अजनबी 3

यादें ! यादें !! सुखद यादों के साथ रुला देने वाली न जाने कितनी यादें बसी है इस दिल में।
  "ये ! सो गए क्या...?", किसी ने मेरा कंधा हिलाते हुए पुकारा और इस पुकार के साथ ही टूट गया यादों का विहंगम स्वप्निल संसार।
      "ऊं....", मैंने अपनी आंखें खोली, " कौन ...?"
    "मै सत्य, ... सो गए क्या ?",
    मैंने पूरी तरह से अपनी आंखें खोली, देखा सामने सत्य और मंगल खड़े हैं।
     "नहीं यार ... दो-तीन दिनों से जाग रहा हूँ न, सोने को अच्छे से मिला नहीं तो तुम्हारा इंतजार करते-करते नींद आ गई..." 
     खान पीना बना, सभी ने खाया। माहौल कोई पार्टी का था नहीं। सत्य ने अपने साथ चलने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया, "मैं यही ठीक हूं, मंगल के पास। सुबह चलेंगे अभी तुम जाओ और आराम करो..."
    सत्य के जाने के बाद मंगल ने मड़ैया के सामने ही
 मेरी खाट बिछाई। बिस्तर लगाया और खुद मेरी चारपाई के पास पत्थर में बैठ गया। गुजरी हुई रात की हर एक तस्वीर यादें बनकर मेरे साथ थी। सुखद यादें आज मुझे रुला रहीं थीं। 
   "यह सब क्या हो गया मंगल, कभी सोचा न था... रातें वही है, हवाएं वही हैं, मौसम वही है, यह बगिया वही है... हम वही हैं, सब कुछ उसी तरह हैं... लेकिन एक सितारा जो कभी हमारे साथ हुआ करता था... आज आसमान पर जा बैठा..."
   "सब किस्मत की बात है सर जी !! कौन जानता था कि इतनी कम उम्र में... भगवान जी उन्हें हमसे छीन लेंगे...", मंगल के स्वर में उदासी थी और उदासी की वह चमक धीरे-धीरे उसकी आंखों में भी दिखने लगी थी।
   "कुछ तो बताओ मंगल क्या गुजरी उसके साथ...", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा था। 
   "कुछ नहीं सर जी, आपके जाने के बाद पहले दो-तीन दिन तो बिल्कुल खामोश रहीं। भइया जी दिन को अपनी नौकरी चाकरी में व्यस्त रहते और वो बाबा की सेवा करतीं। शाम को अक्सर इसी बगिया में आ जाया करती थीं। कमली के साथ बोलती-बताती... अक्सर उसी आम के पेड़ के नीचे बैठती और अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिखा करती थीं। एक बार भैया जी के साथ नदी के तीर की बस्ती में मेला देखने गई और बस वहीं से एक अजीब सा पागलपन छा गया..."
   मैंने आश्चर्य से पूछा था, "पागलपन !!! कैसा पगलपन ?"
    "बस्ती के बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने का पागलपन ... उनका जीवन स्तर सुधारने का पागलपन... और इस पागलपन में मुझे भी घसीट लिया। भैया जी से कहकर मेरे लिए बाइक खरीदवाई... लगातार एक महीना तक मेरे साथ बस्ती के घर-घर जाकर सभी आवश्यक जानकारी इकट्ठा करती रही। 
      सभी को एकजुट किया। और अब क्या बताए सर जी... दो महीने के अंदर ही सभी के बीच इस तरह से घुल मिल गई कि उनकी बात को फिर कोई नहीं टालता था। एक-एक बच्चे को स्कूल ले जाकर नाम लिखवाया। जो बड़े बच्चे थे उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करती। अटारी के नीचे वाला जो हाल है न, वहां पुरी की पूरी क्लास लगा करती थी। शाम को बहुत सारे बच्चे आते थे। वह भी पढ़ातीं और स्कूल में ग्यारहवीं और बारहवीं के कुछ बड़े और होशियार बच्चे भी छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए आने लगे थे।
   कुल मिलाकर क्रांति ला दी थी। छोटे बड़े सरकारी दफ्तरों में अच्छी खासी जान पहचान हो गई थी। बस्ती के लिए बहुत सारी सरकारी योजनाएं उन्होंने लागू करवाई... विधायक तक उनकी सीधी पहुंच थी... कुछ लोग कहते कि आगे चलकर नेताजी बनने की जुगाड़ में हैं... लेकिन मैं जानता हूँ सर जी उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। इधर-उधर भटकने वाले आदिदिवासियों को एक जगह स्थाई रूप से रहने के महत्व को समझाया। खेती के महत्व को बताया, बच्चों की शिक्षा के अर्थ समझाएं... फुल की फुल इंदिरा गांधी बन गई थी..."
    जब कोई अपना अच्छा काम करता है तो उसका वर्णन करते समय हमारी आंखों में जो चमक होनी चाहिए वही चमक मैंने मंगल की आंखों में देखी।
    "इंदिरा गांधी नहीं मंगल... मदर टरेसा बोलो..."
    "यह कौन है सर जी ? कभी नाम नहीं सुना..."
    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "कैसे सुनोगे मंगल !! इस देश में फिल्मी हीरो-हीरोइन और नेताओं के नाम ही तो चलते हैं... वैसे तुम्हें जानकारी के लिए बता दूं कि जो काम तुम्हारी पीहू बिटिया कर रही थी कभी इस तरह का काम उन्होंने भी किया था... जब मैं यहां पहली बार आया था न तो उसके दो-तीन महीने पहले ही उनकी डेथ हुई थी... लेकिन एक बात बताओ मगल अचानक पीहू में इतना बदलाव  कैसे ...?"
    "बताया न सर जी, जब मेला गई तो देखा होगा उनकी गरीबी। उनकी स्थिति को समझा होगा। वहीं से उनका मन परिवर्तित हुआ कि उनके लिए कुछ करना चाहिए। पढ़े-लिखी तो थी हीं। अरे सर जी अच्छे-अच्छे विधायक, मिनिस्टर उनसे अंग्रेजी में बात करने में संकोच करने लगे थे... एक बार एक मिनिस्टर जी चुनाव प्रचार करने आए थे, तो सोचा होगा कि गांव की होगी कोई देहाती लड़की, भला अंग्रेजी क्या जानेगी... तो बस झड़ने लगे अंग्रेजी में... पहले तो बिटिया चुपचाप सुनती रही लेकिन जब वह शुरू हुई तो उनको रास्ता नहीं मिल रहा था भागने का... "
    उसकी बात सुनकर मुझे हंसी आई और मुझे अपनी पहले दिन की मुलाकात के लम्हे भी याद आए। 
    मंगल मेरे साथ हंसते हुए आगे कह रहा था, "अरे सर जी... मुझे भी पहले कहां मालूम था उनके बारे में ज्यादा कुछ... ढाई साल तक उनके साथ काम किया तो समझ में आया। उन्हें बहुत ज्ञान था सर जी, हर सब्जेक्ट में !!! ... जब अंग्रेजी बोलती तो पूरी अंग्रेजों की तरह और संस्कृत के श्लोक जब पढ़ती तो लगता साक्षात सरस्वती देवी बोल रही हैं... और बताऊं सर जी उनको और भी भाषाएं आती थी... एक बार हम लोग जिले के शिक्षा विभाग के ऑफिस गए। वहां उनकी मुलाकात एक अधिकारी से हुई जो बंबई के थे, तो उनके साथ बिल्कुल मराठी में बात की... ये देख कर मैं दंग रह गया था। ... सर जी भैया जी बहुत लकी थे कि उन्हें पीहू बिटिया ने पसंद किया था... कभी-कभी यह सोचकर दुख लगता है... जब पीहू बिटिया उनके साथ थी तो उनके पास नई-नई नौकरी के कारण साथ बिताने के लिए ज्यादा समय नहीं हुआ करता था... और आज समय है तो पीहू बिटिया उनके साथ नहीं है, बस उनकी यादों में इधर-उधर भटकते रहते हैं। एक दिन कह रहे थे कि जो काम पीहू ने शुरू किया है उसे आगे ले जाना चाहते हैं..."
    मैंने गहरी सांस लेते हुए मंगल से कहा, "हां मंगल तुमने ठीक कहा, सहजता से प्राप्त कोई वस्तु या व्यक्ति की कीमत हमे उस वक्त समझ में नहीं आती है, और एक दिन जब वह हमारी जिंदगी से चला जाता है तो फिर उसी के लिए रोते हैं, तड़पते हैं, भटकते हैं... उसकी यादों को दिल में सजोए अपनी तकिया भिगोते हैं... मन ही मन उसके लिए न जाने कितने खत लिखते हैं..."
   "सर जी आपने पीनी कम कर दी है क्या ?... नहीं मैं तो ऐसे ही पूछ रहा हूँ, पहले होता तो आपने अभी तक फरमाइश कर दी होती..."
   मंगल की बात सुनकर मैं उसके दिल का हाल जान सकता था। मैंने उसकी तरफ देख कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "तुम बना लो ... "
    "और आपके लिए ...?"
    "रहने दो... मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है... देखो तुम बुरा मत मनना। सच में मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है, तुम अपने लिए आराम से बना लो... "
   मंगल ने वही किया फिर सिगरेट का पैकेट मेरी तरफ बढ़ते हुए बोला, "इसे तो ले लेंगे न ? "
   एक सिगरेट जलते हुए फिर मैने उससे कहा, "और कुछ हो तो बताओ..."
   मंगल फिर अपनी अतीत में लौटते हुए बताने लगा, "बस्ती को स्वर्ग बना दिया सर जी। हर घर के सामने फल फूल के पेड़ लगवाए। लोगों को जीने का तरीका बताया। नए बच्चों को शिक्षा, सफाई, स्वास्थ्य और बड़े बुढो को खेती के महत्व को समझाया। जीवन स्तर में काफी सुधार ला दिया... कभी मेरे साथ चलिएगा वहां। आपको बहुत अच्छा लगेगा। एकदम टूरिस्ट प्लेस बन गया है... 
     मंगल और भी बहुत सी बातें मुझे बता रहा था। और मैं उसकी बातों को सुनते हुए यह भी पूछना चाहता था की कहो मंगल कभी उसने मुझे भी याद किया। लेकिन मैं पूछ नहीं पा रहा था।
   मेरे यहां से जाने के तीन वर्षों तक पीहू ने नि:संदेह बहुत अच्छे काम किए और मुझे उसके द्वारा किए गए हर एक काम पसंद आए। उन पर मैं गर्व कर सकता हूँ। लेकिन इन तीन वर्षों के उसके जीवनकाल में मेरा क्या स्थान था, था भी कि नहीं था, यह जानने के लिए मैं बहुत ही उत्सुक हो रहा था। 
    उस दिन मुझे एक बात पता चली कि इंसान किस हद तक स्वार्थी हो सकता है। किसी ने किसी के लिए क्या किया इससे अधिक महत्वपूर्ण यह जानने में होता है कि उसके जीवन में आपका क्या महत्व था। आपको उसने कितनी शिद्दत से याद किया। उसने आपके लिए आंसू बहाए या नहीं। यदि मंगल अभी कह दे कि पीहू मुझे याद करके तड़पी थी, मेरे लिए रोई थी तो इस वक्त मेरी भी आंखों में आंसू होंगे। लेकिन वे आंसू दुःख के नहीं खुशी के होंगे। वाह री दुनिया ! हम किसी के गम में अपनी खुशी की तलाश कैसे और क्यूं कर लेते हैं... ?
     सप्तरंगी इंद्रधनुष में रोशनी के अलग-अलग रंग होते हैं, लेकिन अंधेरे का एक ही रंग होता है, काला। यदि इस रंग को अलग-अलग किया जाय तो भुखमरी, गरीबी, अराजकता, हत्या, बलात्कार, धोखा, कपट जैसे न जाने कितने रंग उभर कर सामने आएंगे। 
      पीहू ने अपने जीवन के इंद्रधनुषी रंगों को समेट लिया और जो रंग उभर कर सामने आया वह था श्वेत और उज्जवल रोशनी, जो इस काले रंग के अंधकार से लड़ सकती थी। जिसके सामने आसमान में सफर तय करते हुए इस मिलियन्स वाट के बल्ब की रोशनी भी फीकी पड़ जाए। मैंने मंगल से पूछा, "जरा अपने मून क्लॉक को देखकर बताओ तो... टाइम कितना हुआ होगा...?"
     "11 बज रहे होंगे, वैसे मेरी एक बात समझ में नहीं आई सर जी ? उन्होंने अपने पत्र में अपना अंतिम संस्कार नदी तीर की बस्ती के पास ही करने के लिए क्या सोच कर लिखा रहा होगा ?", मंगल ने मेरी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए पूछा था।
    उसके प्रश्न को सुनकर मैं भी एक पल के लिए चौंक गया, "हां मंगल, मुझे कमली ने बताया है... लेकिन क्यों... नहीं सोच पा रहा हूं..."
    मंगल बता रहा था, "कुछ दिनों बाद बस्ती वालों ने उनकी स्मृति में एक बड़ा सा चबूतरा बनवा दिया और आसपास बहुत सारे पेड़ लगा दिए। इसी ग्यारह तारीख को दो वर्ष पूरे हो जाएंगे। अब तो पेड़ भी कुछ बड़े-बड़े हो गए हैं..."
   "मंगल तुमसे एक बात पूछूं...? कमली ने मुझे बताया कि भैया जी जब यहां से गए थे तो पीहू से किसी बात को लेकर उसका झगड़ा हुआ था, कुछ कहा सुनी हुई थी ? तुम तो पास ही थे न ? क्या तुम्हें मालूम है कौन सी बात थी... तुम्हें कुछ मालूम है ?"
    "नहीं सर जी ज्यादा तो मुझे भी कुछ मालूम नहीं है। मैं जब भूसा निकालने के लिए कोठरी में गया था तो उड़ती हुई एक बात मुझे सुनाई दी थी। शायद शादी विवाह को लेकर कोई बात चल रही थी दोनों में। भैया जी बोले की जब शादी करना हो तो मंगल से खबर भिजवा देना मैं आ जाऊंगा... लेकिन पीहू बिटिया ने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। मुझे उनकी यह बात याद रही। जब मैं शहर उन्हें बुलाने के लिए गया तो पता चला कि वह मुंबई में है। इस समय फैक्ट्री ने उन्हें कुछ महीनों के लिए ट्रेनिंग में भेजा है... घर से ही ऑफिस का फोन नंबर मिला। मेरी उनसे बात हुई और मैंने फिर सारी बातें बताई। हाथ जोड़े कि भैया जी नाराज होकर गए हैं, लौट आइए। फिर दो दिन तक मैं उन्हीं के घर में रुका था। तीसरे दिन वह लौट कर आए थे, आते ही उन्होंने मुझसे पूछा था कि क्या पीहू ने बुलाने के लिए भेजा है ?
   "फिर...?"
    अब मैं तो चाहता था सर जी कि किसी तरह वह यहां पर आए जाएं। मैंने झूठ बोल दिया था कि हां उन्होंने ही भेजा है। लेकिन सर जी उनके घर वालों का स्वभाव बड़ा अजीब लगा मुझे... भैया जी की बातों और घर वालों की बातों में अंतर महसूस हुआ था..."
    "मतलब...?", मैंने आश्चर्य से पूछा था। 
    "उसे दिन मैं दूसरे कमरे में था जब भैया जी अपनी मम्मीजी से बात कर रहे थे। भैया जी बोले कि यदि पीहू शादी के लिए तैयार नहीं है, तो आप लोग क्यों जबरदस्ती कर रहे हैं ? आप लोग जहां कहेंगे मैं शादी करने के लिए तैयार हूं वह भी कोई रोक नहीं लगाएगी..."
     उनकी मम्मी जी गुस्से से बोली, "जब उसे यही करना था तो तीन साल तक लटका के क्यों रखा ? उसे जमीन जायदाद और पैसे का घमंड है न। भाई तो रहा नहीं। इकलौती मालकिन जो बन बैठी है ? आखिर निकाल फेंकना न कुत्ते की तरह ?"
    "अच्छा ऐसा कहा उन्होंने !! तो फिर भैया जी ने क्या कहा...?", मैंने पूछा।
    "मुझे अजीब लगा... लेकिन इससे भी अजीब बात यह लगी कि जब भैया जी ने कहा कि मुझसे अधिक तो आप लोग लगे हुए थे कि मैं वही शादी करूं जबकि मैंने आप लोग को पहले भी बता दिया था कि शायद पीहू शादी करना ही नहीं चहती है... अब जब बुलाया है तो बात करके देखूंगा... लेकिन सर जी जब यहां लौट कर आए तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था... सर जी, बहुत रात हो गई है। जितनी बातें उठाएंगे आपको दुख होगा,  मुझे नींद आ रही है, अब आप भी सो जाइए..."
      बात अधूरी रह गई। मंगल जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया और मैं सोने की कोशिश करते हुए सोच रहा था... शायद पीहू को अपनी मृत्यु का पहले पूर्वाभास हो चुका था। उसके न रहने पर भी दुनिया अपने निर्धारित स्थान पर कायम है। सभी कुछ तो अपनी जगह पर है। ये मौसम, ये सूरज, ये धरती, ये चांद-सितारे, ये बहारें, ये हवा, ये पुरवाई, ये बादल, ये बरसाते, ये बगिया, मंगल, कमली, मैं, सत्य और नदी तीर में बसी आदिवासी बस्ती सभी कुछ। लेकिन जो सत्य ने खो दिया उसे अब दोबारा उसे नहीं मिलने वाला, फिर भी वह यहां भटक रहा है। और मैंने क्या खो दिया ? यदि बता सकता तो आपको जरूर बताता लेकिन इस राइटर के पास अब कोई लफ्ज नहीं हैं..."
    सुबह आठ बजे के लगभग नींद खुली। घड़े से पानी निकाल कर मुंह धोया। कमली और मंगल दोनों खेत में काम कर रहे थे। मुझे मुंह धोता देख मंगल भाग कर मेरे पास आया। 
    "सर जी जग गए ...? नहाने की व्यवस्था बना दूं ...?", मंगल ने पास आते हुए कहा। 
   "हां बना दो ... क्या सत्य आया था ?", मैंने अपनी स्वीकृत के साथ एक प्रश्न भी पूछा।
   "हां आए थे, आपको सोता देख बोले कि सो लने दो... मैं बाद में आऊंगा..."
    तभी एक आदमी साइकिल के कैरियर में बड़ी सी टोकरी बंधे हुए गेट पर दिखाई दिया। मैं मंगल से कहा, "देखो तो लगता है कोई सब्जी लेने आया है..."
जब वह पास आया तो मुझे उसकी सूरत कुछ जानी पहचानी लगी। मैं उसे गौर से देखने लगा उसकी भी आंखें कुछ संकुचित हुई और दूसरे ही पल उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर मुझे अभिवादन किया। मैं अभी भी दुविधा में था। मंगल ने मेरी दुविधा दूर करते हुए उस व्यक्ति से मेरा परिचय करवाया, "सर जी जब आप पिछली बार आए थे, याद कजिए इनके लड़के से आपकी मुलाकात हुई थी ? अरे वही सर जी जिसको आपने पढ़ने के लिए समझाया था ?"
   "ओह हां !! याद आया, वह आज नहीं आया...?", मैंने उसे पहचानते हुए उसी से पूछा।
   "नहीं साहब जी, वह स्कूल गया है। इस साल 12वीं में है न...", उसने कुछ मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
    मैं खुशी जाहिर करते हुए बोला, "अरे वाह !! तो तुमने उसे आगे पढ़ाया...?"
  वह कृतज्ञता जाहिर करते हुए बोला, "अरे साहब जी मैंने कहां पढ़ाया, पढ़ाया तो पीहू बिटिया जी ने... आपके जाने के बाद एक दिन वह मेरे साथ सब्जी लेने आया था और पीहू बिटिया से मुलाकात हुई तो उन्होंने उसे ट्यूशन पढ़ाया और परीक्षा भी दिलवाई। पास हो गया और धीरे-धीरे उसका पढ़ने में मन लगने लगा। और देखिए आज 12वीं पहुंच गया... उस दिन आपसे कहा था बातें करने के लिए तो सभी हैं लेकिन करता कोई नहीं है। लेकिन पीहू बिटिया ने किया बल्कि बहुत लोगों के साथ करके दिखाया...", आगे के शब्द वह कह नहीं सका उसका गला भर आया और आंखों में आंसू आ गए। 
   मैंने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, "मेहनत तुम्हारे बेटे ने की, पीहू ने तो बस दिशा दिखाई। बस यही तो चाहिए आगे बढ़ने के लिए। कोशिश करो कि तुम्हारा बेटा भी वही करें जो पीहू ने उसके साथ किया था..."
   उस अधेड़ व्यक्ति ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "जी साहब जी... करेगा, क्यों नहीं करेगा ?"
    उसके जाने के बाद मंगल ने आम के पेड़ के नीचे चारपाई बिछा दी। मैंने स्नान किया और कपड़े चेंज किए। फिर मंगल से बोल, "मंगल यदि बुरा न मानो तो यह कपड़े तुम धो देना या कमली से बोल देना ...?"
    "अरे धुल जायेंगे सर जी, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है ..?"
    "और देखो आज दिन में बिल्कुल न तो तुम पियोगे और न मैं... यहां गांव की मुख्य बस्ती की स्कूल चलना है। ... और तुम जिन लड़कों का जिक्र कर रहे थे वही जो यहां पढ़ने आते थे उनसे भी मिलना है..."
   "कुछ तो कॉलेज पढ़ने के लिए शहर चले गए हैं... और कुछ अभी भी स्कूल में पढ़ रहे हैं... लेकिन क्यों मिलना है सर जी...?"
    "बस ऐसे ही... तुम्हारी बाइक तो ठीक-ठाक है न ?", मैंने पूछा था। 
   "बिल्कुल सर जी लेकिन पहले आप ब्रेकफास्ट तो... लीजिए भैया जी भी आ रहे हैं..."
    जब सत्य नजदीक आया तो मैंने देखा कि उसके हाथ में टिफिन बॉक्स है। उसने टिफिन मेरे पास रखते हुए कहां, "इसमें लंच है... और यह घर की चाबी... मैं माइंस तरफ जा रहा हूं... शायद लौटने में कुछ देर हो जाए तब तक तुम यही रहना या मन करे तो घर निकल जाना..."
    फिर वह चला गया। मंगल ने टिफिन खोलकर मुझे खाना परोसा। मैंने खाते हुए मंगल से कहा, "मंगल तुम्हारे भैया जी तो बहुत लाजवाब खाना बनाते हैं... पीहू ने बहुत कुछ सिखा दिया..."
    मेरी बात सुनकर मंगल मुस्कुराते हुए बोला, "सर जी, वक्त इंसान को सब कुछ सिखा देता है ..."
    हम लगभग ग्यारह बजे गांव की स्कूल पहुंचे। प्रिंसिपल पीहू को अच्छी तरह से जानते थे। जब उन्हें पता चला कि मैं उनका दोस्त हूँ, तो आदर और सम्मान के साथ मुझसे बातचीत की।  मुझे उनसे बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां मिली। पीहू की राजनीतिक पहुंच और बस्ती के प्रति उसका समर्पण। शिक्षा के प्रति जागरूकता अभियान जो उसने चलाया था नि:संदेह प्रसंसनीय था। मैने प्रिंसिपल साहब से आग्रह किया कि मुझे 11वीं और 12वीं के लड़कों से जो स्वभाव के अच्छे और पढ़ने में होशियार हों उनसे मिलना है। उनसे मेरा परिचय करवा दीजिए। उन्होंने तुरंत एक लिस्ट बनाई और चपरासी को देते हुए बोले, "जाओ इन्हें क्लास से बुला लाओ... "
     प्रिंसिपल ने कुल दस स्टूडेंट्स के नाम लिखे थे उनमें से दो एब्सेंट थे, पांच लड़के और तीन लडकियां मीटिंग के लिए तैयार थे। प्रिंसिपल के बगल वाले कमरे में हमारी उनके साथ मीटिंग हुई। मैने अपना परिचय पीहू के मुंबई के दोस्त के रूप में दिया। 
     मैने उन्हें बताया कि मैं और पीहू मुंबई में एकसाथ स्कूल और कॉलेज में पढ़े थे, फिर वो यहां आ गई लेकिन हम दोनों एकदूसरे को लेटर लिख अपने हाल चाल शेयर कर लेते थे। उसके द्वारा ही मुझे उसके द्वारा बस्ती और एजुकेशन के लिए किए जाने वाले कार्य की जानकारी मिलती थी .. इधर पिछले एक दो सालों से उसकी कोई खबर नहीं मिली तो मिलने चला आया... यहां आया तो पता चला कि..."
   आधे घंटे की बातचीत में ही वे सभी हमसे काफी घुल मिल गए। उन सभी के लिए पीहू "पीहू दीदी" थी। पीहू के न रहने का दुख सभी को था। पीहू के साथ उनकी बहुत सारी यादें जुड़ी थी। मैने उन सभी से पीहू की कार्यशैली समझना चाहा। जो जितना जानता था उसने उतना शेयर किया। 
    उनमें से एक बोला, "सर ! यदि आपको पूरी जानकारी चाहिए तो ओम भैया और कुसुम दीदी से मिल लीजिए ... कोई भी नया काम करने से पहले पीहू दीदी उन्हीं से डिस्कशन करती थीं... वो दोनों इस समय शहर के कॉलेज में पढ़ते हैं... सर आपने मुझे नहीं पहचाना ?"
    "पहचान गया, आज सुबह ही बगिया में तुम्हारे दद्दा से मुलाकात हुई थी... तुम्हारा नाम क्या है ?"
   उसने शालीनता से जवाब दिया, "भागीरथ..."
   मैंने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा, "अपने नाम का अर्थ तो जानते ही होंगे...? तो अब तुमसे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है.... है न ?"
   उसने उसी तरह शालीनता से सर झुका कर कहा, "जी सर... हम सभी लोग आपके साथ हैं, यह हमारा ही तो काम है..."
    मैंने कॉलेज का नाम-पता लिया। फिर उनसे अगले दिन मिलने को कहकर वापस बगिया आ गया।
    "मंगल यदि बाइक से चलते हैं तो कितना समय लगेगा... यही एक से डेढ़ घंटे के बीच न...?"
    "जी सर जी... लेकिन क्यों पूछ रहे हैं...?"
     "तुमने खाना खाया... न खाया हो तो जल्दी से खा लो... हम चल रहे हैं... जल्दी करो"
    लगभग 2 घंटे बाद हम उसी कॉलेज के सामने खड़े थे जहां ओम और कुसुम पढ़ते थे। दोनों ही मंगल को अच्छी तरह से पहचानते थे। मंगल ने मेरा वही परिचय दिया जो मैं स्कूल में प्रिंसिपल और दूसरे बच्चों को देकर आया था। कॉलेज कैंपस में दोनों से लगभग एक घंटे बातचीत हुई। दोनों ही प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति नजर आए। उनका दृष्टिकोण और नजरिया आधुनिक लगा।  
     कुसुम ने मुझे समझाते हुए कहा, "हम गांव के लोगों को पढ़ने में तीन सब्जेक्ट में अधिक समस्याएं आती है, मैथ्स, साइंस और अंग्रेजी। ... इन्हीं में अधिकांश लड़के-लड़कियां फेल होते हैं। पीहू दीदी ने इस बात को समझा और उन्होंने एक फार्मूला तैयार किया। जिसकी मैथ्स अच्छी होगी वह अपने जूनियर को मैथ्स पढ़ाएगा, जिसकी साइंस अच्छी होगी वह साइंस पढ़ाएगा जिनकी अंग्रेजी अच्छी होगी वह अंग्रेजी पढ़ाएगा। 
      पहले तो लोगों को बहुत अजीब लगा, यहां तक कि हमें भी लगा। यह कैसे संभव है कि एक ही स्कूल में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पढ़ा सकते हैं ? लेकिन पीहू दीदी में एक जबरदस्त खूबी थी, और वह थी अगले इंसान को समझा ले जाने की। मोटिवेशन देने की। सामने वाले को प्रैक्टिकली करके दिखाने की।
   उन्होंने 12 बच्चों को सिलेक्ट किया जिनकी कुछ की मैथ्स अच्छी थी और कुछ की साइंस। गांव के सभी की अंग्रेजी तो वैसे ही वीक होती है। उनमें से हम दोनों भी थे। उन्होंने 15 दिन हम सभी को अपने घर बुलाकर अंग्रेजी पढ़ाई। और सर तब हम लोगों ने पहली बार जाना कि हमारे गांव में एक ऐसी लड़की भी है कि जिसकी अंग्रेजी और सोच इतनी अच्छी है। फिर एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम साइंस का कोई भी चैप्टर जो तुम्हें अच्छे से आता हो कल और अच्छे से तैयार करके आना। इसी तरह ओम को भी कहा कि तुम्हें मैथ्स का जो चैप्टर अच्छे से बनता हो उसे और अच्छे से पढ़ कर आना। पहले तो समझ में आया नहीं कि यह क्या करने जा रही है। सोचा शायद हमारा टेस्ट लेना हो।  लेकिन उन्होंने कहा था तो हम लोगों ने वैसा ही किया। फिर अगले दिन क्लास में 10वीं के स्टूडेंट्स को मैंने आधे घंटे साइंस पढ़ाई और ओम ने मैथ्स। 
    पहले एक दो क्लास में संकोच लगा। पढ़ाने वाला पढ़ाता और पढ़ने वाले चुपचाप सुन लेते। फिर धीरे-धीरे क्रॉस क्वेश्चन होने लगे। जब क्रॉस क्वेश्चन होने लगे तो जवाब भी देना पड़ता। और इस तरह से हम दोनों और अच्छे से तैयारी करके आने लगे। मन में डर रहता था कि पता नहीं कल कौन क्या पूछ ले। हम सभी 12 के 12 स्टूडेंट 10वीं और 12वीं क्लास के थे। फिर एक हफ्ते में ही हमारे मन में विश्वास हो गया कि जब हम आपस में ही एक दूसरे को पढ़ा सकते हैं, तो अपनी और जूनियर क्लास को तो पढ़ा ही लेगे। जो लोग हमें सर जी, मैडम जी कहकर चिढ़ाते थे धीरे-धीरे वे सभी हमारी क्लास में आने लगे। 
    जब हम बच्चों में खुद ही पढ़ने की रुचि जागृति हो गई तो टीचर्स ने भी लपरवाही करना छोड़ दिया। वे सभी मन लगाकर पढ़ाते और हम लोग भी सभी मन लगाकर पढ़ते। सत्य भैया को भी जब समय मिलता तो हमे फिजिक्स और केमेस्ट्री पढ़ा देते। इस तरह हम सभी का रिजल्ट बहुत ही अच्छा आया था। 
