखा। एक छाया सी देखी शायद कोई अजनबी था। लेकिन जानते हो उस रात मैं स्वप्न में रोई और जागने पर महसूस किया जैसे मेरी आंखें भरी हुई हैं। उस सपने में जब एक पल के लिए उसने पलट कर मुझे देखा था... एक धुंधली सी तस्वीर... जो एक छाया की तरह नजर आई... वो मेरे दिल में बस गई। और फिर जब मैं उस दिन पहली बार टिफिन लेकर आई तो तुम्हें इसी आम के पेड़ के नीचे चारपाई में अधलेटे देखा। तुम्हारी पीठ मेरी तरफ थी। देख के आभास हुआ कि शयद तुम ही थे जो उस दिन दिखे थे। मंगल ने कहा भी कि मैं खाना खिला दूंगा, आप परेशान मत होइए। लेकिन मैंने उससे कहा कि नहीं चलो मैं भी चलती हूँ। पास आने पर जैसे ही तुम हमारी तरफ पलटे मेरा दिल तेजी से धड़क उठा। तीन दिन पहले ही देखे गए स्वप्न की परछाई अब स्पष्ट रूप से मेरे सामने थी। मैं अंदर ही अंदर डर गई। अपने इसी डर और बेचैनी को छुपाने के लिए मैंने तुम्हे खुद से दूर रखने की कोशिश करती रही।
   उसकी यह बातें सुनकर मुझे भी आश्चर्य हुआ, "ऐसा भी होता है क्या ? पीहू मैं भी तुमसे एक बात बताता हूँ... कुछ इसी तरह मुझे भी आभास हुआ था। जब बाइक घर के पास से बगिया की तरफ मुड़ी और मेरी नजर तुम्हारे घर की तरफ गई, तो मुझे ये घर जाना पहचाना लगा। ये बगिया, ये रास्ते  देखकर महसूस हुआ जैसे मैं यहां पहले भी आ चुका हूँ। मैंने सत्य से पूछा भी, क्या मैं यहां पहले भी कभी आया हूँ, उसने हंसते हुए मेरी बात टाल दी। मुझे भी आश्चर्य था, क्योंकि मैं भी जानता था... मैं यहां पहले कभी नहीं आया हूँ... फिर भी यह सभी जाने पहचाने क्यों लग रहे हैं ?
    वह बोली, "पता नहीं क्यूं, हम दोनों के साथ ही ऐसा हुआ ? उस दिन जब तुम अटारी में खाना खा रहे थे... याद करो गर्लफ्रेंड वाली बात ? तुमने कहा था की हो सकता है... हम मिले हों, पिछले जन्म में या फिर इसी जन्म में किसी स्वप्न में... तुम्हारी यह बात सुनकर मुझे अजीब सा डर लगा और एकदम से वही स्वप्न याद आ गया था... यदि हम दोनों को एक दूसरे से मिलने का पूर्वाभास पहले ही हो चुका था, तो फिर यह सच है कि कुदरत हमें मिलना चहती थी। हमारी नियति हमें एक दूसरे के करीब लाना चाहती थी..."
    "तुम सच कहती हो यहां आने पर मुझे महसूस हुआ कि जैसे मैं पहले भी आ चुका हूं... तुम्हें देखने के बाद महसूस होना कि जैसे मैं तुमसे पहले भी मिल चुका हूँ... इन सबका आभास हमें कुदरत ही कर रही थी...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा। 
    कुछ पल ठहरने के बाद उसने आगे कहा, "लेकिन तुम्हारी रात की हरकत ने तो मुझे एक मौका और दे दिया कि मैं तुम्हें खुद से दूर रखूँ। मैंने सत्य को स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि अब हम और रिस्क नहीं ले सकते, वह तुम्हे कंपनी वाले क्वार्टर में भेज दे। तब सत्य ने मुझे बताया कि उसके दोस्त ने चलते-चलते यही कहा था कि वह तुम्हारा ध्यान रखे। तुम अभी कुछ महीने पहले ही एक बुरे दौर से गुजरे हो। उसने शंका जाहिर की शायद कोई गर्लफ्रेंड का मैटर है। बताओ मैं उसे इस हालत में कैसे अकेला छोड़ दूं ? अपनी जिम्मेदारी पर ले आया हूँ, यदि उसे कुछ हो गया तो ? बगिया में रहेगा तो कम से कम मंगल और कमली तो रहेंगे उसका ध्यान रखने के लिए ? वैसे तुम अच्छे हो, ज्ञान के साथ पढ़े हो। उसी ने मुझे मना किया कि मैं बाबा से कुछ न कहूं। वह शाम को तुमसे बात कर लेगा।
    हम लोगों ने किसी तरह बाबा से छुपाया। सत्य के कंपनी जाने के बाद उस दिन सुबह मैं खुद को तुमसे मिलने से न रोक पाई। सोचा तुम्हें चार बातें सुनाऊंगी तो तुम खुद यहां से चले जओगे....
   मैंने हंसते हुए पूछा  "अच्छा !! तो सुनाया क्यों नहीं, सुनाना चाहिए था न...?"
   मेरी हंसी शायद उसे अच्छी नहीं लगी, उसने कड़ी नजरों से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "तुम्हें यह सब कहानी लग रही है न ? कहानी लिखते हो न, तो तुम्हें तो लगेंगी ही...?"
   उसकी बात सुनकर मेरे मन में भी पछतावा जागा। मैं कैसा इंसान हूँ, कोई अपने दिल का हाल बता रहा है और मुझे मजाक सूझ रही है, "सो सॉरी पीहू..."
 उसने कसकर मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, तुम्हें चार बातें सुनाने के लिए ही मैं यहां आई थी। खाट के पास खाली शराब की बॉटल लुढ़की देख मुझे और भी गुस्सा आया। जब मंगल चाचा को डांटा, तब उन्होंने तुम्हारे गिरने की बात को छोड़कर सभी कुछ सच-सच बता दिया था। 
    तब मैंने तुम्हारे बैग की तलाशी ली तो ऊपर ही एक पेपर मिला, और भरी बॉटल भी। जब मैं पेपर को बाहर निकाल कर फेंकना चाहा तो मंगल चाचा ने रोक दिया। उन्होंने कहा मत फेंकिए, कहानी छपी है। मैंने पूछा, कहानी छपी है !! किसकी ? तब उन्होंने बताया कि सर जी की। मुझे आश्चर्य हुआ। इसी चहरी में बैठकर मैंने तुम्हारी "गुल्लक" कहानी पढ़ी।  कहानी के हर इमोशंस, हर डायलॉग, लिखने का तरीका, शब्दों का चयन इन सभी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। खासकर वह डायलॉग जो पिता अपने बेटे से कहता है, क्या था ...हां याद आया,... इंसान तरक्की पसंद होता है...
     पूरी कहानी पढ़ने के बाद तुम्हारे प्रति मेरी विचारधारा में परिवर्तन हुआ। मैने पहली बार तुम्हे ध्यान से देखा, तुम किसी बच्चे की तरह बेखबर सो रहे थे। महज तेईस-चौबीस साल की उम्र में एक पिता और उसके पुत्र के बीच के संबंधों पर आधारित कैसे कोई इतनी सेंसटिव कहानी लिख सकता है। इस उम्र में खासकर जबकि दिल टूटा हो लोग अक्सर असफल प्रेम पर कहानियां लिखते हैं। लेकिन नहीं, तुमने पिता-पुत्र के जज्बातों और रिश्तों को दर्शाने वाली कहानी लिखी। उसी समय मुझे समझ में आ गया था कि मैंने तुम्हें जानने और समझने में गलती कर दी। मेरे मन में तुम्हारे लिए करुणा जागी, मुझे तुम शराबी कहीं से नजर नहीं आ रहे थे।
     लेकिन मेरे सामने एक प्रश्न अभी भी खड़ा था, तुम इतनी शराब क्यूं पीते हो ? मतलब एक दिन में फुल बॉटल खत्म !! जबकि यह कोई उम्र नहीं होती इतनी पीने की। आखिर तुम्हारे साथ ऐसा क्या हुआ ? बस यही से तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में और सहानुभूति जागी, और तुम्हारा बैग ले कर मैं घर चली गई। एक यही तरीका था तुम्हें घर बुलाने का ताकि मैं तुमसे अकेले में बात कर सकूं। 
     इस तरह उस दिन तुम्हें अटारी में अकेले खाना खिलाना मेरी सोची-समझी चाल थी। मैं तुम्हारे साथ कुछ वक्त गुजारना चाहती थी ताकि तुम्हें समझ सकूं, तुम्हारे बारे में और जान सकूं...  तुमने जब अपनी तिरते आंसू वाली कविता सुनाई, उसका अर्थ समझाया तो मुझे विश्वास हो गया कि गुल्लक कहानी लिखना केवल इत्तफाक नहीं हो सकता। फिर जब तुमने माइलस्टोन के लिए लिखी गई कुछ कविता सुनाई, राधा सी प्रीत तुम्हारी... मोहन सा मैं भी तरसा हूँ...
    मैं समझ है, तुम्हारे अंदर कहीं न कहीं कोई न कोई एक ऐसा दर्द है जिसे तुम जी रहे हो। किसी से कहते नहीं हो लेकिन तड़पते हो। हर दिन जीते हो, हर दिन मरते हो। वैसे अब तो बता दो उस दिन तुम अटारी से भागे क्यों ? क्या शराब पीने के लिए ?
    उसकी बात सुनकर मैं चुप था, उसने कुछ और जोर देकर पूछा, "अब हमारे बीच कुछ भी छुपाने लायक है क्या ?"
   "नहीं, जब मैं यहां पहुंचा तो मंगल ने भी यही सोचा था कि मैं शराब की तलब में बगिया आया हूँ, लेकिन वो बात नहीं थी पीहू। तुम लोगों के जाने के कुछ देर तक तो मैं चित्रलेखा पढ़ता रहा। लेकिन मन नहीं लग रहा था। अकेलेपन में अचानक ही सूनी रात शहनाइयों और बैंड-बाजों की आवाज से गूंज उठी। महसूस हुआ जैसे आंगन में विवाह मंडप सजा हो। विवाह मंत्रों के उच्चारण, शादी की रस्में, मंगल गीत और शोर, इन सब के एहसास मुझे बेचैन कर रहे थे। मैं पसीने से तर-बतर हो गया। बहुत तेज प्यास लगी और मैं पानी पीने के लिए नीचे आया... बस वहीं महसूस हुआ कि यदि मैं यहां कुछ देर और रुका तो कहीं पागल न हो जाऊं। मुझे उस वक्त कोई ऐसा इंसान चाहिए था जो मेरे साथ कुछ देर तक जाग सके, मुझसे बाते कर सके। बगिया याद आई, मंगल का चेहरा सामने आया और मैं घर से भाग निकला। मेरी हार्ट बीटिंग इतनी अबनॉर्मल हो चुकी थी कि सच में उस दिन यदि मैंने शराब न पी होती, तो मैं मर सकता था...", फिर मैंने मुस्कुराते हुए बात आगे बढ़ाई, "फिर तुम्हें कब एहसास हुआ कि मैं बुरा इंसान नहीं हूँ..."
     "एहसास तो तुम्हारी कहानी पढ़ते ही हो गया था लेकिन जब तुमने ईमानदारी से मुझसे शराब पीने की इजाजत मांगी और पैसे भी। उसी शाम मैने समझ लिया कि तुमने मुझे यूं ही गर्लफ्रेंड नहीं माना है। हम जैसे स्वाभिमानी इंसान रोटी और पैसे उसी से मांगते हैं जिसे हम बहुत अपना समझते हैं। मुझे खुशी हुई कि तुमने मुझे अपना समझा। और उसी क्षण मैंने तय कर लिया कि मैं अपने इस दोस्त को अकेले इस हालत में नहीं छोड़ सकती। जब तुमने पार्टी ऑफर की उसी पल मैंने भी फैसला कर लिया, यह सोच कर कि कभी न कभी तुम मुझसे अपनी पर्सनल फिलिंग शेयर करोगे। 
    तब क्या जानती थी कि जिस दर्द से तुम्हें बाहर निकलना चाहती थी वही दर्द मैं खुद मोल ले लूंगी। इसीलिए कहती हूँ कि काश तुम मेरी जिंदगी में न आए होते। मैं बहुत खुश थी, लेकिन आज ? बिल्कुल असहाय !! नंगे पांव तुम चलते रहे और छाले मेरे पैरों में पड़ते रहे। दर्द में रोए तुम और आंसू मेरी आँखों से बहते रहे। खुद तो दर्द लिया ही लेकिन उसका भागीदार तुम्हें भी बना लिया। और तुम ?  तुम्हारी भी किस्मत अजीब है मेरे दोस्त, मैने तुमसे जिस दर्द को बांटा, उसी दर्द को ब्याज के साथ तुम्हें वापस भी कर दिया। 
    कुछ देर चुप रहने के बाद उसने मुझसे कहा, "कभी मैंने सत्य से कहा था कि मुझे उसकी एक्स गर्लफ्रेंड को थैंक्स कहना है, क्योंकि यदि उसने सत्य को न छोड़ा होता तो शायद वह मेरी जिंदगी में न आता। और आज दिल चाहता है कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड से मिलूं और पहले उसे अपने गले से लगाकर उसके आंसू पोंछूं, फिर उसे डांटू और उससे पूंछू कि क्यूं छोड़ा तुम्हे ? क्यूं आने दिया तुम्हे मेरी जिंदगी में ? काश !  काश कि! तुम मेरे पास कभी आए ही न होते। काश ! हम कभी मिले ही न होते...
      जब सत्य मेरी जिंदगी में आया तो मुझे बेहद खुशी हुई, लेकिन तुम्हारे आने पर मुझे कोई खुशी क्यूं महसूस नहीं हुई ?  जब तुम्हे पहली बार देखा तो उसी दिन नियति ने मुझे पूर्वाभास करा दिया था कि मैं तुमसे दूर रहूं। लेकिन हुआ क्या ? मैंने तुमसे जितना दूर रहने की कोशिश की तुम मेरे हृदय के उतना ही करीब आते चले गए, और अब देखो तुम्हारे आगे-पीछे घूम रही हूँ । कोई परवाह नहीं की कौन कहां पर है और क्या कर रहा है। क्यों मेरी पूरी दुनिया तुम्हारे इर्द-गिर्द ही सिमट के रह गई है ? बताओ, प्रतिपल तुम्हारे ही बारे में क्यों सोचती रहती हूँ ? दुनिया की सारी सच्चाई, सारी ईमानदारी तुम्हारी मासूम आंखों में ही क्यों दिखाई देती है ? जब भी इनमें झांक कर देखती हूँ तो खुद के सुंदर होने का आभास क्यूं होता है ? सामान्य से दिखने वाले एक इंसान में पूरी दुनिया की विशिष्टता क्यों नजर आती है ? मेरे मन के सभी दर्शन का अक्स तुम्हारे ही व्यक्तित्व में क्यों नजर आता है ? और क्यूं आज, यह सोच कर मेरे हृदय में एक उदासी-सी छा जाती है कि तुम अब मेरे पास से चले जा रहे हो ? शायद उसी तरह जैसे उस दिन मैंने एक सपने में देखा। 
     वह कहती गई, मैं सुनता गया। साथ ही हम दोनों की आंखें भींगती रही.. उस क्षण मैंने यह भी जाना कि जब इंसान के शब्द खत्म हो जाते हैं, तो उसके हृदय की पीड़ा उसकी आंखें कहती हैं। उसकी संवेदनाओं का विस्तार उसके आंसुओं में होता है।
     कुछ देर बाद उसने कुछ मुस्कुराते हुए और मेरी तरफ देख पूछा, "अच्छा चलो नाम न बताओ, लेकिन यह तो बता दो कि तुम दोनों की राहें जुदा क्यूं हुई... ऐसी कौन सी आफत आ गई थी... जाति, धर्म, या फिर पारिवारिक रंजिश ?"
   मैंने मायूसी से कहा, "नहीं पीहू! जरूरी नहीं की जाति, धर्म या फिर पारिवारिक रंजिश ही हमेशा कारण बने। उसका ननिहाल मेरे गांव में था, रिश्ता उल्टा पड़ रहा था ! जिस कुल गोत्र से बेटी ली, उसी कुल गोत्र में अपनी बेटी कैसे दे सकते थे, बस यही कारण था.… और भी कुछ रहा हो तो मैं नहीं जानता, मुझे तो बस इतना ही पता है..."
    पीहू ने आश्चर्य से कहा, "हम 21वीं सदी की ओर बढ़ रहे हैं या फिर से 19वीं सदी की ओर लौट रहे हैं?"
   "पता नहीं पीहू कहां जा रहे हैं ... और सच मानो तो मैंने अब सोचना छोड़ दिया है... तुमने कहा न कि मैं खुदगर्ज और स्वार्थी इंसान हूँ, तो बनाया किसने ? मैंने तो सभी के बारे में सोचा तो फिर किसी ने हमारे बारे में क्यों नहीं सोचा ? उसके पिता ने मान-सम्मान का वास्ता दिया होगा, मां ने आंखों में आंसू लिए दूध की दुहाई दी होगी। हो सकता है उसके मामा, भाइयों और बहनों ने इमोशनल ब्लैकमेल भी किया हो... मैंने कभी उससे कोई सफाई नहीं मांगी और न ही उसने दी। वैसे भी यह कहानी अब खत्म हो चुकी है। अब हमारी रहें जुदा हैं...  वह अपने रास्ते गई और मैं अपने रास्ते चल पड़ा। फिर भी सच कहता हूँ पीहू ! अनंत जीवन-पथ पर भटकते हुए जब कहीं एक पल के लिए ठहरता हूँ और उसके बारे में सोचता हूँ, तो उसकी यादें मेरी आंखें भींगो जाती हैं। उसके साथ जिए हुए हर एक पल, हर एक लम्हे याद आते हैं। दिल में आता है कि न जाने क्या कर जाऊं... फिर खुद को रोक लेता हूँ... सोचता हूँ शायद यही तो जीवन है..."
   "मोहब्बत कैसे हुई...?", उसने एकदम से पूछ लिया। 
    "मतलब ! मैं समझ नहीं...!!",  आश्चर्य से उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "मेरे कहने का अर्थ है... तुम्हे कब महसूस हुआ कि तुम उसे प्यार करने लगे हो..."
   "ये भी दिलचस्त कहानी है... चलती हुई राहों में उनसे पहली बार देखा, मेरे पास से एक हवा के झोंके की तरह गुजर गुजर गई... उसके मामा की लड़की उसके साथ थी। मैं उसे जाते हुई पीछे से देख रहा था कि अचानक उसके हाथ से उसकी रुमाल गिरी... वह पलटी और फिर एक कदम आगे बढ़कर कुछ झुककर उसने अपने रुमाल उठाई... तब पहली बार मैंने उसे देखा था... हम दोनों की नजरें एक दूसरे से जा मिली... उसकी आंखों में अपने लिए एक अजीब सी कशिश देखी... मेरे मन में भी हलचल हुए। हर दिन वह मुझे राहों में या फिर किसी के घर में मिल जाती। तब तक मुझे बिल्कुल नहीं मालूम था कि ये कौन है.. और मेरे गांव में कैसे और किसके यहां आई है... लेकिन जब भी मैं उसे देखता वह मुझे अपनी सी लगती... महसूस होता जैसी मैं इसे पहले से जानता हूँ... फिर एक शाम जब वो मेरे घर आई तो ठीक से परिचय हुआ... हमने एकदूसरे के बारे में जाना... उसने कहानियां सुनाई और मैने सुनी... हां जब पहली बार उसे देखा था तब उसकी तरफ आकर्षित हुआ... मन में उससे फिर से मिलने की चाहत ने जन्म लिया... लेकिन जिसे प्यार कहते हैं वो तो उसी रात शिद्दत से महसूस हुआ..."
    "क्या पहली नजर के प्यार पर तुम यकीन करते हो...?", उसने पूछा था।
    "नहीं... केवल किसी को दूर से देख कर आप उसके स्वभाव, उसकी अभिरुचि, उसके दृष्टिकोण इत्यादि को कैसे जान सकते हैं... उसका सुंदर चेहरा और लुक्स आपको लुभा सकता है... प्यार तो इनसे अलग है न..."
    थोड़ी देर के लिए मान लो यदि ऐसे इंसान के साथ रहना पड़े जिससे ये मैच न करे तो ?"
    "तो ऐसे इंसान को हम पसंद नहीं कर सकेंगे... फिर जब लाइक नहीं तो लव कैसे होगा... कहीं तुम्हारा मतलब अरेंज्ड मैरिज से तो नहीं ?", मैने पूछा था।
   "हां, यही समझो...", उसने जिज्ञासा से कहा।
   "तो फिर एक दूसरे के प्रति ढेर सारी रिस्पेक्ट, कुछ एडजेस्टमेंट और रिस्पांसिबिलिटी फैक्टर काम आते हैं, इसे कहते हैं रिश्ता निभाना, जिंदगी को गुजरना..."
  "लेकिन ये तो हर रिश्ते में जरूरी हैं..."
   "बिल्कुल मानता हूँ, अपने प्रेम को यथार्थ के धरातल में उतारने के लिए, अर्थात विवाह में स्थापित करने के लिए इनका होना जरूरी है, लेकिन सर्वप्रथम प्रेम का होना जरूरी होता है... तो फिर ये अपने आप बन जाते हैं... यदि नहीं तो बिल्डअप करना पड़ता है... इसीलिए सफल वैवाहित संबंधो के लिए प्रेम का का होना जरूरी है, लेकिन प्रेम के लिए किसी रिश्ते की जरूरत नहीं... यह अपने आप में ही पूर्ण होता है... इसे कोई नाम देना जरूरी नहीं... प्रेमी, प्रेमिका, लवर, माय लव इत्यादि, इन सभी में प्रेम शब्द आता है... क्या किसी रिश्ते में आता है... नहीं न ?"
