अजनबी 3

      यादें ! यादें !! सुखद यादों के साथ रुला देने वाली न जाने कितनी यादें बसी है इस दिल में।
     "ये ! सो गए क्या...?", किसी ने मेरा कंधा हिलाते हुए पुकारा और इस पुकार के साथ ही टूट गया यादों का विहंगम स्वप्निल संसार।
     "ऊं....", मैंने अपनी आंखें खोली, " कौन ...?"
    "मै सत्य, ... सो गए क्या ?"
    मैंने पूरी तरह से अपनी आंखें खोली, देखा सामने सत्य और मंगल खड़े हैं।
     "नहीं यार... दो-तीन दिनों से जाग रहा हूँ न, सोने को अच्छे से मिला नहीं तो तुम्हारा इंतजार करते-करते नींद आ गई..." 
     खान-पीना बना, सभी ने खाया। माहौल कोई पार्टी का था नहीं। सत्य ने अपने साथ चलने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया, "मैं यही ठीक हूं, मंगल के पास। सुबह चलेंगे अभी तुम जाओ और आराम करो..."
    सत्य के जाने के बाद मंगल ने मड़ैया के सामने ही
 मेरी खाट बिछाई। बिस्तर लगाया और खुद मेरी चारपाई के पास पत्थर में बैठ गया। गुजरी हुई रात की हर एक तस्वीर यादें बनकर मेरे साथ थी। कल की सुखद यादें आज मुझे रुला भी नहीं पा रही थीं। 
   "यह सब क्या हो गया मंगल, कभी सोचा न था... रातें वही है, हवाएं वही हैं, मौसम वही है, यह बगिया वही है... हम वही हैं, सब कुछ उसी तरह हैं... लेकिन एक सितारा जो कभी हमारे साथ हुआ करता था... आज आसमान पर जा बैठा...?"
   "सब किस्मत की बात है सर जी ! कौन जानता था कि इतनी कम उम्र में भगवान जी उन्हें हमसे छीन लेंगे...", मंगल के स्वर में उदासी थी और उदासी की वह चमक धीरे-धीरे उसकी आंखों में भी दिखने लगी थी।
   "कुछ तो बताओ मंगल क्या गुजरी उसके साथ...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा था। 
   "कुछ नहीं सर जी, आपके जाने के बाद पहले दो-तीन दिन तो बिल्कुल खामोश रहीं। भइया जी दिन को अपनी नौकरी चाकरी में व्यस्त रहते। वो बाबा की सेवा करतीं। शाम को अक्सर इसी बगिया में आ जाया करती थीं। कमली के साथ बोलती-बताती... अक्सर उसी आम के पेड़ के नीचे बैठती और अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिखा करती थीं। फिर एक अजीब सा पागलपन छा गया..."
   मैंने आश्चर्य से पूछा था, "पागलपन !!! कैसा पगलपन ?"
    "बस्ती के बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने का पागलपन ... उनका जीवन स्तर सुधारने का पागलपन... और इस पागलपन में मुझे और कमली भी घसीट लिया। भईया जी से कहकर मेरे लिए बाइक खरीदवाई... लगातार एक महीना तक साथ बस्ती के घर-घर जाकर सभी आवश्यक जानकारी इकट्ठा करती रही। 
      सभी को एकजुट किया। अब क्या बताए सर जी... दो महीने के अंदर ही सभी के बीच इस तरह से घुल मिल गई कि उनकी बात को फिर कोई नहीं टालता। एक-एक बच्चे को स्कूल ले जाकर नाम लिखवाया। जो बड़े बच्चे थे उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करती। अटारी के नीचे वाला जो हाल है न, वहां पुरी की पूरी क्लास लगा करती थी। शाम को बहुत सारे बच्चे आते थे। वह भी पढ़ातीं और स्कूल में ग्यारहवीं और बारहवीं के कुछ बड़े और होशियार बच्चे भी छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए आने लगे थे।
   कुल मिलाकर क्रांति ला दी थी। छोटे बड़े सरकारी दफ्तरों में अच्छी खासी जान पहचान हो गई थी। बस्ती के लिए बहुत सारी सरकारी योजनाएं उन्होंने लागू करवाई... विधायक तक उनकी सीधी पहुंच थी... कुछ लोग कहते कि आगे चलकर नेताजी बनने की जुगाड़ में हैं... लेकिन मैं जानता था सर जी, उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। इधर-उधर भटकने वाले आदिदिवासियों को एक जगह स्थाई रूप से रहने के महत्व को समझाया। खेती के महत्व को बताया, बच्चों की शिक्षा के अर्थ समझाएं... फुल की फुल इंदिरा गांधी बन गई थी..."
    जब कोई अपना अच्छा काम करता है तो उसका वर्णन करते समय हमारी आंखों में जो चमक होनी चाहिए वही चमक मैंने मंगल की आंखों में देखी।
    "इंदिरा गांधी नहीं मंगल... मदर टरेसा बोलो..."
    "यह कौन है सर जी ? कभी नाम नहीं सुना..."
    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "कैसे सुनोगे मंगल !! इस देश में फिल्मी हीरो-हीरोइन और नेताओं के नाम ही तो चलते हैं... जो काम पीहू कर रही थी कभी इसी तरह के काम की शुरुआत उन्होंने भी की थी... लेकिन एक बात बताओ मगल अचानक पीहू में इतना बदलाव आया कैसे...?"
    "बताया न सर जी, जब उनकी गरीबी, उनकी स्थिति को समझा, वहीं से उनका मन परिवर्तित हुआ कि उनके लिए कुछ करना चाहिए। पढ़े-लिखी तो थी हीं। अरे सर जी अच्छे-अच्छे विधायक, मिनिस्टर उनसे अंग्रेजी में बात करने में संकोच करने लगे थे... एक बार एक मिनिस्टर जी चुनाव प्रचार करने आए थे, तो सोचा होगा कि गांव की होगी कोई देहाती लड़की, भला अंग्रेजी क्या जानेगी... तो बस झाड़ने लगे अंग्रेजी में... पहले तो बिटिया चुपचाप सुनती रही लेकिन जब वह शुरू हुई तो उनको रास्ता नहीं मिल रहा था भागने का..."
    मंगल हंसते हुए आगे कह रहा था, "अरे सर जी... मुझे भी पहले कहां मालूम था उनके बारे में ज्यादा कुछ... ढाई साल तक उनके साथ काम किया तो समझ में आया। उन्हें बहुत ज्ञान था, हर फील्ड में !!! ... जब अंग्रेजी बोलती तो पूरी अंग्रेजों की तरह और जब संस्कृत के श्लोक पढ़ती तो लगता साक्षात सरस्वती देवी बोल रही हैं... और बताऊं सर जी उनको और भी भाषाएं आती थी... एक बार हम लोग जिले के शिक्षा विभाग के ऑफिस गए। वहां उनकी मुलाकात एक अधिकारी से हुई जो बंबई के थे, तो उनके साथ बिल्कुल मराठी में बात की... ये देख कर मैं दंग रह गया। सर जी ! भईया जी बहुत लकी थे कि उन्हें पीहू बिटिया ने पसंद किया था... कभी-कभी यह सोचकर दुख लगता है... जब पीहू बिटिया उनके साथ थी तो उनके पास नई-नई नौकरी के कारण साथ बिताने के लिए ज्यादा समय नहीं हुआ करता था... और आज समय है तो पीहू बिटिया उनके साथ नहीं है, बस उनकी यादों में इधर-उधर भटकते रहते हैं। एक दिन कह रहे थे कि जो काम पीहू ने शुरू किया है उसे आगे ले जाना चाहते हैं..."
    मैंने गहरी सांस लेते हुए मंगल से कहा, "हां मंगल तुमने ठीक कहा, सहजता से प्राप्त कोई वस्तु या व्यक्ति की कीमत हमे उस वक्त समझ में नहीं आती है, और एक दिन जब वह हमारी जिंदगी से चला जाता है तो फिर उसी के लिए रोते हैं, तड़पते हैं, भटकते हैं... उसकी यादों को दिल में सजोए अपनी तकिया भिगोते हैं... मन ही मन उसके लिए न जाने कितने खत लिखते हैं..."
   "सर जी आपने पीनी कम कर दी है क्या ?... नहीं मैं तो ऐसे ही पूछ रहा हूँ, पहले होता तो आपने अभी तक फरमाइश कर दी होती..."
   मंगल की बात सुनकर मैं उसके दिल का हाल जान सकता था। मैंने उसकी तरफ देख कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "तुम बना लो ... "
    "और आपके लिए ...?"
    "रहने दो... मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है... देखो तुम बुरा मत मनना। सच में मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है, तुम अपने लिए आराम से बना लो... "
   मंगल ने वही किया फिर सिगरेट का पैकेट मेरी तरफ बढ़ते हुए बोला, "इसे तो ले लेंगे न ? "
   एक सिगरेट जलाते हुए फिर मैने उससे कहा, "और कुछ हो तो बताओ..."
   मंगल फिर अपनी अतीत में लौटते हुए बताने लगा, "बस्ती को स्वर्ग बना दिया सर जी। हर घर के सामने फल-फूल के पेड़ लगवाए। लोगों को जीने का तरीका बताया। नए बच्चों को शिक्षा, सफाई, स्वास्थ्य और बड़े-बुढो को खेती के महत्व को समझाया। जीवन स्तर में काफी सुधार ला दिया... कभी मेरे साथ चलिएगा वहां। आपको बहुत अच्छा लगेगा। एकदम टूरिस्ट प्लेस बन गया है... 
     मंगल और भी बहुत सी बातें मुझे बता रहा था। और मैं उसकी बातों को सुनते हुए यह भी पूछना चाहता था की कहो मंगल कभी उसने मुझे भी याद किया। लेकिन मैं पूछ नहीं पा रहा था।
   मेरे यहां से जाने के बाद तीन वर्षों तक पीहू ने नि:संदेह बहुत अच्छे काम किए, जिन पर मैं गर्व कर सकता हूँ। लेकिन इन तीन वर्षों के उसके जीवनकाल में मेरा क्या स्थान था, था भी कि नहीं ? यह जानने के लिए मैं बहुत ही उत्सुक हो रहा था। 
    उस दिन मुझे मानवीय स्वभाव की एक बात और पता चली... इंसान किस हद तक स्वार्थी हो सकता है। किसी ने किसी के लिए क्या किया इससे अधिक महत्वपूर्ण यह जानने में होता है कि उसके जीवन में आपका क्या महत्व था। आपको उसने कितनी शिद्दत से याद किया। उसने आपके लिए आंसू बहाए या नहीं। यदि मंगल अभी कह दे कि पीहू मुझे याद करके तड़पी थी, मेरे लिए रोई थी तो इस वक्त मेरी भी आंखों में भी शायद आंसू होंगे... लेकिन वे आंसू दुःख के नहीं खुशी के होंगे। वाह री दुनिया ! हम किसी के गम में अपनी खुशी की तलाश कैसे और क्यूं कर लेते हैं...?
     सप्तरंगी इंद्रधनुष में रोशनी के अलग-अलग रंग होते हैं, लेकिन अंधेरे का एक ही रंग होता है, काला। यदि इस रंग को अलग-अलग किया जाय तो भुखमरी, गरीबी, अराजकता, हत्या, बलात्कार, धोखा, कपट जैसे न जाने कितने रंग उभर कर सामने आएंगे। 
      पीहू ने अपने जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को समेट लिया और जो रंग उभर कर सामने आया वह था श्वेत और उज्जवल रोशनी, जो इस काले रंग के अंधकार से लड़ सकती थी। जिसके सामने आसमान में सफर करते हुए इस मिलियन्स वाट के बल्ब की रोशनी भी फीकी पड़ जाए। मैंने मंगल से पूछा, "जरा अपने मून क्लॉक को देखकर बताओ तो... टाइम कितना हुआ होगा...?"
     "साढ़े दस बज रहे होंगे...", मंगल आगे बता रहा था, "कुछ दिनों बाद बस्ती वालों ने उनकी स्मृति में एक बड़ा सा चबूतरा बनवा दिया और आसपास बहुत सारे पेड़ लगा दिए। इसी ग्यारह तारीख को दो वर्ष पूरे हो जाएंगे। अब तो पेड़ भी कुछ बड़े-बड़े हो गए हैं..."
   "मंगल तुमसे एक बात पूछूं...? कमली ने मुझे बताया कि भईया जी जब यहां से गए थे तो पीहू से किसी बात को लेकर उनका झगड़ा हुआ था, कुछ कहा सुनी हुई थी ? तुम तो पास ही थे न ? क्या तुम्हें मालूम है कौन सी बात थी...?"
    "नहीं सर जी, ज्यादा तो मुझे भी नहीं मालूम। मैं जब भूसा निकालने के लिए कोठरी में गया था तो उड़ती हुई एक बात मुझे सुनाई दी थी। शायद शादी विवाह को लेकर कोई बात चल रही थी दोनों में। भईया जी बोले की जब शादी करना हो तो मंगल से खबर भिजवा देना मैं आ जाऊंगा... लेकिन पीहू बिटिया ने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। मुझे उनकी यह बात याद रही। जब मैं शहर उन्हें बुलाने के लिए गया तो पता चला कि वह मुंबई में है। फैक्ट्री ने उन्हें कुछ महीनों के लिए ट्रेनिंग में भेजा है... घर से ही ऑफिस का फोन नंबर मिला। मेरी उनसे बात हुई और मैंने फिर सारी बातें बताई। हाथ जोड़े कि भैया जी नाराज होकर गए हैं, लौट आइए। फिर दो दिन तक मैं उन्हीं के घर में रुका था। तीसरे दिन वह लौट कर आए थे, आते ही उन्होंने मुझसे पूछा था कि क्या पीहू ने बुलाने के लिए भेजा है ?
   "फिर...?"
    अब मैं तो चाहता था सर जी कि किसी तरह वह यहां पर आए जाएं। मैंने झूठ बोल दिया था कि हां उन्होंने ही भेजा है। लेकिन सर जी उनके घर वालों का स्वभाव बड़ा अजीब लगा मुझे... भैया जी की बातों और घर वालों की बातों में अंतर महसूस हुआ था..."
    "मतलब...?", मैंने आश्चर्य से पूछा था। 
    "उस दिन मैं दूसरे कमरे में था जब भैया जी अपनी मम्मीजी से बात कर रहे थे। भैया जी बोले कि यदि पीहू शादी के लिए तैयार नहीं है, तो आप लोग क्यों जबरदस्ती कर रहे हैं ? आप लोग जहां कहेंगे मैं शादी करने के लिए तैयार हूं... वह भी कोई रोक नहीं लगाएगी..."
     उनकी मम्मी जी गुस्से से बोली, "जब उसे यही करना था तो तीन साल तक लटका के क्यों रखा ? उसे जमीन, जायदाद और पैसे का घमंड है न। भाई तो रहा नहीं। इकलौती मालकिन जो बन बैठी है ? आखिर निकाल फेंका न तुझे कुत्ते की तरह ?"
    "अच्छा ऐसा कहा उन्होंने !! तो फिर भैया जी ने क्या कहा...?", मैंने पूछा।
    "मुझे अजीब लगा... लेकिन इससे भी अजीब बात यह लगी कि जब भैया जी ने कहा कि मुझसे अधिक तो आप लोग लगे हुए थे कि मैं वही शादी करूं जबकि मैंने आप लोग को पहले ही बता दिया था कि शायद पीहू शादी करना ही नहीं चहती है... अब जब बुलाया है तो बात करके देखूंगा... लेकिन जब यहां लौट कर आए तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था... सर जी, बहुत रात हो गई है। जितनी बातें उठाएंगे आपको दुख होगा, मुझे नींद आ रही है, अब आप भी सो जाइए..."
      बात अधूरी रह गई। मंगल जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया और मैं सोने की कोशिश करते हुए सोच रहा था... शायद पीहू को अपनी मृत्यु का पहले पूर्वाभास हो चुका था। उसके न रहने पर भी दुनिया अपने निर्धारित स्थान पर कायम है। सभी कुछ तो अपनी जगह पर है। ये मौसम, ये सूरज, ये धरती, ये चांद-सितारे, ये बहारें, ये हवा, ये पुरवाई, ये बादल, ये बरसात, ये बगिया, मंगल, कमली, मैं, सत्य और नदी तीर में बसी आदिवासी बस्ती... सभी कुछ। लेकिन जो सत्य ने खो दिया उसे अब दोबारा उसे नहीं मिलने वाला, फिर भी वह यहां भटक रहा है। और मैंने क्या खो दिया ? यदि बता सकता तो आपको जरूर बताता लेकिन इस राइटर के पास अब कोई लफ्ज नहीं हैं..."
    सुबह आठ बजे के लगभग नींद खुली। घड़े से पानी निकाल कर मुंह धोया। कमली और मंगल दोनों खेत में काम कर रहे थे। मुझे मुंह धोता देख मंगल भाग कर मेरे पास आया। 
    "सर जी जग गए ...? नहाने की व्यवस्था बना दूं ...?", मंगल ने पास आते हुए कहा। 
   "हां बना दो ... क्या सत्य आया था ?", मैंने अपनी स्वीकृत के साथ एक प्रश्न भी पूछा।
   "हां आए थे, आपको सोता देख बोले कि सो लने दो... मैं बाद में आऊंगा..."
    तभी एक आदमी साइकिल के कैरियर में बड़ी-सी टोकरी बंधे हुए गेट पर दिखाई दिया। मैंने मंगल से कहा, "देखो तो लगता है कोई सब्जी लेने आया है..."
जब वह पास आया तो मुझे उसकी सूरत कुछ जानी-पहचानी लगी। मैं उसे गौर से देखने लगा उसकी भी आंखें कुछ संकुचित हुई और दूसरे ही पल उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर मुझे अभिवादन किया। मैं अभी भी दुविधा में था। मंगल ने मेरी दुविधा दूर करते हुए उस व्यक्ति से मेरा परिचय करवाया, "सर जी जब आप पिछली बार आए थे, याद कजिए इनके लड़के से आपकी मुलाकात हुई थी ? अरे वही सर जी जिसको आपने पढ़ने के लिए समझाया था ?"
   "ओह हां !! याद आया, वह आज नहीं आया...?", मैंने उसे पहचानते हुए उसी से पूछा।
   "नहीं साहब जी, वह स्कूल गया है। इस साल 12वीं में है न...", उसने कुछ मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
    मैं खुशी जाहिर करते हुए बोला, "अरे वाह !! तो तुमने उसे आगे पढ़ाया...?"
  वह कृतज्ञता जाहिर करते हुए बोला, "अरे साहब जी मैंने कहां पढ़ाया, पढ़ाया तो पीहू बिटिया जी ने... आपके जाने के बाद एक दिन वह मेरे साथ सब्जी लेने आया था और पीहू बिटिया से मुलाकात हुई। उन्होंने उसे ट्यूशन पढ़ाया और परीक्षा भी दिलवाई। पास हो गया और धीरे-धीरे उसका पढ़ने में मन लगने लगा। और देखिए आज 12वीं पहुंच गया... उस दिन आपसे कहा था बातें करने के लिए तो सभी हैं लेकिन करता कोई नहीं है। लेकिन पीहू बिटिया ने किया बल्कि बहुत लोगों के साथ करके दिखाया...", आगे के शब्द वह कह नहीं सका उसका गला भर आया और आंखों में आंसू आ गए। 
   मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मेहनत तुम्हारे बेटे ने की, पीहू ने तो बस दिशा दिखाई। बस यही तो चाहिए आगे बढ़ने के लिए। कोशिश करो कि तुम्हारा बेटा भी किसी के साथ वही करें जो पीहू ने उसके साथ किया था..."
   उस अधेड़ व्यक्ति ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "जी साहब जी... करेगा, क्यों नहीं करेगा..."
    उसके जाने के बाद मंगल ने आम के पेड़ के नीचे चारपाई बिछा दी। मैंने स्नान किया और कपड़े चेंज किए। फिर मंगल से बोल, "मंगल यदि बुरा न मानो तो यह कपड़े तुम धो देना या कमली से बोल देना ...?"
    "अरे धुल जायेंगे सर जी, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है ..?"
    "और देखो आज दिन में बिल्कुल न तो तुम पियोगे और न मैं... यहां गांव की मुख्य बस्ती की स्कूल चलना है। ... और तुम जिन लड़कों का जिक्र कर रहे थे वही जो यहां पढ़ने आते थे उनसे भी मिलना है..."
   "कुछ तो कॉलेज पढ़ने के लिए शहर चले गए हैं... और कुछ अभी भी स्कूल में पढ़ रहे हैं... लेकिन क्यों मिलना है सर जी...?"
    "बस ऐसे ही... तुम्हारी बाइक तो ठीक-ठाक है न ?", मैंने पूछा था। 
   "बिल्कुल सर जी लेकिन पहले आप ब्रेकफास्ट तो... लीजिए भैया जी भी आ रहे हैं..."
    जब सत्य नजदीक आया तो मैंने देखा कि उसके हाथ में टिफिन बॉक्स है। उसने टिफिन मेरे पास रखते हुए कहां, "इसमें लंच है... और यह घर की चाबी... मैं माइंस तरफ जा रहा हूं... शायद लौटने में कुछ देर हो जाए तब तक तुम यही रहना या मन करे तो घर निकल जाना..."
    "नहीं सत्य, अभी मैं गांव के हायर सेकेंडरी स्कूल जाऊंगा... मुझे पीहू के स्टूडेंट से मिलना है तुम आराम से अपने काम पर जाओ शाम को मुलाकात होगी...", मैंने टिफिन बॉक्स हाथ में लेते हुए कहा। 
     "ओके, तो शाम को मुलाकात होगी...", फिर वह चला गया। मंगल ने टिफिन खोलकर मुझे खाना परोसा। मैंने खाते हुए मंगल से कहा, "मंगल तुम्हारे भैया जी तो बहुत लाजवाब खाना बनाते हैं... पीहू ने बहुत कुछ सिखा दिया..."
    मेरी बात सुनकर मंगल मुस्कुराते हुए बोला, "सर जी, वक्त इंसान को सब कुछ सिखा देता है ..."
    हम लगभग ग्यारह बजे गांव की स्कूल पहुंचे। प्रिंसिपल पीहू को अच्छी तरह से जानते थे। जब उन्हें पता चला कि मैं उनका दोस्त हूँ, तो आदर और सम्मान के साथ मुझसे बातचीत की। मुझे उनसे बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां मिली। पीहू की राजनीतिक पहुंच और बस्ती के प्रति उसका समर्पण। शिक्षा के प्रति जागरूकता अभियान जो उसने चलाया था नि:संदेह प्रसंसनीय था। मैने प्रिंसिपल साहब से आग्रह किया कि मुझे 11वीं और 12वीं के लड़कों से जो स्वभाव के अच्छे और पढ़ने में होशियार हों उनसे मिलना है। उनसे मेरा परिचय करवा दीजिए। उन्होंने तुरंत एक लिस्ट बनाई और चपरासी को देते हुए बोले, "जाओ इन्हें क्लास से बुला लाओ... "
     स्टाफ रूम में हमारी उनके साथ मीटिंग हुई। मैने अपना परिचय पीहू के मुंबई के दोस्त के रूप में दिया।
   आधे घंटे की बातचीत में ही वे सभी हमसे काफी घुल मिल गए। उन सभी के लिए पीहू "पीहू दीदी" थी। पीहू के न रहने का दुख सभी को था। पीहू के साथ उनकी बहुत सारी यादें जुड़ी थी। मैने उन सभी से पीहू की कार्यशैली समझना चाहा। जो जितना जानता था उसने उतना शेयर किया। 
    उनमें से एक बोला, "सर ! यदि आपको पूरी जानकारी चाहिए तो ओम भैया और कुसुम दीदी से मिल लीजिए ... कोई भी नया काम करने से पहले पीहू दीदी उन्हीं से डिस्कशन करती थीं... वो दोनों इस समय शहर के कॉलेज में पढ़ते हैं... सर आपने मुझे नहीं पहचाना ?"
    "पहचान गया, आज सुबह ही बगिया में तुम्हारे दद्दा से मुलाकात हुई थी... तुम्हारा नाम क्या है ?"
   उसने शालीनता से जवाब दिया, "भागीरथ..."
   मैंने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा, "अपने नाम का अर्थ तो जानते ही होंगे...? तो अब तुमसे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है.... है न ?"
   उसने उसी तरह शालीनता से सर झुका कर कहा, "जी सर... हम सभी लोग आपके साथ हैं, यह हमारा ही तो काम है..."
    मैंने कॉलेज का नाम-पता लिया। फिर उनसे अगले दिन मिलने को कहकर वापस बगिया आ गया।
    "मंगल, तुमने खाना खाया...? न खाया हो तो जल्दी से खा लो... हम शहर चल रहे हैं... जल्दी करो"
    लगभग 2 घंटे बाद हम उसी कॉलेज के सामने खड़े थे जहां ओम और कुसुम पढ़ते थे। दोनों ही मंगल को अच्छी तरह से पहचानते थे। मंगल ने मेरा वही परिचय दिया जो मैं स्कूल में प्रिंसिपल और दूसरे बच्चों को देकर आया था। कॉलेज कैंपस में दोनों से लगभग एक घंटे बातचीत हुई। दोनों ही प्रगतिशील विचारधारा के नजर आए। उनका दृष्टिकोण और नजरिया आधुनिक लगा।  
     कुसुम ने मुझे समझाते हुए कहा, "हम गांव के लोगों को पढ़ने में तीन सब्जेक्ट में अधिक समस्याएं आती है, मैथ्स, साइंस और अंग्रेजी। ... इन्हीं में अधिकांश लड़के-लड़कियां फेल होते हैं। पीहू दीदी ने इस बात को समझा और उन्होंने एक फार्मूला तैयार किया। जिसकी मैथ्स अच्छी होगी वह अपने जूनियर को मैथ्स पढ़ाएगा, जिसकी साइंस अच्छी होगी वह साइंस पढ़ाएगा जिनकी अंग्रेजी अच्छी होगी वह अंग्रेजी पढ़ाएगा। 
      पहले तो लोगों को बहुत अजीब लगा, यहां तक कि हमें भी लगा। यह कैसे संभव है कि एक ही स्कूल में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पढ़ा सकते हैं ? लेकिन पीहू दीदी में एक जबरदस्त खूबी थी, और वह थी अगले इंसान को समझा ले जाने की। मोटिवेशन देने की। सामने वाले को प्रैक्टिकली करके दिखाने की।
   उन्होंने 10वीं क्लास के 12 बच्चों को सिलेक्ट किया जिनकी कुछ की मैथ्स अच्छी थी और कुछ की साइंस। गांव के सभी की अंग्रेजी तो वैसे ही कमजोर होती है। उनमें से हम दोनों भी थे। उन्होंने 15 दिन हम सभी को अपने घर बुलाकर अंग्रेजी पढ़ाई। और सर तब हम लोगों ने पहली बार जाना कि हमारे गांव में एक ऐसी लड़की भी है कि जिसकी अंग्रेजी और सोच इतनी अच्छी है। फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम साइंस का कोई भी चैप्टर जो तुम्हें अच्छे से आता हो कल और अच्छे से तैयार करके आना। इसी तरह ओम को भी कहा कि तुम्हें मैथ्स का जो चैप्टर अच्छे से बनता हो उसे और अच्छे से पढ़ कर आना। पहले तो समझ में आया नहीं कि वो क्या करने जा रही हैं। सोचा शायद हमारा टेस्ट लेना हो।  लेकिन अगले दिन क्लास में 10वीं के स्टूडेंट्स को मैंने आधे घंटे साइंस पढ़ाई और ओम ने मैथ्स। 
    पहले एक दो क्लास में संकोच लगा। पढ़ाने वाला पढ़ाता और पढ़ने वाले चुपचाप सुन लेते। फिर धीरे-धीरे क्रॉस क्वेश्चन होने लगे। जब क्रॉस क्वेश्चन होने लगे तो जवाब भी देना पड़ता। और इस तरह से हम दोनों और अच्छे से तैयारी करके आने लगे। मन में डर रहता था कि पता नहीं कल कौन क्या पूछ ले! फिर एक हफ्ते में ही हमारे मन में विश्वास हो गया कि जब हम आपस में ही एक दूसरे को पढ़ा सकते हैं, तो अपनी और जूनियर क्लास को तो पढ़ा ही लेगे। जो लोग हमें सर जी, मैडम जी कहकर चिढ़ाते थे धीरे-धीरे वे सभी हमारी क्लास में आने लगे। पीछे वाला कच्चा घर क्लास में तब्दील हो गया।
    जब हम बच्चों में खुद ही पढ़ने की रुचि जागृति हो गई तो टीचर्स ने भी लपरवाही करना छोड़ दिया। वे सभी मन लगाकर पढ़ाते और हम लोग भी सभी मन लगाकर पढ़ते। सत्य भैया को भी जब समय मिलता तो हमे फिजिक्स और केमेस्ट्री पढ़ा देते। इस तरह हम सभी का रिजल्ट बहुत ही अच्छा आया था। 
    उन्होंने अगला प्रयास स्कूल की लाइब्रेरी के सुधार करना था। ब्लॉक से लेकर जिले तक के एजुकेशन ऑफिसर्स से बात की। बजट इश्यू करवाया और आधुनिक किताबें लाइब्रेरी के लिए आईं। 
   जिन बारह स्टूडेंट्स से उन्होंने शुरुआत की उन्हें एक दिन पिकनिक मनाने के लिए नदी तीर के बस्ती ले गई। वह तो बाद में समझ में आया कि पिकनिक एक बहाना था। वास्तव में वो हमें उन बस्ती वालों के रहन-सहन, उनकी गरीबी, उनकी अशिक्षा दिखाना चहती थी। हम बस्ती के मुखिया से मिले और पूरी बस्ती घूम कर देखी। लौटते समय उन्होंने कहा "काश ! मैं इनके लिए कुछ कर पाती..." 
    फिर हम लोगों की तरफ देखते हुए पूछा, "मैं अकेले तो नहीं... लेकिन हम साथ मिलकर कुछ कर सकते हैं क्या...?"
   तब मैने पूछा था, "हम क्या कर सकते हैं दीदी ...?"
   उन्होंने शांत मन से कहा था, "तुम लोग खुद ही सोच कर बताना..."
    और फिर अगले दो दिनों तक हम 12 लोगों ने एक वर्क प्लान तैयार किया। बस्ती को साफ सुथरा करना ताकि बीमारी कम से कम हो। छोटे बच्चों का अधिक से अधिक स्कूल में एडमिशन और तीसरा बड़े बुजुर्गों को अच्छी जीवन शैली के लिए प्रेरित करना। और हमारे इस वर्क प्लान में उन्होंने एक चीज और जोड़ दी, एक साल के अंदर-अंदर ही बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र और प्राइमरी स्कूल की स्थापना। 
   "तो क्या आंगनबाड़ी केंद्र और प्राइमरी स्कूल की स्थापना हुई ...", मैंने जिज्ञासा से पूछा था। 
   "हां बिल्कुल सर ... उसी साल 15 अगस्त को स्कूल कार्यक्रम के दौरान उनका परिचय विधायक जी से हुआ। उनके भाषण को सुन कर वे काफी प्रभावित हुए। उन्होंने हमारी बहुत मदद की और आज भी करने को तैयार हैं। लेकिन उनके न रहने पर सब कुछ बिखर गया। अब कोई उन जैसा आगे आने के लिए तैयार ही नहीं है।
   "क्यूं ... तुम लोग तो हो न ..?"
    "हा सर हम लोग तो हैं... फिर भी सर... हम लोगों की खुद की भी एजुकेशन है... घर वाले भी कहां तैयार होंगे...?"
   "बिल्कुल नहीं होंगे ... लेकिन तुम बारह लोगों में से और सभी कहां हैं...?"
   "कहां होंगे सर... सब इसी कॉलेज में है, कोई मैथ्स सेक्शन में, कोई बायो, कोई आर्ट, तो कोई कॉमर्स में... मिलना चाहेंगे..."
  "हां जरूर... लेकिन यहां नहीं... वहीं अपने घर-गांव में... उन सभी से मेरा एक संदेश कहना... गुरु दक्षिणा देने का समय आ गया है। ग्यारह तारीख को पीहू की पुण्यतिथि है ... सभी 11 तारीख से 12 तक कॉलेज से छुट्टी ले ले। 10 को संडे है... दस को सुबह पीहू की उसी क्लास रूम में मैं आप सभी का इंतजार करूंगा... जहां से इस सफर की शुरुआत हुई थी..."
    फिर हम लोग लगभग 6 बजे तक वापस आ आए। मैं खाट में लेट गया। कमली ने बताया कि सत्य भैया आए थे। कह कर गए हैं कि आप यहीं रुकियेगा वह आज फैक्ट्री में ओवर ड्यूटी करेंगे, कल सुबह आयेंगे।"
     मंगल को मैंने एक बॉटल जो लगभग आधी बची थी निकाल के देते हुए कहा, "आज तुमने काफी भाग दौड़ की है, थके होंगे थोड़ी-सी ले लो..." 
   "आप नहीं लेंगे...", मंगल ने पूछा।
   "चलो ठीक है बना लो... कमली से भी पूछ लेना चिंता मत करना और भी होगी। ज्ञान की शादी का माहौल था न... उसने डाली दी होंगी...", फिर मैं आंख बंद करके खाट पर लेट गया, मंगल अपने काम में जुट गया।
    थोड़ी देर बाद उसने कहा, "सर जी अब आगे किया किया जाए..."
   "तुम्हारे भैया जी तो आज आयेंगे नहीं, बिना उनसे पूछे क्या कर सकते हैं ? पर एक बात बताओ मंगल जैसा कि तुमने कहा है कि भैया जी दिल से चाहते हैं कि पीहू के अधूरे काम को और आंखें बढ़ाया जाए तो एक तरह से उन्हें तो कोई एतराज होगा नहीं ? हां पैसे-दाम शुरू में खर्च तो होंगे, वह सब कहां से होगा ?"
    "वह सब भैया जी देख लेंगे आप चिंता न कीजिए। हर साल खेती-बाड़ी का इतना पैसा इकट्ठा होता है, सब अकाउंट में जमा है, तो फिर भला उन्हें क्या एतराज होगा...?"
   "चलो मान लिया यह तो पीहू के ही हैं तो सत्य को कोई एतराज नहीं होगा, लेकिन ध्रुव भैया को तो हो सकता है न...", मैंने शंका जाहिर की। 
   "तो आप ऐसा क्यों नहीं करते हैं, ध्रुव भैया का नंबर मेरे पास है, आप थोड़ा-सा उनसे बात कर लीजिए... चलिए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, गांव चलते हैं। वहां एक बनिया प्राइवेट टेलीफोन बूथ चलता है...", मंगल अपनी गिलास खत्म करते हुए बोला।
  मैंने अपनी सहमति जताते हुए कहा, "हां मंगल यह तुम ठीक रहते हो, चलो चलते हैं..."
   उस शाम मैंने पहली बार ध्रुव भैया से बात की थी। चकित कर देने वाले कुछ तथ्य मेरे सामने आए। उन्होंने बताया की पीहू ने मरने से कुछ ही दिन पहले  उन्हें फोन कर बताया था कि एक न एक दिन मेरा फोन उन्हें आएगा। उसने अपने प्रेम को ध्रुव भैया से स्वीकार भी किया था। फिर एकदिन उसने ही खबर दी कि उसने सत्य से शादी कर ली। भाई को बहन के लिए फोन पर पागलों की तरह रोते हुए सुना। उन्होंने बताया कि उनके और सत्य के नाम से बैंक में जॉइंट अकाउंट है, लेकिन पैसा दोनों में से कोई भी विड्रॉ कर सकता है, वह सत्य से बात कर लेंगे। यदि वह इस वक्त जर्मनी में न होते तो खुद भी आते। लेकिन उन्होंने मुझे एक-एक चीज समझाई, कैसे क्या किया जा सकता है। वे रोते हुए बोले, मुझे यह जानकर बेहद खुशी हो रही है कि तुम मेरी बहन की सोच को उसकी विचारधारा को आगे ले जाना चाहते हो। तुम शुरुआत करो, जब मैं इंडिया में सेटल हो जाऊंगा तो उसके अधूरे काम को फिर मैं आगे बढ़ाऊंगा। जब उनकी बातें मंगल को मैंने बताई तो उसे आत्मबल मिला, "तो फिर शुरू करते हैं सर जो होगा देख लगे  यदि ध्रुव भैया हमारे साथ हैं, तो समझिए काम होगा..."
    दूसरी सुबह सत्य स्वयं हम लोगों से बगिया में मिलने आया उसने बताया कि ध्रुव भैया का कल फोन आया था वह भी वही चाहते हैं जो हम लोग चाहते हैं... 
    मैंने उससे सारी बातें बताई। पूरी बातें सुन लेने के बाद उसने कहा, "चाहता तो मैं भी हूँ कि उसने जो शुरुआत की वह आगे बढ़े... चलो ठीक है तुम हो तो कोई प्लान बनाते हैं... देखते हैं क्या होता है... वैसे तुम यहां कितना रुक सकते हो ..?"
   "मैं खुद नहीं जानता... लेकिन हां, पीहू की टीम जबरदस्त है। बस उसे एक स्टार्टअप देने की जरूरत है। गाइडेंस के लिए तुम साथ में रहोगे ही। ... उन सभी की एजुकेशन कॉलेज की है, तो जाहिर है वह अधिक समय यहां के लिए नहीं दे पाएंगे। हमें उनके सहयोग से एक और टीम बनानी पड़ेगी... ऐसे लोगों को सेलेक्ट करना पड़ेगा जो यहां रहकर काम कर सकते हैं, और उन लोग को ऐसे काम देने होंगे जो वे वहां रहकर कर सके। इसी संडे को उन्हें बुलाया है, तब तक हम दोनों कुछ सोच कर रखते हैं। फिर डिस्कशन करेंगे। मुझे विश्वास है कि एक अच्छा रास्ता निकलकर सामने आएगा। तुम चाहो तो फैक्ट्री के मैनेजमेंट से भी बात कर सकते हो। आर्थिक रूप से शायद वह भी मदद करने के लिए तैयार हो जाए। क्योंकि तुम तो जानते ही हो सरकारी मदद में कितना टाइम लगता है..."
   सत्य कुछ सोचते हुए बोला, "हूँ... सही कहते हो... मैं बात करूंगा... मैं और गांव के अन्य सभी लोग जो जिस लायक होंगे मदद करेंगे..."
   "पीहू की पुण्यतिथि 11 को है न... हम इसकी शुरुआत उसी दिन से करेंगे... उसी नदी के तीर से... उस दिन गांव के सभी प्रमुख लोगों को वहीं आमंत्रित करेंगे... खाने-पीने की सारी व्यवस्था वहीं होगी..."
   "लेकिन सामान ले-जाने ले-आने में काफी दिक्कत होगी यार... हम वही कार्यक्रम यहां भी तो कर सकते हैं..."
   "हां बिल्कुल कर सकते हैं। कल रात मुझसे मंगल ने पूछा था कि पीहू ने अपने अंतिम संस्कार की इच्छा नदी तीर की बस्ती के पास ही क्यों जाहिर की होगी...? क्या कभी तुमने सोचा है ...? मैं तुम्हें बताता हूँ। वह जानती थी कि उसका काम अभी अधूरा है। यदि वह किसी भी निशानी के तौर पर वहां रहेगी तो हम सभी को वह स्थान याद रहेगा, हम वहां के लिए कुछ न कुछ करेंगे। इस तरह उसने इनडायरेक्टली अपने अधूरे काम को पूरा करने का एक नजरिया छोड़ा है। उसने हम सभी से कहा है कि देखो मेरी तरफ, जब भी देखोगे तो तुम्हें मेरे साथ यह बस्ती भी दिखाई देगी... यहां के लोग भी दिखाई देंगे..."
    सत्य ने आश्चर्य से कहा, "ओह !! उसने हम सभी को उस स्थान से जोड़कर रखने के लिए यह इच्छा जाहिर की !!! ... अब मैं बिल्कुल समझ गया, तो फिर ऐसा ही होगा। गांव में कुछ लोगों के पास ट्रैक्टर-ट्राली है। एक दिन के लिए हायर कर लेंगे... सब समान कस्बे से आ जाएगा और हलवाई का काम तो यहीं गांव के तीन चार लोग करते ही हैं... मैं उनसे भी बात कर लूंगा...
    "वो सब मैं मंगल के साथ देख लूंगा... तुम कल कस्बे के टेंट हाउस में ऑर्डर बुक कर देना।  किराना और टेंट हाउस का समान दस को दोपहर तक बस्ती पहुंच जाए ... कल मैं मंगल के साथ बस्ती जाऊंगा। और एक बात .... तुम अपने मैनेजमेंट से बात कर उन्हें भी आने के लिए कहो... और ध्यान रखना इस बीच उनसे किसी भी डोनेशन का जिक्र मत करना... वो सब बाद में... वो सब अपने आप उसी दिन हो जाएगा..."
     सत्य ने हंसते हुए मुझसे पूछा, "क्या बात है, कोई लंबा प्लान सोच के रखा है क्या ?"
     "देखते हैं यार, यदि सभी कुछ जैसा सोचा है हो गया तो परिणाम अच्छा होगा... मैं जानता हूं सत्य कि किसी के गम में खुद को तबाह कर लेना, मर जाना आसान होता है, लेकिन उसके किसी अधूरे ख्वाब को पूरा करना मुश्किल होता है। मैं नहीं जानता कि हम दोनों कितना सफल होंगे लेकिन जितना भी होंगे न, खुद के मन को शांति देगा...", मैंने भी उसी तरह मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
   "लेकिन आज क्या किया जाए", उसने पूछा।
   तभी मंगल बोला, "कमली खाना बना रही है भैया जी, बस कुछ देर में बनकर तैयार हो जाएगा आप आराम से खाना खाईये फिर कुछ आराम कर लीजिए। तीन बजे तक को गांव चलते हैं, कुछ लोगों से मिलेंगे उनसे भी अपनी बात कहेंगे देखते हैं उनका क्या विचार है..."
    मैं भी अपनी सहमति देते हुए कहा, "हां सच मंगल ठीक कह रहा है। तुम अभी खाना खाओ और तीन-चार घंटे तक सो लो... कल से ड्यूटी कर रहे हो थक गए होंगे... अब आज की ड्यूटी कितने बजे से है ?"
     सत्य कुछ निराशा भरे स्वर में बोला, "कुछ स्टाफ छुट्टी में है... इसलिए फिलहाल छुट्टी भी तो नहीं मिल पा रही है... सुबह दस से शाम छः बजे तक.."
    मैंने उसे समझाते हुए कहा, "कोई बात नहीं हम लोग इधर का देख लेंगे। तुम बस टाइम निकालकर टेंट हाउस के सामान देख लेना वह 10 को दोपहर तक पहुंच जाएं..."
   "तुम चिंता मत करो वो मैं देख लूंगा..."
    फिर जैसा तय हुआ था पूरा दिन वैसा ही गुजरा। सात तारीख को मैं मंगल के साथ नदी तीर की आदिवासी बस्ती में गया। मंगल ने सही बताया था। पूरी बस्ती नीट एंड क्लीन। सलीके से एक क्यू में बने हुए घर और लगभग प्रत्येक घर के सामने फल-फूल के पौधे। प्राइमरी स्कूल और उसके पास ही आंगनबाड़ी केंद्र। सुरक्षा की दृष्टि से पूरी बस्ती को चारों तरफ से तार की बाड़ी से सुरक्षित किया गया था।
     बस्ती के मुखिया के घर में ही हमारी मुलाकात सभी प्रमुख लोगों से हुए। होने वाले प्रोगाम के बारे में जानकर उनमें प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पीहू उनके दिल-ओ- दिमाग में एक सोच बनकर अभी भी जीवित थी। बस उसे फिर से एक गति देने की आवश्यकता थी। मैं लगभग सभी उम्र के लोगों से मिला। यह भी पता चला कि उसे आदिवासी बस्ती से चार लड़के कॉलेज पढ़ने के लिए गए हुए हैं।
    शाम को चार बजे हम उस स्थान पर भी पहुंचे जहां पर पीहू की समाधि बनाई गई थी। बस्ती से लगभग आधे किलोमीटर दूर यह वही नदी के किनारे का स्थान था जिसके कुछ दूर पर वह घाट था जहां मैं पहली बार पीहू क साथ घाट के पत्थर में बैठा था। जिंदगी को जी लेने की मन में आंड में चाहत लेकर मैंने उसकी आंखों में झांका था। दो जाम से कुछ घूट एक ही प्याले में पिये थे। सैंडविच, अमरूद का स्वाद तीखी चटनी के साथ लिया था। इस घाट से कुछ ऊंचाई पर अब उसकी समाधि थी।
    पीहू उनके लिए कोई सामान्य लड़की नहीं रह गई थी। वह एक ऐसी देवी के रूप में उनके मन में स्थापित हो चुकी थी जिसका जन्म उनके बेहतर भविष्य के लिए हुआ था, और जो सदैव के लिए उन्हीं के पास रह गई। समाधि का निर्माण नदी से निकले हुए उन्हीं रंग-बिरंगे पत्थरों से ही हुआ था। चारों तरफ तार की बाड़ी और पेड़ पौधे भी लगे हुए थे। 
     उन सभी के मन के भाव देखकर एक पल के लिए मैं भी भूल गया कि पीहू एक इंसान थी। मेरे हृदय में उसके लिए अथाह श्रद्धा के भाव जागे। मैं उसकी समाधि के सामने घुटने के बल बैठ गया। उसे पुष्प अर्पित करते हुए मेरी आंखें भीग गई। मैने मुश्किल से अपने मन को नियंत्रित कर मुखिया से कहा, "यदि हम एकजुट हो कर एकसाथ प्रगति के मार्ग पर चले तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी..."
    वहां से लौटते समय मेरे कदम इस घाट की तरफ बढ़े मंगल ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया था, "आज नहीं सर जी फिर कभी बीच में 2 किलोमीटर जंगली रास्ता है, लौटने में आज देर हो जाएगी, और फिर हम बाइक पर हैं। जब हम वापस लौटे तो शाम को पांच बज चुके थे। मन कुछ उदास था। मैं पीहू की डायरी ले कर उसी आम के पेड़ के नीचे चटाई में बैठा था। कभी डूबते हुए सूरज को देखता, तो कभी उसकी डायरी में लिखे शब्दों को पढ़ता। यह वही स्थान है जहां पर मैंने पीहू के साथ अनगिनत सुखद पल जिये थे। अपनी फिलिंग्स एक दूसरे के साथ शेयर की थी। एक ही साथ इस डूबते हुए सूरज को देखा था। यहीं पर उसने लेडी नर्टन की पोयम और आदिवासी लोकगीत अपनी सुरीली आवाज में मुझे सुनाए थे। अब वे पल वे लम्हे गुजर चुके थे... लेकिन उनकी यादें अभी भी इस मन में हैं। मैं जानता हूँ उन लम्हों को मैं कितना भी याद करूं अब लौट कर मेरे जीवन में नहीं आएंगे और बस यही सोचकर मैं उदास था। मुझे कुछ उदास बैठा देखकर कमली मेरे पास आई, "अरे सर जी यह तो पीहू बिटिया की डायरी है ?"
    "हां, जब सत्य उसे छोड़ कर गया था तो उसके लिए उसने एक कविता लिखी थी, वही पढ़ रहा था। बहुत अच्छी लिखी है..."
    "नहीं सर जी, उन्हें तो इस डायरी में आपके जाने के कुछ दिनों बाद लिखते हुए देखा था... मुझे नहीं लगता कि भइया जी के जाने के बाद उन्होंने कुछ इसमें लिखा होगा..."
    मैं कमली की बात बीच में ही काटते हुए कहा, "नहीं कमली, तुम्हें धोखा हो रहा है..."
    कमली ने मेरे हाथ से डायरी ले कर उस पेज को ध्यान से देखते हुए कहा, "नहीं सर जी... मुझे कोई धोखा नहीं हो रहा है... मुझे अच्छे से याद है... यह उन्होंने आपके जाने के चार-पांच दिन बाद लिखा था... हां सर जी ! आप के जाने के बाद उनकी तबियत तीन चार दिन तक ठीक नहीं रही। घर से बाहर ही नहीं निकली... बस अटारी में पड़ी रहती। एक दिन शाम के वक्त इस बगिया में आई, और इसी पेड़ के नीचे बैठकर इसी डायरी में कुछ देर तक लिखती रहीं थीं। मैं पंप हाउस के पास ही खेत में काम कर रही थी। फिर वह अपनी डायरी में चेहरा छुपा के रोने लगी। मैं भाग कर उनके पास आई। उन्हें चुप कराया लेकिन तब भी उनके आंसू बहते जा रहे थे, और यह डायरी उनकी गोद में थी। उनके आंसुओं से अक्षर धूल गए थे... ये देखिए, आप खुद देख लीजिए।  मैंने खुद डायरी से उनके आंसू पोछे थे। मुझे अच्छी तरह से याद है, डायरी का वह यही पन्ना है..." 
    जब मैंने गौर से देखा तो मुझे कमली की बात सही प्रतीत हुई। कविता लिखने के लिए निब पेन का उपयोग किया गया था… पानी की बूंद से कुछ अक्षर फैल गए थे। तो क्या यह कविता पीयू ने सत्य के लिए नहीं मेरे लिए लिखी थी ! .... मुझे याद करते हुई लिखी थी !! ... और लिखते समय जो आंसू उसकी आंखों से बहे... वो मेरे लिए थे !!! ... उफ़ !!"
     इसी पेड़ के नीचे आज से लगभग पाँच वर्ष पूर्व ऐसी ही एक ढलती हुई शाम में मैने पीहू से पूछा था, "ये आध्यात्मिक प्रेम क्या होता है ?"
     उसने जो जवाब दिया वो आज कमली की बात को प्रमाणित कर रहा था।
   "एक ऐसा प्रेम जो फूल से नहीं उसकी खुशबू से होता है... जो सूरज से नहीं उसकी गर्मी से होता है... जो चंद्रमा से नहीं उसकी शीतलता से होता है... अर्थात जो व्यक्तिपरक नहीं सार्वभौमिक है ... यानी कि ऐसा प्रेम जो होने के कारण से नहीं, बल्कि होने से होता है ..."
    और शायद इसीलिए मेरे लाख दूर होने पर भी मेरा प्रेम उसके हृदय में जीवित रहा... हर पल धड़कन बन धड़कता रहा...
   अर्थात इस प्रेम में फिजिक्स, केमिस्ट्री, सोशियोलॉजी, फिलासफी, साइकोलॉजी जैसे शब्द नहीं होती, सिर्फ इमोशन होते थे।
   कमली फिर से बोली आपको विश्वास नहीं होता न ? तो आप पढ़ कर सुनाइए, क्योंकि उन्होंने कुछ लाइन रोते हुए पढ़कर मुझे सुनाई थी... आप सुनाएंगे तो याद आ जाएंगी... 
     और जब मैने शुरू की तीन लाइन पढ़ी तो झट से बोल उठी, "... अब कोई भरम नहीं है सर जी !.. ये ... ये ... वही कविता... जो उन्होंने आपको याद करते हुए लिखी थी...", कहते-कहते कमली भावुक हो गई।
   आज मैं उसी आम के पेड़ के नीचे उसी जगह पर बैठा था, जहां पर पहली बार उसने मुझे गले से लगाया था, मेरे कंधे में सर रख रोई थी... यह वही जगह है जहां मैं इस भ्रम से बाहर आया था कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। उसे अपनी बाहों में समेट मैं भी रोया था ... अपने हृदय की सभी बाते कही थी... वह मेरे पैरों को तकिया समझ निश्चित सोई थी... मेरे जाने के बाद न जाने कितनी शामें मुझे याद करते हुए उसने गुजारी होंगी और अपने जीवन की पहली और आखरी कविता लिख कलम मेरे लिए छोड़ दी होगी..."
     पीहू ! अर्थात एक पपीहे की पुकार जो अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र के लिए होती है। एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, समझदार, सुसंस्कृत लड़की का नाम था पीहू। जो अपने जीवन के अंतिम समय में अपने नाम के अनुरूप ही एक पुकार बनकर रह गई। अपने दर्द को बांटने के लिए मुझे पुकारती रही और एक दिन उसकी पुकार इन फिजाओं में खो के रह गई। ... पीहू ! पीहू !! पीहू !!! और एक दिन अपने जीवन की सभी आशाओं का परित्याग कर अपने परिवार से जा मिली। शायद यही उसकी नियति थी...
     ये सब सोचते हुए मेरी आँखें भरने लगी और फिर अचानक अपना चेहरा डायरी पर रख भभक के रो पड़ा जैसे कभी पीहू रोई होगी। आज उसके आंसुओं की प्यास मेरे आंसुओं से बुझ रही थी। उसके जीवन का स्वाति नक्षत्र उसके मरने के बाद आया...?
    कमली ने कहा, "उस दिन तो उन्होंने पूरा नहीं सुनाया था, अब आज... आप ही सुना दीजिए.. बिटिया ने क्या लिखा... हम लोग भी तो सुन ले.."
   मंगल भी मेरे पास आ बैठा, उसने भी कहा, "हां सर जी ! ... भइया जी ने तो बहुत बार पढ़ा होगा.. यदि आप पढ़ेंगे तो उनकी भी आत्मा को शांति मिलेगी...
    "कि काश मंगल... मुझे देवताओं से बिना मांगे त्याग का वरदान न मिला होता... मैं उसे छोड़ कर न गया होता...", ये कहते हुए मै चीख-चीख के रो रहा था, "मैं आज तक एक निरर्थक जिंदगी ही तो जी रहा हूँ... उसकी जगह मुझे मौत क्यूं न आई ... मैं क्यूं न मर गया... लेकिन  ये बात तुम दोनों कभी भी भईया जी से मत बताना... उनका ये भ्रम न टूटे तो अच्छा होगा..."
    मैं रोता जा रहा था। मंगल मुझे अपने अंक में समेटे चुप कराने की कोशिश में लगा था... 
   "मंगल मैने तो तुम्हे अपना एड्रेस दिया था न ? जब भैया जी यहां से चले गए...  और वह रोती रह गई... तड़पती रह गई... तो तुमने मुझे लेटर क्यों न लिखा ? मैं तो तुमसे कह कर गया था न...  उसका ध्यान रखना ? तो क्यों ध्यान नहीं रखा तुमने...? जब कभी मैं टूटा, बिखरा... तो उसने मुझे संभाला... और जब वह खुद टूटी-बिखरी तो...? उसे दिलासा देने वाला भी कोई उसके पास न था !! जान लो मंगल मुझसे अपराध हुआ... तुमसे अपराध हुआ... हम दोनों हमेशा उसके गुनहगार रहेंगे... "
    मंगल रोते हुए बोला, "जिस हिसाब-किताब की कॉपी में अपने एड्रेस लिखा था, एक दिन वह उनके हाथ लग गई और उन्होंने वह पन्ना फाड़ अपने पास रख लिया था। एक दिन इसी जगह पर जब वह रो रही थी तो मैंने उनसे कहा था कि सर जी कह कर गए हैं कि मंगल तुम मुझे पत्र लिखना। उन्होंने कहा था कि...  दो साल गुजर गए मंगल चाचा !  तुम्हारे सर जी ने एक बार भी हम लोगों की सुध न ली ! ... आने की बात तो दूर एक लेटर तक न लिखा ! ... उन्हें तो पता मालूम था न...? वही  लिख लेते... वैसे भी शायद उनकी शादी हो गई होगी... उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए..."
    "मंगल एक तो मेरी शादी अभी भी नहीं हुई है... और दूसरी कि यदि हो भी गई होती तब भी मैं आता... मैं उसके लिए आता और सत्य का पता लगाता ... लेकिन नियति के हाथों मुझे उसका गुनहगार बनना लिखा था तो ये सब कैसे हो जाता... ? सीप टूट के बिखर गई मंगल, लेकिन उससे जो मोती निकला, उसकी चमक ने मेरे जीवन को उजालों से भर दिया... मुझे वह बना दिया जो मैं कभी न बन पाता। उसने मेरी कलम मुझे वापस कर दी... और कह गई, लिखो हम सब की कहानी  ... "कहानी नियति की"।
     यह मुझ पर कर्ज है उसका और जान लो मंगल मुझे उसका यह कर्ज एक न एक में दिन चुकाना होगा... इसके बगैर मुझे मुक्ति नहीं मलेगी।
    कभी उसने कहा था, "... किसने किससे मोहब्बत की मैं नहीं जानती ! लेकिन तुम्हारी एक बात मुझे बहुत ही खूबसूरत लगी कि तुम स्वीकार करते हो... इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए, यह हर कोई नहीं कर पाता है... और एक एग्जांपल तो तुम्हारे सामने ही है... एकदिन लिखूंगी, अपने दिल की सारी बातें लिखूंगी। लेकिन अपनी कहानी नहीं लिखूंगी... वह तुम पर उधार रही... चाहे इस जन्म में लिखना... चाहे दूसरे... मैं इंतजार करूंगी...", 
       तो फिर ठीक है पीहू ! यही सही, अपनी पूरी ईमानदारी और संजीदगी के साथ लिखूंगा। तुम्हारी, सत्य की और अपनी भी सारी कही-अनकही संवेदनाओं के साथ लिखूंगा। मंगल और कमली के निःस्वार्थ सेवा भाव और ज्ञान के मित्रता के प्रति समर्पित भावनाओं को उजागर करते हुए लिखूंगा। और उस दौर में लिखूंगा पीहू... जब ये कहानी लोगों को अवास्तविक महसूस होगी। लोगों को यकीन कर पाना मुश्किल होगा कि ऐसी मोहब्बत थी, ऐसे लोग थे, जिन्होंने इस तरह का जीवन जिया था... ये कहानी उनकी जिंदगी से हो कर गुजरी थी..."
      पीहू यदि तुमने अपनी कविता में अपने हृदय की बाते लिख दी, तो तुम्हारे कहे अनुसार तुम्हारा काम खत्म हुआ, अब बारी मेरी है। मैं तुम्हें अजनबी नहीं बनने दूंगा... अजनबी बन जाने के दर्द को मैं जानता हूँ... और शायद इसीलिए मेरे अंदर अब यह हिम्मत आ चुकी है कि मैं लिख सकूं "किसी को भूलने या न भूलने से परे इस जीवन का एक और सच है, कोई जरूरी नहीं कि जीवन में प्यार एक ही बार हो..."
   अपनी ही कही बात को साबित करने का भी समय आ चुका है, "मानवीय संवेदनाओं से परे यदि कोई दुनिया होती है तो वह दुनिया देवताओं की है, और ईश्वर साक्षी है कि हम देवता नहीं..."
      "कमली ! तुम जाओ, मड़ैया में बिस्तर लगा दो, भइया जी भी आते होंगे। खाना तुम यहीं बना लेना, मै मंगल के साथ ही रुकूंगा..."
   जब कमली चली गई तो मैने मंगल से कहा, "मंगल! जो सोचा वो होगा न, मेरा मतलब गांववाले और बस्तीवाले मदद करेंगे न ?"
   "सबका तो पता नहीं सर जी लेकिन जितने लोगों से मिले हैं, वे जरूर साथ देंगे..", वह विश्वास के साथ बोला। 
   "तो चलो ! मड़ैया में चलते हैं...", मैं उठते हुए बोला।मैं मड़ैया के अंदर बिछी चरपाई पर बैठ गया। मंगल ने कल की दी हुई बॉटल सामने रखते हुए कहा, "मैं आता हूँ..."
    जब वह वापस आया तो इसके हाथ में दो कुल्हड़ और प्लेट में सलाद और नमकीन थी, "तुमने कल नहीं पी.…"
  "नहीं सर जी, अकेले मन नहीं किया था...", उसने एक लार्ज लेने के बाद कहा, "सर जी ! मैं घर जा रहा हूँ... देखता हूं भैया जी आए कि नहीं... और फिर गाय बछड़ों को भी थोड़ा देखना है..."
   मैंने पीछे से कहा, "सत्य को साथ लेते आना..."
उसके जाने के बाद मैंने कमली को पुकारा, "कमली ! क्या मैं कोई हेल्प करूं..."
   कमली पास आते हुए बोली। "नहीं सर जी, चार लोगों के लिए खाना बनाने में कैसी हेल्प, रुकिए मैं सब्जी ले कर आती हूँ, आपके पास ही बैठ कर काट लूंगी..."
   मैने उसके लिए कुल्हड़ में बनाया और खुद अपने लिए गिलास में। मैं खाट में उसी जगह में बैठा था जहां कभी पीहू ने अर्ध-चेतन अवस्था में मुझे सत्य समझ कर पहली बार अपने दिल की बातें बताई थी। बेखुदी में अपनी दोनों बाहें फैलाते हुए कहा था, "सत्य वह बहुत अच्छा इंसान है... तुम्हारी पीहू उसे बहुत... बहुत... पसंद करती है..."
   पिजड़े में बंद कबूतर की तरह मेरी यादों की बेचनियां फड़फड़ती रही, जिन्हें छुपाने के लिए मैं कभी मटर की कुछ फलियां उठा लेता छीलता और उसके कुछ दाने मुंह में डाल लेता... तो कभी पुरानी कोई बात कमली से छेड़ देता, तो कभी प्याला उठाकर एक शिप ले लेता....

मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी, 
फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे,
जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे,
उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने।

   कुछ देर बाद सत्य और मंगल भी आ गए। खाना बना, सभी ने खाया। सत्य ने मुझसे घर चलने के लिए कहा। चलते हुए मैने मंगल से कहा, "कल सुबह आ जाना... और हां बैग दे दो... सुबह कपड़े चाहिए होंगे..."
     "आप भईया जी के साथ गेट तक चलिए... मैं ले कर आता हूँ...", मंगल बर्तन समेटते हुए बोला।
     मैं सत्य के साथ घर पहुंचा। मैंने उससे अपनी इच्छा जाहिर की, "तुम कह रहे थे कि पीहू ने मेरे लिए किताबें छांट के रखी हैं... वही अटारी में है क्या ?"
    "हां ... "
     "तो फिर पहले वहीं चलो ... मैं उन्हें देखना चाहता हूं ..."
     सत्य ने कोई विरोध नहीं किया। अटारी की सीढ़ी चढ़ते समय उसके कदम कांप से रहे थे, "तुम आओ मैं बल्ब जलाता हूं..."
    पूरी अटारी रोशनी से भर गई। जब मैं अटारी पर पहुंचा तो सत्य को अलमारी के सामने खड़ा पाया। उसमें ढेर सारी किताबें रखी हुई थी। मैं सत्य के पास जाकर खड़ा हो गया। 
   "ये रहीं, इस तरफ वाली...", मेरे बैग को अलमारी के सबसे निचले रैक में रखते हुए कहा।
   मैंने एक-एक किताबों को उठाकर देखा। कुछ अंग्रेजी और बाकी सभी हिंदी साहित्य की उच्च श्रेणी की किताबें थी। कुछ स्टोरी बुक, कुछ उपन्यास, कुछ आत्मकथा, कुछ यात्रा वृतांत। जब मैं किताबें देख रहा था तो सत्य बिस्तर को झटक के उसे साफ-सुथारे ढंग से बिछाने में व्यस्त था। 
    "आओ ... बैठी ...", बिस्तर बिछा लेने के बाद उसने मुझे बुलाया।
     मैं बिस्तर पर आकर बैठ गया और वह मेरे सामने कुर्सी में। मैं उससे पूछना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन इस वक्त पूछना मुझे मुनासिब नहीं लगा। मैं खामोशी से उसकी तरफ देखता रहा। अचानक उसकी आंखें भर आई।
  मैने उसके हाथ में अपना हाथ रख दिलासा देते हुए कहा, "ये क्या सत्य... नहीं... रोते नहीं... उसकी आत्मा को तकलीफ होगी... तुम्हारे पास तो उसकी सुखद यादें हैं। उन्हें ही याद करके मुस्कुराओ..."
   वह अचानक कुर्सी से उठा और घुटने के बाल मेरे सामने बैठ गया। मेरी गोद में अपना सर रखकर रोते हुए उसने मुझसे एक सवाल किया, "मिलन की वो सुखद यादें ... क्यूं बिछोह के दिनों में... अक्सर तन्हाइयों में हमें रुलाती हैं...?"
     उसकी यह दशा देखकर मेरी भी आंखों में नमी आ गई, "तुम सच कहते हो, इसका जवाब मैं भी बहुत वर्षों से खोजने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन आज तक कामयाब नहीं हुआ। मेरे ख्याल से शायद इसलिए कि अब हमें पता होता है कि वो पल, वो लम्हे हमारी जिंदगी में दोबारा कभी नहीं आएंगे। उसी का दर्द... उसी की टीस हमें रुलाती है.…"
    वह रोते हुए मुझसे कह रहा था, "मैं दो माह तक उससे दूर रहा... जब मंगल के साथ पहुंचा तो घर के सभी दरवाजे अंदर से बंद थे। हमने बहुत आवाज दी लेकिन जब किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो मंगल सामने की बाउंड्री लांघ कर आंगन में पहुंचा और अंदर से दरवाजा खोला... अंदर के दोनों बेडरूम बाहर से बंद थे... हम दोनों पीहू की तलाश करते हुए इसी अटारी में आए। सीढ़ी के बीच पायदान पर जब पहुंचा तो सामने...."
    वह फिर रो पड़ा। कुछ देर रो लेने के बाद उसने आगे कहना शुरू किया, "मैं अवाक, आश्चर्यचकित-सा, मन में एकसाथ कई प्रश्न लिए यह सब कब, कैसे और क्यूं हो गया ? खिड़की से कुछ हटकर पड़ी इसी चारपाई पर उसका शरीर पड़ा था। चेहरा ठीक सीढ़ियों की तरफ था, आंखें खुली हुई। मुझे एक अलग ही अंदाज से देखती हुई, किंतु निस्तेज। यहां पर उसके शरीर की खुशबू नहीं थी, थी तो पूरी अटारी में मुर्दा जिस्म से उठती हल्की-हल्की दुर्गंध... उसके बालों की उलझन, वो दुर्गंध जो मुझसे कह रही थी भाग जाओ यहां से, नहीं ठहर पाओगे तुम यहां पर... मुख से निकलते वाला खून, उसके कंधे और बिस्तर में जम गया था... बहुत ही भीभ्तस दृश्य...
     लेकिन उसकी आंखें ? वह तो मुझे अपने पास बुला रही थी। कहां भाग कर जाओगे ? देखो मुझे !!! जीवन का यह दूसरा पहलू। जिसे तुमने कभी अपनी बाहों में समेटा, जिसे तुमने चूमा, जिसकी सुंदरता के तुमने न जाने कितनी तारीफे की, जिन होठों से फूल झरते थे, जिस बदन से कभी तुम्हें चंदन-सी खुशबू आती थी।  जिसके बालों में तुमने अपनी उंगलियां घुमाई... हां जिस शरीर के उन्माद में तुम कभी पानी की तरह बहे थे, मैं वही हूँ..."
   पूरी बात कहते-कहते उसकी सांस फूलने लगी। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने आगे कहा, "पोस्टमार्टम के बाद डॉक्टर ने मुझे बताया कि उसकी मृत्यु का कारण उसके दिल के नाजुक स्थान में छेद था... जो शायद पैदाइशी रहा होगा... और उम्र के साथ-साथ बड़ा होता गया... हार्टअटैक नहीं... हार्टफेल हुआ था... यूं कह लो उसका हृदय फट गया था... नसों में बहने वाला खून पेट और आंतों में भर गया था..."
   "उफ़ ! सत्य रुक जाओ... प्लीज...", उस वक्त मेरी आंखों में कोई आंसू नहीं थे। मैं पत्थर बन गया। जिसने मुझे जिंदगी के मायने समझाएं, जिंदगी जीने के प्रति मेरे मन में चाहत पैदा की, उसकी दर्दनाक मौत मेरे लिए असहनीय थी... उस दृश्य की कल्पना करके ही में सिहर गया। अब मेरे सोचने समझने की सारी शक्ति समाप्त हो चुकी थी। नज़रें शून्य पर टिकी थी, लगा कि मेरा दिल भी फट जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सत्य उसी तरह रो रहा था, लेकिन मैं नहीं।
   कहते हैं इंसान जब रोते-रोते थक जाता है, रो लेने की इन्तहा हो जाती है, तो उसमें एक अजीब-सी स्थिरता और शांति आ जाती है, सत्य जी भर रोया, और इतना रोया की वह थक गया। उसने उठते हुए मुझसे कहा चलो बेडरूम... यहां क्या करोगे..."
   "तुम जाओ... मैं यहीं ठीक हूँ...", मेरी आंखें अभी भी शून्य पर टिकी थी। पलकों ने झपकना छोड़ दिया था।
   सत्य ने मुझे समझाते हुए कहा, "यहां सोने की क्या जरूरत है... चलो ?"
   "नहीं, तुम जाओ मुझे अकेला छोड़ दो प्लीज़...", मैंने सत्य को खुद से परे ढकेलते हुए कहा।
    सत्य ने फिर कोई विरोध नहीं किया बल्कि सीढ़ी उतरते समय उसने मुझसे बस इतना पूछा, "तुम्हें डर तो न लगेगा ? ... और यदि लगे तो लाइट चालू रहने देना ..."
   मैंने उसकी तरफ देखा आश्चर्य से बोला, "डर !... नहीं। अब जाओ चुपचाप सो जाओ ..."
    कभी इसी अटारी पर एकदिन उसे तन्हा छोड़ के जाने के लिए मजबूर हो गया था, लेकिन बाबा ने ठीक कहा था, मैं एक दिन आऊंगा, मुझे आना ही होगा। यही मेरी नियति है। आज जब मैं लौटकर आया तो वह नहीं है !! मैं रोना चाहता था, चीख-चीख कर पीहू से पूछना चाहता था, "क्या ऐसी होती हैं रोमांटिक कहानियां...?"
  लेकिन मेरे आंसू ही नहीं निकल रहे थे। कोई देखे, महसूस करें तो कहे... कितना पत्थर दिल हूँ मैं...
  कभी उसने इसी जगह मुझसे कहा था, "इस दिल के सारे अरमान, सारी ख्वाहिशें तभी तक के लिए हैं जब तक सांसों की डोर होती है...", तो टूट जाती न सांसों की डोर... उसका दिल क्यूं फटा ?
     "सांसों की डोर", इस शब्द पर आकर मैं अटक गया, मेरे दिमाग में बिजली कौंध गई। यह तो उस पोयट्री बुक का नाम है जिसमें मैंने... मैं तेजी से उठा और अलमारी तक पहुंचा। मैंने सभी बुक को एक-एक कर के देखा लेकिन वह पोएट्री बुक मुझे कहीं नहीं दिखी। मै सोच में पड़ गया, कहां गई होगी ? 
    तभी मुझे ध्यान आया कि कभी सत्य ने मुझे बताया था कि पीहू पढ़ चुकी बुक्स को पेटी में सम्हाल के रखती है। मैने देखा वह पेटी अटारी के एक कोने में अभी भी रखी हुई थी। मै पेटी के नजदीक पहुंचा, उसमें कोई ताला नहीं लगा था। मैने झुक कर पेटी को खोला। बल्ब की रोशनी से अटारी में उजाला पर्याप्त था। सभी किताबें सलीके से जमा के रखी गई थीं। ऊपरी किताबों में कुछ धूल जमी थी। मै वहीं जमीन पर बैठ गया।
    मैं उन्हें एक-एक कर के निकलता, उन्हें देखता, फिर जमीन पर रख देता। मुझे तो उस एक पोएट्री बुक की तलाश थी जो अभी तक नहीं मिली थी। लगभग सभी बुक्स निकाल ली लेकिन सांसों की डोर नहीं मिली। सबसे नीचे मोटी पन्नी बिछी थी।
     तभी मेरी नजर उसी कलर की एक दूसरी पन्नी में पड़ी जिसे अच्छे से फोल्ड कर रखा गया था। मैने उसे उठाया। बुक और मेरी टीशर्ट उसमें तह करके रखी हुई थी, उसके बीच एक सीलबन्द बड़ा आयताकार लिफाफा था। उसे गोंद से अच्छी तरह से चिपकने के बाद पीहू शब्द कुष्ठ इस ढंग से लिखा गया था कि यदि लिफाफे को खोल दिया जाए तो फिर दोबारा उसे उसी ढंग से नहीं चिपकाया जा सकता कि पीहू शब्द उसी तरह दिखे। राइटिंग और लिखने का तरीका देखकर मैं समझ गया कि यह पीहू के द्वारा ही लिखा गया है। क्योंकि वह हस्ताक्षर करते समय अपने नाम की स्पेलिंग में आई के स्थान पर डबल इ और यू के स्थान पर डबल ओ लिखा करती थी।
    मैंने उन्हें बाहर किनारे रख लिया और सभी बुक्स को लगभग उसी तरह जमा के रखने के बाद पेटी बंद कर दी। अब मैं बल्ब के पूरे उजाले में बिस्तर पर था। मैंने सांसों की डोर को पलट कर देखा। पांच-पांच सौ के दोनों नोट और मेरे द्वारा लिखी गई कविता उसी जगह पर मिली। सिर्फ एक अंतर था, दोनों नोटों में पीहू उसी ढंग से लिखा गया था जैसा कि लिफाफे में। अंत में मैने लिफाफे को ऊपर से फाड़ के अंदर देखा, मुझे एक नोटबुक और एक और बंद लिफाफा मिला। जिसे उसी तरह सील पैक किया गया था और उसमें सत्य का नाम लिखा था। मैने नोटबुक का पन्ना पलटाया। पहले पन्ने में मेरा नाम लिखा था। मैने दूसरा पन्ना पलटाया जिसमें एक पत्र की शुरुआत थी। मै पत्र को पढ़ने लगा...

प्रिय अजनबी,
नमस्ते, 
      यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।

   तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:-

जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए,
उस शहर उस गली, उस घर को सलाम।
जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया,
उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम।
ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।

   तो लो, अब हो गई न एक रोमांटिक कहानी की शुरुआत ?

     ठीक उसी दिन की तरह जब पहली बार मैं तुमसे अपनी बगिया में मिली थी और तुमने मुझे पीछे से पुकारा था, "पीहू..."

      उस आवाज की कशिश मैं आज तक नहीं भूल पाई। उस दिन महसूस किया जैसे मैं वर्षों से इसी एक पुकार का इंतजार कर रही थी। तुम्हारी वह पुकार आज भी मेरी अंतरात्मा में समाई हुई है। जिसकी प्रतिध्वनि को मैं न जाने कितनी बार महसूस करती आई हूँ। लगता है जैसे कहीं से तुम चुपके से आ जाओगे और उसी तरह पुकारोगे, "पीहू...!!" लेकिन तुम तो ठहरे निर्मोही, कैसे आओगे ? ठीक कहती थी वह लड़की, "तुम बहुत निर्मोही हो..."

    या फिर जब आज की सुबह के साथ जब सूरज की पहली किरणों ने मोगरे और कनेर के ताजा फूलों को चूम कर इस दिन की शुरुआत की। कभी मुरझाने की कगार में खड़े दो पौधों को तुम्हारे सेवा-भाव के स्पर्श ने इन्हें जीवन दान दिया, देखो तो अब यह कितने बड़े हो गए हैं। सुर्ख लाल और सफेद रंग के न जाने कितने फूल इनमें रोज खिलते है। उनकी हल्की-हल्की खुशबू हर रात खिड़की से होते हुए अटारी तक पहुंचती है। कोई दूर से देखे तो उसे महसूस हो जैसे सुर्ख लाल रंग के जोड़े में एक दुल्हन अपने झक सफेद रंग की शेरवानी पहने दूल्हे को आलिंगनबद्ध किए खड़ी हैं। या फिर तुम्हारी कहानी के दो सितारे इस ज़मीं पर उतर आए हैं। एक कतार में लगे गेंदे, गुलाब, चमेली, गुड़हल और बनफूल के पौधों में भी ढेर सारे फूल खिलते हैं। और आज एक कोने में लगे सूरजमुखी के पेड़ में पहली बार एक फूल खिला है। बिल्कुल छोटा-सा ये फूल अपने प्रिय की तरफ देखते हुए लज्जा से मुस्कुरा रहा है। इसे मैने पिछले महीने ही लगाया था।

    कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? 

    कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी थम-सी गई थी, इतनी कि कुछ होश ही न था कि क्या हो रहा है और क्या होगा।     
 
     लेकिन आज सत्य के छोड़ कर जाने के दुख का परित्याग कर, तुम्हारे कहे अनुसार खुद को संवारा। अपनी पसंद की साड़ी पहनी। फेस क्रीम, हल्की गुलाबी कलर की लिपस्टिक, माथे में बिंदिया, कुछ ज्वेलरी और भी छोटे-मोटे मेकअप किए। कुछ देर तक अपने आप को आईने में देखा और महसूस किया जैसे मेरी नजरों से तुम भी मुझे देख रहे हो। तुम्हें तो मैंने हमेशा ही याद किया, यदि आज लिखने बैठूं तो कागज कम पड़ जाएं, और लफ़्ज़ न जाने अपने कितने मायने खुद-ब-खुद खोज लेंगे। 

     जब इंसान जिंदगी में सब कुछ खो देता है केवल तभी उसमें स्वयं को प्राप्त करने की लालसा का जन्म होता है, और आज तुम्हें ये पत्र लिखने का अर्थ खुद को प्राप्त कर लेना है।

  कभी तुमने कहा था कि मैं लिखने की शुरुआत करूं, तो एक कविता लिखनी चाही, अधूरी रह गई। कलम की स्याही से अधिक आंसू टपकते, शब्द धुल जाते थे, तो क्या करती ? 

    फिर अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने की सोची, मन नहीं किया। वैसे भी क्या लिखती, जो अजनबी में तुम न लिखोगे ? अंत में तुम्हें पत्र लिखने का विचार आया, जिसमें बहुत कुछ ऐसा लिखने को था, जो मेरे मन में रह गया, या फिर उन लम्हों को फिर से तुम्हारे साथ जीना चाहती थी जो गुजर गए। चार दिन की वह मेरी जिंदगी थी जो मैंने तुम्हारे साथ गुजरी नहीं बल्कि जी थी। बहुत सी बातें थी जो तुमसे कहना चाहती थी, पूछना चाहती थी, लेकिन कुछ अधूरी रह गई। कुछ वादे थे जो मैने तुमसे किए थे। तुम्हारी कुछ अधूरी ख्वाहिशें थीं, जिन्हें आज पूरा कर रही हूँ।

     एक दिन हमारे जीवन से सत्य-असत्य, पाप-पुण, मोह-माया, यथार्थ-कल्पना इत्यादि के भेद खत्म होने लगते हैं। जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान इन सभी की परिभाषाएं संकुचित होने लगती हैं। फिर इनका कोई मोल नहीं रह जाता है। मन का सूनापन, बेचैनिया, उदासी ये सभी जीवन में इतने प्रभावशाली और करीब होने लगते हैं कि अंत में यही हमारे लिए अंतिम सत्य बन जाते हैं। हमें अपने अवसाद से प्रेम होने लगता है। हम ऐसे गहन अंधकार में डूब जाते हैं, जिसमें फिर कोई रौशनी हो भी जाए तो आंखों को चुभने लगती है। आज मैं ऐसे ही दौर से गुजर रही हूँ। तुम्हारी स्मृतियां किसी उजाले से कम नहीं। यह जितने ही प्रभावशाली ढंग से मेरे मन में उजागर होती हैं, उतनी ही कस के मैं अपनी आँखें भींच लेती हूँ। 

    तुम सोचोगे कि आज ही क्यों तुम्हे पत्र लिखने की सोची जबकि तुम्हे यहां से गए तीन वर्ष होने को आए हैं ? तो फिर जान लो तुम इस जगह से गए हो, मेरे मन, मेरे हृदय, मेरे अंतर्मन,  मेरी अंतरात्मा, मेरी सोच से नहीं। मैंने तो तुम्हें हर दिन मन ही मन लिखा है। आज तो मैं उन्हें कागज में इकट्ठा कर रही हूँ। इसलिए अपने हृदय में यह भ्रम मत पाल लेना की सत्य के छोड़ जाने के शोक में डूब कर या फिर किसी अवसाद में आकर मैं तुम्हें यह पत्र लिख रही हूं। तो लो फिर शुरू करती हूँ...

    मैं पहले उस दिन को लिखती हूँ जिस दिन तुम मेरे पास से गए। मैं तुम्हें देखती रही, तुम कहते रहे, मैं सुनती रही और तुम मेरी आखों से ओझल हो गए। एक आस थी कि तुम लौट कर फिर आओगे, लेकिन तुम नहीं आए। मैं कुछ देर तक वही सीढ़ी के बैठी रोती रही। फिर निढाल-सी बिस्तर पर आकर लेट गई। हृदय के स्पंदन इतने कम महसूस हुए लगा जैसे इसी क्षण मैं मर जाऊंगी। सच कहूं यदि ऐसा हो गया होता तो अच्छा होता। कम से कम तुम रुक तो जाते। कहते हैं इंसान के मरने के बाद भी कुछ समय तक उसका मस्तिष्क जीवित रहता है, तो मैं उन लम्हों में एक बार तुम्हे फिर से जी भर के देख और महसूस तो कर लेती। हमारे बीच कुछ ऐसा अनकहा अभी भी रह गया है कि जिसे कहने के लिए महसूस करने के लिए हमें फिर मिलना होगा।

    उस समय इतना भी साहस न हुआ कि मैं तुम्हें जाते हुए कम से कम खिड़की से एकबार देख तो लूं। सच कहूं तो चाह कर भी उसे शाम मैं रो न पाई, ना रोने का वादा जो लिया था तुमने कैसे उसे झूठा होते हुए देखती ? हृदय में उठती पीड़ा जब असहनीय हो गई, तू आंखें पत्थरा-सी गईं। कब बेहोश हो गई पता ही नहीं चला।

     जब उठी तो शाम को छः बज रहे थे। तुम्हारा अधूरा जाम अभी भी खिड़की में उसी तरह रखा था। उसे खिड़की से उठा रैक में रख फिर लेट गई। कुछ देर बाद ही सत्य आया और मेरे पास बैठ गया। उस शाम उसने बहुत कोशिश की कि मैं उठ जाऊं, लेकिन नहीं उठी। उसने ही बाबा के पूजा की तैयारी की। रसोई घर जा नहीं सकता था, तब मैं उठी, बाबा और सत्य को खाना खिलाया, खुद खाने का मन नहीं किया। मैं वापस इसी अटारी पर आकर लेट गई। कुछ देर बाद वह आया और बार-बार मुझसे बेडरूम में लेटने के लिए कहता रहा, लेकिन मै नहीं गई। थक-हारकर वह कुछ देर तक बैठा रहा फिर मुझे अकेला छोड़कर वह सोने चला गया। मैं बहुत देर तक जागती रही। उठी और उस अधूरे जाम को पी के सो गई। 

    जब दूसरे दिन उठी तो मेरी दुनिया बदल चुकी थी, अब उस दुनिया में तुम नहीं थे। जितने भी थे मेरे मन में थे। फिर मैंने किसी से तुम्हारे बारे में कोई बात नहीं की। यदि कभी बाबा पूछते या सत्य पूछता तो मैं चुप रहती। मैंने तुम्हें अंतरात्मा में बसा लिया, अब तुम दुनिया के लिए कहां थे। लगभग चार-पांच दिन तक यही रूटीन चलता रहा। मैं घर के काम-काज करती, सबका ख्याल रखती, खाना बनाती, सबको खिलाती, सब उसी तरह चलता रहा, और साथ में एक प्रश्न मेरे अंतर्मन में कि तुम कैसे होंगे, कहां होंगे। क्या कभी याद करते भी होगे कि नहीं। 

    तुम्हारे पास तो तुम्हे याद करने के लिए तुम्हारी माइलस्टोन की नायिका थी। लेकिन मेरे पास तो केवल तुम थे न !! तो फिर क्यों चले गए मुझे छोड़कर ? अब तुमसे क्यों पूछती हूँ, तो चलो उसी से पूछती हूँ, जिसने तुम्हे कभी निर्मोही कहा था। तुम्हे कम से कम इतना तो समझाए कि तुम मुझे छोड़ कर न जाओ ।

     उससे कहती, मेरे पास जिंदगी है ही कितनी ? मेरे होने पर भी जब वह तुम्हारा है, जब न रही तो तुम्हारा ही होगा न ? मैं चाहूं तो लाख कमी गिना सकती हूँ उसकी, लेकिन जरा एक खूबी तो बताओ उसकी ?  फिर समझ लो उसी एक खूबी से मैने भी मोहब्बत की। मैंने उसकी आंखों में तुम्हें देखा, फिर भी उससे मोहब्बत की... उसे चाहा... प्यार किया, क्या तुम ऐसा कर पाती ? जब भी मैं उसकी बात करूंगी तो तुम खुद-ब-खुद आ ही जाओगी ? उसने तम्हारे साथ जिंदगी जीनी चाही और मैने उसके साथ, तो फिर क्या गलत हुआ ? क्या इतने से ही तुम मुझसे रूठ जाओगी, मुझसे नफरत करोगी या अपनी कंपीटीटर समझोगी ? मेरे लिए उसे प्यार करना खुद से प्यार करने के बराबर था, तो फिर कैसे न करती ? क्या इंसान का खुद से प्यार करना कोई गुनाह है ?

   अब तुमसे कहती हूँ, याद है ? मैंने चलती हुई राहों में तुमसे कहा था कि तुम कहना जानते हो और कह देते हो, मन को लुभाना जानते हो और लुभा लेते हो, किसी के दिल में उतरना जानते हो और उतर जाते हो... सभी कलाएं आती हैं तुम्हें... कभी उनके दिल की बात कहो जो कभी कह न पाए ? और बदले में तुमने मुझे एक छोटा सा शेर सुनाया था, जैसे चांद में कोई सूरज नजर आता हो...! असंभव सी बात ? याद है न ?

     चलो मैंने तो स्वीकार कर लिया था, पर अक्सर सोचती हूँ, कि यदि न किया होता तो ? अपने प्यार अपनी चाहतों को दिल में ही रखा होता, और सचमुच सामाज और दुनिया के बनाए रीति-रिवाजों में मैं सत्य की पत्नी होती, और फिर कहीं तुमसे मोहब्बत हो गई होती तो फिर क्या होता ? कैसे अपने दिल की बात तुम से कह पाती ? तब क्या होता ?

   उस वक्त शायद मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर पाती। लेकिन जरा सोचो, जिंदगी के किसी मोड़ पर इसका बोध होने पर मैं क्या करती ? तब तो पूरी किताब ही लिखनी पड़ती न ? कहते हैं मृत्यु के कुछ दिन पूर्व या कुछ पल पहले हम मन ही मन अपने पूरे जीवन का आकलन करते हैं, सच स्वीकार करते हैं...

   तो फिर जाओ, जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर, वर्षों बाद ही सही, मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी। तुम्हें स्वीकार या अस्वीकार से परे रख, हो सकता है तुम्हें प्यार भी कर लूं, लेकिन तुमसे कहूंगी नहीं। किंतु हां, तुम्हारे बारे में सोचूंगी, मन में अलग-अलग धारणाएं बनाऊंगी कि तुम क्या हो और क्या नहीं हो ? 

   हो सकता है प्रेम, कामना, आशक्ति से परे हट तुम्हें एक नए मुकाम में रख लूं। यदि उन लम्हों को तुम लिख सके तो समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो। हां दोस्त ! मेरे प्रियवर !! इसी वादे के साथ मैं तुम्हें एक बार फिर मिलूंगी।

  लेकिन आज जब साम्य के बिन्दु तक हम दोनों पहुंच ही गए तो अब खुद की ही बाते करूंगी तुमसे। आखिर तुम गए भी तो मुझे अपना कर्जदार बना कर। कैसे ? लिखूंगी, लेकिन अभी नहीं। उससे पहले कहने को और तुमसे पूछने को बहुत कुछ है। 

    वर्षों पहले मम्मी-पापा, भाई सभी चले गए। पिछले साल बाबा भी चले गए। ध्रुव भैया भी बहुत दूर ही हैं। केवल सत्य था मेरे पास, उसे भी गए हुए दो माह होने को आया, शायद वह भी लौटकर न आए। एक-एक करके सभी मेरे जीवन में आए और आकर चले भी गए। रह गई मैं, इतना बड़ा घर, जिसमें सांसों का बोझ उठाए मैं भटक रही हूँ। ये अटारी, ये खिड़की, सामने गौशाला, निकलती कच्ची सड़क, उसके पार शीशम का पेड़, जहां सत्य को पहली बार खड़े देखा था और तुम्हे जाते हुए आखिरी बार देखने की हिम्मत न जुटा पाई !! इसी बिस्तर पर पड़ी सुबकती रही, सिसकती रही, रोती रही !!!

   और देखो तो हम बिछड़े भी ठीक उसी तरह जैसे की मैंने स्वप्न में देखा था। पहले मैं भी इन सब चीजों को नहीं मानती थी, लेकिन हमारा मिलना और मिलकर यूं बिछड़ना शायद हमारी किस्मत थी। आज जब मैं तुम्हे पत्र लिख रही हूँ, तो उस दिन का एक अधूरा स्वप्न कल रात पूरा हुआ। तुम्हें जाते हुए देखने का स्वप्न। मैंने देखा, मेरे जिस्म में वही गहरे बादामी कलर का सूट है। मेरे बाल खुले हुए हैं। अटारी का बल्ब जल रहा है... पूरी अटारी में उजाला ही उजाला फैला है। एक हाथ से मैंने खिड़की की छड़ पकड़ रखी हैं, दूसरे हाथ में तुम्हारा अधूरा जाम है... तुम बाइक पर टिक कर खड़े हो... मुझे अपलक देखते हुए। मैंने अपना हाथ हिला कर तुम्हें अलविदा कहा और दूसरी तरफ से तुमने मुझे...

    उसके स्वप्न को पढ़ कर मेरे दिमाग में आंधियां चलने लगी। ठीक यही सब कुछ तो मैंने उस शाम देखा था। तो वह मेरा कोई भ्रम नहीं था ? लगभग तीन वर्ष बाद पीहू की प्रबल इच्छाशक्ति से उत्पन्न होने वाले स्वप्न को साकार होते हुए मैंने उसी दिन देख लिया था ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...

    तब क्या पता था, एक दिन इन्हीं आंखों में असंख्य आंसुओं को समेटे, तुम्हे याद करते हुए न जाने कितनी रातें गुजारनी पड़ेगी। इसी घर में तुम्हे ले कर मैं सत्य से लड़ी थी कि खबरदार जो वह तुम्हे यहां रहने के लिए तुमसे कहे। किसी भी कंडीशन में मैं अपनी अटारी तुम्हें रहने के लिए न दूंगी, और आज ? देखो तो उसी अटारी में मैं तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रही हूँ, और शायद अपने जीवन का अंतिम पत्र तुम्हें लिख रही हूँ।... लेकिन कहे देती हूँ, इसे पढ़ने के लिए तुम्हें स्वयं यहां आना पड़ेगा, मै इसे तुम्हारे पते पर पोस्ट करने से रही। देखो तुमने जैसा चाहा मैंने वैसा किया। तुमने जो कहा वह किया, तो फिर अब आ जाओ न ?

   ठीक है मानती हूँ, कोई रिश्ता नहीं, लेकिन हमारे बीच ब्वॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड वाला रिश्ता तो हमेशा से ही रहा न ? चलो इसे भी मत मानों, तो केवल दोस्त ही मान कर उसका हाल-चाल जानने के लिए आ जाओ... तुम वादा कर के गए थे न, कि तुम मेरी शादी के बाद एकबार ही सही, लेकिन आओगे ? तो अब आ जाओ... तुम झूठे साबित नहीं होगे। सत्य ने भी तुमसे कहा था कि तुम मुझे उसकी वाइफ बन जाने के लिए कन्वेंस कर लोगे तो वह ताउम्र तुम्हे मेरा बॉयफ्रेंड मानने के लिए तैयार हो जाएगा, तो अब उसे भी कोई एतराज नहीं होगा।

     कभी मैंने सोचा था कि जो अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद आत्महत्या तक करने की कोशिश तक कर सकता है तो फिर वही लड़का मुझसे प्यार कैसे कर सकता है ? सच कहूं तो प»हले मुझे भी यही लगता था, इस जिंदगी में प्यार एक ही बार होता होगा। जब भी तुम्हारी बातों में उसका जिक्र होता, तुम्हारे आंसुओं में उसे मुस्कुराते हुए देखती, जिसका नाम तक तुम नहीं लेते थे, तब मेरे दिल में अजीब-सी बेचैनी होती। यूं कह लो कुछ हद तक जेल्सी की भावना भी जगाती। क्यों ?

    यह तो मैं पहले से ही तय कर चुकी थी कि तुम्हारे मन से यह बात निकाल के रहूंगी कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। लेकिन यही सवाल तो एकदिन तुमने खुद मुझसे पूछ लिया, तब मैं क्या करती ? कुछ हद तक मैं तुम्हारे सामने एक्टिंग करने की कोशिश करना चाहती थी कि तुम्हें मुझसे धीरे-धीरे लगाव हो जाए, मेरे प्रति आकर्षण पैदा हो जाए और मैं जीत जाऊं। लेकिन जैसे ही तुम्हारे सामने जाती, तुमसे बातें करती, तो मुझे एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।  ऐसा क्यों होता था ? 

    उस दिन जब ज्ञान भैया ने मुझे बताया कि उसके बगैर तो तुम जीना ही नहीं चाहते थे, तो आश्चर्य हुआ। शायद जिस आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा मैंने दी, उसकी शुरुआत मेरे ही जीवन से होनी थी !! कहते हैं, नियति एक बार ऐसे व्यक्ति को हमारे सामने ला खड़ा करती है, जिसके साथ होने पर हमें ऐसे आध्यात्मिक प्रेम की अनुभूति होती है, और इस तरह से यह व्यक्तिपरक न होते हुए भी किसी एक व्यक्ति के पास होने पर ही महसूस होता है, क्यों ?

    आकर्षण, मोह और आसक्ति ये सभी भाव जब अपने सर्वोत्तम और शुद्धतम स्वरूप में होते हैं तभी आध्यात्मिक प्रेम का जन्म होता है। अब मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि हम दोनों के जीवन में यह अपने सर्वोत्तम स्वरूप में था और सदैव रहेगा। तुम जहां भी होगे, जिसके साथ भी होगे, आज तुम भी महसूस करते होगे।

     कभी सत्य के साथ एक ही बेडरूम में मैं बेखबर सोती थी और वह जगता था। तुम्हारे जाने के बाद उल्टा हो गया था। वह थका-हारा बेखबर-सा सोता और मैं जागती रहती, यह सोचते हुए कि तुम कहां होगे, कैसे होंगे, क्या कर रहे होगे, मुझे कभी याद भी करते होंगे कि नहीं ? जब मैं अपने इस जीवन के अस्तित्व में तुम्हारे होने या न होने की तलाश करती तब तुम्हारी कविता की ये पंक्तियां याद आती...

तू सोती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी राते भूल गया हूँ,
जब से तुझको प्रिय-बाहों में,
रातों को जगते देखा है।

    क्या सचमुच तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ? इसी अटारी में तुमने मेरी सांसों को उखड़ते हुए देखा था और मुझे डांटा भी था कि मैं इतना काम न किया करूं। तो आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं तुम्हें एक सच बताती हूँ। सांसों के टूटने की शुरुआत कॉलेज लाइफ में बैडमिंटन खेलते हुए मेरे बेहोश हो जाने पर ही हो चुकी थी।

     स्कूल के समय से ही हम भाई-बहनों की रुचि किताबों के साथ-साथ स्पोर्ट और क्लचरल प्रोग्राम में भी थी। रेसिंग, बैडमिंटन, हाई जंप इन सब में दोनों ही पार्टिसिपेट किया करती थे। एक दिन कॉलेज में बैडमिंटन खेलते हुए अचानक बेहोश के गिर पड़ी। सांस लेने में तकलीफ होने लगी... पहले तो सभी ने समझा की थकान की वजह से होगा, लेकिन मैंने इससे पहले भी महसूस किया था कि जब भी मैं ज्यादा मेहनत के काम करती हूँ... तो जल्दी थक जाती हूँ, और सांस लेने में भी दिक्कत होती है। एक दिन जब पापा को बताया तो उन्होंने मुझे एक अच्छे डॉक्टर को दिखाया...

   डॉक्टर ने पूरा चेकअप करने के बाद पापा को बताया कि जन्म से ही मेरे दिल में एक छोटा सा छेद था, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी उसका आकार भी बढ़ता जाएगा। लगभग पच्चीस-तीस साल की उम्र में वह इतना बड़ा हो जाएगा कि दिल की धड़कने कम होती जाएंगी और मेरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होनी शुरू हो जाएगी। सांसे लेना मुश्किल होता जाएगा। आधुनिक दौर में दिल में छेद होना और उसका सफल आपरेशन होना सामान्य-सी बात है, लेकिन उसी डाक्टर ने पापा को बताया कि हार्ट के जिस पार्ट में छेद है, सर्जरी करना कठिन और बेहद रिस्की भी है। सफल होने के मात्र आठ-दस प्रतिशत ही चांसेस हैं, लेकिन वह अपने से बड़े डॉक्टर से कंसल्ट करेंगे कि क्या किया जा सकता है..."

     एक इत्तेफाक ही था कि उन दोनों के बीच के इस डिस्कशन को मैंने सुन लिया लेकिन जाहिर नहीं होने दिया था। उसके तीसरे दिन मेरा जन्मदिन था। चौथे दिन हम सभी दादी की डेथ में गांव आ गये , बीसवें दिन वह हादसा हुआ। पूरा का पूरा परिवार काल के गर्भ में समा गया। इस सच को अब मेरे सिवा कोई नहीं जानता। मैने सत्य, ध्रुव भईया को और न ही बाबा को कभी बताया।

     यदि मैंने सत्य को शुरू से ही किसी भी रिश्ते से दूर रखना चाहा, तो यही एकमात्र कारण नहीं था। जब कभी उसे अपने और विवाह के प्रति बहुत अधीर देखती तो सोचती कि उसे सब कुछ सच-सच बता दूं। फिर अगले ही पल एक अजीब-सा डर लगने लगता। सच जानने के बाद सत्य का रिएक्शन कैसा होगा ? या तो वह बेहद समझदार व्यक्ति की तरह मेरी जिंदगी से धीरे-धीरे या फिर एकदम से चला जाएगा, यह होता तो ठीक था लेकिन न गया तो फिर ? बिल्कुल नसमझो की तरह हर पल मेरे पास रहने की कोशिश की तो ? इस बात से बेखबर कि मुझे खुश रखने के एक्स्ट्रा एफर्ट से मुझे दर्द ही मिलेगा। तब मैं उसकी आंखों में प्रतिपल खुद को मरते हुए न देखती ? फिर उसके साथ मैं एक सामान्य जीवन कैसे जी पाती ?

   अब तुम्हें शिकायत हो सकती है कि ये सब मैंने तुम्हें क्यों नहीं बताया ? तुम भी तो मेरे जीवन में चार दिन के मेहमान बन के आए थे, सोचा क्यों तुम्हे परेशान करूं... लेकिन आज मानती हूँ, मैं गलत थी... तुमसे और ध्रुव भैया से बताना चाहिए था... या तो मैं मर चुकी होती या फिर तुम्हारे साथ जिंदगी जी रही होती... मेरी किस्मत में प्रतिपल यूं मरना तो न लिखा होता !!

    यहां से जाते समय तुम जिस मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे थे, उसी द्वंद्व से मैं भी गुजर रही थी। सत्य बेखबर सो रहा था और मैं सोफे में बैठी कुछ देर तक सोचती रही। तुम जा रहे थे, यह पीड़ा मेरे लिए असहनीय हो रही थी। मैं सोच रही थी कि तुम्हें कैसे रोकूं लूं, या फिर ऐसा कौन सा उपाय करूं कि तुम यहां जल्द ही लौट कर आओ। सच मानो मैंने तय कर लिया था कि तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें एक निश्चित तारीख दूंगी कि उस तारीख तक मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी। तुमसे कहूंगी, मुझे हमारी जिंदगी के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला लेना है, तुम आओगे न ? तो मैं जानती हूँ कि तुम आते। तब तक मैं यहां बाबा, ध्रुव भईया और सत्य से बात कर लेती। यही सब सोच कर मैं कमरे से बाहर निकली थी कि बाबा बैठक में मिल गए और उन्होंने तुम्हें बुलाने के लिए मुझसे कहा। 

      तुम उनके पास गए और बाबा ने तुमसे वह मांग लिया जो उस दिन तुमसे वादा लिया था। याद करो जब तुम पार्टी की इजाजत लेने के लिए उनके पास गए थे ? मैंने समझ लिया कि बाबा क्या चाहते हैं। जब तुम मेरी जिंदगी से चले ही जा रहे थे तो फिर मैंने जीने की प्रति सभी लालसा का मन से परित्याग कर दिया। सोचा बाबा का फैसला जब हो ही चुका तो इस दुनिया से जाते-जाते उन्हें कोई और कष्ट क्यूं दूं। मेरे दोस्त तो मैं क्या करती ? उसी क्षण जब खुद को मार लेने का फैसला कर लिया, तो अब तुम्हें कैसे और किसके लिए रोकती ? इन सबके बावजूद मेरे मन की यही अभिलाषा थी कि तुम जाते-जाते ही सही काम से कम एक बार मुझसे पूछो तो सही, "पीहू !... क्या तुम्हें मुझसे प्यार है...?

     तुम्हारे कहे अनुसार घर के काम भी ज्यादा नहीं करती थी। बाहर के काम मंगल चाचा और कमली से करवा लेती, और घर के अंदर के सत्य से। वह हंसी-खुशी करता भी था। जब बाबा पूजा में होते तो वह साथ में रसोई में भी हेल्प करता था।

   एकदिन जब वह अपने घर से वापस लौट कर आया तो मैंने उसे काफी चिंतित देखा। पूछने पर उसने बताया कि उसकी शादी की बात चल रही है। मां और पिताजी का कहना है या तो तुम पीहू से शादी करो, हमें कोई एतराज नहीं, या फिर इनमें से कोई रिश्ता सिलेक्ट करो। हम कब तक लोगों को मना करते रहे, आखिर हमें भी तो समाज में रहना है। अब मैं उसे कैसे समझाती..?

      उस दिन शाम का ही वक्त था। मंगल गाय बछड़ों को बांध रहा था। इसी अटारी में इसी बात पर हमारी बहस हो गई। मैने कहा, "मन तो लिया तुम्हें अपना पति। क्या जरूरी है कि बारात सजे ? बाबा ने तुम्हे अपना लिया था, मैने भी अपना लिया, तो बता दो अपने घर वालों को कि हमारी शादी हो चुकी है.. इसमें दिक्कत क्या है ?"

    मेरी बात सुनकर उसने कुछ गुस्से से कहा,  "ऐसा नहीं होता... न समाज के सामने हमारी शादी हुई है न कोर्ट में रजिस्टर्ड हैं.. इस इलीगल शादी को कौन मानेगा ?"

     और मैंने भी गुस्से से उससे कह दिया, "फिर तुम्हे जो करना हो करो। शादी भी करनी हो तो कर लो।  लेकिन मैं नहीं करूंगी, और न ही किसी समाज के सामने स्वीकार करूंगी। यदि तुम्हें इस शर्त के साथ मेरे साथ रहना है तो रह सकते हो..."

    उसने भी गुस्से से सीढ़ियां उतरते हुए कहा, "...तो ठीक है, मैं जा रहा हूँ, अब लौटकर नहीं आऊगा। शादी करने का इरादा हो तो मंगल से घर में फोन करवा देना, मैं आ जाऊंगा..."

     फिर कुछ देर बाद ही उसे जाते हुए इसी खिड़की से देखा। मंगल ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह चला गया। जितनी सहजता से मैने तुम्हे जाने दिया, उतनी ही सहजता से उसे भी। 

    उसके बाद मैं उस सत्य को हमेशा तलाशती रही जब मैंने पापा के द्वारा अपने बर्थडे में दिए गए सूट को पहना था और उसने मुझसे कहा था, "तुमने इसे पहना तो सूट ने अपनी सुन्दरता पा ली... तुम्हारे पापा ने सच कहा था... आई विश ! यदि हमारी बेटी हो तो तुम जैसी ही हो, वह तुम पर जाए..."

     क्या पता मेरी कोख में जो नन्हा सा जीव पल रहा है, वह हमारी बेटी हो !! उसे भी छोड़ कर चला गया वो !!

   तो अब बताओ मैं किसे पुकारू ? तुम्हारे सिवा मेरी जिंदगी में कौन रह गया ? तुम न हो कर भी मेरे पास सदैव रहे। तुम तो मेरे जीवन के वह कृष्ण हो जिसे राधा हमेशा अपने अंतर्मन से पुकारती रही। तुम तो उस द्रोपदी के भी कृष्ण हो जिसने अपने मित्रता के धर्म का निर्वहन करने के लिए, अपनी मुरली को त्याग कर सुदर्शन चक्र धारण किया। तुम तो वो सारथी भी हो जिसने अपने मित्र के अपमान का बदला लेने के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में उसके पति के रथ की लगाम अपने हाथों में थाम ली। उसी मित्रता के धर्म को याद करके मैं तुम्हें पुकारती हूँ, तुम मेरे साथ न्याय करो ? मुझे सिंपैथी नहीं, तम्हारी काइंडनेस चाहिए। मैं तुम्हें एक बार फिर गले से लगा कर रोना चाहती हूँ।

   आज लाग-लपेट से दूर अंतरात्मा से तुमसे कहती हूँ मेरे दोस्त, प्यार तुमसे हुआ, तुम मेरे हर एक लम्हे में, मेरे वजूद के हर एक हिस्से में हो। जब भी तुम्हे याद करती हूँ तो आंसू बहते हैं, रोती हूँ, तड़पती हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद सत्य को भी याद करती हूँ। वह मेरे होने वाले इस बच्चे का पिता है, क्यों उसे छोड़ कर चला गया ? जिंदगी में सिर्फ यही शिकायत रहेगी उससे ? जब मैंने उसे अपना लिया था, बदला लेने के लिए ही सही जब मैंने तन-मन-धन सब कुछ अर्पित कर दिया तो इन परिस्थितियों में जब न तो बाबा है, न ध्रुव भैया है, मंगल चाचा और कमली के सिवा कोई नहीं,
 उसका मुझे छोड़कर चले जाना, मैं तुमसे पूछती हूँ, क्या उचित है ? मैंने विवाह के लिए उसे पहली बार तो मना नहीं किया था, तो इस बार ऐसा क्या हो गया ?  सब कुछ पा लेने के बाद उसे अचानक रीति रिवाज के अनुसार विवाह की जरूरत महसूस हुई ? क्यों ? 

    कभी सोचती कि विवाह के लिए मैंने अपनी सहमति दे दी होती तो शायद अच्छा ही होता। जब वचन और कर्म से सब कुछ उस पर न्योछावर कर दिया तो सामाजिक रूप से उसे स्वीकार करने में कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता ? लेकिन नहीं, अपनी सहमति देने से पूर्व मुझे अपने बारे में उसे सब कुछ सच-सच बताना पड़ता। बस यहीं पर आकर मैं रुक जाती थी। यदि न बताती तो कल को मेरे बाबा पर आरोप लगता कि एक मरणासन्न लड़की को हमारे बेटे के गले बांध दिया... या फिर शायद उनको खुशी ही होती ? 

    जाते समय तुमसे मांगा भी तो क्या मांगा... कि तुम यहां एक बार ही सही, अपनी मर्जी से लौट कर फिर से आओ !! प्यार, दोस्ती, चाहत इन सब से परे सिर्फ तुम्हे गले लगाकर इतना ही कहा होता, मत जाओ मेरे जीवन से... तो शायद... नहीं... नहीं... यक़ीनन तुम बाबा से किया हुआ वादा भी तोड़ देते... मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाते, और यदि जाते भी तो जल्द ही लौट कर आते।

    सच लिखा न ? हां... उस दिन मैंने समझ लिया था कि यही बात बाबा से मिलने से पहले तुम मुझसे कहना चाहते थे, जो संबंध तुमने मन ही मन मेरे प्रति स्वीकार कर लिया था, मै जान गई थी वह संबंध किसी भी वादे और रिश्ते से बढ़ कर था, फिर भी मैने तुम्हे जाने दिया !!