    उन्होंने अगला प्रयास स्कूल की लाइब्रेरी के सुधार करना था। ब्लॉक से लेकर जिले तक के एजुकेशन ऑफिसर्स से बात की। बजट इश्यू करवाया और आधुनिक किताबें लाइब्रेरी के लिए आईं। 
   जिन बारह स्टूडेंट्स से उन्होंने शुरुआत की उन्हें एक दिन पिकनिक मनाने के लिए नदी तीर के बस्ती ले गई। वह तो बाद में समझ में आया कि पिकनिक एक बहाना था। वास्तव में वो हमें उन बस्ती वालों के रहन-सहन, उनकी गरीबी, उनकी अशिक्षा दिखाना चहती थी। हम बस्ती के मुखिया से मिले और पूरी बस्ती घूम कर देखी। लौटते समय उन्होंने कहा "काश ! मैं इनके लिए कुछ कर पाती..." 
    फिर हम लोगों की तरफ देखते हुए पूछा, "मैं अकेले तो नहीं... लेकिन हम साथ में कुछ कर सकते हैं क्या ...?"
   तब मैने पूछा था, "हम क्या कर सकते हैं दीदी ...?"
   उन्होंने शांत मन से कहा था, "तुम लोग खुद ही सोच कर बताना ..."
    और फिर अगले दो दिनों तक हम 12 लोगों ने एक वर्क प्लान तैयार किया। बस्ती को साफ सुथरा करना ताकि बीमारी कम से कम हो। छोटे बच्चों का अधिक से अधिक स्कूल में एडमिशन और तीसरा बड़े बुजुर्गों को अच्छी जीवन शैली के लिए प्रेरित करना। और हमारे इस वर्क प्लान में उन्होंने एक चीज और जोड़ दी, एक साल के अंदर-अंदर ही बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र और प्राइमरी स्कूल की स्थापना। 
   "तो क्या आंगनबाड़ी केंद्र और प्राइमरी स्कूल की स्थापना हुई ...", मैंने जिज्ञासा से पूछा था। 
   "हां बिल्कुल सर ... उसी साल 15 अगस्त को स्कूल कार्यक्रम के दौरान उनका परिचय विधायक जी से हुआ। उनके भाषण को सुन कर वे काफी प्रभावित हुए। उन्होंने हमारी बहुत मदद की और आज भी करने को तैयार हैं। लेकिन उनके न रहने पर सब कुछ बिखर गया। अब कोई उन जैसा आगे आने के लिए तैयार ही नहीं है।
   "क्यूं ... तुम लोग तो हो न ..?"
    "हा सर हम लोग तो हैं ... फिर भी सर ... हम लोगों की खुद की भी एजुकेशन है... घर वाले भी कहां तैयार होंगे...?"
   "बिल्कुल नहीं होंगे ... लेकिन तुम बारह लोगों में से और सभी कहां हैं...?"
   "कहां होंगे सर... सब इसी कॉलेज में है, कोई मैथ्स सेक्शन में, कोई बायो, कोई आर्ट, तो कोई कॉमर्स में... मिलना चाहेंगे..."
  "हां जरूर... लेकिन यहां नहीं... वहीं अपने घर-गांव में... उन सभी से मेरा एक संदेश कहना... ग्यारह तारीख को पीहू की पुण्यतिथि है ... सभी 11 तारीख से 12 तक तक कॉलेज से छुट्टी ले ले। 10 को संडे है... दस को सुबह पीहू की उसी क्लास रूम में मैं आप सभी का इंतजार करूंगा... जहां से इस सफर की शुरुआत हुई थी..."
  फिर हम लोग लगभग 6 बजे तक वापस आ आए। मैं खाट में लेट गया। कमली ने बताया कि सत्य भैया आए थे। कह कर गए हैं कि आप यहीं रुकियेगा वह आज फैक्ट्री में ओवर ड्यूटी करेंगे, कल सुबह आयेंगे।"
     मंगल को मैंने एक बॉटल जो लगभग आधी बची थी निकाल के देते हुए कहा, "आज तुमने काफी भाग दौड़ की है, थके होंगे थोड़ी-सी ले लो..." 
   "आप नहीं लेंगे...", मंगल ने पूछा।
   "चलो ठीक है बना लो... कमली से भी पूछ लेना चिंता मत करना बाग में और भी हैं ज्ञान की शादी का माहौल थाना उसने डाली दी होंगी...", फिर मैं आंख बंद करके खाट पर लेट गया मंगल अपने काम में जुट गया।
    थोड़ी देर बाद उसने कहा, "सर जी अब आगे किया किया जाए..."
   "तुम्हारे भैया जी तो आज आयेंगे नहीं, बिना उनसे पूछे क्या कर सकते हैं ? पर एक बात बताओ मंगल जैसा कि तुमने कहा है कि भैया जी दिल से चाहते हैं कि पीहू के अधूरे काम को और आंखें बढ़ाया जाए तो एक तरह से उन्हें तो कोई एतराज होगा नहीं ? हां पैसे दाम शुरू में खर्च होंगे, वह सब कहां से होगा ?"
    "वह सब भैया जी देख लेंगे आप चिंता न कीजिए। हर साल खेती-बाड़ी का इतना पैसा इकट्ठा होता है, सब अकाउंट में जमा है, तो फिर भला उन्हें क्या एतराज होगा...?"
   "चलो मान लिया यह तो पीहू के ही हैं तो सत्य को कोई एतराज नहीं होगा, लेकिन ध्रुव भैया को तो हो सकता है न...", मैंने शंका जाहिर की। 
   "तो आप ऐसा क्यों नहीं करते हैं, ध्रुव भैया का नंबर मेरे पास है, आप थोड़ा-सा उनसे बात कर लीजिए... चलिए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, गांव चलते हैं। वहां एक प्राइवेट टेलीफोन बूथ है...", मंगल अपनी गिलास खत्म करते हुए बोला।
  मैंने अपनी सहमति जताते हुए कहा, "हां मंगल यह तुम ठीक रहते हो, चलो चलते हैं..."
   उसे शाम मैंने पहली बार ध्रुव भैया से बात की थी। चकित कर देने वाले कुछ तथ्य मेरे सामने आए। उन्होंने बताया की पीहू ने मरने से कुछ ही दिन पहले  उन्हें फोन कर बताया था कि एक न एक दिन मेरा फोन उन्हें आएगा। उसने अपने प्रेम को ध्रुव भैया से स्वीकार भी किया था। इस बात को जान कर उन्होंने उसे डांटा भी था कि यह बात उसने पहले क्यों नहीं बताई... भाई को एक बहन के लिए फोन पर पागलों की तरह रोते हुए सुना। उन्होंने बताया कि उनके और सत्य के नाम से बैंक में जॉइंट अकाउंट है, लेकिन पैसा दोनों में से कोई भी विड्रॉ कर सकता है, वह सत्य से बात कर लेंगे। यदि वह इस वक्त जर्मनी में न होते तो खुद भी आते। लेकिन उन्होंने मुझे एक-एक चीज समझाई, कैसे क्या किया जा सकता है। वे रोते हुए बोले, मुझे यह जानकर बेहद खुशी हो रही है कि तुम मेरी बहन की सोच को उसकी विचारधारा को आगे ले जाना चाहते हो तुम शुरुआत करो जब मैं इंडिया में सेटल हो जाऊंगा तो उसके अधूरे काम को फिर मैं आगे बढ़ाऊंगा। जब उनकी बातें मंगल को मैंने बताई तो उसे आत्मबल मिला, "तो फिर शुरू करते हैं सर ज  जो होगा देख लगे  यदि ध्रुव भैया हमारे साथ हैं माननीय काम होगा..."
    दूसरी सुबह सप्तश स्वयं हम लोगों से बगिया में मिलने आया उसने बताया कि ध्रुव भैया का कल फोन आया था वह भी वही चाहता है जो हम लोग चाहते हैं... 
    मैंने उससे सारी बातें बताई। पूरी बातें सुन लेने के बाद उसने कहा, "चाहता तो मैं भी हूँ कि उसने जो शुरुआत की वह आगे बढ़े... चलो ठीक है तुम हो तो कोई प्लान बनाते हैं... देखते हैं क्या होता है... वैसे तुम यहां कितना रुक सकते हो ..?"
   "मैं खुद नहीं जानता... लेकिन हां, पीहू की टीम जबरदस्त है। बस उसे एक स्टार्टअप देने की जरूरत है। गाइडेंस के लिए तुम साथ में रहोगे ही। ... उन सभी की एजुकेशन कॉलेज की है, तो जाहिर है वह अधिक समय यहां के लिए नहीं दे पाएंगे। हमें उनके सहयोग से एक और टीम बनानी पड़ेगी... ऐसे लोगों को सेलेक्ट करना पड़ेगा जो यहां रहकर काम कर सकते हैं, और उन लोग को ऐसे काम देने होंगे जो वे वहां रहकर कर सके। इसी संडे को उन्हें बुलाया है, तब तक हम दोनों कुछ सोच कर रखते हैं। फिर डिस्कशन करेंगे। मुझे विश्वास है कि एक अच्छा रास्ता निकलकर सामने आएगा। तुम चाहो तो फैक्ट्री के मैनेजमेंट से भी बात कर सकते हो। आर्थिक रूप से शायद वह भी मदद करने के लिए तैयार हो जाए। क्योंकि तुम तो जानते ही हो सरकारी मदद में कितना टाइम लगता है..."
   सत्य कुछ सोचते हुए बोला, "हूँ... सही कहते हो... मैं बात करूंगा... मैं और गांव के अन्य सभी लोग जो जिस लायक होंगे मदद करेंगे..."
   "पीहू की पुण्यतिथि 11 को है न... हम इसकी शुरुआत उसी दिन से करेंगे... उसी नदी के तीर से... उस दिन गांव के सभी प्रमुख लोगों को वहीं आमंत्रित करेंगे... खाने-पीने की सारी व्यवस्था वहीं होगी..."
   "लेकिन सामान ले-जाने ले-आने में काफी दिक्कत होगी यार... हम वही कार्यक्रम यहां भी तो कर सकते हैं..."
   "हां बिल्कुल कर सकते हैं। कल रात मुझसे मंगल ने पूछा था कि पीहू ने अपने अंतिम संस्कार की इच्छा नदी तीर की बस्ती के पास ही क्यों जाहिर की होगी...? क्या कभी तुमने सोचा है ...? मैं तुम्हें बताता हूँ। वह जानती थी कि उसका काम अभी अधूरा है। यदि वह किसी भी निशानी के तौर पर वहां रहेगी तो हम सभी को वह स्थान याद रहेगा, हम वहां के लिए कुछ न कुछ करेंगे। इस तरह उसने इनडायरेक्टली अपने अधूरे काम को पूरा करने का एक नजरिया छोड़ा है। उसने हम सभी से कहा है कि देखो मेरी तरफ, जब भी देखोगे तो तुम्हें मेरे साथ यह बस्ती भी दिखाई देगी... यहां के लोग भी दिखाई देंगे..."
    सत्य ने आश्चर्य से कहा, "ओह !! ....  उसने हम सभी को उस स्थान से जोड़कर रखने के लिए यह इच्छा जाहिर की !!! ... अब मैं बिल्कुल समझ गया, तो फिर ऐसा ही होगा। गांव में कुछ लोगों के पास ट्रैक्टर-ट्राली है। एक दिन के लिए हायर कर लेंगे... सब समान कस्बे से आ जाएगा और हलवाई का काम तो यहीं गांव के तीन चार लोग करते ही हैं... मैं उनसे भी बात कर लूंगा...
    "वो सब मैं मंगल के साथ देख लूंगा... तुम कल कस्बे के टेंट हाउस में ऑर्डर बुक कर देना।  किराना और टेंट हाउस का समान दस को दोपहर तक बस्ती पहुंच जाए ... कल मैं मंगल के साथ बस्ती जाऊंगा। और एक बात .... तुम अपने मैनेजमेंट से बात कर उन्हें भी आने के लिए कहो... और ध्यान रखना इस बीच उनसे किसी भी डोनेशन का जिक्र मत करना... वो सब बाद में... वो सब अपने आप उसी दिन हो जाएगा..."
     सत्य ने हंसते हुए मुझसे पूछा, "क्या बात है, कोई लंबा प्लान सोच के रखा है क्या ?"
     "देखते हैं यार, यदि सभी कुछ जैसा सोचा है हो गया तो परिणाम अच्छा होगा... मैं जानता हूं सत्य कि किसी के गम में खुद को तबाह कर लेना, मर जाना आसान होता है। लेकिन उसके किसी अधूरे ख्वाब को पूरा करना मुश्किल होता है। मैं नहीं जानता कि हम दोनों कितना सफल होंगे लेकिन जितना भी होंगे न, खुद के मन को शांति देगा...", मैंने भी उसी तरह मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
   "लेकिन आज क्या किया जाए", उसने पूछा।
   तभी मंगल बोला, "कमली खाना बना रही है भैया जी, बस कुछ देर में बनकर तैयार हो जाएगा आप आराम से खाना खाईये फिर कुछ आराम कर लीजिए। तीन बजे तक को गांव चलते हैं, कुछ लोगों से मिलेंगे उनसे भी अपनी बात कहेंगे देखते हैं उनका क्या विचार है..."
    मैं भी अपनी सहमति देते हुए कहा, "हां सच मंगल ठीक कह रहा है। तुम अभी खाना खाओ और तीन-चार घंटे तक सो लो... कल से ड्यूटी कर रहे हो थक गए होंगे... अब आज की ड्यूटी कितने बजे से है ?"
     सत्य कुछ निराशा भरे स्वर में बोला, "कुछ स्टाफ पहले से ही छुट्टी में है... इसलिए फिलहाल दो दिनों तक ड्यूटी दोनों शिफ्ट में करनी पड़ेगी... शाम को 6 बजे निकल जाऊंगा और फिर सुबह 10 बजे आऊंगा..."
    मैंने उसे समझाते हुए कहा, "कोई बात नहीं हम लोग इधर का देख लेंगे। तुम बस टेंट हाउस के सामान देख लेना वह 10 को शाम तीन बजे तक पहुंच जाएं..."
   "तुम चिंता मत करो वो मैं देख लूंगा..."
    फिर जैसा तय हुआ था पूरा दिन वैसा ही गुजरा। सात तारीख को मैं मंगल के साथ नदी तीर की आदिवासी बस्ती में गया। मंगल ने सही बताया था पूरी बस्ती नीट एंड क्लीन। सलीके से एक क्यू में बने हुए घर और लगभग प्रत्येक घर के सामने फूल फल के पौधे। प्राइमरी स्कूल और उसके पास ही आंगनबाड़ी केंद्र। सुरक्षा की दृष्टि से पूरी बस्ती को चारों तरफ से तार की बाड़ी से सुरक्षित किया गया था।
     बस्ती के मुखिया के घर में ही हमारी मुलाकात सभी प्रमुख लोगों से हुए। होने वाले प्रोगाम के बारे में जानकर उनमें प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पीहू उनके दिल-ओ- दिमाग में एक सोच बनकर अभी भी जीवित थी। बस उसे फिर से एक गति देने की आवश्यकता थी। मैं लगभग सभी उम्र के लोगों से मिला। यह भी पता चला कि उसे आदिवासी बस्ती से चार लड़के कॉलेज पढ़ने के लिए गए हुए हैं। शाम को चार बजे हम उस स्थान पर भी पहुंचे जहां पर पीहू की समाधि बनाई गई थी। पीहू उनके लिए कोई सामान्य लड़की नहीं रह गई थी। वह एक ऐसी देवी के रूप में उनके मन में स्थापित हो चुकी थी जिसका जन्म उनके बेहतर भविष्य के लिए हुआ था, और जो सदैव के लिए उन्हीं के पास रह गई। समाधि का निर्माण नदी से निकले हुए रंग-बिरंगे पत्थरों से हुआ था। चारों तरफ तार की बाड़ी और पेड़ पौधे भी लगे हुए थे। 
     उन सभी के मन के भाव देखकर एक पल के लिए मैं भी भूल गया कि पीहू एक इंसान थी। मेरे हृदय में उसके लिए अथाह श्रद्धा के भाव जागे। मैं उसकी समाधि के सामने घुटने के बल बैठ गया। उसे पुष्प अर्पित करते हुए मेरी आंखें भीग गई। मैने मुश्किल से अपने मन को नियंत्रित कर मुखिया से कहा, "यदि हम एकजुट हो कर एकसाथ प्रगति के मार्ग पर चले तो यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी..."
    जब हम वापस लौटे तो शाम को पांच बज चुके थे। मन कुछ उदास था। मैं पीहू की डायरी ले कर उसी आम के पेड़ के नीचे चटाई में बैठा था। कभी डूबते हुए सूरज को देखता, तो कभी उसकी डायरी में लिखे शब्दों को पढ़ता। यह वही स्थान है जहां पर मैंने पीहू के साथ अनगिनत सुखद पल जिये थे। अपनी फिलिंग्स एक दूसरे के साथ शेयर की थी। एक ही साथ इस डूबते हुए सूरज को देखा था। यहीं पर उसने लेडी नर्टन की पोयम और आदिवासी लोकगीत अपनी सुरीली आवाज में मुझे सुनाए थे। अब वे पल वे लम्हे गुजर चुके थे... लेकिन उनकी यादें अभी भी इस मन में हैं। मैं जानता हूँ उन लम्हों को मैं कितना भी याद करूं अब लौट कर मेरे जीवन में नहीं आएंगे और बस यही सोचकर मैं उदास था। मुझे कुछ उदास बैठा देखकर कमली मेरे पास आई, "अरे सर जी यह तो पीहू बिटिया की डायरी है ?"
    "हां, जब सत्य उसे छोड़ कर गया था तो उसके लिए उसने एक कविता लिखी थी, वही पढ़ रहा था। बहुत अच्छी लिखी है..."
    "नहीं सर जी, उन्हें तो इस डायरी में आपके जाने के कुछ दिनों बाद लिखते हुए देखा था... मुझे नहीं लगता कि भइया जी के जाने के बाद उन्होंने कुछ इसमें लिखा होगा..."
    मैं कमली की बात बीच में ही काटते हुए कहा, "नहीं कमली, तुम्हें धोखा हो रहा है..."
    कमली ने मेरे हाथ से डायरी ले कर उस पेज को ध्यान से देखते हुए कहा, "नहीं सर जी... मुझे कोई धोखा नहीं हो रहा है... मुझे अच्छे से याद है... यह उन्होंने आपके जाने के चार-पांच दिन बाद लिखा था... हां सर जी ! आप के जाने के बाद उनकी तबियत तीन चार दिन तक ठीक नहीं रही। घर से बाहर ही नहीं निकली... बस अटारी में पड़ी रहती। एक दिन शाम के वक्त इस बगिया में आई, और इसी पेड़ के नीचे बैठकर इसी डायरी में कुछ देर तक लिखती रहीं थीं। मैं पंप हाउस के पास ही खेत में काम कर रही थी। फिर वह अपनी डायरी में चेहरा छुपा के रोने लगी। मैं भाग कर उनके पास आई। उन्हें चुप कराया लेकिन तब भी उनके आंसू बहते जा रहे थे, और यह डायरी उनकी गोद में थी। उनके आंसुओं से अक्षर धूल गए थे... ये देखिए, आप खुद देख लीजिए।  मैंने खुद डायरी से उनके आंसू पोछे थे। मुझे अच्छी तरह से याद है, डायरी का वह यही पन्ना है..." 
    जब मैंने गौर से देखा तो मुझे कमली की बात सही प्रतीत हुई। कविता लिखने के लिए निब पेन का उपयोग किया गया था… पानी की बूंद से कुछ अक्षर फैल गए थे। तो क्या यह कविता पीयू ने सत्य के लिए नहीं मेरे लिए लिखी थी ! .... मुझे याद करते हुई लिखी थी !! ... और लिखते समय जो आंसू उसकी आंखों से बहे... वो मेरे लिए थे !!! ... उफ़ !!"
     इसी पेड़ के नीचे आज से लगभग पाँच वर्ष पूर्व ऐसी ही एक ढलती हुई शाम में मैने पीहू से पूछा था, "ये आध्यात्मिक प्रेम क्या होता है ?"
     उसने जो जवाब दिया वो आज कमली की बात को प्रमाणित कर रहा था।
   "एक ऐसा प्रेम जो फूल से नहीं उसकी खुशबू से होता है... जो सूरज से नहीं उसकी गर्मी से होता है... जो चंद्रमा से नहीं उसकी शीतलता से होता है... अर्थात जो व्यक्तिपरक नहीं सार्वभौमिक है ... यानी कि ऐसा प्रेम जो होने के कारण से नहीं, बल्कि होने से होता है ..."
    और शायद इसीलिए मेरे लाख दूर होने पर भी मेरा प्रेम उसके हृदय में जीवित रहा... हर पल धड़कन बन धड़कता रहा...
   अर्थात इस प्रेम में फिजिक्स, केमिस्ट्री, सोशियोलॉजी, फिलासफी, साइकोलॉजी जैसे शब्द नहीं होती, सिर्फ इमोशन होते थे।
   कमली फिर से बोली आपको विश्वास नहीं होता न ? तो आप पढ़ कर सुनाइए, क्योंकि उन्होंने कुछ लाइन रोते हुए पढ़कर मुझे सुनाई थी... आप सुनाएंगे तो याद आ जाएंगी... 
     और जब मैने शुरू की तीन लाइन पढ़ी तो झट से बोल उठी, "... अब कोई भरम नहीं है सर जी !.. ये ... ये ... वही कविता... जो उन्होंने आपको याद करते हुए लिखी थी...", कहते-कहते कमली भावुक हो गई।
   आज मैं उसी आम के पेड़ के नीचे उसी जगह पर बैठा था, जहां पर पहली बार उसने मुझे गले से लगाया था, मेरे कंधे में सर रख रोई थी... यह वही जगह है जहां मैं इस भ्रम से बाहर आया था कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। उसे अपनी बाहों में समेट मैं भी रोया था ... अपने हृदय की सभी बाते कही थी... वह मेरे पैरों को तकिया समझ निश्चित सोई थी... मेरे जाने के बाद न जाने कितनी शामें मुझे याद करते हुए उसने गुजारी होंगी और अपने जीवन की पहली और आखरी कविता लिख कलम मेरे लिए छोड़ दी होगी..."
     पीहू ! अर्थात एक पपीहे की पुकार जो अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र के लिए होती है। एक खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, समझदार, सुसंस्कृत लड़की का नाम था पीहू। जो अपने जीवन के अंतिम समय में अपने नाम के अनुरूप ही एक पुकार बनकर रह गई। अपने दर्द को बांटने के लिए मुझे पुकारती रही और एक दिन उसकी पुकार इन फिजाओं में खो के रह गई। ... पीहू ! पीहू !! पीहू !!! और एक दिन अपने जीवन की सभी आशाओं का परित्याग कर अपने परिवार से जा मिली। शायद यही उसकी नियति थी...
     ये सब सोचते हुए मेरी आँखें भरने लगी और फिर अचानक अपना चेहरा डायरी पर रख भभक के रो पड़ा जैसे कभी पीहू रोई होगी। आज उसके आंसुओं की प्यास मेरे आंसुओं से बुझ रही थी। उसके जीवन का स्वाति नक्षत्र उसके मरने के बाद आया...?
    कमली ने कहा, "उस दिन तो उन्होंने पूरा नहीं सुनाया था, अब आज... आप ही सुना दीजिए.. बिटिया ने क्या लिखा... हम लोग भी तो सुन ले.."
   मंगल भी मेरे पास आ बैठा, उसने भी कहा, "हां सर जी ! ... भइया जी ने तो बहुत बार पढ़ा होगा.. यदि आप पढ़ेंगे तो उनकी भी आत्मा को शांति मिलेगी...
    "कि काश मंगल... मुझे देवताओं से बिना मांगे त्याग का वरदान न मिला होता... मैं उसे छोड़ कर न गया होता... ", ये कहते हुए मै चीख-चीख के रो रहा था, "मैं आज तक एक निरर्थक जिंदगी ही तो जी रहा हूँ ... उसकी जगह मुझे मौत क्यूं न आई ... मैं क्यूं न मर गया ... लेकिन  ये बात तुम दोनों कभी भी भईया जी से मत बताना... उनका ये भ्रम न टूटे तो अच्छा होगा..."
    मैं रोता जा रहा था। मंगल मुझे अपने अंक में समेटे चुप कराने की कोशिश में लगा था... 
   "मंगल मैने तो तुम्हे अपना एड्रेस दिया था न ? जब भैया जी यहां से चले गए...  और वह रोती रह गई... तड़पती रह गई... तो तुमने मुझे लेटर क्यों न लिखा ? मैं तो तुमसे कह कर गया था न...  उसका ध्यान रखना ? तो क्यों ध्यान नहीं रखा तुमने...? जब कभी मैं टूटा, बिखरा... तो उसने मुझे संभाला... और जब वह खुद टूटी-बिखरी तो...? उसे दिलासा देने वाला भी कोई उसके पास न था !! जान लो मंगल मुझसे अपराध हुआ... तुमसे अपराध हुआ... हम दोनों उसके हमेशा गुनहगार रहेंगे... "
    मंगल रोते हुए बोला, "जिस हिसाब-किताब की कॉपी में अपने एड्रेस लिखा था, एक दिन वह उनके हाथ लग गई और उन्होंने वह पन्ना फाड़ अपने पास रख लिया था। ... एक दिन इसी जगह पर जब वह रो रही थी तो मैंने उनसे कहा था कि सर जी कह कर गए हैं कि मंगल तुम मुझे पत्र लिखना। ... तो उन्होंने कहा था कि ...  दो साल गुजर गए मंगल चाचा !  तुम्हारे सर जी ने एक बार भी हम लोगों की सुध न ली ! ... आने की बात तो दूर एक लेटर तक न लिखा ! ... उन्हें तो पता मालूम था न...? वही  लिख लेते... वैसे भी शायद उनकी शादी हो गई होगी... उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए हमें..."
    "मंगल एक तो मेरी शादी अभी भी नहीं हुई है... और दूसरी कि यदि हो भी गई होती तब भी मैं आता... मैं उसके लिए आता और सत्य का पता लगाता ... लेकिन नियति के हाथों मुझे उसका कर्जदार बनना लिखा था तो ये सब कैसे हो जाता... ? सीप टूट के बिखर गई मंगल !  ... और उससे जो मोती निकला न... उसकी चमक ने मेरे जीवन को उजालों से भर दिया।... मुझे वह बना दिया जो मैं कभी न बन पाता... उसने मेरी कलम मुझे वापस कर दी... और कह गई, लिखो हम सब की कहानी  ... "कहानी नियति की"।
     यह मुझ पर कर्ज है उसका और जान लो मंगल मुझे उसका यह कर्ज एक न एक में दिन चुकाना पड़ेगा... इसके बगैर मुझे मुक्ति नहीं मलेगी।
    कभी उसने कहा था, "... किसने किससे मोहब्बत की मैं नहीं जानती ! लेकिन तुम्हारी एक बात मुझे बहुत ही खूबसूरत लगी कि तुम स्वीकार करते हो... इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए, यह हर कोई नहीं कर पाता है... और एक एग्जांपल तो तुम्हारे सामने ही है... एकदिन लिखूंगी, अपने दिल की सारी बातें लिखूंगी। लेकिन अपनी कहानी नहीं लिखूंगी... वह तुम पर उधार रही... चाहे इस जन्म में लिखना... चाहे दूसरे... मैं इंतजार करूंगी...", 
       तो फिर ठीक है पीहू ! यही सही, अपनी पूरी ईमानदारी और संजीदगी के साथ लिखूंगा।  तुम्हारी, सत्य की और अपनी भी सारी कही-अनकही संवेदनाओं के साथ लिखूंगा। मंगल और कमली के निःस्वार्थ सेवा भाव और ज्ञान के मित्रता के प्रति समर्पित भावनाओं को उजागर करते हुए लिखूंगा। और उस दौर में लिखूंगा पीहू... जब ये कहानी लोगों को अवास्तविक महसूस होगी। लोगों को यकीन कर पाना मुश्किल होगा कि ऐसी मोहब्बत थी, ऐसे लोग थे, जिन्होंने इस तरह का जीवन जिया था... ये कहानी उनकी जिंदगी से हो कर गुजरी थी..."
      पीहू यदि तुमने अपनी कविता में अपने हृदय की बाते लिख दी, तो तुम्हारे कहे अनुसार तुम्हारा काम खत्म हुआ, अब बारी मेरी है।
      नही पीहू ! मैं तुम्हें अजनबी नहीं बनने दूंगा... अजनबी बन जाने के दर्द को मैं जानता हूँ... और शायद इसीलिए मेरे अंदर अब यह हिम्मत आ चुकी है कि मैं लिख सकूं "किसी को भूलने या न भूलने से परे इस जीवन का एक और सच है, "कोई जरूरी नहीं कि जीवन में प्यार एक ही बार हो..."
   और अपनी ही कही बात को साबित करने का भी समय आ चुका है, "मानवीय संवेदनाओं से परे यदि कोई दुनिया होती है तो वह दुनिया देवताओं की है, और ईश्वर साक्षी है कि हम देवता नहीं..."
      "कमली ! तुम जाओ, मड़ैया में बिस्तर लगा दो, भइया जी भी आते होंगे। खाना तुम यहीं बना लेना, मै मंगल के साथ ही रुकूंगा..."
   जब कमली चली गई तो मैने मंगल से कहा, "मंगल ! जो सोचा वो होगा न, मेरा मतलब गांववाले और बस्तीवाले मदद करेंगे न ?"
   "सबका तो पता नहीं सर जी लेकिन जितने लोगों से मिले हैं, वे जरूर साथ देंगे..", वह विश्वास के साथ बोला। 
   "तो चलो ! मड़ैया में चलते हैं...", मैं उठते हुए बोला।
   मैं मड़ैया के अंदर बिछी चरपाई पर बैठ गया। मंगल ने कल की दी हुई बॉटल सामने रखते हुए कहा, "मैं आता हूँ..."
    जब वह वापस आया तो इसके हाथ में दो कुल्हड़ और प्लेट में सलाद और नमकीन थी, "तुमने कल नहीं पी.…"
  "नहीं सर जी, अकेले मन नहीं किया था...", उसने एक लार्ज लेने के बाद कहा, "सर जी ! मैं घर जा रहा हूँ... देखता हूं भैया जी आए कि नहीं... और फिर गाय बछड़ों को भी थोड़ा देखना है..."
   मैंने पीछे से कहा, "सत्य को साथ लेते आना..."
उसके जाने के बाद मैंने कमली को पुकारा, "कमली ! क्या मैं कोई हेल्प करूं..."
   कमली पास आते हुए बोली। "नहीं सर जी, चार लोगों के लिए खाना बनाने में कैसी हेल्प, रुकिए मैं सब्जी लेती आती हूँ, आपके पास ही बैठ कर काटती हूँ..."
   मैने उसके लिए कुल्हड़ में बनाया और खुद अपने लिए गिलास में। मैं खाट में उसी जगह में बैठा था जहां कभी पीहू ने अर्ध चेतना की अवस्था में मुझे सत्य समझ कर पहली बार अपने दिल की बातें बताई थी। बेखुदी में अपनी दोनों बाहें फैलाते हुए कहा था, "सत्य वह बहुत अच्छा इंसान है... तुम्हारी पीहू उसे बहुत... बहुत... पसंद करती है..."
    