  "ओह ! बड़ी गूढ़ बाते हैं, तुम अपनी कहो...", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
    "हां तो मैं पहली नजर में प्रेम होने की बात कर रहा था... लेकिन मैने कुछ हद तक उसे पहली बार देख के पसंद किया... क्यूं ? जिसका जवाब बाद में मुझे मिला, जब मेरी दादी ने बताया कि हम बचपन में एक साथ खेले है, खूब लड़े-झगड़े हैं। मैं उसकी हेयर क्लिप... हेयर बैंड छुपा देता था... उसे परेशान करता था... जब वह रूठ जाती या फिर रोने लगती तो पहले मैं उसे चुप कराने की कोशिश करता लेकिन जब वह चुप न होती तो मैं उसेसे लिपट कर खुद भी उसके साथ रोने लगता... हां ऐसी स्टूपिड हरकतें थीं हमारी... बचपन से ही हमारे बीच एक अलग बांड था... इस तरह देखा जाए तो उस दिन हम पहली बार नहीं मिले थे... वह मेरे अवचेतन मस्तिष्क की यादों में थी....", इतना कहने के बाद मेरी आवाज ने मेरा साथ छोड़ दिया। कुछ शब्द दिल में ही घुट के रह गए।
      उसने आत्मीयता और संजीदगी से मुझसे पूछा, "सॉरी यार !! तुम दोनों को अलग नहीं होना चाहिए था... लेकिन मुझसे तो कहते हो आगे बढ़ने के लिए, तो फिर तुम आगे क्यों नहीं बढ़ते हो, क्यों रुके हो उसी जगह पर...?"
    मेरे होठों में फीकी मुस्कान दौड़ गई, "क्या मतलब तुम्हारा ? हथेली में चिराग ले कर किसी दूसरी मोहब्बत की तलाश करूं ? और मान लो तलाश करने पर या फिर इत्तेफाकन मिल भी गई, तो क्या जरूरी है कि फिर से किसी की कोई और मजबूरियां न होंगी ?"
    उसकी भीगीं पलके उठीं, उसने करुणा से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "क्या तुम मुझे ताने दे रहे हो...?"
    तब तक मुझे भी एहसास हो चुका था कि मुझे यह नहीं कहना चाहिए था। मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "सॉरी पीहू... मैंने एक सामान्य सी बात कही है... रियली आई डज़नट मीन इट... लेकिन जरा सोचो पीहू ! जो सच है तो है। हम उसे झुठला नहीं सकते... शायद इसीलिए अब हर एक लम्हे को जिंदगी का अंतिम मान के जीता हूँ। जिसके लिए जो फिलिंग्स है कह देता हूँ। इसी पेड़ के नीचे कभी ज्ञान से जो कहा था, न चाहते हुए वही तुमसे कह दिया..."
    उसने कौतूहल से पूछा, "ज्ञान से कहा था !! क्या कहा था...?"
   मैने सर झुकाए हुए जवाब दिया, "यही कि यदि तुम सत्य के साथ पहले से कमिटेड न होती तो मैं तुम्हें प्रपोज करता। तुमसे कहता, तुम मुझे पति के रूप में न सही हमेशा बॉयफ्रेंड के रूप में पास रख लो। मैं पल भर में स्वार्थी बन जाता पीहू। कहता, जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ। अब तुम ही एक वजह हो जीने की। तुम्हारे सामने घुटने के बल बैठ तुम्हे मांगता... कहता, मै भटका, टूटा, और बिखरा हुआ मुसाफिर हूँ। तुम मुझे अपनी बाहों का सहारा दे दो। मुझे किन्ही रस्मों की जरूरत नहीं है, बस तुम मेरे पास रहो। हर सुबह खिलते हुए फूलों में, ढलती हुई शामों में, रात्रि की नीरवता में, मेरी हर खुशियों में, मेरी हर उदासियों में। मैं तुम्हारे साथ जिंदगी जीना चाहता हूँ। इस समय मेरी नजर में तुम्ही हो जो मुझे समझती हो और मुझे संभाल सकती हो..."
   "तुमने ज्ञान से यह सब कह दिया ?", उसने आश्चर्य से पूछा था।
      मैने संजीदगी से कहा,  "हां कह दिया पीहू ! क्योंकि उसने ही कभी मुझसे कहा था कि न कहने का दर्द ... कभी-कभी कह देने के दर्द से कहीं अधिक होता है। इंसान जिंदगी भर खुद का दोषी बनकर रह जाता है कि काश उस वक्त कह दिया होता। और फिर दिल में तुम्हारे लिए चाहत हो, प्यार हो और ऊपर से मैं सिर्फ दोस्ती-दोस्ती का खेल खेलूं, यह झूठी जिंदगी मुझे बर्दाश्त नहीं थी। जिसने मुझे छोड़ना था छोड़ दिया तो अब मैं किन्हीं वादों में नहीं हूँ। लेकिन तुम हो, और तुम्हारे इस कमिटमेंट का मैं सम्मान करता हूँ। यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो शायद मैं भी यही करता। तो फिर मैं तुम्हें क्यूं मजबूर करूं ? 
    और फिर तुमने ही तो कहा है कि मुझमें कहने और स्वीकार कने कि हिम्मत है, जो सब में नहीं होती है, और एक एग्जांपल तो तुम्हारे सामने ही है ?  तुमने कुछ न कह कर सब कुछ कह दिया, तो अब कोई जरूरत नहीं है कि तुम मुझसे कुछ और कहो। मैं अपनी किस्मत को कोसूं या तुमसे कोई शिकायत करू, क्या जरूरत है ? 
     जिंदगी की राह में भटकते हुए तुमसे आ मिला, तुमने मुझे अपना अच्छा दोस्त समझा या मान लो कि हमारी हॉबीज, इंटरेस्ट, बात करने का लहजा, जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण ये सब मैच कर गया, इन्हीं या फिर और भी किन्हीं कारणों से मुझे तुमसे प्यार भी हो गया, तो इसमें गलत क्या है ? यह तो नेचुरल है, होता है।  लोग बेवजह ही प्यार, मोहब्बत इन शब्दों की परिभाषा को जटिलताओं में खोजते रहते हैं। शायद इसलिए की सरल और आसान चीज लोगों को पसंद ही नहीं आती। हम विशिष्टता की तलाश करते हैं और जटिलताओं में जीवन के हल खोजते हैं। इस तरह जिंदगी को और कॉम्प्लिकेटेड करते चले जाते हैं।
     जबकि जीवन और प्यार इनसे आसान तो कुछ है ही नहीं। बस मैं इतनी-सी बात न समझ पाया था। इन्हें स्वीकार करने की हिम्मत होनी चाहिए, जो कि पहले मुझमें भी नहीं थी। लेकिन जब तुमसे मिला तो समझ में आ गया। तुम्हारे सामने तुमसे अपने दिल के जज्बातों को स्वीकार करना, इसकी शुरुआत है। हम जीवन को स्वीकार कर ले...यही हमारी सबसे बड़ी विशिष्टता होगी, और यही हमें औरों से अलग भी रखेगी..."
   ध्यान से सुनने के बाद उसने मुझसे पूछा, "इतनी बड़ी फिलोसोफी का अर्थ क्या निकाला ?"
   मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "यही कि भूल जाओ कि मैंने कुछ कहा और तुमने कुछ सुना... नशे की रात ढल गई, अब खुमार न रहा।  वो देखो...", दूर से आते हुए ज्ञान और सत्य की तरफ मैंने इशारा करते हुए कहा, "फिल्म खत्म हुई... पर्दे पर द एंड लिखा हुआ आ रहा है... अब तुम उठ कर अच्छे से बैठ जाओ...", मैने बैग खोलते हुए कहा।
     नजदीक आते हुए सत्य ने अपने चिरपरिचित अदाज में कहा, "ये देखो ज्ञान ! अच्छी खासी चारपाई को छोड़कर ये दोनों आम के पेड़ के नीचे बैठे हैं, और विद जाम। वाह ... वाह... क्या कहने ...", कहते हुए सत्य हम लोगों के पास ही चटाई पर बैठ गया। 
    उसी के बगल में ज्ञान ने बैठते हुए मुझसे पूछा, "सब खत्म कर दी कि कुछ बची हैं..."
    मैंने बैग की तरफ इशारा करते हुए कहा, "अभी तो लगभग पूरी एक बॉटल बची होगी..."
   "वाह !... क्यों सत्य चलते-चलते हो जाए आखिरी के एक-दो जाम...", उसने सत्य की तरफ देखते हुए पूछा। 
    "हो जाए, अब तो ह्यूमन राइट्स वाले भी चले गए, अब टेंशन फ्री हूँ। तो चलो इसी खुशी में थोड़ी-सी हो जाए। बाकी तुझसे जुदा होने का मन तो नहीं करता...", सत्य मेरे पैरों को तकिया बनाकर इस तरह लेट गया जैसे कुछ देर पहले पीहू लेटी थी। ज्ञान ने मंगल से इंतजाम करने के लिए कहा।
    पांच जाम बने। मेरी तरफ देखते हुए बोला, "देख एक बज रहे हैं, खाना-पीना खाकर थोड़ा आराम करेंगे फिर चार के लगभग निकल चलेंगे... ठीक है न ?"
   मैं कुछ बोलता इससे पहले सत्य बोल उठा, "यार तू जब से आया है, जाने-जाने की रट लगाए हुए हैं। तुझे जाना है तो जा, ये कहीं नहीं जा रहा, मैं कल इसके लिए फैक्ट्री में बात करता हूँ... आजकल कंप्यूटर की कितनी डिमांड है। इसे तो यूं चुटकी बजाते जॉब मिल जाएगी... "
   ज्ञान ने सत्य की बात को काटते हुए कहा, "इसे घर से मैं लेकर आया हूँ मेरे भाई। ये मेरी जिम्मेदारी में है। इसे एक बार कुशलता पूर्वक इसके घर पहुंचा दूं फिर तुम उठा लाना, मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। भई इसके भी माता-पिता हैं, कल को वह मुझसे सवाल पूछेंगे कि कहां गया मेरा बेटा, तो क्या जवाब दूंगा ?"
   इस बार सत्य ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "ठीक है यार, तुम जाओ.... मानता हूं तुम्हारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं, कुछ फर्ज हैं जो निभाने हैं... लेकिन कल दोपहर वाली बात जो कही थी, वही तीसरी इंसान वाली ... उससे मैं एग्री नहीं करता। मैं कोई संत पुरुष नहीं हूँ, जानता हूँ। इसलिए यह नहीं कहूंगा कि पीहू और मेरे बीच में कभी कोई नोक-झोंक नहीं होगी लेकिन यह वादा है, तुम्हें लेकर तो कभी नहीं होगी।
     मुझे जीवन में पीहू की खुशियां चाहिए और मैं जानता हूं कि यह तुम्हारे साथ खुश रहती है। तुमसे अपने सारे दुख-दर्द शेयर भी कर लेती हैं। मुझे यह भी अंदाजा है, तुम दोनों के दिलों में एकदूसरे के लिए सॉफ्ट कॉर्नर है, तो क्या फर्क पड़ता है ? है तो है। मुझे इससे न तो आज कोई एतराज है और न ही कभी होगा। लेकिन मैं तुम्हारे साथ कोई जोर जबरदस्ती नहीं करूंगा। फिर भी एक बात कहता हूँ, जीवन में कभी भी तुम अकेला महसूस करो, तुम्हें मेरी जरूरत हो, पीहू की जरूरत हो, बेहिचक चले आना। घर के ही नहीं हमारे दिल के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा-हमेशा के लिए खुले रहेंगे..."
    हम सभी ने एक दूसरे से चीयर्स किया, "गुजरते हुए लम्हों के नाम ... इस दुपहरी के नाम ... आज ढलने वाली शाम के नाम... कल होने वाली नई सुबह के नाम... कल फिर से उगने वाले सूरज के नाम... आने वाली जिंदगी के नाम... और इस पेड़ के नाम जिसकी छत्रछाया में हम बैठे हुए पी रहे हैं... सुस्ता रहे हैं।
   सत्य कह उठा, "वाह ! देखा ज्ञान, सबके नाम से तो हो गया, हम लोग के नाम से कुछ न हुआ ? यार हमें भी शामिल करो ?"
      मैंने हंसते हुए कहा ऑफकोर्स क्यों नहीं, "पीहू को पसंद आने वाली सत्य की दिलकश मुस्कुराहट के नाम, पीहू के जीवन में बादल की तरह छा जाने वाले सत्य के प्रेम के नाम, पीहू के जीवन में चमकते हुए इस सूरज के नाम, ज्ञान की जान के नाम, जो कि अभी तक मैं ही हूँ... और हम सभी की दोस्ती के नाम..."
   सत्य फिर बोला, "ये ! नॉट फेयर यार !! पीहू के लिए कुछ नहीं बोला..."
    मैंने दिल पर हाथ रख आह भरते हुए एक्टिंग की, "न मेरे भाई, मेरी दुखती रग पर हाथ मत रख। इसके लिए तो पूरी किताब लिखनी पड़ेगी पागल। और फिर कहीं इसके स्वीट से हसबैंड को जलन होने लगी तो...?"
    सत्य ने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा !! तो हो जाने देना, हम किस दिन के लिए है, उसे सम्हाल लेंगे यार। और फिर आफ्टर ऑल उसकी वाइफ की ही तारीफ होगी न... तो क्यूं जलेगा... तुम तो कहो..."
    मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं दोस्त! कहीं ये न हो, तुम अगर मुझको ना चाहो तो कोई बात नहीं, किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी..."
   मेरी बात पर सभी ठहाके मार के हंस पड़े। कुछ देर बाद पीहू ने कहा, "सुनो बॉयफ्रेंड अब कहना तो पड़ेगा... क्योंकि मुझे अपनी तारीफ सुनना बहुत अच्छा लगता है... तो शब्दों में कोई कंजूसी नहीं चलेगी...?"
   "कोई डाउट है क्या ? आफ्टर ऑल यू आर द ऑनली गर्लफ्रेंड ऑफ इनकमिंग फेमस राइटर... तो लैंग्वेज चूज करो, हिंदी में, अंग्रेजी में या फिर उर्दू में ?"
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "सबको मिला-जुला के अच्छे-अच्छे शब्द, जो सुनने में अच्छे लगे और जिनका मीनिंग भी बहुत सुंदर हो..."
   "तो फिर सुनो...", मैने प्याला उसकी तरफ करते हुए कहा,
   "दुनिया की मुकम्मल खुशी समेटे हुए तुम्हारी खूबसूरत गहरी बादामी आंखों के नाम, ... पागल कर देने वाली तुम्हारी इस प्यारी-सी चितवन के नाम, ... मदहोश कर देने वाली तुम्हारी जुल्फों की भीनी-भीनी खुशबू के नाम...  किसी शराबी को जाम की तरह लुभाते तुम्हारे इन गुलाबी नाजुक लबों के नाम ... मन मोह लेने वाली मोहिनी सूरत के नाम ... गालों में पड़ते हुए इन डिंपल्स के नाम...  माथे में चमकने की आस लिए बिंदिया के नाम... सत्य के नाम से मांग में सजने वाले सिंदूर के नाम... चंद्रमा की सारी खूबसूरती समेटे हुए प्यारे से मुखड़े के नाम.... पीहू! तुम्हारे अस्तित्व में समाई इस पूरी प्रकृति के नाम..."
    "वाह क्या बात है, ज्ञान देखो इसे कहते है स्किल, पीहू की तारीफ भी कर ली और इस तरह की कि इसके होने वाले हसबैंड को कोई जलन भी नहीं हुई, बल्कि अच्छा ही लगा..."
     पीहू ने बीच में टोकते हुए कहा, "वह सब छोड़ो
इसने अपने बारे में कुछ नहीं कहा..."
   "हां यह बात तो है, अब कुछ अपने बारे में भी। देखो पूरी ईमानदारी के साथ... कोई कंजूसी नहीं...", सत्य ने पीहू का पक्ष लेते हुए कहा...
   "अरे यार ! मेरी क्या हस्ती, और अपने मुंह मियां मिट्ठू ... अरे यार, ये न होगा। ... और फिर मै तो एक एहसास हूँ ..", मैंने टरकाने के उद्देश्य से कहा।
   पीहू ने मेरे कंधे में हाथ रखते हुए कहा, "देखो अब जाते समय हमारा दिल न दुःखाओ ...", 
    "चलो ... तो फिर ठीक है ... सोचने दो ... ", मैने बॉटल से सभी के कुल्हड़ भरे। फिर सभी को देते हुए कहा, "चीयर्स ! पपीहे की प्यास बुझाते हुए स्वाति नक्षत्र के नाम। ... चीयर्स ! बादल की रिमझिम बरसाती हुई बूंदों के नाम। ... चीयर्स ! सृष्टि को उजालों से भरते हुए सूर्य की तपिश के नाम। ....  चीयर्स ! चंद्रमा की स्निग्ध ज्योत्सना में बिखरी हुई शीतलता के नाम। ... चीयर्स ! मन को लुभा लेने वाले फूलों की खुशबू के नाम ...
     .… चीयर्स ! हृदय की धड़कन बन बहती हुई हवा की रवानी के नाम। ... चीयर्स ! अंधेरों को दूर करते दीप के उजाले के नाम। ... चीयर्स ! जीवन में सुंदरता का एहसास दिलाते मोतियों की चमक के नाम। ,..चीयर्स ! प्रिय के लिए प्रेयसी के दिल में मचलते जज्बातों के नाम। .. चीयर्स ! बनती-संवारती हर एक यादों के नाम। ... चीयर्स ! कहीं-अनकही हर बातों के नाम ... चीयर्स !...", 
    मैं बीच में रुक गया मैंने महसूस किया जैसे मेरे कंधे पर रखा पीहू के हाथ धीरे से कांप गया हों... मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों की कोर भरे हुए थे ... ज्ञान की निगाह भी उसी पर टिकी हुई थी। जब उसे महसूस हुआ तो उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया, " चीयर्स ! ... एक दूसरे से जुदा होती इन राहों के नाम ... चीयर्स ! अब फिर कभी न लौट के आने वाले इन लम्हों के नाम... पीहू ! तुम्हारी हर खुशी के नाम...
    सत्य ने तारीफ करते हुए कहा, "क्या बात है, क्यों न तुम्हारी पीहू के साथ पटे ? दोनों ठहरे लटरेचर को जीने वाले... तुम दोनों यदि साथ मिल जाओ तो लिटरेचर की दुनिया में न जाने क्या कर दो..."  
    ज्ञान उठते हुए बोला, "आग लगा दें भाई आग !!, लेकिन फिलहाल अभी तो पेट में लगी है ... चलो चलते हैं जोरों की भूख लग रही है यार... "
   सत्य भी उठाते हुए ज्ञान से बोला "बाइक तो एक ही है। ऐसा करता हूँ, मैं शैल को अपने साथ ले जाता हूँ... तुम पीहू के साथ पैदल आओ... "
   पीहू उठते हुए बोली, "ज्ञान भैया आप बैग लेकर सत्य के साथ जाइए, मैं और ये साथ आयेगे..."
   सत्य ने पीहू को समझाते हुए कहा, "इसे क्यों परेशान कर रही हो ...?"
    "ये ! क्या तुम्हे कोई परेशानी है...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "अरे पीहू ! तुम इसे क्यूं परेशान...", ज्ञान ने भी पीहू को टोकते हुए कहा।
   "नहीं ज्ञान... पीहू सही कहती है...", इस बार सत्य ने ज्ञान को समझते हुए कहा, "ये यहां चार दिनों तक रहा, मंगल, कमली और इस जगह को अलविदा कहना आसान नहीं होगा इसके लिए... मेरे ख्याल से अभी बहुत वक्त है। इन्हें छोड़ो दो, ये आराम से आ जाएंगे... हम लोग चलते है... ठीक है न शैल ? तुम आराम से आओ... कोई दिक्कत तो नहीं होगी न...?"
   "नहीं ... कोई दिक्कत नहीं होगी... मैं आराम से आऊंगा... तुम लोग चलो...", मैं चहरी की तरफ बढ़ता हुआ बोलो, "बाबा से डिस्टेंट रखना..."
    पीछे से ज्ञान की आवाज आई, "तुम दोनों भी पीछे वाले रास्ते से आना"
   सत्य और ज्ञान मेरा बैग लेकर चले गए। मैं और पीहू ने ठंडे पानी से हाथ मुंह धोए, मंगल ने हम दोनों के लिए दो बड़े-बड़े अमरुद तोड़ कर दिए ... फिर मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया ... "सर जी ! सेवा में कोई कमी रह गई हो तो माफी दे दीजिएगा ...", यह कहते-कहते वह लगभग रो पड़ा। मैंने उसके कंधे में हाथ रखते हुए कहा, "न मंगल ऐसा ना कहो मेरे भाई... तुम्हारी सेवा का तो मैं कर्जदार हो गया ... और जो कहा है, उसे ध्यान रखना... चलो कमली से भी मिल लेते है..."
    हम तीनों मड़ैया के पास आ गए। कमली कुछ दूर पर काम कर रही थी। पीहू उसकी तरफ बढ़ गई... मैं वही पत्थर की पटिया में बैठ गया। मंगल ने एक तरफ रखी हुई एक कॉपी और पेन मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "सर जी, पता लिख दीजिए..."