   मैंने ज्ञान भैया से केवल तुम्हारे बारे में या तुम्हारी प्रेमिका के बारे में ही नहीं पूछा था। मैंने तो तुम्हें पहले ही पढ़ और जान लिया था। और तुम्हारा प्यार ? वो तो तुम्हारी आंखों में झलकता था, तो फिर ये सब जानने की मुझे कोई जरूरत थी ही नहीं। मैंने तो तुम्हारा पूरा फैमिली बैकग्राउंड पूछा था। उस रात जाना, तुम हमसे कम नहीं हो। करोड़ों की संपत्ति है तुम्हारे पास। फिर एकदिन कितनी सहजता से सबकुछ छोड़ कर मेरे पास रुक जाना चाहते थे। बिना किसी रिश्ते के, मेरे सच्चे दोस्त बन कर। वैसे भी इन सभी भौतिक चीजों की आवश्यकता तुम्हारे जीवन में थी ही कहां ? तुम्हारे जीवन में तो शब्दों की अहमियत थी, मुझसे मिलने वाले निश्चल प्रेम की थी।

     आज मैने अपने पूरे परिवार को खोया, अंत में जिसे पति के रूप में अपनाया उसे भी जाने दिया और तुम जैसे इंसान को रोक न सकी, यही मेरी जिंदगी का हासिल रहा मेरे दोस्त। और अब ? कोख में एक नया जीवन लिए अपने इसी दर्द के साथ इस घर और बगिया के बीच भटकती रहती हूँ। अब आंसू भी नहीं निकलते, और निकले भी तो क्यूं ? कोई पोंछने वाला भी तो नहीं। सिर्फ दुख इस बात का है कि एक नया जीवन जो मेरे माध्यम से जन्म ले सकता है, अब उसे भी मेरे साथ ही जाना होगा। शायद यह भी कोई अभिशप्त जीव है, जिसे जन्म से पहले ही मृत्यु का महाभिशाप मिला है या फिर मुक्ति का... ?

    अभी तक बड़े ही धैर्य से मैने पत्र पढ़ा था। लेकिन पत्र के इस मोड़ पर आ कर मेरा धैर्य टूट गया। उसके दर्द उसकी पीड़ा और उसकी बेबसी को महसूस कर मैं पत्र के ऊपर अपना चेहरा रख रो पड़ा। कुछ देर रो लेने के बाद जब दिल कुछ हल्का हुआ तो मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...

    जब भी मंगल और कमली मुझे उदास भटकते इधर-उधर देखते, तो दिलासा देते। मंगल चाचा तो कहते कि मैं तुम्हें खत लिख दूं या फिर उन्हें ही तुम्हारा पता लौटा दूं तो वही लिख देंगे, लेकिन मैं ही मना कर देती। 

    तीन साल होने को आए न, तुम्हें याद भी होऊंगी या नहीं, कौन जाने ? दिल कहता है तुम भूले नहीं होगे। लेकिन यदि सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होगे तो उसमें बाधा क्यों बनूं। तुम भी तो मुझे तब छोड़ कर गए थे, जब तुम्हें मेरी सबसे अधिक जरूरत थी, और आज मुझे तुम्हारी है !! जब तुम स्वार्थी न बन सके तो फिर मैं कैसे बन जाऊं ?

   देह-त्याग से दो-तीन घंटे पहले दोपहर को बाबा ने मुझे अपने पास बैठा कर तुम्हारे बारे में बहुत सारी बातें की थीं। मुझे नाइटेंगल वाली वह कहानी भी आर्द्रकंठ से सुनाई जो जाने से पहले तुमने उन्हें सुनाई थी, और उन्होंने स्वीकार किया था कि यह कहानी काल्पनिक होते हुए भी कितनी सच है। उन्होंने अफसोस से मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था, मेरा ज्ञान तो किसी व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और कुंडली पढ़कर भविष्य बताने का ज्ञान है। लेकिन उसने तो एक छोटी सी कहानी में तुम्हारी पूरी जिंदगी लिख दी। मैं जानती हूँ कि यह कहानी तुमने पहले नहीं लिखी होगी, बल्कि बाबा को हमारे बीच के संबंध को इनडायरेक्टली बताने के लिए सोच ली होगी। मेरी भी आँखें नम हुई और सोचा काश ये कहानी मैने लिखी होती...

     उस दिन उन्होंने यह भी बताया कि तुम तो यहां वापस लौट के आने के लिए जा रहे थे। किस तरह तुमने उनके पैर पकड़ कर उनसे मेरा साथ मांगा था। तुम मेरे लिए किस तरह से रोए थे। यह बताते हुए वो खुद भी रो पड़े थे,
      "...वह लड़का तुम्हारे लिए बहुत रोया था पीहू ! लेकिन तब मैं इसी भ्रम में था कि तुम और सत्य एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, एक दूसरे को प्रेम भी करते थे। उस शाम बारिश में सत्य को मुझसे मिलाना सिर्फ एक बहाना था। उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि यह लड़का जबरदस्ती तुम्हारी जिंदगी में शामिल होना चाहता है... अपने जीवन की एक कमी को तुमसे भर लेना चाहता है... ऐसे स्वार्थी इंसान को मैं तुम्हें कैसे सौंप देता ?

     लेकिन आज मुझे कोई भ्रम नहीं हो रहा है... तुम्हारी आंखों की नमी में उसी लड़के के लिए प्यार देख रहा हूँ। तुम्हारी उदासियों में, तुम्हारे आंखों के इस सूनेपन में... मुझे वही लड़का नजर आ रहा है। तुम्हारे बाबा से अनजाने में अपराध हो गया पीहू !... और देखो तो क्षमा मांग कर वह गया... किन्हीं भी रिश्ते-नातों से दूर उसने सिर्फ तुम्हारे आस-पास रहना चाहा था। तुम्हारा सच्चा दोस्त बनकर, तुम्हारा हमदर्द बनकर। मैं उसे यह भी न दे सका !! उसके प्रति कठोर हो गया, और इस हद तक कि उसकी आंखों से बहते हुए गंगा-जमुना के जल के समान पवित्र और निश्चल आंसुओं को भी न देख सका। उसके प्रेम में वो ऊर्जा थी जो तुम्हारी किस्मत बदल सकती थी..."

   और उस दिन उन्होंने मुझसे सभी कुछ स्वीकार किया कि किस हद तक उन्होंने सत्य के चेहरे में तुम्हे लेकर इनसिक्योरिटी देखी और महसूस की थी। उस दिन उसने बाबा से कहा था, "बाबा ! सोचता हूँ, उसको यहीं रोक लूं... शायद पीहू भी चाहती है... ठीक ही तो है... दोनों किताबों के शौकीन है... उनकी बहुत-सी आदतें भी एक दूसरे से मैच करती हैं... पीहू और उसके बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है... आप लोगों के पास रहेगा... वैसे भी काम-काज के कारण मैं घर की तरफ ध्यान नहीं दे पाता हूँ... जहां तक मुझे पता है, उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे छोड़ के दूसरे से शादी कर ली है... एक बार तो सुसाइड करने की कोशिश भी कर चुका है। यहां रहेगा तो उसका भी मन लगा रहेगा... उसे आप लोगों का सहारा मिल जाएगा... भटक रहा है बेचारा इधर-उधर... आप क्या कहते हैं ?"

  पीहू के पत्र से मिली इस जानकारी ने मुझे चौका दिया। तो क्या उस दिन बाबा ने सच छुपाने से लिए अपनी ज्योतिष विद्या का सहारा लिया था ? उफ़ ! इंसान भी न जाने कितने मुखौटे पहनता है ? अभी और भी न जाने कितने सच सामने आना शेष हैं ? मैंने पत्र को देखा, अक्षर धुंधले हो रहे थे। अपनी आँखें पोंछ आगे पढ़ने लगा...

  आश्चर्य हो रहा है न पढ़ के ? अब तुम बताओ, ईर्षा, स्वामित्व और असुरक्षा का प्रेम के होने या न होने से क्या संबंध ? क्या उनके प्रदर्शन के बगैर प्रेम अप्रमाणित होता है ? तो फिर सत्य के प्रति तुम्हारे व्यवहार में और तुम्हारी आंखों में मुझे कोई ईर्षा क्यों न दिखाई दी ? प्रेम होने के बावजूद तुमने मुझ पर अपना हक नहीं जताया। शायद इसीलिए तुम्हारे अंदर किसी भी असुरक्षा की भावना ने जन्म नहीं लिया। तो क्या मैं मान लूं कि तुम मुझसे तटस्थ रहे ? नहीं, कैसे मान लूं ? मैं भी तो इन शब्दों से दूर ही रही। 

     झूठ नहीं लिखूंगी, थोड़ी देर के लिए जब तुम उस लड़की की तारीफ करते तो मुझे जलन होती थी। यदि वह अच्छी थी, तो फिर थी। इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है ? आखिर तुम्हारे व्यक्तित्व के विकास में, तुम्हारी सोच और समझ में उसका भी तो योगदान है। कैसे छीन लेती या कोशिश करती उसे तुमसे दूर करने की ? फिर तुम भी तो मुझे आधे-अधूरे ही मिलते न ? लेकिन हां, एक अफसोस जरूर होता, कि काश ! उसकी जगह कभी तुमसे मैं मिली होती या फिर इतना तो हुआ होता कि बाबा और मेरी जिंदगी में सत्य के आने के पहले तुम आए होते।

     कभी तुमसे यूं ही नहीं कहा था कि मेरे पास पैसे-रुपए, जमीन-जायदाद की कमी नहीं है। कमी थी तो सिर्फ एक ऐसे इंसान की जो मेरे पास ठहरता और मुझे समझता, जो यह न कहता कि तुम यह कर लो, तुम वह कर लो, बल्कि पूछता, पीहू ! आज तुमने क्या किया ? कौन-सी कहानी, नॉवेल या पोयम पढ़ी, कुछ मुझे भी पढ़ के सुनाओ न। मेरे मना करने पर कुछ जिद करता जैसे कि उस दिन लेडी नॉर्टन की कविता के लिए तुमने की थी। 

    आज जब सोचती हूँ तो आंसू आते है। उस दिन तुमने कैसे ज़िद की थी, "ये पीहू ! फिर से सुनाओ न प्लीज, मीनिंग के साथ...", उसी आम के पेड़ के नीचे लेट कर इस पोयम को गुनगुनाती हूँ, वो भी बीच में रुक-रुक के उसके मीनिंग भी अपने दृष्टिकोण से समझाती हूँ... लेकिन अब सुनने के लिए तुम हो कहां !!! यूं कोई देखे तो पागल समझे, लेकिन वहां कोई होता नहीं। हां एक दिन मंगल चाचा ने सुना तो मुस्कुरा के बोले, "बिटिया यहीं क्लास लगा लो बच्चो की..."

   एक ऐसा ही दिन था। मैं सुबह का नाश्ता बनाते हुए इसी पोयम को गुनगुना रही थी। सत्य ने सुना और उपहास से बोल, "इतनी किताबें मत पढ़ो की पागल हो जाओ, पता नहीं क्या बड़बड़ाती रहती हो..."

   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बड़बड़ा नहीं रही हूँ, एक पोयम है उसे ही गुनगुना रही हूँ... तुम सुनोगे ?"

   वह लापरवाही से बोला, "न... मुझे समझ में न आएगी..."
    मैंने कहा, "कोई बात नहीं... मैं समझाऊंगी न... अच्छी पोयम है...सुन लो ?"
   वह उपेक्षा से बोला, "अंग्रेजी के चार अक्षर ज्यादा पढ़ लिए तो इतरा रही हो... तुम नाश्ता बनाओ... वैसे भी यार मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है... फैक्ट्री भी जाना है..."

   उस दिन सोचा, क्या यह वही सत्य है जिसे मेरी बातें पसंद थी, मेरी हर पसंद से प्यार था... लेकिन इसके आगे कुछ नहीं सोचा। मन में ख्याल आया कि हो सकता है किसी बात को लेकर स्ट्रेच हो... लेकिन उसी शाम जब मैं अटारी पर लेटी कीट्स की वही पोयम्स  पढ़ रही थी, तो आते ही बोला, "फाइनल ईयर का फॉर्म भर तो दिया है, कभी-कभी सिलेबस भी पढ़ लिया करो... ओवर कॉन्फिडेंस अच्छी बात नहीं..."

   उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा दी। हां सच... और क्या कर सकती थी ? देखा जाए तो उसकी बातें प्रैक्टिकल थी, मेरे प्रति फिक्र थी, लेकिन इनमें मैं कहां थी ?

   लेकिन कभी कोई था, जो एक पोयम मीनिंग के साथ मेरे मुख से दोबारा सुनने के लिए तरसता चला गया। कोई था, जो मुझसे कहता था तुम्हें जो पसंद हो वही करो। कोई था, जिसने मेरे अंदर उत्साह भरा कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ। कोई था, जो मेरी आंखों में आंसू की एक बूंद देखकर कहता तो कुछ नहीं था, बस चुपचाप गले लगा लेता था। कोई था, जो कहता कि हमें जिंदगी को गुजारना नहीं जीना चाहिए। कोई था, जिसे मेरे होने से प्यार था... आज तुमसे पूछतो हूँ, वह कौन था अजनबी ?

   जज्बातों में भटक गई, हां तो मैं लिख रही थी कि मुझे किससे दोस्ती करनी है, मुझे किसके साथ की जरूरत है, यह फैसला तो मुझे लेना चाहिए न ? तो फिर उसने बाबा से ऐसा क्यों कहा ? यदि कुछ कहना था तो मैं कहती ?

  बाबा को उस दिन बस इसी बात का भी पछतावा था कि सत्य के इस बात की पुष्ठि उन्होंने मुझसे क्यों नहीं की ? मेरी इच्छा जानने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की ? और उसकी एक ही वजह थी, बाबा का यह भ्रम कि मैं सत्य से पहले से ही प्यार करती थी, बारिश में सत्य का उनसे मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, पूर्व नियोजित था। हां सच, इस रात सत्य के रुकने का आभास उन्हें हो गया था। मेरे चरित्र पर कोई संदेह नहीं था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि एक लड़के को बिना उनकी परमिशन के यदि मैने भरी बरसात में न जाने दिया तो वह मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकता है...?

     काश ! बाबा को यह भ्रम न हुआ होता। जब बाबा ने तुमसे एकांत में मिलने की इच्छा जाहिर की तो पता नहीं क्यों मेरा मन किसी अज्ञात आशंका से घिर गया था। मुझे कुछ-कुछ आभास हो रहा था कि तुम्हारे साथ क्या होने वाला है। उस दिन मैंने गलती की। मुझे तुम्हारे साथ जाना चाहिए था। बाद में भले ही बाबा के कहने पर उनके सम्मान के लिए मैं वहां से चली आती। 

     तुम मुझसे एक सवाल पूछते-पूछते चले गए, "क्या जीवन में प्यार एक ही बार होता है...?", उस समय पूरे विश्वाश के साथ मैं कोई जवाब कैसे दे सकती थी ? दूसरी या तीसरी बार की तो छोड़ो, जबकि मैं पहली ही बार प्यार के होने या न होने के झूले में झूल रही थी !! और देखो तो, अंतिम रात और दिन जो जिंदगी मैने तुम्हारे साथ जी, उसी में मुझे मेरे सारे सवालों के जवाब मिले। मैने तुम्हे जताया भी, तुम समझे भी, लेकिन फिर भी जाते-जाते वही सवाल पूछ लिया। उसी क्षण मैं समझ गई कि बाबा ने तुमसे क्या मांगा होगा। यदि तुमने मुझसे पूछा होता, "बताओ पीहू ! क्या तुम्हे मुझसे प्यार है...?", तो इसका जवाब मैं जरूर देती। बल्कि भाग कर स्वयं बाबा के पास जाती, मेरे और सत्य के रिश्ते को लेकर जो भी गलतफहमी उनके मन में होती, उन्हें दूर करती। उनसे सच कहती और तुम्हे अपने जीवन में मांगती। हां मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर ! उस दिन मैं भी तुम्हारी तरह स्वार्थी बन जाती।

     लेकिन नहीं उस दिन तुम दोनों ही महानता के उच्चतम शिखर पर जा बैठे। भ्रम में एक ने कन्यादान किया तो दूसरे ने उस भ्रम को सही सिद्ध करने के लिए अपने प्रेम का त्याग किया। किसी ने जरूरत ही नहीं समझी कि मुझसे पूछे कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ ? और शायद मेरा दोष यह था कि न चाहते हुए मैने यह सब स्वीकार किया ?

     सच पूछो तो उस पल मुझे उस लड़की से न तो कोई जलन हो रही थी, न ही कोई शिकायत कि उसने तुम्हें क्यों छोड़ा... निश्चित ही वह भी मेरी तरह मजबूर हो गई होगी। अंत में बाबा ने कहा था कि मैं तुम्हें अपने पास बुला लूं और अपने आप को आजाद कर लूं इस सोने के पिंजड़े से। लेकिन जब मैं सभी बंधनों से मुक्त हो गई, तो एकदूसरे को स्वीकार करने के लिए हम पास थे ही नहीं। पर तुम ही बताओ तब भी क्या यह संभव होता ?

    न मुझे गलत न समझना। मैं इसलिए नहीं लिख रही हूँ कि मैंने सत्य को बाबा के कहने पर अपना पति मान लिया था। बाबा ने तो पिंजड़े का दरवाजा खोल अपने वचन से मुझे मुक्त कर दिया था। मैं ही न उड़ पाई बावजूद इसके कि मुझे पूरा आभास था कि तुम्हे मेरा इंतजार आज भी होगा। शायद इसलिए कि तब मुझे खुद ही नहीं मालूम था कि और कितने दिनों तक मैं तुम्हारे साथ इस खुले आकाश में उड़ पाऊंगी, तुम्हारे पैरों को तकिया समझ इन ढलती हुई शामों को देख पाऊंगी, तुम्हारी कविताएं सुन पाऊंगी ? जब इतना निर्मोही मैं सत्य के प्रति न हो पाई तो तुम्हारे प्रति कैसे हो जाती ? और देखो तो अब वह समय नजदीक आ भी गया !!!

    लेकिन इन सबके बावजूद आज सोचती हूँ कि अंतिम दिन जब तुम अटारी की सीढ़ियां उतर रहे थे, काश ! उस समय कुछ हिम्मत करके बाबा से बात की होती। जिसका नाम सत्य है, उसे सच बता दिया होता तो इस जीवन में ये काश शब्द तो न होता। तुम मेरी नियति बन कर मेरे पास आए और ये मेरी भूल थीं कि मैंने अपनी किस्मत समझ के तुम्हे खुद से दूर जाने दिया। 

     या फिर काश !! उस रात मैं सत्य के साथ ही सो रही होती जब तुम्हे सत्य समझ कर अपनी फिलिंग तुम्ही से ही कह रही थी, "...वह बहुत अच्छा इंसान है, तुम्हारी पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", तब शायद वह खुद ही कुछ समझ जाता। 

    या फिर काश... उस वक्त भले ही मैं बाबा का सख्त विरोध न करती जब उन्होंने तुमसे अकेले में मिलने की इच्छा जताई थी, प्यार से इतना ही मांगा होता, "प्लीज बाबा, जो भी बात करनी है, मेरे सामने कीजिये...", तो शायद वे आसानी से इंकार न कर पाते... होने को बहुत कुछ हो सकता था लेकिन नहीं हुआ। यही हमारा प्रारब्ध है, यही मेरी किस्मत।

    या फिर काश !!! उस समय मै पूरी तरह होश में न होती जब तुमने मुझे अपनी बाहों में थाम रखा था और मैंने लिपटते हुए तुमसे "आई लव यू" कहा था। 

   तुम्हें पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न ? तो आज सच जान लो, जब मेरे कंधे के नीचे से तकिया निकली जा रही थी तो उस समय मैं होश में आ चुकी थी, लेकिन मैने बेखुदी का नाटक किया था। 

    जरा उन लम्हों को तुम ध्यान से सोचो जब मैंने एक पल के लिए अपनी आंखें खोली और तुम्हें देखा था। उसी वक्त मैं समझ गई थी कि मैं कहां और किसकी बाहों में हूँ। जब मैंने तुम्हें'आई लव यू' कहा और तुमने रोते हुए मेरे माथे को चूम कर आई टू' कहा था और मैने तुम्हे अपनी तरफ खींच कर गले लगा लिया था, उस पल मैं उतने ही होश में थी जितने कि तुम थे। 

     उस वक्त भी तुम दुविधा की स्थिति में थे, अचानक तुम्हें पता नहीं क्या हुआ कि तुम उस स्थिति से बाहर आए और तुमने भी मुझे उसी तरह गले से लगाया और मुझसे बोले थे, "मुझे भी तुमसे प्यार है पीहू...जानता हूँ... मैं तुम्हारे जीवन का सत्य नहीं, लेकिन झूठ भी तो नहीं। मैं तो तुम्हारे जीवन का प्यार हूँ, जो या तो होता है या फिर नहीं होता है... लेकिन मैं हूँ..."

    "और हमेशा रहूंगा !", लो पूरा कर दिया तुम्हारे अधूरे वाक्य को। अब तुम बताओ है न वही हू-ब-हू शब्द ? कभी मैंने कहा था कि मेरी मेमोरी बहुत शार्प है, यूं ही नहीं कहा था मेरे दोस्त। 

   कभी सोचती हूँ, उस रात जब मैने तुम्हारे हाथ से नींबू पानी पिया था और तुमने कितने प्यार और अपनत्व से अपने सीने में मेरे सर को सहलाते हुए मुझे पिलाया था। वो पल मुझे आज भी उसी तरह याद हैं... क्यों ? आज उसका भी जवाब मुझे मिल गया है।

    और अब  यह भी स्वीकार करने में मुझे कोई लज्जा नहीं है कि यदि उस रात मंगल चाचा न होते तो मैं बेखुदी का और नाटक करती। अपनी सारी हदें पार करती और तुमसे भी करवाती। उतार फेंकती लज्जा के आभूषण को। उस पल जब मैंने मन से तुम्हे प्यार कर लिया और तुम्हारी आंखों में अपने लिए प्यार देखा लिया था तो ऐसा कर जाना मेरे लिए कौन सी बड़ी बात होती ? तब बेखुदी में तुमसे लिपट कर तुम्हे और जी भर चूमती... प्यार करती। यदि तुम छुड़ाने की कोशिश भी करते तो मैं तुम्हें छोड़ती ही नहीं। और फिर कितनी देर तक तुम रोक पाते खुद को या मुझे ?  तुम्हारे अंदर ऐसी आग पैदा कर देती इसमें तुम स्वयं पतंगे की तरह जलकर मेरे अस्तित्व में खो जाते। तब शायद तुम इतनी आसानी से मुझे छोड़कर तो न जा पाते ? लेकिन होश में थी न, मंगल चाचा के सामने लज्जा रूपी आभूषण को कैसे उतर देती।

     तो क्या वह मौका मुझे नहीं मिला था ? तो तुम्हें जानकर यह आश्चर्य होगा कि उसी रात कुछ देर बाद मिला था। मुझे अच्छे से लिटा देने के बाद मंगल चाचा अपनी जगह पर चले गए; और। तुमने घड़े से निकाल कर पानी पिया, अपना मुख धोया और निश्चित हो कर अपनी चारपाई पर जा लेट गए। कुछ देर बाद मुझे भी नींद आ गई। जब आंख खुली तो जोरों की प्यास लग रही थी। मैंने  देखा मंगल चाचा अपने स्थान पर नहीं थे। उनकी तलाश में जब मेरी निगाहें चारों तरफ गई तब मैंने उन्हें गेट की तरफ जाते हुए देखा। मैंने घड़े से पानी निकला और पीने के बाद बचे हुए पानी से अच्छे से मुंह धोया। इस बीच मंगल चाचा को अपने घर की तरफ जाते देखा। दूसरे ही पल उनके घर के दरवाजा के बंद होने की हल्की आवाज मुझे सुनाई दी। 

    फिर मैंने तुम्हारी तरफ देखा। तुम बेखबर से सो रहे थे। मैं तुम्हारे पास आई और तुम्हारी चारपाई पर ठीक उसी तरह बैठ गई जैसे कुछ देर पहले तुम मेरी चारपाई पर बैठे थे। चंद्रमा का हल्का-हल्का उजाला तुम्हारे चेहरे पर पड़ रहा था। कुछ देर तुम्हें गौर से देखती रही। अब तुम थे, मैं थी, खुली प्रकृति थी, और थे मेरे मन के सभी भाव जो ऊपर लिख चुकी हूँ। उस दिन पहली बार मैंने तुम्हें रति की निगाहों से देखा। तुम्हें उस पुरुष के रूप में देखा जिसे मैं हृदय से चाहने लगी थी, मन से प्यार करने लगी थी और जो मेरी अंतरात्मा में आ बसा था। मैं धीरे से तुम्हारी तरफ करवट लेकर लेट गई। तुम्हें कसकर अपनी बाहों में भर लेना चाहती थी, तुम्हें चूमना चाहती थी। एक उच्चश्रृंखल और उद्याम नदी की भांति अपने सागर में समाहित होना चहती थी। 

     प्रत्येक इंसान के जीवन में एकबार ही सही ऐसा लम्हा जरूर आता हैं, जहां कल्पना का स्थान यथार्थ से भी अधिक महत्वपूर्ण होता है। मैं अपनी उन्हीं कल्पनाओं के प्रत्येक बिंदु से गुजर रही थी। मैं हाथ बढ़ाकर तुम्हारे चेहरे को छू लेना चाहती थी, तुम्हारे बालों को धीरे-धीरे सहलाना चाहती थी। अपनी समस्त कल्पनाओं को तुम्हारे साथ हकीकत का रूप देना चाहती थी। लेकिन यह क्या, मेरे बढ़े हुए हाथ कांप क्यूं गए ? मैं डर गई, न जाने तुम मेरे प्रति क्या सोच बना लो ? इस पल को, मेरी इन हरकतों को कहीं तुम उन रातों से न जोड़ लो जो मैने सत्य के साथ एक ही बेडरूम और बिस्तर में गुजारी हैं ?

     उस दिन महसूस किया की एक स्त्री में पुरुष की तुलना में सेक्स की चाहत कितनी स्थाई और कितने गुना अधिक हो सकती है, लेकिन शायद उससे कई गुना उसे नियंत्रित कर लेने की क्षमता भी होती होगी। उस पल मैंने यह भी एहसास किया कि कुछ देर पहले तुम किस मानसिक स्थिति से गुजरे होगे, और तुमने अपने आप को कैसे नियंत्रित किया होगा ? उस पल तुम्हे ले कर मेरे मन में काम की भावना जरूर जागृति हुई किंतु उसमें वासना न थी। अपने प्रिय का आलिंगन कर उसके साथ शारीरिक सुख भोगने को कामवासना नहीं कह सकते। ये तो वो भाव हैं जो किसी भी आध्यात्मिक प्रेम से भी ऊपर होते हैं। 

    हां सचमुच उस रात मैंने खुले विचारों से तुम्हारे साथ सेक्स करना चाहा। मन में इच्छा जागृत हुई, तुम धरती बन जाओ और मैं बादल बन कर तुम पर छा जाऊं। यही मेरे इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि मैंने पहली बार जिस लड़के को लव यू कहा, वह तुम थे, जिसके साथ सेक्स करना चाहा, वह भी तुम थे, आज तक तुम्ही हो, फिर ये लफ्ज़ मेरी जुबान पर किसी और के लिए न आए। 

       और रही बात कल्पना की, तो फिर ऐसी कल्पना किसी और के लिए तो क्या कभी सत्य के लिए भी जागृत नहीं हुई, जिसे अंत में पति मान कर यह शरीर सौंपा। यदि तुम किसी लड़की की कल्पना में हो तो निश्चित ही उसके लिए तुम्हारा स्वरूप विराट और स्थाई होगा। उसकी कल्पना के प्रत्येक बिंदु में तुम संजीव और शाश्वत रहोगे। तुम्हारे जाने के बाद मैंने इसे प्रतिपल महसूस किया।

      उस रात मैं अपने मन के ये सारे भाव लिए तुम्हें देखती कुछ देर तक पड़ी रही। जब मन नियंत्रित और शांत हुआ, काम से वासना का अंत हुआ, तो बरबस ही मेरी आंखें भर आई। उस दिन मुझे पहली बार अपने सामने खड़ी मृत्यु को सोच कर मन दुखी हुआ। कुदरत से शिकायत भी हुई। मैं चीख-चीख के रोना चाहती थी। कई सवाल करना चाहती थी। क्यों मुझे मिली अल्प आयु ? और यदि मिली भी तो फिर क्यों मिलाया मुझे तुमसे। क्यों अंकुरित हुआ मेरे अंतर्मन के वृहद आकाश में तुम्हारे प्रति प्रेम का शाश्वत और विराट स्वरूप ? मुझे अपनी बेबसी पे रोना आ रहा था। 

    लेकिन मैं खुलकर रो भी तो नहीं पा रही थी। मन में यही ख्याल बार-बार आ रहा था कि कहीं तुम्हारी नींद न टूटे ? वैसे भी मुझे लेकर तुम बहुत परेशान हो चुके थे। मैं उसी तरह रोते हुए तुम्हें देखती पड़ी रही। जब हृदय की पीड़ा अपने तीव्रतम बिंदु पर पहुंच गई और उसे नियंत्रित करना मुझे मुश्किल नजर आया तो रोते हुए मैंने धीरे से तुम्हारे सर को चूमा और अपने बिस्तर पर औंधे मुंह आ गिरी। सुबकती रही, रोती रही और तुम इन सबसे बेखबर किसी देवता की तरह सो रहे थे। तुम पर क्रोध भी आ रहा था, क्यों मेरे मन की आवाज तुम तक नहीं पहुंच रही ? किस स्वप्न-लोक में डूबे हो कि तुम्हें मेरी आंखों के आंसू, और हृदय की पीड़ा और मेरे अंतर्मन में बसा तुम्हारे प्रति प्रेम तुम्हे न दिखाई दे रहा ? या फिर सब कुछ जानते हुए, महसूस करते हुए अनजान बने रहने का नाटक कर रहे हो, जैसे कि कुछ देर पहले मैं कर रही थी ? यह सभी बातें सोचकर मेरे हृदय में गहरी पीड़ा उठी और उस रात में सोई नहीं बल्कि बेहोश हुई थी। मंगल चाचा कब आए फिर क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं। जब सुबह जागी तो तुम्हें अपने पास ठीक उसी तरह बैठे पाया जैसे की रात में तुम्हारे पास मैं बैठी थी। और फिर आगे वही नाटक किया जैसे रात की किसी भी घटना की जानकारी मुझे नहीं है।

    अट्रैक्शन का साइंटिफिक रीज़न तो हो सकता है लेकिन प्रेम का नहीं। यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है और वह मन तुम थे। कुछ लोगों को कहते सुना था, आज भी मैगजीन में कभी-कभी पढ़ने को मिल जाता है कि आध्यात्मिक प्रेम की परिणित सेक्स है। फिर मैं तो बहुत छोटी सी जगह में रहती हूँ, ऐसी विचारधारा रखने वाले काम ही लोग मिलते हैं। कह लो न के बराबर। लेकिन तुम तो आजाद पंछी हो, एकदिन खुले आकाश में उड़ोगे, कहानियां भी लिखोगे। ऐसे न जाने कितने लोगों से मुलाकात होगी जो इस घटिया सोच पर यकीन रखते होंगे। 

     ऐसे लोगों से मेरी तरफ से एक सवाल पूछना, क्या सेक्स करते समय आंखों से आंसू निकलते हैं ? किसी की पीड़ा का एहसास होता है ? तो फिर प्रेम में क्यों होता है ?  शारीरिक मिलन एक पड़ाव है न कि प्रेम का अंत। इंसान अपनी कमजोरी को सिद्धांत बना लेता है। यदि आपका चित्त अर्थात मन स्थिर है, तो प्रेम की परिणीत कभी सेक्स नहीं हो सकता। 

     इसीलिए मैंने लिखा यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है। यदि शरीर को आत्मिक सुख तक पहुंचना है तो उसे मन में प्रेम धारण करना होगा। केवल श्रृंगार ही नहीं करुण रस को भी शामिल करना होगा। तन भी उसी की तरफ आकर्षित होता है जिससे मन मिलता है। आखिर तन को भी तो आत्मिक सुख की जरूरत है। कहो गलत है क्या ? तुमसे नहीं पूछ रही हूँ तुम तो कह गए हो, "करुणा से उत्पन्न प्रेम, बहारों के मौसम में उत्पन्न प्रेम से कहीं अधिक स्थाई होता है..."

  और यही वजह है कि एक ही बेडरूम शेयर करने के बावजूद सत्य के प्रति मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं जागी थी। लेकिन तुम्हारे लिए जागी। हम दोनों उस पड़ाव को एक साथ पार कर शारीरिक मोह से मुक्त होते, और वास्तव में वहीं से शुरू होता हमारे प्रेम का आध्यात्मिक सफर।

    लोगों को अक्सर यह भी कहते हुए सुना है कि नारी का मन, उसका हृदय बहुत गूढ़ होता है, ये गलत है, भ्रामक है। तुम ऐसा समझने की भूल जीवन में कभी मत करना। यदि उसके जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति को थोपा जाए जिसे वह मन से पसंद न करे, और फिर उससे चरित्र की उम्मीद की जाए, क्या यह संभव है ? क्योंकि अंततः इस शरीर को भी आत्मिक सुख प्राप्त करने के लिए मन में स्थापित प्रेम की ही तलाश होगी।

संगमरमर - सा जिस्म लिए लोग यहां से फना हुए,
रूहों के ताजमहल अब उनके न होने पर हंसते हैं।

    अब तुम्हारे लिए लिखती हूँ, ईश्वर करें तुम जियो हजारों साल, तुम्हे लंबी उम्र मिले। तुमने कम उम्र में एक लड़की से प्यार किया, उसने भी तुमसे किया, लेकिन तुम दोनों ही एक दूसरे की जिंदगी में न आ सके। फिर युवावस्था में हम दोनों मिले। हमने भी एक दूसरे को चाहा, प्यार किया, नहीं मिल सके। मेरे जाने का समय भी हो गया है, तो अब कोई संभावना भी नहीं। लेकिन तुम्हारे पास एक विकल्प है, यदि तुम्हें सुखद सांसारिक और पारिवारिक जिंदगी जीनी हो तो ऐसी लड़की को अब अपने जीवन में महत्व देना जो तुम्हें मन से पसंद करती हो। यह मैं नहीं कह रही, इस सिद्धांत को तो एक युग पहले रुक्मणी और कृष्ण ने स्थापित कर के दिखाया है। सीधे से अर्थों में जो भूल सत्य ने की वह तुम कभी न करना। अब चलो टॉपिक चेंज करते हैं...

   मेरी इंटेलिजेंसी तो तुमने देखी है अब मेरे प्यार की इंतहा देखना चाहोगे ? तो देखो...

   तेरी आंखों के छलकते पैमाने में नहीं, 
   तेरी आंसुओं में डूबना चाहता हूँ मैं ।"

    यह तुम्हारी कविता की दो लाइन है न, जो महुए के पेड़ के नीचे तुमने सुनाई थी ? आज भी याद है मुझे। तुम सोचते होंगे दो लाइन याद करने से क्या हो गया ? तो जान लो तुम्हारी सभी कविता मुझे उसी तरह याद है जैसा कि तुमने सुनाई थी। तुम एक बार सुना देते थे फिर मैं उसे मन ही मन कई बार दोहराती थी जैसे एक बच्चा एग्जाम के समय किसी प्रश्न के उत्तर को रटता है। क्योंकि मैं जानती थी कि उस समय तुम बस सुनाते जा रहे थे, लिख तो नहीं रहे थे। वह सभी तुम्हारी अमानत थी, कैसे छोड़ देती ? वे सभी इसी नोटबुक के पीछे लिख कर जा रही हूँ।

   इस पेड़ के नीचे तुमने कीट्स की व्हेन आई  हैव फियर के हिंदी अनुवाद की कुछ लाइन सुनाई थी। मुझे नहीं मालूम था, कि यह पोयम किस बुक में मिलेगी तो फिर मैंने कीट्स की सभी पोएट्री बुक्स बॉम्बे से उसी पब्लिशर को फोन करके मंगाई थी जिसमें कभी पापा काम किया करते थे। वे सभी इसी संदूक में रखी हुई हैं, लेकिन जिसमें यह पोएट्री है, वह तुम्हारे लिए अलमारी में ही अलग से रख छोड़ी हैं। जो किताबें मैं तुम्हारे लिए अलग से रखी हैं, वह सभी सत्य को मालूम है। उसी से पूछ लेना या फिर खुद ही ढूंढ लेना।

    कुछ कविताएं भले ही स्कूल के समय पढ़ी थी। सिलेबस में होने के कारण कई बार पढ़ते-पढ़ते कुछ कविताएं याद हो जाती थी और कुछ को याद करना पड़ता था। लेकिन जरा सोचो तुम्हारी कविताएं रट कर मुझे कौन,-सा एग्जाम पास करना था ? तो फिर क्यों सुग्गी की तरह रटतो थी। क्योंकि मुझे तुमसे जुड़ी हर चीज से मोहब्बत थी, है और रहेगी। शायद इसीलिए अब मुझे उस लड़की से भी कोई जलन नहीं जो तुम्हारी जिंदगी में पहली बार आई थी।

    यह है मेरे प्यार की इंटेंसिटी। हर रिश्ते में प्रेम का कुछ न कुछ अंश होता है। चाहे वह दोस्त हो या फैमिली मेंबर हो। लेकिन जिसके लिए प्रेम की तीव्रता सर्वाधिक होती है वह या तो ईश्वर होता है या फिर प्रियवर। और इस तरह से तुम मेरे प्रिय भी और मेरे इष्ट भी।

     सच कहूं तो यह बातें मुझे उस समय इतनी शिद्दत से महसूस नहीं हुई थी जब तक तुम मेरे करीब थे। जैसे ही तुम मुझसे दूर गए तब मैंने समझा कि मेरे जीवन से क्या चल गया। महसूस किया जैसे कोई दिल की धड़कन हीं चुरा ले गया। महसूस किया जैसे कोई मेरे होठों की मुस्कान छीन ले गया। महसूस किया जैसे मेरी आंखों ने कोई सजीला स्वप्न खो दिया। महसूस किया जैसे मेरे जीवन से कोई मुझे ही चुरा ले गया।

    आज यह भी सोचती हूँ कि मेरे मन की पीड़ा, दिल की बेचैनी और आंखों के सूनेपन को क्या बाबा और सत्य ने कभी न पढ़ा होगा ? तो फिर मंगल और कमली ने हर दिन क्यों पढ़ा, और मुझे क्यों दिलासा देते रहे ? 

     तुम्हारी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर याद आती है, उनमें से एक जो तुम मुझसे कह कर गए थे कि कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद की जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं... यही आज मेरे जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। शायद इसलिए कि तुम मेरे जीवन का एक ऐसा भ्रम थे जो सत्य रूपी यथार्थ की धरातल पर आकर जीवंत हो गया। एक ऐसा सत्य जो आज मेरे पूरे वजूद को, मेरी जिंदगी को झूठा साबित कर गया। तुम उस अधूरे नशे की तरह थे जिसकी खुमारी उतारने के लिए मैं सुबह पी भी न पाई, और उसी खुमारी को लिए मैं अब तक भटक रही हूँ। आज सोचती हूँ तुममें ऐसी कौन सी बात थी जिसे याद करके मैं दिन-दिन भर सोचती रहती हूँ, भटकती रहती हूँ। तुम्हारी तलाश में बगिया जाती हूँ, लगता कि तुम आम के पेड़ की छांव में उसी जगह बैठे हो, मेरे इंतजार में...

     लेकिन बाबा ने दुनिया छोड़ने से कुछ क्षण पहले मुझसे कहा था कि मैं शोक न करूं, तुम एक न एक दिन लौट कर आओगे। तुम्हारी नियति तुम्हें यहां लेकर आएगी। सत्य बाबा से दूर था, उसने कुछ स्पष्ट नहीं सुना होगा तभी तो उसने पूछा, बाबा किसके आने की बात कर रहे हैं। मैने बात टाल दी, "... मंगल को याद कर रहे हैं, जाओ बोला दो, शायद बाबा के प्रस्थान का समय...", फिर मैं रो पड़ी।

     सत्य के जाने के बाद बाबा ने अपनी पेटी की तरफ इशारा करते हुए कहा था, "पीहू जाते समय उसने तुम्हारे लिए कुछ लिखा था... मुझे दे कर गया और कहा था कि पहले मैं खुद पढ़ लूं, फिर यदि उचित लगे तो तुम्हे दे दूं... लेकिन आज तक उसे पढ़ने की मेरी खुद की हिम्मत न हुई... वो उसी तरह संदूख की ऊपरी रैक में पड़ी है... जल्दी निकालो उसे... पढ़ो मैं मरने से पहले सुनना चाहता हूँ... जल्दी करो... मेरी सांसे टूट रही हैं..."

   उस समय मेरे लिए ये सब अजीब-सा लग रहा था। मैं कभी बाबा को तो कभी संदूक को देखती। बाबा ने फिर कुछ तेज आवाज़ में कहा, "पीहू !!! देखो जल्दी करो... सत्य के आने से पहले उसे पढ़ो..."

   मैंने उनके कहे अनुसार तुम्हारी लिखी हुई कविता ले कर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ गई। पढ़ने की हिम्मत तो मुझे खुद भी नहीं हो रही थी... न जाने तुम क्या लिख कर गए होंगे ? मन में अजीब सी बेचैनी उठने लगी... पढ़ने से पहले ही आंखे भर आने तो थी... लेकिन पढ़नी तो थी न...? तो फिर मैने
पढ़ा...

है मोहब्बत तेरी रूह से, 
जा तुझे छोड़ दिया।
नजर की इकरार-ए-वफा,
जा तुझे छोड़ दिया।

      मुश्किल से ये कुछ शब्द पढ़ पाई और आवाज़ रुक-सी गई। हृदय सागर से उठी न जाने कितनी लहरों ने इन आंखों के रास्ते अख्तियार किए। मन में भूली बिसरी यादों के न जाने कितने तूफान उठे। शरीर के रोम-रोम में पीड़ा का एहसास हुआ। मैं भी उन्हीं रास्तों से गुजर रही थी जिन रास्तों से शायद तुम लिखते वक्त गुजरे होंगे। बाबा का कांपता हुआ दाहिना हाथ मेरे सर पर था... अब इससे अधिक क्या लिखूं... बस उस वक्त मैं रोती जा रही थी... और पढ़ती भी जा रही थी... 

इस दिल की अधूरी दास्ताँ है तू, 
जा तुझे छोड़ दिया।
बुझा इस दिल से तेरी यादों का दिया,
खुद को स्याह रातों के हवाले किया।

     बस यहीं पर मेरी सब्र का बांध टूट गया। मैने रोते हुए बाबा से कहा, "बाबा... अब नहीं पढ़ी जाती... ये पोयम अपने मुझे पहले क्यूं न दी... हां बाबा पहले क्यूं न दी..."
    बाबा ने मजबूत किंतु धीरे आवाज में कहा, "और भी हो तो पहले पूरा पढ़ो... फिर सब बताता हूँ..."
     मैने आगे पढ़नी शुरू की...

  दर्द-ए-इश्क अब इंतहा हो गई,
  लगा गले जा तुझे छोड़ दिया।
  ऐसी मोहब्बत ना हो अब किसे से,
  सजदें कर जा तुझे छोड़ दिया।
  तू आखिरी लब्ज़ है मेरी कहानी के,
  लिख कर जा तुझे छोड़ दिया....

   मै उसी तरह रोती जा रही थी... बाबा का हाथ बराबर मेरे सर को सहलाता रहा। जब कुछ देर बाद भी मैं शांत न हुई तो बाबा ने मुझे समझाते हुए कहा, "पीहू ! अब चुप हो जा... अब जाते हुए मुझे और शर्मिंदा मत कर... माफ कर अपने बाबा को... ग्रह-नक्षत्र, कुंडली, हाथ की रेखा इन सब को जीवन में बड़ा स्थान दिया। मैं समझ गया था कि उसने जरूर कुछ ऐसा लिखा होगा जिसे पढ़ने के बाद मेरा भी मन कही विचलित न हो जाए... इसलिए न तो खुद पढ़ा और न ही तुझे पढ़ने के लिए दिया... लेकिन मैं एक बात को भूल गया था कि प्रेम की ऊर्जा असीमित होती है, यह वह भाव है जहां ईश्वर के नियम भी बदल जाते हैं... उसने जिन संवेदनाओं और अनुभूतियों से गुजरते हुए अपने हृदय की पीड़ा लिखी होंगी वो कभी खाली नहीं जाती... उसके शब्द हम दोनों को मजबूर कर देते... इसलिए मैंने पहले भी तुमसे कहा है और आज फिर कहता हूँ या तो तुम उसे बुला लेना या फिर अपनी किस्मत समझ सत्य के साथ विवाह कर लेना... और ध्यान रखना यह उसकी आखिरी इच्छा थी कि ये कविता सत्य के हाथ न लगे... 

   और फिर बाबा चले गए। मैं उसी तरह गुमसुम बैठी रही। आंखों के आंसू सूख चुके थे, और दिल के दर्द अब दिल की धड़कन बन धड़क रहे थे। बाबा का हाथ मेरे सर पर न रहा। सत्य के पहुंचते ही मैने काग़ज़ का वह टुकड़ा ठीक उसी जगह रख लिया जहां कभी तुम्हारी माइलस्टोन के लिए लिखी कविताएं, माचिस की डिबिया और सिगरेट का पैकेट छुपाया था। उस दिन सचमुच दिल जल गया था।

    सच लिखती हूँ, तुम्हारे जाने से एक मिनट पहले भी यदि यह पोयम मुझ तक पहुंच गई होती तो मैं तुम्हें नहीं जाने देती... चाहे उस शाम मुझे सब के सामने तुम्हे अपनी कसम ही क्यूं न देनी पड़ती... मैं देती और तुम्हे रोकती... तुम होते तो फिर सब सही हो जाता। और ये क्या लिख के गए तुम ? 

     बुझा दिल से तेरी यादों का दिया,
     खुद को स्याह रातों के हवाले किया।

     क्या मैने तुम्हे इसी दिन के लिए समेटा था... सहेजा था... कि एक दिन फिर यूं ही टूट के, बिखर के चले जाओ...? तो फिर लो मेरे दोस्त ! आज तुम्हारी यह कविता तुम्हारे ही हवाले कर मैं अब इस दुनिया से जा रही हूँ... तुम्हारा यह इस्तीफा नामंजूर है मुझे। लेकिन कहती हूँ... फिर से मत बिखरना।

    तुम्हें याद है, इसी अटारी में जब बाबा से मिलने से पहले तुमने मेरे पांव दबाए थे... और मैंने अधिकार पूर्वक दबवाये भी थे...? जरा तुम सोचना किस अधिकार से...? सचमुच उस शाम मेरे पांव दर्द कर रहे थे। मोहब्बत की राहों में तुम्हारे साथ चलते-चलते शायद मैं कुछ थक-सी गई थी। और सच पूछो तो इसीलिए पत्र के शुरुआत में मैने लिखा था कि तुम गए भी तो अपना कर्जदार बनाकर... अब मुझे उस कर्ज की अदाएगी तो करनी होगी न ? लेकिन इसके लिए तुम्हें अब वहीं आना होगा, जहां कालचक्र से परे, प्रेम रूपी सरिता के सतत निर्मल प्रवाह में, दो किनारों पर खड़े हम दोनों, एक दूसरे से दूर ही सही किंतु अनुराग-अभिसिंचित जल तरंगे हमारे कदम चूमे। 

    मैं यह भी जानती हूँ यदि तुम यहां आए तो इस बुक की तलाश जरूर करोगे। सच, किसी के डर से ये सब पेटी में छुपा कर नहीं रख रही हूँ। बल्कि इसलिए कि यह सुरक्षित रहें और तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंच जाए। फिर तुम्हारी इच्छा जिसे चाहो पढ़ा देना, लेकिन पहले तुम पूरा पढ़ना। क्योंकि जब ये पत्र तुम्हें लिख रही हूँ मुझे भी अपनी मृत्यु अर्थात देह त्याग का पूर्वाभास हो चुका है। मेरे न रहने के बाद दुनिया के रीति-रिवाज के अनुसार इस घर को शुद्ध किया जाएगा। तब खासकर मेरे कपड़े मेरी चीजे या तो दान कर दी जाएंगी या फिर उन्हें गंगा या नर्मदा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। लेकिन मेरी बुक्स और मेरी यह पेटी रहेगी। 

    और यदि सत्य लौट के आया भी तो उन्हें कभी अपने से दूर नहीं होने देगा। मुझे मालूम है कि उसे इन बुक्स को पढ़ने में कोई खास रुचि नहीं है, फिर भी मेरी बुक्स को वह संजो का रखना चाहेगा। क्योंकि वह जानता है कि मुझे इनसे कितना लगाव है। और वैसे भी यहां बुक्स को जलाना या जल में प्रवाहित करना पाप समझा जाता है...

   अब किसी को जो और जैसे समझना हो समझे, कोई परवाह नहीं। मैंने तो किसी के साथ कोई छल नहीं किया, सिवाय तुम्हारे। सभी वादे और वफाएं निभाईं। अब स्वीकार करती हूँ, छले तो तुम गए। कभी किसी ने छोड़ देने की शर्त के साथ तुम्हें अपनाया और मैने खामोशी से उसी शर्त को पूरा किया। 

    जब तुम्हें याद करते हुए तुम्हारे लिए बुक्स अलग रखती या फिर तुम्हारी टी-शर्ट पहनती तो सत्य
धीरे से मुस्कुरा देता। एक दिन उसने कहा, मैं ही तुम्हें याद करती हूँ, तुम कभी नहीं करते होगे। फिर एक दिन उसने यह भी पूछा, "पीहू मेरे ख्याल से उसे तुमसे प्यार हो गया था... तुम्हे क्या लगता है ?"

   देखो तो कितना विरोधाभाषी और गलत सवाल किया था उसने। उसे तो यह पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं। लेकिन नहीं, उसने नहीं पूछा, क्यों ?  कभी उसने तुम्हारी राइटिंग स्किल देखने के लिए मेरे लिए एक प्रेम पत्र लिखवाया था। क्या उसने कभी पढ़ा या मुझे पढ़ने दिया ? याद करो मैं पढ़ती उससे पहले ही भूख लगने की बात कह के कैसे टाल गया था ? और यदि उस रात तुमने मेरे आई लव यू का जवाब आई टू के रूप में न दे मुझे नशे में समझ कर मेरे साथ कोई गलत हरकत करने का प्रयास किया होता तो दूसरे दिन मैं भी उसे पढ़ने की कोशिश न करती, या यूं कह लो फिर तुमसे मिलने की कोशिश ही न करती। 

      तुम वहीं बगिया में पड़े रहते। यदि घर आते भी तो भोजन करा के तुम्हे विदा कर देती और तुम चले जाते। न मैं तुमसे प्यार जताती और न ही उस रात की कोई याद दिला कर तुम्हें शर्मिंदा करती। लेकिन हां इस दिल से जरूर उतार देती। जब मैने तुमसे पत्र पढ़वाया तो तुमने बिल्कुल सहज भाव से पढ़ा। मुझे विश्वास ना हुआ, क्या वह यही आवाज है, जिसमें तुम अपने दिल की बात कहते हो, अपनी कविता पढ़ते हो ? मैं फौरन समझ गई कि तुम खुद को सत्य के रास्ते अलग रख, अपनी फिलिंग्स छुपा के चुपचाप चले जाना चाहते हो। लेकिन मुझे तो सच जानना था न, वो भी तुम्हारे मुख से उसी आवाज में, उसी इंटेंसिटी के साथ। तो फिर मैने तुमसे एक्टिंग करने के लिए कहा। तुम्हें अपनी नज़दीकियां दी, तुम्हे गले से लगाया, तुम्हारे हर शब्द में रोई और खुद भी स्वीकार किया। सच पूछो तो तुम्हे कुरेदा, तुम्हे मजबूर किया कि तुम मुझसे अपने दिल की बात कह सको। लेकिन नहीं तुमने तो मेरे भी दिल की बात कह दी। 

    जब तुमने मुझसे कहा कि मेरी आंखों में उस दिन तुमने न तो सत्य को देखा और न ही खुद को। दिखाई दिया तो एक सुनापन... एक प्रतीक्षा... एक इंतजार जो एक लम्हे की थी। तुमने कितनी आसानी और बेबाकी से मुझसे कह दिया कि मुझे सत्य से प्यार नहीं था, और न ही आज है। हां मैं उसे प्यार करने की कोशिश करती रही लेकिन कभी कामयाब नहीं हो सकी।

   और खुद के लिए कहा, "चला जाता पीहू ! यदि मैं भी कोई नादान लड़का होता तो जरूर चला जाता। तुम्हारी आंखों में, तुम्हारे आचरण में यदि मैंने खुद के लिए प्यार न देखा होता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, और सच मानो तो किसी क्रम से परे पूरी इंटेंसिटी के साथ है। मैंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति तुम्हारे सच्चे, निःस्वार्थ और लालच रहित प्रेम को महसूस करने के बाद ही की...."

    बस यह दो प्रमुख बातें थी जिसे सुन लेने के बाद
खुद के विजेता होने का भ्रम टूट गया। अभी तक तो मैं समझती रही कि मैंने तुम्हें कुरेदा, प्रेम अभिव्यक्ति के लिए तुम्हे मजबूर किया। लेकिन तुम तो कभी मजबूर थे ही नहीं, बस मुझे एहसास दिलाते रहे कि हां तुम मजबूर हो। तुमसे ही सीखा कि अपने प्रिय के प्रेम में सब कुछ हार जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है।

   लेकिन मैं तो उस समय की बात कर रही थी जब खुद के विजेता होने के भ्रम में थी। मैंने तुम्हें कुरेदा क्योंकि पहली नजर में ही पत्र में मेरे प्रति लिखी तुम्हारी प्रत्येक भावनाएं सच लगी, क्यों ? क्योंकि लिखी गई प्रत्येक भावना को तुम पहले ही मुझसे स्वीकार कर चुके थे। मैने उन्हें केवल शब्दों में नहीं तुम्हारे चरित्र में महसूस कर लिया था। इसलिए लिखती हूँ, अब कर लो सत्य से अपनी तुलना। दावा है, उन्नीस नहीं बीस ही पाओगे खुद को। 

    तुमने मेरे प्रति जो महसूस किया तुम कह गए लेकिन मैंने उसे जताया, पूरे मन से स्वीकार भी किया लेकिन तुम्हे रोक न पाई, क्यों ? जिंदगी में कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद इसलिए कि उनके जवाब भी एक सवाल ही होते है..." 