   डिनर समाप्त होने के बाद मैंने कहा, "तो ठीक है... कल मैं मंगल के साथ गांव चला जाऊंगा तो हलवाइयों से बात कर लूंगा तुम कस्बे के काम देख लेना ... अब सोते हैं ... लेकिन हां तुम कल कह रहे थे कि पीहू ने मेरे लिए किताबें छांट के रखी हैं ... वही अटारी में है क्या ?"
    "हां ... "
     "तो फिर चलो ... मैं उन्हें देखना चाहता हूं ..."
     सत्य ने कोई विरोध नहीं किया। वह तख्त से उठा और चल दिया। मैं भी उसके पीछे-पीछे हो लिया। अटारी की सीढ़ी चढ़ते समय उसके कदम कांप से रहे थे, "तुम आओ मैं बल्ब जलाता हूं..."
    पूरी अटारी रोशनी से भर गई। जब मैं अटारी पर पहुंचा तो सत्य को अलमारी के सामने खड़ा पाया। उसमें ढेर सारी किताबें रखी हुई थी। मैं सत्य के पास जाकर खड़ा हो गया। 
   "ये रहीं .... इस तरफ वाली ..."
   मैंने एक-एक किताबों को उठाकर देखा। कुछ अंग्रेजी और बाकी सभी हिंदी साहित्य की श्रेणी की किताबें थी। कुछ स्टोरी बुक, कुछ नोवेल्स, कुछ आत्मकथा, कुछ यात्रा वृतांत। जब मैं किताबें देख रहा था तो सत्य बिस्तर को झटक के उसे साफ-सुथारे ढंग से बिछाने में व्यस्त था। 
    "आओ ... बैठी ...", बिस्तर बिछा लेने के बाद उसने मुझे बुलाया।
     मैं बिस्तर पर आकर बैठ गया और वह मेरे सामने कुर्सी में। मैं उससे पूछना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन इस वक्त पूछना मुझे मुनासिब नहीं लगा। मैं खामोशी से उसकी तरफ देखता रहा। अचानक उसकी आंखें भर आई।
  मैने उसके हाथ में अपना हाथ रख दिलासा देते हुए कहा, "ये क्या सत्य... नहीं... रोते नहीं... उसकी आत्मा को तकलीफ होगी... पागल रोते नहीं हैं... तुम्हारे पास तो उसकी सुखद यादें हैं। उन्हें ही याद करके मुस्कुराओ..."
   वह अचानक कुर्सी से उठा और घुटने के बाल मेरे सामने बैठ गया। मेरी गोद में अपना सर रखकर रोते हुए उसने मुझसे एक सवाल किया, "मिलन की वो सुखद यादें ... क्यूं बिछोह के दिनों में... अक्सर तन्हाइयों में हमें रुलाती हैं...?"
     उसकी यह दशा देखकर मेरी भी आंखों में नमी आ गई, "तुम सच कहते हो,  इसका जवाब मैं भी बहुत वर्षों से खोजने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन आज तक कामयाब नहीं हुआ। ... मेरे ख्याल से शायद इसलिए कि अब हमें पता होता है कि वो पल वो लम्हे हमारी जिंदगी में दोबारा कभी नहीं आएंगे। उसी का दर्द... उसी की टीस हमें रुलाती है.…"
    वह रोते हुए मुझसे कह रहा था, "मैं दो माह तक उससे दूर रहा... जब मंगल के साथ पहुंचा तो घर के सभी दरवाजे अंदर से बंद थे। हमने बहुत आवाज दी लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो मंगल सामने की बाउंड्री लांघ कर आंगन में पहुंचा और अंदर से दरवाजा खोला ... अंदर के दोनों बेडरूम बाहर से बंद थे... हम दोनों पीहू की तलाश करते हुए इसी अटारी में आए।  सीढ़ी के बीच पायदान पर जब पहुंचा तो सामने...."
    कुछ देर सांस लेने के बाद उसने आगे कहना शुरू किया, "मैं अवाक, आश्चर्यचकित-सा, मन में एकसाथ कई प्रश्न लिए यह सब कब, कैसे और क्यूं हो गया ? खिड़की से कुछ हटकर पड़ी इसी चारपाई पर उसका शरीर पड़ा था। चेहरा ठीक सीढ़ियों की तरफ था, आंखें खुली हुई। मुझे एक अलग ही अंदाज से देखती हुई, किंतु निस्तेज। यहां पर उसके शरीर की खुशबू नहीं थी, थी तो उसके बालों की उलझन। पूरी अटारी में मुर्दा जिस्म से उठती हल्की-हल्की दुर्गंध, जो मुझसे कह रही थी भाग जाओ यहां से, नहीं ठहर पाओगे तुम यहां पर... मुख से निकलते वाला खून, उसके कंधे और बिस्तर में जम गया था... बहुत ही भीभ्तस दृश्य...
     लेकिन उसकी आंखें ? वह तो मुझे अपने पास बुला रही थी। कहां भाग कर जाओगे ? देखो मुझे !!! जीवन का यह दूसरा पहलू। जिसे तुमने कभी अपनी बाहों में समेटा, जिसे तुमने चूमा, जिसकी सुंदरता के तुमने न जाने कितनी तारीफे की, जिन होठों से फूल झरते थे, जिस बदन से कभी तुम्हें चंदन-सी खुशबू आती थी।  जिसके बालों में तुमने अपनी उंगलियां घुमाई, हां जिस शरीर के उन्माद में तुम कभी पानी की तरह बहे थे, मैं वही हूँ..."
   पूरी बात कहते-कहते उसकी सांस फूलने लगी। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने आगे कहा, "पोस्टमार्टम के बाद डॉक्टर ने मुझे बताया कि उसकी मृत्यु का कारण उसके दिल में छेद था... जो शायद पैदाइशी रहा होगा... और उम्र के साथ-साथ बड़ा होता गया...हार्टअटैक नहीं बल्कि हार्टफेल हुआ था... यूं कह लो उसका हृदय फट गया था... नसों में बहने वाला खून पेट और आंतों में भर गया था..."
   "उफ़ ! सत्य रुक जाओ... प्लीज मैं नहीं सुन सकूंगा...", उस वक्त मेरी आंखों में कोई आंसू नहीं थे। मैं पत्थर बन गया। जिसने मुझे जिंदगी के मायने समझाएं, जिंदगी जीने के प्रति मेरे मन में चाहत पैदा की, उसकी यह दर्दनाक मौत मेरे लिए असहनीय थी... उस दृश्य की कल्पना करके ही में सिहर गया। अब मेरे सोचने समझने की सारी शक्ति समाप्त हो चुकी थी। मेरी नज़रें शून्य पर टिकी थी,  लगा कि मेरा दिल भी फट जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सत्य उसी तरह रो रहा था, लेकिन मैं नहीं।
   कहते हैं इंसान जब रोते-रोते थक जाता है, अर्थात रो लेने की इन्तहा हो जाती है तो उसमें एक अजीब-सी स्थिरता आ जाती है, सत्य जी भर रोया और इतना रोया की वह थक गया। उसने उठते हुए मुझसे कहा चलो बेडरूम... यहां क्या करोगे..."
   "तुम जाओ... मैं यहीं ठीक हूँ...", मेरी आंखें अभी भी शून्य पर टिकी थी। पलकों ने झपकना छोड़ दिया था।
   सत्य ने मुझे समझाते हुए कहा, "यहां सोने की क्या जरूरत है... इतना बड़ा बेड है... वहीं चलो ?"
   "नहीं, तुम जाओ मुझे अकेला छोड़ दो प्लीज़...", मैंने सत्य को खुद से परे ढकेलते हुए कहा।
    सत्य ने फिर कोई विरोध नहीं किया बल्कि सीढ़ी उतरते समय उसने मुझसे बस इतना पूछा, "तुम्हें डर तो न लगेगा ? ... और यदि लगे तो लाइट चालू रहने देना ..."
   मैंने उसकी तरफ देखा, "डर !... नहीं। अब जाओ चुपचाप सो जाओ ..."
    कभी इसी अटारी पर एकदिन उसे तन्हा छोड़ के जाने के लिए मजबूर हो गया था, लेकिन बाबा ने ठीक कहा था, मैं एक दिन आऊंगा, मुझे आना ही होगा। यही मेरी नियति है। आज जब मैं लौटकर आया तो वह नहीं है !! मैं रोना चाहता था, चीख-चीख का पीहू से पूछना चाहता था, "क्या ऐसी होती हैं रोमांटिक कहानियां...?"
  लेकिन मेरे आंसू ही नहीं निकल रहे थे। कोई देखे, महसूस करें तो कहे... कितना पत्थर दिल हूँ मैं...
  कभी उसने इसी जगह मुझसे कहा था, "इस दिल के सारे अरमान, सारी तमन्ना तभी तक के लिए हैं जब तक सांसों की डोर होती है..." तो टूट जाती न सांसों की डोर... उसका दिल क्यूं फटा?
     "सांसों की डोर", इस शब्द पर आकर मैं अटक गया, मेरे दिमाग में बिजली कौंध गई। यह तो उस पोयट्री बुक का नाम है जिसमें मैंने ....!! मैं तेजी से उठा और अलमारी तक पहुंचा। मैंने सभी बुक को एक-एक कर के देखा लेकिन वह पोएट्री बुक मुझे कहीं नहीं दिखाई दी। मै सोच में पड़ गया, कहां गई होगी ? 
    तभी मुझे ध्यान आया कि कभी सत्य ने मुझे बताया था कि पीहू पढ़ चुकी बुक्स को पेटी में सम्हाल के रखती है। मैने देखा वह पेटी अटारी के एक कोने में अभी भी रखी हुई थी। मै पेटी के नजदीक पहुंचा, उसमें कोई ताला नहीं लगा था। मैने झुक कर पेटी को खोला। बल्ब की रोशनी से अटारी में उजाला पर्याप्त था। सभी किताबें सलीके से जमा के रखी गई थीं। ऊपरी बुक्स में कुछ धूल जमी थी। मै वहीं जमीन पर बैठ गया।
    मैं बुक्स को एक-एक कर के निकलता, उन्हें देखता, फिर जमीन पर रख देता। मुझे तो उस एक बुक की तलाश थी जो अभी तक नहीं मिली थी। लगभग सभी बुक्स निकाल ली लेकिन सांसों की डोर नहीं मिली। सबसे नीचे मोटी पन्नी बिछी थी।
     तभी मेरी नजर उसी कलर की एक दूसरी पन्नी में पड़ी जिसे अच्छे से फोल्ड कर रखा गया था। मैने उसे उठाया। बुक और मेरी टीशर्ट उसमें तह करके रखी हुई थी, उसके बीच एक सीलबन्द बड़ा आयताकार लिफाफा था। उसे गोंद से अच्छी तरह से चिपकने के बाद पीहू शब्द कुष्ठ इस ढंग से लिखा गया था कि यदि लिफाफे को खोल दिया जाए तो फिर दोबारा उसे उसी ढंग से नहीं चिपकाया जा सकता कि पीहू शब्द उसी तरह दिखे। राइटिंग और लिखने का तरीका देखकर मैं समझ गया कि यह पीहू के द्वारा ही लिखा गया है। क्योंकि वह अपने इस नाम की स्पेलिंग में आई के स्थान पर डबल इ और यू के स्थान पर डबल ओ लिखा करती थी।
    मैंने उन्हें बाहर किनारे रख लिया और सभी बुक्स को लगभग उसी तरह जमा के रखने के बाद पेटी बंद कर दी। अब मैं बल्ब के पूरे उजाले में बिस्तर पर था। मैंने सांसों की डोर को पलट कर देखा। पांच-पांच सौ के दोनों नोट और मेरे द्वारा लिखी गई कविता उसी जगह पर मिली। सिर्फ एक अंतर था, दोनों नोटों में पीहू उसी ढंग से लिखा गया था जैसा कि लिफाफे में। अंत में मैने लिफाफे को ऊपर से फाड़ के अंदर देखा, मुझे एक नोटबुक मिली जो वास्तव में कई पन्नों का एक पत्र था। मै पत्र के एक-एक शब्द को ध्यान से पढ़ने लगा...