      मैंने कॉपी के पिछले पन्ने पर अपना पता लिखा और कॉपी उसे वापस देते हुए कहा, "मंगल एक बार फिर कहता हूँ, पीहू का ध्यान रखना... उसे उदास मत होने देना... कमली को भी अपने सामने समझा देना..."
   "जी सर जी...", फिर उसने कुछ संकोच से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "सर जी !... कल रात की एक बॉटल में थोड़ी सी अभी भी पड़ी है... एक इच्छा है, जाते-जाते आखिरी बार हम चारों... कमली को भी अच्छा...", उसकी बात पूरी होती कि पीहू और कमली पास आ गए। मैने मंगल को शांत रहने का इशारा किया..."
  "पीहू ! मैने कमली को चीयर्स कहा ही नहीं...", पास आने पर मैने पीहू से कहा।
   "बैग तो जा चुका है...", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
   "अरे तुम बैग छोड़ो... कल रात एक बॉटल में कुछ बची थी... अरे मंगल कहां गई... हो तो निकालो यार..."
    "है न सर जी...", मंगल तो इसी इंतजार में था। पीहू मेरे पास बैठती हुई बोली, "हां यार हम तो कमली को भूल ही गए थे..."
    "कमली ! तुम भी आराम से बैठो..."
    मंगल ने चार कुल्हड़ रखे। मैने उन्हें खुद भरा। तीन जाम बने। हम तीनों ने एकसाथ चीयर्स किया। लगभग दस मिनट एक दूसरे से बात करते हुए धीरे-धीरे पीते रहे। हंसी-मजाक, कुछ बीती बाते, कुछ गुजरे हुए लम्हों की कसक हमारे चेहरे में साफ झलक रही थी। फिर वो पल भी आया जब हमे जुदा होता था। मैंने दोनों हाथ जोड़कर कमली से विदा मागी, "कमली जा रहा हूँ... तुम्हें बहुत परेशान किया न ? तीन दिनों तक लगातार पार्टी करते रहे... हमारे लिए खाना बना-बनाकर तुम परेशान हो गई न... ? "
      मेरे इतना कहने पर उसने खुद हाथ जोड़ लिए और कुछ भावुक स्वर में बोली, "नहीं सर जी... कहां परेशान किया... खाना तो सभी ने मिल-जुल कर ही बनाया है... यह चार दिन कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला... अब कब आयेंगे..."
    उसकी भावुकता देख मैं भी कुछ-कुछ भावुक हो गया, "पता नहीं कमली ! लेकिन हां यदि कभी इस तरफ आना हुआ तो तुम लोगों से मिलने जरूर आऊंगा... अब इजाजत दो... भइया जी घर में इंतजार कर रहे होंगे..."
     मंगल और कमली दोनों ही बाड़ी के गेट तक छोड़ने आए... मैने कमली से कहा, "कमली ! बॉटल में अभी बची है, आज रात को मंगल के साथ तुम भी एंजॉय करना... और हो सके तो हमें याद भी करना..."
    गांव के खेतों के बीच से गुजरती हुई टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी, जिस पर मैं पीहू के साथ चला और शायद आज आखिरी बार उसके चलने जा रहा था... 
    दोपहर का समय धूप तेज थी, और लगभग डेढ़ किलोमीटर का फासला था। सूर्य की तपिश, पीछे छूटती हुई बगिया, उस बगिया के किसी कोने में बैठे या काम करते हुए मंगल और कमली। वह पंप हाउस, वो आम का पेड़ जिसकी छांव में मेरी पीहू से पहली मुलाकात हुई थी। उसी बगिया के खट्टे-मीठे अमरूद, गाजर, चुकंदर, अनार का स्वाद कोई कैसे भूल जाए ? ढेर सारी शराब और सिगरेट के धुएं में लिप्त मेरी आवारगी, ऐसी जिंदगी कैसे एक पल में कोई छोड़ जाए ?
      और फिर कभी न भूलने वाले यादगार लम्हों को जहां हमने एक दूसरे के साथ जिया। पूरी ईमानदारी के साथ हमने एक दूसरे से अपने दिल की बातें शेयर की, गले लग एकदूसरे के लिए रोए ... वो टीन-शेड जहां मेरी मुलाकात उसके उन फैमिली मेंबर्स से हुई जो हमारे बीच न रहे। और... वो मड़ैया, इसके आसपास हम खूब हंसे, रोए, साथ बैठकर खाना खाया, एक्टिंग की। जहां मैंने चांद सितारों के बीच अपनी रातें गुजारी। ... बेखुदी में मुझे सत्य समझ कर बात करती हुई पीहू के वो लब्ज़, "वो अच्छा इंसान है सत्य... तुम्हारी पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", वही बगिया पीछे छूट रही थी।
     यादें और न जाने कितनी यादें मेरे मन को बेचैन कर गई। मन भारी हो रहा था, लगा चक्कर आ जाएगा और मैं गिर पड़ूंगा। मैंने जल्दी से पीहू का हाथ पकड़ लिया, "पीहू किसी पेड़ की छांव में रुकते हैं, मुझे बेचैनी हो रही है ...", उसने घबरा कर मेरी तरफ देखा, "उफ़ ! तुम्हें तो बहुत पसीना आ रहा है, आओ कुछ देर इधर बैठते हैं...", उसने खेत की मेढ़ पर लगे बाँस के भीटे की तरफ इशारा करते हुए कहां। 
     हम दोनों वहीं जमीन पर बैठ गए। उसने अपनी रुमाल से मेरे माथे और चेहरे के पसीने को पोछा और खुद को गिल्टी महसूस किया, "सॉरी ! मुझे तुम्हें अपने साथ चलने के लिए नहीं कहना चाहिए था.... तुम बाइक से ही चले जाते तो अच्छा रहता..."
    मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "नहीं सच मानो मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही है, मैं तो खुद तुम्हारे साथ चलना चाहता था। लेकिन तुमने साथ चलने के लिए क्यों कहा... इसी तरह ख़ामोशी से चलते रहने के लिए ?"
    उसने मेरी तरफ देखते हुए जवाब दिया, "नहीं सोचा तो बहुत कुछ था कि यह कहूंगी... वह कहूंगी। यह बात करूंगी... वह बात करूंगी। ... लेकिन पता नहीं क्यों जब भी कोशिश करती हूँ.... आवाज ही नहीं निकलती... उससे पहले आंखें भर आती हैं...", उसने अपने आंसू छुपाने के लिए चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था। मैंने अपनी हथेली से उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया और आंखों में उभर आए आंसुओं को अपनी उंगलियों से पोंछते हुए बोला मैं भी रो पड़ा... आंखों में आंसू लिए उसकी तरफ देखते हुए अपने बिखरे जज्बातों को समेटते हुए मैंने कहा...

   हो सके तो ए जिंदगी कुछ आहिस्ता चल,
   हम मनपसंद शख्स के साथ सफर में है।
   अभी तो जीने हैं हमें कुछ यादगार लम्हे,
   अब नहीं हम किसी मंजिल की तलाश में।।

   "हां पीहू ! सच कहता हूँ, अब मुझे किसी मंजिल की तलाश नहीं, अब नहीं चलना मुझे किसी सफर में... सारे रास्ते तुम पर आकर खत्म होते हैं... दिल कहता है, जिंदगी का यह सफर यहीं ठहर जाए... मैं तुम्हारे साथ बहुत से यादगार लम्हों को अभी जीना चाहता हूँ... मैं लौट कर आऊंगा। लेकिन प्लीज अभी चुप हो जाओ .. जज़्ब कर लो इन आंसुओ को... इनका बोझ में नहीं उठा सकूंगा... खुद को गुनहगार समझ लूंगा..."
   उसने सिसकते हुए पूछा, "सच में तुम आओगे न...?"
   "मैंने वादा किया है न ? मैं एकबार जरूर आऊंगा लेकिन तुम्हारी शादी के बाद। यहां तक की शादी में भी नहीं। एक और लग्न मंडप में बैठकर सारी रस्में देखने की हिम्मत अब मुझ में नहीं रह गई पीहू...", मैंने अपने आंसू खुद ही पोंछते हुए कहा, "मैं स्वार्थी और खुदगर्ज हो गया हूँ न... अब तुम भी बन जाओ... पर मैं कभी सोचूंगा ...
तू साथ किसी के चलती होगी, 
तो फिर वह कैसे चलता होगा,
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
इक साथ तेरे चलने पर, 
खुद को सौ-सौ बार संभलते देखा है।

   तुम्हारे साथ जीवन पथ पर चला तो संभल गया, या यूं कहो संभाल लिया तुमने मुझे। मैं यहां से बहुत सारी यादें लेकर जरूर जा रहा हूँ... लेकिन सच मानो टूटकर या बिखरकर नहीं जा रहा हूँ। एक मजबूत इंसान बनकर जा रहा हूँ... अब मेरे अंदर नियति के फैसले को स्वीकार करने की हिम्मत आ गई है। हम दोनों इस धरती के किसी भी कोने में रहे... एकदूसरे की यादों में तस्वीर बनाकर सदैव जिंदा रहेंगे ... अब आध्यात्मिक प्रेम को स्वीकार करने और उसे जीने का समय आ गया है पीहू ... हम किन्हीं भी लम्हों में कमजोर पड़ जाएं.… इससे पहले अब जुदा होना होगा..."
    मेरे इतना कहते ही वह एकबार फिर मेरे कंधे पर सर रख रो पड़ी। मैंने उसके और खुद अपनी आंखों के आंसुओं को पोंछा, उसका हाथ मजबूती से थाम उठते हुए बोला, "चलो चलते हैं पीहू... जिंदगी का यह पल... यह सफर... सिर्फ और सिर्फ हम दोनों के नाम..."
   कुछ दूर तक हम यूं ही चलते रहे, और चलती रही हमारी खमोशियां। कभी एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा देते... तो कभी हमारी नजरे एक दूसरे की नजरों से मिल कुछ क्षण के लिए ठहर-सी जाती... तो कभी कुछ देर में ही आने वाले जुदाई के लम्हों का ख्याल कर हमारे चेहरे उतर जाते। तो कभी मेरे कदम कुछ लड़खड़ाए, कुछ डगमगाए से जमीन पर पड़ते।
    तो कभी "मुझे दुनियां बालों शराबी न समझो... ", "बेखुदी में सनम उठ गए जो कदम...", "छलकाए जाम...", और "मुझको यारों माफ करना मैं नशे में हूँ...," जैसे गीतों को मैं गुनगुना उठता। उसने कुछ मुस्कुराते हुए और मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "तुम्हें भी नशा होता है !! तुम्हें तो देवताओं का वरदान प्राप्त है न ?"
    मैंने हंसकर कहा, "लौटा दिया, कुछ तो लिहाज रखना था न... तुम्हारी इन नशीली आंखों का... अच्छा एक चीता सुनो  ...?"
    उसने भी हंसकर कहा, "भालू की तरह ?"
   "हां...", मैंने भी हंसकर जवाब दिया, "भालू की तरह..."
   "तो सुनाओ...?", उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा। 
मुझे अब किसी मंजिल की तलाश नहीं 
ये रास्ते ही बहुत हैं तेरे साथ के लिए।
तू चलता चल साथ मेरे हम-राही,
तेरे बगैर ये जिंदगी आसां तो नहीं।।
   उसने तारीफ करते हुए कहा, "वाह क्या बात है ! मैं भी कुछ कहूं ?"
    "क्यों नहीं ... हमारी खुशनसीबी !! ... इरशाद ", मैने उत्सुकता से कहा।
   कुछ देर सोचते के बाद उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा ,
इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।
  "क्या बात है पीहू ... वाह! काश मैने लिखा होता।
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अब हमारे बीच मेरा क्या, तेरा क्या ?" 
   मैने कहा, "सही है, ये तुम्हारे ये डार्क गोल्डन और कर्ली हेयर शायद तुम्हें अपनी मम्मी से विरासत में मिले हैं... मैंने उनकी फोटो उस दिन एल्बम में देखी थी... है ना ?"
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बहुत तेज नजर है तुम्हारी। मेरी नानी स्वीडिश थीं। इंडिया ट्रिप में आई थी और मेरे नाना जो कि उन्हें पसंद आ गए उनसे शादी कर ली। उनका एक ही बच्चा हुआ और वो थीं मेरी मां। मैने बहुत बचपन में उन्हें देखा था। उनके बालों का कलर गोल्डन था। मेरी मां का कुछ चेंज हो के डार्क गोल्डन हो गया और मेरा भी कुछ-कुछ चेंज ही हो गया, अब पता नहीं इस कलर को क्या कहेंगे..."
   "ओह ! तो पूरी कहानी ये है... नानी जी तो अभी होंगी न...?", मैंने आतुरता से पूछा था और उसने उतनी ही मायूसी से जवाब दिया, "नहीं... कोई नहीं है, सब गए..."
   मैने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "वैसे इस रंग और स्टाइल के बाल मैने आज तक नहीं देखे... मुझे पसंद आए। तुम्हारे कर्ली बालों को देख कर मुझे किसी शायर की एक लाइन याद आ गई ... मुझे उसका नाम तो नहीं मलूम ... लेकिन तुम पर फिट बैठती है... काफ़िर हैं जो बंदे नहीं इस लाम के...!"
   उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे ! हां ये तो मैने भी पढ़ी है, फिराक गोरखपुरी की जीवनी में इसका जिक्र आया था...", फिर उसने पूरा शेर सुनाया था
"लाम के मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के,
वे काफ़िर हैं जो बंदे नहीं इस 'लाम' के"
     यहां पर लाम का अर्थ है, घुमावदार अर्थात कर्ली। लोग इस लाम को जोड़ के इस्लाम कहते है, और समझते भी हैं। है न ?
     मैंने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, "वाह पीहू ! क्या बात है !! इसीलिए तो कहता हूँ कि तुमने सूरत के साथ-साथ सीरत भी पाई है..."
    उसने कुछ सकुचाते हुए कहा,  "अब इतनी भी तारीफ मत करो कि मुझे खुद पर ही गुरूर आ जाए..."
    "तो इसमें बुरा क्या है ? कभी-कभी खुद पर गुरुर करना भी जरूरी होता है। तभी तो हम जैसे तुम्हारे साथ चलने पर खुद को गौरांवित महसूस करेंगे..."
   "ये लो... तुम तो उलटी गंगा बहा रहे हो... यहां तो मुझे इस बात का गुरूर है कि तुम जैसा राइटर मेरे साथ है..."
   मैने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो तो ठीक है... एक दूसरे पर गुरुर करते रहें... एक दूसरे को कंपलीमेंट्स देते रहें... और यूं ही साथ चलते रहे..."
   "साथ चलते रहे...", उसने खोए-खोए अंदाज में कहा, "लेकिन कब तक...?"
    और मैं चुपचाप उसकी तरफ देखता रह गया। इस सवाल का जवाब तो मेरे पास भी नहीं था। मुझे चुप देखकर उसने पूछा, "अच्छा यह बताओ तो क्या तुम मुझे इसलिए पसंद करते हो कि मैं खूबसूरत हूँ, पढ़ी लिखी हूँ...?"
    "हां भी.. और नहीं भी...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
   "मतलब ? मैं समझी नहीं... सीधे कहो। ये गोल-गोल क्यूं जवाब दे रहे हो... और कहते हो मै गोल-गोल घूमाती हूँ...", उसका लहजा शिकायती था।
  "पसंद करने के लिए सुंदरता, ज्ञान ये सब जरूरी हो सकता है, लेकिन प्यार करने के लिए नहीं। उसके लिए एक अच्छा इंसान होना जरुरी है। व्यक्तित्व में मानवीय संवेदनाओं का विस्तार जरुरी है। मुझे तुम्हारी सहृदयता से प्यार है... तुमने मेरे दर्द को महसूस किया... अपना समझा... ये छोटी बात नहीं..."
   "तुम ऐसा क्यूं सोचते हो कि मुझे तुमसे सिर्फ सिंपैथी है ?."
    मैने दूसरे ढंग से कहा, "नहीं पीहू, मैंने यह नहीं कहा कि तुम्हें मुझसे केवल सिंपैथी है। मेरा मतलब काइंडनेस से है..."
   "इसमें अंतर क्या है एक ही बात तो है...?", उसने कुछ आश्चर्य से पूछा।
   मैंने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा, "ऊपरी तौर पर देखा जाए तो कोई अंतर नहीं लेकिन एक छोटा सा अंतर होता है, एक्शन का। सिंपैथी में दुख या दर्द को महसूस कर उन्हें शब्दों से जताया जाता है, किंतु काइंडनेस में शब्दों से जताने के साथ-साथ उसे दूर करने का प्रयास भी किया जाता है... और फिर कभी-कभी तो शब्दों की भी जरूरत नहीं होती है... यदि ये नहीं... तो प्यार भी नहीं... वो क्या कहते है... हां टू लव... और वैसे भी मैं सच्चा प्यार, झूठा प्यार जैसे विचारों को नहीं मानता। यदि प्यार है, तो फिर है। नहीं है, तो फिर नहीं है। अब इसमें सच्चा क्या, झूठा क्या...?"
  उसने मेरी कही बात का कोई खंडन या जवाब नहीं दिया। उसे चुप देखकर मैंने ही पूछा, "मेरी पोयम की आखिरी कड़ी सुनोगी...?"
   उसने मेरी तरफ देखा, "आखिरी ...?"
   "हां, एक दम अंतिम... ये कोई पोयम नहीं एक सवाल है, जिसे मेरा अंतर्मन तुमसे बार-बार पूछेगा..."
   "तो सुनाओ... सॉरी पूछो.…"
   "हां पीहू अक्सर मेरा हृदय, मेरा मन, मेरा अंतर्मन तुमसे पूछेगा...
जब नाम तेरा वह लेता होगा,
फिर तुझको कैसा लगता होगा। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
कभी...
मेरे इकबार बुलाने पर तुझको, 
सौ-सौ बार पलटते देखा है।

   मैंने कहा, उसने सुना, लेकिन चुप रही...
   मैने पूछा, "किस सोच में पड़ गई...?"
  अचानक उसने संजीदगी की से पूछा, "तुमने अपनी पोयम की ये लाइंस क्या सोच कर कही...?"
   मैंने सावलिया निगाह से उसकी तरफ देखते हुए पूछा, "तुम्हे न मालूम...?"
   "न मालूम... तो बताओ अब...?", उसने कुछ गुस्से से पूछा।
   अब मैं चुप था। कुछ देर चुप रहने के बाद मैने हिम्मत कर कहा, "....ये सुनो ! नाराज़ मत हो..."
   "नाराज़ !! तुमसे !!! तुम कहना जानते हो और कह देते हो, किसी के मन को लुभाना जानते हो तो लुभा लेते हो... किसी के दिल में उतरना जानते हो तो उतर जाते हो... किसी से दिल की बात कहनी हो तो कभी कविता में या फिर शायरी में कह जाते हो... सभी कलाएं आती है तुम्हें... लेकिन उनका क्या जिन्हें नहीं आती...?  सोचा है..? कभी तो उनकी आवाज बनो...?"
    "शायद तुम ठीक कहती हो...सॉरी!",  मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
 उसने शिकायती लहजे में कहा, "अभी भी, शायद ?"
 मैं कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, 
    बिना स्वप्न के भी तुम नजर आते हो,
    जैसे चांद पे कोई सूरज नजर आता हो।
   उसने पूछा, "अब यह क्या है.…"
   "उनके दिल की बात जो कह न पा रहे.... शायद...", अंत में उसे चिढ़ाने के लिए शायद शब्द में जोर डालते हुए कहा था। मेरी तरफ देख वह थोड़ा मुस्कुराई थी और जवाब में कहा,
   जो दिल की नजरों से देखा आज तुझे,
   तू किसी आईने-सा मुझे नजर आता है।
   "व... वाह !! पीहू, क्या बात है... देखा, बन गई न तुम भी राइटर... मैं कुछ दिन और रुका तो तुमसे माइलस्टोन लिखवा के ही छोड़ूंगा... अरे हां यार !! वो कविताएं हैं कहां..."
    "मेरे पास हैं... बिल्कुल सुरक्षित... अभी उसे दुबारा पढ़ ही नहीं पाई... तुम्ही में उलझी रह गई न... मैं उसे बिल्कुल अकेले में पढूंगी... फिर यदि लगा कि कोई सुधार करना है तो अपने सजेशन के साथ सत्य से ज्ञान भैया के पास भेज दूंगी... सॉरी यार..."
   मैने हंसते हुए कहा, "ये... कोई बात नहीं... जब मैं दोबारा आऊंगा... तब दे देना... कुछ अपनी तरफ से भी लिखना... लेकिन यह बताओ मेरे रोग कब से पाल लिए... नहीं समझी ? मेरा मतलब सॉरी कहने का..."
   उसने भी हंसते हुए कहा, "रोग नहीं आदत कहो... अब तो तुम मेरी आदत में शुमार हो चुके हो... समझे...?"