      मैंने भी इन तीन वर्षों में खुद से बहुत सारे सवाल किए हैं। मैं अक्सर पहले सत्य को क्यों अजनबी कहती रही ? क्या मेरे जीवन में किसी अजनबी का आना मेरी नियति थी, जिसका पूर्वाभास वह मुझे पहले से कराती रही ? क्या बाबा को मेरी असमय और गुमनाम मृत्यु का आभास पूर्व में ही हो चुका था ? क्या उन्हें मालूम पड़ गया था कि मेरी चिता को आग देने वाला भी कोई नहीं होगा और इसलिए उन्होंने सत्य को मेरे पति के रूप में पहले से ही निर्धारित कर दिया ? 

     पति ! मेरे जीवन में बाबा द्वारा निरूपित एक ऐसा रिश्ता जिसे बाद में ही सही मैंने अपनाने की कोशिश पूरी इमानदारी से की। यह सच है कि उसको लेकर पहले मेरी मन में जिज्ञासा थी। यह लड़का कौन है और यहां क्यों खड़ा रहता है ? क्या यह मेरे लिए आता है ? फिर धीरे-धीरे महसूस हुआ कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, शायद यह तो इसका जॉब है। पहली मुलाकात में मैंने महसूस किया कि वह एक अच्छा इंसान है। दुनियादारी से कुछ दूर सच्चा और इमानदार। उसमें ऐसी बहुत सी विशेषताएं हैं जो एक अच्छे पति में होनी चाहिए, लेकिन मेरा ध्यान उसके अंदर ऐसी किसी भी विशेषता की ओर नहीं गया।  क्योंकि मैंने तो विवाह न करने का फैसला पहले से ही कर लिया था। 

     लेकिन हां, वह एक अच्छा दोस्त बन सकता था और मैंने उसे पहले इसी रूप में स्वीकार किया। पूरी ईमानदारी से लिखती हूँ और जैसा कि तुम भी मानते हो, मैंने सत्य को प्यार करने की कोशिश की। मैं उससे शादी न भी कर पाऊं तो कम से कम उसे प्यार तो कर लूं, लेकिन नहीं कर पाई, क्यों ? यह सवाल मैंने भी खुद से कई बार पूछा था और जिसका जवाब जिंदगी ने मुझे तुमसे मिला कर दिया। मेरी अंतरात्मा को, मेरी इन नजरों को प्रतीक्षा तो उस एक लम्हे की थी जो तुम थे, तो फिर प्रेम उससे कैसे हो जाता ?

    यकीनन इसीलिए बाबा द्वारा रिश्ता बना देने की बाद भी मैंने उसे एक लिमिट में ही अपनाया। मैं उसके साथ खुद को समय देना चाहती थी और जानना चाहती थी कि क्या कभी मैं इसे प्यार कर पाऊंगी या नहीं। और सच पूछो तो तुम्हारे आने के पूर्व ही मुझे इस बात का आभास हो चुका था कि सत्य का मेरी जीवन में क्या स्थान है। इसलिए लिखती हूँ, तीसरे इंसान होने का गिल्ट तुम अपने मन में कभी मत पालना। 

    मेरे जीवन में तुम्हारा आना कई मायनों में मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। मैं केवल इसलिए नहीं कह रही हूँ कि केवल तुम्हारी हॉबीज तुम्हारा इंटरेस्ट मुझसे मैच करता था और लिटरेचर में रुचि ही हम दोनों के बीच आकर्षण का एकमात्र केंद्र था। प्रमुख केंद्र था हमारे विचारों का मिलना। आपस में हमारे दृष्टिकोण का मिलना। तुम जितने भावुक थे, उतने ही प्रेक्टिकल। तुम्हारे व्यक्तित्व में इन दोनों का गजब का समन्वय और सामंजस्य था। जैसे कि पहली नजर के प्यार में तुम भी विश्वास नहीं करते थे और न ही मैं करती थी। प्यार तो उस व्यक्ति से होगा जो तुम्हारी सोच, तुम्हारी विचारधारा, तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारी अभिरुचि से मेल खाता हो। तब तुम पूरी इंटेंसिटी के साथ उसे स्वीकार भी करोगे। 

    ये बातें जब पहली बार तुमने मुझसे कही तो सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन जब बात की गहराई तक पहुंची तो समझा कि इसमें गलत क्या है, यह तो बहुत नैचुरल है। प्रत्येक इंसान ऐसे ही व्यक्ति की चाहत तो अपनी जिंदगी में करता है। फिर तुम्हारा मुझसे कहना कि कभी-कभी हम जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं। फिर उसके ही अस्तित्व में हम अपनी तलाश करते और जहां हम खुद को कभी नहीं पाते हैं। ठीक उसी पल मुझे अपनी सभी शंकाओं का समाधान मिल गया। मैं समझ गई थी मुझे किसको किस स्थान पर रखना चाहिए।

     याद करो हमारी मुलाकात का तीसरा दिन जब इसी अटारी में तुम्हारे बार-बार रोकने पर सत्य ने भावुकता में आकर मुझे और खुद को श्रापित कर लिया था। तब भी मैंने किसी भी भावुकता के अधीन हो उससे कोई रिश्ता नहीं स्वीकार करना चाहा था, लेकिन नहीं बीच में तुम फिर कूद पड़े। फिर बाद में पता चला कि तुम तो मुझे उसके साथ विवाह के लिए तैयार भी करने वाले थे। लेकिन इस बारे में मैंने तुमसे कोई अधिक बात नहीं की, जानते हो क्यों ? क्योंकि यह सब को-एक्सीडेंटल हुआ। तुम कहीं से दोषी सिद्ध नहीं हो रहे थे। यदि होते तो उसी दिन तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर तुम्हें एक थप्पड़ मारती और कहती, "कौन होते हो मेरी जिंदगी का फैसला करने वाले... यदि यह जिंदगी मेरी है तो यह फैसला मैं ही करूंगी न कि तुम। किससे प्यार करूं और किससे शादी करूं..." और यह भी पूछती, "क्या किसी को प्यार करना या न करना हमारे बस में होता है...? मैंने तो तुम्हें प्यार नहीं करना चाहा था फिर तुम से ही क्यों हो गया, बताओ...?"

    तुम्हारे सामने सत्य के लिए परेशान होना, बेचैनियां दिखाना, नजदीकियां बढ़ाना इन सबका एक ही कारण था, यह देखना कि इन सब का असर तुम पर क्या होता है ? लेकिन तुम तो बस मुस्कुरा के रह जाते थे। एक महान अभिनेता की तरह अपने मन के सभी भावों को छुपा ले जाते थे। मैं तुम्हारे अंतर्मन को पढ़ना चाहती थी, और हुआ क्या ? धीरे-धीरे तुम मेरे अंतर्मन को पढ़ते चले गए। उसके बाद अपने शब्दों से मेरी जो तस्वीर तुमने बनाई वह मेरे लिए खुद एक नई पीहू की तस्वीर थी। 

   उस रात जब सत्य बाथरूम में था और मैं अटारी के नीचे वाले हॉल के फ्यूज बल्ब को चेंज करने आई थी। तुम और ज्ञान भैया अटारी में मुझे ले कर आपस में बातें कर रहे थे। जिज्ञासा से मैं दबे पांव सीढ़ी के पास खड़ी हो गई थी। नीचे अंधेरा होने से तुम लोगों का ध्यान मेरी तरफ नहीं गया। लेकिन मैने उस रात सब कुछ देखा और सुना। तुमने ज्ञान भैया से वादा किया कि तुम कभी देवदास नहीं बनोगे। जब तुम पोएट्री बुक में पैसे और अपनी पोयम के पन्ने दबा रहे थे। उस रात मैने तुम्हारे चेहरे को ध्यान से पढ़ा था, तुम्हारे दिल की हर एक फिलिंग तुम्हारे चेहरे पर लिखी थी। 

   ज्ञान भैया को मेरे और सत्य के बीच प्यार को ले कर शंका थी और तुमसे उन्होंने कहा भी था कि वे मुझसे बात करेंगे, लेकिन तुमने रोक दिया। फिर सत्य की फैमिली के बारे में तुम्हे बताया, सुनकर मुझे भी आश्चर्य हुआ था। लेकिन अगले ही पल उन सबका बिहेवियर मुझे याद आया। मैं तो इन सब से दो महीने पहले ही मिल चुकी थी न। सभी को मेरा बैकग्राउंड और मेरी प्रॉपर्टी की जानकारी लेना महत्वपूर्ण लगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि मुझे क्या पसंद है और क्या नहीं। सच लिखती हूँ, उस पल भी सत्य के प्रति मेरा यकीन नहीं डगमगाया। मुझे उसकी मित्रता पर पूरा भरोसा था। हो सकता है उसके घर वाले इस विचारधारा के हों लेकिन उसको मैंने इस विचारधारा से मुक्त ही रखा था।

    बस उसी एक पल में मुझे वो मिल गया जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी। मुझे विश्वास हो गया, ज्ञान भैया न सही लेकिन एक न एक दिन तुम खुद ही मुझसे स्वीकार करोगे। उस रात सीढ़ी से उतरते हुए मैंने नशे में किसी व्यक्ति को या किसी मित्र को सहारा नहीं दिया था, बल्कि उस व्यक्ति को दिया था जिसे मैंने सर्वस्व मान लेने का इरादा कर लिया था। लेकिन इतनी जल्दी नहीं, मुझे तो तुम्हारे बारे में अभी बहुत कुछ जानना था, समझना था। मैंने कहा न पहली नजर के प्यार पर मैं विश्वास नहीं करती और इसीलिए मैंने उस दिन कहा था, "जब चढ़ेंगे तो यह अंतिम पायदान ही पहला पायदान होगा। मित्रता के आखिरी पायदान पर तो हम पहुंच ही चुके थे न ?

     हां मेरे प्रियवर, वहीं से शुरू हुआ था मेरे प्यार का सफर, जिसे कुदरत ने तुम्हारे आने से पहले ही निर्धारित कर दिया था। एकदिन हम दोनों प्यार की सीढ़ी के सभी पायदान को पार कर इसी अटारी पर पहुंचे, जहां हमने एक साथ एक ही आईने में अपने चेहरे देखे। अंतिम बार तुम्हें गले लगा कर रोई। तुम्हारे कदमों में बैठ कर बाबा से अनजाने में हुए किसी भी गुनाह की मन ही मन ऊपर वाले से छमा याचना की और तुमसे मांगा कि तुम एकबार ही सही फिर यहां लौटकर मेरे लिए आओ...

    अंत में... तन्हा तुम्हे उन्हीं सीढ़ियों को उतरते हुए देखा और मैं प्यार की ऊंचाइयों में अनिमेष खड़ी बस तुम्हे उतरते हुए देखती रह गई। क्या कभी तुमने किसी पहाड़ी की ऊंचाई पर खड़े इकलौते वृक्ष को देखा है, मैने देखा है। उसके दर्द और एकाकीपन को अब तक महसूस भी किया है... वो सब सुना जो स्वप्न की परछाईं न कह सकी। मन को शांति मिली और सहसा यकीन नहीं हुआ की पांच वर्ष पूर्व मेरे हृदय मेरे मन की बात कोई तुमसे कैसे कह कर चला गया। उस दिन यह भी महसूस किया कि तुम्हारे जीवन में प्यार एक ही बार आया क्योंकि दोनों बार तुम्हारी मुलाकात एक ही किरदार से हुई। कुछ अनकही रह गई थी शायद, जो एक दूसरे से तुम कह न पाए। वह तुमसे जो ना कह पाई मैंने कहा, और तुम जो उससे न कह सके वह मैंने सुना। 

     तुम्हे याद है वह कविता, तुमसे मिलकर चाहा है तुमको... थक शून्य पथ पर चलते-चलते ? तुमने छोटी-छोटी पर्चियों में माइलस्टोन के लिए जो कविताएं लिखी थीं, इसी नोटबुक पर पीछे लिखी हुई तुम्हें मिल जाएंगी। दो-तीन अपनी तरफ से लिखी हैं, जो उसके मन की बात तुमसे कह सके। समझ लेना यह उसका मुझ पर कर्ज था।

    तुम्हारे जाने के कुछ दिनों बाद जब मेरा मन स्थिर हुआ तो मैंने उसके बारे में सोचा जो तुम्हारे जीवन में पहली बार आई थी, और सच पूछो बहुत दूर तक सोचा। बिल्कुल निष्पक्ष, उसकी जगह पर खड़े होकर सोचा, तो समझ में आया कि वह किस दर्द से गुजरी होगी। नियति में तुम दोनों की कुछ अधूरी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए तुम्हें मेरे जीवन में भेजा। जहां तक तुमने अपनी कहानी मुझे बताई कि तुम दोनों गांव-घर, लोक-लाज के कारण कभी एकांत में मिल ही न पाए। अपने मन की बात एकदूसरे से पूरी तरह न कर पाए। और देखो, हम दोनों बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की तरह पूरे चार दिनों तक एकसाथ एकदूसरे के पास रहे। खूब हंसी-मजाक और मौज-मस्ती की। एकदूसरे से दिल की बात कही, एक दूसरे को गले लगा कर रोए भी।

       यह सब करते हुए हम कभी भी अपनी हद को पार नहीं की कर सके। इस दिल में हसरत होते हुए भी मैं तुम्हारे होठों को कभी छू तक न पाई। बात सिर्फ अपनी ही क्यों करूं, तुम्हारी भी क्यूं न कर लूं ? तुमने सिर्फ उन लम्हों को पूरा किया जो उसके साथ अधूरे रह गए। जो उसके साथ किया मेरे साथ रिपीट नहीं किया। दो उदाहरण देती हूँ। पहला, तुमने कभी केवल प्रेम भाव से मुझे गले नहीं लगाया जब भी लगाया तो मुझे दिलासा देने या फिर अपनी करुणा देने के लिए। दूसरा, पहली नजर में ही देखकर मुझसे प्यार न करना। बेशक तुमने मुझे अपनाया लेकिन खुद भी बिना किसी दाग धब्बे के तुम मेरी जिंदगी से चले भी गए। 

     तुमने मुझे यह भी बताया था की बिछड़ते समय तुम उसे गले लगा कर रो भी न सके, तो मुझे गले लगा कर रो लिया, मुझे दिलासा दे दिया। जो उससे एक बात कहना चाहते थे, वह मुझसे कह गए कि मैं तुम्हें बेवफा कभी नहीं समझूंगा। और उसके मन की बात मैंने तुमसे कह दी। तुम्हारे पैर छूकर तुमसे अपने लोगों के गुनाहों की माफी मांग ली, और तुम्हे चार बाते भी सुना दी। 

     सच पूछो तो आज मुझे समझ में आता है कि क्यों वह अक्सर एक ही आईने में अपनी सूरत के साथ तुम्हारी सूरत देखा करती थी ? शायद कुछ चेहरे, कुछ जोड़ियां आईने में ही कैद होकर रह जाने के लिए होती हैं। वास्तविक जीवन में उनका कोई सह-अस्तित्व होता ही नहीं। और देखो तो मैने भी वही किया !! आज मुझे उसके प्यार की इंटेंसिटी भी समझ में आती है। महसूस कर सकती हूँ कि किसी को अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जी लेने की उम्मीद के न होते हुए भी उसे ही चाहते रहने का दर्द क्या होता है ? 

    जब उस एक्ट को तुम्हारे साथ प्ले किया उस वक्त मैंने खुद को उसी लड़की के रूप में महसूस किया था। तुमसे लिपट कर रोने वाली लड़की पीहू नहीं वही थी, जिसने तुम्हारे साथ जिंदगी जीने के सपने देखे और उन्हें बिखरता हुआ भी महसूस किया। उस लड़के के दर्द को भी महसूस किया जिसे जिस्म नहीं जिंदगी जीने के लिए अपने प्यार का साथ चाहिए था, क्योंकि वह जिंदगी को गुजरना नहीं बल्कि जीना चाहता था।

     यह भी समझ में आया कि हम दो अलग-अलग होते हुए भी हमारी शख्सियत एक-सी थी। जिंदगी जीने के दृष्टिकोण एक थे, हमारी रुचि अभिरुचि और शायद तुम्हारे प्रति प्रेम की तीव्रता भी एक जैसी ही थी। नहीं तो इतनी सहजता से तुम मुझसे प्यार नहीं कर पाते। तुम समझ सकते हो कि मेरे लिए यह स्वीकार करना कितना कठिन रहा होगा लेकिन सच को स्वीकार करना चाहिए। यह भी तुम्हीं से सीखा। मेरे प्रीति तुम्हारे प्रेम की भावना उतनी ही निश्चल थी जितनी की उसके प्रति रही होगी। नहीं तो कोई इतनी सहजता से उस लड़की से मोहब्बत नहीं कर सकता था जो किसी के साथ एक ही बेडरूम शेयर करती हो।

     मैं यह सब बाते हवा में नहीं लिख रही हूँ बल्कि महसूस करके लिख रही हूँ। तुम्हारे स्थान पर यदि मैं होती तो मेरे लिए इतना सहज कभी नहीं होता। और दावा है कि यदि तुम्हारे स्थान पर सत्य होता तो उसके लिए तो नमुमकिन ही होता। 

    एक दिन तुमने मुझसे कहा भी था यदि मैं सत्य के साथ फिजिकल होती भी तो भी तुम्हारे प्यार में कोई कमी नहीं होती, और न ही तुम्हें कोई फर्क पड़ता। और मान लो कोई उच्चतम श्रेणी का वर्जिन है भी, लेकिन वह तुमसे प्यार नहीं करता है, उसे तुमसे मोहब्बत ही नहीं, कभी मन से तुम्हारा आलिंगन न कर पाए तो फिर ऐसी वर्जिनिटी का क्या करोगे तुम ? अचार डालोगे या किसी शोरूम में प्रदर्शनी के लिए रखोगे ? इसी थॉट पर मैंने एक छोटी सी कविता लिखी है, चाहे तो तुम माइलस्टोन में शामिल कर लेना,

दुनिया के प्रचलित पैमानों पर, 
जब उसने तुमको तौला होगा। 
हां तब तक थी तुम वर्जिन, 
उसने भी यह जाना होगा। 
लेकिन प्रथम आलिंगन के एहसासों को, 
भीगे-भीगे होठों के पहले-पहले चुंबन को,
किसने किस पैमाने से जाना होगा ?

     वर्जिनिटी तो टेस्ट की जा सकती है, उसे जांचा परखा भी जा सकता है। प्रचलित पैमानों  से काफी हद तक उसका अनुमान भी लगाया जा सकता है। लेकिन यदि तुमने किसी को अपनी बाहों में भरकर प्यार किया हो, उसके होठों को या माथे को चूमा हो, उसके गालों को प्यार से सहलाया हो, उसके रोने पर उसे गले से लगाकर खुद भी रोए हो, उसके आंसू पोछे हों, एकसाथ हंस हो, मुस्कुराया हो, तो फिर उन्हें मापने का पैमाना क्या होगा ? कोई उसकी माप कैसे करेगा ? दिल के शबनमी शर्मीले जज्बातों को, भौतिकता के किस तराजू में तौलेंगा ?

    यदि तुम कभी अजनबी लिखो तब मेरी तरफ से उसके लिए एक बात जरूर लिखना कि वह मुझे खुद से अलग न समझे। मुझसे नफरत न करें। मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी न समझे। क्योंकि नियति ने उसके कुछ अधूरे काम को पूरा करने के लिए मुझे तुमसे मिलाया था। और वह काम मैंने पूरी ईमानदारी से किया है। 
   मैं नहीं जानती कि वह दिखने में कैसी रही होगी। कद-काठी, रूप-रंग मुझसे मैच करता रहा होगा कि नहीं ? लेकिन एक बात तो है, तुम्हारे प्रति हम दोनों के प्रेम की इंटेंसिटी एक जैसी रही होगी। हम दोनों की कुछ आदतें और स्वभाव भी आपस में मिलते-जुलते रहे होंगे। मेरे व्यक्तित्व में कुछ हद तक तुम्हें उसका अक्स नजर आया होगा। तभी तो तुम सहजता से मेरे प्रेम को स्वीकार कर मेरे साथ अपनी जिंदगी जीने की चाहत को जागृत कर पाए होगे। नहीं तो क्या इन पांच वर्षों में तुम्हें कोई सुंदर लड़की न मिली होगी ? 

   उस दिन जब बेखुदी में मैं अपने आप में ही बड़बड़ा रही थी, जिन लम्हों की याद मुझे नहीं है। मेरे बहुत पूछने पर मंगल ने मुझे बताया था कि तुम कैसे तड़प गए थे जब मैने नशे में ही सही उसे भला-बुरा कहने और बद्दुआ देने की कोशिश की थी। तुमने मुझे हर उस वक्त रोका जब भी मैंने उसके खिलाफ बोलने की कोशिश की। आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं अपने उन सभी कहे की उससे माफी मांगती हूँ, और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उसे मेरी कोई बद्दुआ न लगे। वह जहां भी रहे सुखी वैवाहिक जीवन जिए। इसी में तुम्हारा भी सुख है, जैसा कि तुमने कहा था। 

    यदि मैं सत्य के साथ वास्तविक रूप से वैवाहिक संबंधों में हो गई होती और फिर तुम मुझसे मिलने के लिए आए होते, तो मैं तुम्हारा स्वागत कैसे करती और तुम्हे किस रूप में अपनाती ? यह मेरे जीवन का अधूरा काम है, जो अब उसे पूरा करना होगा। यह उस पर मेरा कर्ज है जो उसे चुकाना होगा।

     अब तुम दोनों के लिए इस हृदय से, सच्चे मन के साथ यही दुआ निकलती है, अलग-अलग ही सही तुम दोनों खुश रहो, तुम दोनों सदैव के लिए एक दूसरे के हृदय में स्थापित रहो। 

   अब मैं अपनी कहानी में लौटती हूँ। मैं बात करती हूँ उन दिनों की जब सत्य मेरे जीवन में था और तुम जा चुके थे। एकदिन उसने व्यंग्यात्मक और उलाहना भरे लहजे में कहा, "पीहू ! हमारे रिलेशन को तीन साल होने को हैं... लेकिन तुम न तो मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो रही हो और न ही अपनी सहमति देती हो ? शायद अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं...?"

   जानते हो, उस दिन मैंने तुम्हारी ही टी-शर्ट पहन रखी थी। उसे गौर से देख कुछ मुस्कुराते हुए उसने व्यंग्यात्मक लहजे में आगे पूछा, "प्यार तो करती हो न मुझसे...?"

    अब मैं इतनी नादान तो नहीं थी कि उसके कहने के अर्थ को समझ न सकूं... उस शाम तुम पर पहली बार क्रोध जागृत हुआ। दिल में आया कि मंगल चाचा को साथ ले सीधे तुम्हारे घर पहुंच जाऊं और तुम्हारा गिरेबां पकड़ तुमसे पूछूं कि बताओ किसके लिए छोड़ कर आए थे तुम मुझे ? एक जो अब रहे नहीं, और दूसरा जो इतने सालों बाद मुझसे पूछता है कि बताओ तुम्हारे दिल में क्या है ? अरे तुम्हें कुछ पूछना था तो तुमने उसी दिन मुझसे क्यूं न पूछा, जिस दिन बाबा से मेरे और तुम्हारे बारे में बात की थी ?

    दिल में आया कि उसे सब कुछ सच-सच कह दूं। कह दूं कि हां तुमसे प्यार नहीं है, और जिससे करती हूँ, उससे कह चुकी। लेकिन तुमसे शादी न करने की एकमात्र वजह ये नहीं है। मरने वाली हूँ इसलिए नहीं कर रही, ताकि तुम किसी भी रिश्ते से मुक्त रहो, और शायद यह मेरा दुर्भाग्य है कि कुछ ज्यादा ही जी गई..."

   लेकिन बहुत कुछ सोच के रुक गई। मैं जानती थी कि वह ज्ञान भैया का बेस्टफ्रेंड है। मेरी कहे को वह न जाने किस रूप में प्रस्तुत करे। और फिर बात तुम तक पहुंची तो क्या होगा ? तुम इस अपराध बोध से ग्रस्त न हो जाओगे कि तुमने मेरी जिंदगी खराब की और फिर तुम न जाने कौन सा कदम उठा लो, क्या कर जाओ, मेरी होने वाली मृत्यु को तुम कही अपने सर न ले लो... उस पल पहली बार मुझे तुम्हारी भावुकता से डर लगा था।

    भावुकता !!! कभी तुमने ही कहा था कि भावुकता में लिए गए निर्णय जरूरी नहीं की सही साबित हों, लेकिन तुम खुद इस बात को कहां मानते थे। तो फिर आओ वह समय आ चुका हैं जब मैं अपना एक वादा पूरा करूं, शीरी-फरहाद की प्रेम कहानी सुनाने का वादा।

     यदि इस कहानी को कुछ देर के लिए सच मान लिया जाय तो यह कहानी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। लोग अक्सर इन प्रेम कहानियों की रूमानियत को बरकरार रखने के लिए उन तथ्यों को बाहर निकाल कर फेंक देते हैं जो हमारे लिए शिक्षाप्रद हो सकती हैं। लोग अक्सर यही समझते हैं, और उन्हें यही बताया जाता है कि फरहाद शीरीं को पहले से चाहता था। जबकि यह सही नहीं है। शीरीं से उसकी पहली मुलाकात उसकी शादी के बाद ही हुई थी।

    आर्मेनिया के बादशाह की बेटी शीरीं जो बेहद ही खूबसूरत और कला से मोहब्बत रखने वाली एक भावुक लड़की थी, उस पर ईरान का बादशाह खुसरो सम्मोहित हुआ। उसने शीरीं से विवाह करने की इच्छा जाहिर की। शीरीं को मालूम था कि उसके इंकार करने का नतीजा क्या होगा। बादशाह किस हद तक जा सकता है। तब उसने अपनी सुंदरता को लोक हित के लिए समर्पित कर दिया। शीरीं ने खुसरो का ये प्रस्ताव मान लिया। लेकिन उसके सामने लोकहित में एक शर्त रखी.अगर खुसरो पर्शिया के लोगों के लिए दुर्गम पहाड़ियों के बीच से दूध की नहर बनवाते हैं तो वह उनसे शादी करने को तैयार है. खुसरो ने यह शर्त स्वीकार कर लिया। इसके बाद ही शीरीं ने खुसरो से शादी की थी।

     नहर खुदवाने का काम खुसरो ने फरहाद नाम के एक इंजीनियर को दिया. जो वास्तव में एक इंजीनियर नहीं शिल्पकार था। जिसने एक से बढ़कर एक बेहतरीन नक्काशी की थी, मूर्तियां बनाई थीं। पहाड़ियां दुर्गम थी, उनके पत्थरों को काटकर नहर निकालना एक चुनौती भरा काम था। जिसे एक बुद्धिमान और कुशल शिल्पी की देख-रेखा में ही किया जा सकता था।

     बादशाह ने फरहाद को बुलवा कर शीरीं से मिलवाया ताकि उसकी सलाह पर फरहाद नहर की खुदाई करवा सके. तब खुसरो को कहां मालूम था कि वह अपनी पत्नी की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहा है जो सिर्फ पत्थरों को काटकर नहर ही नहीं निकल सकता बल्कि पत्थरों को तराश कर उन्हें शक्ल भी दे सकता है। कला से मोहब्बत करने वाली शीरीं की मुलाकात एक ऐसे कलाकार से हुई जो उसके लिए नहर का काम करने के लिए भी तैयार हो गया। वहीं फरहाद की मुलाकात एक ऐसी खूबसूरत और जहीन लड़की से हुई जिसने लोकहित के बारे में सोचा था। इसलिए कभी अपनी शादी की एक ही शर्त रखी। 

      क्योंकि वह जानती थी की एक बादशाह ही वे साधन जुटा सकता है और इस कार्य को पूर्ण करने का जरिया बन सकता है। नहीं तो, यदि शीरीं को दौलत से मोहब्बत होती तो उसे कौन-सा पानी या दूध की कमी होने वाली थी, जो इस तरह की शर्त रखती ? इस तरह फरहाद शीरीं की खूबसूरती के साथ उसकी सोच से भी प्रभावित हुआ था और उसने इस लोकहित में शीरीं का पूरा साथ देने का फैसला लिया। लेकिन वह वास्तव में था तो एक कलाकार ही न ? उसने शीरीं की मूर्ति केवल अपने दिल में ही स्थपित नहीं की, बल्कि दुनिया के सामने भी प्रस्तुत कर दी। क्या गलत किया उसने ? 

   बस यही बात तो शीरीं के दिल को छू गई होगी, तभी तो उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ फरहद से मोहब्बत की। फरहाद ने शीरीं के लिए असंभव से लग रहे काम को पूरा किया। मैं नहीं मानती कि उसने कोई दूध की नहर निकाली होगी लेकिन ईरान में उस समय पानी की उपलब्धता किसी दूध से कम नहीं थी। इसलिए उस स्थान, समय और परिवेश में दूध को पानी का पर्यायवाची माना जा सकता है। उसका पति अर्थात खुसरो बादशाह था। उसके अहंकार को चोट लगी कि कैसे उसकी पत्नी एक मजदूर से मोहब्बत कर सकती है ?

     यदि उसने शीरीं की नजरों से ही फरहद को देखा होता तो उसे भी मजदूर के अंदर एक कलाकार नजर आता। कहानी का अंत भावुकता में हुआ। धूर्त और चालाक लोग जो हमेशा से एक अच्छे इंसान के साथ करते आए हैं, वही खुसरो ने फरहद के साथ किया। शीरीं की मृत्यु की झूठी खबर उस तक पहुंचा दी गई और जिसका परिणाम था फरहद की आत्महत्या। अपराध किसी और ने किया और अपराधबोध से ग्रस्त हो शीरीं ने भी स्वयं की हत्या की। 

   तो ? अब सच कहना, तुमने भी फरहाद की तरह मेरे दिल-ओ-दिमाग में चल रही कशमकश को पढ़ न लिया था ? तुम अच्छी तरह समझ चुके थे मेरे लिए वह लोकहित मेरे बाबा थे। तभी तो जाते-जाते अपने पूछे गए सवाल का जवाब तुम खुद ही दे गए। क्या कहा था तुमने,  "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है..."

    यदि तुमने जान लिया था कि मैं सत्य से प्यार नहीं करती तो फिर तुम किस प्यार की बात कर रहे थे ? तुमने ऐसा क्यो कहा, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका..."

     ऊपर और अंतिम के ये शब्द, "... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा...", मुझे गुमराह करने के लिए था न, ताकि मैं तुम्हारे कहे के अर्थ तक न पहुंच सकूं...? इन्हीं में उलझा के रह जाऊं...? तुम तो सिर्फ मुझसे इतना कहना चाहते थे, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका...", यहां पर प्रेम का कोई क्रम नहीं था। है न ? लेकिन शायद तुम भूल गए कि लिटरेचर जैसी जिंदगी तुम जरूर जी रहे थे लेकिन उस लिटरेचर को तो पढ़ मैं रही थी। तो फिर कैसे न समझ पाती ?

   इसीलिए मैंने तुमसे चलती हुई राहों में कभी कहा था कि तुम किसी शीरी के फरहाद मत बनना। भावुकता में आ कर कोई भी फैसला मत लेना। सामने वाले को अपने जैसा समझने कि भूल मत करना। पूरी दुनिया तुम जैसी नहीं है मेरे दोस्त ! लालच, प्रपंच और षड्यंत्र से भरी पड़ी है यह दुनिया। 

    ये कहानी तुमसे क्यों कही ? पहली वजह तो तुम समझ ही गए होगे, दूसरी मैं अब लिखती हूँ। तो जान लो मैं तुम्हारे जीवन की वही शीरीं हूँ। तथाकथित वैवाहिक संबंधों में रहते हुए तुमसे मोहब्बत की, उतनी ही तीव्रता से जितनी तीव्रता से तुमने की, और फिर तुम्हें अपनी नजरों के सामने ही मर जाने दिया तो अपराध बोध तो जागृत होगा न ? आखिर तुम्हारी हत्या करने वाले लोग कौन थे, जिन्हें मैंने अपना माना था, तो फिर मैं दोष-मुक्त कैसे हुई ? 

     तब खुद के होने से घृणा होने लगी। क्या मतलब प्यार की देवी बने रहने का। क्या अर्थ रह जाता है इन ऊंचाइयों का जहां अब तुम ही नहीं। उसी पल से मैंने अपनी उन्नति नहीं अवनति के बारे में सोचना शुरु किया। फैसला लिया खुद को मार लेने का। जिसकी शुरुआत थी प्यार की उस सीढ़ी से उतरना, जिसके एक-एक पायदान को चढ़ कर हम इन ऊंचाइयों तक कभी पहुंचे थे। धीरे-धीरे मुझे यह भी विश्वास हो चला कि जिस वादे को निभाने के लिए तुमने मुझे छोड़ा यदि मैं उसे पूरा करूं लूं तो मैं भी सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पहुंच जाऊंगी, जहां तुम फिर से मिल जाओगे। जब तुम पर आया क्रोध शांत हुआ तब मुझे तुम्हारी रिस्पेक्ट, एडजेस्टमेंट और रिस्पॉन्सिबिलिटी वाली थ्योरी याद आई। तब पति-पत्नी के इस अधूरे रिश्ते को मैंने पूर्ण करने का फैसला लिया, वह था सत्य को स-शरीर अंगीकार कर उसे अपने पति का दर्जा देना...

     इसी तरह जाड़ों के शुरुआत के ही दिन थे जब मैंने इसी अटारी को अपने मन मुताबिक सजाया। मन के लाखों अरमानो को सुहागसेज में बिखेर दिया। खुद भी दुल्हन की तरह सजी, गुलाबी साड़ी पहनी, माथे में सिंदूर लगाया और समय आने पर स्वयं को सत्य की बाहों के हवाले कर दिया। वह खुश था, उसने समझा होगा कि मैं अब उससे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा, क्यों...?

    मैं थी और सत्य था। केवल हम दोनों थे। उसकी बातें, उसकी हर एक छुअन मुझे उत्तेजित कर रही थी। सब कुछ उसी तरह हो रहा था, शायद जैसे एक नव-विवाहिता के जीवन में होता होगा। नई उमंग, नई चाहते, नए सपने, सभी कुछ जीवन में नया महसूस हो रहा था। हैरान थी, क्या यह वही सत्य है, जिसे अभी तक मैंने केवल अपना मित्र माना था, कभी-कभी जिसकी बाहों में सर रखकर मैं बेखबर सोया करती थी ? और बाद में जिससे हजार शिकायतें हुईं; घृणा के हद तक नफरत भी इस मन में पैदा हुई; तो उस दिन उसकी छुअन में जो मैं महसूस कर रही थी, वह क्या था ? सामंजस्य, समझौता या फिर जिस्म की परिभाषा ?

     कामोंत्तेजित शारीरिक सुख प्राप्त करने का क्षणिक सुख का एहसास भी अलग ही होता है मेरे दोस्त ! जहां इंसान दुनिया की सारी फिलासफी, सुख-दुख, दर्द, मोह, माया, बंधन, सभी भूल कर उस सुख की अनुभूति करता है। सच लिखती हूँ, उन पलों में, मैं तुम्हें भी भूल गई। लेकिन क्या पता था इस शारीरिक सुख को प्राप्त करने के सफर की शुरुआत जितनी महीन और नाजुक होगी, उसका अंत उतने ही तेज धमाके के साथ होगा...?

     वही सब कुछ मेरे साथ हुआ। चरमोत्कर्ष के बिंदु पर पहुंचकर मेरे मानस पटल के वृहद आकाश में एक धमाका हुआ। आसमान तेज रोशनी से भर गया। इस धमाके से असंख्य सितारे एक-एक कर बिखरते चले गए। इनमें से बेहद चमकदार सितारे धीरे-धीरे फिर इकट्ठा हुए। उनसे एक तस्वीर बनी, और फिर जो एक चेहरा उभर कर सामने आया उसे देख कर मेरे हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, शरीर बेजान-सा हो गया। 

     शेष बचे हुए सितारे टूट-टूट कर मेरी आंखों में ही समाते चले गए। मैने अपनी आँखें मूंद ली, बेजान जिस्म लिए पड़ी रही। कुछ क्षण बाद जब आंखे खोली तो वही सितारे मोती बन मेरी आंखों में चमक उठे। मेरे आंसुओं को देख सत्य ने सहानुभुति से मुझे खुद से लिपटा लिया, "सॉरी... फर्स्ट टाइम है न..."

     बस, उसी पल से मैने कुछ भी सोचना बंद कर दिया। तुम कब याद आए कब नहीं, अब नहीं लिख सकती। बस इतना लिखती हूँ, तुम्हारी तरह स्वीकार करने की हिम्मत अब शायद मुझ में भी आ चुकी है। कष्ट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, पीड़ा होती है। और यही पीड़ा जब सहनशक्ति से बाहर हो जाती है, तो इंसान चीखता है, चिल्लाता है, आंसू बहाता है या फिर बिल्कुल गुमसुम हो जाता है। उस दिन सोचा था कि मेरे पास तुम्हारी ऐसी कौन-सी धरोहर थी जिसके लुट जाने का मैं शोक मना रही हूँ ?  जिसकी चुभन और दर्द को महसूस कर मेरी आंखों में आंसू आ रहे है ? फिर भी आ रहे थे न ? क्यों ? 

     सच लिखती हूँ, उस रात का मन में कोई पछतावा नहीं, लेकिन कोई सुखद अनुभूति या सुनहरी यादें भी नहीं। क्यों ? क्या इसलिए कि जिससे मन मिले यदि उसी से शरीर भी मिले तो वो पल अविश्वमर्णीय होते हैं। यहां तुम्हारा सिद्धांत सही साबित नहीं हुआ या फिर यह समझ लो सिद्धांत अधूरा था। 

    काश ! उस दिन तुमने यह भी बताया होता कि इस सिद्धांत से अंतर्मन में स्थापित हो चुके प्रेम को किसी भी रिश्ते से विस्थापित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत तो उनके लिए सही हो सकता है, जिन्हें पहले किसी से प्रेम हुआ ही न हो। शरीर के चौबीस आयामों में स्पंदित हो चुके प्रेम को भला कौन सा सिद्धांत विस्थापित कर सका है ? अब तो जितनी भी जिंदगी बची थी उसे जीनी नहीं गुजारनी थी, और मैंने तो इसके लिए भी अपने आप को तैयार कर लिया था, लेकिन अब किसके साथ...

   बाद में मुझे यह भी समझ में आया कि उस दिन तुम प्रेम की सीढ़ी उतर कर भी मुझसे कहीं ऊंचे पायदान पर पहुंच गए थे। तुमने केवल सत्य और बाबा के लिए ही मेरा त्याग नहीं किया था, बल्कि वह त्याग मेरे लिए भी था। मैं चाहती तो तुम्हें रोक सकती थी, किंतु मौन रह गई। तुमने उस मौन को स्वीकार किया, सत्य के रूप में बाबा को बेहतर विकल्प देकर चले गए। मुझे किसी भी दुविधा में नहीं पड़ने दिया। सीढ़ी उतरते समय पीछे से मेरी सिसकिया सुन तुम कुछ पल के लिए रुके, फिर अपनी पीठ और सर दिवाल से टीका, कस कर अपनी आँखें बंद कर मुझसे जो कहा वे शब्द मुझे आज भी याद हैं, ""पीहू ! ... मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", उस समय न तो मेरी तरफ तुमने देखा और न ही मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। तुम नहीं चाहते थे न कि मैं किसी द्वंद्व में पड़ कमजोर हो जाऊं...? और अंत में जाते-जाते मुझे निर्दोष भी साबित कर गए।

   कहते हैं, दो इंसानों की तुलना आपस में नहीं करनी चाहिए, लेकिन अब यह गुस्ताखी मुझे कर लेने दो। एक मुझसे सर्वस्व पा कर भी बेचैन था, अभी भी मुझसे और भी बहुत कुछ पाना चाहता था, तभी तो मुझे कस कर बंधनों में बांधना चाहा, लेकिन बांध नहीं पाया। प्रतिपल छटपटाता रहा। वहीं दूसरी तरफ तुम !! छोटी सी उम्र में एक नहीं दो बार अपने प्रिय का त्याग कर शांत और स्थिर मन से चले गए... और ऐसे गए कि फिर लौट कर न आए। क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ? 

   अब मेरी जिंदगी एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहां मुझे अपने शरीर से कोई मोह नहीं रह गया था। कौमार्य एक बार लुटाओ या फिर हजार बार, क्या फर्क पड़ता था। फिर मैंने सत्य को रोकने की कोशिश कभी नहीं की। उसने जब चाहा तब खुद को उसकी बाहों में समर्पित किया। और जब कभी उसने नहीं चाहा तो फिर मैंने चाहा। 

     अदब लब्जो को एक किनारे रख सामान्य शब्दों में लिखूं तो उन दिनों मैने खूब मजे लूटे, है न ? आखिर सत्य ने बाबा की बड़ी सेवा की और घर में कैद एक लड़की के जीवन में पल दो पल की खुशियां लेकर आया। इन सब का आखिर उसे कुछ तो प्रतिफल मिलना चाहिए, यह हक था उसका, जो दिया ? या फिर मैने तुम्हारे साथ चीटिंग की ? प्यार का ढोंग तुमसे करती रही और अंत में शादी की, अपना तन सौंपा भी तो उस व्यक्ति को जिससे कोई मोहब्बत न थी ? यदि तुम ऐसा सोचते हो तो फिर गलत सोचते हो। आओ जान लो उसके आगे का सच, मैंने तो बदला लिया था। सत्य से, बाबा से, तुमसे और सच पूछो तो सबसे बड़ा बदला स्वयं से था।

     जिसे मन दिया उसे तन से अपना न बना पाई, और जिसे शरीर दिया उसे कभी हृदय और मन से न अपना सकी। कामवासना की आग में हर दिन तुम्हारी यादों को जलाती, जब वह आग ठंडी हो जाती तो उन्हीं यादों की बची हुई ताजा गर्म राख को पूरे शरीर पर लपेट लेती। हर अंत में एक तस्वीर बनती और फिर मेरे आंसुओं से घुल भी जाती। चलो इसी बहाने ही सही, तुम दिख तो जाते थे।  मेरा हृदय रोता, मन रोता, अंतर्मन चीखता। इस दर्द को सहन करना मेरे लिए कितना मुश्किल रहा होगा, कभी सोचना ? यह था खुद से बदला लेना। तुम्हे न रोक पाने का बदला। 

     अब जरा अपनी नाइटेंगल वाली कहानी याद करो। राजा के सामने उसका प्यारा बुलबुल अपने साथी को प्रतिपल याद करता, उसने राजा को गीत सुनना भी बंद कर दिया कैसा लगाता रहा होगा राजा को ? और एक रात उसी साथी को याद करते-करते मर भी गया और वह कुछ न कर सका। कैसा महसूस हुआ होगा उसे ? यह मेरा सत्य से बदला था। सही व्यक्ति से सही सवाल न पूछने का बदला। उसे तो मुझसे पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार था कि नहीं। लेकिन यदि कभी यही सवाल वह तुमसे पूछे तो इसका जवाब तुम जरूर देना, क्योंकि तुम किसी शीरी के फरहाद नहीं।

      यद्यपि बुलबुल की मृत्यु महात्माजी के सामने न हुई लेकिन जब कभी भी उसकी मृत्यु की खबर उन तक पहुंची होगी तो उन पर क्या गुजरी होगी ? यह था बाबा से बदला। साथी बुलबुल को राजमहल से दूर करने का बदला। मुझसे अथाह प्रेम रखने के बावजूद उस पर विश्वास न करने का बदला। मेरे जिंदगी के फैसले में खुद मुझे शामिल न करने का बदला। 

     यदि कभी साथी बुलबुल लौट कर राजमहल आया होगा और उसने पिजड़े में कैद बुलबुल की दर्दनाक मृत्यु को जाना होगा, तब उसके मन में कैसी पीड़ा उठी होगी ? उसे तुम महसूस करना। यह रहा तुमसे बदला। इन तीन वर्षों में कभी भी लौट के न आने का बदला। जानती हूँ भूले नहीं होगे मुझे, लेकिन मैं तुम्हें भूल जाऊं इस बात के लिए मुझे मजबूर करने का बदला। जरा सोचना, एक लड़की ने अपने परिवार के चाहने पर तुम्हार त्याग किया, और तुमने बाबा के चाहने पर मेरा। क्या फर्क रह गया तुम दोनों में ? वैसी भी मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर तुम्हारी नाइटिंगेल की कहानी मेरे न रहने पर ही पूरी होती है न ?

    एकदिन तुम भी मेरी तरह तड़पोगे, तुम्हारा मन भी रोएगा, अंतर्रात्मा चीखेगी लेकिन तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे। जब दर्द की इन्तहा हो जाएगी तो तुम्हारे होठों में एक फीकी मुस्कान आएगी। हंसते-मुस्कुराते तुम्हारी आंखों में आंसू आयेंगे। 

   अब मैं अपनी कहती हूँ, मन में एक ही लालच था कि कभी न कभी तो मैं सीढ़ी के उस आखिरी पायदान तक पहुंचूंगी जहां पर शायद तुम खड़े मिलोगे। 

   याद करो पहला दिन जब तुम पहली बार इस अटारी में आए थे। डिनर के बाद सत्य चला गया और मैं अटारी में ही अपनी बुक को सलीके से कैटिगरीवाइज़ जमा रही थी, और तुम खिड़की की छड़ पकड़े कभी बाहर तो कभी मेरी तरफ देखते। मैने तुम्हारे बिस्तर को ठीक किया और तुम्हारी ही दी हुई पोएट्री बुक को लिए हुए सीढ़ी उतर रही थी। याद आया ? तो फिर उसके आगे की मैं कहती हूँ, सीढ़ी के आखिरी पायदान में मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई दी, जैसे तुमने पीछे से मेरा नाम ले कर मुझे धीरे से पुकारा हो। तुम्हारी आवाज की वह कशिश वह अपनत्व मेरे शरीर, मेरी अंतरात्मा को झंकृत कर गई। मैं तुम्हारी तरफ पलटी तो देखा तुम मुझे एकटक देख रहे हो, मैं भी तुम्हे उसी तरह देखती कुछ देर तक खड़ी रही कि शायद तुम कुछ कहोगे। लेकिन तुम खामोश थे, मैं पूछना चाहती थी, क्यूं पुकारा मुझे ? लेकिन मेरे मुख से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। तब पता चला कि तुम्हारी पुकार मेरे मन का भ्रम है, यदि तुमने पुकारा होता तो कुछ कहते न ? और यह भ्रम केवल उस दिन नहीं कई बार हुआ। जब तुम थे तब भी और आज जब तुम मेरे पास नहीं हो तब भी।

    मैं कभी-कभी एक संभावना में जीती हूँ, जो पूरी हो सकती थी लेकिन न हुई। नहीं... नहीं... गलत लिख गई, जो मैं पूरी कर सकती थी लेकिन नहीं की।
एक सुखद स्वप्न जिसमें मैं और तुम, दो नहीं एक होते हैं। काश ! जिस दिन तुम जा रहे थे, तुमसे सब कुछ सच-सच बता देती। और तुमसे कहती कि मैं कोई सर्जरी नहीं करवाऊंगी, बस जितने दिन हूँ, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। फिर जल्द ही तुमसे विवाह भी करती। 

     तुम्हारे नाम की माथे में बिंदिया होती। गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर होता। हम मन, वचन और कर्म से एकदूसरे के होते, हमारी जायज़ संतान होती। और इस तरह आज हम दोनों सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होते। मैं तुम्हें लेडी नॉर्टन, कीट्स, शेली की पोयम सुनाती और तुम्हारी कहानियों को पढ़ती।

    तुम्हारे साथ मैं भी कुछ कविताएं लिखती। तब हमारा जीवन कितना उल्लासित और हर्षित होता। जीवन जीने के प्रति मेरे मन में भी चाहत होती। तब शायद इतनी जल्दी मैं मृत्यु के इतने करीब न होती, और जब कभी इस दुनिया को अलविदा कहती भी, तो हमारा अंश तुम्हारे पास होता।

    मैं यह सब इसलिए लिख रह हूँ, ताकि तुम जान जाओ की सत्य से विवाह न करने की एकमात्र वजह यह नहीं थी कि मैं दो-चार वर्ष की मेहमान थी। बात प्राथमिकता की थी और यह बात मैंने तुमसे ही सीखी। याद करो आखिरी दिन जब तुमने मुझसे कहा था कि तुम मुझे जिस रूप में रखना चाहो मैं रहने के लिए तैयार हूँ, यही बात जाते-जाते तुम बाबा से कह कर गए थे। तुम्हारे लिए प्राथमिक मैं थी, न की कोई रिश्ता। और यह बात तुमने अपने जीवन में पहली बार प्रमाणित नहीं की, इससे पहले भी कर चुके थे। शायद यही वजह है कि उस लड़की की शादी हो जाने के बाद भी तुमने उस पर कोई इल्जाम नहीं लगाया, उसे बेवफा नहीं समझा। क्योंकि उसका प्रेम तुम्हारे जीवन में प्राथमिक था, रिश्ता नहीं। जो नहीं बन पाया तो क्या हुआ ?

   इसी तरह तुम मेरे जीवन में प्रथम स्थान रखते थे। तुम्हें अपने पास रखने के लिए मुझे जो भी कीमत चुकानी पड़ती, मैं चुकाती। चाहे वह कीमत विवाह होती या विवाह पूर्व ही तुम्हे तन सौंप सत्य को यह एहसास दिलाना कि मैं उसकी कभी थी ही नहीं, या फिर बाबा के सम्मुख याचक बन तुम्हे मांग लेना या फिर ध्रुव भैया को बुला कर उनसे अपनी राखी के प्रतिदान के रूप में अपना साथ देने को कहना। सच मानो मैं यह सभी कर्म करती, यदि उस शाम हिम्मत जुटा कर तुम्हे रोक लेती। और तुम ? यह जान कर भी कि मेरे न रहने पर तुम्हें इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, मेरी यादों के सहारे जिंदगी जीने की कीमत !! लेकिन वह तुम चुकाते। क्योंकि हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे तो यह कर सकते थे। 

   मेरी यह कहानी पढ़ कर लोग मुझे चरित्रहीन और उच्चश्रृंखल प्रवृत्ति की लड़की का खिताब दे सकते हैं, तो फिर उन्हें दे लेने देना। तुम बुरा मत मानना। यह सच है कि मैंने शुरू में सत्य के विवाह करने की इच्छा को यह कह कर टाल दिया था कि पहले हम एक दूसरे को समझते हैं, फिर विवाह भी कर लेंगे। लेकिन जब मुझे आभास हो गया कि किसी भी दृष्टिकोण से मुझे सत्य से प्रेम नहीं है। तो मैं उससे विवाह करने के लिए तैयार क्यों हो जाती ? उसके बाद उसने जितनी बार भी मुझसे यह इच्छा जाहिर की, मैंने उसे स्पष्ट शब्दों में मना ही किया। यहां तक की यह भी कहा कि तुम जहां चाहे, वहां विवाह कर सकते हो, मैं या मेरे बाबा रोक नहीं लगाएंगे। यदि तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो तो भी चले जाओ। यह बात स्पष्ट रूप से मैंने तुम्हारे आने के तीन दिन पहले उस रात भी कही थी जिस रात मैने तुम्हारा स्वप्न देखा था। लेकिन वही बात को टाल गया तो मैं क्या करती। क्या उसे अपमानित करके यहां से भगा देती ? मैंने उस पर कोई बंदिश नहीं लगाई। न ही भावुकता में आकर मैंने उससे कोई वादा किया था और न ही मैंने कोई इमोशनल ड्रामा या ब्लैकमेल किया। 

     इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि मैंने हमेशा विवाह से इंकार ही किया ताकि वह किसी भी बंधन में न बंधे, हमेशा मुक्त रहे। तब भी वह तीन साल तक मेरे पास रहा, क्यों ? और आज मैंने ऐसी कौन सी नई बात कह दी कि वह चला गया ? उस नादान को कम से कम यह तो समझना चाहिए था कि पूरे गांव में वह मेरे पति की हैसियत से ही पहचाना जाने लगा था। बाबा हों या चाहे ध्रुव भैया हो, उसे सभी इसी रिश्ते से जानते थे। और अंत में मैंने शरीर सौंप कर उसे यह एहसास दिलाया कि अब मैं तुम्हें छोड़कर कहां जा सकती हूँ ? जिसने यह भी न सोचा हो कि लगातार दस-बारह दिनों तक जिसके साथ सेक्स किया वह प्रेग्नेंट भी हो सकती है, फिर भी वह छोड़ कर गया। यह जानते हुए भी की मंगल और कमली के सिवा इस सूनसान घर में मेरे लिए और कोई नहीं है ? मैं आज तक यह नहीं समझ पाई कि उसके जाने की वजह क्या थी। मुझसे अपमानित होना ? या फिर अपनी अहमियत सिद्ध करना ? या फिर तुम ? या फिर उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ?

    मंगल बिना बताए उसे लेने के लिए उसके घर गया। कमली से मुझे बाद में मालूम पड़ा। यदि मेरे सामने जाता तो मैं उसे कभी न जाने देती। मैं अब तो ईश्वर से प्रार्थना भी करती हूँ कि उसके आने से पहले ही मुझे इस शरीर से मुक्ति मिले। लेकिन उसके आने के पहले तक के लिए भी क्यों सोचूं ? मैं तो चाहूंगी कि यह पत्र समाप्त होते ही, मैं इस दुनिया को अलविदा कह दूं। क्रोध की पराकाष्ठा घृणा होती है। पहले सत्य पर क्रोध आया और वह क्रोध जब अपनी चरम सीमा को पार कर गया तो घृणा में बदल गया।

   आश्चर्य हो रहा है न ? तो इसका कारण ऊपर के संभावित सवाल में है। जिनका उत्तर निचले क्रम से मैं दे रही हूँ।

    उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ? बिल्कुल उसकी यह सोच सही है। जब मेरे अपने लोग और आसपास के लोग उसे मेरे पति के रूप में उसे स्वीकार कर चुके थे तो उसका यह सोचना वाजिब है। लेकिन मेरा शरीर पा लेने के बाद, उसका चले जाना, उसके प्रति उत्पन्न होने वाली घृणा का प्रमुख कारण है। 

    या फिर तुम ? नहीं बिल्कुल नहीं। तुम्हें गए तो तीन साल होने को हैं। यदि इसी कारण से उसे दूरी बनानी थी तो कब का बन चुका होता। मुझे तुम्हारी टीशर्ट पहने हुए देखना और फिर मेरी डायमंड रिंग को इंगेजमेंट फिंगर में पहने हुए देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। और फिर मेरी बातें जिसमें अक्सर तुम होते थे उसे सुनना, मेरी आंखों में तुम्हारे लिए बेशुमार मोहब्बत देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। इन सबके बावजूद वह तीन साल तक मेरे साथ रहा तो क्यों ? वास्तव में उसे मैं नहीं बल्कि उसे मेरे पति-पत्नी का रिश्ता चाहिए था। क्यों ? यह उसका मेरे प्रति मोह था या फिर कोई और लालच ? 

