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अजनबी 3

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यादें !  यादें !! सुखद यादों के साथ रुला देने वाली न जाने कितनी यादें। "ये ! सो गए क्या...?", किसी ने मेरा कंधा हिलाते हुए पुकारा और इस पुकार के साथ ही टूट गया यादों का विहंगम स्वप्निल संसार। "ऊं....", मैंने अपनी आंखें खोली, " कौन ...?" "मै सत्य, ... सो गए क्या ?" मैंने पूरी तरह से अपनी आंखें खोली, देखा सामने सत्य और मंगल खड़े थे। "नहीं यार... दो-तीन दिनों से जाग रहा हूँ न, सोने को अच्छे से मिला ही नहीं। तुम्हारा इंतजार करते-करते झपकी आ गई..."  खान-पीना बना, सभी ने खाया। सत्य ने अपने साथ चलने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया, "मैं यही ठीक हूँ, मंगल के पास। सुबह चलेंगे अभी तुम जाओ और आराम करो..." सत्य के जाने के बाद मंगल ने मड़ैया के सामने ही मेरी खाट बिछाई। बिस्तर लगाया और खुद मेरी चारपाई के पास पत्थर में बैठ गया। यहां गुजरी हुई रातों की हर एक तस्वीर यादें बनकर मेरे साथ थी। कल की सुखद यादें आज मुझे रुला भी नहीं पा रही थीं।  "यह सब क्या हो गया मंगल, कभी सोचा न था... रातें वही है, हवाएं वही हैं, मौसम वही है, यह बगिया...