   "जी समझे...", मैने भी उसी तरह कहा।
    कौन कहेगा कि गांव की इन टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुजरते हुए दो इंसान चल रहे हैं। यहां तो चल रही है अनंत संवेदनाएं, अनकही भावनाएं। निष्कपट, छल और प्रपंच से दूर। ऐसी भवनाएं जो अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने पर निःसंकोच क्षमा याचना भी करती है, और उन्हें सह-हृदय क्षमादान भी मिलता है। 
    गांव की इसी सरजमीं पर दो अजनबी मिले। बहुत सारी असमानता लिए हुए ! एक लड़का तो दूसरी लड़की। एक प्यार में लुटा तो दूसरा प्यार की रूमानियत में डूबा। एक आने वाले कल से बेफिक्र तो दूसरा भविष्य के सुखद स्वप्न संजोता हुआ। एक जिंदगी को बर्बाद करने पर अमादा, दूसरा अपनी जिंदगी को संवारने की कोशिशों में लगा हुआ। एक नशे में डूबने के लिए तैयार तो दूसरा उसे बचाने के लिए नशे के उसी दरिया में छलांग लगाने को तैयार। एक अपने सभी वचनों से आजाद, मुखर अभिव्यक्ति लिए, तो दूसरा रिश्तों के बंधन और वादों में बंधा हुआ।
    इन सब के बावजूद एक समानता जिसने उन दोनों को एकदूसरे से आपस में इस तरह उलझा दिया कि अब चाह कर भी एकदूसरे से सुलझ नहीं सकते। सभी असमानताएं फीकी पड़ गई। साहित्य के प्रति रुचि और उनके बीच भावनाओं का सतत निर्मल प्रवाह जो उन्हें रुलाता भी है, और हंसता भी है। दोनों की अभिरुचि और उससे उत्पन्न एकदूसरे के प्रति चाहत साम्य के ऐसे बिंदु पर आकर टिकी है, जहां गुरुता का कोई मोल नहीं। दोनों के बीच न तो कोई रिश्ता है और ना ही होने की कोई संभावना। सिर्फ है तो दो संवेदनाओं का बंधन और एक दूसरे के प्रति आदर और अटूट विश्वास। 
     दुनिया में दो शब्द हैं, कमिटमेंट यानी प्रतिबद्धता और लायल्टी यानी वफा। कभी न कभी जिंदगी इंसान को ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देती है, जहां इनका कोई मोल नहीं रह जाता। अंतर्मन में स्थापित हो चुके एक सच के सामने ये शब्द हार जाते हैं, लेकिन फिर भी ये ताउम्र निभाए जाते हैं। इस डर से नहीं की दुनिया क्या कहेगी, बल्कि इस डर से कि कहीं हम स्वयं की नजरों से न गिर जाएं। चाहे इसके लिए हमें अपने आंसू ही क्यों न पीने पड़े। चाहे किसी को कितना ही याद क्यों न करना पड़े। चाहे उसके लिए हम अंदर ही अंदर तड़पते रहे, रोते रहे। फिर भी हम उन्हें निभाते चले जाएंगे। सीधे और सरल शब्दों में कहें तो कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि हम स्वयं की ज़िंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं, और इसकी कीमत कोई और नहीं एकदिन हम स्वयं चुकाते हैं। 
    पीहू कोई नादान लड़की नहीं है। यदि वह केवल समझदार, जहीन और मॉडर्न परिवेश में पली-बढ़ी लड़की होती तो अभी का अभी सत्य से सॉरी कह स्वयं के प्रति सारी वफाएं निभा लेती, फिर चाहे उस पर कोई कैसा भी इल्जाम लगाता, वह सब कुछ बर्दाश्त कर एक पल में फैसला ले लेती । आखिर यह उसकी अपनी ज़िंदगी है, और इसे कैसे और किसके साथ जीना है, यह उसका अधिकार है। लेकिन उसके अंदर अपने परिवार से प्राप्त जो संस्कार है, उसे स्वयं के प्रति बेवफा हो जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
    वह अपने हृदय की बाते, मेरे सामने तो कह सकती है, स्वीकार भी कर सकती है, लेकिन बाबा और सत्य के सामने नहीं। क्यों ? जवाब कुछ भी हो, तो क्या इसलिए मैं उसे चरित्रहीन मान लूं ? निःसंदेह नहीं और कदापि नहीं। यही तो है रिश्तों के लिए त्याग और देवत्व का अभिशाप, और मैं खुद इस अभिशाप से बरी नहीं। और इसलिए मैंने सिर्फ उससे एक ही वादा किया है, उसकी शादी के बाद एकबार आने का। तब तक उसकी दुनिया बदल चुकी होगी। आज की ये स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी होगी और वह सत्य से साथ, सात वचनों में और मजबूती के साथ बंधी हुई मेरे सामने होगी। 
  चलते हुई पीहू ने मुझसे पूछा,  "सिगरेट पियोगे ...?"
  मुझे आश्चर्य हुआ, "तुम और सिंगरेट !! लेकिन पैकेट तो बैग के साथ चला गया होगा ?"
     "आम के पेड़ के नीचे छूट गई थी, मैने रख ली। ... लेकिन चलते हुए नहीं पीनी ...", फिर उसने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा, "वहां बैठकर पीते हैं... आओ"
  हम उसी पोएट्री ट्री की छांव में बैठ गए। पीहू ने अपने प्रकृति प्रदत्त लॉकर से माचिस और सिगरेट का पैकेट निकला। मैंने थोड़ा-सा मजाक किया, "सिगरेट का पैकेट तो ठीक है, लेकिन माचिस वहां नहीं रखनी चाहिए ... तीलियों जल गई होती तो ?"
   उसने माचिस की तीली से सिगरेट किसी अगरबत्ती की तरह जलते हुए कहा, "तो क्या होता, एक दिन इस शरीर को जलना ही तो है ?"
    मैने उसे समझाते हुए कहा, "इस तरह नहीं जलेगी, अपने होठों में दबाओ, और कश खींचते हुए जलाओ..."
   मेरे बताए अनुसार उसने जैसे ही सिगरेट का कश खींचा और धुआं उसके गले तक पहुंचा उसे खांसी आ गई। मुझे तो 8-10 दिन में सिगरेट पीनी आ गई थी, लेकिन मैं समझ गया कि इसे सिगरेट पीने का कोई तजुर्बा नहीं है। उसने सिगरेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो..."
    मैंने सिगरेट लेते हुए पूछा, "एक बात बताओ पीहू ! तुमने पहले कभी शराब नहीं पी, सिगरेट भी नहीं पी, तो ये सब मेरे साथ क्यों...?"
   उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बताया तो था, याद करो बड़े पापा से क्या कहा था तुमने .. हु ? इनके माध्यम से मैं तुम तक पहुंचना चाहती थी..."
   "मुझ तक या मेरे दर्द तक...?"
   "एक ही बात है...", उसने सहजता से कहा।
    "तो तुम चाहती हो कि मैं यह सब छोड़ दूं ..?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "क्या तुम नादान बच्चे हो कि मैं तुम्हें समझाऊं ? वैसे भी छोड़ने या न छोड़ने का फैसला तुम्हारा होना चाहिए ... किसी से वादा करोगे तो फिर उसके न रहने पर वह टूट भी सकता है। लेकिन जब खुद से कोई वादा करोगे तो कभी नहीं टूटेगा। वैसे मैं चाहती हूं कि तुम छोड़ दो ... "
     "तुम्हें बता चुका हूँ कि मैं कोई वादा नहीं करता, लेकिन तुमसे किया... कसम तो नहीं, लेकिन हां मैं इन सब चीजों का कभी आदी नहीं बनूंगा..."
    "एक बात बताओ, जब तुम अच्छी तरह से जानते थे कि मैं सत्य के साथ कमिटेड हूँ... तो अपनी फिलिंग्स मेरे साथ शेयर करने की क्या जरूरत थी ? तुम चुपचाप नहीं जा सकते थे ? बोलो ? सत्य ने कहा और तुमने लव लेटर भी लिख दिया...!!"
    "तो तुम्हे क्या लगता है कि मैने तुम्हे बहकाया है ? तुम्हारे साथ कोई फरेब किया है ? या फिर तुमसे झूठ कहा है...?"
   "काश कि मुझे एहसास होता कि तुम झूठ कह रहे हो या मजाक कर रहे हो...", उसने मेरे हाथ से सिगरेट वापस लेते हुए कहा।
   "तो फिर पूछने की वजह... ?"
    उसने बात बदलते हुए पूछा, "मान लो कि तुम सत्य के स्थान पर होते और वह तुम्हारे स्थान पर... तो मेरे प्रति तुम्हारी सोच क्या होती ?"
      "बस यही सोच कर परेशान हो...?", मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, "यदि ऐसा होता तो मेरी प्राथमिकता तुम्हारी खुशी होती, मैं चाहता कि तुम मेरे साथ जिंदगी जियो न की गुजारो। हम जिसे प्यार करते हैं, अल्टीमेट उसकी खुशी ही तो चाहते हैं। 
      उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "यदि कोई लड़की तुमसे प्यार करे, कुछ दूर तुम्हारे साथ चले और फिर एक दिन तुमसे कहे कि मुझे तुमसे अधिक कोई और पसंद है, तो क्या यह सही है... ?"
     "बिल्कुल सही नहीं है। लालच और स्वार्थ से प्रेरित होकर किसी का साथ छोड़ देना सही नहीं है, बशर्ते आपको उससे प्यार होना चाहिए।  बेहतर से बेहतरीन की तलाश कभी खत्म नहीं होती है पीहू। यदि तुमने मेरे और सत्य के संदर्भ में यह बात पूछी है तो पहले तुम खुद से एक सवाल पूछो कि क्या तुम्हें सत्य से वास्तव में प्रेम है ? विवाह न करने के लिए बार-बार उसे मना करने का वास्तविक कारण बाबा का तुमसे कंसल्ट न करना है ? क्योंकि हम किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि अपनी स्वयं की पसंद से प्यार करते हैं। उसके जीवन में अपने अस्तित्व की तलाश करते हैं। सत्य की हाइट, पर्सनैलिटी, अपीरियंस, सुंदरता मुझसे श्रेष्ठ है, और एजुकेशन तो लगभग बराबर ही है। अधिकांश मामले में वह मुझसे कहीं बेहतर है। इसीलिए बाबा के चाहने पर उसे एक रिश्ते में एक संभावना के साथ स्वीकार भी किया। क्या वो संभावना की तलाश पूरी हुई ? तुम दोनों के जीवन में एकदूसरे का कोई अस्तित्व हैं ? अब मैं तुमसे पूछता हूँ तुम दिल से बताना कि इन सभी सवालों के जवाब क्या है ?
   कुछ देर सोचते रहने के बाद उसने मुझसे पूछा, "  इंसान की सभी फीलिंग हार्मोनिक केमिकल रिएक्शन का परिणाम है, और निर्णय दिमाग लेता है, न कि दिल। उसका काम तो ब्लड सरकुलेशन का है। फिर भी लोग कहते हैं, दिल से सोचना चाहिए। संभव है ?"
  मैने उसे समझाते हुए कहा, "मेरी समझ से यह एक प्रतीक है। दिल की बात का अर्थ यह हैं कि जो बात पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ कही जाए, स्वीकार की जाए। अपनी निर्मल और पवित्र भावनाओं को जो लालच और स्वार्थ से परे हो, से व्यक्त की जाए। यदि हमसे कोई कहता है कि मैं तुम्हें हृदय की गहराइयों से प्यार करता हूँ, तो इसका एक ही अर्थ होना चाहिए कि उसका प्रेम स्वार्थ और लालच से परे है..."
   वह खामोश थी, मैंने उसे ध्यान से देखा महसूस हुआ जैसे कि उसके अंतर्मन में कोई द्वंद्व चल रहा है। मुझे उसे इस द्वंद्व से बाहर निकालना होगा। मैने ही बात आगे बढ़ाई, "यदि ईमानदारी से मैं अपनी बात करूं तो मेरा प्रेम जो तुम्हारे प्रति हैं, वह पूर्णत: लालच और स्वार्थ से परे नहीं है। तुम खूबसूरत और जहीन लड़की हो, जिससे मेरी अभिरुचि, सोच और जिंदगी जीने के नजरिए में समानता है। मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम और आकर्षण स्वाभाविक और सहज है। लेकिन एक संभावित रिश्ते में होने के बावजूद जो प्रेम तुम्हारे मन में मेरे लिए है, वह स्वार्थ और किसी भी लालच से परे है। सत्य मेरा कोई दुश्मन नहीं है कि मैं उसका अहित चाहूं। यदि तुम मन से उसे अपना पति मानती हो या मान सकती हो तो फिर तुम्हे  इस इस रिश्ते को निभाना चाहिए, फिर चाहे इसके लिए तुम्हें अपनी प्रेम का ही त्याग क्यों न करना पड़े करो। लेकिन यही सबसे कठिन काम होता है। किसी से दूरी बना लेने से, उसकी तरफ से मुंह फेर लेने से यादें नहीं मिट जाती हैं। उसके लिए प्यार नहीं मर जाता है। बस ठहर जाता है, और फिर हम उस मोड़ से आगे बढ़ जाते है, लेकिन हमारे अंतरात्मा में प्रेम की भावना समाप्त नहीं होती है। अंतर्मन को एक ऐसे प्रेम की तलाश सदैव रहेगी जो दुनियादारी से परे हो।
    याद है पीहू, हमारी पहली मुलाकात ? शराब, सिंगरेट और मेरा रूढ़ बिहेवियर। सिर्फ एक ढंग की चीज मेरे हाथ में थी, और वह थी पोयट्री बुक, जो तुम्हें पसंद आई... क्यों ?
   मैने आगे कहा, "लेकिन जब तुम्हे मेरे बारे में और अधिक मालूम पड़ा तो तुमने मेरे दर्द को समझा। जिस लड़के ने कुछ महीने पहले ही अपनी प्रेमिका की शादी देखी हो जिसे वह बहुत चाहता था। शोक में मैं था, करुणा और दया तुम्हारे ह्रदय में जागी और इससे तुम्हारे मन में जिस प्रेम की उत्पत्ति हुई वह निश्चित ही किसी भी लालच और स्वार्थ से परे था और आज भी है।
   करुणा से भरे हृदय में यदि किसी के लिए प्रेम जागृत होता है तो वह बहारों के मौसम की रूमानियत में डूबे हुए प्रेम से अधिक स्थाई और स्वार्थ-रहित होता है। हम उसके दुःख और संताप को हरने की कोशिश करते है, अपना सर्वस्व त्याग कर उसकी खुशी चाहते हैं, यही तो है प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है। इस तरह हम प्रेम के उस मुकाम पर होते हैं, जहां आज तुम खड़ी हो पीहू ! मेरे लिए अनगिनत त्याग करने के द्वंद से लड़ती हुई...
     रिश्ता और प्यार दोनों में फर्क होता है। किसी भी रिश्ते में प्यार और विश्वास का होना बहुत जरूरी है। जिस रिश्ते में यह नहीं रह जाता तो फिर ऐसे रिश्ते केवल निभाए जाते हैं। पीहू ! यदि ऐसा न होता तो सात जन्मों के कुछ रिश्तों की परिणिति डाइवोर्स पेपर में न होती। मेरी समझ में जन्म-जन्मांतर की कोई अवधारणा नहीं। 
   इसलिए तुम कहीं से दोषी और बेवफा नहीं हो, और शायद सत्य इस बात को समझता हैं। यदि कोई दोषी है तो शायद वह मैं हूँ, और इस बात को मैं तहे दिल से स्वीकार भी करता हूँ। तुमने अभी सच कहा कि मुझे अपनी फिलिंग्स तुम्हारे साथ शेयर करने की जरूरत ही क्या थी ? मै चुपचाप क्यूं न चला गया ? 
    चला जाता पीहू ! यदि मैं भी कोई नादान लड़का होता तो जरूर चला जाता। तुम्हारी आंखों में, तुम्हारे आचरण में यदि मैंने खुद के लिए प्यार न देखा होता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, और सच मानो तो किसी क्रम से परे पूरी इंटेंसिटी के साथ है। मैंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति तुम्हारे सच्चे, निःस्वार्थ और लालच रहित प्रेम को महसूस करने के बाद ही की।
     मैं जानता हूँ कि मेरी तुम्हारे साथ जिंदगी जीने की लालसा कभी पूर्ण नहीं होगी, और न ही इसकी कोई संभावना है। फिर भी तुम्हारे लिए मेरी यह अभिव्यक्ति तुम्हारे साथ जीवन भर एक सुखद याद बन के रहेगी। जिस लड़के के प्रति तुम्हारे हृदय में करुणा जागी, मन में चाहत जागी, जिसे प्रतिपल तुमने खुश देखना चाहा, उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ तुमसे प्यार किया, तुम्हे चाहा... और इन्हीं यादों के साथ तुम भी सदैव मेरे हृदय में रहोगी... और रही बात पहले प्यार की तो ये सच है कि जिसके लिए हमारे मन में पहली बार इस भावना का जन्म होता है... हम जिसके लिए भी महसूस करते है... उसे कभी नहीं भुल पाते, लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि फिर हमें किसी से प्यार ही न हो..."
    और एक बात कहता हूँ, मै अपने माता-पिता की इकलौती संतान नहीं हूँ, कि मेरे शादी न करने से उनका वंश समाप्त हो जाएगा, या फिर मेरे ऊपर कोई बहुत बड़ी जिम्मेदारियां है। मैं सबसे छोटा हूँ। मैं सारी उम्र तुम्हारे साथ इसी तरह रह सकता हूँ। बिना किसी बंधन के... बगैर किसी रिश्ते के... लेकिन जो दुनिया मैंने देखी है, वह इस बात कि मुझे इजाजत नहीं देती। यदि मैं तुम्हारे साथ रहा तो हो सकता है एक दिन हमारे बीच की चाहत तुम्हारे और सत्य के पति-पत्नी के रिश्ते को फीका न कर दे और वजह मुझे समझा जाएगा। तीसरे इंसान के रूप में मुझे परिभाषित किया जाएगा। और सच मानो पीहू, यदि प्यार को किसी क्रम में रखना जरूरी है... तो मैं दूसरा इंसान तो बन सकता हूँ... लेकिन किसी और के होते तीसरा इंसान बनना मुझे मंजूर नहीं..."
  "मतलब ... मैं समझी नहीं ?", उसने आश्चर्य से पूछा।
   "तो सुनो पीहू ! यदि थोड़ी देर के लिए मान लो वह लड़की आज भी मेरी ज़िन्दगी में होती, तो शायद इतनी आसानी से तुम मुझसे अपने प्यार को स्वीकार न कर पाती... कहीं न कहीं तुम्हारे मन में आ जाता कि तुम उस लड़की के साथ गलत कर रही हो..."
   "ये रुको...", उसने मुझे बीच में रोकते हुए संजीदगी  से पूछा, "तो तुमने क्यों किया... क्या तुम्हें गलत नहीं लगा..."
    "नहीं... एक सच तुमने मुझे बताया तो एक सच मैं भी तुम्हे बताता हूँ। अंतर्मन का सच, जहां कोई भी इंसान मुश्किल से पहुंच पाता है। कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं। जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। भटकते रहते हैं..."
   पीहू चकित। मेरी तरफ देखते हुए बोली, "क्या कह रहे हो तुम ! "
     "हां सच कह रहा हूं, उदाहरण अपना ही लेता हूँ। मैने कहा था न कि निश्छल प्यार को साबित करने के लिए मैने उसके कहने पर भी कभी उसकी सच्ची कसम तक न खाई। डरता था कि कही उसे कुछ हो न जाए। लेकिन क्या हुआ ? उसके अपने ही लोगों ने उसे जीते जी मार डाला। उसके पेरेंट्स ने उसके लिए मुझसे बेहतर विकल्प की तलाश की, न कि उसके प्यार की!! जो काम उसके पेरेंट्स ने किया सभी-कभी वही काम हम खुद के लिए स्वयं करते हैं..."
     प्रत्येक रिश्ते का एक दायित्व होता है जिसकी पूर्ति कर्तव्य से की जाती है। और इस आदान-प्रदान में एक दूसरे के प्रति आपस में लगाव या जुड़ाव पैदा होता है, जिसे प्रेम नहीं उसकी परछाईं कह सकते हैं, जो उजाला न रहने पर साथ छोड़ जाती है, और तब बचता है केवल प्रेम का वास्तविक स्वरूप... और वही अंतर्मन में स्थापित हो जाता है, और वह कोई विचार ही हो सकता है। फिर उस विचार के गेयर में जो भी फिट बैठेगा, उसी से आपको प्रेम होगा... और यही कारण है कि प्रेम को सदैव एक एहसास एक भावना के रूप में चित्रित किया गया है..
  "तो क्या मैं यह मान लूं कि रिश्तो में आपसी समझ और प्रेम का होना जरूरी है, ये जितना होगा उतने ही अच्छे से हम उस रिश्ते को निभा सकते हैं, लेकिन प्रेम के लिए रिश्ते का होना जरूरी नहीं..."
    मैंने खामोशी से उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, "हां, बिलकुल यही कहना चाहता हूँ... तुमने किसी के साथ कोई धोखा या फरेब नहीं किया है। मुझे और सत्य को आपस में मिक्सअप करने की तुम्हे जरूरत नहीं होनी चाहिए..."
   "क्यों...", उसने आश्चर्य से पूछा था।
    मैंने शांत मन से कहा, "यही सवाल कभी खुद तुम स्वयं से पूछना..?"
   वह कुछ नाराजगी से बोली, "देखो प्लीज... जाते-जाते मुझसे लड़ो मत... खुल कर कहो...?"