    अपनी अहमियत सिद्ध करना ? बिल्कुल हो सकता है। बाबा के जाने के बाद वह इस घर में मालिक की तरह रहा। उसने सोचा होगा चलो अब मैं देखता हूँ कि ये सब अकेले तुम कितना और कैसे मैनेज करती हो ? एक न एक दिन या तो बुलवाओगी या खुद मनाने आओगी। 

   मुझसे अपमानित होना ? नहीं, यदि विवाह से इंकार करना ही उसे अपना अपमान लगा तो यह तो मैं कई बार कर चुकी थी। 

     तुमने सच कहा था, कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, क्योंकि वे गुनाह, गुनाह नहीं, गुनाह-ए-अजीम होते हैं। उनकी सिर्फ सजा मिलती हैं। उसे भी जिसने गुनाह किया है और उसे भी जिसके प्रति गुनाह हुआ है। तुम्हारे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम्हें जाने दिया, मेरे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम फिर लौट के न आए। यह गुनाह हम दोनों से हुआ, तो फिर सजा मिलना तो तय था और मिली। खुद को सजा दे कर मैने अपराधबोध से मुक्ति पा ली और तुम्हें सजा दे कर तुम्हें किसी भी पछतावे से मुक्त कर दिया। सत्य मेरे द्वारा दी गई सजा से मुक्ति के लिए तड़पेगा। उसकी पत्नी होने के नाते यह अधिकार में तुम्हें देता हूँ कि उसे मुक्ति मिलनी चाहिए या नहीं। 

      इसीलिए मैंने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर उसे पत्र में लिखा है कि जब तक तुम यहां एकबार नहीं आ जाते मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम एक बार यहां ना आ जाओ तुम अटारी में रखी मेरी बुक्स को वह किसी स्कूल या लाइब्रेरी को दान न करें। यह काम तुम करोगे। इसके लिए मैंने उसके उस बच्चों की सौगंध दी जो इस दुनिया में आने से पूर्व ही अपनी मां के साथ काल के गर्त में समा जाएगा। पहली बार मैंने उसका भावनात्मक उपयोग किया, ताकि तुम एक बार यहां आ सको। इस पत्र को पढ़ सको और अपनी अमानत माइलस्टोन के लिए लिखी गई कविताएं ले जा सको।

      कभी सोचती हूँ, आध्यात्मिक प्रेम में शरीर का भला क्या महत्व, वह तो इससे परे होता है न ? कभी उसके विवाह को देख फिर मेरा त्याग कर तुम शरीर के मोह से मुक्त हुए और अब मैं भी हो गई। हम दोनों अब एक ही धरातल पर खड़े हैं, इसलिए लिखती हूँ कि अब इस शरीर का त्याग करने पर भी मुझे कोई कष्ट नहीं होगा।

   अब भी तुम्हारी इस टी-शर्ट में मेरी जान बसती है। उसे ही बार-बार पहनने का मन करता है, लेकिन थोड़ी देर में उतार कर अच्छे से सहेज के फिर से रख देती हूँ कि कहीं जल्दी पुरानी न हो जाए... उधड़ न जाए या फट न जाए।

      मुझे ऐसा क्यूं महसूस होता है कि जब तक तुम्हारी ये टी-शर्ट मेरे पास है, तुम मेरे पास न होकर भी मेरे पास ही रहोगे ? क्यूं महसूस होता है कि जैसे मेरे जीवन का और शायद उसके बाद का भी अस्तित्व इसी के जुड़ गया है ?  क्यूं जब भी इसे पहनती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि तुम मेरी रूह के साथ मेरे जिस्म से भी लिपट गए हो ? क्यूं जितनी बार भी इसे धुलती हूँ तो तुम्हारे परफ्यूम की खुशबू फिर से एक नए अंदाज में महक उठती है, और मेरे वजूद के हर हिस्से में समाती चली जाती है ?

   अब क्यूं अक्सर खुद से पूछती हूँ कि टाइम कितना हो गया होगा ? और उसके जवाब की तलाश में सोती हुई रात में अपने बेडरुम से बाहर निकल आंगन में आ कर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर आसमां में चांद सितारों की पोजीशन को देख अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ।

    शायद उस दिन तुमने ठीक कहा था कि कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं, जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। क्या वही काम मैने खुद स्वयं के लिए किया...? नहीं, बाबा के लिए भले ही सत्य बेहतर विकल्प रहा हो लेकिन मेरे लिए तो तुम ही थे, जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर मैं चली जाती। तुमसे झूठ बोल सकती थी कि मुझे भी पहले कुछ नहीं मालूम था। पीछे रह जाते तुम, तब तुम मुझसे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। 

   सही लिखा न ? तुम तो पहले से ही बिखरे हुए मुझ तक पहुंचे थे। मैं पूरे मन योग से तुम्हें संवारती, अपने नजरिया से एकत्र करती और फिर एक दिन तुम्हें बिखेर, स्वयं चली जाती ? तो फिर बताओ तुम क्या करते ? जरा शांत मन से सोचना क्या त्याग सिर्फ तुमने किया ? सत्य ने मेरी अभिरुचियों का सम्मान जरूर किया लेकिन उसके साथ जुड़ न पाया। मैने जो बुक्स के नाम उसे लिख के दिए उसने ला के दी,  लेकिन मुझे याद नहीं आता कि कभी उसने कोई कहानी या कोई छोटी सी कविता ही मेरे साथ पढ़ी हो या उनके विषय में डिस्कसन किया हो। यदि मैने कभी करना भी चाहा तो यह कह के टाल गया, "छोड़ो यार ये सब बेकार की बाते हैं...", या फिर, "...मैं तुम जैसा समझदार नहीं हूँ..."

   धीरे-धीरे यह समाज और उसके रीति रिवाज मुझसे ऊपर नजर आए। मुझे वैवाहिक बंधनों में बांधने की चाहत इतनी प्रबल हो चुकी थी कि उसने कभी भी मेरे इंकार की वजह पूरी ईमानदारी के साथ जानने की जरूरत ही नहीं समझी। वह इसे बहुत ही कैजुअल लेता था। उसने धीरे-धीरे अपने मन में मेरा अक्स बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज की लड़की के रूप में स्थापित कर लिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं। उसने कभी भी पूरी ईमानदारी से मेरे साथ जुड़ने की  कोशिश ही नहीं की। यदि करता तो मेरी अभिरुचियों में ही मुझे समझ पाता। वह तो मांग और पूर्ति पर आधारित बाजार के सिद्धांत की तरह मुझे अपनाना चाहता था। कैसे कामयाब हो जाता ? 

   मैने दार्शनिक, पौराणिक, और आधुनिक सभी तरह के लिटरेचर पढ़ें, और सच पूछो तो बहुत पढ़े, लेकिन कभी लिख नहीं पाई। जब भी कुछ लिखने की कोशिश की तो यही सोचा न जाने कैसा लिखूं ? किसी को पसंद आएगा कि नहीं ? लेकिन उस दिन बगिया से लौटते समय मैने बड़ी हिम्मत करके तुम्हे अपने जीवन की पहली चार लाइन सुनाई थी, तुम्हे याद तो होगी न...?

  इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
  यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
  तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
  एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।

     और फिर तुम्हारा ये कहना, "... वाह ! काश मैने लिखा होता...", मेरे दिल को छू गया। यहां पर बात आत्मप्रशंसा के आत्मिक-सुख की नहीं थी। बात तो थी इनकरेज करने की, किसी को हिम्मत देने की। कभी सत्य मेरी अधूरी रह गई एजुकेशन को लेकर चिंतित था। वह चाहता था कि मैं उसे पूरा करूं और कंपटीशन एग्जाम की तैयारी करूं और अंत में सर्विस करूं। मैं नहीं कहती कि उसकी सोच गलत थी लेकिन उसकी इस सोच में मैं कहां थी ? उसने यह नहीं पूछा कि पीहू तुम क्या करना चाहती हो, तुम्हारी पसंद क्या है ? उसकी समझ में मेरे लिए जो बेहतर लगा उसी को पूरा करना चाहा। लेकिन तुम मेरी जिंदगी में मेरे पैरेंट्स के अलावा वह पहले इंसान थे जिसने मुझसे ये पूछा था। और आज देखो तो उसी का नतीजा है कि अधूरी ही सही एक पोयम लिखी और तुम्हें इतना लंबा पत्र लिख रही हूँ...

   इसीलिए लिखा कि तुम मेरे लिए बेहतर विकल्प थे और मेरा प्यार भी। मेरा तुम्हे प्यार करना उतना ही कुदरती था जैसे इंसान खुद से प्यार करता है। किसी के त्याग को मौन रह के स्वीकार कर लेना उससे भी बड़ा त्याग होता है। तो मेरे प्रियवर ! अपनी इच्छाओं का, अपने बेहतर विकल्प का, और अपने प्यार का  त्याग सिर्फ तुमने ही नहीं मैंने भी किया, और सच पूछो तो तुमसे कहीं अधिक किया। तुम्हारे लिए तड़पी, रोई, पागलों की तरह घंटों-घंटों बगिया में उसी आम के पेड़ के नीचे बैठी रही। ढलते हुई शाम को देख लेडी नॉर्टन की वही पोयम गुनगुनाती रही। जब थक जाती तो अपनी चुनरी ओढ़ के वहीं लेट जाती। कुछ लिखने की कोशिश करती फिर अधूरा छोड़ देती, किसके लिए लिखती ? अब तो कोई कहने वाला भी तो नहीं था,  "पीहू ! काश मैने लिखा होता..."

     ज्ञान भैया ने तुमसे कहा था न, कि कभी-कभी न कहने का दर्द कह देने के दर्द से कहीं अधिक होता है, तो उन्होंने सच ही कहा था। यह तो अच्छा हुआ कि आखिरी दिन ही सही, तुम्हारे साथ-साथ मैने भी अपने अंतर्मन के सच को स्वीकार कर लिया। कुछ तुमसे कह दिया, जो नहीं कह पाई तो इस पत्र में लिख दिया। आज सोचती हूँ, यदि न किया होता तो ? फिर तो तुम्हे पूरी किताब ही लिखनी पड़ती, है न ? 

   यदि ऐसा न होता तो आम के पेड़ की छांव में या फिर चलतो हुई राहों में तुम्हें कस कर गले न लगाया होता। आज भी उस आईने को मैंने सहेज कर न रखा होता जिसमें अंतिम बार तुम्हारी सूरत के साथ अपनी सूरत देखी थी। आज भी जब कभी उसमें अपनी सूरत देखती हूँ तो क्यों चुपके से तुम भी आ जाते हो ? और मैं महसूस करती हूँ कि जैसे मै तुम्हारे कंधे पर सर रख तुम्हे देख रही हूँ, तुम्हारे गाल को फिर से चूम रही हूँ। इन सभी पलों में मुझे समझ में आता है कि तुम मेरी जिंदगी में क्या मायने रखते थे... और आज भी रखते हो...

    तुम्हारे साथ मैने अपने जीवन के महज चार दिन ही तो जिए थे। उन चार दिनों में तुम्हारे साथ हंसी, रोई, तुम्हे गले लगाया, साथ में शराब पी, यहां तक कि सिगरेट पीने की कोशिश भी की। जो तुमने कहा, सुनती गई। वे सभी लम्हे मेरी निगाहों में आज भी कैद हैं। जहां जरूरत महसूस की तुम्हें डाटा भी, लेकिन कभी तुमसे नाराज नहीं हुई और न ही तुमसे रूठने का मन किया, क्यों ? शायद इसलिए कि लोगों को अक्सर कहते सुना है कि जिंदगी चार दिन की होती है, और यह चार दिन मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी। क्यों तुम्हारा मेरे साथ होना मेरे आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा पर भारी पड़ गया ?

      और इन सब का जवाब वही एक सवाल है, जो सत्य ने मुझसे कभी नहीं पूछा। उसे तो पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं, लेकिन नहीं, उसने कभी नहीं पूछा, क्यों ? 

    कहते हैं यदि किसी के मन में और हृदय में किसी के लिए प्रेम हो तो वह आंखों से छलकता है, फिर वह जमाने से भी नहीं छुपता। तो फिर मैं यह कैसे मान लूं कि जिस प्रीत को मंगल और कमली ने हमारी आंखों में देखा, उस प्रीत को सत्य ने न देखा होगा ? तुम याद करो वह आखरी दिन जब हम बगिया से घर तक साथ चलते हुए आए थे। उस दिन मेरी इच्छा का सम्मान सत्य ने ही किया था और उसने मेरा फेवर लिया था। वास्तव में वह अपनी इसी शंका की पुष्ठि करना चाहता था। हम दोनों घर देर से पहुंचे और उसे अपनी शंका सही प्रतीत हुई। उसके मन में असुरक्षा की भावना जागी जिसका जिक्र उसने अपने सामने अपने ही तरीके से बाबा से किया। तो फिर जवाब मालूम होने के बाद भी सवाल कैसे पूछता ? वह जानता था कि यदि उसने पूछ लिया तो पीहू झूठ नहीं बोलेगी। तब उसकी सभी संभावनाएं समाप्त न हो जाती ? मैं चाहूं या न चाहूं, वह तो मुझसे शादी करना चाहता था न ?

     उसने मुझसे एक रिश्ता चाहा था तो उसे मिला। लेकिन तुमने जो चाहा तुम्हे न मिला, यानी मेरा साथ, मेरी नजदीकियां। रिश्ते नातों से दूर मेरे साथ जिंदगी को जीने की ख्वाहिश तुम्हारी पूरी न हुई। इसका दोषी भी मैं तुम्हें ही मानती हूँ। किसी को प्यार की उन ऊंचाइयों पर ले जाकर न खड़ा कर दो जहां वह देवी या देवता बनने के लिए मजबूर हो जाए और फिर उस तक पहुंचने के लिए तुम खुद ही तरस जाओ। नियति ने तो तुम्हे वो रांझणा बना के रख दिया जो हीर की चौखट में न तो हीर की भिक्षा मांग सकता था और न ही उसे छीन के ले जा सकता था। 

   कभी - कभी मेरे मन में एक सवाल उठता कि सत्य मेरे जीवन में क्यों आया जिसका जवाब आज मुझे मिल गया है। नियति हमें एक दूसरे से मिलना चाहती थी और कारण उसे बनाया। 

    तुम यहां पर दोबारा क्यों आए हो ? आए हो या लाए गए हो ? यदि सत्य तुम्हें यहां लेकर आया है तो क्यों ? यदि वह तुम्हारे साथ अटारी पर नहीं है तो क्यों ? और यह पत्र यदि तुम रात को अकेले पढ़ रहे हो तो क्यों ? यदि वही मौसम है जिस मौसम में हम पहली बार मिले थे, और बाहर चंद्रमा की मद्धिम रोशनी चारों तरफ फैली हुई है, तो क्यों ? ....

    अचानक पूरी अटारी में अंधेरा छा गया, शायद लाइट गुल हो गई थी। पत्र के इस भाग को पढ़ते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे पूरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गई... बाहर खिड़की से आता हुआ चंद्रमा का हल्का-हल्का प्रकाश, और मेरे दिमाग में गूंजता हुआ एक प्रश्न, "आखिर मैं यहां क्यों हूँ..."

    एक हाथ में पत्र लिए मैं बिस्तर पर निढाल लेट गया। मेरी आंखें बंद, दिल की धड़कने तेजी से चल रही थी। सत्य और पीहू दोनों का नजरिया और एकदूसरे के प्रति सोच मेरे सामने आ चुकी थी। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित विवाह के लिए सत्य की मांग नाजायज नहीं थी। लेकिन नहीं, पीहू ने मौन रह के बाबा के कहे अनुसार न केवल अधमने मन से रिश्ते को स्वीकार किया बल्कि अपने आचरण से जाहिर भी किया। उसे बाबा से खुल कर बात करनी चाहिए थी।

     सत्य की गलती यह थी कि जिस पल पीहू ने सशरीर उसे स्वीकार किया तो सत्य को दृढ़ता के साथ मना करना चाहिए था कि नहीं पहले तुम मुझसे सामाजिक रूप से विवाह करो, फिर ये सब बाद में होगा। लेकिन उसने भी अपनी मौन स्वीकृति दी, तो फिर पीहू उसकी पत्नी हुई न ? और केवल दस बारह दिन के बाद ही उसे छोड़ के केवल इसलिए भाग जाना कि अब पीहू सामाजिक रूप से विवाह के लिए तैयार नहीं, मुझे कहीं से उचित नहीं लग रहा था। पीहू ने तो उससे कहा नहीं होगा कि आओ पहले सेक्स कर लेते हैं फिर सबके सामने शादी करेंगे। बाबा ने कन्यादान कर दिया और तुमने स्वीकार किया, पति-पत्नी की तरह रहे, उसके मौन शारीरिक समर्पण को स्वीकार किया और एकदिन उसे छोड़ कर भाग गए!! वह अकेली थी, बाबा भी गुजर चुके थे, और तुमने इतना कठोर निर्णय ले लिया !! अरे भागना था तो उसी दिन भाग गए होते न जिस दिन बाबा ने कंयादान किया था, या फिर तब जब पीहू ने पहली बार शादी के लिए मना किया होगा।

      और इस कहानी में यदि मैं अपने आप को कटघरे में खड़ा करूं तो कैसे और क्यों ? किसी तीसरे व्यक्ति के रूप में मैं खुद को निरूपित करू तो क्यों और किस हद तक ? यदि पीहू से मेरे विचार, मेरी आदतें, मेरा दृष्टिकोण मैच कर गया, और हमें एक दूसरे से प्यार हो भी गया तो इससे किसी का क्या नुकसान हुआ ? क्या पीहू से मेरी मुलाकात न हुई होती तो वह सत्य से शादी करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाती ? यदि हां, तो मुझसे मिलने से पहले भी वे दोनों चार महीने तक क्या कर रहे थे ? क्यों सत्य ने मुझसे कहा कि मैं पीहू को विवाह के लिए प्रेरित करूं... क्या सत्य को पूर्वानुमान हो चुका था कि पीहू के प्रेम के किसी भी खांचे में वह फिट नहीं बैठता है। मैंने तो ज्ञान से नहीं कहा था कि वह पीहू से मेरे बारे में बात करें और न ही उसने की, तो फिर ? जो भी बात की तो मेरी गुजरी जिंदगी के बारे में। जबकि उसके इस पत्र के अनुसार तब, जब वह प्यार की पहली सीढ़ी चढ़ चुकी थी। अधिक से अधिक ज्ञान से मेरे फैमिली बैकग्राउंड, मेरी प्रेमिका और आत्महत्या करने के प्रयास के बारे में जानकारी मिली होगी। इससे अधिक वह क्या बता सकता था ?

     अब सवाल यह नहीं है कि प्रेम क्या है, और क्यों होता है ? सवाल तो यह है कि किससे होता है या होगा। और शायद जिसका जवाब मैं पहले ही पीहू को दे भी चुका हूँ। नहीं तो और क्या कारण रहा होगा कि पीहू ने अपनी पूरी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मैने उससे। मुझसे ज्ञान में अधिक, लुक-वाइज और सुंदरता में मुझसे कहीं अधिक, यदि हमारे बीच कुछ मैच करता था तो वह था जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण अर्थात नजरिया, एकदूसरे की विचारधारा, अभिरुचि। एक साथ दिन भर रहने के बाद भी यही लगता कि अभी वक्त ही क्या हुआ है।

      हमने एक दूसरे को प्रभावित नहीं बल्कि चकित किया। अरे ! तुम भी यही सोचती हो ! वाह !! वंडरफुल !!! इस प्रेम में स्थिरता थी, सहजता थी। सोच में एक गहराई थी। दीवानगी सिर्फ इतनी थी कि हम एक दूसरे को दुःखी नहीं देख सकते थे। जब कभी मैं रोया तो उसने फौरन मुझे गले से लगा लिया, उसके रोने पर मैंने उसे गले लगा लिया, फिर हम दोनों ही एक दूसरे का दुःख महसूस कर रोए। कहना-सुनना बाद में होता रहा। बस यही तो हमने किया। नहीं तो कौन-सा हम दोनों ने चांद-सितारे तोड़कर एकदूसरे के हाथ में रख दिए ?

  मैं कुछ देर तक इन्हीं विचारों में खोया रहा। एकाएक मुझे आभास हुआ जैसे किसी ने मुझे पुकारा हो। कौन हो सकता है, शायद सत्य हो ? मै उठकर बैठ गया। मैंने कंफर्म करना चाहा, धीरे से पुकारा, "सत्य ..", लेकिन कोई जवाब न मिला।

    मैंने सोचा मेरा वहम होगा। मैं लेटने ही वाला था कि फिर किसी ने मुझे पुकारा इस बार की आवाज पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट थी।

   अब तक खिड़की से आते प्रकाश का मैं आदी हो गया था। मुझे अब अटारी में सब कुछ लगभग स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मैंने सीढ़ी के पास खड़े होकर नीचे झांक कर देखा, घुप अंधेरे के सिवा वहां भी कोई नहीं था । मैंने फिर भी कंफर्म करना चाहा, मैंने फिर धीरे से पुकारा "सत्य !..."

    लेकिन अचानक मेरे दिमाग में धमाका हुआ, आखिर मैं सत्य को पुकार ही क्यों रहा हूँ। जहां तक मुझे समझ में आ रहा था, दोनों बार की आवाज तो किसी लड़की की आवाज थी। अभी तक मेरा ध्यान क्यों न गया ? यही सब सोचते हुए मैं जैसे ही पलटा फिर से किसी ने मुझे पुकारा और इस बार की आवाज कुछ ऐसी थी जैसे किसी ने दूर से पुकारा हो। उस आवाज में अथाह करुणा थी।

     अगले ही पल मैंने खुद को खिड़की के पास खड़े हुए पाया। बाहर गौशाला, उसके सामने सड़क, सड़क के उस पार शीशम का पेड़, और उस पेड़ के नीचे खड़ी पीहू ।

    यदि कोई काल्पनिक कहानी लिख रहा होता तो निश्चित है यह सब मैं कभी नहीं लिखता। क्योंकि मैंने विज्ञान पढ़ा है, और जिसका प्रमाण नहीं, जो निराधार है, विज्ञान उसे नहीं मानता है। तो फिर मेरी कल्पना में भी उसका कोई स्थान नहीं होता। लेकिन यह कहानी तो मेरे जीवन का एक अंश है, और जिसे मैं घटते हुए देखा रहा था, महसूस कर रहा था और जिसका प्रमाण मेरे सामने, जीता-जागता खड़ा था। उसे कैसे अनदेखा कर देता ? उसे कैसे और क्यों न लिखता ? 

    न तो मैं शराब के नशे में हूँ, और न ही मैं इसका आदी हूँ। पांच साल पहले जब मैं यहां से गया था तब से लेकर आज तक मैने कभी-कभार ही पिया था, वो भी लिमिट में। मैंने उससे वादा किया था कि मैं देवदास नहीं बनूंगा, और मैंने ये वादा पूरी ईमानदारी से निभाया था। तो मैं यह भी मानने के लिए तैयार नहीं कि नशे में होने से या उसका आदी होने से मेरे दिमाग के न्यूरॉन्स ने एक डिल्यूजन या भ्रम की स्थिति पैदा की है, बिल्कुल नहीं। 

     तभी मैंने देखा वह कुछ कदम चलाते हुए सड़क पर आई। अब पूरा का पूरा चंद्रमा का मद्धिम प्रकाश उस पर पड़ रहा था। उसकी नज़रें बिल्कुल खिड़की पर लगी हुई थी। चंद्रमा की उस शुभ्र ज्योत्स्ना में वह बेहद शांत लग रही थी। 

     पता नहीं क्यूं मेरे अंदर का डर चला गया और दुविधा एक पल में दूर हो गई। उसे सामने देखकर मन में प्रसन्नता हुई। अब मेरे अंदर रंच मात्र का भय नहीं रह गया। पल भर के लिए मैं भूल गया कि पीहू मर चुकी है। दोनों हाथ से खिड़की की छड़ पकड़े उसकी तरफ मैं एकटक देखता रहा। मेरा शरीर बिल्कुल हल्का हो गया। लगा, जैसे मैं जीवन और मृत्यु से परे हो चुका हूँ। मन के सभी शोक और संताप प्रकृति में ही कहीं विलीन हो गए।

   उसे यूं सामने देख मेरी आँखें भर आने को थीं। होठों में फीकी मुस्कान दौड़ गई। नियति ने हमें एक बार फिर एकदूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन कितने विपरीत !! शारीरिक बंधनों में बंधा हुआ आज मैं उसकी अटारी पर था और वह इन सभी बंधनों से मुक्त बाहर खड़ी थी।  

    मृत्यु से मुझे डर नहीं और पीहू से डरने की कोई वजह नहीं। यदि यह उसकी आत्मा है, तो भी नहीं।यदि केवल मेरे मन का भ्रम है, तो भी नहीं। और फिर जिसके न रहने पर मैं दर्द में तड़पा, उसे एक बार देखने और मिलने के लिए तरसा, उसके सामने आते ही मैं डर जाऊं ?

  अचानक लाइट आ गई। मैने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा सामने कहीं कोई नहीं था। मेरे हाथ में अभी भी वह नोटबुक थी। मैं आराम से बैठ पत्र को आगे पढ़ने लगा...

    कभी-कभी मैं सोचती थी कि तुम क्या थे, राइटर, एक्टर या फिर डायरेक्ट ? तुमने एक्टिंग की तो बिल्कुल नॉर्मल इंसान की तरह, जब लिखा तो गहरी बातें, और डायरेक्ट किया तो पीहू को पीहू से ही मिला दिया। अरे पागल यह भी न सोचा, यदि पीहू, पीहू से मिल गई तो सिर्फ तुम्हारी होकर रह जाएगी ? 

   जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे तुमने, मैंने भी देखें लेकिन उन सब का हासिल क्या था ? हमारा तुम्हारा मिलना ?  सत्य का मेरे जीवन में आना मेरे अपनों की मुक्ति थी, और तुमसे मिलना, मेरा खुद से मुक्त हो जाना !! अब मैं खुद की कहां रही !!!

    क्या जानती थी कि मैं खुद अपने आप को ऐसे बंधन में बांध लूंगी जिससे दूर जाना मेरे बस में नहीं होगा। फिर एक दिन तुम आए, सोने के पिंजड़े में कैद बुलबुल की बगिया में आ कर चुपचाप बैठ गए।

    मैं तुम्हें जब भी सोचती हूँ तो कोई अध्यात्म कोई दर्शन कोई फिलासफी मेरे काम क्यूं नहीं आती ? तुम बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। यदि उन सभी बातों का अर्थ निकालती हूँ तो सिर्फ तुम्हारा चेहरा ही क्यों नज़र आता है ? 

    बिछोह के अंतिम पलों में कभी मेरी अटारी की सीढियों को उतरते समय तुमने मुझसे कहा था, "पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", जानती हूँ उस पल तुमने कोई एक्टिंग नहीं की थी। तो फिर आओ, मैं तुम्हें हृदय से, मन से, और अंतर्मन से पुकार रही हूँ, असंख्य सितारों की तरह मेरी आंखों से झिलमिलाते, चमकते हुए आ जाओ। मुझे गले से लगा लो, मेरे आंसुओं को पोंछ लो, या फिर मेरे साथ जी भर के रो ही लो। तुम्हारी ही बात तुम्हे याद दिलाती हूँ, सैम्पेथी नहीं कॉन्डनेस चाहिए जो मेरे अंतर्मन के दर्द से मुझे मुक्ति दिला दे...

   कहते हैं मरते समय इंसान को जोरों की प्यास लगती है, यदि यह सच है तो अब मुझे इसकी भी परवाह नहीं कि मेरे पास मुझे पानी पिलाने के लिए कोई होगा या नहीं। उस रात बेखुदी में जब मैं तुम्हें सत्य समझ कर अपने दिल की बातें तुमसे ही कह रही थी, और तुम कुछ घबराए से मुझे होश में लाने के लिए नींबू-पानी पिला रहे थे, बेखबर इस बात से कि मैं तो पहले से ही होश में आ चुकी थी, फिर भी बेहोशी का नाटक करती रही। 

     सच तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी, बल्कि उस आत्मिक सुख की अनुभूति करना चाहती थी जो सिर्फ अपने प्रियवर से मिल सकतो थी। अपने लिए तुम्हे परेशान देखा, अपने जज्बातों को नियंत्रित करते देखा।

    तुम्हारे सीने पर सर रखकर तुम्हारी बाहों के घेरे में तुम्हारे ही हाथों से पानी पिया। इनकी भी स्मृति मेरे पास है, और शायद इसलिए जब मरते समय तुम्हारी पीहू को प्यास लगेगी तो वह इस धरती से प्यासी न जाएगी। 

      शायद तुम्हारी पीहू का इस धरती से जाने का समय नजदीक आ चुका है। जब न रही तो फिर किससे कहोगे, "पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", तो उसे विदा करने ही आ जाओ। देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ मैं उतनी ही बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ मुझे...

    कभी इसी अटारी में मैंने तुमसे पूछा था कि यदि कुदरत तुम्हें अपनी मृत्यु के चुनाव का अवसर दे तो कैसी मृत्यु चाहोगे। याद है न, इस पर तुमने कहा था, "यदि नियति मुझे मेरी मृत्यु का चुनाव करने दे तब मैं एक ऐसी मौत मरना चाहूंगा जिसमें प्रिय की प्रतिक्षा हो... एक आस हो उसके आने की... मेरी आंखे खुली हुई हों... और मेरे दिल की धड़कन आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जाए। एक ऐसी मृत्यु जिसमें जीवन का संगीत हो... जिसकी स्वर-लहरी अपने चरम पर पहुंचकर धीरे-धीरे शांत हो... उसके सभी सुर मेरे हृदय में समाहित होते चले जाएं... वीणा की ऐसी झकार जो तार टूटने के बाद भी कुछ देर तक गूंजती रहे... मैं जीवन का यही संगीत सुनते हुए अपने प्रिय की प्रतीक्षा में मृत्यु का वरण करना चाहूंगा..."

   उसदिन तुम्हारे द्वारा कही गई यह बात मेरे अंतर्मन में इस कदर बैठ गई कि मैं फिर कभी भूल ही न पाई। तो चलो अच्छा ही हुआ, जिंदगी के इस रंगमंच में अपनी अंतिम सांस लेते हुए इस किरदार को अभिनय के लिए तुम एक स्क्रिप्ट तो देकर गए। मुझे याद आती हैं, तुम्हारे बाहों की बंदिशें, तुम्हारे लफ़्ज़ों की रुमानियत, संगीत जिसकी लहरों में मेरा मन आज भी तैरता है। कुछ पा लेने और खो देने के डर से दूर, मैं ऐसे संसार में पहुंच गई हूं जहां तुम हो, सिर्फ तुम हो।

     अब यही मेरे मन की भी आखिरी इच्छा है, जब मैं यह संसार छोडूं तो मेरी आंखें खुली हो, और मैं तुम्हें सीढ़ी के आखिरी पायदान पर खड़े एकटक देखती रहूं। इसीलिए अब मैने अपनी चारपाई खिड़की के कुछ और पास कर ली है, और उसी तरफ सर करके लेटती हूँ। शायद मरते समय ही सही तुम आ जाओ। यदि नियति ने मेरे न रहने पर ही तुम्हारे आने को निर्धारित कर रखा है, तो लिखती हूँ, फिर तुम किसी शीरी के फरहाद बन के मत आना।

   तुम्हे याद है, इसी बगिया में तुमने मुझे कविता के रूप में एक कहानी सुनाई थी, दो सितारों की कहानी ? शायद हम दोनों उस कहानी के वही दो सितारे हैं, जो एकदूसरे के करीब आए, एकदूसरे के मन को लुभाए। फिर हमारे मन में एकदूजे के साथ जिंदगी को जीने की लालसा जागी। लेकिन मेरे पास जिंदगी बची ही कहा थी मेरे दोस्त। पर जो भी थी मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी, लेकिन... देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की ये दुनिया... ये सूरज, चन्द्र, ग्रहों, उपग्रहों की दुनिया, इनके आगे तो बाबा भी हारे।

       जिन्हें मैने अपने जीवन में ईश्वर का स्थान दिया, वो एक पछतावा लिए इस दुनिया से गए। शायद उनके लिए नियति ने यही सजा निर्धारित की थी। लेकिन उनकी सजा क्या है जिन्हें महसूस हुआ कि हमारे साथ रहने पर संपूर्ण सृष्टि के नियम भंग हो जाएंगे, ब्रह्मांड हिल जाएगा, न जाने इस धरती में कितने भूकंप आ जाएंगे...? याद करो तुम अपनी कहानी...

   "उनके नजदीकी आकर्षण से, मन में उठती लहरों से, दिल की सच्ची बातों से, कुछ और करीब आने से, सृष्टि नियम बिगड़ते देखा। सब मिलकर जा प्रभु से बोले। दूर करो अब इन दो तारों को, प्रेम में पागल इन दो न्यारों को..."

   तो क्या इन देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की कोई सजा नहीं...? ईश्वर तो करुणामयी होता है... उत्पात तो इन्होंने मचाया, ईश्वर को भी नियति से श्रापित होने पर मजबूर किया ? 

    मैने तुमसे यूं ही नहीं कहा था, कि तुम मेरी नियति बन के आये और मैने तुम्हे अपनी किस्मत समझ जाने दिया। तो एकबार फिर तुम नियति बनाकर आओ। जब भी तुम्हारे बारे में सोचती हूँ तो मन में हूक सी उठती है। यदि उसने हम दोनों की आंखों में एक दूसरे के लिए प्यार देख भी लिया था तो भी उस नादान को यह तो सोचना चाहिए था कि जो चार महीने तक एक ही बिस्तर में होने के बाद भी उसकी हम-बिस्तर न हुई, कभी भी विवाह के लिए अपनी सहमति न दी तो उस लड़की के हृदय और मन में उसके लिए कितना और किस स्तर का प्रेम रहा होगा ?

       बाबा की एक भूल, वही ग्रहों, उपग्रहों, सूर्य, चंद्र की दुनिया से स्थापित एक रिश्ते का दंभ पाले मेरे संपूर्ण जीवन का परमेश्वर बन गया। जब उसने बाबा से हम दोनों के बारे में बात की होगी, उस क्षण बाबा ने हम दोनों के बारे में क्या सोचा होगा ? उसके कुछ शब्दों में बाबा के हृदय में हजारों शंकाओं को न जन्म दे दिया होगा ? मुझे छोड़कर जाने के अपराध से तो मैंने उसे उसी दिन मुक्त कर दिया था जब मैंने उसे अपने चित से निकाल फेंका। लेकिन इस अपराध से उसे मैं कैसे मुक्त कर दूं ? वह मेरा ही नहीं हमारे बीच निश्छल प्रेम का अपराधी है। इसलिए तुम्हें पुकारती हूँ, जब भी तुम आना तो नियति बन कर आना। एक अजनबी की तरह ही निष्पक्ष भाव से अपना फैसला देना।

     या मेरे जीवन के स्वाति नक्षत्र बन के आना। तुम्हें मेरा नाम बहुत प्यार लगता था न ? अपने शब्दों में दी गई परिभाषा को पूरा करने के लिए आना। मैं नहीं जानती कि जीवन और मृत्यु के बीच क्या संबंध है ? मरने के बाद इंसान कहां जाता है, यह भी नहीं पता। लेकिन मैं यही रहूंगी, तुम मुझे पुकारना, पीहू... पीहू... पीहू... और तुम देखना मैं दौड़ती-भागती जहां भी रहूंगी, जिस दुनिया में भी रहूंगी तुमसे मिलने आऊंगी.... फिर चाहे इसके लिए मुझे कितने ही आयाम ही क्यूं न पार करने पड़े, मैं करूंगी। लेकिन मेरे प्रियवर, मेरे इष्ट, मेरे दोस्त मैं आऊंगी, और जरूर आऊंगी।

     या फिर हे राधे के प्रिय !!! हां मैं तुम्हे पुकारती हूँ, तुम वही कृष्ण बन के आना... एक अधूरी कहानी जिसे कालचक्र पूरा न कर सका, उसे तुम पूरा करना... 
तुम्हारे इंतजार में,
तुम्हारी पीहू।