प्रिय अजनबी,
नमस्ते, 
      यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिछाती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।
   तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:-

जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए,
उस शहर उस गली, उस घर को सलाम।
जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया,
उस वक़्त उस घड़ी, उस पहर को सलाम।
ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।

अब ठीक है न ?

   कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? जिससे गुनाह होता है, उसे भी, और जिसके साथ होता है, उसे भी।
   कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी थम-सी गई थी, इतनी कि कुछ होश ही न था कि क्या हो रहा है और क्या होगा।      
     लेकिन आज सत्य के छोड़ कर जाने के दुख का परित्याग कर, तुम्हारे कहे अनुसार खुद को संवारा। अपनी पसंद की साड़ी पहनी। फेस क्रीम, हल्की गुलाबी कलर की लिपस्टिक, माथे में बिंदिया, कुछ ज्वेलरी और भी छोटे-मोटे मेकअप किए। कुछ देर तक अपने आप को आईने में देखा और महसूस किया जैसे मेरी नजरों से तुम मुझे देख रहे हो। तुम्हें तो मैंने हमेशा ही याद किया, यदि आज लिखने बैठूं तो कागज कम पड़ जाएं, और लफ़्ज़ न जाने अपने कितने मायने खुद-ब-खुद खोज लेंगे। 
     जब इंसान जिंदगी में सब कुछ खो देता है केवल तभी उसमें स्वयं को प्राप्त करने की लालसा का जन्म होता है, और आज तुम्हें ये पत्र लिखने का अर्थ खुद को प्राप्त कर लेना है।
  कभी तुमने कहा था कि मैं लिखने की शुरुआत करूं, तो एक कविता लिखनी चाही, अधूरी रह गई। कलम की स्याही से अधिक आंसू टपकते, शब्द धुल जाते थे, तो क्या करती ? 
    फिर अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने की सोची, मन नहीं किया, वैसे भी क्या था लिखने को ? और अंत में तुम्हें पत्र लिखने का विचार आया, जिसमें बहुत कुछ था। चार दिन की वह मेरी जिंदगी थी जो मैंने तुम्हारे साथ गुजरी नहीं बल्कि जी थी। बहुत सी बातें थी जो तुमसे कहना चाहती थी, पूछना चाहती थी लेकिन अधूरी रह गई। तो अब इसे ही लिखने का फैसला किया। कुछ वादे थे जो मैने तुमसे किए थे। तुम्हारी कुछ अधूरी ख्वाहिशें थीं, जिन्हें आज पूरा कर रही हूँ।

     एक दिन हमारे जीवन से सत्य-असत्य, पाप-पुण, मोह-माया, यथार्थ-कल्पना इत्यादि के भेद खत्म होने लगते हैं। जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान इन सभी की परिभाषाएं संकुचित होने लगती हैं। फिर इनका कोई मोल नहीं रह जाता है। मन का सूनापन, बेचैनिया, उदासी ये सभी जीवन में इतने प्रभावशाली और करीब होने लगती हैं कि अंत में यही हमारे लिए अंतिम सत्य बन जाती हैं। हमें अपने अवसाद से प्रेम होने लगता है। हम ऐसे गहन अंधकार में डूब जाते हैं जिसमें फिर कोई रौशनी हो भी जाए तो आंखों को चुभने लगती है। आज मैं ऐसे ही दौर से गुजर रही हूँ। तुम्हारी स्मृतियां किसी उजाले से कम नहीं। यह जितने ही प्रभावशाली ढंग से मेरे मन में उजागर होती हैं, उतनी ही कस के मैं अपनी आँखें बंद कर लेती हूँ। 

    तुम सोचोगे कि आज ही क्यों तुम्हे पत्र लिखने की सोची जबकि तुम्हे यहां से गए 3 वर्ष होने को आए हैं ? तो फिर जान लो तुम इस जगह से गए हो, मेरे मन, मेरे हृदय, मेरे अंतर्मन,  मेरी अंतरात्मा, मेरी सोच से नहीं। मैंने तो तुम्हें हर दिन मन ही मन लिखा है। आज तो मैं उन्हें कागज में इकट्ठा कर रही हूँ। इसलिए अपने हृदय में यह भ्रम मत पाल लेना की सत्य के छोड़ जाने के शोक में डूब कर या फिर किसी अवसाद में आकर मैं तुम्हें यह पत्र लिख रही हूं। तो लो फिर शुरू करती हूँ...

   याद है, मैंने चलती हुई राहों में तुमसे कहा था कि तुम कहना जानते हो और कह देते हो, मन को लुभाना जानते हो और लुभा लेते हो, किसी के दिल में उतरना जानते हो और उतर जाते हो... सभी कलाएं आती हैं तुम्हें... कभी उनके दिल की बात कहो जो कभी कह न पाए ? और बदले में तुमने मुझे एक छोटा सा शेर सुनाया था, जैसे चांद में कोई सूरज नजर आता हो...! असंभव सी बात ? याद है ?
     चलो मैंने तो स्वीकार कर लिया था, पर अक्सर सोचती हूँ, कि यदि न किया होता तो ? अपने प्यार अपनी चाहतों को दिल में ही रखा होता, और सचमुच सामाज और दुनिया के बनाए रीति-रिवाजों में मैं सत्य की पत्नी होती, और फिर कहीं तुमसे मोहब्बत हो गई होती तो फिर क्या होता ? कैसे अपने दिल की बात तुम से कह पाती ? तब क्या होता ?
     तब तो पूरी किताब ही लिखनी पड़ती न ? कहते हैं मृत्यु के कुछ दिन पूर्व या कुछ पल पहले हम मन ही मन अपने पूरे जीवन का आकलन करते हैं, सच स्वीकार करते हैं...
   फिर जाओ, जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर, वर्षों बाद ही सही, मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी। तुम्हें स्वीकार या अस्वीकार से परे रख, हो सकता है तुम्हें प्यार भी कर लूं, लेकिन तुमसे कहूंगी नहीं। किंतु हां, तुम्हारे बारे में सोचूंगी, मन में अलग-अलग धारणाएं बनाऊंगी कि तुम क्या हो और क्या नहीं हो ? 
   हो सकता है प्रेम, कामना, आशक्ति से परे हट तुम्हें एक नए मुकाम में रख लूं। यदि उन लम्हों को तुम लिख सके तो समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो। हां दोस्त ! मेरे प्रियवर !! इसी वादे के साथ मैं तुम्हें एक बार फिर मिलूंगी।
  लेकिन आज जब साम्य के बिन्दु तक हम दोनों पहुंच ही गए तो अब खुद की ही बाते करूंगी तुमसे। आखिर तुम गए भी तो मुझे अपना कर्जदार बना कर। कैसे ? लिखूंगी, लेकिन अभी नहीं। उससे पहले कहने को और तुमसे पूछने को बहुत कुछ है। 
    तीन साल पूरे होने को हैं, लेकिन तुम लौट कर न आए। वर्षों पहले मम्मी-पापा, भाई सभी चले गए। पिछले साल बाबा भी चले गए। ध्रुव भैया भी बहुत दूर ही हैं। केवल सत्य था मेरे पास, उसे भी गए हुए दो माह होने को आया, शायद वह भी लौटकर न आए। एक-एक करके सभी मेरे जीवन में आए और आकर चले भी गए। रह गई मैं, इतना बड़ा घर, जिसमें सांसों का बोझ उठाए मैं भटक रही हूँ। ये अटारी, ये खिड़की, सामने गौशाला, निकलती कच्ची सड़क, उसके पार शीशम का पेड़, जहां सत्य को पहली बार खड़े देखा था और तुम्हे जाते हुए आखिरी बार देखने की हिम्मत न जुटा पाई !! इसी बिस्तर पर पड़ी सुबकती रही, सिसकती रही, रोती रही !!!
   और देखो तो हम बिछड़े भी ठीक उसी तरह जैसे की मैंने स्वप्न में देखा था। पहले मैं भी इन सब चीजों को नहीं मानती थी, लेकिन हमारा मिलना और मिलकर यूं बिछड़ना शायद हमारी किस्मत थी। आज जब मैं तुम्हे पत्र लिख रही हूँ, तो उस दिन का एक अधूरा स्वप्न कल रात पूरा हुआ। तुम्हें जाते हुए देखने का स्वप्न। मैंने देखा, मेरे जिस्म में वही गहरे बादामी कलर का सूट है। मेरे बाल खुले हुए हैं। अटारी का बल्ब जल रहा है... पूरी अटारी में उजाला ही उजाला फैला है। एक हाथ से मैंने खिड़की की छड़ पकड़ रखी हैं, दूसरे हाथ में तुम्हारा अधूरा जाम है... तुम बाइक पर टिक कर खड़े हो... मुझे अपलक देखते हुए। मैंने अपना हाथ हिला कर तुम्हें अलविदा कहा और दूसरी तरफ से तुमने मुझे...

    उसके स्वप्न को पढ़ कर मेरे दिमाग में आंधियां चलने लगी। ठीक यही सब कुछ तो मैंने उस शाम देखा था। तो वह मेरा कोई भ्रम नहीं था ? लगभग तीन वर्ष बाद पीहू की प्रबल इच्छाशक्ति से उत्पन्न होने वाले स्वप्न को साकार होते हुए मैंने उसी दिन देख लिया था ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...

    तब क्या पता था, एक दिन इन्हीं आंखों में असंख्य आंसुओं को समेटे तुम्हे याद करते हुए न जाने कितनी रातें गुजारनी पड़ेगी। इसी घर में तुम्हे ले कर मैं सत्य से लड़ी थी कि खबरदार जो वह तुम्हे यहां रहने के लिए कहे। किसी भी कंडीशन में मैं अपनी अटारी तुम्हें रहने के लिए न दूंगी, और आज ? देखो तो उसी अटारी में मैं तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रही हूँ, और शायद अपने जीवन का अंतिम पत्र तुम्हें लिख रही हूँ।... लेकिन कहे देती हूँ, इसे पढ़ने के लिए तुम्हें स्वयं यहां आना पड़ेगा, मै इसे तुम्हारे पते पर पोस्ट करने से रही। देखो तुमने जैसा चाहा मैंने वैसा किया। तुमने जो कहा वह किया, तो फिर अब आ जाओ न ?
   ठीक है मानती हूँ, कोई रिश्ता नहीं, लेकिन हमारे बीच ब्वॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड वाला रिश्ता तो हमेशा से ही रहा न ? चलो इसे भी मत मानों, तो केवल दोस्त ही मान कर उसका हाल-चाल जानने के लिए आ जाओ... तुम वादा कर के गए थे न, कि तुम मेरी शादी के बाद एकबार ही सही, लेकिन आओगे ? तो अब आ जाओ... तुम झूठे साबित नहीं होगे। सत्य ने भी तुमसे कहा था कि तुम मुझे उसकी वाइफ बन जाने के लिए कन्वेंस कर लोगे तो वह ताउम्र तुम्हे मेरा बॉयफ्रेंड मानने के लिए तैयार हो जाएगा, तो अब उसे भी कोई एतराज नहीं होगा।
     कभी मैंने सोचा था कि जो अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद आत्महत्या तक करने की कोशिश तक कर सकता है तो फिर वही लड़का मुझसे प्यार कैसे कर सकता है ? सच कहूं तो प»हले मुझे भी यही लगता था, इस जिंदगी में प्यार एक ही बार होता होगा। जब भी तुम्हारी बातों में उसका जिक्र होता, तुम्हारे आंसुओं में उसे मुस्कुराते हुए देखती, जिसका नाम तक तुम नहीं लेते थे, तब मेरे दिल में अजीब-सी बेचैनी होती। यूं कह लो कुछ हद तक जेल्सी की भावना भी जगाती। क्यों ?
    यह तो मैं पहले से ही तय कर चुकी थी कि तुम्हारे मन से यह बात निकाल के रहूंगी कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। लेकिन यही सवाल तो एकदिन तुमने खुद मुझसे पूछ लिया, तब मैं क्या करती ? कुछ हद तक मैं तुम्हारे सामने एक्टिंग करने की कोशिश करना चाहती थी कि तुम्हें मुझसे धीरे-धीरे लगाव हो जाए, मेरे प्रति आकर्षण पैदा हो जाए और मैं जीत जाऊं। लेकिन जैसे ही तुम्हारे सामने जाती, तुमसे बातें करती, तो मुझे एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।  ऐसा क्यों होता था ? 
    उस दिन जब ज्ञान भैया ने मुझे बताया कि उसके बगैर तो तुम जीना ही नहीं चाहते थे, तो आश्चर्य हुआ। शायद जिस आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा मैंने दी, उसकी शुरुआत मेरे ही जीवन से होनी थी !! कहते हैं नियति एक बार ऐसे व्यक्ति को हमारे सामने ला खड़ा करती है, जिसके साथ होने पर हमें ऐसे आध्यात्मिक प्रेम की अनुभूति होती है, और इस तरह से यह व्यक्तिपरक न होते हुए भी किसी एक व्यक्ति के पास होने पर ही महसूस होता है, क्यों ?
    आकर्षण, मोह और आसक्ति ये सभी भाव जब अपने सर्वोत्तम और शुद्धतम स्वरूप में होते हैं तभी आध्यात्मिक प्रेम का जन्म होता है। अब मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि हम दोनों के जीवन में यह अपने सर्वोत्तम स्वरूप में था और सदैव रहेगा। तुम जहां भी होगे, जिसके साथ भी होगे, आज तुम भी महसूस करते होगे।
     कभी सत्य के साथ एक ही बेडरूम में मैं बेखबर सोती थी और वह जगता था। तुम्हारे जाने के बाद उल्टा हो गया था। वह थका-हारा बेखबर-सा सोता और मैं जागती रहती, यह सोचते हुए कि तुम कहां होगे, कैसे होंगे, क्या कर रहे होगे, मुझे कभी याद भी करते होंगे कि नहीं ? जब मैं अपने इस जीवन के अस्तित्व में तुम्हारे होने या न होने की तलाश करती तब तुम्हारी कविता की ये पंक्तियां याद आती...

तू सोती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी राते भूल गया हूँ,
जब से तुझको प्रिय-बाहों में,
रातों को जगते देखा है।