   "तो फिर एक और सच सुनों... अपने उन सवालों के जवाब सुनों जब तुमने दूसरे दिन इसी बगिया में शाम को पूछे थे। तुम्हे सत्य से प्यार कभी था ही नहीं, और न आज है... या यूं कह लो... कोशिशों के बावजूद भी तुम कर न पाई... ये बात मैने उसी दिन जान ली थी जिस दिन तुमने अटारी में मुझे खाना खिलाया था... अपने और सत्य के बारे में बताया था... और मैने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी आंखों में उसे देख सकता हूँ... अपना रिएक्शन याद करो...? मेरी आंखों में देखते हुए कहा था, बताओ मेरी आंखों में क्या दिखता है... सच कहता हूँ... न तो उस दिन सत्य दिखा... और न ही मैं... भले ही मज़ाक में कहा था कि मैं दिखता हूँ... लेकिन उस दिन तुम्हारी आँखें सूनी-सूनी लगीं... एक प्रतीक्षा... एक इंतजार... किसी एक लम्हों का जो तुम्हें समझ सके...?"
    "अच्छा !! तो क्या तुम..."
    "हां मैं तुम्हारे जीवन का वही एक लम्हा हूँ... जिसे मेरे यहां आने के पूर्व ही नियति ने स्वप्न के रूप में तुम्हे आभास करा दिया था। और अब तुम्हे उसी एक लम्हे से प्यार हो गया... लेकिन तुम आज भी बाबा के द्वारा स्वीकार किए गए रिश्ते में खुद को सत्य के साथ जोड़ के देखते रहना चाहती हो... जहां तुम खुद को कभी नहीं पाओगी पीहू... देखो मैने जो समझा, जो महसूस किया, कह दिया।  तुम्हे हर्ट नहीं करना चाहा... यदि कुछ गलत कह दिया हो तो बुरा मत मानना....सॉरी..."
   उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "नहीं, इसकी जरूरत नहीं..."
    कुछ देर चुप रहने के बाद उसने मुझसे पूछा, "तो क्या तुमने यह समझ लेने के बाद ही मुझसे कहा कि पीहू तुमसे प्यार है और बेशुमार है..."
    "नहीं पीहू ! यदि तुम वास्तव में सत्य की पत्नी होती, उससे तुम्हे प्यार भी होता, तब भी कहता... क्योंकि तुम्हारा व्यक्तित्व, तुम्हारा अस्तित्व सत्य से अलग है... हम सभी का होता है। हां यह हो सकता है कि फिर तुम्हें गले से लगाने में संकोच होता... तुम्हे भी होता ? लेकिन कह तो सकता था न ?... और  सच मानो, मैं जरूर कहता..."
   "और यदि मैं एक्सेप्ट न करती तो...?"
   "मैं तुमसे कभी पूछता ही नहीं... बल्कि अपने प्रेम को स्वीकार करता...?"
    "अच्छा ये बताओ, ये कहानी-कविता, शेर-ओ-शयरी, इन सब का शौक कब से हुआ ?", उसने पूछा।
   मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "पहले कोई शौक नहीं था, न लिखने का न पढ़ने का। मैथ्स और साइंस मेरे फेवरेट सब्जेक्ट थे... जैसे तुम्हारी आलमारी में बुक्स हैं न, उसी तरह कुछ बुक्स उसके पास थीं। जब कभी मुलाकात होती, वह मेरे घर आती या कभी मैं उसके घर जाता तो उसके हाथ में कोई न कोई नॉवेल होती। कभी-कभी मुझे भी पढ़ने को दे देती। मैं तो यह सोच के ले लिया करता कि चलो कोई तो उसकी चीज मेरे पास होगी। टीनएज के वो भी क्या दिन थे पीहू, मैं अपनी तन्हाइयों में घंटों उस बुक को अपने सीने से लगाए लेटा रहता। महसूस होता जैसे वह मेरे साथ हैं और मेरे सीने में सर रख मेरे पास लेटी है..."
    उसने जिज्ञासा से पूछा, "फिर ...?"
   "फिर क्या ... धीरे धीरे पन्ने पलटने लगा ...
    उसने मुस्कुराते हुए मेरी बात को मेरे ही अंदाज में पूरा करते हुए कहा, "... फिर धीरे-धीरे पढ़ने भी लगा। महसूस होता जैसे उसकी आंखों को पढ़ रहा हूँ ... है न ?", उसने चुटकी ली।
   मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, "वाह ! क्या बात हैं... क्या इमेजिनेशन है... राइटर तो तुम्हें होना चाहिए यार...? लेकिन हां, यह जरूर महसूस होता था कि जिन शब्दों को मैं पढ़ रहा हूँ, उसने भी पढ़े होंगे।  जिन पन्नों को मैं पलट रहा हूँ, उन पन्नों को उसने भी छुआ होगा, पलटा होगा। एक अजीब-सी कशिश एक अजीब-सा नशा छा जाता... यू नो व्हाट आई मीन ?"
     "या वेरी वेल... वॉव !! व्हाट अ रोमांटिक लव स्टोरी ? अब जब राइटर बन ही गए हो तो अपनी कहानी लिखो न ? मैं तो कहती हूँ, एक मोटी सी नॉवेल लिखो... मैं भी पढूंगी... "
    "अरे नहीं यार... वो तो तुम्हे लिखनी है... वैसे यदि कभी लिखूंगा तो पहले अजनबी लिखूंगा..."
    "क्यूं...?"
    "तुमने वादा जो लिया है... ?"
    "वो तो तुम्हे लिखनी पड़ेगी लेकिन पहले अपनी कहानी लिखना उसके बाद अजनबी... पहला हक उसका बनता है..."
   "अच्छा !!! बड़े हक की बात कर रही हो...?"
    उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्यूं नहीं करनी चाहिए क्या ? मेरा कोई हक नहीं...?"
     "क्यों नहीं है, पूरा हक है। लेकिन बात हक की नहीं है, बात दिल टूटने की है। किसी के जज्बातों को ठेस पहुंचाने की है। चलो अपना टूटा तो टूटा। अब मेरे कारण अपनों के अपनों का क्यों टूटे ..?"
    "किन अपनों के अपनों की बात कर रहे हो ..?", उसने कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा। 
    "देखो यार ! मान लो कि मैंने लिख दी और कहीं वो नॉवेल उसके हसबैंड ने पढ़ ली तो ? और यही बात अजनबी के लिए भी है ? चलो सत्य को तो मैं जानता हूँ। वह भी मुझे जानता है। मानलो कुछ सच और कुछ आध्यात्मिक बातें कर उसे काफी हद तक मैं एक्सप्लेन भी कर ले जाऊं, लेकिन कहीं न कहीं उसके दिल को भी ठेस लगेगी पीहू। अब बात रही मेरी कहानी की, तो उसके हसबैंड को तो मैं बिल्कुल भी नहीं जानता न। पता नहीं किस स्वभाव का हो। मुझ पर विश्वास करेगा कि नहीं करेगा... फिर अपनी पत्नी के प्रति उसके मन में क्या धारणा बने ?
   "जब तुम समझाओगे तो क्यों नहीं समझेगा ..?"
   "नहीं पीहू, रिश्तों में कहीं न कहीं दरार आ ही जाती है। मन न जाने कहां-कहां भटकने लगता है। प्यार रहा होगा तो किस हद तक रहा होगा, कितनी दूर तक रहा होगा। खास कर फिजिकल रिलेशन को ले कर... रहा होगा कि न रहा होगा। और वैसे भी वह मुझसे डायरेक्ट बात थोड़े करेगा, उससे करेगा न ? इसीलिए कहता हूँ एक तरीका है, तुम ऐसा करो, मैं तुम्हें सब कुछ बता देता हूँ, शुरू से लेकर अंत तक। कुछ पोएम्स तो हैं ही, कुछ और लिख लेंगे। नाम, स्थान और पता बदल कर मेरी कहानी तुम लिख दो। एक लेडी राइटर का नाम होने पर किसी को कोई शक भी नहीं होगा... ठीक है...?"
    "ठीक है... लेकिन रही बात सब कुछ बताने की तो धीरे-धीरे तो सब कुछ बता चुके हो ...", फिर उसने दोहरे अर्थ में मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा, "सच बताओ... कोई और सीक्रेट भी है क्या... हुं ? अब मुझसे कह सकते हो यार, मैं किसी से थोड़े न कहने जाऊंगी...?"
  मैंने शरमाते हुए कहा, "तुम भी... ऐसा कोई सीक्रेट नहीं..."
   "हां ... अब तो तुम ऐसा ही कहोगे... रहा भी होगा तो कौन सा तुम बताने वाले हो ?... कम से कम मुझे तो नहीं... ?"
   "अरे यार, तुम हद करती हो... पागल हो क्या... सच कह रहा हूं...", मैंने कुछ गुस्से से कहा।
    वह खिलखिला कर हंस पड़ी, "अच्छा-अच्छा नाराज मत हो, मान लिया। मैं तो बस तुम्हे छेड़ रही थी। झूठ कहना होता तो तुम मेरी नजरों में नजरे डाल कर बोलते, यूं न शरमाते। जानने लगी हूँ तुम्हे। लेकिन सच कहते हो, चाहे हसबैंड हो या वाइफ, एतराज केवल फिजिकल रिलेशन को ले कर होता है। मन के घोड़े सिर्फ उसी दिशा में दौड़ते हैं...?"
   "शायद इसलिए कि मन के अंदर क्या है कोई झांक कर देख नहीं पाता, या यूं कह लो कोई देखना भी नहीं चाहता, दोनों बातें हैं न। अब हमें चलना चाहिए", मैने उठते हुए कहा, "घर में सभी इंतजार कर रहे होंगे..."
   उसने एक आह भरते हुए कहा,  "हां चलेंगे अभी थोड़ा रुको। बड़ी अजब दुनियां है न। कोई आपके मन को छू ले तो कोई बात नहीं, वो चल जाएगा। लेकिन शरीर छू लिया तो आप दोषी... कलंकित..."
   "हम दुनिया को क्यूं इल्जाम दें ? आखिर हम भी तो इसी दुनिया के हैं न !! कोई चांद सितारों से थोड़े न आए हैं..."
   उसने आसमान की तरफ देख कुछ उदासी से कहा, "क्या पता यार !! ... शायद वहीं से आए हों... कौन जाने...?"
  "ऐसा विचार क्यूं आया...?", मैंने मुस्कुराते हुए पूछा था।
  वह खोए-खोए स्वर में बोली, "वो इसलिए कि चार दिनों में कौन किसे इतने अच्छे से समझ सकता है... जो सिंपैथी और काइंडनेस के अंतर को भी समझा जाए ? भाई की तत्वीरा देख कर या फिर अपनी फैमिली को याद कर शोक में डूबी एक लड़की को उसी के हम उम्र का एक अजनबी लड़का सहज भाव से गले लगा खुद रो पड़ा ? और उसे लड़की ने उसके स्पर्श और उसके इस आचरण का कोई विरोध नहीं किया बल्कि उसे अच्छा लगा। तो फिर कहो वह कितना अजनबी हुआ ?"
    हवा के झोंके से उसके चेहरे पर बिखर आए डार्क गोल्डन स्वीडिश कर्ली और सिल्की जुल्फों को हटाते हुए मैने उसकी गहरी बदामी आंखों में देखते हुए मैंने कहा, "शायद इसलिए कि तुम स्पर्श की भाषा को अच्छे से समझती हो..."
    उसके गालों की गुलाबी आभा बढ़ गई। उसने भी मेरी आंखों में निर्मेष देखते हुए कहा, "तुम मेरी आंखों में ऐसे न देखा करो, और जाते-जाते तो न ही दखो..."
   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "क्या करूं मुझे अच्छी लगती है तो देखता हूँ, यूं ही न कहा था कि इन आंखों में कूद जाने का मन करता है, वह भी बिना किसी सेफ्टी किट के..."
   उसने उसी तरह मुझे देखते हुए कहा, "सत्य को मेरी नोज अच्छी लगती है, और तुम्हे मेरी आईस... तो क्या मेरे बॉडी के अदर पार्ट्स फालतू हैं..."
  मेरी मुस्कुराहट हंसी में बदल गई, "नहीं हैं..."
   "तो तुम हंसे क्यों?"
   "इसके लिए मेरे पास एक फिलॉसफी है, मेरा अपना दृष्टिकोण... आंखों के सिवा अदर पार्ट्स जैसे नोज लिप्स, चीक, ब्रेस्ट और भी इन्हें देखकर सेक्स की भावना जागृत होती है। लेकिन आंखे ? उसमें डूब कर देखो तो मन को एक अजीब-सा सुकून मिलता है। हृदय की धड़कन बढ़ जाती है और उस स्पंदन से वास्तविक प्रेम और करुणा का जन्म होता है..."
   "क्या वास्तव में सच्चे प्रेम का जन्म करुणा से होता है... मुझे तुम्हारी यह फिलासफी नहीं समझ में आती है ?"
   मैने उसे समझाते हुए कहा, "मैंने कहा ना कि मैं सच्चे प्रेम और झूठे प्रेम जैसे शब्दों पर यकीन नहीं करता। प्रेम या तो होता है या तो नहीं होता है। और जो झूठा है वह प्रेम हो नहीं सकता। उदाहरण तुम्हारे सामने कई बार आया फिर भी मन में यह संशय है ? तो फिर याद करो वो एक्ट जो तुमने मेरे साथ किया था। सीन कट होने के बाद भी तुम मुझसे लिपट कर रोती ही जा रही थी... उस पल तो तुम्हें यह भी याद नहीं रहा कि वहां सत्य भी है... क्यूं पीहू ? इसीलिए न कि वो सीन मेरी रियल-लाइफ से संबंधित था। मेरे साथ यह सब घटित हुआ और इस तरह से हुआ... यही सब सोच कर तुम रो रही थी न...? 
   "हां, उस एक्ट में जो पोयम थी उसी को सोच के लिखी थी न..? 
   "कौन सी... वो स्वप्न सुंदरी वाली ?"
   "हां... तुम एक बार फिर सुनाओ न ?"
    "मुझे याद नहीं... सच लिखने के बाद दोबारा पढ़ी नहीं, अभी बस लिख दी..."
   "मैं सुनाऊं... मुझे याद है...?"
   "हा सुनाओ...?"
  अपनी आंखों में कुछ आंसुओं को समेटे उसने मेरी तरफ देखते हुए वहीं कविता सुनाई...

  स्वप्न सुंदरी बन क्यों, 
  अब छलती है यह माया। 
  जैसे प्रेम, प्रेम न हो,  
  हो जैसे चंदा की छाया। 
  पाकर अतुलित जीवन निधि,
  आह! फिर मैंने तुमको क्यों खोया..." 

  कविता के समाप्त होने पर उसने कहा, "काश ये कविता मैने लिखी होती..."
   मैंने धीरे से मुस्कुराते हुए पूछा, "मैने तो उसे याद करते हुई लिखी, तुम किसके लिए लिखती ?"
   वह खामोश रही। अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर ली।
   कुछ देर बाद मैंने ही उससे कहा, "पीहू तुमने समझाया मुझे कि संवेदनाओं को महसूस कर किसी के हृदय के दर्द को दूर करना क्या होता है... और अब नज़ारे फेर रही हो...?"
    कुछ देर बाद उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखें भरी हुई थी। वह रोती उससे पहले मैंने उसे अपने गले से लगा लिया।
  कुछ देर बाद वह खोए-खोए से अंदाज में बोली, "आज तुमने कहा था न कि काश पीहू सत्य के आने से पहले मैं तुम्हारी जिंदगी में आया होता...?"
   "हां याद है..."
   उसने अपनी बाहों में मुझे भरते हुए शांत स्वर में कहा, "अपने मन में चल रहे सभी अंतर्द्वंद को समाप्त करते हुए, बिल्कुल शांत हृदय से अब मैं जो कहती हूँ तुम सुनो। स्वीकार करती हूँ कि काश ऐसा हुआ होता। बल्कि उससे भी पहले की बात कहती हूँ... काश ! तुम्हारे गाँव में मेरी नानी का घर होता... काश ! टीनएज में तुम्हारे गाँव मैं गई होती... काश ! गाँव की उन गलियों में तुमसे मेरी मुलाकात हुई होती... काश ! सितारों से भरे आसमान के नीचे तुम्हे कहानियां मैंने सुनाई होती... काश ! सावन के बरसते हुए पहले दिन नेवी ब्लू कलर का सूट पहनकर तुम्हारे घर मैं गई होती... काश ! उस दिन टॉवल से तुमने मेरे बाल सुखाये होते... काश उस दिन गले से तुमने मुझे लगाया होता... काश ! उस दिन जिन होठों को तुमने चूमा वो होठ मेरे होते... काश ! काश ये सब हुआ होता...
   हमारे बीच के इस संबंध को हमने नहीं बनाया। यह तो नियति द्वारा स्थापित किया गया संबंध है जो कहीं दूर सितारों की दुनिया से आया है। इसलिए हम दोनों को कहीं ना कहीं आभास होता रहा कि हम पहले भी मिल चुके हैं। मैंने तो स्वप्न में दिखी एक परछाई से प्रेम किया जब मैं करुणा से रोते हुए उसे पुकार रही थी। तुम उसे सितारों की दुनिया से उतर आए और साकार रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए। कविता में सवाल उससे पूछा, लेकिन जवाब मेरे पास है... 
  तुमसे मिलकर चाहा है तुमको, 
  थक शून्य पथ पर चलते-चलते। 
  खुद को खो कर पाया है तुमको, 
  पुलकित जीवनरस भरते-भरते। 
  चिर शांत अवचेतन मन में, 
  तुम सजीव हृदय वाटिका मेरी। 
  पल्लवित हृदय वाटिका के पुष्पों को, 
  अब मैं तुम को ही अर्पण करतो हूँ।।
       मैने उसके बारे में तुमसे जो कुछ भी कहा यदि उसे या तुम्हे बुरा लगा हो तो जीवन में जब कभी उससे मिलो तो मेरी तरफ से सॉरी कहना..."
    उसके द्वारा कही गई हर बात में सच्चाई थी। वीणा के तार की दर्द भरी एक ऐसी झंकार जो सीधे मेरे दिल में उतरती गई और उसकी दर्द में डूबी हर एक सिसकी, हर एक आह, मुझे रुला गई। कुछ देर बाद जब वह शांत हई तो मैने उसके माथे को चूमते हुए उससे कहा, "एक दिन हम न रहेंगे लेकिन ये प्यार के रास्ते रहेंगे... हमारी यादों के माइलस्टोन रहेंगे। ये गांव.. ये गलियां यही रहेंगी। कुछ कहानियां कभी खत्म नहीं होती पीहू... आज भी किसी गाँव में दो अजनबी मिल रहे होंगे।
     आज भी कहीं एक टीनएजर लड़की अपने टीनएजर बॉयफ्रेंड को सितारों से भरे आसमान के नीचे कहानी सुना रही होगी... हम न रहे, लेकिन न होकर भी हम उन लम्हों में रहेंगे। फिर गाँव की किसी पगडंडी पर हम इसी तरह साथ-साथ चल रहे होंगे... कहीं फिर कोई अपनी पीहू को अपने हृदय से लगाए यूं ही बैठा होगा... हम तो एक्टिंग करने वाले लोग हैं न... रहे न रहे, लेकिन ये किरदार हमेशा रहेंगे। चलो अब चलते हैं, घर पर सभी इंतजार कर रहे होंगे... उठो..."
   लेकिन वह उसी तरह मेरे कंधे में सर रखे हुए बोली, "काश कभी मैने तुम्हे शीरी फरहाद की लव स्टोरी सुनाई होती... नहीं सुना पाई। लेकिन चलती हुई राहों में तुमसे एक बात कहती हूँ... तुम कभी भी किसी शीरी के फरहाद मत बनना... सुना न ? मेरी ये बात हमेशा याद रखना... अब चलो...'
   मैने उसका हाथ पकड़ उठते हुए कहा, "पहले न सुनाई तो क्या हुआ.. अब सुना दो न... देखो ये तो मुझे मालूम है... कि शीरी के कहने पर फरहाद ने दूध की नहर निकाल दी... लेकिन इससे अधिक मैं कुछ भी नहीं जानता... प्लीज सुनाओ न ..."
   उसने चलते हुए कहा, "नहीं अभी नहीं। बड़ी स्टोरी है न, फिर कभी। अभी तो तुमसे अपनी कहनी है... तुम्हारी सुननी है..."
    मैने उलाहना भरे स्वर में कहा, "भगवान न करे तुम कैसी गर्लफ्रेंड किसी को मिले... लेडी नॉर्टन की पोयम न सुनाई और ये कहानी भी नहीं... छोटे बच्चे की तरह बहला देती हो... तो क्या ये सारे वादे किसी और जन्म में पूरा करोगी...?"
   उसने धीरे से खुद को मुझसे अलग किया, अपनी आंखों को पोंछा फिर होठों में फीकी मुस्कान लिए बोली, "नहीं, जो वादे किए हैं इसी जन्म में पूरा करूंगी। और रही बात छोटे बच्चे होने की तो वो तुम हो, मैं रोती हूँ तो तुम भी रो देते हो... मैं हंसती हूँ तो तुम भी हंस देते हो... तो फिर बताओ मुझे... यह तो एक नासमझ छोटा बच्चा ही करता है न...? इसीलिए कहा है कि कभी भी किसी शीरी के फरहाद मत बनना... अब बड़े हो जाओ।"
  "ठीक है याद रखूंगा... अब तुम अपनी कहो...", मैने उठते हुए कहा।
     कुछ पल खामोशी से चलने के बाद उसने पूछा, "सच में ये टी शर्ट तुम मुझे दे दोगे...?"
   "कोई शक है ?... ये तुम पर मुझसे अधिक खिलती है,  लेकिन पूछा क्यूं ?"
   "कहीं उस दिन के एक्टिंग का रिम्युनिरेशन तो नहीं...?"