   पत्र समाप्त हो चुका था। पत्र की अंतिम पंक्तियां पढ़कर मैं सोच में पड़ गया, कहानी तो खत्म हो चुकी है, एक पीहू थी !! अब इस कहानी में शेष क्या है, जिसे मुझे पूरा करना है ?
    मेरी हालत कुछ ठीक नहीं थी सत्य के नाम का पत्र अभी भी उसी तरह सीलबंद पड़ा था। मन में पढ़ लेने का ख्याल आया,  लेकिन दूसरे ही पल यह भी ख्याल आया की यदि पीहू की इच्छा होती कि मैं इस पत्र को पढ़ूं तो वह उसे इस तरह से सीलबंद न करती। 
      लाइट फिर गुल हो गई। मन उचट हो गया। अब मैं यह सोच रहा था कि मैं यहां रुकूं या ना रुकूं ? सत्य की हकीकत सामने आ चुकी थी। फैसला मुझे लेना था। सत्य कहीं मेरा कोई नुकसान तो नहीं चाहता ? लेकिन मुझे तभी ख्याल आया यदि ऐसा होता तो वह मुझे ज्ञान के कह कर उसके सामने यहां न लाता ? क्या सचमुच सत्य प्रायश्चित कर रहा है या फिर कोई ढोंग ? लेकिन मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है ? मुझे तो वह काम पूरा करना है जिसकी शुरुआत में कर चुका हूँ, सत्य अब अपनी खुद की जाने। तभी बिजली का बल्ब जल उठा। मैंने रैक से बैग निकाला और उसके सबसे नीचे सभी सामान व्यवस्थित रखा और ऊपर अपने कपड़े। बैग में दो बॉटल भी थी। दिल की घबराहट और बेचैनी को थोड़ा नियंत्रित करने के लिए मैंने तीन-चार घूंट सीधे बॉटल से ही पी लिए... फिर बैग को उसी स्थान पर रख बिस्तर पर लेट गया। अगले ही पल मेरी आंखे थकान से बंद हो गई। तभी महसूस हुआ जैसे कोई कुर्सी पर आकर चुपचाप बैठ गया हो। मैंने आंख खोलनी चाही लेकिन खुली नहीं।
       मैने उससे पूछा, "पीहू !... क्या तुम सचमुच हो या मेरे मन का कोई भ्रम हो...?"
  उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कोई उठा और मेरी सिरहने की ज़मीन के पास घुटने के बल बैठ गया। एक अजीब-सा सम्मोहन, एक अजीब सा नशा, एक अजीब सी मदहोशी मेरे अंदर सामने लगी। मैं हाथ बढ़ाकर उसे छू लेना चाहता था, लेकिन मेरे हाथ नहीं उठ रहे थे... मुझे महसूस हुआ जैसे मैं धीरे-धीरे एक स्वप्नलोक में जाने लगा हूं .. मैंने बड़ी मुश्किल से उसे फिर पुकारा, "पीहू ! मेरी पलके बोझिल क्यों हो रही है... मुझे नींद क्यूं आ रही है... "
     एक शांत स्वर सुनाई दिया, "सो जाओ... मैं तुम्हारे साथ हूं..."
     मैंने अर्ध चेतन अवस्था में उससे फिर पूछा, "पीहू! टाइम कितना हुआ होगा..."
    उसने कहा, "बारह बज के सत्ताइस मिनट..."
    उसके आगे का मुझे कुछ होश नहीं। सुबह उठा तो सात बज चुके थे। 
    मैं अटारी से नीचे आया। जब गैलरी पहुंचा तो बेडरूम का दरवाजा अध-खुला था। मैंने कमरे में प्रवेश करते हुए सत्य को पुकारा लेकिन वह कमरे में नहीं था। कमरा अस्त व्यस्त पड़ा था, कूलर में गंदा पानी भरा था... जैसे कुछ दिनों तक कूलर को यूज़ न किया गया हो... तभी मेरी नजर ड्रेसिंग टेबल के ऊपर रखे सत्य के रिस्ट वॉच पर गई वह बंद थी। मैंने देखा उसमें ठीक 12:27 हुए थे। कल यही टाइम तो पीहू ने मुझे बताया था मुझे आश्चर्य हुआ यह कैसे हो सकता है। मैंने उसे उठाकर ध्यान से देखा। घड़ी जो अभी तक बंद थी, अचानक ही टिक टिक टिक की आवाज के साथ चल पड़ी... घड़ी मेरे हाथ से छूटते-छूटते बची। मैं वापस उसे उसी जगह पर रख कमरे से बाहर आ गया।
    तभी पीछे से मंगल आता हुआ दिखाई दिया मैंने उसे अपने पास बुलाया, "मंगल कूलर का पानी खाली कर उसे खिड़की से निकाल लो और पीछे स्टोर रूम में रख दो। लेकिन रुको पहले कमरे को थोड़ा साफ सुथरा करवाओ..."
     सत्य भी नहा कर आ चुका था। उसने पूछा, "यह सब क्या..?"
   मैंने कहा, "कुछ नहीं, सोचा जब कूलर यूज़ नहीं कर रहे हो तो फिर खुलवाकर स्टोर रूम में रखवा दूं ?"
    "तुम्हारा घर है भाई, जो अच्छा समझो करो...", फिर वह आश्चर्य से बोला, "अरे मेरी घड़ी चल पड़ी...", फिर वह मंगल से बोला, "कूलर खोलने के बाद गाय को भी देख लेना... न हो तो गाय और बछिया को ले जा के बगिया में आम के पेड़ के नीचे ही बांध दो... कमली देखती रहेगी..."
   मंगल अपने काम में जुट गया। ब्रेकफास्ट करने के बाद सत्य फैक्ट्री और मैं मंगल के साथ गांव की मुख्य बस्ती की तरफ आ गया। कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात की और तय कार्यक्रम के अनुसार उन सभी व्यक्तियों से भी मिले जिनका ग्यारह तारीख को महत्वपूर्ण योगदान हो सकता था।
    लगभग एक बजे हम वापस घर आए। मैंने अटारी से अपना बैग निकाला, घर में फिर से ताला लगवाया और फिर मंगल के साथ बगिया आ गया। कमली खाना तैयार कर हम दोनों का ही इंतजार कर रही थी। खाने के बाद मैं चारपाई पर लेट गया और फिर खयालों में डूब गया। क्या सत्य सचमुच का एक्टर है, कोई दिखावा कर रहा है, या सचमुच वह पीहू के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ना चाहता है ? कहते हैं इंसान के आंसू झूठे नहीं होते... उसका अटारी पर यूं रोना मुझे अभी भी याद था। कैसे मान लूं के वे झूठे थे। मैं दुविधा की स्थिति म था..."
   कुछ देर मुझे विचारों में डूबा देख मंगल ने पूछा था, "क्या बात है सर जी, क्या सोच रहे हैं...?"
  "कुछ नहीं..."
   "सर जी मैं घर की तरफ जाता हूं गाय और बछिया को ले आता हूँ, दो-चार दिन यही रख देता हूँ...", यह कहते हुए मंगल चला गया और मैं आंख बंद करके लेट रहा। कुछ देर बाद मुझे झपकी आ गई... मैं कुछ देर तक यूं ही सोता रहा... जब उठा तो शाम के छः बज रहे थे। मैं टहलते हुए पंप हाउस की तरफ आ गया। अच्छे से मुंह हाथ धोया आम के पेड़ के नीचे बैठ गया... दूर सूरज डूब रहा था... मन कुछ दुविधा की अवस्था में उदास था... क्या मंगल से मैं यह सब कहूं... लेकिन क्या कहूंगा भैया जी की जो तस्वीर उसकी नजरों में है उसे क्यों खराब करू... तभी मुझे मंगल आता हुआ दिखा मैंने जोर से कहा, "बैग उठा लाओ..."
    कुछ देर में मंगल आ गया था। उसने बैग मेरे नजदीक रखते हुए बताया कि सत्य आज कैंटीन से खा कर आया है और उसने कहा है कि सर जी को वहीं सुरक्षित रखो और ध्यान देना शायद कल इस क्षेत्र में चीते का मूवमेंट देखा गया है। 
    "ठीक है, तुम बैठो और बनाओ, आज पीनी है...", मैंने उदासी से कहा। 
    "ठीक है सर जी...", उसने मेरे सामने बॉटल और गिलास रखते हुए कहा, "मैं खाने के लिए कुछ ले कर आता हूँ..."
    कुछ देर में ही मंगल ताजी गाजर और अमरूद ले आया। कुछ देर तक खामोशी से डूबते हुए सूरज को देखते हुए मैं पीता रहा। मंगल भी खमोश ही रहा। जब मेरी खामोशी उसे सहन न हुई तो उसने पूछा, "सर जी क्या बात है, आप चुप-चुप से हैं ?"
   "हां मंगल, कभी नहीं सोचा था कि मैं फिर कभी इस पेड़ के नीचे उसके बगैर बैठूंगा। सब कुछ एक डरावना सपना नजर आता है। अच्छा तुम एक बात बताओ, तुम तो पीहू के साथ बहुत दिनों तक उसके इस काम में रहे, क्या तुम्हारे भईया जी को इससे पहले इसमें कोई इंटरेस्ट था...?"
     "उनके पास ज्यादा टाइम ही कहां होता था। वह अपनी नौकरी में व्यस्त रहते थे और फिर फैक्ट्री की नौकरी से भगवान बचाये। कभी ओवर टाइम तो कभी नाइट ड्यूटी तो कभी कुछ... हां जिस दिन छुट्टी रहती या फुर्सत में होते तो बच्चों को पढ़ा दिया करते थे। बल्कि पीहू बिटिया को डांटते भी कि ये क्या तुमने फालतू का रोग पाल लिया है। क्या अपनी परेशानियां कम थी जो दुनिया-जहान की मोल ले ली..."
   "और बाबा...?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
   "अब क्या बताऊं सर जी, शायद अपने आगे कुछ कहते भी रहे हो लेकिन मेरे आगे तो कुछ नहीं कहा... लेकिन उनके लिए वह हमेशा फिक्रमंद रहते थे... एक घटना मुझे अच्छी तरह से याद है, आपके जाने के बाद दिसंबर की एक शाम यही कोई तीन बजे पीहू बिटिया यहां आई, मड़ैया से चटाई ले इसी जगह बिछा कर बहुत देर तक चुनरी ओढ़े पड़ी रही। कुछ मन ही मन कह रही थी, वह भी अंग्रेजी में। मैं जब पास आया तो मेरी तरफ देखकर थोड़ा सा मुस्कुरा दी, लेकिन सर जी उनकी आंखें भरी हुई थी... फिर वह अक्सर यहां आती, यही चटाई बिछा के लाती और फिर मन ही मन कुछ बड़बड़ाया करती थी। जब तक जिंदा रही, दूसरे-तीसरे दिन जरूर आती, इस जगह से न जाने कैसा नाता जुड़ गया था उनका... एक दिन जब घर लौटने में देर हो गई तो दाऊ साहब उन्हें खोजते हुए स्वयं यहां आ गए... पहली बार मैंने देखा कि उन्होंने पीहू बिटिया को डांटा था और खुद भी रोए थे फिर उसके बाद मैंने उन्हें कभी भी डांटते हुए नहीं देखा..."
    मेरी भी आंखों में कोई आंसू आते इससे पहले मैंने अपनी गिलास खाली करते हुए कहा, "चलो चलते हैं। लगता है आज रात पानी बरसेगा, देखो तो आसमान में बादल छाने लगे हैं। ठंड भी थोड़ा बढ़ गई है। लगता है आसपास कहीं बरस भी रहा है।
   मंगल उठाते हुए बोला, "हां सर जी... चलते है..."
   हम वापस मड़ैया में आ गए। मंगल ने मिट्टी के बर्तन में आग जलाते हुए कहा। "सब का इंतजाम है अपने पास... आप चिंता न लीजिए..."
   "वह तो मैं देख ही रहा हूं मंगल लेकिन यह बताओ कल का क्या प्रोग्राम है ?", मैंने मंगल से पूछा था। 
   उसने कुछ याद करते हुए कहा, "अरे ठीक याद दिलाया सर जी... भइया जी ने कुछ कार्ड दिए है, गांव के कुछ प्रमुख व्यक्तियों को देना है। उन्होंने विधायक जी से भी फोन पर चर्चा की है, शायद वह भी आएंगे। भैया जी ने टेंट हाउस में सभी सामान बुक कर दिया है। दस तारीख को दोपहर तक पहुंच जाएगा... सुबह गांव वालों को कार्ड बांटने के बाद दोपहर को बस्ती फिर चलेंगे वहां भी जगह निर्धारित कर लेते हैं, कहा क्या होगा...?"
    मैंने अपनी सहमति जताते हुए कहा, "हां यह ठीक रहेगा, कल बस्ती चलेंगे और सभी कुछ कहां और कैसे होगा फाइनल कर लेंगे..."
   कमली ने खाना परोसा और हम लोग खाकर चुपचाप लेट गए। कुछ देर बाद मंगल सो गया। मैंने भी आंख बंद कर ली लेकिन थकान के बावजूद मुझे नींद नहीं आ रही थी। यह वही जगह थी जहां पर आज से पांच वर्ष पूर्व हम एकसाथ हंसे थे, मुस्कुराए थे, रोए थे और भविष्य में लिखी जाने वाली माइलस्टोन के दो टीनएजर किरदारों की एक्टिंग करते हुए मैने उससे कहा था, "...मुझे तुम्हारा शरीर नहीं तुम चाहिए, हां तुम चाहिए... इस जीवन में तुम्हारा साथ चाहिए... मैं तुम्हारे साथ जिंदगी जीना चाहता हूँ, तुम्हारे बगैर गुजारना नहीं..."
    तभी मुझे महसूस हुआ की कोई मेरे माथे को सहलाते हुए धीरे से बोला। "रोओ मत... सब ठीक होगा, अब तुम आ गए न..."
     मैंने आंख खोलने की लाख चेष्टा की लेकिन वह खुली नहीं। बस मैं धीरे से इतना पूछ पाया, "पीहू तुम आ गई ? टाइम कितना हुआ होगा ?"
    जवाब मिला, "दस बज कर पैतालीस मिनट..."
    "इतना एक्यूरेट...?"
    इस बार जवाब के स्थान पर हल्की-सी हंसी सुनाई दी। जवाब कुछ देर बाद मिला, "हां, तुम थक गए हो, अब सो जाओ..."
   फिर एक अजीब-सा नशा, अजीब-सी मदहोशी छाने लगी। शरीर बिल्कुल हल्का हो गया। मुझे नींद आई इतनी गहरी की सुबह जल्दी खुल गई। लगभग सात बजे सत्य मेरे पास आया, "ठीक है, मैं शाम को लौट आऊंगा... आज थोड़ा जल्दी जाना है... पहले माइंस जाऊंगा फिर फैक्ट्री। तुम्हें यहां कोई दिक्कत तो नहीं है ?", फिर उसने चाबी मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा, "जरूरत पड़े तो यह रखो घर की चाबी, मेरे पास डुप्लीकेट है...", मेरी नजर उसकी रिस्ट वॉच पर गई। मैं चौक गया, वह बंद थी, ठीक 10:45 पर... 
    मुझे घड़ी की तरफ दखते-देख सत्य ने स्वयं कहा, " यार पता नहीं इस घड़ी को क्या हो गया है ? दो दिनों से ऐसे ही रात को बंद हो जाती है, लगता है दिखाना पड़ेगा.."
    "ठीक है दिखा लेना...", मैंने उसके हाथ से चाबी लेते हुए कहा। तभी अचानक घड़ी चल पड़ी, टिक... टिक... टिक... 
   सत्य ने आश्चर्य से कहा, "अजीब बात है यार, कल भी ऐसा ही हुआ... अपने आप चल पड़ी... और आज भी.... पता नहीं क्या हो गया है; खैर कोई बात नहीं मैं चलता हूँ..."
      ये दिन ठीक उसी तरह से गुजरा जैसा की मंगल ने पहले से निर्धारित किया था। बस्ती में सब कुछ फाइनल कर लेने के बाद हम लोग फिर शाम को बगिया पहुंचे। मैंने मंगल से कहा, "मंगल आज मैं घर पर रुकूंगा। कल दस तारीख है न, ओम और कुसुम आयेंगे, और उनके साथ दूसरे लोग भी होंगे उन्हें गाइड करना होगा। मेरे ख्याल से उन सभी को तैयार करना होगा कि वे हमारे साथ बस्ती चले और दस की रात हमारे साथ वहीं रुके, लेकिन दिक्कत यही है कि उनके घर वालों से परमिशन कैसे मिलेगी...?"
    मंगल ने विश्वास के साथ कहां, "लड़कों के लिए तो मिल जाएगी सर जी, लड़कियां लौट आएंगी,  फिर ग्यारह को सुबह आ जाएंगी क्या दिक्कत है...?"
   "ठीक कहते हो यही सही रहेगा..."
    शाम को लगभग 6 बजे जब हम घर पहुंचे तो ताला बंद था। मतलब सत्य अभी फैक्ट्री से नहीं आया था। मंगल ने मेरा बैग अटारी में रखा। फिर वह बगिया से गाय-बछिया को ले आया और उनके इंतजाम में जुट गया। लगभग आधे घंटे के बाद सत्य आया और उधर मंगल भी अपने काम से फुर्सत हो गया था। मंगल ने इच्छा जाहिर की, "सर जी थोड़ी-थोड़ी हो जाय, काफी थकान लगी हुई है..."
  सभी इंतजाम के साथ हम लोग अटारी पर आ गए। मैंने सत्य से पूछा, "कल मंगल बता रहा था कि विधायक जी से तुम्हारी बात हुई है ?"
   सत्य ने मुझे समझाते हुए कहा, "सब कुछ सेट हो गया है। कंपनी मैनेजमेंट के सभी प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया है, उनमें से आधे तो आयेंगे ही। रही बात विधायक जी की तो वह ऐसा मौका नहीं छोड़ने वाले हैं ? आखिर पूरे क्षेत्र के वोट का सवाल है... अब रही बात गांव की तो उनको मंगल, तुम और पीहू के स्टूडेंट देख ही लोगे ?"
   मंगल ने पूछा, "जी भइया जी, देख लूंगा वैसे कल टेंट का समान कब तक आएगा ?"
   "मैं सुबह 10 बजे जाऊंगा तो कोशिश करूंगा कि दोपहर 12 और 1 बीच सभी सामान गांव आ जाए फिर तुम आगे का देख लेना..."
   मैने सुझाव दिया, "कल कुछ पुराने स्टूडेंट आयेंगे, मैं उनसे भी बात करूंगा, तब तक मंगल तुम गांव चले जाना और लोगों को एकबार फिर सभी जानकारी दे देना..."
     सभी प्लानिंग सेट हो जाने के बाद मंगल चला गया। डिनर बना और हम दोनों ने साथ खाया। सत्य अपने रूम में चला गया और मैं अटारी में वापस आ गया। अब यहां रुकने की मेरी एक ही वजह थी, "पीहू का ड्रीम प्रोजेक्ट...", मन में एक ही लालसा थी कि वह एकबार फिर शुरू हो जाए।
    दिन भर की भाग दौड़ के साथ ही पूरा शरीर भी थक चुका था। चारपाई में आंखे बंद कर लेट गया। हल्की सी आहट महसूस हुई जैसे मेरे सिरहाने पर कोई कुर्सी में आ बैठा हो। मैंने आंखें खोलनी चाही लेकिन नहीं खुली। एक अजीब-सा नशा, एक मदहोशी मेरे मन में समाती चली गई, लगा जैसे किसी का नर्म मुलायम हाथ बराबर मेरे माथे को सहला रहा था। धीरे-धीरे मैं गहरी नींद सो गया। रात को जब मेरी नींद खुली तो मैंने देखा बल्ब और पंखा दोनों के स्विच बंद थे। नाइट बल्ब जल रहा था, और मेरे सिरहाने रखा मुलायम कम्बल कंधे तक अच्छे से ओढ़ाया हुआ था। मन में प्रश्न जागा, क्या सत्य आया था ? या फिर...
   मैं बिस्तर से उठा और खिड़की की छड़ पकड़ कर खड़ा हो गया। बाहर देखा हल्की चांदनी बिखरी हुई थी। मैं कुछ देर तक खड़ा रहा लेकिन मुझे बाहर कोई नहीं दिखा। मैं वापस बिस्तर पर आ गया। कुछ देर तक जागता पड़ा रहा फिर आंखें बंद कर ली। फिर वही आहट.. फिर वही स्पर्श... फिर वही नशा... लाख कोशिशों के बाद भी मेरी आंखें नहीं खुली... मैंने डूबती हुई आवाज में पूछा, "पीहू टाइम कितना हुआ...", अगले ही पल उसकी हल्की खनकती हंसी सुनाई दी, "तुम सवाल बहुत पूछते हो, तीन बज के बत्तीस मिनट..."
   जब सुबह नींद खुली तो सूरज की हल्की सुनहरी धूप खिड़की से होते हुए दीवाल पर टकरा रही थी और खिड़की की सुंदर सी छाया दीवाल में बन रही थी। मैं उठा और बिस्तर को ठीक से समेट कर एक किनारे रख दिया और नीचे आ गया। मंगल को गौशाला के पास काम करते हुए देख उससे बोला, "काम जल्दी से निपटा लो और तैयार रहो, आज पीहू के कुछ स्टूडेंट आयेंगे... याद है न ?"
   "जी याद है, आप तैयार रहिए बस दस मिनट का काम है मैं भी तैयार हो के आता हूँ..."
   "ठीक है मेरा बैग उठाकर बैठक में रख देना...", कहता हुआ मैं अंदर आ गया। सत्य की वही समस्या, "यार देखो तो... इस घड़ी ने परेशान करके रख दिया है, कल रात को भी बंद हो गई..."
    "लाओ दिखाओ तो जरा...", मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।
   सत्य ने घड़ी अपने हाथ से उतर कर मुझे देते हुए कहा, "आराम से देखो, तब तक मैं तैयार होता हूँ, फिर वह बेडरूम में चला गया। मैंने घड़ी को ध्यान से देखा 3:32 पर उसके कांटे रुके हुए थे। अगले ही पल वह फिर चल पड़ी, टिक... टिक... टिक...
    इस बार मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने मन ही मन कहा, "तो इसका मतलब तुम मेरे आस-पास ही हो पीहू... तुम्हारे होने का एहसास कोई भ्रम नहीं है..."
   तभी मंगल ने मेरा बैग मुझे लाकर दिया और कह के गया कि एक घंटे के अंदर वह आ जाएगा... मैंने घड़ी तख्त में रख दी, बैग से कपड़े निकले और बाथरूम में घुस गया। कुछ देर बाद जब बाहर आया तो देखा। बैठक में टीवी पर न्यूज चल रही थी और सत्य चाय बनाकर मेरा इंतजार कर रहा था। 
   "लो चाय पियो... और यह बताओ कोई जादू वादू जानते हो क्या... तुम्हारे छूते ही मेरी घड़ी चल पड़ती है...", फिर वह जोर से हंसा, उसके साथ में भी, "नहीं यार। तुम दिखा लो... कोई न कोई डिफेक्ट होगा..."
   "ब्रेकफास्ट तैयार है निकालूं...?"
   "बिल्कुल..."
    कुछ देर में ही हम ब्रेकफास्ट करके फुर्सत हो गए। सत्य ने आंगन वाला दरवाजा अंदर से बंद किया... फिर बेडरूम को लॉक करके हम लोग पीछे की तरफ आ गए।
   9 बजे मंगल के आने के बाद सत्य पूर्व निर्धारित कार्य को संपन्न करने के लिए फैक्ट्री की तरफ चला गया और मैं मंगल के साथ बच्चों के आने का इंतजार करने लगा।
   लगभग दस बजे सुमन और ओम के साथ तकरीबन आठ दस लड़के और आए। सभी से परिचय हुआ। कुछ से मैं पहले ही मिल चुका था। होने वाले कार्यक्रम की सभी ने रुपरेखा तैयार की। सभी में एक अपूर्व उत्साह का संचार दिखाई दे रहा था। कुछ करने का जज्बा अपनों के लिए। यह तय किया गया कि भागीरथ के साथ चार लड़के मेरे साथ आदिवासी बस्ती चलने के लिए यही रुकेंगे और बाकी मंगल और के साथ अभी गांव की मुख्य बस्ती जायेंगे भी और बाकी के सभी गांव वालों को होने वाले कार्यक्रम के प्रति आज जागरूक करेंगे और अधिक से अधिक संख्या में आने के लिए कहेंगे। सभी मंगल के साथ मुख्य बस्ती चले गए और मैं सड़क की तरफ ही गौशाला के पास कुर्सी में बैठ फैक्ट्री की तरफ से आने वाले ट्रैक्टर का इंतजार करने लगा।  लगभग दोपहर दो बजे के करीब ट्रैक्टर के साथ मंगल भी आता हुआ दिखाई दिया। आदिवासी बस्ती की तरफ जाने वाली सड़क के मोड पर आकर ट्रैक्टर रुक गया और मंगल अपनी बाइक लिए हुए मेरे पास आया। 
   "ये लोग ट्रैक्टर और ट्राली में बैठ लेंगे आप चलिए मेरे साथ...", फिर उसने दरवाजा अच्छे से बंद करके ताला लगाया और चाबी अपने जेब में डाल ली। 
    कुछ देर बाद हम बस्ती पहुंचे। निर्धारित स्थान पर टेंट वाले टेंट लगा रहे थे। हलवाई मिठाई बनाने में जुटे हुए थे। लगभग दो घंटे बाद टेंट वाले अपना काम करके चले गए। कार्यक्रम में विधायक जी के शिरकत करने का फायदा यह हुआ की पूरा स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया। स्थानीय पार्टी मेम्बर्स भी अपने अपने स्तर पर कार्य कर रहे थे। कमली के अकेला होने की वजह से मंगल मेरी व्यवस्था कर वापस चला गया। मेरी देखभाल के लिए भगीरथ और उसके कुछ दोस्त मेरे साथ थे। पूरा दिन व्यस्तता में गुजरा। शाम हुई फिर रात। मेरे रुकने की व्यवस्था प्राथमिक स्कूल में की गई। 
     मैं खाना खाकर लेट तो गया, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। शीत ऋतु की चांदनी से भींगी शांत रात भी मेरे मन को बेचैन कर रही थी। महसूस होता जैसे गुलाबी ठंड की चादर ओढ़े मन की सारी बेचैनियां धीरे-धीरे उदासियों में तब्दील होती जा रही हैं। धरती और आकाश के बीच दूधिया रंग के सेतु से एक करुण पुकार चोरी से दबे पांव उतर कर मेरे अंतस में समाती जा रही है। प्राथमिक स्कूल के चारों तरफ बाउंड्री वॉल थी। सामने के खुले भाग में मैं कुछ देर तक टहलता रहा। कुछ होश नहीं की रात को कितना बज गया। चारों तरफ एक गूंजता हुआ सन्नाटा था। 
     टहलते टहलते जब मैं कुछ थक सा गया तो अंदर अपने कमरे में पहुंचा कपड़े उतारे। टी-शर्ट और फुल लोअर पहन बिस्तर पर लेट गया। कुछ देर यूं ही लेटा रहा। फिर वही हुआ जो हर रात होता आया था। एक कोमल स्पर्श, नशीली खुशबू, वही मदहोशियां। मैंने हमेशा की तरह प्यार से पूछा, "पीहू! कितना टाइम हो गया..."
  हमेशा की तरह जवाब मिला, "ठीक ग्यारह बजे हैं, अब सो जाओ, देखो तो तुम कितना थक गए हो...", उसने मेरे माथे पर प्यार से हाथ रखा,  फिर मैं... मैं न रहा।
      जब सुबह उठा तो रात्रि की ताजा शबनम से नहाई एक सुहानी सुबह मेरा स्वागत कर रही थी। आसपास के पेड़ों में बैठे परिंदे स्वागत गीत गा रहे थे, और उनमें से कुछ इस सुहानी सुबह को अपने पंजों में दबाए धरती से चुराकर कहीं दूर आसमानों में ले जाने की नाकाम कोशिशों में लगे थे।
      चारों तरफ रग-बिरंगे फूलों के ऊपर उड़ती रंग-बिरंगी तितलियां सुबह के स्वागत में स्वागत द्वार सजा रहीं थीं। पूर्व दिशा से हल्की-हल्की उजागर होती लालिमा लिए संपूर्ण आकाश मस्कुरा रहा था। कुछ ही देर में शबनम से भीगी सुबह के गीले बदन को सूर्य की हल्की-हल्की तपिश, और मंद-मंद बहती हवा सुखाने की भरपूर कोशिशों में लगी थीं। सफेद रंग के हल्के-हल्के बादल के बीच से निकलती हुई किरणें, कुछ ऐसा आभास कर रही थीं, जैसे एक दिव्य रथ को कई देवता मिलकर सजाने की कोशिश में जुटे हैं, और कुछ ही देर बाद भगवान दिनकर उस पर सवार होकर पूरे वैभव और गरिमा के साथ अपने सफ़र पर चल पड़ेंगे। 
    हालांकि स्कूल के अंदर ही स्नान करने की व्यवस्था थी, लेकिन मेरा मन न किया। बैग से आज के दिन पहनने वाले कपड़े निकाले और एक पॉलीथिन में डाल नदी की तरफ चल पड़ा। भागीरथ और उसके कुछ दोस्तों से मुलाकात हई, मैंने उन्हें बताया कि मैं नहा कर अभी आता हूँ, तब तुम लोग अपना काम देखो। फिर मैं टहलते-टहलते बस्ती वाले घाट पर पहुंचा। सुबह के नौ बज रहे होंगे। मैंने चारों तरफ देखा, बस्ती में हलचल शुरू हो चुकी थी लेकिन बस्ती का नदी घाट सुना था। इस घाट से लगभग चार-पांच सौ मीटर की दूरी पर वह दूसरा घाट था जहां मैं कभी पीहू के साथ बैठा था। इन सबसे होती हुई मेरी नजर नदी के उस पार एक मंदिर के झंडे पर गई। कई स्मृतियां एकदम से ताजा हो गई। आज से पांच वर्ष पूर्व मंदिर में गुजरे हुए जीवन के एक-एक दृश्य मेरी आंखों के सामने से गुजर रहे थे। रहस्य से भरा हुआ वह गुजारा समय जो आज भी मेरे मन में बेचैनियां पैदा करता है, कई सवाल खड़े करता है, उन स्मृतियों को कैसे भूल जाता। 
     तभी मेरी नजर फिर से दूर घाट की तरफ गई। कुछ लोगों से भरी हुई एक छोटी सी नाव उस घाट से नदी के दूसरे किनारे की तरफ जाती हुई दिखाई दी। मैं आश्चर्यचकित था अभी कुछ देर पहले तो वहां कोई नाव नहीं थी, फिर अचानक कहां से प्रकट हो गई ?सामने से एक बच्चा जिसकी उम्र नौ-दस साल रही होगी, आता हुआ दिखाई दिया। मैंने उसे अपने नजदीक बुला कर नाव की तरफ इशारा करते हुए पूछा, "वो नाव तुम्हारे बस्ती की है ?"
     उस लड़के ने मेरे इशारा करने पर उस तरफ देखा फिर धीरे से बोल, "कौन सी नाव ?"
    मैंने फिर इशारा करते हुए कहा, "अरे ! देखो उस घाट के पास एक नाव और उसे पर बैठे कुछ लोग शायद नदी के दूसरी पर जा रहे हैं...?"
     उस लड़के ने मेरी तरफ फिर चकित-सा देखा और फिर उसी तरह धीरे से बोला, "वहां तो कोई नाव नहीं है...?"
    अब चौंकाने की बारी मेरी थी, "क्या !! तुम्हें वो नाव नहीं दिखाई दे रही...?"
     उसने मेरी तरफ अजीब सी दृष्टि से देखा जैसे मैं कोई पागल हूँ, फिर आगे बढ़ गया। पहले मेरे मन में गहरा सन्नाटा छाया रहा, चारों तरफ से आती सांय-सांय की आवाज के साथ फिर मेरे मन में एकाएक धमाका हुआ। मुझे पीहू की वह बात याद आई, "हो सकता है आज के सवालों के जवाब हमें भविष्य में मिले... ओह नो !!... तो आज वही दिन है... तो क्या ग्यारह नवंबर की तारीख थी उस दिन भी ? मैंने मन ही मन हिसाब लगया... जब पिछली बार आया था तो आठ तारीख थी दूसरे दिन जब पीहू ने अटारी में मुझे खाना खिलाया तो नौ तारीख थी। दस तारीख की शाम को ज्ञान आया और ग्यारह तारीख को पीहू जीप लेकर.... ओह गॉड..."
    तभी किसी की मासूम आवाज मेरे कानों में गूंज गई, "हां तुम्हें तो सारी कलाएं आती हैं... तुम तो बच के निकल जाओगे... डूबूगी तो मैं ही...."
   अगले ही पल मैंने निर्णय ले लिया कि मुझे करना क्या है। नहीं पीहू यदि कलचक्र ने हमें अपनी गलती सुधारने का मौका दिया है तो मैं उसे यूं ही नहीं जाने दूंगा। मैं तुम्हें और नहीं डूबने दूंगा। मेरे पास इतना समय नहीं था कि मैं किसी नाव या किसी व्यक्ति का सहारा ले सकूं... जीवन में कुछ कर्म हमें स्वयं करने होते हैं, उसमें किसी की भागीदारी संभव ही नहीं। यदि मैं किसी को सम्मिलित करता भी हूँ, तो क्या बता कर करूंगा ? 
      मैं धीरे से चुपचाप घाट उतार गया। पॉलीथीन के कपड़े घाट के पत्थर पर रखें, जूते उतारे और पानी में कूद गया। अब मेरा टारगेट था नदी का दूसरा किनारा। मैं अपनी पूरी ताकत के साथ तैरने लगा। जब मैं बीच नदी में पहुंचा तो मैंने देखा दूसरे घाट की नाव नदी के दूसरे किनारे में पहुंच रही थी। चारों तरफ भयंकर पानी ही पानी। तैरने की प्रैक्टिस छूटने के कारण मैं बुरी तरह हांफ रह था। मैंने जल्दी-जल्दी जोर-जोर से सांसे ली, पुनः अपनी शक्ति को समेट तैरने लगा। लगभग दस मिनट बाद मैं नदी के दूसरे किनारे पर था। सामने कोई सुविधा जनक घाट नहीं था, फिर भी मैं किसी तरह ऊपर पहुंचा। कपड़े पूरी तरह से गीले हो चुके थे। उनसे टप टप पानी टपक रहता। कपड़े सुखाने का मेरे पास समय नहीं था और ना ही मैंने सुखाने की कोई कोशिश की।
   मैंने सामने की तरफ देखा। नदी से जंगल की तरफ जाते हुए दो रास्ते दिखे। इनमें से कौन-सा रास्ता मंदिर तक जाता होगा मैं सोच ही रहा था कि मेरे पास से एक लड़का हल्की मुस्कुराहट लिए हुए गुजारा। कुछ दूर चलने के बाद पलट कर उसने एक रास्ते की तरफ इशारा किया और खुद दूसरे रास्ते की तरफ बढ़ गया। मेरे पास सोचने समझने के लिए ज्यादा समय नहीं था और मैं उसी रास्ते में आगे बढ़ गया।
     यह रास्ता जंगलों के बीच बड़े-बड़े पत्थरों के आस-पास से गुजरा हुआ शायद मंदिर तक जा रहा था। मैं तेज कदमों के साथ उसी रास्ते में आगे बढ़ता जा रहा था। रास्ता बहुत ही ऊबड़खाबड़ था। बड़े-बड़े पेड़, कुछ छोटे-मोटे झाड़ और पत्थरों के बीच से गुजरता हुआ रास्ता मंदिर की पहाड़ी के बाई तरफ जा कर खत्म हो गया। अब क्या करूं ? मेरे पास समय कम था। मैंने बेबस नजरों से फिर इधर-उधर देखा। आंखों में एक चमक आई, "हां अब यही करना होगा..."
     जिस बड़ी-सी चट्टान पर आकर रास्ता खत्म होता था यदि उस चट्टान को किसी तरह पार कर लिया जाए तो मंदिर तक पहुंचा जा सकता है, लेकिन कैसे ? चट्टान खुरदरी जरूर थी लेकिन ढलान अधिक होने के कारण सीधे खड़े होकर उसमें चलना तो संभव नहीं था। किंतु हां यदि बच्चे की तरह घुटने और दोनों हाथ के पंजों का सहारा ले कर चढ़ा जाए तो उसे पार किया जा सकता है। मैने वही किया। आधी चट्टान चढ़ने के बाद जब मैंने अपने बाईं तरफ देखा तो मेरी रूह कांप गई। बाईं तरफ जहां चट्टान जहां खत्म होती थी, उसके ठीक नीचे हजारों फीट गहरी खाई थी। दृश्य बहुत ही भयानक लग रहा था। मैंने अपने आप से कहा, कौन-सा मुझे उस तरफ जाना है... मुझे तो सीधा इस चट्टान को पार करना है। मैं मजबूती से घुटने के बल धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। कुछ देर बाद ही मैं चट्टान के दूसरी तरफ था। 
     एक सकरा पगडंडीनुमा रास्ता जो कई तरह के पेड़ों और पत्थरों के आस-पास से गुजरता हुआ कुछ खड़ी चढ़ाई लिए हुए मंदिर तक जाता दिखा, मैं उसी रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। चढ़ाई आसान नहीं थी, मैं कभी पेड़ के तने का तो कभी पत्थरों का सहारा लेते हुए आगे बढ़ रहा था। कुछ ही देर बाद मुझे मंदिर की पताखा दिखने लगी थी। जब मैं कुछ और ऊपर पहुंचा तो मैंने देखा शायद यह मंदिर के बाईं तरफ का भाग है जो अब कुछ समतल था। मैं वहीं एक पेड़ के तने पर टिककर बैठ गया। 
     मेरी सांसे अभी भी अनियंत्रित और कुछ तेज चल रही थी। हाथ और घुटने में जलन हो रही थी। चट्टान कुछ अधिक ही खुरदुरी थी, हाथ और घुटने छिल गए थे। पांव में कुछ जंगली कांटे भी चुभे थे। दर्द असहनीय तो नहीं लेकिन पीड़ादायक था। थोड़ी देर बाद मैने तने की ओट से अपना सर थोड़ा सा निकाल कर मंदिर की तरफ देखा। अब मेरे सामने आज से ठीक पांच वर्ष पूर्व का वही समय गुजर रहा था। एक लड़की और एक लड़का एक दूसरे के साथ चलते हुए मंदिर के पिछले हिस्से में पहुंचे जहां से कुछ ही दूर पर खाई शुरू होती थी। 
      वे दोनों चलते हुए खाई से लगभग दस-बारह कदम पहले रुक गए। लड़की ने गहरे पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था। उसके बाल सुनहरे होने के कारण धूप में कुछ ज्यादा ही चमक रहे थे। लड़के ने गहरे कत्थई रंग का पेंट और हल्के आसमानी रंग की शर्ट पहन रखी थी।
     उनमें कुछ देर तक आपस में कुछ बातचीत चलती रही। मेरे और उनके बीच लगभग सौ-डेढ़ सौ फुट का फासला था। दोनों बात करते हुए खाई की तरफ बढ़ रहे थें। खाई से दस कदम पहले ही वे दोनों फिर रुक गए। मैंने देखा वह बातचीत करने में व्यस्त हैं। मैंने मौके का फायदा उठया और मैं भी बिना आहट किए हुए आगे वाले दो मोटे-मोटे पेड़ों की ओट में छुप के खड़ा हो गया। मेरे आगे भी पंद्रह-बीस कदम बाद कुएंनुमा खाई थी। मेरी नजर बराबर उन दोनों पर थी, बे आपस में कुछ बातें कर रहे थे। एकाएक उस लड़की ने लड़के की तरफ अपना हाथ बढ़ाया और लड़के ने कुछ सोचते हुए उसका हाथ थाम लिया। कुछ ही देर बाद दोनों खाई की तरफ बढ़ने लगे मैं समझ गया कि क्या होने वाला है। मैं पूरी शक्ति के साथ चीखा, "रुको..." 
       मेरी यह चीख खाई और पहाड़ी से टकराकर कुछ देर तक गूंजती रही। लेकिन मेरी आवाज का प्रभाव यह था कि दोनों के कदम वही के वहीं रुक गए। मैंने रुंधे-कंठ और करुण स्वर में याचना की, "प्लीज !!... ऐसा मत करो..!!!" 
     कुछ देर बद ही दोनों ने मेरी तरफ देखा और लड़का कुछ तेज आवाज में बोला, "ये कौन है वहां...?"
    आवाज सुनते ही मैंने तेजी से अपना चेहरा दूसरी तरफ घूम लिया। समय चक्र के नियमों से बंधा मैं उनके सामने नहीं जा सकता था। दोनों को अपनी तरफ बढ़ता देख मैं जल्दी से एक बड़े से पत्थर की ओट से होता हुआ नीचे की तरफ बढ़ गया। छुपते-छुपाते कुछ दूर जाने के बाद मैं एक पत्थर पर टिक कर बैठ गया। मेरे दिल की धड़कनें अब और तेजी से चल रही थीं। तीन चार बार गहरी-गहरी सांसे लेने के बाद मैंने पत्थर की ओट से देखा, दोनों ऊपर खड़े कुछ बातचीत कर रहे थे। एक और आदमी भी उनके पास नजर आया।
   यदि मैं चाहूं तो इस समय आज से पांच वर्ष पहले की पीहू से मिल सकता हूँ, उसे देख सकता हूँ, बाते कर सकता हूँ। मैने चाहत भरी नजरों से एक बार फिर झाक के देखा। वे दोनों अभी भी आपस में बातें करने में व्यस्त थे। मैं अच्छी तरह से जानता था कि ऊपर उसके साथ जो लड़का बाते कर रहा है, वह आज से पांच वर्ष पूर्व का मैं ही हूँ, इस बात से बेखबर कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन फिर भी मैं उस लड़के को बताना चाहता हूँ कि उसके साथ क्या होने जा रहा है। उसे समझाना चाहता हूँ कि चाहे कुछ भी हो जाए तुम्हें इस लड़की को अकेला छोड़कर नहीं जाना है। जो गलती मैंने की उसे तुम्हें नहीं दोहराना है। और इस लड़की को भी बताना चाहता हूँ कि यह लड़का तुम्हारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसे किसी भी हालत में अपनी जिंदगी से दूर मत जाने देना। नहीं तो एकदिन इसी के लिए तुम्हे रोना पड़ेगा, तड़पना पड़ेगा, भटकना पड़ेगा। इसे याद करते हुए आंसुओं से भीगे हुए न जाने कितने शब्दों को तुम्हें कागज में उतारना होगा। तुम दोनों चाहो तो ये सब रोक सकते हो, बस कुछ निर्णय समझदारी से लेने होंगे। 
     लेकिन मैं जैसे ही अपने मजबूत इरादे से उनकी तरफ बढ़ना चाहा, समय-चक्र का एक गोल घेरा उनके चारों तरफ बनने लगा। जिसके तीक्ष्ण प्रकाश से मेरी आंखें चौंधिया गईं ? मैं सहम कर फिर उसी पत्थर की ओट में छुप गया। अपनी बेबसी पर रोना आया। मैं समझ गया कि इन लम्हों को मैं गुजरते हुए केवल देख सकता हूं कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता जितना पूर्व-निर्धारित या नियति की आज्ञा थी, उतना कर चुका। मेरे दिल से एक आह निकाली, "पीहू..."
     मैंने जमीन पर पड़ा एक छोटा-सा किंतु नुकीला पत्थर उठया और उसी से कुरेंच-कुरेंच कर बड़े से पत्थर पर मैंने उसका नाम अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों में उसी के अंदाज में लिखा, "पी.. ई.. ई.. एच.. ओ.. ओ.."
       जब नाम पूरा हो गया तो मैंने फिर से झांक कर देखा। वे दोनों उसी तरह पत्थर पर बैठ बातें कर रहे थे। कुछ देर सुस्ताने के बाद मैं उनकी नजर बचता हुआ धीरे-धीरे नीचे उतरता चला गया। फिर उसी बड़ी सी चट्टान को उतर के मंदिर की पहाड़ी के जड़ में पहुंच गया, जहां से टेढ़ा-मेंढ़ा एक रास्ता गुजरता हुआ वापस नदी के घाट तक पहुंचता था।
       लगभग एक घंटे से अधिक समय गुजर चुका था। मैं कुछ देर नदी के घाट के ऊपर निढाल सा लेटा सोच रहा था कि अभी तो नदी पार करनी है !! वहां भी तो मुझे खोजा जा रहा होगा। कुछ देर सुस्ताने के बाद वापस नदी में उतर गया। कुछ देर तैरने के बाद नदी के दूसरे घाट में पहुंचा। नहाने के बाद मैंने कपड़े पहने और नारंगी कलर की टी-;शर्ट और गहरे नीले रंग के फुल लोअर को धो कर घाट के ऊपर सूखने के लिए एक झाड़ी में डाल दिया।
    मुझे देखते ही मंगल भागता हुआ मेरे पास आया, आप कहां गायब हो जाते हैं सर जी ? आइए पूजा खत्म हो गई है, हवन तो कर लीजिए..."
      मैं मंगल की तरफ रहस्यमई मुस्कान के साथ बोला, "तो अच्छा!! तुम यह हो ? मैं तो समझा था कि तुम मेरे बाद यहां पहुंचोगे..."
    जब मंगल को कोई बात समझ में नहीं आती है तो वह थोड़ा सा मुस्कुरा देता है, और उसने वही किया। मैं मंगल के साथ पूजा स्थल पर पहुंचा, सत्य को हवन करते हुए देखा। उसके चेहरे में मासूमियत थी। मन में स्थिरता और शांति थी। मैंने मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखा और ठीक उसके बगल में बैठते हुए धीरे से बोला, "सॉरी यार..."
     बदले में वह मुस्कुराते हुए बोला, "शुरुआत करके कहां गायब हो जाते हो...? और यह हाथ में चोट कहां से लगवा ली ?"
    मैंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "क्या बताऊं यार... बहुत जरूरी काम अचानक सामने आ गया, जाना जरूरी था...  बाकी बाते बाद में... अभी हवन करते हैं..."
     उसकी मुस्कान गहरी हो गई, "यहां भी जरूरी काम !!", लेकिन इस बार मैंने कोई जवाब नहीं दिया। हवन का एक कौर उठाकर पूरे मन और श्रद्धा भाव से अग्नि देवता को समर्पित किया। अनायास ही मेरी नजर सत्य की रिस्टवॉच पर गई।  सेकंड का रुका हुआ कांटा फिर चल पड़ा, "टिक टिक टिक टिक..."
     अंत की सुंदरता, प्रचुरता के बाद की शांति और पतन में छिपे उत्थान के वादे को लिये शुरू होती शीत ऋतु की दोपहर हवन कुंड से उठती अग्नि की टेढ़ी-मेढ़ी लपटों के साथ जल रही थी। पेड़ की सूखी शाखाओं से छनकर आती हल्की किंतु स्थिर धूप, सुनहरी आभा लिए, संयमित स्पष्ट परछाइयों के लिए पर्याप्त चमकदार रौशनी चारों तरफ फैला रही थी। हवा में एक ठंडी ताजगी जो धीरे-धीरे साँस लेने के लिए मन को प्रेरित कर रही थी, उस में घुले हुए कर्ण-प्रिय संस्कृत श्लोक और मंत्र सीधे हृदय तक पहुंच रहे थे।
    नीला आसमान, जिसमें ऊँचे और पतले बादल थे, जिससे सूरज की रोशनी महसूस तो हो रही थी लेकिन तेज नहीं लग लग रही थी। ताप में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही थी। आस-पास के पेड़ों से अधिकतर पत्ते गिर चुके थे; और जो थोड़े-बहुत बचे थे, आने वाले समय में शाखों से विरह की वेदना लिए पीले पड़ चुके थे। लेकिन पेड़ भला इनका शोक कब मनाता है... वह तो आने वाले समय में नई कपोलों की सुखद चाहत लिए खुश है। यही प्रकृति की सुंदरता है, यही उसका नियम और रहस्य भी।
      हवन की समाप्ति के बाद मैंने मंगल से पूछा, "कुर्सी वगैरह की व्यवस्था...?"
      मंगल ने बताया, "हां, सुबह दो ट्रैक्टर सामान और आया है, जिसमें कुर्सी-टेबल और अन्य जरूरी सामान आ चुके हैं.."
    निर्धारित समय में सभी गांव वाले, फैक्ट्री मैनेजमेंट के कुछ प्रमुख लोग और विधायक जी पहुंच गए थे। पीहू की समाधि में पुष्पांजलि के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पीहू के द्वारा शुरू किए गए कार्य की सराहना विधायक जी ने खूब की और सभी को आश्वासन दिया कि इस कार्य को वह अपनी देखरेख में और आगे तक ले जाएंगे। यह कार्यक्रम केवल इस बस्ती तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि गांव के चौमुखी विकास के लिए भी इस कार्यक्रम का विस्तार किया जाएगा तथा इस मॉडल को अन्य गांव में भी लागू करने के लिए लोगों को जागृत करेंगे। 
     फैक्ट्री मैनेजमेंट ने भी भरपूर सहयोग करने का वादा किया। विधायक जी और फैक्ट्री मैनेजमेंट के सदस्य लगभग दो बजे चले गए। खाने-पीने का कार्यक्रम लगभग शाम को चार बजे तक चला। इस दौरान मैं किसी भी कार्यक्रम में आगे नहीं आया, सत्य को ही आगे रखा। 
      किसी भी समाज या वर्ग को मुख्य धारा से जोड़ना हो तो उसे शिक्षित कर दीजिए। यह एक मूल मंत्र था जिसे सभी ने आवश्यक समझा। लेकिन शिक्षित होने के लिए शिक्षा के साधन का होना आवश्यक है; और उस साधन को जुटाने का कार्य अब गठित होने वाली एक समिति करेगी। डोनेशन और फंड को व्यवस्थित रूप से जुटाया जाएगा। इसी निर्णय के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। पीहू की विचारधारा का व्यापक विस्तार हुआ। 
     कार्यक्रम समाप्ति पर था। शामियाने, टेंट, कुर्सिया, बर्तन इत्यादि समेटे जाने लगे। सत्य, मंगल, भागीरथ इत्यादि सभी पूरी क्षमता के साथ लगे हुए थे और मैं दूर कुर्सी पर बैठा यह सब देख रहा था। तभी एक लड़का मेरे पास आया। अपने हाथ में पहनी हुई घड़ी को उतार कर मुझे देते हुए बोला, "सर जी, मैं आपको ही ढूंढ रहा था... ये लीजिए आपकी अमानत..."
     मैंने घड़ी को ध्यान से देखा, वह चल रही थी। मैंने उसे वापस करने की चेष्टा करते हुए कहा, "नहीं कोई जरूरत नहीं... तुम इसे अपने पास ही रखो..."
    वह गंभीरता से बोला, "नहीं सर जी, दीदी ने मुझे पैसे दे दिए थे और कहा था एक दिन जब आप यहां पर आएंगे तब मैं यह घड़ी आपको वापस लौटा दूं... तब से संभाल के रखी है। जब जाना की यहां इस तरह का प्रोग्राम है तो मैं समझगया कि आप आयेंगे, इसलिए आज पहन कर ही आया था, मैं आपको बहुत देर से खोज रहा हूँ... दीदी ने बताया था कि आपके पिताजी ने इसे आपको गिफ्ट किया था, इसलिए आप इसे अपने पास रखिए... और दीदी की भी तो यही इच्छा थी, उनकी इच्छा के सम्मान के लिए...", कहते हुए उसने हाथ जोड़ लिए। 
    "तुम अभी भी नाव चलाते हो...?", मैंने पूछा था। 
    "नहीं सर जी, यहां से तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर जहां नदी कम चौड़ी है, कुछ महीने पहले ही एक पुल बन गई है। जब आप यहां पिछली बार आए थे न... तो उसी साल घोषणा हुई थी। बनने में पांच साल लग गए... अब लोग आने-जाने के लिए उसी पुल का उपयोग करते हैं..."
    मैंने कुछ मुस्कुराते हुए पूछा, "अच्छा, और तुम ?"
    वह हंसते हुए बोला, "मैं तो तैर के भी पार कर लेता हूँ... आपकी कहानी का पुरोहित-जी थोड़े न हूँ.. लेकिन आज बाइक से आया हूँ... कितनी अजीब बात है न सर जी !! कभी कितने हंसी-खुशी हम लोग एक ही नाव में बैठकर नदी के इस पार से दूसरे पार गए थे और वापस भी आए थे। विश्वास नहीं होता इतनी कम उम्र में... आज वह हमारे बीच में नहीं हैं... लोग सही कहते हैं... जिंदगी का कोई भरोसा नहीं... आज मे से कल कौन नहीं होगा, आज किसे पता ? अच्छा सर जी अब मैं चलता हूँ...", उसने हाथ जोड़कर इजाजत लेते हुए कहा।
    मुझे वहीं बैठा छोड़कर वह लड़का सीधे पीहू की समाधि पर गया। मैंने स्पष्ट देखा, कुछ फूल तोड़ कर उसने समाधि पर चढ़ाये फिर दोनों हाथ जोड़कर घुटने के बल बैठकर उसने कुछ देर प्रार्थना की। यह देखकर मेरी आंखें भर आई। कुछ देर बाद उसने पास ही खड़ी बाइक को स्टार्ट किया और टेढ़े-मेढे रास्तों में विलीन हो गया।
      उसके जाने के बाद मेरा मन फिर व्याकुल हो रहा था। मैं धीरे से उठा और चलता हुआ उसी घाट के पत्थर में आकर खड़ा हो गया, जहां आज से पांच वर्ष पूर्व मैं पीहू के साथ बैठा था। वह दिन की शुरुआत थी और आज एक दिन का अंत। अस्ताचलगामी पश्चिम में दूर पहाड़ियों के बीच छुपने के लिए तैयार अपनी अंतिम किरणों से नदी में प्रवाहित होने वाले जल को छू कर कल सुबह फिर से मिलने का वादा कर रहा था। 
     आकाश हल्के सुनहरे रंग से गुलाबी और फिर साफ, ठंडे नीले रंग में परिवर्तित होता जा रहा था। पर्वत श्रृंखलाओं के समतल मैदानी भाग में जीवन रेखा की तरह बहती हुई नदी उतनी ही शांत और स्थिर थी जितनी मेरे मन में स्थापित पीहू के प्रति प्रेम की भावना।
      मैंने एक गोल चपटा पत्थर उठाकर नदी के बीच धार की ओर पूरी ताकत से तिरछा फेंका। पत्थर चकरी की तरह घूमता हुआ छप... छप...छप... छप...  की चार आवाज के साथ तैरता डुबकी लगता, पांचवीं डुबकी में नदी के गहरे पानी में समा गया। पत्थर की हर डुबकी से चारों दिशाओं में जल तरंगे उठी, उनका विस्तार हुआ, आपस में टकराई और फिर उसी जल में विलीन हो गई।
    फिर मैंने एक बड़ा पत्थर उठाया और पूरी ताकत से नदी के बीच धार की तरफ फेंका, जैसा कि कभी पीहू ने फेंका था। डुब की कुछ तेज आवाज के साथ वह पानी से टकराया। नदी के पानी में तेज हलचल हुई जैसे सोते से किसी ने उसे जगा दिया हो। चारों दिशाओं में एक बार फिर चक्रवात की तरह गोल जल तरंगे उठी और मेरे अशांत मन की तरह उनका विस्तार होता चला गया। 
    मैं थके और शोक संतृप्त हृदय के साथ उसी पत्थर पर बैठ गय। पीहू !!!  मेरे अंदर एक वैराग्य की भावना जागृत होने लगी। ऐसी भावना जिसमें सब कुछ खोने के बाद कुछ भी प्राप्त करने की लालसा का अंत हो चुका था। जब पहली बार मैं, मंगल और पीहू इस क्षेत्र में आए थे तो पीहू ने सोचा भी न रहा होगा कि मरणोपरांत भी यही उसकी कर्म-स्थली बन जएगी। 
     कभी उसने पत्र में लिखा था कि जब भी तुम अपने अंतर्मन से मुझे पुकारोगे, मैं दौड़ती-भागती चली आऊंगी, चाहे कहीं भी रहूं, चाहे मुझे कितने ही आयाम क्यूं न पार करने पड़े... करूंगी..."
     उस शाम मन रोने को किया तो जी भर के रोया, आंखों से निकले आंसू नदी के जल में घुलते चले गए... हृदय से एक आह निकली, "पीहू..."
      मेरे अंतर्मन से निकली ये पुकार उस तक पहुंची और मुझे यह देख कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि ठीक मेरे चेहरे के बगल से उसके चेहरे की परछाई नदी के स्वच्छ जल में उभर कर सामने आई। मैंने अपने आसपास देखा, कहीं कोई नहीं था। मैंने फिर नदी के पानी में देखा, वह मेरे पास ही बैठी थी। मैंने पानी में ही उसके चेहरे की तरफ देखते हुए अपनी वही कविता पूरी की... जो उस दिन पोएट्री ट्री के नीचे अधूरी रह गई थी...

   तेरी आंखों के छलकते पैमाने में नहीं, 
   तेरी आंसुओं में डूबना चाहता हूँ मैं ।
   तेरी जुल्फों में लहराती बेचैनियों को, 
   अपनी बाहों में समेटना चाहता हूँ मैं।
   होंगे वो कोई और जो होंगे प्यार में तेरे,
   तेरे गम में शरीक होना चाहता हूँ मैं।।

    तभी उसकी महीन आवाज सुनाई दी, "... कभी तुमने कहा था आज मैं कहती हूँ, जब तक तुम इस धरती में हो तब तक मैं भी रहूंगी, भले ही तुम मुझे देख न पाओ लेकिन हमेशा महसूस करोगे... अब जाओ यहां से, आज तुम्हारा काम पूरा हुआ..."
    अचानक हवाओं ने रुख बदला... धीमी चलती हुई हवा अचानक तेज होने लगी... महसूस हुआ जैसे कोई तूफान आने वाला हो।
    मैंने भरी हुई आंखों से नदी के स्वच्छ साफ जल में एक बार फिर देखा। दोनों चेहरों की परछाइयां अभी भी स्पष्ट दिख रहीं थी। मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा, "शायद तुम सच कहती हो, अब मेरा काम खत्म हुआ। तुम्हारा ये खूबसूरत चेहरा, तुम्हारी ये गहरी आंखें, सुनहरे बाल और उनकी उलझन, ये सब कभी मेरे लिए था ही नहीं.. तो फिर शोक किस बात का करूं ? सत्य को तुमने अपना शरीर दिया, अपना कौमार्य उस पर लुटाया तो क्या केवल इसलिए तुमसे नफरत करूं ? नहीं कभी नहीं..."
    अचानक ही मेरे हृदय की पीड़ा चीख उठी, "है कोई... बताओ मुझे क्या है कोई... यदि है तो सामने आए... मेरी पीहू को गले लगा कर कोई उसके आंसू तो पोछे... क्यूं सामने नहीं आता कोई...? इस स्वच्छ जल में उभरी हुई उसकी उज्ज्वल छवि को भला कोई छू के दिखाए... नदी के शांत जल में उसके लिखे गए अक्षरों को कोई अपनी अंजुली में समेट के तो दिखाए... अब क्यूं कोई सामने नहीं आता..."
   चलती हुई हवाएं और तेज हो गई, जैसे मेरे अंदर चलता हुआ तूफान मेरे अंतर्मन से बाहर निकल सामने आ कर पर खड़ा हो गया। लेकिन इस तूफान के बाद भी नदी का पानी एकदम शांत था। दूर पर्वत शखलाएं मुझे प्रेत की तरह खड़ी नजर आईं। महसूस हुआ नदी के इस किनारे पर जीवन की शुरुआत है, और दूसरे किनारे पर इस जीवन का अंत। उनके बीच है, बहती हुई यह जिंदगी, हर तूफान से लड़तो हुई किंतु शांत और निश्चिन्त।
      मेरे जाने के बाद तीन वर्षों तक की गुजरी हुई उसकी जिंदगी के हर एक लम्हे जो मैने उसके पत्र में पढ़े थे, उस समय उन्हें पूरी शिद्दत से महसूस कर पहली बार जी भर के रोया। वह भी कभी रोई होगी, लेकिन उस वक्त दिलासा देने के लिए मैं उसके पास नहीं था... लेकिन आज वह मेरे करीब थी। मैने मन को शांत करने की एक कोशिश की।
    मैने दोनों चेहरों के बीच अपनी तर्जनी से अंग्रेजी के वही अल्फाबेट्स लिखें जो कभी पीहू ने लिखे थे...एल...ओ.... व्ही... ई... फिर हाथ से जल को अपने से परे धकेल दिया। दोनों परछाइयां तेजी से हिली, एक दूसरे से टकराई और उसी जल में विलीन हो गईं। रोते सिसकते मेरे मुख से अनायास निकला, "नना.. निनू... माया... तोना..."