    क्या सचमुच तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ? इसी अटारी में तुमने मेरी सांसों को उखड़ते हुए देखा था और मुझे डांटा भी था कि मैं इतना काम न किया करूं। तो आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं तुम्हें एक सच बताती हूँ। सांसों के टूटने की शुरुआत कॉलेज लाइफ में बैडमिंटन खेलते हुए मेरे बेहोश हो जाने पर ही हो चुकी थी।
     स्कूल के समय से ही हम भाई-बहनों की रुचि किताबों के साथ-साथ स्पोर्ट और क्लचरल प्रोग्राम में भी थी। रेसिंग, बैडमिंटन, हाई जंप इन सब में दोनों ही पार्टिसिपेट किया करती थे। एक दिन कॉलेज में बैडमिंटन खेलते हुए अचानक बेहोश के गिर पड़ी। सांस लेने में तकलीफ होने लगी... पहले तो सभी ने समझा की थकान की वजह से होगा, लेकिन मैंने इससे पहले भी महसूस किया था कि जब भी मैं ज्यादा मेहनत के काम करती हूँ... तो जल्दी थक जाती हूँ, और सांस लेने में भी दिक्कत होती है। एक दिन जब पापा को बताया तो उन्होंने मुझे एक अच्छे डॉक्टर को दिखाया...
   डॉक्टर ने पूरा चेकअप करने के बाद पापा को बताया कि जन्म से ही मेरे दिल में एक छोटा सा छेद था, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी उसका आकार भी बढ़ता जाएगा। लगभग पच्चीस-तीस साल की उम्र में वह इतना बड़ा हो जाएगा कि दिल की धड़कने कम होती जाएंगी और मेरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होनी शुरू हो जाएगी। सांसे लेना मुश्किल होता जाएगा। आधुनिक दौर में दिल में छेद होना और उसका सफल आपरेशन होना सामान्य-सी बात है, लेकिन उसी डाक्टर ने पापा को बताया कि हार्ट के जिस पार्ट में छेद है, सर्जरी करना कठिन और बेहद रिस्की भी है। सफल होने के मात्र आठ-दस प्रतिशत ही चांसेस हैं, लेकिन वह अपने से बड़े डॉक्टर से कंसल्ट करेंगे कि क्या किया जा सकता है..."
     एक इत्तेफाक ही था कि उन दोनों के बीच के इस डिस्कशन को मैंने सुन लिया लेकिन जाहिर नहीं होने दिया था। उसके तीसरे दिन मेरा जन्मदिन था। चौथे दिन हम सभी दादी की डेथ में गांव आ गये , बीसवें दिन वह हादसा हुआ। पूरा का पूरा परिवार काल के गर्भ में समा गया। इस सच को अब मेरे सिवा कोई नहीं जानता। मैने सत्य, ध्रुव भईया को और न ही बाबा को कभी बताया।
     यदि मैंने सत्य को शुरू से ही किसी भी रिश्ते से दूर रखना चाहा, तो यही एकमात्र कारण नहीं था। जब कभी उसे अपने और विवाह के प्रति बहुत अधीर देखती तो सोचती कि उसे सब कुछ सच-सच बता दूं। फिर अगले ही पल एक अजीब-सा डर लगने लगता। सच जानने के बाद सत्य का रिएक्शन कैसा होगा ? या तो वह बेहद समझदार व्यक्ति की तरह मेरी जिंदगी से धीरे-धीरे या फिर एकदम से चला जाएगा, यह होता तो ठीक था लेकिन न गया तो फिर ? बिल्कुल नसमझो की तरह हर पल मेरे पास रहने की कोशिश की तो ? इस बात से बेखबर कि मुझे खुश रखने के एक्स्ट्रा एफर्ट से मुझे दर्द ही मिलेगा। तब मैं उसकी आंखों में प्रतिपल खुद को मरते हुए न देखती ? फिर उसके साथ मैं एक सामान्य जीवन कैसे जी पाती ?
   अब तुम्हें शिकायत हो सकती है कि ये सब मैंने तुम्हें क्यों नहीं बताया ? तुम भी तो मेरे जीवन में चार दिन के मेहमान बन के आए थे, सोचा क्यों तुम्हे परेशान करूं... लेकिन आज मानती हूँ, मैं गलत थी... तुमसे और ध्रुव भैया से बताना चाहिए था... या तो मैं मर चुकी होती या फिर तुम्हारे साथ जिंदगी जी रही होती... मेरी किस्मत में प्रतिपल यूं मरना तो न लिखा होता !!
    यहां से जाते समय तुम जिस मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे थे, उसी द्वंद्व से मैं भी गुजर रही थी। सत्य बेखबर सो रहा था और मैं सोफे में बैठी कुछ देर तक सोचती रही। तुम जा रहे थे, यह पीड़ा मेरे लिए असहनीय हो रही थी। मैं सोच रही थी कि तुम्हें कैसे रोकूं लूं, या फिर ऐसा कौन सा उपाय करूं कि तुम यहां जल्द ही लौट कर आओ। सच मानो मैंने तय कर लिया था कि तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें एक निश्चित तारीख दूंगी कि उस तारीख तक मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी। तुमसे कहूंगी, मुझे हमारी जिंदगी के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला लेना है, तुम आओगे न ? तो मैं जानती हूँ कि तुम आते। तब तक मैं यहां बाबा, ध्रुव भईया और सत्य से बात कर लेती। यही सब सोच कर मैं कमरे से बाहर निकली थी कि बाबा बैठक में मिल गए और उन्होंने तुम्हें बुलाने के लिए मुझसे कहा। तुम उनके पास गए और बाबा ने तुमसे वह मांग लिया जो उस दिन तुमसे वादा लिया था। याद करो जब तुम पार्टी की इजाजत लेने के लिए उनके पास गए थे ? मैंने समझ लिया कि बाबा क्या चाहते हैं। जब तुम मेरी जिंदगी से चले ही जा रहे थे तो फिर मैंने जीने की प्रति सभी लालसा का मन से परित्याग कर दिया। सोचा बाबा का फैसला जब हो ही चुका तो इस दुनिया से जाते-जाते उन्हें कोई और कष्ट क्यूं दूं। मेरे दोस्त तो मैं क्या करती ? उसी क्षण खुद को मार लेने का फैसला कर लिया था। अब तुम्हें कैसे और किसके लिए रोकती ?
   तुम्हारे कहे अनुसार घर के काम भी ज्यादा नहीं करती थी। बाहर के काम मंगल चाचा और कमली से करवा लेती, और घर के अंदर के सत्य से। वह हंसी-खुशी करता भी था। जब बाबा पूजा में होते तो वह साथ में रसोई में भी हेल्प करता था।
   एकदिन जब वह अपने घर से वापस लौट कर आया तो मैंने उसे काफी चिंतित देखा। पूछने पर उसने बताया कि उसकी शादी की बात चल रही है। मां और पिताजी का कहना है या तो तुम पीहू से शादी करो, हमें कोई एतराज नहीं, या फिर इनमें से कोई रिश्ता सिलेक्ट करो। हम कब तक लोगों को मना करते रहे, आखिर हमें भी तो समाज में रहना है। अब मैं उसे कैसे समझती...?
      उस दिन शाम का ही वक्त था। मंगल गाय बछड़ों को बांध रहा था। इसी अटारी में इसी बात पर हमारी बहस हो गई। मैने कहा, "मन तो लिया तुम्हें अपना पति। क्या जरूरी है कि बारात सजे ? बाबा ने तुम्हे अपना लिया था, मैने भी अपना लिया, तो बता दो अपने घर वालों को कि हमारी शादी हो चुकी है.. इसमें दिक्कत क्या है ?"
    मेरी बात सुनकर उसने कुछ गुस्से से कहा,  "ऐसा नहीं होता... न समाज के सामने हमारी शादी हुई है न कोर्ट में रजिस्टर्ड हैं.. इस इलीगल शादी को कौन मानेगा ?"
     और मैंने भी गुस्से से उससे कह दिया, "फिर तुम्हे जो करना हो करो। शादी भी करनी हो तो कर लो।  लेकिन मैं नहीं करूंगी, और न ही किसी समाज के सामने स्वीकार करूंगी। यदि तुम्हें इस शर्त के साथ मेरे साथ रहना है तो रह सकते हो..."
    उसने भी गुस्से से सीढ़ियां उतरते हुए कहा, "...तो ठीक है, मैं जा रहा हूँ, अब लौटकर नहीं आऊगा। शादी करने का इरादा हो तो मंगल से घर में फोन करवा देना, मैं आ जाऊंगा..."
     फिर कुछ देर बाद ही उसे जाते हुए इसी खिड़की से देखा। मंगल ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह चला गया। जितनी सहजता से मैने तुम्हे जाने दिया, उतनी ही सहजता से उसे भी। 
    उसके बाद मैं उस सत्य को हमेशा तलाशती रही जब मैंने पापा के द्वारा अपने बर्थडे में दिए गए सूट को पहना था और उसने मुझसे कहा था, "तुमने इसे पहना तो सूट ने अपनी सुन्दरता पा ली... तुम्हारे पापा ने सच कहा था... आई विश ! यदि हमारी बेटी हो तो तुम जैसी ही हो, वह तुम पर जाए..."
     क्या पता मेरी कोख में जो नन्हा सा जीव पल रहा है, वह हमारी बेटी हो !! उसे भी छोड़ कर चला गया वो !!
   तो अब बताओ मैं किसे पुकारू ? तुम्हारे सिवा मेरी जिंदगी में कौन रह गया ? तुम न हो कर भी मेरे पास सदैव रहे। तुम तो मेरे जीवन के वह कृष्ण हो जिसे राधा हमेशा अपने अंतर्मन से पुकारती रही। तुम तो उस द्रोपदी के भी कृष्ण हो जिसने अपने मित्रता के धर्म का निर्वहन करने के लिए, अपनी मुरली को त्याग कर सुदर्शन चक्र धारण किया। तुम तो वो सारथी भी हो जिसने अपने मित्र के अपमान का बदला लेने के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में उसके पति के रथ की लगाम थाम लिया। उसी मित्रता के धर्म को याद करके मैं तुम्हें पुकारती हूँ, तुम मेरे साथ न्याय करो ? मुझे सिंपैथी नहीं, तम्हारी काइंडनेस चाहिए। मैं तुम्हें एक बार फिर गले से लगा कर रोना चाहती हूँ।
   आज लाग-लपेट से दूर अंतरात्मा से तुमसे कहती हूँ मेरे दोस्त, प्यार तुमसे हुआ, तुम मेरे हर एक लम्हे में, मेरे वजूद के हर एक हिस्से में हो। जब भी तुम्हे याद करती हूँ तो आंसू बहते हैं, रोती हूँ, तड़पती हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद सत्य को भी याद करती हूँ।  वह मेरे होने वाले इस बच्चे का पिता है, क्यों उसे छोड़ कर चला गया ? जिंदगी में सिर्फ यही शिकायत रहेगी उससे ? जब मैंने उसे अपना लिया था, बदला लेने के लिए ही सही जब मैंने तन-मन-धन सब कुछ अर्पित कर दिया तो उन परिस्थितियों में जब न तो बाबा है, न ध्रुव भैया है, मंगल के सिवा कोई नहीं। उस वक्त उसका मुझे छोड़कर चले जाना, मैं तुमसे पूछती हूँ, क्या उचित है ? मैंने विवाह के लिए उसे पहली बार तो मना नहीं किया था, तो इस बार ऐसा क्या हो गया ?  सब कुछ पा लेने के बाद उसे अचानक रीति रिवाज के अनुसार विवाह की जरूरत महसूस हुई ? क्यों ? 
    कभी सोचती कि विवाह के लिए मैंने अपनी सहमति दे दी होती तो शायद अच्छा ही होता। जब वचन और कर्म से सब कुछ उस पर न्योछावर कर दिया तो सामाजिक रूप से उसे स्वीकार करने में कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता ? लेकिन नहीं, अपनी सहमति देने से पूर्व मुझे अपने बारे में उसे सब कुछ सच-सच बताना पड़ता। बस यहीं पर आकर मैं रुक जाती थी। यदि न बताती तो कल को मेरे बाबा पर आरोप लगता कि एक मरणासन्न लड़की को हमारे बेटे के गले बांध दिया... या फिर शायद उनको खुशी ही होती ? 
    जाते समय तुमसे मांगा भी तो क्या मांगा... कि तुम यहां एक बार ही सही, अपनी मर्जी से लौट कर फिर से आओ !! प्यार, दोस्ती, चाहत इन सब से परे सिर्फ तुम्हे गले लगाकर इतना ही कहा होता, मत जाओ मेरे जीवन से... तो शायद... नहीं... नहीं... यक़ीनन तुम बाबा से किया हुआ वादा भी तोड़ देते... मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाते, और यदि जाते भी तो जल्द ही लौट कर आते।
    सच लिखा न ? हां... उस दिन मैंने समझ लिया था कि यही बात बाबा से मिलने से पहले तुम मुझसे कहना चाहते थे, जो संबंध तुमने मन ही मन मेरे प्रति स्वीकार कर लिया था, मै जान गई थी वह संबंध किसी भी वादे और रिश्ते से बढ़ कर था, फिर भी मैने तुम्हे जाने दिया !!
   मैंने ज्ञान भैया से केवल तुम्हारे बारे में या तुम्हारी प्रेमिका के बारे में ही नहीं पूछा था। मैंने तो तुम्हें पहले ही पढ़ और जान लिया था। और तुम्हारा प्यार ? वो तो तुम्हारी आंखों में झलकता था, तो फिर ये सब जानने की मुझे कोई जरूरत थी ही नहीं। मैंने तो तुम्हारा पूरा फैमिली बैकग्राउंड पूछा था। उस रात जाना, तुम हमसे कम नहीं हो। करोड़ों की संपत्ति है तुम्हारे पास। फिर एकदिन कितनी सहजता से सबकुछ छोड़ कर मेरे पास रुक जाना चाहते थे। बिना किसी रिश्ते के, मेरे सच्चे दोस्त बन कर। वैसे भी इन सभी भौतिक चीजों की आवश्यकता तुम्हारे जीवन में थी ही कहां ? तुम्हारे जीवन में तो शब्दों की अहमियत थी, मुझसे मिलने वाले निश्चल प्रेम की थी।
     आज मैने अपने पूरे परिवार को खोया, अंत में जिसे पति के रूप में अपनाया उसे भी जाने दिया और तुम जैसे इंसान को रोक न सकी, यही मेरी जिंदगी का हासिल रहा मेरे दोस्त। और अब ? कोख में एक नया जीवन लिए अपने इसी दर्द के साथ इस घर और बगिया के बीच भटकती रहती हूँ। अब आंसू भी नहीं निकलते, और निकले भी तो क्यूं ? कोई पोंछने वाला भी तो नहीं। सिर्फ दुख इस बात का है कि एक नया जीवन जो मेरे माध्यम से जन्म ले सकता है, अब उसे भी मेरे साथ ही जाना होगा। शायद यह भी कोई अभिशप्त जीव है, जिसे जन्म से पहले ही मृत्यु का महाभिशाप मिला है या फिर मुक्ति का... ?
    अभी तक बड़े ही धैर्य से मैने पत्र पढ़ा था। लेकिन पत्र के इस मोड़ पर आ कर मेरा धैर्य टूट गया। उसके दर्द उसकी पीड़ा और उसकी बेबसी को महसूस कर मैं पत्र के ऊपर अपना चेहरा रख रो पड़ा। कुछ देर रो लेने के बाद जब दिल कुछ हल्का हुआ तो मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...
    जब भी मंगल और कमली मुझे उदास भटकते इधर-उधर देखते, तो दिलासा देते। मंगल चाचा तो कहते कि मैं तुम्हें खत लिख दूं या फिर उन्हें ही तुम्हारा पता लौटा दूं तो वही लिख देंगे, लेकिन मैं ही मना कर देती। 
    तीन साल होने को आए न, तुम्हें याद भी होऊंगी या नहीं, कौन जाने ? दिल कहता है तुम भूले नहीं होगे। लेकिन यदि सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होगे तो उसमें बाधा क्यों बनूं। तुम भी तो मुझे तब छोड़ कर गए थे, जब तुम्हें मेरी सबसे अधिक जरूरत थी, और आज मुझे तुम्हारी है !! जब तुम स्वार्थी न बन सके तो फिर मैं कैसे बन जाऊं ?
   देह-त्याग से दो-तीन घंटे पहले दोपहर को बाबा ने मुझे अपने पास बैठा कर तुम्हारे बारे में बहुत सारी बातें की थीं। मुझे नाइटेंगल वाली वह कहानी भी आर्द्रकंठ से सुनाई जो जाने से पहले तुमने उन्हें सुनाई थी, और उन्होंने स्वीकार किया था कि यह कहानी काल्पनिक होते हुए भी कितनी सच है। उन्होंने अफसोस से मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था, मेरा ज्ञान तो किसी व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और कुंडली पढ़कर भविष्य बताने का ज्ञान है। लेकिन उसने तो एक छोटी सी कहानी में तुम्हारी पूरी जिंदगी लिख दी। मैं जानती हूँ कि यह कहानी तुमने पहले नहीं लिखी होगी, बल्कि बाबा को हमारे बीच के संबंध को इनडायरेक्टली बताने के लिए सोच ली होगी। मेरी भी आँखें नम हुई और सोचा काश ये कहानी मैने लिखी होती...
  उस दिन उन्होंने यह भी बताया कि तुम तो यहां वापस लौट के आने के लिए जा रहे थे। किस तरह तुमने उनके पैर पकड़ कर उनसे मेरा साथ मांगा था। तुम मेरे लिए किस तरह से रोए थे। यह बताते हुए वो खुद भी रो पड़े थे, "...वह लड़का तुम्हारे लिए बहुत रोया था पीहू ! लेकिन तब मैं इसी भ्रम में था कि तुम और सत्य एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, एक दूसरे को प्रेम करते थे। उस शाम बारिश में सत्य को मुझसे मिलाना सिर्फ एक बहाना था। लेकिन आज मुझे कोई भ्रम नहीं हो रहा है... तुम्हारी आंखों की नमी में उसी लड़के के लिए प्यार देख रहा हूँ। तुम्हारी उदासियों में, तुम्हारे आंखों के इस सूनेपन में... मुझे वही लड़का नजर आ रहा है। तुम्हारे बाबा से अनजाने में अपराध हो गया पीहू !... और देखो तो क्षमा मांग कर वह गया... किन्हीं भी रिश्ते-नातों से दूर उसने सिर्फ तुम्हारे आस-पास रहना चाहा था। तुम्हारा सच्चा दोस्त बनकर, तुम्हारा हमदर्द बनकर। मैं उसे यह भी न दे सका !! उसके प्रति कठोर हो गया, और इस हद तक कि उसकी आंखों से बहते हुए गंगा-जमुना के जल के समान पवित्र और निश्चल आंसुओं को भी न देख पाया। उसके प्रेम में वो ऊर्जा थी जो तुम्हारी किस्मत बदल सकती थी..."
   और उस दिन उन्होंने मुझसे सभी कुछ स्वीकार किया कि किस हद तक उन्होंने सत्य के चेहरे में तुम्हे लेकर इनसिक्योरिटी देखी और महसूस की थी। उस दिन उसने बाबा से कहा था, "बाबा सोचता हूँ, उसको यहीं रोक लूं... शायद पीहू भी चाहती है... ठीक ही तो है बाबा... दोनों किताबों के शौकीन है... उनकी बहुत-सी आदतें भी एक दूसरे से मैच करती हैं... पीहू और उसके बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है... आप लोगों के पास रहेगा... वैसे भी काम-काज के कारण मैं घर की तरफ ध्यान नहीं दे पाता हूँ... जहां तक मुझे पता है, उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे छोड़ के दूसरे से शादी कर ली है... एक बार तो सुसाइड करने की कोशिश भी कर चुका है। यहां रहेगा तो उसका भी मन लगा रहेगा... आप लोगों का सहारा मिल जाएगा उसे... भटक रहा है बेचारा इधर-उधर... आप क्या कहते हैं ?"
  पीहू के पत्र से मिली इस जानकारी ने मुझे चौका दिया। तो क्या उस दिन बाबा ने सच छुपाने से लिए अपनी ज्योतिष विद्या का सहारा लिया था ? उफ़ ! इंसान भी न जाने कितने मुखौटे पहनता है ? और भी न जाने कितने सच सामने आना शेष हैं ? मैंने पत्र को देखा, अक्षर धुंधले हो रहे थे। अपनी आँखें पोंछ आगे पढ़ने लगा...
  आश्चर्य हो रहा है न पढ़ के ? अब तुम बताओ ईर्षा, स्वामित्व और असुरक्षा का प्रेम के होने या न होने से क्या संबंध ? क्या उनके प्रदर्शन के बगैर प्रेम अप्रमाणित होता है ? तो फिर सत्य के प्रति तुम्हारे व्यवहार में और तुम्हारी आंखों में मुझे कोई ईर्षा क्यों न दिखाई दी ? प्रेम होने के बावजूद तुमने मुझ पर उसका हक नहीं जताया। शायद इसीलिए तुम्हारे अंदर किसी भी असुरक्षा की भावना ने जन्म नहीं लिया। तो क्या मैं मान लूं कि तुम मुझसे तटस्थ रहे ? नहीं, कैसे मान लूं ? मैं भी तो इन शब्दों से दूर ही रही।
     झूठ नहीं लिखूंगी, थोड़ी देर के लिए जब तुम उस लड़की की तारीफ करते तो मुझे जलन होती थी। यदि वह अच्छी थी, तो फिर थी। इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है ? आखिर तुम्हारे व्यक्तित्व के विकास में, तुम्हारी सोच और समझ में उसका भी तो योगदान है। कैसे छीन लेती या कोशिश करती उसे तुमसे दूर करने की ? फिर तुम भी तो मुझे आधे-अधूरे ही मिलते न ? लेकिन हां, एक अफसोस जरूर होता, कि काश ! उसकी जगह कभी तुमसे मैं मिली होती या फिर इतना तो हुआ होता कि बाबा और मेरी जिंदगी में सत्य के आने के पहले तुम आए होते।
     कभी तुमसे यूं ही नहीं कहा था कि मेरे पास पैसे-रुपए, जमीन-जायदाद की कमी नहीं है। कमी थी तो सिर्फ एक ऐसे इंसान की जो मेरे पास ठहरता और मुझे समझता, जो यह न कहता कि तुम यह कर लो, तुम वह कर लो, बल्कि पूछता, पीहू ! आज तुमने क्या किया ? कौन-सी कहानी, नॉवेल या पोयम पढ़ी, कुछ मुझे भी पढ़ के सुनाओ न। मेरे मना करने पर कुछ जिद करता जैसे कि उस दिन लेडी नॉर्टन की कविता के लिए तुमने की थी। 
    आज जब सोचती हूँ तो आंसू आते है। उस दिन तुमने कैसे ज़िद की थी, "ये पीहू ! फिर से सुनाओ न प्लीज, मीनिंग के साथ...", उसी आम के पेड़ के नीचे लेट कर इस पोयम को गुनगुनाती हूँ, वो भी बीच में रुक-रुक के उसके मीनिंग भी अपने दृष्टिकोण से समझाती हूँ... लेकिन अब सुनने के लिए तुम हो कहां !!! यूं कोई देखे तो पागल समझे, लेकिन वहां कोई होता नहीं। हां एक दिन मंगल चाचा ने सुना तो मुस्कुरा के बोले, "बिटिया यहीं क्लास लगा लो बच्चो की..."
   एक ऐसा ही दिन था। मैं सुबह का नाश्ता बनाते हुए इसी पोयम को गुनगुना रही थी। सत्य ने सुना और उपहास से बोल, "इतनी किताबें मत पढ़ो की पागल हो जाओ, पता नहीं क्या बड़बड़ाती रहती हो..."
   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बड़बड़ा नहीं रही हूँ, एक पोयम है उसे ही गुनगुना रही हूँ... तुम सुनोगे ?"
   वह लापरवाही से बोला, "न... मुझे समझ में न आएगी..."
    मैंने कहा, "कोई बात नहीं... मैं समझाऊंगी न... अच्छी पोयम है...सुन लो ?"
   वह उपेक्षा से बोला, "अंग्रेजी के चार अक्षर ज्यादा पढ़ लिए तो इतरा रही हो... तुम नाश्ता बनाओ... वैसे भी यार मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है... फैक्ट्री भी जाना है..."
   उस दिन सोचा, क्या यह वही सत्य है जिसे मेरी बातें पसंद थी, मेरी हर पसंद से प्यार था... लेकिन इसके आगे कुछ नहीं सोचा। मन में ख्याल आया कि हो सकता है किसी बात को लेकर स्ट्रेच हो... लेकिन उसी शाम जब मैं अटारी पर लेटी कीट्स की वही पोयम्स  पढ़ रही थी, तो आते ही बोला, "सेकंड ईयर का फॉर्म भर तो दिया है, कभी-कभी सिलेबस भी पढ़ लिया करो... ओवर कॉन्फिडेंस अच्छी बात नहीं..."
   उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा दी। हां सच... और क्या कर सकती थी ? देखा जाए तो उसकी बातें प्रैक्टिकल थी, मेरे प्रति फिक्र थी, लेकिन इनमें मैं कहां थी ?
   लेकिन कभी कोई था, जो एक पोयम मीनिंग के साथ मेरे मुख से दोबारा सुनने के लिए तरसता चला गया। कोई था, जो मुझसे कहता था तुम्हें जो पसंद हो वही करो। कोई था, जिसने मेरे अंदर उत्साह भरा कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ। कोई था, जो मेरी आंखों में आंसू की एक बूंद देखकर कहता तो कुछ नहीं था, बस चुपचाप गले से लगा लेता था। कोई था, जो कहता कि हमें जिंदगी को गुजारना नहीं जीना चाहिए। कोई था, जिसे मेरे होने से प्यार था...आज तुमसे पूछतो हूँ, वह कौन था अजनबी ?
   जज्बातों में भटक गई, हां तो मैं लिख रही थी कि मुझे किससे दोस्ती करनी है, मुझे किसके साथ की जरूरत है, यह फैसला तो मुझे लेना चाहिए न ? तो फिर उसने बाबा से ऐसा क्यों कहा ? यदि कुछ कहना था तो मैं कहती ?
  बाबा को उस दिन बस इसी बात का भी पछतावा था कि सत्य के इस बात की पुष्ठि उन्होंने मुझसे क्यों नहीं की ? मेरी इच्छा जानने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की ? और उसकी एक ही वजह थी, बाबा का यह भ्रम कि मैं सत्य से पहले से ही प्यार करती थी, बारिश में सत्य का उनसे मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, पूर्व नियोजित था। हां सच, इस रात सत्य के रुकने का आभास उन्हें हो गया था। मेरे चरित्र पर कोई संदेह नहीं था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि एक लड़के को बिना उनकी परमिशन के यदि मैने भरी बरसात में न जाने दिया तो वह मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकता है...?
     काश ! बाबा को यह भ्रम न हुआ होता। जब बाबा ने तुमसे एकांत में मिलने की इच्छा जाहिर की तो पता नहीं क्यों मेरा मन किसी अज्ञात आशंका से घिर गया था। मुझे कुछ-कुछ आभास हो रहा था कि तुम्हारे साथ क्या होने वाला है। उस दिन मैंने गलती की। मुझे तुम्हारे साथ जाना चाहिए था। बाद में भले ही बाबा के कहने पर उनके सम्मान के लिए मैं वहां से चली आती। 
     तुम मुझसे एक सवाल पूछते-पूछते चले गए, "क्या जीवन में प्यार एक ही बार होता है...?", उस समय पूरे विश्वाश के साथ मैं कोई जवाब कैसे दे सकती थी ? दूसरी या तीसरी बार की तो छोड़ो, जबकि मैं पहली ही बार प्यार के होने या न होने के झूले में झूल रही थी !! और देखो तो, अंतिम दिन जो जिंदगी मैने तुम्हारे साथ जी, उसी में मुझे मेरे सारे सवालों के जवाब मिले। मैने तुम्हे जताया भी, तुम समझे भी, लेकिन फिर भी जाते-जाते वही सवाल पूछ लिया। उसी क्षण मैं समझ गई कि बाबा ने तुमसे क्या मांगा होगा। यदि तुमने मुझसे पूछा होता, "बताओ पीहू ! क्या तुम्हे मुझसे प्यार है...?", तो इसका जवाब मैं जरूर देती। बल्कि भाग कर स्वयं बाबा के पास जाती, मेरे और सत्य के रिश्ते को लेकर जो भी गलतफहमी उनके मन में होती, उन्हें दूर करती। उनसे सच कहती और तुम्हे अपने जीवन में मांगती। हां मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर ! उसे दिन मैं भी तुम्हारी तरह स्वार्थी बन जाती।
     लेकिन नहीं उस दिन तुम दोनों ही महानता के उच्चतम शिखर पर जा बैठे। भ्रम में एक ने कन्यादान किया तो दूसरे ने इस भ्रम को सही सिद्ध करने के लिए अपने प्रेम का त्याग किया। किसी ने जरूरत ही नहीं समझी कि मुझसे पूछे कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ ? और शायद मेरा दोष यह था कि न चाहते हुए मैने यह सब स्वीकार किया ?
     सच पूछो तो उस पल मुझे उस लड़की से न तो कोई जलन हो रही थी, न ही कोई शिकायत कि उसने तुम्हें क्यों छोड़ा... निश्चित ही वह भी मेरी तरह मजबूर हो गई होगी। अंत में बाबा ने कहा था कि मैं तुम्हें अपने पास बुला लूं और अपने आप को आजाद कर लूं इस सोने के पिंजड़े से। लेकिन जब मैं सभी बंधनों से मुक्त हो गई, तो स्वीकार करने के लिए तुम मेरे पास थे ही नहीं। पर तुम ही बताओ तब भी क्या यह संभव होता ?
    न मुझे गलत न समझना। मैं इसलिए नहीं लिख रही हूँ कि मैंने सत्य को बाबा के कहने पर अपना पति मान लिया था। बाबा ने तो पिंजड़े का दरवाजा खोल अपने वचन से मुझे मुक्त कर दिया था। मैं ही न उड़ पाई बावजूद इसके कि मुझे पूरा आभास था कि तुम्हे मेरा इंतजार आज भी होगा। शायद इसलिए कि तब मुझे खुद ही नहीं मालूम था कि और कितने दिनों तक मैं तुम्हारे साथ इस खुले आकाश में उड़ पाऊंगी, तुम्हारे पैरों को तकिया समझ इन ढलती हुई शामों को देख पाऊंगी, तुम्हारी कविताएं सुन पाऊंगी ? जब इतना निर्मोही मैं सत्य के प्रति न हो पाई तो तुम्हारे प्रति कैसे हो जाती ? और देखो तो अब वह समय नजदीक आ भी गया !!!
    लेकिन इन सबके बावजूद आज सोचती हूँ कि अंतिम दिन जब तुम अटारी की सीढ़ियां उतर रहे थे, काश ! उस समय कुछ हिम्मत करके बाबा से बात की होती। जिसका नाम सत्य है, उससे सच कह दिया होता तो इस जीवन में ये काश शब्द तो न होता। तुम मेरी नियति बन कर मेरे पास आए और ये मेरी भूल थीं कि मैंने अपनी किस्मत समझ के तुम्हे खुद से दूर जाने दिया। 
     या फिर काश !! उस रात मैं सत्य के साथ ही सो रही होती जब तुम्हे सत्य समझ कर अपनी फिलिंग तुम्ही से कह रही थी, "...वह बहुत अच्छा इंसान है, तुम्हारी पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", तब शायद वह खुद ही कुछ समझ जाता। 
    या फिर काश... उस वक्त भले ही मैं बाबा का सख्त विरोध न करती जब उन्होंने तुमसे अकेले में मिलने की इच्छा जताई थी, प्यार से इतना ही मांगा होता, "प्लीज बाबा, जो भी बात करनी है, मेरे सामने कीजिये...", तो शायद वे आसानी से इंकार न कर पाते... होने को बहुत कुछ हो सकता था लेकिन नहीं हुआ। यही हमारा प्रारब्ध है, यही मेरी किस्मत।
    या फिर काश !!! उस समय मै पूरी तरह होश में न होती जब तुमने मुझे अपनी बाहों में थाम रखा था और मैंने लिपटते हुए तुमसे "आई लव यू" कहा था। 
   तुम्हें पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न ? तो आज सच जान लो, जब मेरे कंधे के नीचे से तकिया निकली जा रही थी तो उस समय मैं होश में आ चुकी थी, लेकिन मैने बेखुदी का नाटक किया था। 
    जरा उन लम्हों को तुम ध्यान से सोचो जब मैंने एक पल के लिए अपनी आंखें खोली और तुम्हें देखा था। उसी वक्त मैं समझ गई थी कि मैं कहां और किसकी बाहों में हूँ। जब मैंने तुम्हें'आई लव यू' कहा और तुमने रोते हुए मेरे माथे को चूम कर आई टू' कहा था और मैने तुम्हे अपनी तरफ खींच कर गले लगा लिया था, उस पल मैं उतने ही होश में थी जितने कि तुम थे। 
     यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि मैंने पहली बार जिस लड़के को आई लव यू कहा, वह तुम थे, और आज तक तुम्ही हो, फिर ये लफ्ज़ मेरी जुबान पर किसी और के लिए न आए। यकीनन कभी सत्य के लिए भी नहीं जिसे अंत में पति मान कर तन सौंपा।
  उस वक्त भी तुम दुविधा की स्थिति में थे, अचानक तुम्हें पता नहीं क्या हुआ कि तुम उस स्थिति से बाहर आए और तुमने भी मुझे उसी तरह गले से लगाया और मुझसे बोले थे, "मुझे भी तुमसे प्यार है पीहू...जानता हूँ... मैं तुम्हारे जीवन का सत्य नहीं, लेकिन झूठ भी तो नहीं। मैं तो तुम्हारे जीवन का प्यार हूँ, जो या तो होता है या फिर नहीं होता है... लेकिन मैं हूँ..."
    "और हमेशा रहूंगा !", लो पूरा कर दिया तुम्हारे अधूरे वाक्य को। अब तुम बताओ है न वही हू-ब-हू शब्द ? कभी मैंने कहा था कि मेरी मेमोरी बहुत शार्प है, यूं ही नहीं कहा था मेरे दोस्त। 
   उस रात जब मैने तुम्हारे हाथ से नींबू पानी पिया था तब कितने प्यार और अपनत्व से अपने सीने में मेरे सर को सहलाते हुए तुमने मुझे पिलाया था। वो पल मुझे आज भी याद हैं। कहते है न मरते समय इंसान को प्यास लगती है और इसीलिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वह पल मुझे उसी तरह याद रहे। तो कम से कम प्यासी तो इस धरती से न जाउंगी।
    और अब  यह भी स्वीकार करने में मुझे कोई लज्जा नहीं है कि यदि उस रात मंगल चाचा न होते तो मैं बेखुदी का और नाटक करती। अपनी सारी हदें पार करती और तुमसे भी करवाती। उतार फेंकती लज्जा के आभूषण को। उस पल जब मैंने मन से तुम्हे प्यार कर लिया और तुम्हारी आंखों में अपने लिए प्यार देखा लिया था तो ऐसा कर जाना मेरे लिए कौन सी बड़ी बात होती ? तब बेखुदी में तुमसे लिपट कर तुम्हे और जी भर चूमती... प्यार करती। यदि तुम छुड़ाने की कोशिश भी करते तो मैं तुम्हें छोड़ती ही नहीं। और फिर कितनी देर तक तुम रोक पाते खुद को या मुझे ?  तुम्हारे अंदर ऐसी आग पैदा कर देती इसमें तुम स्वयं पतंगे की तरह जलकर मेरे अस्तित्व में खो जाते। तब शायद तुम इतनी आसानी से मुझे छोड़कर तो न जा पाते ?
     लेकिन होश में थी न, मंगल चाचा के सामने लज्जा रूपी आभूषण को कैसे उतर देती। अट्रैक्शन का साइंटिफिक रीज़न तो हो सकता है लेकिन प्रेम का नहीं। यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है और वह मन तुम थे। कुछ लोगों को कहते सुना था, आज भी मैगजीन में कभी-कभी पढ़ने को मिल जाता है कि प्रेम रूपी आध्यात्म की परिणित सेक्स है। फिर मैं तो बहुत छोटी सी जगह में रहती हूँ, ऐसी विचारधारा रखने वाले काम ही लोग मिलते हैं। कह लो न के बराबर। लेकिन तुम तो आजाद पंछी हो, एकदिन खुले आकाश में उड़ोगे, कहानियां भी लिखोगे। ऐसे न जाने कितने लोगों से मुलाकात होगी जो इस घटिया सोच पर यकीन रखते होंगे। 
     ऐसे लोगों से मेरी तरफ से एक सवाल पूछना, क्या सेक्स करते समय आंखों से आंसू निकलते हैं ? किसी की पीड़ा का एहसास होता है ? तो फिर प्रेम में क्यों होता है ? शारीरिक मिलन एक पड़ाव है न कि प्रेम का अंत। इंसान अपनी कमजोरी को सिद्धांत बना देता है। यदि आपका चित अर्थात मन स्थिर है, तो प्रेम की परिणीत कभी सेक्स नहीं हो सकता।
     इसीलिए मैंने लिखा यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है। यदि शरीर को आत्मिक सुख तक पहुंचना है तो उसे मन में प्रेम धारण करना होगा। केवल श्रृंगार ही नहीं करुण रस को भी शामिल करना होगा। तन भी उसी की तरफ आकर्षित होता है जिससे मन मिलता है। आखिर तन को भी तो आत्मिक सुख की जरूरत है। कहो गलत है क्या ? तुमसे नहीं पूछ रही हूँ तुम तो कह गए हो, "करुणा से उत्पन्न प्रेम, बहारों के मौसम में उत्पन्न प्रेम से कहीं अधिक स्थाई होता है..."
  और यही वजह है कि एक ही बेडरूम शेयर करने के बावजूद सत्य के प्रति मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं जागी थी। लेकिन तुम्हारे लिए जागी। हम दोनों उस पड़ाव को एक साथ पार कर शारीरिक मोह से मुक्त होते, और वास्तव में वहीं से शुरू होता हमारे प्रेम का आध्यात्मिक सफर।
    लोगों को अक्सर यह भी कहते हुए सुना है कि नारी का मन, उसका हृदय बहुत गूढ़ होता है, ये गलत है, भ्रामक है। तुम ऐसा समझने की भूल जीवन में कभी मत करना। यदि उसके जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति को थोपा जाए जिसे वह मन से पसंद न करे, और फिर उससे चरित्र की उम्मीद की जाए, क्या यह संभव है ? क्योंकि अंततः इस शरीर को भी आत्मिक सुख प्राप्त करने के लिए मन में स्थापित प्रेम की ही तलाश होगी।
संगमरमर - सा जिस्म लिए लोग यहां से फना हुए,
रूहों के ताजमहल अब उनके न होने पर हंसते हैं।
    अब तुम्हारे लिए लिखती हूँ, ईश्वर करें तुम जियो हजारों साल, तुम्हे लंबी उम्र मिले। तुमने कम उम्र में एक लड़की से प्यार किया, उसने भी तुमसे किया, लेकिन तुम दोनों ही एक दूसरे की जिंदगी में न आ सके। फिर युवावस्था में हम दोनों मिले। हमने भी एक दूसरे को चाहा, प्यार किया, नहीं मिल सके। मेरे जाने का समय भी हो गया है, तो अब कोई संभावना भी नहीं। लेकिन तुम्हारे पास एक विकल्प है, यदि तुम्हें सुखद सांसारिक और पारिवारिक जिंदगी जीनी हो तो ऐसी लड़की को अब अपने जीवन में महत्व देना जो तुम्हें मन से पसंद करती हो। यह मैं नहीं कह रही, इस सिद्धांत को तो एक युग पहले रुक्मणी और कृष्ण ने स्थापित कर के दिखाया है। सीधे से अर्थों में जो भूल सत्य ने की वह तुम कभी न करना। अब चलो टॉपिक चेंज करते हैं....
   मेरी इंटेलिजेंसी तो तुमने देखी है अब मेरे प्यार की इंतहा देखना चाहोगे ? तो देखो...
   होंगे वो कोई और जो प्यार में होंगे तेरे,
   मैं तो तेरे गम में शरीक होना चाहता हूँ।
    यह तुम्हारी कविता की दो लाइन है न, जो महुए के पेड़ के नीचे तुमने सुनाई थी ? आज भी याद है मुझे। तुम सोचते होंगे दो लाइन याद करने से क्या हो गया ? तो जान लो तुम्हारी सभी कविता मुझे उसी तरह याद है जैसा कि तुमने सुनाई थी। तुम एक बार सुना देते थे फिर मैं उसे मन ही मन कई बार दोहराती थी जैसे एक बच्चा एग्जाम के समय किसी प्रश्न के उत्तर को रटता है। क्योंकि मैं जानती थी कि उस समय तुम बस सुनाते जा रहे थे, लिख तो नहीं रहे थे। वह सभी तुम्हारी अमानत थी, कैसे छोड़ देती ? वे सभी इसी नोटबुक के पीछे लिख कर जा रही हूँ।
   इस पेड़ के नीचे तुमने कीट्स की व्हेन आई  हैव फियर के हिंदी अनुवाद की कुछ लाइन सुनाई थी। मुझे नहीं मालूम था, कि यह पोयम किस बुक में मिलेगी तो फिर मैंने कीट्स की सभी पोएट्री बुक्स बॉम्बे से उसी पब्लिशर को फोन करके मंगाई थी जिसमें कभी पापा काम किया करते थे। वे सभी इसी संदूक में रखी हुई हैं, लेकिन जिसमें यह पोएट्री है, वह तुम्हारे लिए अलमारी में ही अलग से रख छोड़ी हैं। जो किताबें मैं तुम्हारे लिए अलग से रखी हैं, वह सभी सत्य को मालूम है। उसी से पूछ लेना या फिर खुद ही ढूंढ लेना।
    कुछ कविताएं भले ही स्कूल के समय पढ़ी थी। सिलेबस में होने के कारण कई बार पढ़ते-पढ़ते कुछ कविताएं याद हो जाती थी और कुछ को याद करना पड़ता था। लेकिन जरा सोचो तुम्हारी कविताएं रट कर मुझे कौन,-सा एग्जाम पास करना था ? तो फिर क्यों सुग्गी की तरह रटतो थी। क्योंकि मुझे तुमसे जुड़ी हर चीज से मोहब्बत थी, है और रहेगी। शायद इसीलिए अब मुझे उस लड़की से भी कोई जलन नहीं जो तुम्हारी जिंदगी में पहली बार आई थी।
    यह है मेरे प्यार की इंटेंसिटी। हर रिश्ते में प्रेम का कुछ न कुछ अंश होता है। चाहे वह दोस्त हो या फैमिली मेंबर हो। लेकिन जिसके लिए प्रेम की तीव्रता सर्वाधिक होती है वह या तो ईश्वर होता है या फिर प्रियवर। और इस तरह से तुम मेरे प्रिय भी और मेरे इष्ट भी।
     सच कहूं तो यह बातें मुझे उस समय इतनी शिद्दत से महसूस नहीं हुई थी जब तक तुम मेरे करीब थे। जैसे ही तुम मुझसे दूर गए तब मैंने समझा कि मेरे जीवन से क्या चल गया। महसूस किया जैसे कोई दिल की धड़कन हीं चुरा ले गया। महसूस किया जैसे कोई मेरे होठों की मुस्कान छीन ले गया। महसूस किया जैसे मेरी आंखों ने कोई सजीला स्वप्न खो दिया। महसूस किया जैसे मेरे जीवन से कोई मुझे ही चुरा ले गया।
    आज यह भी सोचती हूँ कि मेरे मन की पीड़ा, दिल की बेचैनी और आंखों के सूनेपन को क्या बाबा और सत्य ने कभी न पढ़ा होगा ? तो फिर मंगल और कमली ने हर दिन क्यों पढ़ा, और मुझे क्यों दिलासा देते रहे ? 
     तुम्हारी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर याद आती है, उनमें से एक जो तुम मुझसे कह कर गए थे कि कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद की जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं... यही आज मेरे जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। शायद इसलिए कि तुम मेरे जीवन का एक ऐसा भ्रम थे जो सत्य रूपी यथार्थ की धरातल पर आकर जीवंत हो गया। एक ऐसा सत्य जो आज मेरे पूरे वजूद को, मेरी जिंदगी को झूठा साबित कर गया। तुम उस अधूरे नशे की तरह थे जिसकी खुमारी उतारने के लिए मैं सुबह पी भी न पाई, और उसी खुमारी को लिए मैं अब तक भटक रही हूँ। आज सोचती हूँ तुममें ऐसी कौन सी बात थी जिसे याद करके मैं दिन-दिन भर सोचती रहती हूँ, भटकती रहती हूँ। तुम्हारी तलाश में बगिया जाती हूँ, लगता कि तुम आम के पेड़ की छांव में उसी जगह बैठे हो, मेरे इंतजार में...
     लेकिन बाबा ने दुनिया छोड़ने से कुछ क्षण पहले मुझसे कहा था कि मैं शोक न करूं, तुम एक न एक दिन लौट कर आओगे। तुम्हारी नियति तुम्हें यहां लेकर आएगी। सत्य बाबा से दूर था, उसने कुछ स्पष्ट नहीं सुना होगा तभी तो उसने पूछा, बाबा किसके आने की बात कर रहे हैं। मैने बात टाल दी, "... मंगल को याद कर रहे हैं, जाओ बोला दो, शायद बाबा के प्रस्थान का समय...", फिर मैं रो पड़ी।
     सत्य के जाने के बाद बाबा ने अपनी पेटी की तरफ इशारा करते हुए कहा था, "पीहू जाते समय उसने तुम्हारे लिए कुछ लिखा था... मुझे दे कर गया और कहा था कि पहले मैं खुद पढ़ लूं, फिर यदि उचित लगे तो तुम्हे दे दूं... लेकिन आज तक उसे पढ़ने की मेरी खुद की हिम्मत न हुई... वो उसी तरह संदूख की ऊपरी रैक में पड़ी है... जल्दी निकालो उसे... पढ़ो मैं मरने से पहले सुनना चाहता हूँ... जल्दी करो... मेरी सांसे टूट रही हैं..."
   उस समय मेरे लिए ये सब अजीब-सा लग रहा था। मैं कभी बाबा को तो कभी संदूक को देखती। बाबा ने फिर कुछ तेज आवाज़ में कहा, "पीहू !!! देखो जल्दी करो... सत्य के आने से पहले उसे पढ़ो..."
   मैंने उनके कहे अनुसार तुम्हारी लिखी हुई कविता ले कर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ गई। पढ़ने की हिम्मत तो मुझे खुद भी नहीं हो रही थी... न जाने तुम क्या लिख कर गए होंगे ? मन में अजीब सी बेचैनी उठने लगी... पढ़ने से पहले ही आंखे भर आने तो थी... लेकिन पढ़नी तो थी न...? तो फिर मैने
पढ़ा...