   "अरे नहीं, उसके लिए तो तुम्हे ऑस्कर मिलना चाहिए... कहीं से लगा ही नहीं कि वह महज एक्टिंग थी... सो नेचुरल न...?"
   उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "तो क्या तुमने एक्टिंग की थी...?"
     मैं भी उसी अंदाज में उसकी तरफ देखते हुए कहा, "मैंने तुमसे पहले भी कहा है कि मैं इतना अच्छा एक्टर नहीं हूं जो अपने कैरेक्टर के लिए रो सके। जब भी हंसा या रोया तो खुद के लिए... मैं तुम्हारे साथ कभी कोई एक्टिंग की ही नहीं पीहू, जो भी था या है सब वास्तविक है..."
   "एक बात और पूंछू.…?", उसने बात बदलते हुए कहा।
   "कोई खास बात है...?"
   "नहीं कोई खास बात नहीं... ये तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए खरीदी है न, ... यदि उन्होंने पूछा... कहां छोड़ आए तो...?"
     "तो कहूंगा छोड़ नहीं आया... गिफ्ट कर दिया है... मुझसे अधिक उस पर अच्छी लगती है, इसलिए दे दी..."
    "यदि उन्होंने पूछा किसे दे कर आए हो... कौन है, तो ?"
   "तो कह दूंगा कि पीहू को दे आया..."
   "ये पीहू कौन है...?"
   "अब तुम ही बता दो...?"
    उसने सोचते हुए, कुछ इठलाते हुए और कुछ तिरछी नजरों से मुझे देखते हुए कहा, "उनसे कहना... कहना कि... जिसे तुम पसंद करते हो..."
   "कहने को तो कह दूंगा... लेकिन एक प्रॉब्लम है... वो अगले ही दिन यहीं धरना दे देंगी... "
    "वो भला क्यूं...?"
    "बताया न, ब्रोकन हार्ट हूँ... उन्हें बहू की सख्त जरूरत है...", मैंने हंसते हुए कहा। 
   वह भी हंसी, "अच्छा !... तो उन्हें जरूरत है.!!.. तुम्हे नहीं...? और क्या जरूरी है कि मैं उन्हें पसंद आ ही जाऊं ?"
   "क्यों नहीं ? तुम में क्या बुराई है ? इंडियन नयन-नक्श, अंग्रेजों की तरह गोरा रंग और स्वीडिश डार्क गोल्डन कलर के बाल तो हैं ही। ज्ञान में भी श्रेष्ठ... कुल गोत्र भी श्रेष्ठ। सब मिलाकर इस पृथ्वी लोक की अदभुत सुंदरी, किसे पसंद न आएगी...?"
    वह खुश होने का नाटक करते हुए बोली, "वाव ! मैं इतनी सुंदर हूँ ? अच्छा तो ये बताओ... तुम्हें मुझमें सबसे अधिक क्या पसंद है ?... मेरा मतलब मेरी सुंदरता या मेरी ज्ञान ?"
    मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "अब देखो मुझे उलझाओ मत... एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति न पैदा करो। मैं तुम लड़कियों के स्वभाव को अच्छी तरह से जनता हूँ... फसाती हो..."
  "अरे वाह जी ! तो अब यही बात दो... कितनी लड़कियों को जानते हो... और अब तक कितनी लड़कियों ने तुम्हे फसाया है ?"
   "अभी तक तो नहीं। हां... पर इतना जरूर जान गया हूं कि अब तुम मुझे फसाने की कोशिश कर रही हो। तो सुनो उतारो टीशर्ट... मुझे वापस करो... इतने सारे सवाल इसी की वजह से हो रहे हैं न ...", मैंने खीझने का अभिनय करते हुए कहा।
   उसने मुझसे दूर हटते हुए कहा, "भूल कर भी हाथ न लगाना, अब न दूंगी... अब तो इसमें मेरी जान बसती है..."
    उसकी बात सुन मैंने अपने हाथ पीछे खींच लिए फिर संजीदगी से बोला, "एक बात कहनी थी..."
    उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्या..?"
    "अपने रूड बिहेवियर के लिए सॉरी... और उन सभी बातों के लिए भी जो शायद मुझे तुमसे नहीं कहनी चाहिए थी... लेकिन कह दी..."
    उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा, "तुम सॉरी बहुत बोलते हो... कहा न मत बोला करो। इस तरह से बार-बार सॉरी बोलने पर कही गई बातों का महत्व कम हो जाता है। वे बातें भी जो शायद मुझे पसंद भी आई हो..."
   "अच्छा !!... तो लो अब नहीं कहता... वैसे इतने अच्छे थॉट्स आते कहां से हैं...", मैंने हंसते हुए पूछा। 
   उसने ब्रेन की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यहां से... लो घर आ गया... याद है न पीछे से प्रवेश करना है...", फिर वह हंसी थी। उसकी ये हंसी मुझे झूठी लगी... पता नहीं क्यों... पर लगीं।
  कुछ देर बाद ही हम दोनों जब घर पहुंचे तो पीछे का दरवाजा खुला था... सत्य को अपना इंतजार करते हुए पाया। पता चल कि बाबा आराम कर रहे हैं। हाथ पैर धोने के बाद पीहू और सत्य ने खाना परोसा। बाबा की नींद में कोई बाधा न पहुंचे इसलिए हम लोगों ने कच्चे घर में खाना खाया। 
   ज्ञान ने तय किया कि कुछ देर आराम करने के बाद निकलेंगे। दरवाजा खुला था, ज्ञान वहीं जमीन पर चटाई बिछा के लेट गया। पीहू और सत्य बेडरूम में चले गए और मैं अटारी में आ गया। मेरा बैग टेबल में रखा था। सांसों की डोर पोयट्री बुक उसी तरह अपनी जगह पर रखी हुई थी। मैंने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर अधूरी कविता को पूरा लिखा। साथ ही दो लाइन और लिख वापस उसी बुक में दबा दिया... 
   यूं तो पहले भी देखा हैं हमने जुदाई का मंजर,
   पर तुझसे जुदा होने का एहसास कुछ और ही है।

     मैने देखा दोनों नोट भी उसी तरह रखे हुए थे। मै चारपाई पर लेट गया।  खिड़की खुली हुई थी बाहर से ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। एक रात लगभग साढ़े दस और ग्यारह के बीच मैं इसी अटारी को छोड़कर भागा था, लेकिन आज इसे छोड़ने पर इतनी तकलीफ क्यों महसूस हो रही है ? एक अनजाने दर्द से मैं क्यों गुजर रहा हूँ ? आंख बंद किए हुए मैं सोच रहा था कि लोग सच कहते हैं कि जिंदगी चार दिन की होती है और शायद वो चार दिन की जिंदगी मैंने जी ली है। जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था मेरे दिल की धड़कनें और मन की बेचैनियाँ बढ़ती जा रही थी। मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था, क्या सचमुच अब मैं यहां से चला जाऊंगा ? 
     कुछ देर यूं ही लेटे रहने के बाद मैं उठा। बैग से बॉटल और कांच की एक ग्लास निकली और उसे खिड़की में रख उसी के पास खड़ा बाहर देखने लगा। यह घर, इस घर की ये अटारी, यहां की आवो-हवा से जुड़ी हर एक यादें अब मुझे बेचैन कर रही थी। मैने अपनी सोच की दिशा मोड़ने के लिए एक जाम बनाया और उसी तरह बाहर देखते हुए धीरे-धीरे पीता रहा। अब मैं अपने ही अंतर्द्वंद से लड़ रहा था, जाऊं या कि ना जाऊं ? 
    यह दुनिया है मेरे दोस्त, यहां मांगने से कुछ नहीं मिलता। आंसू कमजोरी की निशानी होते हैं। यदि कुछ पाना है तो पत्थर की तरह कठोर बन उसे हासिल करने के लिए निर्णय लेना पड़ता है। सही-गलत, पाप-पुण्य से परे हटकर सोचना पड़ता है। पीहू चाहती है कि मैं रुक जाऊं, सत्य भी चाहता है कि मैं रुक जाऊं... तो फिर दिक्कत किस बात की ?  ज्ञान को समझा लेने में कोई कठिनाई नहीं होगी। 
   मुझ जैसा मूर्ख कौन होगा जो पीहू के हृदय की बात जानकर भी अब उससे दूर चला जाए ?  नहीं चाहिए मुझे कोई आध्यात्मिक प्यार, अब मैं पीहू के साथ एक वास्तविक जिंदगी जीना चाहता हूँ...
    सत्य मेरा कोई दुश्मन नहीं और न ही मैं उससे किसी भी रंजिश का बदला लेना चाहता हूँ। मैं तो बस पीहू का होना चाहता हूँ। मैं उसके साथ जिंदगी जीना चाहता हूँ। वह सदैव मेरे पास रहे, मैं उसके पास रहूं, और जैसे सत्य को विश्वास है कि एक न एक दिन पीहू उससे विवाह करने के लिए तैयार हो जाएगी तो उस जैसी आशा मैं क्यों नहीं रख सकता ? मैं ऐसी जिंदगी तो जी चुका हूँ। लेकिन उसका अंजाम ?
    बस यहीं पर आकर मेरी सोच ठहर गई। इन सब के बावजूद यदि अंत में विवाह के लिए पीहू ने सत्य को ही चुन लिया तो...? और कौन-सा इतनी आसानी से सत्य पीहू की जिंदगी से दूर चला जाएगा ? 
    कुछ देर पहले बगीचे में जब मैने सब कुछ पीहू पर छोड़ दिया, उससे कह दिया कि अब तुम जैसा चाहो मैं वही करूंगा तो उसके बाद उसने एकबार भी रुकने के लिए नहीं कहा, क्यों ? मैं नहीं जानता कि पीहू और सत्य के बीच का प्रेम किस स्तर और गहराई तक है ? प्रेम है भी या नहीं या केवल उसके होने मात्र का भ्रम है ? पीहू के अब तक जीवन को ध्यान में रख कर उसके बारे में विचार करूं तो उसका जन्म एक संस्कारी, सुशिक्षित और सुविधा सम्पन्न परिवार में हुआ। उसे हर रिश्ते विरासत में मिले। मॉडर्न और ट्रेडिशनल सोसाइटी दोनों के बीच उसका जीवन गुजारा। 
     मुंबई जैसे महानगर में उसे आधुनिक एजुकेशन मिली। निश्चित ही स्कूल-कॉलेज में फ्रेंडशिप सर्किल भी आधुनिक और चमकदार रहा होगा। बड़े पापा और बड़ी मम्मी से पारिवारिक मूल्य और उनके महत्व को समझने का नजरिया मिला। पिता जो एक पब्लिशिंग कंपनी में सब एडिटर थे उनसे किताबों के प्रति अभिरुचि मिली। भारतीय अध्यात्म से प्रेरित हो कर उसकी स्वीडिश नानी ने उसके भारतीय नाना से विवाह किया था। उसकी मां की परवरिश भी कुछ हद तक उसी तरह हुई होगी जैसे की पीहू की। और शायद इसीलिए उसे अपनी मां से रूप सुंदरता के साथ-साथ आधुनिक और व्यापक दृष्टिकोण भी मिला। 
   और  बाबा से मिले संस्कार, जीवन को अपनी पसंद और उन्मुक्त भाव से जीने का नजरिया। बाबा की पूर्ण सहमति के साथ उसके पापा, बड़े पापा और बड़े भाई तीनों ने अपनी-अपनी पसंद से विवाह किया। जहां तक मैं समझ पा रहा था तो इस परिवार में विचारों के आदान-प्रदान खुले माहौल में जरूर होते रहे होंगे किंतु विचार एक दूसरे पर थोपे नहीं गए होंगे। निर्णय लेने की स्वतंत्रता और उससे मिले किसी भी प्रकार के परिणाम के प्रति पूरे परिवार का एकजुट हो कर खड़े रहना और उसका सामना करना इस परिवार की सबसे बड़ी विशेषता रही होगी। 
    और एक दिन सब कुछ समाप्त। उसके जीवन के महत्वपूर्ण रिश्ते पल भर में राख हुए। एक भाई, इतनी दूर जो होकर भी नहीं के बराबर है। बचे बाबा और ये घर जहां पर पीहू की पूरी दुनिया सिमट के रह गई। खुले आकाश में उड़ने की अभिलाषा और क्षमता लिया हुआ एक परिंदा पिंजरे में कैद हो कर रह गया। बेरहम परिस्थितियों ने उससे उसका खुला आसमान छीन लिया। यहां आने पर पहले दिन ही मंगल से पीहू के बारे में मुझे जो जानकारी मिली वह आज के पीहू के ठीक विपरीत थी। इन तीन वर्षों में उसका संपूर्ण जीवन इसी घर में कैद था। वह अपनी बगिया में भी बहुत कम आती-जाती थी। मेरे साथ पीहू का उन्मुक्त भाव से बगिया में समय बिताने पर मंगल को खुद  आश्चर्य हुआ था। 
    उसके इस अधूरे और कुछ हद तक एकाकी जीवन में सत्य का प्रवेश सूखी धरती पर पहली बरसात की तरह था। सत्य की सादगी और उसका आकर्षक व्यक्तित्व उसके मन को भा गया होगा। उसे सत्य के रूप में एक अच्छा मित्र मिल गया जिससे वह अपने सभी सुख-दुःख बांट सकती थी। सत्य ने भी पीहू की निश्छल भावनाओं का सम्मान किया होगा और उसके रोने पर खुद भी रोया होगा। उससे मिले सम्मान को पीहू ने कई गुना कर प्रेम के रूप में उसे लौटाया। वह किसी सूखती अमरबेल की तरह जीवन प्राप्त करने के लिए उससे लिपटती चली गई। उसने उससे भले ही विवाह नहीं किया लेकिन बाबा की इच्छानुसर उसे अपने जीवन में शायद कुछ शर्तों के आधीन पति का स्थान देने में भी कोई संकोच नहीं किया। 
   अब उसी सत्य के पास पीहू के लिए समय नहीं है। शायद उसने पीहू की इच्छा और क्षमता का सही आकलन ही नहीं किया। यदि किया होता तो उसे मालूम पड़ता है कि पीहू का अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों ही सिर्फ चार-दिवारी में कैद हो जाने का नहीं है। वह उन औरतों में से नहीं है जिनके पति उनसे कहे कि मैं कमा के ला रहा हूं और तुम आराम से घर में बैठकर खाओ, गृहस्ती संभालों और मेरा इंतजार करो।
    फिर एक दिन उसकी मुलाकात एक ऐसे लड़के से हुई जो खुले आसमान के नीचे दोपहर बारह बजे बेपरवाह, एक हाथ में सुलगती सिगरेट और दूसरे हाथ में पोएट्री बुक लिए बैठा है। खाट के सिरहाने में एक अधूरा जाम और व्हिस्की की खुली बॉटल रखी है। उसे आश्चर्य भी हुआ और आविश्वास भी। कैसे उसकी हमउम्र का ही एक लड़का इस तरह की जिंदगी जी सकता है। प्रथम दृष्टिया उसे उस लड़के की आजादी से जलन हुई। इसीलिए उसने सत्य से उस लड़के को इस घर से दूर रखने के लिए कहा। जबकि सच यह था कि उसने उस लड़के को इस घर से नहीं अपितु अपने जीवन से दूर रखने की नाकाम कोशिश की। दूसरे दिन जब उसे उसके बारे में कुछ और जानकारी मिली, उसके ज्ञान, दृष्टिकोण और क्षमता का आभास हुआ तो उसे उस लड़के में अपना ही प्रतिरूप नजर आया। 
     प्रत्येक जीव सर्वाधिक प्रेम स्वयं से करता है । आज आम के पेड़ के नीचे उस लड़के को गले लगा, उसके माथे को चूमकर जो भी कहा वह वास्तव में स्वयं से ही कहा। उसे पुनः खुद को खुद से मिलाने में वह लड़का तो सिर्फ एक माध्यम बना। अब उसका दूर जाना पीहू को पीहू से ही अलग कर देने जैसा होगा। उसका खुला आसमान, उड़ने की अभिलाषा इन सब का एक झटके में अंत कर देना होगा। उसकी क्षमता इच्छा, व्यक्तित्व और सोच को फिर से एक परिधि में कैद कर देने जैसा होगा।
   और वह लड़का जो बहुत ही कम उम्र में जीवन के कई पहलुओं को देखते हुए, महसूस करते हुए यहां तक पहुंचा है, उसे भी तो पीहू जैसी दृढ़ मनसिकता का एक मजबूत इंसान चाहिए। उसे भी एक ऐसे  साथी की तलाश है जो इस खुले आसमान में उसके साथ उड़ सके, उसके साथ हंस सके, मुस्कुरा सके और जरूरत पड़ने पर उसे गले से लगा सके। उसके लिए भी पीहू से दूर जाने का अर्थ है खुद से खुद को दूर ले जाना। तो अब ?
   यहां ठहरने का एक ही अर्थ है कि धीरे-धीरे पीहू की जिंदगी से सत्य को दूर करना, और यह कार्य किसी को करना नहीं पड़ेगा। यह तो खुद-ब-खुद स्वचालित रूप से होता चला जाएगा। जब इसे रोकने की कोशिश की जाएगी तो कमिटमेंट, लॉयल्टी, एलिगेशन, विक्टिम, एक्यूज्ड, कलपेट इत्यादि शब्दों की भारी भरकम और नई-नई परिभाषाएं दी जाएंगी। एक दूसरे पर आरोप सिद्ध करने के प्रयास किए जाएंगे। 
    उफ़ !  तो अब मैं क्या करूं, कहां जाऊं, क्या निर्णय लूं ? आज फिर मैं द्वंद के दोराहे पर खड़ा था जहां फैसला लेना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। हे ईश्वर ! तो क्या पीहू के साथ जिंदगी जीने के लिए मुझे स्वार्थी इंसान बनना पड़ेगा...? मेरे और उसके बीच का संबंध सिर्फ प्रेम का नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा ऊंचाइयों पर स्थापित हो चुका है, और वह है दर्द और आंसुओं का संबंध। जिसमें अब किसी छल, कपट, स्वार्थ, झूठ का कोई स्थान नहीं।
     मैने जाम एक झटके में खाली किया। क्या किस्मत पाई है मैने भी। किसी ने अपना बनाकर एक पल में अजनबी बना दिया ... और किसी ने एक अजनबी को इस कदर अपना बना लिया कि फिर से अजनबी बन जाने का अब कोई इरादा नहीं हो रहा था।
    प्रिय और मित्र के आलिंगन के भेद मालूम हैं मुझे। मित्र को गले लगाते समय एक लड़की के जिस्म की दूरी क्या होती है, अंदाजा है मझे। वहीं दूसरी तरफ जब वही लड़की अपने प्रिय का आलिंगन करती है तो जिस्म के नजदीकियों का भी अंदाजा है मुझे। 
    पीहू ने जिस तरह से मुझे अपने गले लगाया था वह पल मुझे याद है, और कहूं तो अच्छी तरह से याद है। जहां मेरे दिल की धडकनों ने उसके दिल की धड़कनों को स्पष्ट सुना था। 
      हृदय की बेचैनियां बढ़ती जा रही थी। मैंने दूसरा जाम बनाया। डूबो लेना चाहता था खुद को आज शराब में। सारी भावनाओं को दफन कर देना चाहता था शराब के इस प्याले में। 
   लेकिन इससे हासिल क्या होगा ? क्या दिल की बेचैनियां खत्म हो जाएंगी ? क्या पीहू से जुदा होकर मैं जिंदगी में आगे बढ़ पाऊंगा ? नामुमकिन की हद से भी नामुमकिन लग रहा था। केवल मोह के बंधन होते तो मैं तोड़ देता, लेकिन ये बंधन तो प्रीत के हैं। इन्हें कैसे तोड़ दूं ? और इससे भी बड़ा सवाल, आखिर क्यों तोड़ दूं ? क्या केवल इसलिए कि वह सत्य के साथ वचनबद्ध है ? तो रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है मुझे ?
    जिस आध्यात्मिक प्रेम की शुरुआत पांच वर्ष पहले हो चुकी थी उसे ही तो आगे बढ़ना है। मैं अपने आप को अंदर ही अदर समझ रहा था। अपने इरादे मजबूत कर रहा था। लेकिन इन आंखों का क्या करूं जो दिल के जज्बातों को आंसुओं में परोस देने के लिए बेताब थीं। मैं खिड़की की छड़ को मजबूती से पकड़े उस पर अपना सर झुका रो पड़ा। बस उसी क्षण मैंने फैसला लिया। मैं उसके साथ रहूंगा। मैं उसे केवल सत्य के भरोसे छोड़कर नहीं जा सकता। बस मुझे बाबा का साथ चाहिए। मैं आज वापस तो जाऊंगा, लेकिन जल्द ही लौट कर आऊंगा। यहीं पीहू के साथ स्वयं को स्थापित करूंगा। उसके साथ रहूंगा, बिना किसी रिश्ते के...