 एक मद्धिम स्वर फिर सुनाई दिया, "शांत हो जाओ... छोड़ो सब... भूल जाओ जो भी हुआ... जो भी मैने पत्र में लिखा था..."
    उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे में ढलते हुए सूरज की सारी लालिमा समा गई। मैने गुस्से से कहा, "शांत हो जाऊं ? भूल जाऊं... देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की ये दुनिया... झूठे, मक्कार, फरेबी लोगों की ये दुनिया... सूर्य, चन्द्र, ग्रहों, उपग्रहों की ये दुनिया... तो सुनो पीहू ! नहीं भूल सकता इन्हें... छल सिर्फ मेरे साथ होता तो भूल जाता... लेकिन यह छल तो तुम्हारे साथ भी हुआ... तो फिर कैसे भूल जाऊं ?"
     उस वक्त मेरे हृदय में दहकती आग इतनी प्रबल हो गई कि मैं एक पल के लिए अपने होश खो बैठा। झुक कर नदी का जल अपनी अंजुली में लेते हुए कहा, "नियति को इस पविता जल की शपथ है..."
     लेकिन मेरी बात अधूरी रह गई, महसूस हुआ जैसे किसी ने कसकर मेरे हाथ पकड़ लिए। आंसुओं से भींगा एक स्वर सुनाई दिया, "रुको... यह क्या करने जा रहे हो, जो गलती कभी सत्य ने की, को वही तुम करने जा रहे हो...? शांत हो जाओ, तुम्हें यह शोभा नहीं देता है। आज तुमने सुबह जो किया भूल गए क्या...? प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है... किसी को श्राप देने से इंसान खुद भी श्रापित होता है... अब यह गलती मत करो... छोड़ दो इस जल को इसी नदी में... और हाथ जोड़कर पूरी आस्था और सच्चाई के साथ नियति से क्षमा मांगो..."
    उसकी बातें सुनकर महसूस हुआ जैसे मैं किसी दुःखद स्वप्न से जगा हूँ। मैंने अपनी अंजुली खोल दी।फिर मजबूत इरादे से बोला, "सॉरी पीहू !! लेकिन मैं अपनी गलती फिर से नहीं दोहराऊंगा... तुम चलो मेरे साथ... यहां अब तुम्हारी भी जरूरत नहीं..."
    तूफान अपने चरम पर पहुंचा। तेज हवाओं ने नदी के पानी को झंझोर के रख दिया। कुछ पल में ही तेज हवाएं थम सी गई, नदी में उठती-गिरती लहरें एकदम से शांत हो गईं। नदी अपने लहरों के आंचल में उस तूफान को समेट कर फिर से स्थिर हो गई।
    कुछ देर बाद मैं उठा और पत्थर के ऊपर खड़ा हो गया। मैंने नदी की तरफ भरपूर दृष्टि से देखा, फिर मेरी निगाह दूर नदी के समानांतर चलती हुई पर्वत श्रृंखलाओं पर गई जहां सूरज डूब रहा था। मैंने सभी दृश्य अपने मन में कैद किए... आज इस नदी को पार करना, समय-चक्र को पार करने के बराबर था। यह सब मुझसे नियति ने करवाया, मुझे हमारी भूल सुधारने का मौका दिया। मैंने दोनों हाथ जोड़, आंखों में आंसू लिए नियति से क्षमा यचना की। पीहू श्राप से मुक्त हो चुकी थी और उसके साथ में मै भी। फर्क सिर्फ इतना था कि पीहू भौतिक रूप से अपना जीवन जी चुकी थी और मेरा जारी है, बेखबर इस बात से कि इसका अंत कब होगा ? लेकिन मुझे अब पूरी ईमानदारी से इसे जीना होगा, तभी मेरी भी मुक्ति है। मैं यही सब सोचते, विचारों में खोया, अभी भी वहीं पर खड़ा था।
     तभी पीछे से मंगल आते हुए बोला, "मैं समझ गया था सर जी आप यही मिलेंगे.... कितना बड़ा तूफान आते-आते रह गया। भईया जी तो आपको ढूंढ-ढूंढ के परेशान हो गए थे... चलिए चलते हैं... बीच में जंगल का रास्ता है... अंधेरा होने से पहले निकालना है..."
    मैंने उसकी बात सुनी और चुपचाप उसी तरह खड़ा रहा। मंगल ने फिर कहा, "सर जी पीहू बिटिया की याद आ रही है न, कभी इसी जगह…"
    मंगल ने बात अधूरी छोड़ दी। मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा, "हां मगल, एक पल को लगता है जैसे आज की ही बात हो, और दूसरे पल लगता है जैसे कई जन्म बीत गए हैं... जानते हो मंगल, आत्महत्या का सबसे चुनौती भरा रास्ता कौन-सा है ? आप तैरना जानते हो और पानी में कूद कर आत्महत्या करेंने की कोशिश करे..."
   मंगल ने आगे बढ़कर तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया, "न सर जी... नहीं !!"
    "पागल हो गए हो क्या ? छोड़ो मेरा हाथ....", मैंने शांत स्वर में उससे कहा, "जैसी मृत्यु की कामना कभी मैंने की थी ठीक वैसे ही उसने अपनी मृत्यु का स्वागत किया... उससे मिली जिंदगी को मैं यूं ही पानी में नहीं डुबो सकता..."
     मैंने झुक कर अंतिम बार नदी के पानी से पूरे चेहरे में छीटें मारे... पूरे सर को गीला किया... आंखों से बहते पानी को नदी के पानी ने धो दिया... फिर मंगल की तरफ मुड़ते हुए कहा, "चलो चलते हैं..."
    मैं उसके साथ घाट के ऊपर आ गया। उसके साथ आगे बढ़ते हुए पूछा, "तुम्हारे भईया जी कहां हैं..?"
    "वो टेंट हाउस के सभी सामान और बर्तन के साथ निकल गए हैं... मुझसे कहा है कि मैं आपको लेकर आऊं...."
    उसी घाट के ऊपर कुछ ही दूरी पर उसकी समाधि थी। जिसके चारों तरफ फूल ही फूल खिले थे एक छोटा सा बगीचा जल्दी तैयार होने जा रहा था। सुरक्षा के लिए चारों तरफ से पक्के तार की बाउंड्री बनाई गई थी जैसे जंगली जानवरों से खेतों की सुरक्षा करने के लिए बनाई जाती है।
      मैं मंगल के साथ वहां पहुंचा और उसके आसपास लगे फूल के पौधों से मैंने कुछ फूल तोड़े और उसके चबूतरे में रखकर हाथ जोड़ दिए। मंगल ने भी नम आंखों से हाथ जोड़कर प्रणाम किया। अटारी की सीढ़ी उतरते समय उसके कहे गए शब्द मुझे आज भी याद थे। मैं घुटने के बल बैठ गया और चबूतरे के ऊपर अपना सर रख सिसक पड़ा। उस पल मुझे महसूस हुआ जैसे पीहू जीवन से थक कर लेटी हुई है, और मैं धीरे-धीरे उसके बालों को सहलाता हुआ उसके नजदीक बैठा हूँ...
    कुछ देर बाद मंगल मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए भीगे स्वर में बोला, "अब चलिए सर जी..."
   मैदानी भागों से उठकर नदी के पानी में अपनी प्यास बुझाते हुए बवंडरों को मैंने कई बार देखा था। लेकिन उस दिन नदी की जल तरंगों को चीरते हुए एक बवंडर उठा और ठीक उसकी समाधि के सामने आकर शांत हो गया। मैंने यह नजारा अपने जीवन में पहली बार देखा था, और शायद अंतिम बार भी। मैंने उसी तरह बैठे हुए प्यार से कहा, "चलो पीहू... अब यहां से चलते हैं...", अचानक मेरा शरीर हल्का होता चला गया, जैसे कोई रूह मेरे शरीर में ही नहीं मेरे अंतर्मन में समाती जा रही हो।
   हम वापस बस्ती पहुंचे। मुखिया और अन्य सभी लोगों को कार्यक्रम की सफलता के लिए धन्यवाद दिया। भागीरथ और उसके मित्र को समझाया कि अब इस बस्ती की ही नहीं पूरे समाज की प्रगति तुम युवाओं के हाथ में है... अब यह दुनिया तुम्हारी है... बना लो जैसी चाहते हो..."
     जब हम बगिया पहुंचे तो शाम को सात बज रहे थे। मंगल ने चारपाई बिछा दी। कमली ने बताया कि भईया जी सामान के साथ फैक्ट्री ही निकल गए हैं, आज शायद देर से आयेंगे। मैं रिलैक्स होकर चारपाई पर लेट गया। शायद जिस काम के लिए नियति मुझे यहां ले आई थी वह पूरा हुआ। अब मन में एक अजीब सी शांति छाने लगी। कुछ कर गुजरने का जज्बा जो मेरे दिल में था, वह पूरा हुआ। मैंने मंगल से कहा, "मंगल ! निकालो यार... बानाओ... मैं थक गया हूँ... महसूस होता है जैसे बहुत लंबा सफर करके आया हूँ..."
     हम दोनों साथ पीते रहे, रात ढलती रही। कभी-कभी कमली भी आ के कुछ देर के लिए बैठ जाती।
"सर जी आप सुबह सुबह कहां गायब हो गए थे... मैं और भईया जी ढूंढ-ढूंढ कर परेशान हो गए थे...", मंगल ने एकदम से पूछा था। 
    मैं कुछ देर सोता रहा इसे बताऊं या न बताऊं, अगले ही पल मैं निर्णय लिया, जितना बताना उचित है, उतना तो बताया जा सकता है, "कहीं नहीं मंगल, जरा याद करो आज का दिन। आज वही तारीख है न जिस दिन हम तीनों उस मंदिर गए थे... नदी के पार वाला... याद आया... और आज ही के दिन उसका अंतिम संस्कार हुआ था... तो उसकी आत्मा की शांति के लिए देवी मां से प्रार्थना करने उसी मंदिर में गया था..."
      "क्या...?", मंगल में चौंकते हुए कई सवाल एक साथ पूछ डाले, "लेकिन कैसे... नाव कहां मिली आपको... किसके साथ गए थे...."
     "किसी के साथ नहीं मंगल अकेले गया था, और नदी को तैर कर पार किया था...", मैंने सर झुकये हुए उत्तर दिया।
     मंगल कुछ क्रोधित होते हुए बोला, "आप भी सर जी अपने मन का ही करते हैं, जानते हैं कितनी गहरी नदी है ? एक के ऊपर एक दस ऊंट भी खड़े हो जाए न तो भी उसकी थाह न पाएंगे... और आप बिना सोचे समझे... क्या जरूरत थी ? जाना ही था तो कम से कम मुझसे कहा होता तो मैं नाव की व्यवस्था कर आपके साथ खुद चलता..."
      मैंने एक शिप लेते हुए कहा, "तुम तो वहां पहले से ही पहुंच गए थे..."
    मंगल मेरी तरफ आश्चर्य-चकित देख रहा था। मैंने उससे मुस्कुराते हुए कहा, "मतलब कभी आज ही के दिन हम लोग गए थे न, तो मुझे महसूस हुआ जैसे कि तुम और पीहू मुझे छोड़ कर अकेले चले गए हो, तो मैं पीछा कर लिया। यार... अब मुंह लटकाए मत बैठे रहो.... मैं जिंदा हूँ, और वापस भी आ गया हूँ... चलो एक और बनाओ..."
    खाने की बहुत ज्यादा इच्छा तो थी नहीं हल्का-फुल्का खाकर हम लोग लेट गए। मंगल को लेटते ही नींद आ गई शायद बहुत थक गया था और उसने कुछ ज्यादा पी भी ली थी। कुछ देर बाद उसके खर्राटे बजने लगे।
     मैं कुछ देर तक जागता पड़ा रहा, फिर मैंने भी आंखें बंद कर लीं। सोने से पूर्व वही हुआ। किसी का सु-कोमल स्पर्श मेरे माथे को छू गया। फिर वही नशा, वही मदहोशी, वही खुशबू, मेरे चारों तरफ फैलती चली गई। मैने आंख मूंदे हुए थके हुए शब्दों में कहा, "क्यों भटकती हो पीहू... मुक्त हो जाओ यहां से... यहां भटकना तुम्हारी नियति नहीं... चलो मेरे साथ..."
    "चल रही हूँ न ? और देखो तो कैसी हालत बना ली है अपनी, हाथ में भी चोट लगी है, पैरों में न जाने कितने कांटे चुभे होंगे, क्या जरूरत थी तुम्हे आने की...", उसने शिकायत की। 
      मैं धीरे से हंसते हुए बोला, "मुझे लेकर कूदने वाली थी, और पूछती हो क्या जरूरत थी...?"
     "हां तो कूद गए होते न... क्या दिक्कत थी...", उसने भी मजाकिया लहजे में कहा।
     "अच्छा !! जरा सोचो यदि हम कूद गए होते तो बाबा को मंगल क्या जवाब देता ? बेचारे पर सीधे दफा 302 न लगती ?", मैंने भी धीरे से मजाक किया।
    "तो इसलिए पानी का दरिया पार किया..."
    "और नहीं तो क्या, तुम्हारे लिए यदि आग का दरिया भी पार करता पड़ता तो वो भी करता..."
    "उस दिन मैंने सच कहा था न कि वह आवाज मुझे तुम्हारे जैसी लगी थी। हमें इस जीवन में श्रापित होने से बचाने के लिए देखो तो किस तरह नियति ने उस दिन भविष्य से तुम्हें ही भेज दिया था..."
    "तो यथार्थ क्या है पीहू ? आज जो घटित हुआ वह या जो उसे दिन घटित हुआ था वह ?"
    "दोनों ही... तुम्हें याद है लौटते समय तुमने एक लड़के को नदी में तैरते हुए देखा था लेकिन खुद को पहचान न पाए लेकिन मैंने उसी दिन पहचान लिया था... तुम नाव के समानांतर जरूर थे लेकिन उससे आगे थे। तुम तैर कर भविष्य में पहुंच गए और नियति ने तुम्हें अपनी बाहों में समेट कर सुरक्षित रख लिया, शायद आज के दिन के लिए..."
    "कैसे ? वो हमसे काफी दूर था, मैने तो उसे उसकी टी-शर्ट के रंग को देख कर अंदाजा लगाया था..  लेकिन तुम इतने विश्वास के साथ कैसे जान गई थी कि वह लड़का मैं ही हूँ...? लेकिन यदि ऐसा था भी तो उस दिन तुमने..."
    "झूठ कहा था, एक नहीं दो बार तुमसे सच छुपाया। उस दिन जब आवाज की दिशा में हम दोनों ने एक साथ देखा था, तो तुम भले ही अपना चेहरा न देख पाए लेकिन मैंने पेड़ की ओट में खड़े तुम्हारे कपड़े के साथ-साथ तुम्हारे चेहरे को भी देख लिया था... फिर जब तुमने कहा की कोई तैर रहा है, शायद वही लड़का है, तब मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि तुम्ही हो... और आज के दिन तुम वर्तमान से अपने अतीत का पीछा कर रहे थे इसलिए हमसे पीछे थे। लेकिन मंदिर में तुम अतीत और वर्तमान के साम्य बिंदु पर अपने अतीत के समानांतर खड़े थे... जहां तुमने दोनों घटनाओं को एक साथ घटित होते हुए देखा... और जरा सोचो क्या यह हमारे साथ पहली बार हुआ है, नहीं न ?"
    "तो क्या उस दिन हम दोनों वर्तमान और भविष्य के साम्य बिंदु पर खड़े थे, जब तुमने मुझे देखा था...?"
    "हां, लेकिन विश्वास करना मेरे लिए कठिन था। जानते हो, जब सत्य मुझे छोड़ कर गया तो मेरे मन में कई सवाल थे, अचानक ही देवी मां के दर्शन करने की इच्छा हुई। उसी मंदिर चलने के लिए मैंने मंगल से कहा। इस बार में सीधे रास्ते नहीं गई, बल्कि उसी रास्ते से गई जिस रास्ते से आज तुम गए थे। बड़ी चट्टान को पार कर जब हम ऊपर जा रहे थे, तब रास्ते में मुझे वह बड़ा-सा पत्थर दिखा, शायद जिसकी ओट में तुम हमसे छुप के बैठे रहे होगे, उस पत्थर में मेरा नाम मेरी ही स्टाइल में लिखा था। अब बताओ, तुम्हारे अलावा और कौन लिख सकता था ? बस उसी दिन मुझे सारी कहानी समझ में आ गई... बस मुझे विश्वास हो गया कि उस दिन तुम ही थे... जो भविष्य से उस दिन होने वाली अनहोनी को टालने आए थे..."
     पहली बार भावुकता में रोते हुए मैंने उससे याचना की, "पीहू ! जब तुम इस तरह से मेरी माथे को सहलाती हो, तो मैं चाह कर भी अपनी आंखें नहीं खोल पता हूँ, सच मानो खुलती ही नहीं है... मैं एक बार तुम्हें जी भर के देखना चाहता हूँ... तुम्हारे साथ बैठकर उसी तरह बातें करना चाहता हूँ..."
       "आंखें खोल ली तो भी नहीं देख पाओगे... जब तक आंखें बंद रहेंगी, तुम मुझे महसूस करोगे, और वैसे भी आज तो तुमने नदी के जल में मुझे देख तो लिया... ज्यादा लालची मत बनो... प्रकृति के अपने कुछ नियम होते हैं..", उसने समझाते हुए मुझसे कहा।
    उसकी बात सुन कर मैं खामोश हो गया। कुछ देर बाद उसी ने पूछा, "मुझसे नाराज हो गए क्या ?"
    "नहीं पीहू ! मुझे तो अपनी बेबसी में रोना आ रहा है...", मैने उदास स्वर में कहा। 
     "उस दिन उसी पत्थर पे टिक कर बहुत देर तक बैठी मैं भी रोती रही... सोचती रही कैसे तुमने समय-चक्र को पार किया होगा... कैसे जंगल के उस दुर्गम रास्ते को पार कर उस बड़ी चट्टान तक पहुंचे होगे.. फिर उस पर तुम कैसे चढ़े होगे, कैसे उस पहाड़ी की खड़ी चढ़ाई से होते हुए मंदिर तक पहुंचे होगे... फिर उन्हीं रास्तों से लौटते समय, अपने कितने आंसुओं को मन में सहेजे हुए, उस चट्टान पर मेरा नाम लिखा होगा... कुछ धुंधले से हो गए अपने नाम के ऊपर जब मैने हाथ फेरा तो महसूस किया कि जैसे मैंने तुम्हें छू लिया हो... शायद नियत में मुझे इसीलिए इतने दिनों तक जिंदा रखा था कि एक बार फिर से मैं अपने अतीत में ही सही तुम्हें देख तो लूं..."
    उसके स्पर्श को महसूस कर, उसकी बातें सुन मन की पूरी थकान दूर हो गई। उस रात मैने उससे नहीं पूछा, "टाइम कितना हुआ...?" बल्कि कुछ देर बाद उसने स्वयं कहा, "लो आज भी ग्यारह बज गए... अब सो जाओ..."
     "हां सो जाऊंगा... लेकिन यार सत्य की घड़ी बंद मत करना प्लीज.... वह परेशान हो जाता है...", मैंने उस रिक्वेस्ट की। 
    "वो तो बंद हो गई होगी... शायद आखिरी बार... एक बात पूछनी थी ?"
     "पूछो..."
     "तुमने उस लड़के से रिस्टवॉच तो ले ली, लेकिन पहनी नहीं... क्यों?"
     "ले इसलिए ली कि तुम्हारी और उस लड़के की इच्छा थी, और रही बात पहनने की तो जरूरत नहीं... समय बताने के लिए तुम जो मेरे साथ हो ?"
    "हमेशा नहीं रहूंगी, मैं यहां से नहीं जा सकती... क्योंकि मैं अभी यहां से मुक्त नहीं हूँ..."
    "क्या ? मुक्त नहीं हो...? कैसे...?", उसकी बात सुन कर मैं चौक गया।
      वह शांत स्वर में बोली, "उस दिन जो कहानी तुमने सुनाई थी वह झूठी नहीं थी..."
     सुन कर मैं चौक गया, "क्या कह रही हो तुम...!! "
     "मैं सच कह रही हूँ... यह कहानी है एक श्रापित परिवार की... कहानी की शुरुआत होती है एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, समझदार किंतु उच्चश्रृंखल स्वभाव की एक लड़की से, जिसने अपने परिवार के विपरीत जाकर एक लड़के से मोहब्बत की... उसे अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार किया... जिसने परिवार की स्वीकृत न मिलने पर सोच-समझकर अपने जिद में आत्महत्या करने का फैसला लिया। जब उसका प्रेमी न माना तो एक दिन वह उसे अपने साथ मंदिर ले कर गई। देवी मां के दर्शन करने के पश्चात उसे लेकर उसी मंदिर के पीछे की खाई के ऊपर पहुंची। उसका प्रेमी उसे समझाता रह गया कि यह गलत है... यह ईश्वर की दी हुई जिंदगी का अपमान है... लेकिन उसने अपनी प्रेमी की एक बात न सुनी... उसने उसे आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया। अपनी मोहब्बत... अपने प्यार का वास्ता दिया और उसी खाई में उसे लेकर कूद गई..."
    उसकी बात सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए, "लेकिन तुम्हे ये कैसे मालूम...?"
    वह बोली, "जीवन की कुछ सच्चाइयां इंसान को करने के बाद ही पता चलती हैं.. जो नहीं होना चाहिए था वह हुआ। बेटी की इच्छा का अनादर करने का श्राप उस परिवार को मिला। उस कुल में वही लड़की बेटी ने रूप में जन्म लेती रही और अल्प आयु में ही नियति के श्राप के अनुसार किसी न किसी असाध्य रोग या बीमारी की वजह से मरती भी रही। कभी उसने जीवन का मोल न समझा, इसलिए हर जन्म में जीवन उसे छालता रहा। वह जीवन जीने के लिए तरसती रही। और उसके परिवार को उस लड़की के प्रत्येक जन्म पर संतान वियोग का दुख मिलता रहा..."
     "अच्छा !! इस कहानी में उस लड़के का क्या दोष था.... उसे किस बात की सजा मिली...?"
     "उस लड़के को अपनी भावुकता की सजा मिली। अपनी दृढ़-इच्छा शक्ति से वह अपनी प्रेमिका को आत्महत्या करने से रोक सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि भावुकता में आकर उसने उसका साथ ही दिया। इस तरह से जिस प्यार के लिए उसने जीवन का निरादर किया, वह हर जन्म में अपने प्यार से दूर रहा। उसने जिसे भी चाहा वह उसके जीवन से दूर चला गया। उसे नियति से सदैव अपने प्रिय से दूर रहने का अभिशाप मिला..."
    "तो अब..?"
    "नियति प्रत्येक जीव को अपनी गलती सुधारने का कम से कम एक मौका जरूर देती है... मौका ही नहीं उसका साथ भी देती है... वही उस लड़के के साथ हुआ... नियति में उस लड़के को उस लड़की से फिर मिलाया, लेकिन इस जन्म में भी वह उसे लेकर इस खाई में कूदने वाली थी। लेकिन तभी उसी लड़के ने नियति के माध्यम से काल-चक्र को पार कर दोनों को ऐसा करने से रोक लिया, उसकी अंतिम करुण पुकार, प्लीज... ऐसा मत करो... ने उस लड़की की आत्मा को झंझोर दिया और उसके कदम रुक गए..."
     "पीहू ! मान लिया कि वह लड़की तुम हो, वह लड़का मैं हूँ, और परिवार बाबा का तो फिर सत्य कौन है ? क्या इस कहानी मे..."
    "हां तुम सही समझे, सत्य भी इसी कहानी का हिस्सा था। यह वही व्यक्ति है जो दोनों के बीच दूरियों का कारण बना, जैसे कि इस जन्म में। उस लड़की के रूप-यौवन से आसक्त होकर उससे यह अपराध हुआ... वह सब उसे इस जन्म में अल्प समय के लिए मिला लेकिन अब उसे अपनी आसक्ति के श्राप को भोगना होगा... उस लड़की की यादों को लिए हुए यही भटकना होगा..."
    "यह भी बता दो कि अब उस लड़के को अर्थात मुझे क्या करना चाहिए....?"
     "कभी मैंने तुम्हें आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया, इसलिए मेरा दोष अधिक था और नियति में मुझे इसी स्थान पर कैद करके रख दिया..  इस जन्म में हम दोनों आत्महत्या न कर सके इसके लिए नियति ने तुम्हें ही क्यूं चुना, शायद इसलिए कि उस जन्म में भी तुम मुझे रोक रहे थे। तुम्हें अपना अधूरा काम पूरा करना था, इसलिए तुम यहां आए। समय-चक्र की रेखा में एक साथ चलते रहे। तुमने तो अपना काम पूरा कर लिया और अपने श्राप से भी मुक्त हो गए। लेकिन मैं अभी भी श्रापित हूँ... इसलिए यहां से नहीं जा सकती..."
    "तो इस श्रापित जीवन से तुम्हारी मुक्ति कैसे होगी...?"
    "सच पूछो तो मुझे नहीं मालूम... जिसके पास इसका जवाब है वहां मेरा प्रवेश वर्जित है...?"
   "तुम्हारा प्रवेश वर्जित है!! लेकिन कहां...?"
    मैंने कुछ देर तक प्रतीक्षा की लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला बल्कि हुआ यह कि मैं सो गया, जैसे किसी ने मुझे गहरी नींद सुला दिया हो...

    दूसरे दिन की सुबह सत्य आया। उसने कहा कि वह अभी माइंस जा रहा है। दोपहर को लगभल दो बजे तक लौट कर आएगा। उसने बताया कि कल रात फिर ग्यारह बजे के समय पर उसकी घड़ी बंद हो गई थी। मैंने उसका हाथ पकड़ कर घड़ी देखते हुए कहा, "दिखाओ तो..."
     घड़ी चल पड़ी। मैंने हंसते हुए कहा, "कितना झूठ बोलते हो यार... चल तो रही है... देखो..."
     उसने घड़ी देखते हुए कहा, "तुम भी देखो, रूकी न होती तो अभी के समय पर चलती न ... ग्यारह के आगे नहीं ? उसकी इस बात का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो मान लिया, शहर जाना तो दिखा लेना... नहीं तो दूसरी खरीद लेना... क्यों?"
     मेरी बात सुन वह हौले से मुस्कुरा दिया। मैंने उससे इच्छा जाहिर की, "तुम मुझे आज शाम तक शहर छोड़ दो..."
   उसने कहा,  "ठीक है, मैं अभी माइंस की तरफ जा रहा हूँ, दोपहर बाद लौटूंगा, तुम तैयार रहना..."
      उसके जाने के बाद मैंने मंगल से अपनी आखिरी ख्वाहिश जाहिर की, "मंगल ! मुझे एक बार फिर उसी मंदिर ले चलो... अब तो सुना है, यही कही आस-पास पुल भी बन गई है, चलो बाइक से चलते है..."
    मंगल ने मना नहीं किया, ना ही कोई सवाल पूछा। आधे घटे में हम उसी नदी के दूसरे पार खड़े थे। मैंने उससे कहा, "इस रास्ते से नहीं... बस्ती-घाट के सामने वाले रास्ते से चलो..."
    "लेकिन सर जी वह रास्ता तो..."
    "जानता हूँ... खराब और कुछ ऊबड़खाबड़ है, बाइक है न... धीरे-धीरे चलेंगे..."
    "ठीक है सर जी... आप मुझे अच्छे से पकड़े रहिएगा...", मंगल बाइक को आगे बढ़ाते हुए बोला।
    लेकिन जब मंगल के साथ उस रास्ते से गुजरा तो मुझे महसूस हुआ कि जिस रास्ते से मैं कल पैदल आया था उससे ये रास्ता कम ऊबड़खाबड़ है ...
     मैं यह सोच ही रहा था कि मंगल बोल उठा, "सर जी एक साल पहले यह रस्ता बहुत ही खराब था... कुछ बस्ती वालों और कुछ पुल में काम करने वाले मजदूरों के कारण यह रास्ता फिर प्रचलन में आ गया है... अब कभी-कभी लोग इस रास्ते से भी आते-जाते हैं..."
     मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता जा रहा था कुछ देर बाद हम उस चट्टान के पास पहुंचे जहां पर रास्ता खत्म होता था। लेकिन यह क्या... उस चट्टान के दाहिनी भाग को काटकर ऊपर चढ़ने के लिए एक नया सकरा रास्ता बना हुआ था... ये तो मुझे कल नहीं दिखा था... फिर आज कैसे प्रगट हो गया...? मेरे मन में उठ रहे इस सवाल का जवाब भी मंगल ने ही दिया, "जानते हैं सर जी इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा यही चट्टान थी... पुलिया में काम करने वाले कुछ मजदूरो ने इसे तोड़ कर कुछ आसान बना दिया... चढ़ाई थोड़ा-सा मुश्किल है.. आइये जरूरत हो तो आप मेरा सहारा ले सकते हैं..."
     "नहीं तुम आगे चलो... जरूरत महसूस हुई तो बता दूंगा...", अब मैं उसे कैसे बताता कि कल तो मैंने इस चट्टान को भी पर किया था... ऊपर जाने वाला रास्ता भी काफी हद तक साफ सुथरा बना दिया गया था.. मैं कल की तरह ही बड़ी-बड़ी चट्टानों, रास्ते के पेड़ों और पत्थरों का सहारा लेते हुए आगे बढ़ रहा था। मुझे तो उस बड़े से पत्थर की तलाश थी जिस पर मैने पीहू का नाम लिखा था। आखिरकार मुझे वह मिल गया। मैं उस पत्थर तक पहुंचा जिस की ओट ले कर मैं कल बैठा था। 
      लेकिन ये क्या ? उस पर लिखे गए नाम को देखकर मैं फिर से चकित रह गया। नाम तो ठीक पत्थर के उसी भाग पर लिखा था जहां पर मैंने कल लिखा था। लेकिन उसे देखकर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि यह नाम कल लिखा गया है, इसकी लिखावट काफी धुंधली हो चुकी थी, नजदीक से ही देखने पर समझ में आता था जैसे इस नाम को कुछ साल पहले लिखा गया हो... कल जब लिखा था तो यही नाम कितना उजागर था और आज...? 
     कुछ देर रुकने के बाद मैं आगे बढ़ गया। ऊपर जाकर देखा तो वहां का भी दृश्य बदल चुका था। मंदिर के पिछले भाग में खाई शुरू होने से कुछ पहले ही सुरक्षा के लिए दीवार खड़ी की जा चुकी थी... यह सब देखकर मैं चकित था कल तक तो यहां ऐसा कुछ भी नहीं था... 
    मुझे चकित देखकर मंगल ने बताया, "यह सब उन्हीं मजदूरों का कमाल है सर जी... कोई हादसा न हो इसलिए बस्ती वालों के साथ मिलकर पिछले साल ही उन्होंने यह दीवार खड़ी की है... दो साल पहले पीहू बिटिया भी इसी रास्ते से आई थी... तब यहां कुछ नहीं था..."
    मैं खामोशी से उसकी बात सुनता रहा। फिर उन दोनों पेड़ो की तरफ बढ़ा जिसकी ओट से मैने खड़े हो कर पीहू और खुद को आवाज दे कर खाई की तरफ बढ़ने से रोका था। 
    मंगल मुझे रोकते हुए बोला, "सर जी उधर नहीं, उसके दस-पंद्रह कदम बाद ही खाई हैं... और कुछ ढलान भी... देखिए कहीं पैर न फिसल जाए..."
    मैं उसकी तरफ देख मुस्कुरा दिया, "तुम चिंता मत करो.."
   मैं उन दोनों पेड़ों के पास सावधानी से पहुंचा, और इस बार मैंने आवाज दी, "पीहू..." 
     पीहू...पीहू...पीहू...पीहू...पीहू...... ये नाम पूरी वादियों में गूंजता गया..... 
     आई लव यू...यू...यू... 
     मुझे तुमसे मोहब्बत है... है...है...है... 
     और बेशुमार है... है... है...है...
     कभी मैने वादा किया था आज पूरा हुआ। मैं रोता जा रहा था,  मेरे द्वारा कहे शब्द इन वादियों में ही नहीं मेरे हृदय, अंतर्मन और अंतर्रात्मा में भी गूंज रहे थे... उन्हीं पेड़ों में से एक में अपना सर रख मैं फूट-फूट कर रो रहा था... मंगल ने कंधे में हाथ रखा जरूर, लेकिन कोई दिलासा नहीं दी... शायद वह भी चाहता था कि मैं जी भर के रो लूं...
     कुछ देर बाद क्रंदन सिसकियों में और सिसकियां हिचकियों में बदल गई... उस दिन मैं इतना रोया की रोते-रोते थक-सा गया। कुछ देर उसी पेड़ में टिक के बैठा रहा, फिर उठा; अपने आंसू पोंछे। मंगल से कहा, "मंगल तुम यहीं रुको, मैं देवी मां के दर्शन करके आता हूँ... और देखो मेरे पीछे मत आना... यही इंतजार करना...."
     फिर मैं मजबूत इरादे के साथ मंदिर के अंदर पहुंचा। देवी मां के सम्मुख उनके चरणों में घुटने के बाल हाथ जोड़कर बैठ गया। मां के चरणों में रखे दो फूल ले कर उनके चरणों की वंदना की। फिर मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। पूरी आस्था और विश्वास के साथ मन ही मन प्रार्थना की, "मां हो तुम, तुम ही नियति हो, तुम ही प्रकृति हो। अपने बच्चों के अपराधों को तुम नहीं क्षमा करोगी तो और कौन करेगा... तुम जन्मदात्री हो... तुमने हमें जीवन दिया... और हमने क्या किया ? तुम्हारे ही द्वारा दिए गए जीवन का तिरस्कार ?... वो भी तुम्हारी ही नजरों के सामने ? हमने इस पवित्र स्थान को भी दूषित किया !!... कभी हमसे अक्षम्य अपराध हुआ, और एक श्रापित जीवन लेकर दोनों भटकते रहे... आज हमें अपने अपराध का बोध ही चुका है... तो अब इसे हमारी भूल समझ कर क्षमा करो मां... देखो तो अपनी मृत्यु के बाद भी वह यही आस-पास भटक रही है... उसे भी अपने मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दो ? हम न जाने कितने जन्मों तक भटकते हुए अंत में तुम्हारे पास तक ही पहुंचे, अब हमारा तिरस्कार न करो। हमें इस श्रापित जीवन से मुक्ति दो... और फिर यदि अभी भी कहीं कोई कमी रह गई हो तो वह न सही, लेकिन तुम्हारी कृपा है मैं तो जीवित हूँ न, मैं उस कमी को पूरा करने का तुम्हें वचन देता हूँ... लेकिन अब उसे मेरे साथ ही जाने की आज्ञा दो... उसके परिवार ने बहुत कुछ खोया है। एक ही बेटा बचा है, उसकी रक्षा करना और अब इस परिवार को भी श्राप से मुक्त दो मां..."
     इसके आगे मैं कुछ भी ना कह सका। देवी मां के चरणों में अपना सर रखकर बस मैं रोता रहा। कहते हैं सच्चे मन से की गई प्रार्थना का परिणाम क्षमा रुपी वरदान होता है। शायद इसीलिए जब मैने  प्रार्थना करने के बाद आंखें खोली तो उसे अपने पास बैठे हुए देखा। हम दोनों में एक साथ मां के चरणों में फूल वापस रखें हाथ जोड़कर आशीर्वाद लिया और उठकर खड़े हुए। अंतिम बार मां की चरणों में फिर से प्रणाम किया और मंदिर के बाहर आ गए।
      मंगल बेसब्री से मेरा उसी जगह पर इंतजार कर रहा था। लेकिन इस बार मैं मंदिर से अकेला नहीं आया था, वह मेरे साथ थी। उस वक्त मैं उसे महसूस भी कर सकता था और देख भी सकता था। 
   मंगल मुझसे बोला, "सर जी आप सीधे रास्ते से उतारिए मैं बाइक ले कर मंदिर के नीचे मिलूंगा... इस रास्ते में काफी ढलान है... उतरने में दिक्कत होगी..."
    उसने मुस्कुराते हुए कहा, "हां मंगल चाचा, ठीक है...", फिर वह मेरी तरफ देखते हुए बोली, "मेरी तरफ क्या देख रहे हो ? यह तुम्हे कहना है... इन्हें मेरी बात सुनाई नहीं दे रही होगी..."
    मैं मंगल की तरफ देखते हुए उसी के अंदाज में कहा, "हां मंगल चाचा, ठीक है..."
    मंगल मुस्कुराते हुए बोला, "क्या सर जी आप भी, आप ने तो पीहू बिटिया की याद दिला दी.."
     "तुम्हें तो चाचा उसी दिन से कहना शुरू कर देना चाहिए था जिस दिन से पीहू ने तुम्हें कहना शुरू किया था... फालतू में मंगल-मंगल करके बुलाता रह गया... मोटी बुद्धि का था, भूल हो गई। अच्छा तुम जल्दी से जाओ... हम दोनों सीधे रास्ते से आते हैं..."
    मंगल चकित सा बोला, "हम दोनों !!!..."
    मैंने बात को संभालते हुए कहा, "मैं और मेरी परछाई... हुए न हम दो..?"
    "ठीक है आप अपनी परछाई के साथ नीचे पहुंचिए मैं वही मिलता हूँ... देखिए मुझे कुछ घूम के आना पड़ेगा तो यदि देर हो जाए तो इंतजार कर लीजिएगा... अकेले न निकल जाइयेगा... अब जब चाचा मान ही लिया है तो डांटने का अधिकार भी देना पड़ेगा...", कहता हुआ मंगल नीचे उतर गया। 
    मैंने पीहू की तरफ देख कर कहा, "मंगल कुछ ज्यादा ही नहीं बोल गया ?"
    वह मुस्कुरा के मेरा हाथ पकड़ चलते हुए बोली, "नहीं बिल्कुल नहीं... जब से तुम उसके जीवन में आए हो तब से परेशान ही तो किया है... याद करो... आधी रात को मेरे घर से भाग कर बगिया पहुंच गए थे... बेचारे को मुझसे भी डांट खिलवाई... और कल उसे बिना बताए हुए नदिया पार की... जो मन में आया करते आए... कभी सोचा है वह तुमसे कितना प्यार करता है.... तुम्हारा कितना सम्मान करता है... सब यही लौटाना पड़ेगा... वैसे हो तुम गजब के इंसान... मेरे लिए समय-चक्र को पार कर गए..."
    "इनकी कृपा थी...", मैंने मंदिर की तरफ इशारा करते हुए कहा, "और ये क्या धीरे बोलो...", मां के सामने बेटी की तारीफ नहीं करते। कहीं उन्हें बुरा..."
    वह इठलाते हुए बोली, "छोड़ो यार, पता नहीं कैसे  राइटर हो...यही तो तुम नहीं जानते राइटर जी, यदि किसी मां के सामने उसके बेटे की तारीफ की जाये तो उसे बहुत खुशी होती है, और खासकर यदि उसके बेटे की पत्नी करें तो वो खुशी कई गुना बढ़ जाती है...समझे ?"
     "अच्छा ! तो तुमने मान लिया...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
     "क्यों पहले भी तो मांना था, तुम्ही थे जो छोड़कर भाग गए..." , उसने उलाहना देते हुए कहा।
    "अच्छा !! तो जाने ही क्यों दिया ? याद नहीं रह गया था क्या, मैंने कहा था न यदि कभी तुम्हें छोड़कर जाऊं, रोकने से भी न रुकूं... तो थप्पड़ मार के रोक लेना...", मैंने उसे याद दिलाते हुए कहा।
   उसने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, "हां यार सचमुच याद ही नहीं था और तुम इतनी जल्दी-जल्दी गए भी तो ? एक दिन अपने मन से नहीं रुक सकते थे...?"
   "अच्छा जी ! अब समझा, मैडम जी को अभी भी बहुत-सी शिकायये है...?", मैंने हंसते हुए कहा।
   "शुक्र मनाओ कि अब मेरे पास शरीर नहीं है... नहीं तो तुमसे बहुत सी लड़ाइयां लड़ती...", उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
    "लड़ाइयां मतलब...?"
     "अब समझ लो... एक पति पत्नी में कौन-कौन सी और किस-किस स्तर की लड़ाइयां होती हैं...", वह मेरी आंखों में देखते हुए बोली।
    मैंने हंसते हुए कहा, "तुम मरने के बाद भी नहीं सुधरी... कुछ तो शर्म करो मंदिर परिसर में हो। अच्छा चलो जी मान लिया गलती मेरी थी, तो भी इसका मतलब तो ये नहीं था कि फिर जो मन में आए वो करो...", मैं भी शिकायती लहजे में बोला था। 
    "अच्छा जी !! तो अब तुम्हें भी बहुत सी शिकायतें हैं...", उसने भी हंसते हुए कहा। 
    "क्यों ? क्या मुझे नहीं हो सकती..."
    "तुम लड़कों का धर्म है कि हम लड़कियों की शकायतें सुनो, अपनी उन्हें न सुनाओ, समझे..."
    "हां समझ गया... और सच पूछो तो बहुत पहले समझ गया था... पर यह भी सोचता हूं कि जो मेरा नहीं था, किसी न किसी को तो मिलना ही था। अफसोस कि वह भी संभाल के न रख सका...", बात मैंने सामान्य ढंग से कहीं लेकिन उसे व्यंगात्मक लगी।     "देखो यार व्यंग मत मरो... उस समय मेरी भी मानसिक स्थिति सही नहीं थी, तो मुझे जो समझ में आया वही किया। खुद से बदला लिया, सत्य से लिया, और अंत में तुमसे भी... यह भी भूल गई थी कि बदले और नफरत की भावना पहले उस इंसान को खत्म करती है जो उसे धारण करता है... तो देखो न, खत्म हो गई... जिसे चाहा वह जीवन में न आया तो फिर मैने कौन-सा सुख पा लिया होगा, तुम्ही सोचो ? क्षणिक सुख के बाद जिस आग में जलती थी, वह मैं ही महसूस कर सकती हूँ ? और कई बार किया भी... अब यही सोचती हूँ कि शायद उन सब की कर्जदार थी, उनका कर्ज चुकाये बिना इस देह से मुक्ति मिलना नहीं लिखा रहा होगा... या फिर इस श्रापित जीवन का एक अंश ही रहा होगा !!"
      मैंने उसे बीच में रोकते हुए कहा, "प्लीज पीहू चुप हो जाओ, सॉरी मेरा कहने का अर्थ यह नहीं था। मुझे तो शिकायत सत्य से है और साथ जीवन भर रहेगी..."
     "क्यों रहेगी तुम्हें शिकायत ? क्या उसने मेरे साथ जबरदस्ती की थी ? नहीं न ? रिश्ता तो मैंने अपनी मर्जी से बनाया, उसने स्वीकार किया लेकिन निभा नहीं सका, इसलिए मुझे जीते जी ही रिश्ते-नातों में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी... लेकिन जब वह तुम्हे ले कर आया, तुम्हें देखा, तो उससे सारी शिकायत दूर हों गईं... वैसे भी तुमने वचन दिया था कि जब तक मैं धरती में रहूंगी तब तक तुम मेरा इंतजार करोगे, है न ? तो अब नहीं रही... तो तुम भी अपने वचन से आजाद हो..."
    "तो फिर बताओ इस आजादी का क्या करूं...?", मैने पूछा।
    "खुले मन से स्वागत करो, सभी बंधनों से, सभी कसमों-वादों से दूर, मुक्त हो कर जीवन जिओ...?", उसने समझाते हुए कहा।
     "और शादी...?"
    "होनी प्रबल होती है, वो हो के रहती है, तुम्हारे या मेरे चाहने या न चाहने से कुछ नहीं होगा...? कौन सा अभी तक जो हमने चाहा पुरा हुआ ?"
     "मैं इतना भाग्यवादी नहीं बन सकता...?"
     "मैंने कब कहा ?; लाख कोशिशों के बाद यदि वह न हो जो तुमने चाहा, तो फिर नियति समझकर स्वीकार कर लेना चाहिए... और तुम चिंता मत करो मैं किसी भी हालत में तुमसे संबंधित किसी भी व्यक्ति को परेशान नहीं करूंगी.."
     "जानता हूँ.... तुम इतनी भी बुरी नहीं हो....", मैने मुस्कुराते हुए कहा।
      "अच्छ ! इतनी से क्या मतलब है तुम्हारा... हां ? अब बोलो भी ?", उसने भी मुस्कुराते हुए कहा।
      "कुछ तो हो न, मैं ऐसे नहीं बोल रहा, प्रमाण है मेरे पास, और जिसे तुम्हारी भी स्वीकृत प्राप्त है। मेरे लिए अपने अंतर्मन में  इतनी चाहत, इतना समर्पण, इतना प्रेम रखते हुए पूरी तरह से खुलकर नहीं बताया सिर्फ इसलिए कि तुम्हें मालुम था कि तुम्हारी जिंदगी बहुत दिनों तक तुम्हारा साथ नहीं देगी...? लेकिन पीहू मैं देता न... जितने दिनों तक तुम इस धरती पर रहती तो मैं भी तुम्हारे साथ रहता ? और देखो आज वही तो हो रहा है ? तुम्हारा त्याग करके मैंने कौन सा सुख प्राप्त कर लिया और तुमने कौन सा मोक्ष ? दोनों ही भटक रहे हैं न ? काश पीहू, मैं तुझसे कभी बता सकता, या कभी खुद से कह सकता कि मुझे तुझसे कितनी मोहब्बत थी, है और रहेगी, देखो कोई शायद शब्द भी नहीं है..."
    "वाह राइटर जी, पहले आप फिर तुम और अब तू, क्या बात है... मोहब्बत बढ़ती जा रही है ?"
    "क्यों नहीं आखिर तू मेरी रुहानी मोहब्बत जो ठहरी..?", मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा यह बताओ जितनी बातें खत में लिखी सब सही है न, कि मुझे इंप्रेस करने के लिए यूं ही लिख दिया था..."
    "जैसे एक दो एग्जांपल दो....", उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 
    "एग्जांपल एक दो क्या बहुत सारे हैं... जैसे आखिरी दिन की रात जब तुम बगिया में रुकी थी, बहुत सारे इमोशंस जी रही थी, बहुत सारी इच्छाएं थी, जिसे तुम पूरा कर सकती थी या मझे करने के लिए प्रेरित कर सकती थी, मेरे बगल में आधे घंटे तक लेटी रही, मुझे सोते देखती रही... वही सब...?", मैंने कुछ मुस्कुराते हुए पूछा..."
      "हां तो ? पूरी कहां हुईं ? ईश्वर ना करें कि तुम जैसा ईमनदार बॉयफ्रेंड किसी और लड़की को मिले..."
     उसकी बात खत्म होते ही हम दोनों जोर से हंस पड़े। इसी तरह हंसी मजाक चलता रहा और हम आगे बढते रहे। इन पांच वर्षों में मंदिर के मुख्य रास्ते में भी काफी बदलाव हो चुका था।  मिट्टी को समतल करके सीढ़ीनुमा बना दिया गया था, जिनके ऊपर बड़ी-बड़ी पटिया बिछा दी गई थीं... हम चलते हुए सीढ़ी के अंतिम छोर पर पहुंचे... 
    "रुको... सीढ़ी के आखिरी पायदान को पार इसके बाद शायद मैं तुम्हें दिखाई न दूं... तो जब तक मंगल चाचा नहीं आते तुम मेरे साथ यहीं बैठो..." अपनी बात पूरी कर वह एक सीढ़ी पहले ही बैठ गई... हम दोनों के पैर आखिरी सीढ़ी पर थे। मैं भी उसके बगल में बैठ गया। तभी सामने से एक लड़का आते हुए दिखा। पास आने पर उसने अपने दोनों हाथ जोड़ कर मुझसे नमस्ते कहा। फिर पीहू की तरफ देखते हुए बोला "नमस्ते दीदी..."
     पीयू ने स्वीकृत में अपना सर हिलाया और वह आगे बढ़ गया। उसके हाथ में कुछ फूल थे। मैं चकित-सा कभी उसे तो कभी पीहू को देख रहा था, अंत में मैने पीहू से पूछ ही लिया, "तो क्या इसने तुम्हें देखा ? मेरा मतलब क्या तुम इसे दिखाई दी...?"
    "हां, तभी तो उसने मुझे भी नमस्ते कहा, जानते हो यह लड़का कौन है... अरे यह वही है जिसने कभी मेरे स्वप्न को साकार रूप में देखा था... हम दोनों को मंदिर में बैठे हुए..."
     "ओह !! हा अब याद आया... ये वही है..", मैंने उसे पीछे से कुछ तेज आवाज में पुकारा, "ये सुनो !! अच्छे से देख लो आज हम गायब नहीं हुए..."
     वह पलटा धीरे से मस्कुराया फिर अपना हाथ हिला कर आगे बढ़ गया। पीहू हंसते हुए बोली, "उसे मालूम है..."
    "क्या मालूम है...", मैंने लापरवाही से पूछा। 
    इस बार वह खिल-खिलाकर हंस पड़ी, "यही कि मैं मर चुकी हूँ... ये उसी का छोटा भाई है, जिसे तुमने अपनी घड़ी दी थी..."
    मैं उसकी तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोला, "तो तुमने मुझे रोका क्यों नहीं... आज भी उसने मुझे पागल ही समझा होगा... अच्छा मरने के बाद का कुछ एक्सपीरियंस तो बताओ..."
    "अब क्या बताऊं... मरने के बाद अपने ही शरीर की रखवाली करनी पड़ी... फिर कभी घर के आसपास तो कभी बगिया में तो कभी इस मंदिर के आस-पास... तो फिर कभी नदी के किनारे उसी पत्थर में बैठती, बस एक ही आस थी कि एक न एक दिन तुम आओगे, और मैं तुम्हें फिर से देख पाऊंगी... लेकिन इतनी दूर तक नहीं सोचा था कि तुम मेरे मुक्ति दाता बनाकर आओगे... सुनो तुम्हें एक बात कहने के लिए रोक रखा है... मैं तुम्हें इसी मंदिर पर दिख सकती हूँ इसके अलावा कहीं और नहीं..."
    "तो ...?", मैंने सशंकित मन से पूछा।
    "तुम्हें अपनी इस इच्छा का यही त्याग करके जाना होगा। कभी मैंने चाहा था कि तुम यहां लौट कर आओ और आज मांगती हूँ... जो वचन तुमने देवी मां को दिया है उसकी पूर्ति हेतु अब तुम कभी यहां वापस लौट कर नहीं आओगे। मैं प्रतिपल तुम्हारे साथ रहूंगी, लेकिन आज के बाद तुम मुझे कभी इस तरह इस रूप में नहीं देख पओगे...", कहते हुए उसने अपना मुख दूसरी तरफ फेर लिया।
    मैं सन्न, कुछ देर तक बोल ही नहीं पाया। फिर हिम्मत करके उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा, "तो क्या यह उनकी इच्छा...?"
   उसने कतर दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए कहा, "हां... इसी वचन के बाद ही मुझे मंदिर के अंदर प्रवेश की अनुमति मिली थी। मैं तुम्हें इस तरह से दिख रही हूँ, तुमसे बातें कर रही हूँ, यह सब उनकी कृपा है... मैंने तुम्हारी तरफ से उन्हें वचन दिया है... एक बार फिर मैंने तुम्हारे साथ छल किया न...?"
     कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "यह मेरी जिंदगी के आखिरी पल है जो मेरे लिए बहुत ही खूबसूरत है... यूं उदास होकर मैं इन्हें सिर्फ गुजरते हुए नहीं देखना चाहता... जीना चाहता हूँ इन्हें... तुम्हारा फैसला गलत नहीं है... यदि तुमने वचन दिया... तो समझो कि वह वचन मैंने दिया... मैं अब दोबारा यहां लौट कर कभी नहीं आऊंगा... और वैसे यहां आकर भी क्या करूंगा... तुम तो मेरे साथ ही चल रही हो न... इस जीवन में तुम्हारे होने का एहसास ही बहुत है मेरे लिए... और वैसे भी आध्यात्मिक प्रेम में शरीर का क्या महत्व ? तुम्हें तो मैं जब चाहूं मन की आंखों से देख सकता हूँ, तुम्हारे स्पर्श को महसूस कर सकता हूँ... पर अपने लिए एक वचन मैं तुमसे भी मांगता हूँ... तुम्हारे देह त्याग के समय मैं तुम्हारे पास न था जबकि ये तुम्हारी ख्वाहिश थी, जिसे मैं पूरी न कर सका... लेकिन तुम मुझे वचन दो... जब इस संसार से मैं अपने देह का त्याग करूं, तो तुम मेरे पास रहोगी... मरने के बाद भी तुम्हें खोजते हुए नहीं भटकना चाहता... पीहू !"
    कह के मैं खामोश हो गया। फिर मुझे अचानक एक बात याद आई। मैंने उससे पूछा, "पीहू ! सत्य का क्या होगा..?"
   उसने रहस्यमई मुस्कान के साथ कहा, "तुम उसके लिए चिंता मत करो उसने अपनी मुक्ति का रास्ता स्वयं खोज लिया है। याद है उस दिन अटारी में में उसने क्या कहा था... उस दिन वह नहीं उसकी नियति बोल रही थी... वह समझ चुका है... अब उसके जीवन में हमें कोई हस्तक्षेप नहीं करना है..."
     उसकी बात खत्म होते ही मंगल बाइक लेकर आ गया। मुझे देखते हुए बोला, "चलिए सर जी..."
    मैं इस जीवन में उसे अंतिम बार देखा। मेरे होठों से फीकी मुस्कान आ गई, "ठीक है... इजाजत दो ?"
   वह कुछ बोली नहीं उसी तरह बैठी रही। मैं उठा, उसने पीछे से मेरा हाथ पकड़ लिया फिर करुण स्वर में बोली, "जाओ... जियो अपनी जिंदगी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगी कि तुम भूल जाओ तुम्हारे जीवन में कभी पीहू नाम से कोई आया भी था, जिसे तुमने चाहा, मोहब्बत की.... जिसके कहने पर किसी जन्म में उसके साथ खाई में भी कूद गए... जिसके लिए कभी श्रापित जीवन को भी स्वीकार किया... जिसके लिए कभी मुक्ति दाता बन समय-चक्र को भी पार किया... नदी के उस पार ज़िंदगी है, उसकी भाग-दौड़ है और जीवन संगीत के साथ उसका कोलाहल भी।... नदी के इस पार शांति है, स्थिरता है, एक नए सफर की शुरुआत से पहले का विश्राम है। मैं फिर से अपने इसी स्वरूप में एक बार फिर तुमसे मिलूंगी, तुम्हारा स्वागत करूंगी... अब चलो मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी... न देख पाओगे तो क्या हुआ... तुम मुझे सदैव अपने आस-पास ही महसूस करोगे..."
     फिर उसने धीरे से मेरी कलाई छोड़ दी। मैं अपने आंसू पोंछते मंगल की तरफ बढ़ गया। इस बार मैंने अपने आदत के विपरीत पीछे पलट कर देखा। वह अपने स्थान पर नहीं थी। वह लड़का जो कुछ देर पहले हमारे पास से गुजरा था, वही एक बार फिर मेरे पास से गुजर। उसके होठों में एक अलग ही मुस्कान थीं। उसे जाते हुए मैं और मंगल देखते रहे। थोड़ी दूर जाकर वह पलटा और उसने झुक कर खास अंदाज अभिवादन किया, मैंने मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। वह पलटा और वापस चल पड़ा। 
    मैंने मंगल से पूछा, "ये क्या कर गया..."
    मंगल आश्चर्यचकित था, उसने बताया, "यह विशेष प्रकार का सम्मान है जो पवित्र आत्माओं को दिया जाता है, लेकिन यह सम्मान उसने आपको क्यों दिया...?"
    मैंने हंसते हुए कहा, "क्या मैं पवित्र आत्मा नहीं हूँ..?"
    "वो बात नहीं सर जी, मैं मरने के बाद की आत्मा की बात कर रहा हूँ...", मंगल हंसते हुए बोला।
   "चलो बाइक स्टार्ट करो मगल चाचा, तुम तो मुझे डरा रहे हो..."
    मंगल ने बाइक स्टार्ट की मैं उसके पीछे बैठ गया। मैं समझ चुका था कि उस लड़के ने मेरी तरफ देख कर विशेष अभिवादन क्यों और किसके लिए किया।  