है मोहब्बत तेरी रूह से, 
जा तुझे छोड़ दिया।
नजर की इकरार-ए-वफा,
जा तुझे छोड़ दिया।

      मुश्किल से ये कुछ शब्द पढ़ पाई और आवाज़ रुक-सी गई। हृदय सागर से उठी न जाने कितनी लहरों ने इन आंखों के रास्ते अख्तियार किए। मन में भूली बिसरी यादों के न जाने कितने तूफान उठे। शरीर के रोम-रोम में पीड़ा का एहसास हुआ। मैं भी उन्हीं रास्तों से गुजर रही थी जिन रास्तों से शायद तुम लिखते वक्त गुजरे होंगे। बाबा का कांपता हुआ दाहिना हाथ मेरे सर पर था... अब इससे अधिक क्या लिखूं... बस उस वक्त मैं रोती जा रही थी... और पढ़ती भी जा रही थी... 

इस दिल की अधूरी दास्ताँ है तू, 
जा तुझे छोड़ दिया।
बुझा इस दिल से तेरी यादों का दिया,
खुद को स्याह रातों के हवाले किया।

     बस यहीं पर मेरी सब्र का बांध टूट गया। मैने रोते हुए बाबा से कहा, "बाबा... अब नहीं पढ़ी जाती... ये पोयम अपने मुझे पहले क्यूं न दी... हां बाबा पहले क्यूं न दी..."
    बाबा ने मजबूत किंतु धीरे आवाज में कहा, "और भी हो तो पहले पूरा पढ़ो... फिर सब बताता हूँ..."
     मैने आगे पढ़नी शुरू की...

  दर्द-ए-इश्क अब इंतहा हो गई,
  लगा गले जा तुझे छोड़ दिया।
  ऐसी मोहब्बत ना हो अब किसे से,
  सजदें कर जा तुझे छोड़ दिया।
  तू आखिरी लब्ज़ है मेरी कहानी के,
  लिख कर जा तुझे छोड़ दिया....