   और रही बात पीहू के रोकने की तो वह और कितनी बार रोके। आखिर प्रत्येक इंसान का स्वाभिमान भी तो होता है। वह तो पहले न जाने कितनी बार कह चुकी है। निर्णय लेने के लिए उसने मुझे स्वतंत्र छोड़ दिया। मुझे अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर उठ कर निर्णय लेना होगा। मुझे खामोशी के साथ सबसे पहले अपने मित्रता के धर्म को निभाना होगा। जिस तरह कल शोक में डूबी पीहू को टीन-शेड की तरफ देखते हुए मैने बिना कुछ बोले गले से लगा लिया और उसके शोक की भावना को आत्मसात कर लिया, ठीक उसी तरह आगे भी करना होगा। बिना कुछ जताए, बिना कुछ बोले, धीरे-धीरे उसे उसकी स्वयं की बनाई हुई इस कैद से बाहर निकलना होगा। केवल और केवल तभी मैं उसके नि:स्वार्थ और सच्चे प्रेम तक पहुंच पाऊंगा। 
     अब प्रश्न मेरे या पीहू के बीच प्रेम का रह ही नहीं गया। प्रश्न है आजादी का, एकबार फिर पीहू को उसे लौटा देने का। खुद को एकत्र कर फिर से नई शुरुआत करने का। भले ही मैं पीहू से कई बार कहा चुका हूँ कि जरूरी नहीं की जीवन में प्यार एक ही बार हो, लेकिन इस तथ्य से मैं अभी भी पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो पाया हूँ। पूर्वनिर्मित मान्यताओं और अवधारणा की कैद में रह कर कर हम किसी से प्रेम कर ही नहीं सकते। प्रेम तो मुक्ति चाहता है। उन्मुक्त भाव से खुला आसमान चाहता है। पहले हम दोनों को अपने ही द्वारा बनाई गई भ्रामिक कैद से मुक्त होना होगा। केवल तभी हम एक दूसरे के अंतर्मन में स्थापित प्रेम तक पहुंच पाएंगे। समय लगेगा, लेकिन यह कोई कठिन कार्य नहीं है, बशर्ते कि हम एक दूसरे के पास और साथ रहे। अब धीरे-धीरे मेरे अंदर एक ऐसे आध्यात्मिक प्रेम का जन्म हो रहा था जो प्रिय से विरक्ति नहीं युक्ति चाहता है। एक ऐसा योग जो उसे सशरीर प्राप्त कर लेने की किसी भी लालसा से मुक्त हो।
    अब यह मेरा अंतिम निर्णय था कि यहां से जाने के बाद मैं जल्द ही लौट कर आऊंगा। अब मेरे मन में कोई अन्तर्द्वन्द नहीं था। खुद को बहुत ही रिलैक्स महसूस कर रहा था। वास्तविक पीहू से मिलने की संभावना से ही मन रोमांचित हो उठा। दो रचनाकार एक कलम से इसी यथार्थ की धरातल में अपने स्वप्निल संसार की रचना करेंगे। इसी विचार से मेरी आंखों में खुशी के असंख्य सितारे झिलमिला उठे और प्रत्येक सितारे में एक ही प्रतिबिंब उभर के सामने आ रहा था।
     मैने तीसरा लार्ज पैग बनाया कि तभी महसूस हुआ जैसे पीछे कोई खड़ा हो मैंने समझा ज्ञान होगा, "तो चले..." लेकिन जैसे ही पीछे पलटा तो पीहू को खड़ा पाया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहां, "ये क्या !! तुम रो रहे हो... "
   "हां रो रहा हूं लेकिन ये आंसू ख़ुशी के हैं...", मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। 
   "खुशी के !!... मुझसे दूर जा रहे हो और आंखों में खुशी के आंसू है !! मैं समझी नहीं...?", उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
   "राइटर हूँ, जुदाई में भी मिलन की राह निकाल लेता हूँ...", मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
    कुछ पल मुझे देखते रहने के बाद उसने भी कहा, "अच्छा !! लेकिन अभी तो तुम्हे बाबा बुला रहे हैं..."
   "हुं... बाबा बुला रहे हैं... लेकिन क्यों ? नहीं मेरा मतलब जाते समय तो मिलने जाऊंगा ही न, इसलिए पूछ रहा हूँ...?", मैंने आश्चर्य से पूछा था।
   उसने सर झुकाए हुए जवाब दिया, "मुझे नहीं पता, लेकिन अभी बुलाया है..."
    मैंने आगे पूछा, "और उनके पास कौन है...?"
   जब मैं आई तो अकेले ही थे।
  "तो क्या तुम न चलोगी...", मैने पूछा था।
   "नहीं... शायद बाबा तुमसे अकेले में मिलना चाहते हैं... और देखो जरा अच्छे से मिलना... लो रुमाल मुंह पोछ लो... बाल बिखरे हैं कंघी कर लो... और परफ्यूम डाल लो... शराब की महक नहीं आनी चाहिए... और बार-बार कह रही हूं कि प्लीज अच्छे से बात करना..."
    उसका इतना कहना था कि मुझे कुछ खीझ के साथ-साथ क्रोध भी आ गया, "हां ठीक कहती हो... लेकिन कोई बहुत अच्छी शक्ल सूरत तो मेरी है नहीं, फिर मुंह पोछने से क्या होगा ? बालों में कंघी करने से कोई जेंटलमेन तो बन जाता नहीं ? और शराब तो पी है तो महक तो आएगी... चाहे कितना ही परफ्यूम क्यों न डाल लूं... और ये अच्छे से बात करने से तुम्हारा क्या मतलब ? क्या मैं पागल इंसान हूं ? या फिर कुत्ता हूँ कि उन्हें काट खाऊंगा...? और फिर क्यों जाऊं उनसे मिलने ? क्या लगते हैं वह मेरे ? एक मिनट... एक मिनट... कहीं तुम तो शर्मिंदा नहीं हो कि मैं तुम्हारा..."
   मेरी इतना कहने पर वह मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। एक हाथ से मेरा बाजू और दूसरे हाथ से मेरे चेहरे को अपने चेहरे के सामने लाते हुए कहां, "ये तुम्हे क्या हो गया... प्लीज!! चुप हो जाओ... देखो मुझे माफ कर दो...जो तुम समझ रहे हो ऐसा कुछ भी नहीं... मैं तो खुद भी हैरान हूँ कि बाबा ने तुम्हें बुलाया क्यों है... प्लीज देखो मेरी तरफ... मुझ पर गुस्सा मत करो..."
   मैंने उसकी आंखों में देखा, सच्चाई उसकी आंखों से झलक रही थी। मैंने भी धीरे से कहां, "सॉरी पीहू !!... पता नहीं मुझे क्या हो गया था..."
    उसने अपने रुमाल से मेरा चेहरा पोंछते हुए आगे कहा, "रुकना... कंघी कर दूं, बाल सचमुच बिखरे हुए हैं...", फिर उसने दीवाल की रैक से आईना और कंघी उठा ली। आईना मुझे थमाते हुए बोली, "लो जरा पकड़ो इसे... और थोड़ा-सा सर झुकाओ... हां अब ठीक है..."
    उसने मेरे बालों में कंघी करते हुए कहा, "बाबा से अच्छे से बात करने के लिए इसलिए कहा कि उन्हें नहीं लगना चाहिए कि तुम रुड हो..."
   मैंने थोड़ा-सा हंसते हुए कहा, "ओह!! तो ये बात है... जैसे कि कभी तुम्हे लगा था... है न ?... तो तुम फ़िक्र मत करो... अभी जैसे तुम्हे सजदा किया है न... बाबा के सामने भी सर झुका के बात करूंगा... विश्वास करो मैं उनसे कोई ऐसी बात नहीं कहूंगा जो उन्हें बुरी लगे... आफ्टर ऑल तुम्हारा बॉयफ्रेंड राइटर भी है... इतना अंडरस्टीमेट न करो...."
  फिर मैने खिड़की में रखे जाम को उठाया तभी उसने प्यार से कहा, "नहीं... अभी नहीं... प्लीज पहले बाबा से...",  इतना कहने के साथ ही उसने बैग से परफ्यूम निकालकर स्प्रे किया।
    "चलो ठीक है...", मैने जाम वापस खिड़की में रखते हुए कहा, "प्लीज कहने की जरूरत नहीं मेरी प्यारी पीहू... बल्कि मुझे अच्छा लगा कि तुमने मुझे रोका... लेकिन यार तैयार तो तुम मुझे ऐसे कर रही हो जैसे मैं बाबा से तुम्हारा... हूं... ऐसी कोई बात है क्या ?"
  उसने कुछ थके हुए शब्दों में कहा, "बताया न, मुझे तो खुद नहीं मालूम... पर हो भी सकता है..."
  वह चुपचाप मुझे देखे जा रही थी। मैने उसे चारपाई पर प्यार से बैठाते हुए कहा, "चलो कोई बात नहीं... तुम बैठो आराम से। मैं बाबा से मिलकर अभी आता हूँ... और यह क्या... मेरे तो बाल संवार दिए और खुद तुम्हारे बिखरे हैं... पकड़ो ये आईना और लाओ दो कंघी इधर..."
   "नहीं न... बाबा इंतजार कर रहे होंगे... अभी तुम जाओ... लौटने पर...", उसने मुझे समझाना चाहा।
   "ओए मैडम जी !! पल- पल में दुनिया बदलती है... लौटने पर मौका मिले या न मिले... लो पकड़ो आईना... बस दो मिनट लगेंगे...", मैने अधिकारपूर्वक कहा।
   इस बार उसने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया। एक हाथ से आईना थाम दूसरे हाथ से कंधी मेरी तरफ बढ़ा दी। मैं उसके पीछे ही चारपाई पर बैठ गया और उसके बाल संवारते हुए धीरे से पुकारा, "पीहू !"
  "हूँ..."
  "तुमने बालों में कभी कलर आई मीन... मेहदी... वगैहर..."
   उसने मुस्कुराते हुए बताया, "कलर तो कभी नहीं किया, हां कभी-कभी मेहदी लगा लेती हूँ, लेकिन कभी साबुन या शैंपू का यूज़ नहीं करती, उसकी जगह काली मिट्टी में एलोवेरा, आंवले का रस और दो चार बूंद नींबू का रस मिला कर पेस्ट बना लेती हूँ, फिर उसी से बाल धोती हूँ... लेकिन तुमने पूछा क्यूं ?"
   "बस ऐसे ही...  कलर के साथ मुझे इनकी खुशबू भी अच्छी लगी...", फिर मैं कुछ संजीदगी और प्यार से बोला, "इन बालों की तरह अपना भी ध्यान रखना... घर के कामों में अपने आप को बहुत मत उलझाना... उतना ही करना जितने में तुम्हे थकान न लगे... ज्यादा जरूरी हो तो मंगल और कमली को बुला लेना... और फिर सत्य तो है ही... कुछ उससे भी करवा लेना... अपनी मन पसंद बुक पढ़ना... हां, यदि मेरे जाने के बाद बाबा तुमसे मेरी शिकायत करे, नाराज़ हों, मेरे शराब पीने के कारण मुझे भला-बुरा कहे तो चुपचाप सुन लेना... पलट कर जवाब न देना... और कभी-कभी मुझे भी याद कर लेना..."
  उसके शरीर में हल्का सा कंपन हुआ, जैसे खुद को रोने से रोकने की कोशिश में हल्की सी हिचकी निकल गई हो। कांपते स्वर में उसने पूछा, "और...?"
  उसके पूछने पर ठीक वही हालत मेरी हुई, मेरे भी आवाज कांप गई, "और हां... तुमने ठीक याद दिलाया, सबसे जरूरी बात तो कहना भूल ही गया था... दिनभर के काम काज से फुर्सत हो के कुछ देर आराम करना... फिर जब उठाना तो अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनना... यूं ही अपने बाल संवारना... माथे में छोटी सी बिंदी लगाना... थोड़ी सी फेस क्रीम... हल्की सी लिपस्टिक... और अपने होठों में ढेर सारी मुस्कान ले के आइने में खुद को देखना... मैं भी तुम्हारी ही नजरों से तुम्हे देखूंगा... चाहे मैं जहां भी रहूं। जब कभी मन उदास हो, हृदय में कोई हूक उठे, तो अपनी डायरी में दिल की बातें लिखना या फिर कोई पोयम लिखना... जब मैं लौट के आऊंगा तो सभी पढूंगा... अब मैं जाऊं... बाबा से मिल के आऊं...?"
   लेकिन मैं जैसे ही चारपाई से उठने को हुआ उसने मेरा हाथ पकड़ वापस अपने पास बैठा लिया। फिर अपने हाथ में पकड़े हुए आईने को मेरे चेहरे के सामने करते हुए अपने चेहरे को मेरे चेहरे के नजदीक तब तक लाती गई जब तक दोनों के चेहरे एक साथ उस आईने में न दिखने लगे। कुछ देर तक दोनों देखते रहे, फिर उसकी नजर मेरे चेहरे में आ टिकी। मैने आइने में देखा कि उसका चेहरा मेरे चेहरे के कुछ और नजदीक आया... फिर उसके होठों ने मेरे दाहिने गाल को धीरे से छू लिया। कुछ देर तक वह अपना सर मेरे कंधे में रख उसी तरह गुमसुम बैठी रही फिर धीरे से बोली, "मुझसे शादी करोगे...?"
  मैं चकित था। पीहू की आवाज, उसके हृदय की धड़कन, उसकी नजरों से छलकता प्यार, मुझे कहीं से महसूस नहीं हुआ कि यह बात उसने मज़ाक या फ्लर्ट करने के लिए कही हो।
   मैंने शांत मन से कहा, "बिल्कुल...? अचानक इतना नेक ख्याल आया क्यूं...?"
   उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुमसे अपने पैर दबवाना चाहती हूँ... देखो अपनी बात से मुकरना मत... पहले कहा है तुमने कि यदि तुम्हारी पत्नी के पैर दुखे तो तुम्हे उसके पैर दबाने से भी कोई परहेज नहीं होगा... कहा है न...?"
    "इंकार कब किया, लेकिन ये तो अभी भी कर सकता हूँ... तुम आज्ञा तो दो..."
    "क्या मेरी आज्ञा जरूरी है...?"
    "नहीं, बिल्कुल नहीं, तुम लेट जाओ, ये लो तकिया..."
    "नहीं... रहने दो... मैं तो ऐसे ही...", उसने कुछ शरमाते हुए इंकार करना चाहा।
     मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "मन की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रखनी चाहिए... पूरी न हुई तो फिर पुनर्जन्म लेना पड़ता है, और फिर तुमने ही तो कहा है... जिंदगी चार दिन की होती है..." 
   मैने उसके दोनों पांव अपनी गोद में रख धीरे-धीरे दबाने लगा। उसे कुछ संकोच हो रहा था, जिसे दूर करने के लिए मैने कहा, "शादी के बाद तुम सत्य से भी कह सकती हो... वो भी मना नहीं करेगा..."
   "और मान लो उसने मना कर दिया तो...?"
   "तो तुम मेरी धमकी दे देना... कहना, तुम नहीं दबाओगे तो मैं अपने बॉयफ्रेंड को बुला लूंगी... तब देखना झट से तैयार हो जाएगा..."
  "लेकिन मैं उससे क्यों कहूंगी...? शादी तो तुमसे करनी है न...?"
   "अरे हां, मैं भूल कैसे गया ? अब मान लो कि यदि किसी कारण से नहीं हो पाई... वैसे बाबा ने तो पहले ही कन्यादान कर ही दिया है न..."
   "और जैसे तुम मेरे पैर दबाने के लिए कुंवारे बैठे रहोगे...है न ?",उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
   "क्यूं नहीं ?", मैंने संजीदगी से अपने आप को समेटा और मन ही मन शब्दों का चयन किया, फिर कुछ भारी आवाज़ में बोला, "हे राधे ! किसी युग में तुमने इंतजार किया... इस युग में मैं करूंगा... तुम्हे वचन दिया..."
    वह कुछ हंसते हुए बोली, "अब एक्टिंग छोड़ो और जाओ..."
   लेकिन मैंने उतनी ही संजीदगी से कहा, "न... ये एक्टिंग नहीं है.... वचन तो वचन होता है..."
   मैं उठा किंतु सीढ़ियां उतरने से पहले मैने थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा, "... तुम कहीं जाना मत,  रूकना यही, लौटकर तुमसे और भी जरूरी बात कहनी हैं... मैं जस्ट अभी आता हूँ..."
   लगभग पंद्रह-बीस मिनट बाद जब मैं लौट कर आया तो उसे खिड़की के पास खड़े हुए पाया। उसके चेहरे में बेचैनियां साफ झलक रही थीं। मुझे देखते ही उसने आतुरता से पूछा, "क्यों बुलाया था बाबा ने तुम्हें ? क्या सत्य भी था ? ",  फिर उसने जवाब भी स्वयं ही दिया, "नहीं रहा होगा ... उसे तो मैं बेडरूम में सोते हुए छोड़ कर आई थी... ज्ञान भैया भी नीचे ही सो रहे है... तो तुम बाबा से बिल्कुल अकेले मिले ? बताया नहीं क्या कहा बाबा ने...?"
   मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कोई खास बात नहीं, बस समझाया कि शराब पीना छोड़ दूं... और डांटा भी कि मैं इतना लापरवाह क्यों हूँ... मुझे अपनी जॉब और पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। यह भी कहा कि अपने पेरेंट्स का ध्यान रखो उनकी कुछ आशाएं हैं, जिन्हें तुम्हे ही पूरा करना होगा। बस यही समझ लो मुझे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व के प्रति सजग किया है... चलो अब बैग में समान अच्छे से रख लूं"
   "लेकिन तुम मुझसे कुछ जरूरी बात कहना चाहते थे न ?", उसने आतुरता से पूछा था, "तो कहो न...?"
    मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, "बात करना चाहता था... मैं ?"
    "हां... जाते हुए तो मुझसे कह कर गए...?", मेरी बात सुनकर उसे भी आश्चर्य हुआ था।
    मैंने याद करने की कोशिश का अभिनय करते हुए कहा, "तुमसे कह कर गया था ? क्या बात करना चाहा होगा ?... अरे छोड़ो यार, मुझे तो कुछ याद ही नहीं आ रहा है... वाकई यह शराब बहुत बुरी चीज होती है। अब देखो तो, धीरे-धीरे याददाश्त भी जाती जा रही है... सॉरी यार..."
   मैंने बैग में समान रखना शुरू किया। उसने कुछ देर तक मेरे जवाब की प्रतीक्षा की लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उसने एक गर्लफ्रेंड की तरह ही समझना शुरू किया "अच्छे से रहना, अपना ध्यान रखना, कभी उदास मत होना और हां देवदास बनने की तो सोचना मत...", फिर धीरे से उसने कहा, "जाते समय मेरे सामने मत आना, न ही मुझसे मिलने की कोशिश करना..."
     "क्यों... ये कैसी बात हुई ? ऐसा नहीं होगा...", मैने विरोध जताया,  "मेरी तरफ देखो पीहू ! और बताओ मुझे, क्या प्यार जीवन में एक ही बार होता है...?"
     "नहीं जानती...", उसकी आवाज के साथ उसका शरीर भी धीरे से कांप गया। वह मेरे पास से उठ पुनः खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
    मैं उसे देखते हुए आगे बोला, "मैं पूछना चाहता था कि दूसरी बार क्यों नहीं हो सकता ?"
   "नहीं जानती..." 
   "मैंने तुमसे कहा था न कि जाने से पहले मैं तुमसे एक बात पूछूंगा और वही बात मैं पूछ रहा हूँ... क्या जरूरी है कि जीवन में प्यार एक ही बार हो...?"
    उसने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, "हां याद है... और शायद तुम्हें भी याद होगा कि मैंने भी कहा था कि यदि मेरे पास कोई जवाब न होगा तो क्या तुम मुझसे रूठ कर चले जाओगे... बोलो...?"
    मैं खिड़की के नजदीक उसके पास पहुंचा। एक हाथ से उसने छड़ पकड़ रखी थी। मैने भी अपने दाहिने हाथ से उसके हाथ को पकड़ते हुए कहा, "पीहू ! प्लीज देखो मेरी नजरों में...", 
    उसने अपनी झुकी हुई पलके मेरी तरफ उठाई और मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "बिल्कुल नहीं पीहू... मैं तुमसे रूठ कर नहीं जाऊंगा, ... बल्कि जो सवाल मैंने तुमसे किया है, उसका जवाब देकर जाऊंगा..."
     मैंने खुद के इरादे मजबूत किए लेकिन स्वर कांप गए, "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है... और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा..."
    उसकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। कुछ पल मेरी नजरों में देखती रही फिर अपनी नजरें झुकाते हुए शांत मन से कहा, "अब जरा फिर से बोलों... "
   "क्या..."
   "जो अभी कहा है... मै तुम्हारे जीवन का एक हसीन फरेब हूँ...",  इस बार उसके वाणी में करुणा थी। मन में एक अजीब-सी शांति जो शायद किसी तूफान के आने से पहले की होती है। मै चुप था और उसने मेरी खामोशियों के अर्थ समझ लिए। 
     उसने मेरे हाथ से अपना हाथ धीरे से छुड़ाते हुए कहा, "ठीक है... मत कहो। तो अब जाओ... देखो ज्ञान भैया भी उठ गए हैं, सत्य भी उठ गया होगा... बाबा से एक बार फिर मिल लेना। मै अब नीचे न आऊंगी...  बैग सीढ़ी के आखिरी पायदान पर रखा हुआ मिल जाएगा..."
    लेकिन मैं जाने के लिए जैसे ही पलटा, वह मेरी पीठ से लिपट गई। धीरे से मेरे कंधे में अपना सर रख दिया। उसकी बिखरती सांसों की आवाज स्पष्ट रूप से मुझे सुनाई दे रही थी। वह कुछ देर तक मुझसे लिपट कर यूं ही खड़ी रही जैसे एक सूखती अमरबेल जीवन प्राप्त करने के लिए अपने निकटतम पेड़ का आलिंगन कर लेती है, बेखबर इस बात से कि वह पेड़ अब खुद ही सूख चुका है, भला वह उसे जिंदगी कैसे दे सकता है ?