      खना-पीना खा लेने के बाद दोपहर को बारह बजे मैंने कमली से अंतिम विदाई ली। बैग में बची बॉटल को निकाल कर एक कोने में रख दिया, फिर मंगल के साथ घर आया। घर के पीछे के दरवाजे में ताला लगा हुआ था, जिसकी एक चाबी मंगल के पास थी। मैं अटारी में आया। पीहू ने जो बुक्स मेरे लिए छांट के रखी थी उन्हें मैंने बैग में डाल ली, फिर मंगल की सहायता से मैने बुक्स को तीन-चार कैटेगरी में अलग किया। लगभग दो बजे सत्य घर आया। मैने उसे समझाया कि कौन सी बुक्स किस स्तर के विद्यार्थियों या व्यक्तियों के लिए हो सकती हैं। या तो तुम इन्हें स्कूल लाइब्रेरी में डोनेट कर दो या फिर इस अटारी और कच्चे मकान को लाइब्रेरी में कन्वर्ट कर दो। बैठकर पढ़ने के लिए कुछ टेबल कुर्सियों का इंतजाम कर दो.... बुक्स को सुरक्षित रखने के लिए अलमारी का इंतजाम कर लो। शुरू में पैसे लगेंगे उसके इंतजाम का रास्ता भी मैं तुम्हें बताता हूँ... मैंने पीहू की अंगूठी तुम्हारे कवर्ड में रखी हुई देखी है... उसका मोह त्याग दो... उसे सर्वाधिक लगाव किताबों से था, उसका प्यार उसे लौटा दो... और फिर अपनी आर्थिक स्थिति और सुविधा के अनुसार बाजार से हर कटेगरी की और भी बुक्स हर महीने लाकर रखते जाओ। धीरे-धीरे यह एक बड़ी लाइब्रेरी बन जाएगी..."
    "लेकिन परमानेंट इसकी देखभाल के लिए किसको रखूंगा... लाइब्रेरी को ठीक समय पर खोलना फिर बंद करना ? फिर पूरा का पूरा घर खुला रहेगा...?", सत्य ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
    "उसका रास्ता भी है। इस गैलरी में एक दरवाजा लगवा दो जो तुम्हारे जाने के बाद बंद रहेगा। इस तरह से कच्चे घर और पक्के घर के बीच की कनेक्टिविटी खत्म हो जाएगी... रेगुलर न सही हॉलीडेज़ लाइब्रेरी के रूप में चलाओ... जो सिर्फ छुट्टियों के दिन खुला करेगी... जिस दिन स्कूल की छुट्टी होगी... मंगल सुबह ही इसे खोल कर एक बार साफ सुथरा कर देगा... रही बात लाइब्रेरी में बैठने की, बुक इशू करने की, उसे मैनेज करने की तो 11वीं और 12वीं के कुछ स्टूडेंट जो पढ़ने में इंटरेस्ट रखते हो उनसे बात कर लेना। मेरी लाइब्रेरी में एकेडमिक बुक्स रहेंगी तो वे कुछ आसानी से तैयार हो जाएंगे... उन्ही का ग्रुप बना दो...वह भी अपना पढ़ते रहेंगे और उनके साथ और भी लोग..."
   "ये तुम कुछ दिन और रुक जाओ न...?", उसने आशा भरी दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए कहा। 
   मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "सच कह रहा हूँ, रुक जाता, लेकिन मैं जानता हूँ यह काम तुम और मंगल कर सकते हो... और फिर कितने दिनों तक मैं रुकूंगा...? ये एक-दो दिन का काम तो है नहीं...? इसे धीरे-धीरे आगे बढ़ाना पड़ेगा... और फिर यदि कभी तुम्हें ऐसा महसूस हो की लाइब्रेरी में कोई नहीं आ रहा है तो ऑप्शन है न, इन सभी किताबों और सेटअप को स्कूल या कस्बे की लाइब्रेरी को डोनेट कर देना... लेकिन जल्दबाजी में नहीं। कम से कम इसे साल-दो तक चलाते रहना... मुझे विश्वास है... यह सोच कामयाब होगी... और सच पूछो सत्य यदि यह सोच कामयाब हो गई तो इस क्षेत्र से अशिक्षा और अज्ञानता भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगी..."
    अंत में हम तीनों ही इस बात से सहमत थे। सत्य कपड़े चेंज करने के लिए बेडरूम चला गया। उसके आने से कुछ क्षण पहले मैंने अंतिम बार मंगल को अपने गले से लगाया। वह रोते हुए धीरे से बोला, "अपने साथ उन्हें भी लिए जा रहे हैं सर जी...!!!"
   मैंने उसे खुद से अलग किया फिर उसके आंसू पोंछते हुए कहा, "बिटिया कहते हो और मानते भी हो... तो कब तक रखोगे अपने पास ? अब उसे हंसी-खुशी विदा करो... अपने भईया जी का ध्यान रखना... उनकी सुरक्षा कवच बनकर हमेशा साथ रहना...", 
    फिर मैंने मोगरे और कनेर की कुछ फूल तोड़े... दो-चार मंगल की जेब में डाल दिया और शेष फूलों को अपने बैग में डालते हुए फिर बोला, "मंगल इन पौधों का भी ध्यान रखना, दूसरे तीसरे दिन शाम को सूरज ढलने के बाद या सुबह-सुबह सूरज उगाने के पहले सींच दिया करना... तुम्हारी बिटिया को इन फूलों से बहुत लगाव था। मंगल रो पड़ा। मैंने फिर उसके आंसू पोंछते हुए कहा, "न मंगल, रोते नहीं...."
   सत्य आया... उसने बाइक स्टार्ट की... मैं पीछे बैठा। मंगल ने बैग हम दोनों के बीच सीट में रख अपने हाथ जोड़े लिए। हम दोनों की आँखें सजल थीं। बाइक चल पड़ी, एक बार फिर सभी कुछ पीछे छूटता गया।
     लगभग चार बजे हम कस्बे के बस स्टैंड में चाय पीने के लिए रुके। वह छोटे से कस्बे का छोटा सा बस स्टैंड था। तीन-चार बसें थी। कुछ क्षेत्रीय गांव की तरफ जाने वाली, उन्हीं में से एक शहर के लिए थी। चाय पीते हुए जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी, मैंने सत्य से कहा, "तुम अपना टाइम क्यों बर्बाद करते हो, मैं इस बस से निकल जाता हूँ..."
     कुछ देर न नुकर करने के बाद आखिरकार वह मान ही गया। हमने चाय खत्म की और बस के पास गया। कुछ देर बाद लौटा, "ये लो टिकट, बस जाने में अभी लगभग आधे घंटे हैं। अपना ख्याल रखना और जो मैंने कहा है भूलना मत ... और पहुंचते ही ज्ञान से फोन करवा देना, उसे फैक्ट्री का नंबर मालूम है, वह मुझे खबर कर देगा..."
    कुछ देर खामोश रहने के बाद उसने कहा, "यार एक बात पूछूं… यदि तुम बुरा न मानो तो...?"
    बस यहीं पर आकर वह खामोश हो गया। जब वह कुछ देर तक कुछ नहीं बोला तो मैंने ही कहा, "नहीं, पूछो कौन सी बात...?"
   "नहीं कुछ नहीं.... बस ऐसे ही...", उसने दूसरी तरफ देखते हुए और अपने मन की सारी बेचैनी को छुपाते हुए मुझसे कहा।
    लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा था, न पूछ पाने के दर्द से वह भी गुजर रहा था। उसकी बेचैनियां बढ़ती जा रही थी। वह कभी मेरी तरफ देखाता तो कभी दूर किसी दुकान की तरफ। तो कभी बस की तरफ तो कभी चारों तरफ की भीड़ में उसकी निगाहें खो जाती। मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "सत्य तुम्हें जो पूछना है, मुझसे पूछ सकते हो... कोई भी बात मन में न रखो..."
    कुछ पल मेरी तरफ देखने के बाद बड़ी मुश्किल से उसने पूछा, "क्या तुम पीहू से प्यार करते थे... प्लीज मुझे गलत..."
    मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा और पूरे विश्वाश से कहा, "हां करता था..."
   "क्या पीहू भी तुमसे...?", उसने कुछ संकोच से पूछा था। नजरे झुकी हुई थी। मेरे होठों में फीकी मुस्कान आ गई। जिस प्रश्न कि मुझे तलाश थी वह प्रश्न मेरे सामने था। सही इंसान से पूछा गया सही प्रश्न।
      एक पल के लिए लगा कि मैं सत्य को कभी भी श्रापित जीवन से मुक्त न होने दूं।बकह दूं उसे, वो सब कुछ जो हमारे बीच घटित हुआ, जो पीहू ने मेरे लिए महसूस किया और मैंने पीहू के लिए। बयां कर दूं उसकी मोहब्बत को। बता दूं सारी बातें जो हमारे और पीहू के बीच हुई थी।
     उसे एहसास दिलाऊं कि हमारे बीच सिर्फ दोस्ती का रिश्ता नहीं था, और न ही केवल प्यार का था, बल्कि उससे कहीं अधिक दूर निकल चुका था। जहां हम एक दूसरे का सम्मान करते थे तो दूसरी तरफ एक दूसरे के दर्द को महसूस कर रोते भी थे। 
      उसे यह भी एहसास दिला दूं की किस तरह पीहू ने मुझे अपने गले से लगाया था, जहां हमारे दिल की धड़कनों ने एक दूसरे की धड़कनों को महसूस किया था। हर एक जज्बात, हर एक एहसास, मै उसे बता दूं कि किस तरह उसने तुम्हारा नाम मिटा कर मेरा नाम लिखा था। उसे दे दूं वह नोटबुक जिसमें मेरे लिए पीहू ने पत्र लिखा था।
    और अंत में यह भी बता दूं कि वह कविता जिसे लेकर तुम इस भ्रम में हो कि पीहू ने तुम्हारे लिए लिखी थी, वह कभी भी तुम्हारे लिए थी ही नहीं।  उस कविता के हर एक भाव, शब्दों के जज्बात सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए थे। 
     और इन सब का एक प्रमाण भी था, पीहू का तुम्हारे के लिए लिखा गया अंतिम पत्र जिसमें उसकी आखिरी इच्छा थी, "यदि मैं इस दुनिया में न रही तो तुम मुझसे वादा करो की एक बार ही सही, उसे यहां लेकर आओगे... पता नहीं क्यों मुझे आभास होता है कि मेरी मुक्ति तब तक नहीं होगी जब तक कि वह एकबार यहां न आ जाए..."
  मैं अपनी आँखें बंद कर कुर्सी से पीठ टीका बैठ गया। सोचता रहा, तो यह पीहू की मुक्ति के लिए मुझे नहीं लाया था, शायद यह तो खुद अपनी मुक्ति चहता है... अपने अपराधबोध से मुक्ति... 
     अब सत्य को यहां पर अकेला ही भटकना होगा, एक श्रापित जीवन जीते हुए। जैसा कि उसने कभी तुमसे कहा था, "पीहू तुम मर के देखो, इन नजरों में तब भी तुम्हारी ही तस्वीर होगी...", यह तो उसका खुद को दिया श्राप था। जब उसने अपनी सजा स्वयं निर्धारित कर ली है, तो अब मैं उसमें कोई अवरोध क्यों पैदा करूं।
     लेकिन कैसे ?.... और देखो तो इसका जवाब मुझे तुम्हारे द्वारा लिखे पत्र में मुझसे पूछे गए एक सवाल में ही मिला, "... क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ?"
   पीहू ! आज सत्य मुझसे पूछता है कि तुम्हे मुझसे प्यार था कि नहीं ? तो ठीक है मैं जवाब दूंगा इसे। 
    भ्रम !! जो नहीं है, उसके होने का आभास, बेहद ही उलझा देने वाला होता है। यदि कोई भ्रम अंतर्मन में स्थापित हो जाए तो उससे बड़ा सत्य फिर कुछ भी प्रतीत नहीं होता। यदि मैं एक बार स्वीकार कर लूं कि पीहू को मुझसे मोहब्बत थी, तो यह किसी भी अपराधबोध से मुक्त हो जाएगा। निकल जाएगा इन यादों से दूर। लेकिन उसे अपने ही दिए गए श्राप से मुक्ति नहीं मिलेगी। लेकिन यह तो नियति के फैसले के विरुद्ध होगा न ? तो सत्य तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि अब तुम जिंदगी भर इसी भ्रम में रहो की पीहू ने सिर्फ तुमसे मोहब्बत की। हमने बहुत त्याग किया, अब त्याग करने की बारी तुम्हारी है; और यही त्याग तुम्हें अपने श्रापित जीवन से मुक्ति दिलाएगा।
 "सॉरी यार... शायद मुझे ये नहीं पूछना चाहिए था...?", सत्य ने मेरे कंधे में अपना हाथ रखते हुए कहा।
    मैंने अंदर ही अंदर खुद को मजबूत किया। अपनी आँखें खोली फिर उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखते हुए कहा, "नहीं, अच्छा हुआ कि तुमने मुझसे पूछा। तो जान लो, यह सच है कि उस समय मैं जिस मानसिक स्थिति में गुजर रहा था, तो मेरा झुकाव धीरे-धीरे पीहू की तरफ होने लगा था। हमारी सोच, हमारी पसंद, नपसंद, जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण सभी कुछ तो मैच करता था यार, तो एक पल के लिए मेरे अंदर लालच आ गया था यदि यह लड़की मेरे जीवन में आए आ जाए तो मैं भी हंसी-खुशी जिंदगी जी सकता हूँ। इस तरह से मैं भी तुम्हारी तरह उसके साथ जिंदगी जीना चहता था। मैंने अप्रत्यक्ष रूप से अपने दिल की बात उससे कहने की कोशिश भी की, लेकिन उसने कभी भी मेरी बातों को संजीदगी से नहीं लिया, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था।
    उसने सिर्फ मुझे अपना एक अच्छा दोस्त समझा जो जीवन में कुछ खो कर तुम सबके बीच में पहुंचा था। तुम से अधिक समय उसने मेरे साथ बिताया, तो जाहिर है मेरे इमोशंस को उसने ही अधिक समझा होगा। उसने मुझे भावनात्मक रूप से सपोर्ट किया, लेकिन एक दायरे में रह कर, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था। 
   हम दोनों जब भी अकेले में बात करते तो उन बातों में अधिक से अधिक तुम ही होते थे। तुम्हारे प्यार, तुम्हारी चाहतों का जिक्र ही हमेशा होता था। वह मुझे बताती कि वह तुमसे किस हद तक प्यार करती है, और तुम भी उससे करते हो... अपने प्यार अपनी चाहतों के बीच में उसने कभी भी मुझे नहीं आने दिया, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था।
    मेरे इतना कहने पर सत्य की आँखें भर आईं, "सो सॉरी यार ... मैंने पूछ कर तुम्हें और अपने प्यार दोनों को लज्जित किया..."
    मैंने उसकी आंखों में उसी तरह देखते हुए कहा, "कोई बात नहीं, यदि मन में कोई शंका हो तो उसे दूर कर लेना चाहिए। जब मैं तुम लोगों की जिंदगी में आया और उसे मेरे विषय में जानकारी मिली तो उसे दुख हुआ। उसने स्वयं को मेरी प्रेमिका के स्थान पर रख और मुझे तुम्हारे स्थान पर रखकर विचार किया होगा कि एक न एक दिन तुम्हारे साथ भी यही तो होगा... 
    उसकी इस भावना का प्रदर्शन उस एक्ट में हुआ जब वह मेरी बाह पकड़ कर लगातार रोती रही। यहीं से शुरू हुआ दर्द और आंसुओं का संबंध। प्रिय की समस्त वेदनाओं को वफा, बेवफा, पाप और पुण्य जैसे शब्दों की परिभाषाओं से परे हो कर उसे स्वीकार करने का संबंध। उसे मुझ जैसे व्यक्ति से प्रेम नहीं था। प्रेम था तो मेरे आंसुओं से, मेरे दर्द से, मेरी वेदना से। उसे अपनी होने वाली मृत्यु के बारे में अच्छी तरह से मालूम था कि एकदिन वह स्वयं तुम्हें छोड़कर इस दुनिया से चली जाएगी और तुम मेरी तरह ही तड़पोगे, रोओगे, भटकोगे। 
     उसने सोचा, जो जिंदगी यह लड़का जी रहा है, वही जिंदगी एक दिन तुमको जीनी पड़ेगी। तब वह दिलासा देने के लिए तुम्हारे पास नहीं होगी। तभी तो उस लड़के के दु:ख से दु:खी होकर जितनी बार भी उसे गले लगाया, तो वास्तव में तुम्हे गले लगाया था, तुम्हे दिलासा दिया था।
    उस वक्त उसकी नजर में हम दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे ही नहीं। शायद इसीलिए उसकी भावनाएं, उसकी ऊर्जा और उसका प्रवाह हम दोनों के लिए एक-सी थी, और वह थी अपने प्रिय की समस्त वेदनाओं को आत्मसात करना। उसे गले लगा उसके दुख-दर्द में शामिल हो उसके लिए अश्रु बहाना। मेरे जीवन में आकर उसने मेरी प्रेमिका के इसी एक अधूरे कार्य को पूरा किया और भविष्य में तुम्हारे प्रति अपने कार्य को भी, जब वह इस दुनियां में स-शरीर न होगी। उस समय मेरे प्रति जो भौतिक प्रेम पीहू के हृदय में तुम्हे दिखाई दिया होगा वह वास्तव में आज के सत्य के लिए एक आध्यात्मिक प्रेम था। एक ऐसा प्रेम जो सदैव के लिए होता है, कालचक्र से परे होता है और किसी के होने या ना होने का मोहताज नहीं होता है..
    अब मेरी बात ध्यान से सुनों, पीहू को हार्ट में प्रॉब्लम है, इस बात को पीहू के अलावा कौन जनता था ? क्या बाबा जानते थे, नहीं न ? तो फिर तुमसे विवाह करने में उसे क्या दिक्कत थी ? वह बाद में तुमसे झूठ बोल सकती थी कि पहले उसे खुद जानकारी नहीं थी। सत्य तुम उसके लिए बेहतर विकल्प ही नहीं उसके प्यार भी थे,  जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर चली जाती। पीछे रह जाते तुम, तब तुम उससे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया ? जानते हो क्यों ? क्योंकि वह तुम्हे सच्चा प्यार करती थी, लेकिन तुमने क्या किया, उसे छोड़ कर चले गए न ? तुम्ही ने बताया कि जब उसकी मृत्यु हुई थी तो वह प्रेग्नेंट थी ? तो फिर मुझे बताओ पत्नी या प्रेमिका का ऐसा कौन सा धर्म है जो उसने नहीं निभाया ? जब पहली बार वह तुम्हारे साथ सेक्स के तैयार हुई तो क्या तुमने कुछ पूछा या उससे कहा कि नहीं पीहू हम पहले समाज के सामने शादी कर लेते हैं, ये सब तो बाद में भी हो सकता है ? मुझे नहीं लगता कि तुमने पूछा होगा या कुछ कहा होगा। उसके शारीरिक समर्पण को तुमने विवाह की स्वीकृत समझने की भूल की। और सच कहूं तो यह भूल नहीं थी तुम्हारे अंदर का ललच था कि इसके बाद पीहू कहां जाएगी, उसे तो तैयार होना ही होगा। लेकिन तब भी वह तैयार न हुई तो तुम्हारे अभिमान को ठेस पहुंची... उसकी इस उपेक्षा में तुम्हे बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज लड़की नजर आई, और फिर तुमने दुगने भाव से उसे उपेक्षित किया... अब शायद तुम समझ गए होंगे कि तुमसे विवाह न करने का उसका फैसला तुम्हारे हित में था, ताकि तुम किसी भी सामाजिक रिश्ते नाते में उससे दूर रहो... तुमने समझा कि पति के रूप में तुम्हें अपना कर भी पीहू तुम्हे उपेक्षित कर रही है, तुम्हारा त्याग कर रही है। जबकि वास्तविकता यह थी कि पूरी तरह से पत्नी के रूप में अपना कर तुमने उसका त्याग किया। 
      कभी तुमने मुझसे पूछा था कि क्या मैंने कभी कोई वास्तविक कहानी भी लिखी है... तो जान लो इसीलिए नहीं लिखता। वास्तविक कहानियां किरदारों को सही आईना दिखाती हैं... जो उन्हें मंजूर नहीं। और फिर एक किरदार दूसरे किरदार को इसी तरह तन्हा छोड़कर भाग जाता है।
    मैंने लिखा न कि सत्य मेरा दुश्मन नहीं। मैंने हृदय से उसका कभी बुरा कभी नहीं चाहा। इस बीच बस स्टार्ट हो चुकी थी। पीहू सच कहती थी कि मैं किसी की नजर से नजर मिला कर झूठ बोल सकता हूँ, लेकिन अब मुझे सच कहना था।
    मैने अपनी नज़रें उसकी नजरों से हटाते हुए कहा, "...लेकिन मैं दिल से चाहता हूँ कि तुम यहां से निकल जाओ। इन यादों से दूर भाग जाओ। जितना यहां रहोगे, ये यादें उतनी ही शिद्दत के साथ तुम्हारा पीछा करती रहेंगी... तुम्हें जीने नहीं देंगी, तुम प्रतिपल मरते रहोगे... मुझे तो पीहू ने बचा लिया लेकिन तुम्हे बचाने के लिए यहां कोई दूसरी पीहू नहीं मिलेगी... प्लीज सत्य मै सच कह रहा हूं ... तुम्हारा दोस्त हूँ न, इसलिए तुम्हे समझा रहा हूँ... पीहू जैसे किरदार को तो मरना ही था, तो वह मर गई... लेकिन तुम्हें तो जिंदा रहना है न ? कैसे, यह भी तुम्हें तय करना है ? चलों चलते हैं, शायद बस चलने वाली है..."
 और फिर मैं बस में चढ़कर अपनी सीट पर बैठ गया। सत्य नीचे खड़ा था। बस चल पड़ी मैंने खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर कहा, "चलता हूँ... अपना ध्यान रखना... और जो कहा है उस पर शांत मन से विचार करना..."
   बस आगे बढ़ती जा रही थी और सड़के पीछे छूटती जा रही थी। सत्य भी पीछे रह गया। शायद गांव की उन्हीं गलियों में, उसी बगीचे में, उसी धर में। अपनी अनगिनत यादों के साथ, खुद के लिए दिए गए श्राप से श्रापित जीवन को जीने के लिए वचनबद्ध। लेकिन मैं अब अपने सभी वादों और वचनों से मुक्त हो चुका हूँ। पहली बार की तरह इस बार मैंने कोई गलती नहीं की। मैने पीहू को नहीं छोड़ा, उसे अपने साथ ले आया। उसके पत्र की अंतिम कुछ पंक्तियां मेरे मन में अभी भी गूंज रहीं थी.... उसने लिखा था...
    ".... तो देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ मैं उतनी बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ न अजनबी, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ अपनी पीहू को..."
   मैंने तो अपना वादा निभाया। अपनी पीहू को अपने साथ ले कर जा रहा हूँ, यदि सत्य की कोई पीहू बची हो तो उसे रखे अपने पास, मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं। पीहू की यादों और अपने श्रापित जीवन के साथ भटकते रहना अब उसकी नियति है तो भला मैं क्या कर सकता हूँ। तो सत्य तुम अब खड़े रहो उसी अटारी में प्रेम की उन्हीं ऊंचाइयों पर देवत्व का अभिशाप लिए जहां कभी पीहू खड़ी थी, अकेले और तन्हा। शायद यही तुम्हारा प्रायश्चित है। 
   और मैं ? मैं भी उसी अटारी की सीढ़ी के आखिरी पायदान में अपनी उसी पीहू के साथ खड़ा हूँ जो मेरी है... और अनंत काल के लिए मेरी रहेगी। नहीं चाहिए हमे देवी-देवताओं-सा जीवन, इंकार करते हैं। हम तो वही भले जहां एक साथ हो।
     सच मानो यदि पीहू से केवल मुझे मोहब्बत होती, वह सिर्फ मेरा प्यार होती तो मैं स्वयं हाथ पकड़ कर तुम्हे इस भंवर से बाहर निकालने में मदद करता। लेकिन नहीं, वह सिर्फ मेरी मोहब्बत नहीं, बल्कि सर्वप्रथम मेरी गर्लफ्रेंड यानी मित्र थी। जिसने कभी मुझे बिखरने से बचाया, अपने दृष्टिकोण से सहेजा, मुझे जीना सिखाया। उसने मेरे साथ मित्रता के उसी धर्म का निर्वहन किया जैसा कि कभी तुम्हारे साथ किया था। मुझसे मोहब्बत करना उसका व्यक्तिगत और निजी मामला था उसमें हम कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते और ना ही हमें करना ही चाहिए था।
     यदि तुम इंसान हो और तुम्हारे अंदर कोई इंसानियत जीवित है... तो जरा याद करो, बारिश में भींगी हुई उस रात को, जब तुम पहली बार पीहू से मिले थे। अनजाने में बाबा से बोले गए एक झूठ की उसे सजा मिली, किसके लिए ? उसने तुम्हें अपना मित्र माना था और उसे चिंता थी कि यदि इतनी रात को तुम वापस गए तो कहीं तुम्हारे साथ कोई हादसा न हो जाए और उसने तुम्हे रोक लिया था। लेकिन तुम उसे अकेला छोड़कर भाग गए ? तुमने अपने मित्रता के धर्म का निर्वहन क्यों नहीं किया ? अपने प्यार के लिए न सही अपने मित्र के लिए तो रुक सकते थे न ? लेकिन नहीं रुके ? तो फिर... तुम मित्रता के धर्म का पालन न करने और एक रिश्ते को अस्वीकार करने के दोषी पाए जाते हो ?
   लो सत्य ! जो उसने चाहा वह पूरा हुआ। मैं तुम्हारी सोच का सरथी बन, तुम्हारे रथ को कुरुक्षेत्र के उसी स्थान पर ले जाकर खड़ा कर दिया, जहां से तुम्हे केवल अब पीहू और अपने कर्म दिखाई देंगे। पछतावे और अपराधबोध के असंख्य तीर क्षण-प्रतिक्षण तुम्हारी आत्मा को छलनी करते रहेंगे। भ्रम !! जो नहीं है, उसके होने का आभास, तुम्हें जीवन भर उलझा के रखेगा, "पीहू ने सिर्फ तुमसे मोहब्बत की..." 
     अपने मित्र की मुक्ति के लिए, अपने मित्रता के धर्म के पालन के लिए यदि किसी गांधारी का श्राप भी धारण करना पड़ा तो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगा। मैं जा रहा हूँ, अब इस कुरुक्षेत्र को मेरी कोई जरूरत नहीं।
     एक बात और जान लो, प्रकृति अर्थात नियति जो मनुष्य की अनजानी भूलों पर भी उसे कठोर दंड देती है, तुम उसके भी दोषी पाए गए। वैसे भी कभी तुमने ही कहा था, "पीहू तुम अब मर के देख ही लो, इन नजरों में तुम्हारी ही तस्वीर होगी...", तो फिर भटकों वही तस्वीर लिए।
    इसलिए मैं अब किसी भी अपराधबोध से मुक्त हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया। मैने तो तुम्हारे सामने दोनों विकल्प रखें, अभी भी फैसला तुम्हे ही करना है। एक भ्रम में ही उलझे रहना चाहते हो, या उससे बाहर आना चाहते हो।
    बस कस्बे को पार कर एक दूसरे कस्बे के नजदीक पहुंची। चढ़ने वालों की संख्या बहुत अधिक थी। बस पूरी तरह से रुकती इससे पहले ही एक लड़की लगभग भागती हुई खिड़की के पास आई और मुझसे पूछा, "क्या आपके बगल वाली सीट खाली है ?"
   "जी हां ... खाली है ...", मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया। 
    तब उसने अपने हाथ में पकड़ा न्यूज पेपर मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा "प्लीज इसे उस सीट मे रख दीजिए और रिजर्व कर लीजिए मेरे लिए ..."
   जैसा उसने कहा मैंने किया। बस रुकते ही वह मेरे पास आई।
    "थैंक्स ...क्या मैं विंडो तरफ बैठ सकती हूँ, इफ यू डोंट माइंड ...?", उसने कुछ संकोच से पूछा। 
   "स्योर, आ जाइए ...", और हमने सीट एक्सचेंज कर ली। बस की लगभग सभी सीट भर चुकी थी। दो-तीन आदमी गैलरी में खड़े थे। जब बस चली थी तो मुश्किल से पंद्रह-बीस सवारियां थीं। मैंने उत्सुकता से पूछा, "बहुत लोग चढ़े यहां से, पूरी बस भर गई ?"
    "अधिकांशत: कॉलेज और स्कूल स्टूडेंट हैं, दो-तीन दिन की छुट्टियां थी न, और आज संडे था। कल से स्कूल-कॉलेज खुल जाएंगे। इसीलिए सब लोग जा रहे हैं... वैसे आप ?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
   "मैं अपने एक दोस्त से मिलने आया था... यहीं पीछे वाले कस्बे में...", मैने संक्षिप्त जवाब दिया।
   मेरी बात पूरी होती इससे पहले पीछे बैठे लड़की ने उसे पुकारा, "ये सुनो पीहू ! जब कहानी पूरी पढ़ लेना तो मुझे भी देना, मैं भी पढ़ूंगी ..."
   "हां... ठीक है, अभी तो पढ़नी शुरू की थी कि बस आ गई, रुक पढ़ कर दे रही हूँ...", उसने कुछ पीछे मुड़ते हुए कहा।
    इस नाम को सुनकर एक पल के लिए मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। तो क्या मेरे बगल में बैठी इस लड़की का नाम पीहू है ? अब मैने उसे ध्यान से देखा। लगभग अठारह बीस साल की उम्र, हल्की गोरी रंगत, आइस ब्लू कलर का सलवार सूट, उसी से मैच करता दुपट्टा, ओवल शेप चेहरा, काली आंखे, खुले हुए बाल जिसे बड़े सलीके से हेयर बैंड लगाकर पीछे बांधा गया था। कानों में ब्ल्यू कलर के छोटे-छोटे झुमके, गले में पतली सुनहरी चैन। वह कहानी पढ़ने में व्यस्त थी। अचानक ही उसकी निगाह मुझ पर गई। मुझे अपनी तरफ यूं ध्यान से देखते देख थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा, "क्या देख रहे हैं...?"
   उसकी आशा की विपरीत मैंने उससे खुद ही एक प्रश्न पूछ लिया, "आपका नाम पीहू है ...?"
   उसने आश्चर्य से पूछा, "जी हां ... लेकिन क्यों ? मेरा मतलब आप क्यों पूछ रहे हैं ?"
   "यहां मैं जिस दोस्त से मिलने आया था उसका भी नाम पीहू था..."
   "था...? मतलब .. क्या वो अब ...?", उसने बात अधूरी छोड़ दी। 
    "जी हां ! दो साल पहले उसकी डेथ .."
    "और आप उसकी डेथ के बाद उससे मिलने आए थे ..?", उसके चेहरे में आश्चर्य के भाव थे। 
    "जी ... मुझे उसकी डेथ के बारे में खबर नहीं थी। जब यहां पर आया तो उनके हस्बैंड से यह खबर मिली...", मेरे चेहरे में उदासी साफ झलक रही थी। 
  "ओह नो ! वेरी सॉरी !!! आप बुरा न माने तो एक बात पूछूं ...", उसने दु:ख जताते हुए मुझसे कहा। 
   "जी पूछिए..."
   "वह आपकी फ्रेंड थीं या गर्लफ्रेंड थीं...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा था।
     मैंने उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया बस सीट से अपना सर टिका लिया। मेरी आंखें खुद-ब- खुद बंद हो गई। एक चेहरा मेरी निगाहों में आकर ठहर गया। एक हंसता-मुस्कुराता चेहरा, मेरे साथ रोता हुआ, दुख में मुझे गले लगा के दिलासा देता हुआ चेहरा। न जाने कितनी यादें पल भर में मेरी नजरों के सामने से गुजरने लगी... । 
    बस आगे बढ़ती जा रही थी। छूटते जा रहे थे शरीर और उससे जुड़े मोह-माया के बंधन, जिसकी शुरुआत बहुत पहले उसी अटारी पर उससे अंतिम मुलाकात से हुई थी। 
     कभी मैंने पीहू से कहा था कि हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद अपनी जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते है। दुनिया क्या कहेगी, क्या सोचेगी, इसी में उलझे रह जाते हैं। हम कभी अपने बारे में नहीं सोचते हैं..."
   और फैसला लिया था, अच्छा इंसान होने की यदि यही परिभाषा है तो फिर इतना अच्छा इंसान नहीं बनाना है मुझे, जहां खुद अपनी आत्मा को कष्ट देकर दूसरों के लिए जिंदगी कुर्बान की जाती है, दुनियादारी के बारे में सोचा जाता है। ऐसे लोग, ऐसी दुनिया जो एक दिन खुद तुम्हें छोड़कर चली जएगी उसके लिए मैं पीहू को त्याग दूं। एक बार की गई गलती मैं दोबारा जीवन में नहीं दोहराना चाहता था और इसीलिए मैंने निर्णय लिया था कि मैं आज यहां से जाने के बाद जल्द ही लौट कर वापस आऊंगा। जब सत्य को कोई एतराज नहीं तो फिर मैं इतना क्यों सोच रहा हूँ ?  हमारे बीच पति-पत्नी या फिर प्रेमी-प्रेमिका के रिश्ते का होना ही तो जरूरी नहीं। हमारी रुचि, अभिरुचि, दृष्टिकोण, सोच, विचार सभी कुछ तो मैच करते हैं, तो क्या उसके पास रहने के लिए ये प्राप्त नहीं ? अब मुझे जिंदगी जीने के लिए सिर्फ उसका साथ चाहिए था। जहां हम दो रचयिता एक ही कलम से अपने एक स्वप्निल संसार की रचना करेंगे, बस बाबा को कोई एतराज न हो...
    यही सब सोचते हुए पीहू के कहने पर मैं बाबा से मिलने के लिए बैठक पहुंचा, तो उन्हें आंगन पार कर दरवाजे से बाहर निकलते हुए देखा। उनसे मिलने के लिए मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। घर के पास एक नीम का पेड़ था जिसमें बैठने के लिए उसके चारों तरफ मिट्टी का चौकोर चबूतरा बनाया गया था। बाबा उसी में बैठ गए और इशारे से मुझे भी बैठने के लिए कहा। उनके पैर छूने के बाद मैं भी कुछ डिस्टेंट से उनके पास बैठ गया। उनका पहला सवाल था, "जा रहे हो...?"
   "...", मैं खामोश रहा।
   "शराब कब से पी रहे हो ....?", उनके दूसरे सवाल ने मुझे थोड़ा-सा विचलित किया।
   "जी... यही कोई आठ-दस दिनों से..."
    "हु... बस आठ दस दिनों से !!.. चलो कोई बात नहीं ... छोड़ दो, यह बुरी आदत है...", बाबा ने मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा, "नियत की फैसले को स्वीकार करो और अब जाओ यहां से..."
    उफ़ ये नियति !! मुझे सहन न हुआ तो मैंने बाबा की विचारधारा का खंडन किया, "बाबा क्या सब कुछ नियति निर्धारित करती है ? कुछ हमारे कर्म भी जीवन की दिशा को निर्धारित करते होंगे न ? जो प्राप्त हो जाए उसे कर्मफल और जो न प्राप्त हो उसे नियति मानकर हम संतोष कर ले ? यदि विधि के विधान ही सब निर्धारित कर देते हैं तो फिर हमारे जीवन में कर्म का क्या महत्व ?"
    उत्तर में बाबा के होठों में हल्की सी मुस्कान आ गई, "अच्छा ! तो फिर यह बताओ ऐसा कौन सा कर्म शेष रह गया था जो तुम उसे प्राप्त न कर सके...? उसके साथ जीवन जी लेने की लालसा को पूर्ण न कर सके...? उसे पराया होते हुए सिर्फ देखते रह गए...? अपने प्रिय व्यक्ति को खोकर तुम शोक में ऐसे डूबे कि एकबार आत्महत्या तक करने की कोशिश कर चुके ? और अब अपने जीवन की इस कमी को तुम पीहू से भर लेना चाहते हो...?"
   बाबा की बात सुनकर मैं अवाक रह गया, "बाबा !!!... ये सब आपको कैसे मालूम ?"
    बाबा ने शांत मन से कहा, "यदि तुम सोचते हो कि यह सब मुझे पीहू ने बताया है तो गलत हो तुम। यह सब तुम्हारी हाथ की रेखाओं में लिखा है, तुम्हारे माथे में लिखा है, जिसे मैं पढ़ सकता हूँ। इसीलिए कहता हूँ कि पीहू के जीवन में तुम्हारा जो कार्य था वह तुम पूर्ण कर चुके। अब यहां रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं..."
    इस बार मैंने फिर विरोध किया लेकिन मेरे विरोध में याचना थी, "बाबा ! आपने मेरे बारे में जो बताया वो सब सच है। लेकिन यदि नियति का सहारा लेकर या मेरी एक कमी के कारण कि मैं शराब पीता हूँ, मुझे उसकी जिंदगी से दूर करना चाहते हैं... तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसी क्षण मैं शराब पीने की बात तो दूर उसे छूने की भावना तक का परित्याग कर सकता हूँ, लेकिन मुझे उसकी जिंदगी से दूर मत कीजिए..."
   "मैं जानता हूं कि तुम ऐसा कर सकते हो... लेकिन तुम्हे जाना होगा...", बाबा के चेहरे में एक अजीब सी कठोरता थी। उनकी यह कठोरता देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं रो पड़ा...
    "बाबा !! इतने कठोर न बनिए !! मेरे बारे में न सही लेकिन उसके बारे में तो सोचिए, मैं उसके जीवन में कोई देवता या मसीहा बन कर नहीं आया हूँ, एक सच्चा मित्र बनकर आया हूँ। उसे मेरी जरूरत है, मुझे उसकी जरूरत है, या यूं कह लीजिए हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। अच्छा ठीक है, मैं उसे किसी भी रिश्ते के लिए मजबूर नहीं करूंगा... प्लीज बाबा मान जाइए...?"
   मैं कुछ देर तक उनके जवाब की प्रतीक्षा करता रहा लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। मै उठा, बाबा के पैर छूते हुए कहा, "बाबा सॉरी, आपको समझे बिना अनजाने में आपसे बहस कर गया... आपके आदेश का पालन होगा। अब स्वयं की इच्छा से मैं यहां कभी दोबारा नहीं आऊंगा..."
   उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "नहीं, एक बार फिर तुम्हारी नियति तुम्हें लेकर यहां आएगी, लेकिन तब मैं नहीं रहूंगा। यह समझ लो यह तुमसे मेरी अंतिम मुलाकात है... इसलिए समझा रहा हूँ। अपनी हृदय से शोक की भावना का त्याग कर जीवन पथ पर आगे बढ़ जाओ..."
    "जी बाबा ...", मैंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और जाने के लिए पलटा। दो कदम चलने के बाद ही बाबा ने मुझे पुकारा, "सुनो !! पीहू अभी नादान है... उसे दुनियादारी कभी कोई ज्ञान नहीं है उसके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा, मैं समझ सकता हूँ... और वह निर्णय में ले चुका हूँ। तुम कोई आशा लेकर यहां से मत जाना..."
     भवनाओं के प्रबल वेग ने मेरे कदम ही नहीं रोक दिए बल्कि मैं वापस लौटकर बाबा के पास आया। उनके सामने घुटने के बल बैठ उनकी गोद में सर रख छोटे बच्चों की तरह रोते हुए बोला, "बाबा !! ... मुझे माफ कर दीजिए... मैं कोई सफाई नहीं दे रहा हूं... बल्कि ईश्वर को साक्षी मानकर आपसे एक बात कहता हूँ ... हां मानता हूँ कुछ पल के लिए मैं स्वार्थी हो गया था। आपने सच कहा, मैं अपने जीवन में प्यार की कमी को पीहू से भर लेना चाहता था। उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर उसके साथ जिंदगी जीना चाहता था। लेकिन बाबा इसके लिए क्या मैं सत्य का हृदय दु:खाता ? क्या आपके वचनों को झूठा होते हुए देखता ?  नहीं बाबा नहीं... आपने तो उसका कन्यादान किया है न। यह विचार आते ही मैंने अपनी इस लालसा का भी त्याग कर दिया। लेकिन सच कहता हूँ बाबा, आज उसे छोड़कर जाने का मन नहीं हो रहा है। पता नहीं क्यूं उससे दूर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ। बाबा क्यों लगता है कि जैसे मेरी सांसे रुक जाएंगी। मैं मर जाऊंगा। कभी किसी ने न चाहते हुए मेरा त्याग किया, और मुझे निर्मोही कहां। और वही त्याग आप मुझसे मांग रहे हैं ?  तो फिर बाबा किया, अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग किया लेकिन एक लालसा का त्याग करने के लिए न कहिए। मैं उसके पास रहना चाहता हूँ, किसी रिश्ते में न सही लेकिन एक मित्र के रिश्ते से रहने दीजिए...?"
    बाबा खामोश थे। कुछ देर बाद कुछ गुस्से से बोले, "तुम समझते क्यों नहीं हो, शायद तुम्हारे यहां पर रहने से सब कुछ बिखर जाए... किसी की जिंदगी तबाह हो जाए... लेकिन नहीं तुम्हे तो अपनी पड़ी है... कितने स्वार्थी इंसान हो तुम... मैंने कहा न, मैं उसका बाबा हूँ... उसके भले बुरे के लिए मैं सोच सकता हूँ... इस मामले में मुझे तुम्हारी कोई राय नहीं चाहिए..."
   मैंने उन्हें ध्यान से देखा उनका क्रोध उनकी लाचारी को दर्शा रहा था, "बाबा आप गुस्सा मत होइए... पीहू कहती है, मैं किसी की भी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोल सकता हूँ... तो फिर ठीक है बाबा... यही सही!! मै उसकी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोलूंगा... कह दूंगा कि प्यार जिंदगी में एक ही बार होता है... और वह मैं कर चुका..."
     कुछ देर जी भर रो लेने के बाद मैंने अपने आंसुओं को पोंछा, "लेकिन बाबा आपसे झूठ नहीं कहूंगा। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ... और जानते हैं बाबा, आपसे मिलने से पहले मन ही मन मैंने एक फैसला लिया था कि मैं वापस लौट कर जल्द ही आऊंगा। पीहू जिस रूप में मुझे अपने पास रखना चाहेगी, मैं उसके पास रहूंगा। बाबा ईश्वर साक्षी है, मैंने किसी लालच या सिर्फ अपने जीवन में किसी कमी को पूर्ण करने के लिए पीहू से प्रेम नहीं किया बल्कि उसकी शख्सियत ही ऐसी है कि धीरे-धीरे मुझे उससे प्यार हो गया..."
   बाबा ने दिलासा देते हुए मुझसे कहा, "नियति अर्थात प्रकृति तुमसे वही मांगती है जो तुम उसे दे सकते हो। तुम्हारे अंदर त्याग करने की अद्भुत क्षमता है,  इसलिए हर बार आवश्यकता पड़ने पर तुमसे वही मांगती है। पीहू का अस्तित्व तुम्हारे लिए नहीं है... यह तुम अच्छी तरह से जान लो... मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिष-शास्त्री नहीं हूँ। लेकिन जहां तक मुझे ज्ञान है उसी के आधार पर कह रहा हूँ कि यहां पर रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं है। पीहू तुम्हारी नहीं, सत्य की है। अब जाओ..."
     "जी बाबा आप जो चाहते है वही होगा ... लेकिन सच मानिए बाबा ! मेरा उसके प्रति प्रेम किसी भी भौतिक चाहत से परे था, अब भी है, और सदैव रहेगा। यदि मेरे जीवन में इसी तरह का प्रेम मेरी नियति है, तो मैं उसे अब हृदय से स्वीकार करता हूँ... किन्हीं भी लम्हों में आप अपने आप को मेरा दोषी मत मानिएगा। बाबा ! कभी-कभी मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता हूँ, जाने से पहले अपनी ही लिखी एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ...?"
   बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, "हां क्यों नहीं, पीहू ने बताया था कि तुम कहानियां लिखते हो, साहित्य में रुचि है तुम्हारी... सुनाओ मैं सुनूंगा..."
   मैंने उनकी गोद में उसी तरह अपना सर रखे हुए कहना शुरू किया,
   किसी वन में एक महात्मा जी कुटी बना के रहते थे। एक दिन उन्होंने ध्यान दिया कि एक बुलबुल प्रत्येक सुबह और शाम उनकी कुटी में आकर गीत गाता है। धीरे-धीरे महात्मा को उस पंक्षी से लगाव हो गया। वैसे दिनभर वह जंगल में खुले आसमान में घूमता लेकिन शाम को महात्मा के पास उनकी कुटी में बने अपने घोंसले में लौट आता। वह उन्हें रोज गीत सुनाता और महात्मा जी खाने-पीने के लिए कुछ दाने डाल देते। एक दिन उस राज्य का राजा महात्मा जी के पास भूले भटके पहुंचा। शाम का वक्त था। उसने भी बुलबुल का गीत सुना। उसे बुलबुल का गीत और उसकी सुंदरता पसंद आई। उसने महात्मा जी से उस पक्षी को मांग लिया।
   महात्मा जी को भी अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका था। उन्हें भी उस मासूम पक्षी की चिंता थी। अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उसे राजा को भेट कर दिया। 
    राजा ने उसके लिए एक खूबसूरत सोने का पिंजड़ा बनवाया और खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने दिए। उसके पिंजरे को अपने विशेष शयन कक्ष की खिड़की के पास टंगवा दिया। बुलबुल खुश था। सुंदर राजमहल, रहने के लिए सोने का पिंजरा, खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने। वह राजा को रोज सुबह-शाम गीत सुनाता। दिन भर राजा राजकाज के काम में व्यस्त रहता और बुलबुल अकेला उसी खिड़की से बाहर खुले आसमान को देखता बैठा रहता। जब शाम को राजा अपने शयन कक्ष में पहुंचता तो बुलबुल उनसे बहुत सारी बातें करता। राजा भी दिन भर की हुई घटनाओं के बारे में उसे बताता। धीरे-धीरे राजा को बुलबुल से अतिशय लगाव हो गया। बुलबुल की मीठी-मीठी बातें उसका गीत राजा की जरूरत बन गया।
      एक दिन भूले भटके एक दूसरा बुलबुल उसी खिड़की पर आकर बैठा। उसे देखकर पिंजरे में कैद बुलबुल को अपने दिन याद आए। खिड़की पर बैठे बुलबुल ने उसे बाहर की दुनिया की बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बताई।  फिर दोनों ने एक साथ गीत गाया। राजा के आने पर वह बुलबुल खुले आसमान में वापस उड़ गया। दूसरे दिन वह फिर आया। फिर उसने बाहर की दुनिया की नई-नई बातें उसे बताई। दोनों ने एक साथ गीत गया। यही क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा। पिंजरे में कैद बुलबुल खुश रहने लगा। अब वह दुगने भाव से राजा को भी गीत सुनाता। उसे हर शाम अपने साथी बुलबुल का इंतजार रहता। 
     इंतजार के पल उससे काटे न कटते। तब उसे  धीरे-धीरे अपनी जिंदगी नीरस लगने लगी। उसे महसूस हुआ पिंजरा चाहे सोने का हो या फिर लोहे का, पिंजरा ही होता है। वह भी उस बुलबुल के साथ अपनी पूरी आजादी से खुले आसमान में उड़ना चाहता था। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर गीत गाना चाहता था। खुली हवा में सांस लेना चाहता था। बारिश में भीगना चाहता था। लेकिन वह चाह कर भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता था।
    एक दिन उसने अपने हृदय की बात राजा को बताई। उसने कहा कि वह भी अपने साथी बुलबुल के साथ खुले आसमान में उड़ना चाहता है। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर उसके साथ गीत गाना चहता है, बारिश में भींगना चाहता है और अपनी मेहनत से किसी पेड़ की डाली में अपना एक घोंसला बनाना चाहता है। 
    राजा ने उसके सामने कुछ नहीं कहा, लेकिन वह समझ गया कि यदि दूसरा बुलबुल यहां आता रहा तो...? राजा डर गया। उसे बुलबुल से बहुत प्यार था। यदि उसका प्यारा बुलबुल यहां से चला गया तो वह दिन भर की बातें किससे करेगा ? अपना दुख-दर्द किससे कहेगा ? सुंदर-सुंदर गीत गाकर उसका दिल फिर कौन बहलायेगा ? प्यारे बुलबुल के बिना क्या उसका जीवन स्वयं नीरस न हो जाएगा ? राजा स्वयं चिंताग्रस्त हो गया। लेकिन उसने अपनी चिंता बुलबुल से जाहिर नहीं की।
    और एकदिन वही महात्मा जी राजा से मिलने राज-दरबार में आए। राजा ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और अपने राजमहल में विशेष अतिथि के रूप में एक दिन के लिए ठहर जाने का निवेदन किया। महात्मा ने सोचा कि चलो इसी बहाने वह अपने प्यारे बुलबुल से भी मिल लेंगे। राजा ने महात्मा को राजमहल के उसी विशेष शयनकक्ष में ठहराया जहां वह अपने प्यारे बुलबुल के साथ रहता था। बुलबुल ने उनसे ढेर सारी बातें की, उन्हें भी बहुत अच्छे-अच्छे गीत सुनाए।
      जब शाम हुई तो उसका साथी बलबुल मिलने आया। उसकी मुलाकात महात्मा जी से भी हुईं। उसने आदर-पूर्वक महात्मा जी को प्रणाम किया। फिर रोज की तरह ही दोनों ने एकदूसरे से गुजरे हुए दिन के बारे में ढेर सारी बातें की। दोनों ने एक साथ गीत गया। इस बीच दोनों ही एक दूसरे में इतना खो गए कि उन्हें महात्मा जी और राजा की उपस्थिति का भी ज्ञान न रहा। महात्मा जी की पारखी नजरों से यह बात छुपी न रह सकी। वे बहुत चिंतित हो गए। उन्हें अपने बुलबुल के भविष्य को लेकर फिर चिंता हुई। इतना अच्छा राजमहल, इतनी अच्छी सुख सुविधा, इतनी अच्छी सुरक्षा उसे और कहां मिलेगी। उन्होंने जाते समय अपने बुलबुल से कहा कि जब उसका साथी बुलबुल उससे कल मिलने आए तो उसे उनके पास भेज दे, वो भी उससे मिलना चाहते हैं, उसका गीत फिर से सुनना चाहते हैं ।
     फिर पता नहीं बाबा क्या हुआ मैं नहीं जनता। यह भी नहीं जानता कि महात्मा जी ने उस बुलबुल से क्या कहा होगा। कुछ कहा होगा या कुछ मांगा होगा ? हां सच में बाबा, मैं बिल्कुल नहीं जनता। लेकिन हुआ ये कि फिर वह बुलबुल दोबारा अपने साथी बुलबुल से मिलने नहीं आया !! सोने के पिंजरे में कैद बुलबुल राजमहल में उसका रोज शाम को इंतजार करता रहा... रोता रहा, उसकी याद में तड़पता रहा। धीरे-धीरे जीवन जीने के प्रति उसकी लालसा खत्म होने लगी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। अब वह राजा से भी कम ही बात करता। उसने गीत सुनाना भी बंद कर दिया। अब वह अक्सर बीमार रहने लगा। राजा ने बहुत कोशिश की लेकिन कोई दवाई कोई हमदर्दी काम न आई। राजा को उसके गीत से प्रेम था, और जब बुलबुल ने गाना ही छोड़ दिया तो धीरे-धीरे राजा भी उसके प्रति उदासीन होता चला गया।  
    और जानते है बाबा फिर क्या हुआ ?  एक रात जोर से बदल गरजे, तेज हवाएं चली, पूरी रात जमकर बरसात हुई, आसमान जी भर के रोया। आंधी से राजमहल के सभी चिराग बुझ गए। घुप अंधेरा जैसे मृत्यु के देवता ने पूरे राजमहल को घेर लिया हो। स्वयं राजा को रात भर नींद न आई। लाखों बेचैनियां लिए वह भी टहलता रहा। 
    दूसरे दिन एक नई सुबह हई। बारिश बंद हुई। आसमान बिल्कुल साफ और स्वच्छ हो गया । सूरज की सुनहरी किरणों से सोने का पिंजड़ा जगमगा उठा। राजा ने पिंजरे के पास जा कर देखा, उसका प्यार बुलबुल सोने के पिंजड़े से आजाद हो चुका था।
     मैंने बाबा के चेहरे की तरफ देखा। ढलते हुए सूरज की लालिमा से उनका चेहरा चमक रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि बाबा का गुस्सा था या मेरे प्रति करुणा। मैंने उनसे अंतिम बार पूछा "तो बाबा मैं जाऊं...?"
    उन्होंने स्थिर किंतु शांत आवाज में कहा, "हां... जो तुम्हारी यही नियति है..."
    मैंने भी उतनी ही शांत और स्थिर आवाज मे कहा, "तो बाबा सही साबित हुआ न.... झूठे  मक्कार फरेबी लोगों की ये दुनिया... सूर्य ग्रहण नक्षत्र उपग्रहों की ये दुनिया..."
   मैं उठा, बाबा की तरफ देखा उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे। बड़ी हिम्मत करके मैंने उनके आंसू पोछे, "नहीं बाबा रोते नहीं... यह तो महज़ एक कहानी है... सच थोड़े न है... वैसे भी कुछ तो मेरे लिए छोड़ दीजिए... अब चलता हूँ.... इजाजत दीजिए..."
    और फिर बाबा को पुनः प्रणाम कर, उन्हें उसी तरह बैठा छोड़ मैं वापस चल पड़ा था। 
    जब मैंने आंखें खोली तो मेरी आंखों के कोर भीगे हुए थे। विंडो सीट पर बैठी उस लड़की की नजरे मुझ पर टिकी हुई थीं। मैने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, "सॉरी..."
    वह मुझे गौर से देखती रही फिर उसने अपनी रुमाल मेरी तरफ बढ़ाई। मैंने हाथ के इशारे से मना करते हुए कहा,, "नो थैंक्स, इट्स ओके..."
   उस लड़की ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, "नो... इट्स नॉट ओके..."
   उसके द्वारा कहे गए इन शब्दों से मुझे तेज झटका लगा। मैं उसकी तरफ देखता रह गया और फिर जब कुछ न सूझा तो कांपते हाथों से उसकी रुमाल थाम ली। अपने आंसू पूछते हुए और बात बदलते हुए पूछा, "आप पढ़ती हैं... ?"
    "जी ... बीएससी सेकंड ईयर..."
     मैंने पेपर की तरफ इशारा करते हुए उससे फिर पूछा, "साइंस की स्टूडेंट हैं... और कहानी पढ़ती हैं..."
    "हां मुझे पसंद है... और जरूरी नहीं की साइंस का स्टूडेंट कहानियां न पढ़े...", फिर उसने पेपर को पीछे अपनी सहेली की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो तुम पढ़ लो, मै बाद में पढ़ लूंगी..."
    बस चलती, अपने कुछ स्टॉप पर रूकती और फिर आगे बढ़ जाती। ठीक उसी तरह हमारी बातें होती। कुछ पल के लिए ठहरती फिर शुरू हो जाती। बातों के इस सिलसिले में मैंने उससे पूछा, "अपने नाम का अर्थ आपको मालूम है...?"
   "नहीं ... आपको तो मालूम ही होगा ? तो बता दीजिए ?", उसने उत्सुकता से पूछा।
   "पपिहा पक्षी को जानती हैं...?", मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा। 
   "यूं मीन... हॉक कुक्कू... हां याद आया !! ... वह पीहू ... पीहू बोलता है ... है न ? तो इसका मतलब क्या ? यह तो उसकी बोली है..."
   "हां आप सच कहती हैं। लेकिन इसे और डीप सेंस में सोचिए। वह पक्षी केवल बरसात का पानी पीता है... कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि वह केवल स्वाति नक्षत्र का पानी पीता है। वह पीहू ... पीहू बोलकर उस नक्षत्र को पुकारता है। यह उसकी एक करुण पुकार है, जो प्रकृति से अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र के लिए होती है।
     इसलिए इस पक्षी को चातक अर्थात जैकोबिन कुक्कू भी कहते हैं। तो मेरे कहने का अर्थ यह है कि आपका नाम एक प्यासे पक्षी की करुण पुकार है, जो अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र को पुकारता है। पीहू ... पीहू ... पीहू ... का अर्थ यह हुआ, प्यासा हूँ... प्यासा हूँ... प्यासा हूँ... संपोज यू लव समवन एंड ही इज आउट आफ योर साइट एंड वाइल सर्चिंग फॉर हिम देन यू से, चातक-सी अंखियों में प्यास लिए, स्वाति नक्षत्र को खोजा करती हूँ..."
   "वाह वंडरफुल !! ... आपने तो इस नाम पर फुल पीएचडी कर रखी है... शी वास वेरी लकी !!! ... आपको तो राइटर होना चाहिए, वैसे क्या करते हैं आप...?", उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 
    "प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पड़ता हूँ..."
    बातों का सिलसिला चलता रहा। कभी वह मेरे बारे में कुछ पूछ लेती तो कभी मैं उसके बारे में कुछ पूछ लेता। सफर कटता जा रहा था। कुछ देर बाद ही मंजिल आ गई। बस रुकती उससे पहले पीछे बैठी लड़की ने उसे पेपर वापस करते हुए कहा, "पीहू !! कहानी पढ़ना, बहुत अच्छी है..."
    मैं बस से नीचे आया। टेंपो की भीड़ उतरती सवारियों को घेर कर खड़ी हो गई। आपस में होड़ लगी थी। मैंने एक टेंपो में अपना बैग रखा और उससे पूछा, "गवर्नमेंट रेस्ट हाउस की गली तक चलना है, चलोगे...?"
    "जी... बैठिए दो-तीन सवारी और मिल जाए फिर चलता हूं..."
   वह लड़की मुझसे चंद कदम दूर खड़ी थी। एक दूसरे से नजर मिलते ही वह थोड़ा सा मुस्कुराते हुए मेरे पास आई। वह कुछ पूछती इससे पहले मैंने पूछा, "मैं रेस्ट हाउस तरफ जा रहा हूँ, क्या आपको भी चलना है...?"
   "नहीं मेरे पापा मुझे लेने के लिए आ रहें होंगे। मैं न मिली तो परेशान होंगे। मैं तो आपसे एक बात पूछने के लिए आई थी। मेरा नाम तो जान लिया और अपना नाम बताया ही नहीं...?"
   उसके एक कंधे पर बैग लटका हुआ था और दूसरे हाथ में वह न्यूज़ पेपर था। मैंने मुस्कुराते हुए उसके हाथ से न्यूजपेपर ले लिया। उस पेज को खोला जिस पर कहानी छपी थी। कहानी के टाइटल के नीचे लिखे नाम पर अपनी उंगली रखते हुए उसे दिखा दिया।
     वह आश्चर्यचकित मुझे देखते हुए बोली, "ओह ! तो आप सचमुच राइटर है... तब तो आपका ऑटोग्राफ लेना चाहिए..."
    "नहीं... बिल्कुल नहीं। अभी इतना बड़ा राइटर नहीं बना हूँ... लेकिन जरा रुकिएगा, मुझे आपसे एक फेवर चाहिए..."। 
     मैने टेंपो में रखे बैग से अपनी डायरी निकाली, उसके कुछ पन्ने फाड़ उसे देते हुए बोला, "ये आपके लिए..."
   उसने पहले पेज के टॉप में लिखे हुए टाइटल को पढ़ते हुए पूछा, "सोने का पिंजड़ा... ये क्या है... कोई कहानी है क्या...?"
  मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "हां... अब ये कहानी आपकी है... इसी पेपर में पब्लिशिंग के लिए एक पता लिखा है, नए राइटर के लिए एक कंपटीशन भी है जिसमें सेलेक्ट होने वाली कहानियों को पब्लिश किया जाएगा। इसे ए - 4 साइज के पेपर में अपनी हैंडराइटिंग में लिखकर अंत में अपना पूरा नाम, पता के साथ अपने हस्ताक्षर कर दीजिएगा। फिर एक लिफाफे में अच्छे से फोल्ड करके अखबार में लिखे पते पर पोस्ट कर दीजिएगा...
    वह बच्चों की तरह खुश होते हुए बोली, "अच्छा ! मेरे नाम से छपेगी...?"
   मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "ऑफकोर्स और कुछ दिनों बाद आपको प्राइज या फिर न्यूमेरशन का चेक भी आ जाएगा... इसलिए यदि बैंक में अकाउंट न खुला हो तो खुलवा लीजिएगा..."
    "पैसों का मैं करूंगी क्या... आप अपना पता दे दीजिए मैं आपको भेज दूंगी...", उसने शालीनता से कहा।
   "मेरी तरफ से गिफ्ट समझिएगा, और मिले पैसों से अपने लिए अपनी पसंद की बुक खरीदिएगा...", फिर मैंने कुछ संजीदगी से कहा, "संकोच मत कीजिए, रख लीजिए, इस कहानी को आपके नाम का इंतजार था। इंकार मत कीजिए..."
   उसने मुझे गहरी दृष्टि से देखते हुए कहा, "मैं समझ गई... इसीलिए आपने फेवर शब्द का यूज़ किया था..."
   मैंने भी उसे ध्यान से देखा। उसकी आंखें गहरी बदामी रंग की नहीं हैं, चेहरे का रंग बहुत गोरा नहीं है, हंसते समय गालों में डिंपल नहीं पड़ते हैं, उसके बाल भी स्विडिश स्टाइलिश डार्क गोल्डन और कर्ली नहीं हैं, इन सबके बावजूद उसके पास एक चीज है, उसका नाम "पीहू..."।
    तभी टेंपो वाले ने कहा, "भैया जी बैठिए... चलते हैं..."
    मैंने उसकी तरफ एक बार फिर देखा। मेरे लबों में फीकी-सी मुस्कान आ गई और आंखों कुछ भर आईं। पीहू ने पहली बार बिछड़ते समय सच कहा था,  "मै तुम्हे जिंदगी के हर उस मोड़ पर मिलूंगी जब तुम उदास होगे, अपने आप को अकेला महसूस करोगे... अपने एक नए रूप में... एक नए अंदाज में..."
   अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए मैने कहा ... "पीहू !! इसे भेजना, ये जरूर पब्लिश होगी। अपना ख्याल रखना... अच्छे से पढ़ना... अब मैं चलता हूँ..."
    अपने आंसुओं को धीरे से पोंछते हुए मैं टेंपो में चुपचाप बैठ गया। टेंपो वाले ने गेयर डाला और वह एक झटके से पीछे छूट गई। मैंने मुड़कर देखा और मुस्कुराते हुए अपना हाथ हिला दिया। प्रतिउत्तर में उसने भी मुस्कुरा कर मेरी तरफ अपना दाहिना हाथ हिलाया, "बाय..."
( कहानी "अजनबी " से)
✍️ (शैलेन्द्र एस.)

जो लोग मुझे जानते हैं, तो वो जानते हैं।
जैसा मैं दिखाता हूँ, वह हूँ नहीं,
और जो मैं हूँ, लोग उसे देखना नहीं चाहते।

भटकती रह गई एक रात मेरी,
तुम्हारे बाजुओं में सो न पाई।
बहुत कुछ होता है दुनिया में लेकिन,
यही एक चीज़ थी जो हो न पाई।
तसल्ली अपनी अपने पास रखो, 
मुझे दर्द की ये रातें हैं प्यारी।
ये मेरा इश्क है, मेरा ही रहेगा,
मुझको जरूरत ही नहीं है तुम्हारी।
(मनोज मुंतशिर)

जिंदगी भर की कमाई है ये ज़िद,
सबा को प्यार करने के लिए,
मुझे सबा की भी जरूरत नहीं।

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