   मै उसी तरह रोती जा रही थी... बाबा का हाथ बराबर मेरे सर को सहलाता रहा। जब कुछ देर बाद भी मैं शांत न हुई तो बाबा ने मुझे समझाते हुए कहा, "पीहू ! अब चुप हो जा... अब जाते हुए मुझे और शर्मिंदा मत कर... माफ कर अपने बाबा को... ग्रह-नक्षत्र, कुंडली, हाथ की रेखा इन सब को जीवन में बड़ा स्थान दिया। मैं समझ गया था कि उसने जरूर कुछ ऐसा लिखा होगा जिसे पढ़ने के बाद मेरा भी मन कही विचलित न हो जाए... इसलिए न तो खुद पढ़ा और न ही तुझे पढ़ने के लिए दिया... लेकिन मैं एक बात को भूल गया था कि प्रेम की ऊर्जा असीमित होती है, यह वह भाव है जहां ईश्वर के नियम भी बदल जाते हैं... उसने जिन संवेदनाओं और अनुभूतियों से गुजरते हुए अपने हृदय की पीड़ा लिखी होंगी वो कभी खाली नहीं जाती... उसके शब्द हम दोनों को मजबूर कर देते... इसलिए मैंने पहले भी तुमसे कहा है और आज फिर कहता हूँ या तो तुम उसे बुला लेना या फिर अपनी किस्मत समझ सत्य के साथ विवाह कर लेना... और ध्यान रखना यह उसकी आखिरी इच्छा थी कि ये कविता सत्य के हाथ न लगे... 
   और फिर बाबा चले गए। मैं उसी तरह गुमसुम बैठी रही। आंखों के आंसू सूख चुके थे, और दिल के दर्द अब दिल की धड़कन बन धड़क रहे थे। बाबा का हाथ मेरे सर पर न रहा। सत्य के पहुंचते ही मैने काग़ज़ का वह टुकड़ा ठीक उसी जगह रख लिया जहां कभी तुम्हारी माइलस्टोन के लिए लिखी कविताएं, माचिस की डिबिया और सिगरेट का पैकेट छुपाया था। उस दिन सचमुच दिल जल गया था।
    सच लिखती हूँ, तुम्हारे जाने से एक मिनट पहले भी यदि यह पोयम मुझ तक पहुंच गई होती तो मैं तुम्हें नहीं जाने देती... चाहे उस शाम मुझे सब के सामने तुम्हे अपनी कसम ही क्यूं न देनी पड़ती... मैं देती और तुम्हे रोकती... तुम होते तो फिर सब सही हो जाता। और ये क्या लिख के गए तुम ? 
     बुझा दिल से तेरी यादों का दिया,
     खुद को स्याह रातों के हवाले किया।
     क्या मैने तुम्हे इसी दिन के लिए समेटा था... सहेजा था... कि एक दिन फिर यूं ही टूट के, बिखर के चले जाओ...? तो फिर लो मेरे दोस्त ! आज तुम्हारी यह कविता तुम्हारे ही हवाले कर मैं अब इस दुनिया से जा रही हूँ... तुम्हारा यह इस्तीफा नामंजूर है मुझे। लेकिन कहती हूँ... फिर से मत बिखरना।
    तुम्हें याद है, इसी अटारी में जब बाबा से मिलने से पहले तुमने मेरे पांव दबाए थे... और मैंने अधिकार पूर्वक दबवाये भी थे...? जरा तुम सोचना किस अधिकार से...? सचमुच उस शाम मेरे पांव दर्द कर रहे थे। मोहब्बत की राहों में तुम्हारे साथ चलते-चलते शायद मैं कुछ थक-सी गई थी। और सच पूछो तो इसीलिए पत्र के शुरुआत में मैने लिखा था कि तुम गए भी तो अपना कर्जदार बनाकर... अब मुझे उस कर्ज की अदाएगी तो करनी होगी न ? लेकिन इसके लिए तुम्हें अब वहीं आना होगा, जहां कालचक्र से परे, प्रेम रूपी सरिता के सतत निर्मल प्रवाह में, दो किनारों पर खड़े हम दोनों, एक दूसरे से दूर ही सही किंतु अनुराग-अभिसिंचित जल तरंगे हमारे कदम चूमे। 
    मैं यह भी जानती हूँ यदि तुम यहां आए तो इस बुक की तलाश जरूर करोगे। सच, किसी के डर से ये सब पेटी में छुपा कर नहीं रख रही हूँ। बल्कि इसलिए कि यह सुरक्षित रहें और तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंच जाए। फिर तुम्हारी इच्छा जिसे चाहो पढ़ा देना, लेकिन पहले तुम पूरा पढ़ना। क्योंकि जब ये पत्र तुम्हें लिख रही हूँ मुझे भी अपनी मृत्यु अर्थात देह त्याग का पूर्वाभास हो चुका है। मेरे न रहने के बाद दुनिया के रीति-रिवाज के अनुसार इस घर को शुद्ध किया जाएगा। तब खासकर मेरे कपड़े मेरी चीजे या तो दान कर दी जाएंगी या फिर उन्हें गंगा या नर्मदा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। लेकिन मेरी बुक्स और मेरी यह पेटी रहेगी। 
    और यदि सत्य लौट के आया भी तो उन्हें कभी अपने से दूर नहीं होने देगा। मुझे मालूम है कि उसे इन बुक्स को पढ़ने में कोई खास रुचि नहीं है, फिर भी मेरी बुक्स को वह संजो का रखना चाहेगा। क्योंकि वह जानता है कि मुझे इनसे कितना लगाव है। और वैसे भी यहां बुक्स को जलाना या जल में प्रवाहित करना पाप समझा जाता है...
   अब किसी को जो और जैसे समझना हो समझे, कोई परवाह नहीं। मैंने तो किसी के साथ कोई छल नहीं किया, सिवाय तुम्हारे। सभी वादे और वफाएं निभाईं। अब स्वीकार करती हूँ, छले तो तुम गए। कभी किसी ने छोड़ देने की शर्त के साथ तुम्हें अपनाया और मैने खामोशी से उसी शर्त को पूरा किया। 
    जब तुम्हें याद करते हुए तुम्हारे लिए बुक्स अलग रखती या फिर तुम्हारी टी-शर्ट पहनती तो सत्य
धीरे से मुस्कुरा देता। एक दिन उसने कहा, मैं ही तुम्हें याद करती हूँ, तुम कभी नहीं करते होगे। फिर एक दिन उसने यह भी पूछा, "पीहू मेरे ख्याल से उसे तुमसे प्यार हो गया था... तुम्हे क्या लगता है ?"
   देखो तो कितना विरोधाभाषी और गलत सवाल किया था उसने। उसे तो यह पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं। लेकिन नहीं, उसने नहीं पूछा, क्यों ?  कभी उसने तुम्हारी राइटिंग स्किल देखने के लिए मेरे लिए एक प्रेम पत्र लिखवाया था। क्या उसने कभी पढ़ा या मुझे पढ़ने दिया ? याद करो मैं पढ़ती उससे पहले ही भूख लगने की बात कह के कैसे टाल गया था ? और यदि उस रात तुमने मेरे आई लव यू का जवाब आई टू के रूप में न दे मुझे नशे में समझ कर मेरे साथ कोई गलत हरकत करने का प्रयास किया होता तो दूसरे दिन मैं भी उसे पढ़ने की कोशिश न करती, या यूं कह लो फिर तुमसे मिलने की कोशिश ही न करती। 
      तुम वहीं बगिया में पड़े रहते। यदि घर आते भी तो भोजन करा के तुम्हे विदा कर देती और तुम चले जाते। न मैं तुमसे प्यार जताती और न ही उस रात की कोई याद दिला कर तुम्हें शर्मिंदा करती। लेकिन हां इस दिल से जरूर उतार देती। जब मैने तुमसे पत्र पढ़वाया तो तुमने बिल्कुल सहज भाव से पढ़ा। मुझे विश्वास ना हुआ, क्या वह यही आवाज है, जिसमें तुम अपने दिल की बात कहते हो, अपनी कविता पढ़ते हो ? मैं फौरन समझ गई कि तुम खुद को सत्य के रास्ते अलग रख, अपनी फिलिंग्स छुपा के चुपचाप चले जाना चाहते हो। लेकिन मुझे तो सच जानना था न, वो भी तुम्हारे मुख से उसी आवाज में, उसी इंटेंसिटी के साथ। तो फिर मैने तुमसे एक्टिंग करने के लिए कहा। तुम्हें अपनी नज़दीकियां दी, तुम्हे गले से लगाया, तुम्हारे हर शब्द में रोई और खुद भी स्वीकार किया। सच पूछो तो तुम्हे कुरेदा, तुम्हे मजबूर किया कि तुम मुझसे अपने दिल की बात कह सको। लेकिन नहीं तुमने तो मेरे भी दिल की बात कह दी। 
    जब तुमने मुझसे कहा कि मेरी आंखों में उस दिन तुमने न तो सत्य को देखा और न ही खुद को। दिखाई दिया तो एक सुनापन... एक प्रतीक्षा... एक इंतजार जो एक लम्हे की थी। तुमने कितनी आसानी और बेबाकी से मुझसे कह दिया कि मुझे सत्य से प्यार नहीं था, और न ही आज है। हां मैं उसे प्यार करने की कोशिश करती रही लेकिन कभी कामयाब नहीं हो सकी।
   और खुद के लिए कहा, "चला जाता पीहू ! यदि मैं भी कोई नादान लड़का होता तो जरूर चला जाता। तुम्हारी आंखों में, तुम्हारे आचरण में यदि मैंने खुद के लिए प्यार न देखा होता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, और सच मानो तो किसी क्रम से परे पूरी इंटेंसिटी के साथ है। मैंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति तुम्हारे सच्चे, निःस्वार्थ और लालच रहित प्रेम को महसूस करने के बाद ही की...."
    बस यह दो प्रमुख बातें थी जिसे सुन लेने के बाद
खुद के विजेता होने का भ्रम टूट गया। अभी तक तो मैं समझती रही कि मैंने तुम्हें कुरेदा, प्रेम अभिव्यक्ति के लिए तुम्हे मजबूर किया। लेकिन तुम तो कभी मजबूर थे ही नहीं, बस मुझे एहसास दिलाते रहे कि हां तुम मजबूर हो। तुमसे ही सीखा कि अपने प्रिय के प्रेम में सब कुछ हार जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है।
   लेकिन मैं तो उस समय की बात कर रही थी जब खुद के विजेता होने के भ्रम में थी। मैंने तुम्हें कुरेदा क्योंकि पहली नजर में ही पत्र में मेरे प्रति लिखी तुम्हारी प्रत्येक भावनाएं सच लगी, क्यों ? क्योंकि लिखी गई प्रत्येक भावना को तुम पहले ही मुझसे स्वीकार कर चुके थे। मैने उन्हें केवल शब्दों में नहीं तुम्हारे चरित्र में महसूस कर लिया था। इसलिए लिखती हूँ, अब कर लो सत्य से अपनी तुलना। दावा है, उन्नीस नहीं बीस ही पाओगे खुद को। 
    तुमने मेरे प्रति जो महसूस किया तुम कह गए लेकिन मैंने उसे जताया, पूरे मन से स्वीकार भी किया लेकिन तुम्हे रोक न पाई, क्यों ? जिंदगी में कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद इसलिए कि उनके जवाब भी एक सवाल ही होते है..." 
      मैंने भी इन तीन वर्षों में खुद से बहुत सारे सवाल किए हैं। मैं अक्सर पहले सत्य को क्यों अजनबी कहती रही ? क्या मेरे जीवन में किसी अजनबी का आना मेरी नियति थी, जिसका पूर्वाभास वह मुझे पहले से कराती रही ? क्या बाबा को मेरी असमय और गुमनाम मृत्यु का आभास पूर्व में ही हो चुका था ? क्या उन्हें मालूम पड़ गया था कि मेरी चिता को आग देने वाला भी कोई नहीं होगा और इसलिए उन्होंने सत्य को मेरे पति के रूप में पहले से ही निर्धारित कर दिया ? 
     पति ! मेरे जीवन में बाबा द्वारा निरूपित एक ऐसा रिश्ता जिसे बाद में ही सही मैंने अपनाने की कोशिश पूरी इमानदारी से की। यह सच है कि उसको लेकर पहले मेरी मन में जिज्ञासा थी। यह लड़का कौन है और यहां क्यों खड़ा रहता है ? क्या यह मेरे लिए आता है ? फिर धीरे-धीरे महसूस हुआ कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, शायद यह तो इसका जॉब है। पहली मुलाकात में मैंने महसूस किया कि वह एक अच्छा इंसान है। दुनियादारी से कुछ दूर सच्चा और इमानदार। उसमें ऐसी बहुत सी विशेषताएं हैं जो एक अच्छे पति में होनी चाहिए, लेकिन मेरा ध्यान उसके अंदर ऐसी किसी भी विशेषता की ओर नहीं गया।  क्योंकि मैंने तो विवाह न करने का फैसला पहले से ही कर लिया था। लेकिन हां, वह एक अच्छा दोस्त बन सकता था और मैंने उसे पहले इसी रूप में स्वीकार किया। पूरी ईमानदारी से लिखती हूँ और जैसा कि तुम भी मानते हो, मैंने सत्य को प्यार करने की कोशिश की। मैं उससे शादी न भी कर पाऊं तो कम से कम उसे प्यार तो कर लूं, लेकिन नहीं कर पाई, क्यों ? यह सवाल मैंने भी खुद से कई बार पूछा था और जिसका जवाब जिंदगी ने मुझे तुमसे मिला कर दिया। मेरी अंतरात्मा को, मेरी इन नजरों को प्रतीक्षा तो उस एक लम्हे की थी जो तुम थे, तो फिर प्रेम उससे कैसे हो जाता ?
    यकीनन इसीलिए बाबा द्वारा रिश्ता बना देने की बाद भी मैंने उसे एक लिमिट में ही अपनाया। मैं उसके साथ खुद को समय देना चाहती थी और जानना चाहती थी कि क्या कभी मैं इसे प्यार कर पाऊंगी या नहीं। और सच पूछो तो तुम्हारे आने के पूर्व ही मुझे इस बात का आभास हो चुका था कि सत्य का मेरी जीवन में क्या स्थान है। इसलिए लिखती हूँ, तीसरे इंसान होने का गिल्ट तुम अपने मन में कभी मत पालना। 
    मेरे जीवन में तुम्हारा आना कई मायनों में मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। मैं केवल इसलिए नहीं कह रही हूँ कि केवल तुम्हारी हॉबीज तुम्हारा इंटरेस्ट मुझसे मैच करता था और लिटरेचर में रुचि ही हम दोनों के बीच आकर्षण का एकमात्र केंद्र था। प्रमुख केंद्र था हमारे विचारों का मिलना। आपस में हमारे दृष्टिकोण का मिलना। तुम जितने भावुक थे, उतने ही प्रेक्टिकल। तुम्हारे व्यक्तित्व में इन दोनों का गजब का समन्वय और सामंजस्य था। जैसे कि पहली नजर के प्यार में तुम भी विश्वास नहीं करते थे और न ही मैं करती थी। प्यार तो उस व्यक्ति से होगा जो तुम्हारी सोच, तुम्हारी विचारधारा, तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारी अभिरुचि से मेल खाता हो। तब तुम पूरी इंटेंसिटी के साथ उसे स्वीकार भी करोगे। 
    ये बातें जब पहली बार तुमने मुझसे कही तो सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन जब बात की गहराई तक पहुंची तो समझा कि इसमें गलत क्या है, यह तो बहुत नैचुरल है। प्रत्येक इंसान ऐसे ही व्यक्ति की चाहत तो अपनी जिंदगी में करता है। फिर तुम्हारा मुझसे कहना कि कभी-कभी हम जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं। फिर उसके ही अस्तित्व में हम अपनी तलाश करते और जहां हम खुद को कभी नहीं पाते हैं। ठीक उसी पल मुझे अपनी सभी शंकाओं का समाधान मिल गया। मैं समझ गई थी मुझे किसको किस स्थान पर रखना चाहिए।
     याद करो हमारी मुलाकात का तीसरा दिन जब इसी अटारी में तुम्हारे बार-बार रोकने पर सत्य ने भावुकता में आकर मुझे और खुद को श्रापित कर लिया था। तब भी मैंने किसी भी भावुकता के अधीन हो उससे कोई रिश्ता नहीं स्वीकार करना चाहा था, लेकिन नहीं बीच में तुम फिर कूद पड़े। फिर बाद में पता चला कि तुम तो मुझे उसके साथ विवाह के लिए तैयार भी करने वाले थे। लेकिन इस बारे में मैंने तुमसे कोई अधिक बात नहीं की, जानते हो क्यों ? क्योंकि यह सब को-एक्सीडेंटल हुआ। तुम कहीं से दोषी सिद्ध नहीं हो रहे थे। यदि होते तो उसी दिन तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर तुम्हें एक थप्पड़ मारती और कहती, "कौन होते हो मेरी जिंदगी का फैसला करने वाले... यदि यह जिंदगी मेरी है तो यह फैसला मैं ही करूंगी न कि तुम। किससे प्यार करूं और किससे शादी करूं..." और यह भी पूछती, "क्या किसी को प्यार करना या न करना हमारे बस में होता है...? मैंने तो तुम्हें प्यार नहीं करना चाहा था फिर तुम से ही क्यों हो गया, बताओ...?"
    तुम्हारे सामने सत्य के लिए परेशान होना, बेचैनियां दिखाना, नजदीकियां बढ़ाना इन सबका एक ही कारण था, यह देखना कि इन सब का असर तुम पर क्या होता है ? लेकिन तुम तो बस मुस्कुरा के रह जाते थे। एक महान अभिनेता की तरह अपने मन के सभी भावों को छुपा ले जाते थे। मैं तुम्हारे अंतर्मन को पढ़ना चाहती थी, और हुआ क्या ? धीरे-धीरे तुम मेरे अंतर्मन को पढ़ते चले गए। उसके बाद अपने शब्दों से मेरी जो तस्वीर तुमने बनाई वह मेरे लिए खुद एक नई पीहू की तस्वीर थी। 
   उस रात जब सत्य बाथरूम में था और मैं अटारी के नीचे वाले हॉल के फ्यूज बल्ब को चेंज करने आई थी। तुम और ज्ञान भैया अटारी में मुझे ले कर आपस में बातें कर रहे थे। जिज्ञासा से मैं दबे पांव सीढ़ी के पास खड़ी हो गई थी। नीचे अंधेरा होने से तुम लोगों का ध्यान मेरी तरफ नहीं गया। लेकिन मैने उस रात सब कुछ देखा और सुना। तुमने ज्ञान भैया से वादा किया कि तुम कभी देवदास नहीं बनोगे। जब तुम पोएट्री बुक में पैसे और अपनी पोयम के पन्ने दबा रहे थे। उस रात मैने तुम्हारे चेहरे को ध्यान से पढ़ा था, तुम्हारे दिल की हर एक फिलिंग तुम्हारे चेहरे पर लिखी थी। 
   ज्ञान भैया को मेरे और सत्य के बीच प्यार को ले कर शंका थी और तुमसे उन्होंने कहा भी था कि वे मुझसे बात करेंगे, लेकिन तुमने रोक दिया। फिर सत्य की फैमिली के बारे में तुम्हे बताया, सुनकर मुझे भी आश्चर्य हुआ था। लेकिन अगले ही पल उन सबका बिहेवियर मुझे याद आया। मैं तो इन सब से दो महीने पहले ही मिल चुकी थी न। सभी को मेरा बैकग्राउंड और मेरी प्रॉपर्टी की जानकारी लेना महत्वपूर्ण लगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि मुझे क्या पसंद है और क्या नहीं। सच लिखती हूँ, उस पल भी सत्य के प्रति मेरा यकीन नहीं डगमगाया। मुझे उसकी मित्रता पर पूरा भरोसा था। हो सकता है उसके घर वाले इस विचारधारा के हों लेकिन उसको मैंने इस विचारधारा से मुक्त ही रखा था।
    बस उसी एक पल में मुझे वो मिल गया जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी। मुझे विश्वास हो गया, ज्ञान भैया न सही लेकिन एक न एक दिन तुम खुद ही मुझसे स्वीकार करोगे। उस रात सीढ़ी से उतरते हुए मैंने नशे में किसी व्यक्ति को या किसी मित्र को सहारा नहीं दिया था, बल्कि उस व्यक्ति को दिया था जिसे मैंने सर्वस्व मान लेने का इरादा कर लिया था। लेकिन इतनी जल्दी नहीं, मुझे तो तुम्हारे बारे में अभी बहुत कुछ जानना था, समझना था। मैंने कहा न पहली नजर के प्यार पर मैं विश्वास नहीं करती और इसीलिए मैंने उस दिन कहा था, "जब चढ़ेंगे तो यह अंतिम पायदान ही पहला पायदान होगा। मित्रता के आखिरी पायदान पर तो हम पहुंच ही चुके थे न ?
     हां मेरे प्रियवर, वहीं से शुरू हुआ था मेरे प्यार का सफर, जिसे कुदरत ने तुम्हारे आने से पहले ही निर्धारित कर दिया था। एकदिन हम दोनों प्यार की सीढ़ी के सभी पायदान को पार कर इसी अटारी पर पहुंचे, जहां हमने एक साथ एक ही आईने में अपने चेहरे देखे। अंतिम बार तुम्हें गले लगा कर रोई। तुम्हारे कदमों में बैठ कर बाबा से अनजाने में हुए किसी भी गुनाह की मन ही मन ऊपर वाले से छमा याचना की और तुमसे मांगा कि तुम एकबार ही सही फिर यहां लौटकर मेरे लिए आओ...
    अंत में... तन्हा तुम्हे उन्हीं सीढ़ियों को उतरते हुए देखा और मैं प्यार की ऊंचाइयों में अनिमेष खड़ी बस तुम्हे उतरते हुए देखती रह गई। क्या कभी तुमने किसी पहाड़ी की ऊंचाई पर खड़े इकलौते वृक्ष को देखा है, मैने देखा है। उसके दर्द और एकाकीपन को अब तक महसूस भी किया है... वो सब सुना जो स्वप्न की परछाईं न कह सकी। मन को शांति मिली और सहसा यकीन नहीं हुआ की पांच वर्ष पूर्व मेरे हृदय मेरे मन की बात कोई तुमसे कैसे कह कर चला गया। उस दिन यह भी महसूस किया कि तुम्हारे जीवन में प्यार एक ही बार आया क्योंकि दोनों बार तुम्हारी मुलाकात एक ही किरदार से हुई। कुछ अनकही रह गई थी शायद, जो एक दूसरे से तुम कह न पाए। वह तुमसे जो ना कह पाई मैंने कहा, और तुम जो उससे न कह सके वह मैंने सुना। 
     तुम्हे याद है वह कविता, तुमसे मिलकर चाहा है तुमको... थक शून्य पथ पर चलते-चलते ? तुमने छोटी-छोटी पर्चियों में माइलस्टोन के लिए जो कविताएं लिखी थीं, इसी नोटबुक पर पीछे लिखी हुई तुम्हें मिल जाएंगी। दो-तीन अपनी तरफ से लिखी हैं, जो उसके मन की बात तुमसे कह सके। समझ लेना यह उसका मुझ पर कर्ज था।
    तुम्हारे जाने के कुछ दिनों बाद जब मेरा मन स्थिर हुआ तो मैंने उसके बारे में सोचा जो तुम्हारे जीवन में पहली बार आई थी, और सच पूछो बहुत दूर तक सोचा। बिल्कुल निष्पक्ष, उसकी जगह पर खड़े होकर सोचा, तो समझ में आया कि वह किस दर्द से गुजरी होगी। नियति में तुम दोनों की कुछ अधूरी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए तुम्हें मेरे जीवन में भेजा। जहां तक तुमने अपनी कहानी मुझे बताई कि तुम दोनों गांव-घर, लोक-लाज के कारण कभी एकांत में मिल ही न पाए। अपने मन की बात एकदूसरे से पूरी तरह न कर पाए। और देखो, हम दोनों बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की तरह पूरे चार दिनों तक एकसाथ एकदूसरे के पास रहे। खूब हंसी-मजाक और मौज-मस्ती की। एकदूसरे से दिल की बात कही, एक दूसरे को गले लगा कर रोए भी। यह सब करते हुए हम कभी भी अपनी हद को पार नहीं की कर सके। इस दिल में हसरत होते हुए भी मैं तुम्हारे होठों को कभी छू तक न पाई। बात सिर्फ अपनी ही क्यों करूं, तुम्हारी भी क्यूं न कर लूं ? तुमने सिर्फ उन लम्हों को पूरा किया जो उसके साथ अधूरे रह गए। जो उसके साथ किया मेरे साथ रिपीट नहीं किया। दो उदाहरण देती हूँ। पहला, तुमने कभी केवल प्रेम भाव से मुझे गले नहीं लगाया जब भी लगाया तो मुझे दिलासा देने या फिर अपनी करुणा देने के लिए। दूसरा, पहली नजर में ही देखकर मुझसे प्यार न करना। बेशक तुमने मुझे अपनाया लेकिन खुद भी बिना किसी दाग धब्बे के तुम मेरी जिंदगी से चले भी गए। 
     तुमने मुझे यह भी बताया था की बिछड़ते समय तुम उसे गले लगा कर रो भी न सके, तो मुझे गले लगा कर रो लिया, मुझे दिलासा दे दिया। जो उससे एक बात कहना चाहते थे, वह मुझसे कह गए कि मैं तुम्हें बेवफा कभी नहीं समझूंगा। और उसके मन की बात मैंने तुमसे कह दी। तुम्हारे पैर छूकर तुमसे अपने लोगों के गुनाहों की माफी मांग ली, और तुम्हे चार बाते भी सुना दी। 
     सच पूछो तो आज मुझे समझ में आता है कि क्यों वह अक्सर एक ही आईने में अपनी सूरत के साथ तुम्हारी सूरत देखा करती थी ? शायद कुछ चेहरे, कुछ जोड़ियां आईने में ही कैद होकर रह जाने के लिए होती हैं। वास्तविक जीवन में उनका कोई सह-अस्तित्व होता ही नहीं। और देखो तो मैने भी वही किया !! आज मुझे उसके प्यार की इंटेंसिटी भी समझ में आती है। महसूस कर सकती हूँ कि किसी को अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जी लेने की उम्मीद के न होते हुए भी उसे ही चाहते रहने का दर्द क्या होता है ? 
    जब उस एक्ट को तुम्हारे साथ प्ले किया उस वक्त मैंने खुद को उसी लड़की के रूप में महसूस किया था। तुमसे लिपट कर रोने वाली लड़की पीहू नहीं वही थी, जिसने तुम्हारे साथ जिंदगी जीने के सपने देखे और उन्हें बिखरता हुआ भी महसूस किया। उस लड़के के दर्द को भी महसूस किया जिसे जिस्म नहीं जिंदगी जीने के लिए अपने प्यार का साथ चाहिए था, क्योंकि वह जिंदगी को गुजरना नहीं बल्कि जीना चाहता था।
     यह भी समझ में आया कि हम दो अलग-अलग होते हुए भी हमारी शख्सियत एक-सी थी। जिंदगी जीने के दृष्टिकोण एक थे, हमारी रुचि अभिरुचि और शायद तुम्हारे प्रति प्रेम की तीव्रता भी एक जैसी ही थी। नहीं तो इतनी सहजता से तुम मुझसे प्यार नहीं कर पाते। तुम समझ सकते हो कि मेरे लिए यह स्वीकार करना कितना कठिन रहा होगा लेकिन सच को स्वीकार करना चाहिए। यह भी तुम्हीं से सीखा। मेरे प्रीति तुम्हारे प्रेम की भावना उतनी ही निश्चल थी जितनी की उसके प्रति रही होगी। नहीं तो कोई इतनी सहजता से उस लड़की से मोहब्बत नहीं कर सकता था जो किसी के साथ एक ही बेडरूम शेयर करती हो।

     मैं यह सब बाते हवा में नहीं लिख रही हूँ बल्कि महसूस करके लिख रही हूँ। तुम्हारे स्थान पर यदि मैं होती तो मेरे लिए इतना सहज कभी नहीं होता। और दावा है कि यदि तुम्हारे स्थान पर सत्य होता तो उसके लिए तो नमुमकिन ही होता। 

    एक दिन तुमने मुझसे कहा भी था यदि मैं सत्य के साथ फिजिकल होती भी तो भी तुम्हारे प्यार में कोई कमी नहीं होती, और न ही तुम्हें कोई फर्क पड़ता। और मान लो कोई उच्चतम श्रेणी का वर्जिन है भी, लेकिन वह तुमसे प्यार नहीं करता है, उसे तुमसे मोहब्बत ही नहीं, कभी मन से तुम्हारा आलिंगन न कर पाए तो फिर ऐसी वर्जिनिटी का क्या करोगे तुम ? अचार डालोगे या किसी शोरूम में प्रदर्शनी के लिए रखोगे ? इसी थॉट पर मैंने एक छोटी सी कविता लिखी है, चाहे तो तुम माइलस्टोन में शामिल कर लेना,

दुनिया के प्रचलित पैमानों पर, 
जब उसने तुमको तौला होगा। 
हां तब तक थी तुम वर्जिन, 
उसने भी यह जाना होगा। 
लेकिन प्रथम आलिंगन के एहसासों को, 
भीगे-भीगे होठों के पहले-पहले चुंबन को,
किसने किस पैमाने से जाना होगा ?