     उसने सिसकते हुए कहा, "जा राहें हो तो जाओ, लेकिन हंसते-मुस्कुराते हुए जाओ... मै तुम्हे जिंदगी के हर उस मोड़ पर मिलूंगी जब तुम उदास होगे, अपने आप को अकेला महसूस करोगे। अपने एक नए रूप में... एक नए अंदाज में। मै तुम तक खुद ही पहुंच जाऊंगी... या फिर कहो मैं तुम्हें अपने पास ही बुला लूं..."
     कुछ देर रो लेने के बाद वह मेरे पीछे ही घुटने के बल बैठ गई। अगले ही पल उसने वह किया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। उसके दोनों हाथ मेरे पैरों में थे। मैने पलट कर उसे रोकने की कोशिश करनी चाही, "ये क्या पीहू..."
    "न ... पलटना नहीं और न ही मुझे रोकने की कोशिश करना... कहां था न कि मेरी यह बात याद रखना...", उसने लगभग रोते हुए कहा, "मैं कोई नादान लड़की नहीं जो तुम्हारे बदले हुए व्यवहार के कारण को समझ न सकूं... जो कभी उसके माता-पिता ने उससे मांगा होगा, आज वही मेरे बाबा ने तुमसे मांग लिया... तुम्हारे साथ फिर से छल हुआ... वही कहानी फिर से दोहराई गई... है न ? उन्हें माफ कर दो..."
     "न पीहू ऐसा नहीं कहते ! वो मेरे भी बाबा हैं...", मैं इतना ही कह सका। 
    उसने आगे कहा, "...हो सके तो मेरे लिए एक दुआ करो कि इस वक्त मैं तुमसे जो मांग रही हूँ... उसे ईश्वर पूरा करे..."
   "यह गलत है पीहू... यदि तुम्हे मुझसे कुछ चाहिए... तो सीधे मुझसे कहो न... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि तुम मुझे आज्ञा दो...", उसकी स्थित और भावुकता को महसूस कर मेरी भी हिचकी निकल गई। मेरी भी आंखों से अविरल अश्रुधारा निकली।
   "जरूर कहती... लेकिन कहते है न, कोई मन्नत मांगो तो उसे किसी से कहना नहीं चाहिए... अपनो से भी नहीं... यदि कह दिया फिर वो पूरी नहीं होती...", उसने अपनी दोनों हथेली अपने माथे से लगा, सर पर पीछे की तरफ ले जाते हुए कहा, "जाते समय रोने पर तो पाबंदी लगा ही दी... कम से कम आशीर्वाद तो देते जाओ..."
   मैने उसके सर पर अपना दाहिना हाथ रखा। मेरी आवाज कांप रही थी, "मेरा और तुम्हारा संबंध रिश्ते-नातों से दूर दर्द और आंसुओं का है पीहू... आज उसे ही साक्षी मान कर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे... तुम सदैव हंसती-मुस्कुराती रहो... तुम्हे जीवन की हर खुशी मिले... जाते वक्त तुम्हारे रोने में पाबंदी लगा दी थी न... तो जान लो, जब भी तुम्हारे दिल में कोई दर्द उठेगा, तुम्हारी आंखों में कोई आंसू आएंगे... तो उस वक्त मेरे हृदय में भी एक टींस उठेगी... मेरी भी आंखें सजल होंगी... मैं भी तुम्हारे साथ रोऊंगा पीहू..."
   कुछ देर बाद वह धीरे से उठी फिर अपना मुंह फेर खिड़की की छड़ पकड़ कर बाहर देखते हुए खड़ी हो गई। मैने खिड़की में रखी बॉटल को अपने बैग में रखने से पहले उससे पूछा, "इसे छोड़ दूं या फिर ले जाऊं...?"
     यह सब कहते हुए मेरी नजर उसके माथे से होते हुए उसकी आंखों में आ कर ठहर गई। मैने देखा, मेरे चेहरे का अक्स उसकी गहरी बादामी आंखों में कैद था। निश्चित ही हम एकदूसरे से कुछ और भी कहना चाहते थे लेकिन उस वक्त न तो जुबान साथ दे रही थी और न ही हमारे पास अब कोई शब्द थे। हम दोनों एकदूसरे की तरफ यूं ही निर्मेष देखते रहे। मेरी तस्वीर उसकी आंखों से धुंधली होते हुए पूरी तरह से धूल जाती इससे पहले ही उसने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,   "नहीं... इसकी अब कोई जरूरत नहीं। लेते जाओ... और हो सके तो तुम भी फेक देना..."
      मैने खिड़की में रखे तीसरे जाम को उठा एक शिप ली और उसे वापस उसी जगह रख दिया। मैने बॉटल को बैग में रखा और उसकी डार्क एलो कलर की स्वेटर निकाली। उसके दोनों कंधों में पीछे से डालते हुए धीरे से कहा, "अपना ध्यान रखना पीहू... अब मैं चलता हूँ...", वह उसी तरह शांत बाहर देखती हुई खड़ी रही। मेरा बैग अभी भी उसी तरह चारपाई पर रखा था।
      "पीहू ! ", सीढ़ी के नजदीक पहुंच कर मैंने उसे धीरे से फिर पुकारा।
      उसने कांपते हुए स्वर में कहा, "नहीं ! अब तुम जाओ..."
       "देखो ! सीढी के नीचे तक तो छोड़ दो... समझ लो जाते हुए मुसाफिर की, एक अजनबी की आखिरी ख्वाहिश है...", मैने आशा भरी दृष्टि से उसकी तरफ देखते हुए कहा।
    "नहीं... अब यहां से तुम्हे अकेले ही जाना होगा...  प्लीज जाओ... और न रुलाओ मुझे। हो सके तो बाबा से एक बार फिर मिल लेना। लेकिन हां, जाने से पहले जो मैं कहती हूँ ध्यान से सुनते जाओ...
    इस दिल के सारे अरमान... सारी ख्वाहिशे तभी तक के लिए होती है... जब तक सांसों की डोर होती है। जिस दिन यह डोर टूट जाती है न... तो सारी शिकायतें, उलझने, चाहते, मोहब्बतें सब कुछ यही बिखर के रह जाती हैं। हो सके तो जीवन में एक बार कुछ पल के लिए उस जगह के पास बैठ कर देखना... जहां कोई अपना प्रिय सुपुर्द-ए-खाक या राख हुआ हो। जो कभी तुम्हारे जीवन का हिस्सा था... जिसके साथ तुमने कुछ पल बिताए थे... जिसके साथ तुम हंसे थे... जिसके लिए तुम कभी रोए थे। हो सकता है, तुम्हारे ऐसा करने से उसे मुक्ति मिल जाए... और तब उस दिन मैं तुमसे पूछूंगी कि अब बताओ कितनी अजनबी हूँ मैं तुम्हारे लिए... और तुम मेरे लिए..."
   उसकी ये बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे लगा ही नहीं कि कभी इस पीहू से मेरी मुलाकात हुई है... एक अलग ही पीहू मेरे सामने खड़ी थी।
    "नाराज मत हो पीहू... ठीक है मैं जा रहा हूँ... मैं बाबा से मिलकर चला जाऊंगा... मेरा बैग नीचे रख देना... इट्स ओके...",  फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगा।
     पीछे से महीन किन्तु सिसकियों में डूबी हुई एक आवाज आई, "नो...नो.. इट्स नॉट ओके... मत जाओ प्लीज... रुको..."
  मेरे कदम सीढ़ी के उसी पायदान पर रुक गए एक स्टेप-अप, एक स्टेप-डाउन। मैं उसकी तरफ कुछ मुस्कुराते हुए देखाना चाहता था, दीवार पर पीठ टिक अपना दाहिना हाथ उसकी तरफ बढ़ाना चाहता था। लेकिन मैं उसकी तरफ न तो देख पा रहा था, न मुस्कुरा पा रहा था और न ही हाथ उठा पा रहा था... जैसे किसी अनजानी शक्ति ने मुझे जकड़ लिया हो। अभी एक क्षण पहले ही मै चाहता था कि वह मेरी तरफ देखे, मुझे नीचे तक छोड़ने आए और अब ? मैं बिलकुल नहीं चाहता था कि वह मेरी तरफ देखे, मेरे बढ़े हुए हाथ को थामने के लिए वह सीढ़ियों को उतर मेरे पास आए... नहीं... बिल्कुल नहीं। उसकी अवनति मुझे मंजूर नहीं..."
    मैंने अपनी पीठ और सर दिवाल से टीका, कस कर अपनी आँखें बंद कर ली। मेरी आंखों में आंसुओं का सैलाब एक बार फिर उमड़ा। मैं ठीक उसी तरह रो रहा था जैसे कभी पांच साल पहले रोया था। न कोई क्रंदन, न कोई हिचकी, न कोई सिसकी। बस आंखों से आंसू बहते जा रहे थे। मैं बड़ी मुश्किल से उससे सिर्फ इतना ही कह सका, "पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो..."
    फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगा। कुछ शब्द मेरे जेहन में गूंज रहे थे। उनकी आवृत्ति और तीव्रता इतनी अधिक थी कि अब उसकी तरफ मुड़ के देखना जरूरी हो गया था। सीढ़ी के आखिरी पायदान में मेरे कदम रुक गए। मैंने पलट कर देखा वह सीढ़ी के ऊपर पहले पायदान में खड़ी थी। मैंने अपने आंसू पोछे और शांत मन से कहा, "तुम जिस मुकाम पर हो प्यार की जिन ऊंचाइयों पर खड़ी हो, तुम मुझे वहीं अच्छी लगती हो...
    आज से पांच वर्ष पूर्व हुई शुरू हुई एक कहानी के किरदार ने इस राइटर की हथेली को अपने दिल पर रखकर कभी उससे कहा था, हो सकता है मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर !! जिंदगी में कभी तुम्हें मेरी मोहब्बत एक फरेब महसूस हो, और तुम समझो कि मैंने तुम्हारे साथ कोई दिल्लगी की थी; तो तुम इस पल को, इस लम्हे को जरूर याद करना। तो आज तुमसे कहता हूँ, मैं तुम्हे कभी भी बेवफा नहीं समझूंगा, तुम्हारे साथ जिए गए हर लमहे मेरी यादों में रहेगे।
   उस किरदार ने इस राइटर को एक पत्र में यह भी लिखा था, हो सकता है मेरे प्रियवर !  मैं किसी दिन इतनी मजबूर हो जाऊं की तुम्हें त्याग देने में ही मुझे तुम्हारा या फिर अपनों का हित नजर आए, तो कहती हूँ, तुम उस दिन खुद को टूटने मत देना। तो सुनो पीहू ! वादा है मै बिल्कुल नहीं टूटूंगा। 
    उस वक्त मुझे कभी मौका ही नहीं मिला कि उसके सवालों के जवाब दूं। लेकिन आज जब देखा तुम उस किरदार की तरह ही मोहब्बत की उन्हीं ऊंचाइयों पर खड़ी हो तो सोचा जवाब दे दूं... कह दूं तुमसे।"
    मैंने उसे अंतिम बार देखा वह इस तरह शांत निर्मेष मुझे देखती हुई उन्हें ऊंचाइयों पर खड़ी थी मेरे होठों में एक फीकी मुस्कान आई, मैने कहा, " यदि मैं केवल तुम्हारे स्वप्न की वह परछाई भर होता, तो ये सब तुमसे कभी ना कहता, चुपचाप चला जाता। लेकिन क्या करूं मैं तो माइलस्टोन का राइटर भी हूं न ? तो कैसे न कहता, तो लो पीहू तुम्हारा वह अधूरा स्वप्न अब पूरा हुआ... मैं जा रह हूँ...  गुड बाय..."
   ये मेरे आखिरी लफ्ज़ थे जो मैंने उससे कहे। एक कहानी फिर से शुरू हुई और उसी अंजाम तक पहुंची। फिर पीछे से मैने जानने की कोई कोशिश नहीं की, कि उसने मुझसे किया हुआ वादा पूरी तरह निभाया या नहीं ? अभी भी उसकी आंखों में आंसू थे या नहीं... 
     मैं नीचे आया। अपने आंसुओं को आस्तीन से एक बार फिर पोंछा। खुद को नार्मल किया। ज्ञान को बाइक के नजदीक जो गौशाला के पास थी, झुक के कुछ रिपेयर करते हुए देखा। घर के आंगन की तरफ देखा, खाली नजर आया। मैं चलता हुआ बेडरूम के नजदीक पहुंचा। अंदर झाक कर देखा, सत्य बेखबर-सा सो रहा था। मैं धीरे से अंदर दाखिल हुआ, उसके पास बिस्तर में उसके सिरहाने बैठ गया। मैने पहली बार उसकी तरफ ध्यान से देखा, उसमें मुझे एक सरल, सुकुमार राजकुमार की मासूम सूरत नजर आई। आखिर इस इंसान को किस बात, किस गुनाह की सजा मिले ? कहते हैं गुजरते हुए वक्त के साथ इंसान का बड़े से बड़ा जख्म भी भर जाता है। हो सकता है आज यह पीहू को ठीक से समझ नहीं पा रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि भविष्य में भी यह समझ नहीं पाएगा। आज पीहू को शिद्दत से न सही, लेकिन इसे तो प्यार है उससे। आज इसे सच मालूम पड़ जाए तो क्या वहीं त्याग यह करने के लिए तैयार न होगा ? हो सकता है जिंदगी के सफर में साथ चलते-चलते ये दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ सके, तब मैं एक गुजरी हुई कहानी बनके न रह जाऊंगा ? तो क्या बुरा होगा कि अब इस कहानी को इसी मोड़ पर छोड़ दिया जाए ? लेकिन कैसे ?
    तभी मेरी नजर सोफे पर पड़ी एक नोटबुक और पेन पर गई। मैं चुपचाप उठकर सोफे पर आ गया। हृदय में पीहू से बिछोह की पीड़ा और सत्य के लिए मन में अथाह करुणा लिए नोटबुक के बीच के पन्ने में मैंने एक छोटी सी कविता लिखी,  फिर उस पन्ने को फाड़ कर अपनी जेब में रख लिया। सत्य के कंधे को हिलाते हुए बोला, "सत्य ! उठो... उठो यार... हम जा रहे हैं..." 
     मैं बैठक में पहुंचा और एक बार फिर बाबा के पैर छूकर उनसे इजाजत ली। बाबा मुझसे कुछ और भी कहना चाहते थे, लेकिन सत्य को नजदीक आता देख मैंने इशारे से उन्हें मना कर दिया। वह बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए मुझसे बोला, "एक मिनट, मैं मुंह-हाथ धो लूं... तब तक तुम बाबा से बात करो..."
    मैने बाबा से हाथ जोड़कर उनसे अंतिम विदा मांगी, "बाबा जा रहा हूं... जाने-अनजाने मुझसे कोई भूल हुई हो, कोई अपराध हुआ हो या फिर किसी भी पल मैंने आपका दिल दु:खाया हो तो सत्य और पीहू समझ कर क्षमा कर दीजिएगा..."
    मेरी आंखों के साथ ही बाबा की आंखों में भी आंसू आ गए। वे तख्त से उठे, मेरे दोनों जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा, "...नहीं तुमसे कोई भूल या अपराध नहीं हुआ...", फिर मुझे अपने हृदय से लगाते हुए कहा "मेरा आशीर्वाद है, सदा खुश रहो, सुखी रहो..."
   पीहू ने जो कहा, जो चाहा वह पूरा हुआ। कहते हैं न, हम जिसे प्यार करे, अपना सच्चा दोस्त समझे उसकी अनकही बातों को भी समझना चाहिए। जब पीहू यह समझ सकती है कि बाबा ने मुझसे क्या कहा होगा, क्या चाहा होगा या फिर क्या मांगा होगा तो फिर त्याग करने में मुझे किस दर्द से गुजरना पड़ा होगा  इससे वह अनजान कैसे हो सकती है ? क्या उसने ये अंदाजा न लगाया होगा कि ऐसे में मेरा बर्ताव उनके प्रति कुछ रुखा भी हो गया होगा ? 
   मैने अपनी जेब से लिखी कविता की पर्ची निकाली, उन्हें देते हुए बोला, "बाबा जो अपने कहा, जो चाहा, मैने उसे पूरा किया... आपसे एक प्रार्थना है, यह पीहू के लिए लिखा है... जाते हुए उसे देने की हिम्मत नहीं हो रही है...जब मैं चला जाऊं... तो पहले आप इसे पढ़ लीजिएगा, और फिर यदि आपको उचित लगे तो किसी न किसी बहाने से पीहू को दे दीजिएगा। लेकिन हां बाबा... किसी भी कीमत में इसे सत्य को मत दीजिएगा..."
   बाबा कुछ बोले नहीं, कागज़ के टुकड़े को अपने कुर्ते की जेब में चुपचाप डालते हुए मुझे विश्वास दिलाया, "ठीक है..."
   सत्य बाथरूम से बाहर आते हुए बोला, "चलो यार, पहले जाना तो मुझे भी फैक्ट्री की तरफ था... लेट हो गया तो अब माइंस ही जाऊंगा..."
    बाबा से इजाजत लेकर हम दोनों गैलरी पार कर जब अटारी के पास से गुजर रहे थे तो सत्य ने सीढ़ी के आखिरी पायदान में रखे हुए मेरे बैग को उठाते हुए कुछ ऊंची आवाज में कहा, "पीहू !! हम लोग जा रहे हैं... दरवाजा अंदर से बंद कर लेना...", फिर वह धीरे से मुझसे बोला, "तुमने बाय तो कह दिया न..."
   "हुं... कह दिया है... अब चलो...", मैने भी धीरे से कहा।
    हम सड़क पर आ गए। औपचारिक बातचीत के बाद उसने भी मुझसे वही सब कहा जो पीहू पहले ही कह चुकी थी। फिर उसने ज्ञान से कहा, "हो सकता है कल मैं घर आऊं... मिलेगा न...?"
    ज्ञान ने जवाब दिया "हां ... कल आया तो मिल जाऊंगा। परसों शाम तक मुझे भी जाना है... ठीक है तू अभी निकल... हम भी निकालते हैं... बाय..."
    सत्य चला गया। ज्ञान बाइक को शीशम के पेड़ के पास खड़ी करते हुए बोला, "अरे यार रुक, मै भी बाबा से मिलकर आता हूँ। पता नहीं क्या सोचे ...", फिर वह तेजी से घर की तरफ भागा। दरवाजा अभी भी खुला था।
      मैने बाइक की सीट पर बैग को रख दिया। फिर उसी में टिक कर खड़ा हो गया। मेरी नजर एकटक खिड़की पर थी। मैने देखा, अटारी में बिजली का बल्ब चमक रहा है, पर्याप्त उजाला फैला है। तभी एक साया खिड़की के पास उभरा। मेरे और बल्ब की रौशनी के दरमियां एक हाथ से खिड़की की छड़ पकड़ कर बाहर की तरफ देखते हुए खड़ा हो गया। उसके दूसरे हाथ में मेरा तीसरा अधूरा जाम है।
      मैंने ध्यान से देखा, उसके बदन पर डार्क बादामी कलर का सलवार-सूट और उसी से मैच करता दुपट्टा हैं। सलीके से पीछे की तरफ संवारे हुए अध-खुले बाल जो पीछे से आ रही बल्ब की लाल रोशनी से कुछ और सुनहरे और रेशमी लग रहे हैं। कानों में पहने छोटे-छोटे गोल टप्स सूरज की किरणें से चमक कर चंद्रमा की भांति खिल रहे हैं। होठों में हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक उसके गालों के रंग के साथ मैच कर रही है... लेकिन उसके चेहरे पर खामोश रात की उदासी है, गहरी आंखें कुछ भरी हुई है। मैंने अपनी आंखें बंद कर ली। तो सत्य ने उस दिन पीहू से झूठ नहीं कहा था। जो उसने देखा, वही सब तो मुझे भी दिख रहा है !! लेकिन क्यों ? 
      जब दोबारा मैने अपनी आँखें खोली तो उस परछाईं के लबों पर एक फीकी-सी मुस्कान थी। अपना दाहिना हाथ खिड़की के बाहर निकाल, उसे मेरी तरफ हिलाते हुए कहा, "अलविदा..."
   मैंने भी भरी हुई आंखों से उसी तरह मुस्कुराते हुए अपना हाथ हिला दिया, "अलविदा..."
   "ये भाई पागल हो गया है क्या...", ज्ञान ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा, "किसे हाथ हिला रहा है ? किसे अलविदा कह रहा है, खिड़की में तो कोई है ही नहीं ?"
   मैंने ज्ञान की तरफ पलटते हुए आश्चर्य से पूछ, " क्या !! ... कोई नहीं है ? लेकिन मुझे..."
    लेकिन फिर जब मैने दोबारा खिड़की की तरफ देखा तो सचमुच वहां कोई नहीं था। मैने ज्ञान से सामान्य ढंग से कहा, "लेकिन खिड़की तो है न ! उसी को अलविदा कह रहा था..."
   मैने बैग से बॉटल निकली, ढक्कन खोलकर एक तरफ फेंक दिया। ज्ञान ने कहा, "ला दे... ठंड के दिन हैं... और सफर दूर का है..."
    तीन-चार घूंट पीने के बाद बॉटल मुझे वापस की। मैने एक ठंडी आह भरी। दो घूट पीने के बाद बॉटल खिड़की की तरफ दिखाते हुए एकबार फिर कहा, 
"पीहू !... अलविदा..."
    फिर बची हुई शराब ज़मीन में उड़ेल दी और खाली बॉटल को पेड़ के पास ही लुढ़का दिया, और ज्ञान से बोला, "हां... अब चल..."

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