     वर्जिनिटी तो टेस्ट की जा सकती है, उसे जांचा परखा भी जा सकता है। प्रचलित पैमानों  से काफी हद तक उसका अनुमान भी लगाया जा सकता है। लेकिन यदि तुमने किसी को अपनी बाहों में भरकर प्यार किया हो, उसके होठों को या माथे को चूमा हो, उसके गालों को प्यार से सहलाया हो, उसके रोने पर उसे गले से लगाकर खुद भी रोए हो, उसके आंसू पोछे हों, एकसाथ हंस हो, मुस्कुराया हो, तो फिर उन्हें मापने का पैमाना क्या होगा ? कोई उसकी माप कैसे करेगा ? दिल के शबनमी शर्मीले जज्बातों को, भौतिकता के किस तराजू में तौलेंगा ?

    यदि तुम कभी अजनबी लिखो तब मेरी तरफ से उसके लिए एक बात जरूर लिखना कि वह मुझे खुद से अलग न समझे। मुझसे नफरत न करें। मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी न समझे। क्योंकि नियति ने उसके कुछ अधूरे काम को पूरा करने के लिए मुझे तुमसे मिलाया था। और वह काम मैंने पूरी ईमानदारी से किया है। 
   मैं नहीं जानती कि वह दिखने में कैसी रही होगी। कद-काठी, रूप-रंग मुझसे मैच करता रहा होगा कि नहीं ? लेकिन एक बात तो है, तुम्हारे प्रति हम दोनों के प्रेम की इंटेंसिटी एक जैसी रही होगी। हम दोनों की कुछ आदतें और स्वभाव भी आपस में मिलते-जुलते रहे होंगे। मेरे व्यक्तित्व में कुछ हद तक तुम्हें उसका अक्स नजर आया होगा। तभी तो तुम सहजता से मेरे प्रेम को स्वीकार कर मेरे साथ अपनी जिंदगी जीने की चाहत को जागृत कर पाए होगे। नहीं तो क्या इन पांच वर्षों में तुम्हें कोई सुंदर लड़की न मिली होगी ? 
   उस दिन जब बेखुदी में मैं अपने आप में ही बड़बड़ा रही थी, जिन लम्हों की याद मुझे नहीं है। मेरे बहुत पूछने पर मंगल ने मुझे बताया था कि तुम कैसे तड़प गए थे जब मैने नशे में ही सही उसे भला-बुरा कहने और बद्दुआ देने की कोशिश की थी। तुमने मुझे हर उस वक्त रोका जब भी मैंने उसके खिलाफ बोलने की कोशिश की । आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं अपने उन सभी कहे की उससे माफी मांगती हूँ, और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उसे मेरी कोई बद्दुआ न लगे। वह जहां भी रहे सुखी वैवाहिक जीवन जिए। इसी में तुम्हारा भी सुख है, जैसा कि तुमने कहा था। 
    यदि मैं सत्य के साथ वास्तविक रूप से वैवाहिक संबंधों में हो गई होती और फिर तुम मुझसे मिलने के लिए आए होते, तो मैं तुम्हारा स्वागत कैसे करती और तुम्हे किस रूप में अपनाती ? यह मेरे जीवन का अधूरा काम है, जो अब उसे पूरा करना होगा। यह उस पर मेरा कर्ज है जो उसे चुकाना होगा।
     अब तुम दोनों के लिए इस हृदय से, सच्चे मन के साथ यही दुआ निकलती है, अलग-अलग ही सही तुम दोनों खुश रहो, तुम दोनों सदैव के लिए एक दूसरे के हृदय में स्थापित रहो। 
   अब मैं अपनी कहानी में लौटती हूँ। मैं बात करती हूँ उन दिनों की जब सत्य मेरे जीवन में था और तुम जा चुके थे। एकदिन उसने व्यंग्यात्मक और उलाहना भरे लहजे में कहा, "पीहू ! हमारे रिलेशन को तीन साल होने को हैं... लेकिन तुम न तो मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो रही हो और न ही अपनी सहमति देती हो ? शायद अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं...?"
   जानते हो, उस दिन मैंने तुम्हारी ही टी-शर्ट पहन रखी थी। उसे गौर से देख कुछ मुस्कुराते हुए उसने व्यंग्यात्मक लहजे में आगे पूछा, "प्यार तो करती हो न मुझसे...?"
    अब मैं इतनी नादान तो नहीं थी कि उसके कहने के अर्थ को समझ न सकूं... उस शाम तुम पर पहली बार क्रोध जागृत हुआ। दिल में आया कि मंगल चाचा को साथ ले सीधे तुम्हारे घर पहुंच जाऊं और तुम्हारा गिरेबां पकड़ तुमसे पूछूं कि बताओ किसके लिए छोड़ कर आए थे तुम मुझे ? एक जो अब रहे नहीं, और दूसरा जो इतने सालों बाद मुझसे पूछता है कि बताओ तुम्हारे दिल में क्या है ? अरे तुम्हें कुछ पूछना था तो तुमने उसी दिन मुझसे क्यूं न पूछा, जिस दिन बाबा से मेरे और तुम्हारे बारे में बात की थी ?
    दिल में आया कि उसे सब कुछ सच-सच कह दूं। कह दूं कि हां तुमसे प्यार नहीं है, और जिससे करती हूँ, उससे कह चुकी। लेकिन तुमसे शादी न करने की एकमात्र वजह ये नहीं है। मरने वाली हूँ इसलिए नहीं कर रही, ताकि तुम किसी भी रिश्ते से मुक्त रहो, और शायद यह मेरा दुर्भाग्य है कि कुछ ज्यादा ही जी गई..."
   लेकिन बहुत कुछ सोच के रुक गई। मैं जानती थी कि वह ज्ञान भैया का बेस्टफ्रेंड है। मेरी कहे को वह न जाने किस रूप में प्रस्तुत करे। और फिर बात तुम तक पहुंची तो क्या होगा ? तुम इस अपराध बोध से ग्रस्त न हो जाओगे कि तुमने मेरी जिंदगी खराब की और फिर तुम न जाने कौन सा कदम उठा लो, क्या कर जाओ, मेरी होने वाली मृत्यु को तुम कही अपने सर न ले लो... उस पल पहली बार मुझे तुम्हारी भावुकता से डर लगा था।
    भावुकता !!! कभी तुमने ही कहा था कि भावुकता में लिए गए निर्णय जरूरी नहीं की सही साबित हों, लेकिन तुम खुद इस बात को कहां मानते थे। तो फिर आओ वह समय आ चुका हैं जब मैं अपना एक वादा पूरा करूं, शीरी-फरहाद की प्रेम कहानी सुनाने का वादा।
     यदि इस कहानी को कुछ देर के लिए सच मान लिया जाय तो यह कहानी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। लोग अक्सर इन प्रेम कहानियों की रूमानियत को बरकरार रखने के लिए उन तथ्यों को बाहर निकाल कर फेंक देते हैं जो हमारे लिए शिक्षाप्रद हो सकती हैं। लोग अक्सर यही समझते हैं, और उन्हें यही बताया जाता है कि फरहाद शीरीं को पहले से चाहता था। जबकि यह सही नहीं है। शीरीं से उसकी पहली मुलाकात उसकी शादी के बाद ही हुई थी।
    आर्मेनिया के बादशाह की बेटी शीरीं जो बेहद ही खूबसूरत और कला से मोहब्बत रखने वाली एक भावुक लड़की थी, उस पर ईरान का बादशाह खुसरो सम्मोहित हुआ। उसने शीरीं से विवाह करने की इच्छा जाहिर की। शीरीं को मालूम था कि उसके इंकार करने का नतीजा क्या होगा। बादशाह किस हद तक जा सकता है। तब उसने अपनी सुंदरता को लोक हित के लिए समर्पित कर दिया। शीरीं ने खुसरो का ये प्रस्ताव मान लिया। लेकिन उसके सामने लोकहित में एक शर्त रखी.अगर खुसरो पर्शिया के लोगों के लिए दुर्गम पहाड़ियों के बीच से दूध की नहर बनवाते हैं तो वह उनसे शादी करने को तैयार है. खुसरो ने यह शर्त स्वीकार कर लिया। इसके बाद ही शीरीं ने खुसरो से शादी की थी।
     नहर खुदवाने का काम खुसरो ने फरहाद नाम के एक इंजीनियर को दिया. जो वास्तव में एक इंजीनियर नहीं शिल्पकार था। जिसने एक से बढ़कर एक बेहतरीन नक्काशी की थी, मूर्तियां बनाई थीं। पहाड़ियां दुर्गम थी, उनके पत्थरों को काटकर नहर निकालना एक चुनौती भरा काम था। जिसे एक बुद्धिमान और कुशल शिल्पी की देख-रेखा में ही किया जा सकता था।
     बादशाह ने फरहाद को बुलवा कर शीरीं से मिलवाया ताकि उसकी सलाह पर फरहाद नहर की खुदाई करवा सके. तब खुसरो को कहां मालूम था कि वह अपनी पत्नी की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहा है जो सिर्फ पत्थरों को काटकर नहर ही नहीं निकल सकता बल्कि पत्थरों को तराश कर उन्हें शक्ल भी दे सकता है। कला से मोहब्बत करने वाली शीरीं की मुलाकात एक ऐसे कलाकार से हुई जो उसके लिए नहर का काम करने के लिए भी तैयार हो गया। वहीं फरहाद की मुलाकात एक ऐसी खूबसूरत और जहीन लड़की से हुई जिसने लोकहित के बारे में सोचा था। इसलिए कभी अपनी शादी की एक ही शर्त रखी। क्योंकि वह जानती थी की एक बादशाह ही वे साधन जुटा सकता है और इस कार्य को पूर्ण करने का जरिया बन सकता है। नहीं तो, यदि शीरीं को दौलत से मोहब्बत होती तो उसे कौन-सा पानी या दूध की कमी होने वाली थी, जो इस तरह की शर्त रखती ? इस तरह फरहाद शीरीं की खूबसूरती के साथ उसकी सोच से भी प्रभावित हुआ था और उसने इस लोकहित में शीरीं का पूरा साथ देने का फैसला लिया। लेकिन वह वास्तव में था तो एक कलाकार ही न ? उसने शीरीं की मूर्ति केवल अपने दिल में ही स्थपित नहीं की, बल्कि दुनिया के सामने भी प्रस्तुत कर दी। क्या गलत किया उसने ? 
   बस यही बात तो शीरीं के दिल को छू गई होगी, तभी तो उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ फरहद से मोहब्बत की। फरहाद ने शीरीं के लिए असंभव से लग रहे काम को पूरा किया। मैं नहीं मानती कि उसने कोई दूध की नहर निकाली होगी लेकिन ईरान में उस समय पानी की उपलब्धता किसी दूध से कम नहीं थी। इसलिए उस स्थान, समय और परिवेश में दूध को पानी का पर्यायवाची माना जा सकता है। उसका पति अर्थात खुसरो बादशाह था। उसके अहंकार को चोट लगी कि कैसे उसकी पत्नी एक मजदूर से मोहब्बत कर सकती है ?
     यदि उसने शीरीं की नजरों से ही फरहद को देखा होता तो उसे भी मजदूर के अंदर एक कलाकार नजर आता। कहानी का अंत भावुकता में हुआ। धूर्त और चालाक लोग जो हमेशा से एक अच्छे इंसान के साथ करते आए हैं, वही खुसरो ने फरहद के साथ किया। शीरीं की मृत्यु की झूठी खबर उस तक पहुंचा दी गई और जिसका परिणाम था फरहद की आत्महत्या। अपराध किसी और ने किया और अपराधबोध से ग्रस्त हो शीरीं ने भी स्वयं की हत्या की। 
   तो ? अब सच कहना, तुमने भी फरहाद की तरह मेरे दिल-ओ-दिमाग में चल रही कशमकश को पढ़ न लिया था ? तुम अच्छी तरह समझ चुके थे मेरे लिए वह लोकहित मेरे बाबा थे। तभी तो जाते-जाते अपने पूछे गए सवाल का जवाब तुम खुद ही दे गए। क्या कहा था तुमने,  "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है..."
    यदि तुमने जान लिया था कि मैं सत्य से प्यार नहीं करती तो फिर तुम किस प्यार की बात कर रहे थे ? तुमने ऐसा क्यो कहा, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका..."
     ऊपर और अंतिम के ये शब्द, "... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा...", मुझे गुमराह करने के लिए था न, ताकि मैं तुम्हारे कहे के अर्थ तक न पहुंच सकूं...? इन्हीं में उलझा के रह जाऊं...? तुम तो सिर्फ मुझसे इतना कहना चाहते थे, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका...", यहां पर प्रेम का कोई क्रम नहीं था। है न ? लेकिन शायद तुम भूल गए कि लिटरेचर जैसी जिंदगी तुम जरूर जी रहे थे लेकिन उस लिटरेचर को तो पढ़ मैं रही थी। तो फिर कैसे न समझ पाती ?
   इसीलिए मैंने तुमसे चलती हुई राहों में कभी कहा था कि तुम किसी शीरी के फरहाद मत बनना। भावुकता में आ कर कोई भी फैसला मत लेना। सामने वाले को अपने जैसा समझने कि भूल मत करना। पूरी दुनिया तुम जैसी नहीं है मेरे दोस्त ! लालच, प्रपंच और षड्यंत्र से भरी पड़ी है यह दुनिया। 
    ये कहानी तुमसे क्यों कही ? पहली वजह तो तुम समझ ही गए होगे, दूसरी मैं अब लिखती हूँ। तो जान लो मैं तुम्हारे जीवन की वही शीरीं हूँ। तथाकथित वैवाहिक संबंधों में रहते हुए तुमसे मोहब्बत की, उतनी ही तीव्रता से जितनी तीव्रता से तुमने की, और फिर तुम्हें अपनी नजरों के सामने ही मर जाने दिया तो अपराध बोध तो जागृत होगा न ? आखिर तुम्हारी हत्या करने वाले लोग कौन थे, जिन्हें मैंने अपना माना था, तो फिर मैं दोष-मुक्त कैसे हुई ? 
     तब खुद के होने से घृणा होने लगी। क्या मतलब प्यार की देवी बने रहने का। क्या अर्थ रह जाता है इन ऊंचाइयों का जहां अब तुम ही नहीं। उसी पल से मैंने अपनी उन्नति नहीं अवनति के बारे में सोचना शुरु किया। फैसला लिया खुद को मार लेने का। जिसकी शुरुआत थी प्यार की उस सीढ़ी से उतरना, जिसके एक-एक पायदान को चढ़ कर हम इन ऊंचाइयों तक कभी पहुंचे थे। धीरे-धीरे मुझे यह भी विश्वास हो चला कि जिस वादे को निभाने के लिए तुमने मुझे छोड़ा यदि मैं उसे पूरा करूं लूं तो मैं भी सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पहुंच जाऊंगी, जहां तुम फिर से मिल जाओगे। जब तुम पर आया क्रोध शांत हुआ तब मुझे तुम्हारी रिस्पेक्ट, एडजेस्टमेंट और रिस्पॉन्सिबिलिटी वाली थ्योरी याद आई। तब पति-पत्नी के इस अधूरे रिश्ते को मैंने पूर्ण करने का फैसला लिया, वह था सत्य को स-शरीर अंगीकार कर उसे अपने पति का दर्जा देना...
     इसी तरह जाड़ों के शुरुआत के ही दिन थे जब मैंने इसी अटारी को अपने मन मुताबिक सजाया। मन के लाखों अरमानो को सुहागसेज में बिखेर दिया। खुद भी दुल्हन की तरह सजी, गुलाबी साड़ी पहनी, माथे में सिंदूर लगाया और समय आने पर स्वयं को सत्य की बाहों के हवाले कर दिया। वह खुश था, उसने समझा होगा कि मैं अब उससे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा, क्यों...?
    मैं थी और सत्य था। केवल हम दोनों थे। उसकी बातें, उसकी हर एक छुअन मुझे उत्तेजित कर रही थी। सब कुछ उसी तरह हो रहा था, शायद जैसे एक नव-विवाहिता के जीवन में होता होगा। नई उमंग, नई चाहते, नए सपने, सभी कुछ जीवन में नया महसूस हो रहा था। हैरान थी, क्या यह वही सत्य है, जिसे अभी तक मैंने केवल अपना मित्र माना था, जिसकी बाहों में सर रखकर मैं बेखबर सोया करती थी ? तो उस दिन उसकी छुअन में जो मैं महसूस कर रही थी, पहले क्यों नहीं किया ? 
     कामोंत्तेजित शारीरिक सुख प्राप्त करने का एहसास भी अलग ही होता है मेरे दोस्त ! जहां इंसान दुनिया की सारी फिलासफी, सुख-दुख, दर्द, मोह, माया, बंधन, सभी भूल कर उस सुख की अनुभूति करता है। सच लिखती हूँ, उन पलों में, मैं तुम्हें भी भूल गई। लेकिन क्या पता था इस शारीरिक सुख को प्राप्त करने के सफर की शुरुआत जितनी महीन और नाजुक होगी, उसका अंत उतने ही तेज धमाके के साथ होगा...?
     वही सब कुछ मेरे साथ हुआ। चरमोत्कर्ष के बिंदु पर पहुंचकर मेरे मानस पटल के वृहद आकाश में एक धमाका हुआ। आसमान तेज रोशनी से भर गया। इस धमाके से असंख्य सितारे एक-एक कर बिखरते चले गए। इनमें से बेहद चमकदार सितारे धीरे-धीरे फिर इकट्ठा हुए। उनसे एक तस्वीर बनी, और फिर जो एक चेहरा उभर कर सामने आया उसे देख कर मेरे हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, शरीर बेजान-सा हो गया। 
     शेष बचे हुए सितारे टूट-टूट कर मेरी आंखों में ही समाते चले गए। मैने अपनी आँखें मूंद ली, बेजान जिस्म लिए पड़ी रही। कुछ क्षण बाद जब आंखे खोली तो वही सितारे मोती बन मेरी आंखों में चमक उठे। मेरे आंसुओं को देख सत्य ने सहानुभुति से मुझे खुद से लिपटा लिया, "सॉरी... फर्स्ट टाइम है न..."
     बस, उसी पल से मैने कुछ भी सोचना बंद कर दिया। तुम कब याद आए कब नहीं, अब नहीं लिख सकती। बस इतना लिखती हूँ, तुम्हारी तरह स्वीकार करने की हिम्मत अब शायद मुझ में भी आ चुकी है। कष्ट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, पीड़ा होती है। और यही पीड़ा जब सहनशक्ति से बाहर हो जाती है, तो इंसान चीखता है, चिल्लाता है, आंसू बहाता है या फिर बिल्कुल गुमसुम हो जाता है। उस दिन सोचा था कि मेरे पास तुम्हारी ऐसी कौन-सी धरोहर थी जिसके लुट जाने का मैं शोक मना रही हूँ ?  जिसकी चुभन और दर्द को महसूस कर मेरी आंखों में आंसू आ रहे है ? फिर भी आ रहे थे न ? क्यों ? 
     सच लिखती हूँ, उस रात का मन में कोई पछतावा नहीं, लेकिन कोई सुखद अनुभूति या सुनहरी यादें भी नहीं। क्यों ? क्या इसलिए कि जिससे मन मिले यदि उसी से शरीर भी मिले तो वो पल अविश्वमर्णीय होते हैं। यहां तुम्हारा सिद्धांत सही साबित नहीं हुआ या फिर यह समझ लो सिद्धांत अधूरा था। 
    काश ! उस दिन तुमने यह भी बताया होता कि इस सिद्धांत से अंतर्मन में स्थापित हो चुके प्रेम को किसी भी रिश्ते से विस्थापित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत तो उनके लिए सही हो सकता है, जिन्हें पहले किसी से प्रेम हुआ ही न हो। शरीर के चौबीस आयामों में स्पंदित हो चुके प्रेम को भला कौन सा सिद्धांत विस्थापित कर सका है ? अब तो जितनी भी जिंदगी बची थी उसे जीनी नहीं गुजारनी थी, और मैंने तो इसके लिए भी अपने आप को तैयार कर लिया था, लेकिन अब किसके साथ...
   बाद में मुझे यह भी समझ में आया कि उस दिन तुम प्रेम की सीढ़ी उतर कर भी मुझसे कहीं ऊंचे पायदान पर पहुंच गए थे। तुमने केवल सत्य और बाबा के लिए ही मेरा त्याग नहीं किया था, बल्कि वह त्याग मेरे लिए भी था। मैं चाहती तो तुम्हें रोक सकती थी, किंतु मौन रह गई। तुमने उस मौन को स्वीकार किया, सत्य के रूप में बाबा को बेहतर विकल्प देकर चले गए। मुझे किसी भी दुविधा में नहीं पड़ने दिया। सीढ़ी उतरते समय पीछे से मेरे रोकने पर तुम कुछ पल के लिए रुके, फिर अपनी पीठ और सर दिवाल से टीका, कस कर अपनी आँखें बंद कर मुझसे जो कहा वे शब्द मुझे आज भी याद हैं, ""पीहू ! ... मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", उस समय न तो मेरी तरफ तुमने देखा और न ही मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। तुम नहीं चाहते थे न कि मैं किसी द्वंद्व में पड़ कमजोर हो जाऊं...? और अंत में जाते-जाते मुझे निर्दोष भी साबित कर गए।
   कहते हैं, दो इंसानों की तुलना आपस में नहीं करनी चाहिए, लेकिन अब यह गुस्ताखी मुझे कर लेने दो। एक मुझसे सर्वस्व पा कर भी बेचैन था, अभी भी मुझसे और भी बहुत कुछ पाना चाहता था, तभी तो मुझे कस कर बंधनों में बांधना चाहा, लेकिन बांध नहीं पाया। प्रतिपल छटपटाता रहा। वहीं दूसरी तरफ तुम !! छोटी सी उम्र में एक नहीं दो बार अपने प्रिय का त्याग कर शांत और स्थिर मन से चले गए... और ऐसे गए कि फिर लौट कर न आए। क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ? 
   अब मेरी जिंदगी एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहां मुझे अपने शरीर से कोई मोह नहीं रह गया था। कौमार्य एक बार लुटाओ या फिर हजार बार, क्या फर्क पड़ता था। फिर मैंने सत्य को रोकने की कोशिश कभी नहीं की। उसने जब चाहा तब खुद को उसकी बाहों में समर्पित किया। और जब कभी उसने नहीं चाहा तो फिर मैंने चाहा। 
     अदब लब्जो को एक किनारे रख सामान्य शब्दों में लिखूं तो उन दिनों मैने खूब मजे लूटे, है न ? आखिर सत्य ने बाबा की बड़ी सेवा की और घर में कैद एक लड़की के जीवन में पल दो पल की खुशियां लेकर आया। इन सब का आखिर उसे कुछ तो प्रतिफल मिलना चाहिए, यह हक था उसका, जो दिया ? या फिर मैने तुम्हारे साथ चीटिंग की ? प्यार का ढोंग तुमसे करती रही और अंत में शादी की अपना तन सौंपा भी तो उस व्यक्ति को जिससे कोई मोहब्बत न थी ? यदि तुम ऐसा सोचते हो तो फिर गलत सोचते हो। आओ जान लो उसके आगे का सच, मैंने तो बदला लिया था। सत्य से, बाबा से, तुमसे और सच पूछो तो सबसे बड़ा बदला स्वयं से था।
     जिसे मन दिया उसे तन से अपना न बना पाई, और जिसे शरीर दिया उसे कभी हृदय और मन से न अपना सकी। कामवासना की आग में हर दिन तुम्हारी यादों को जलाती, जब वह आग ठंडी हो जाती तो उन्हीं यादों की बची हुई ताजा गर्म राख को पूरे शरीर पर लपेट लेती। हर अंत में एक तस्वीर बनती और फिर मेरे आंसुओं से घुल भी जाती। चलो इसी बहाने ही सही, तुम दिख तो जाते थे।  मेरा हृदय रोता, मन रोता, अंतर्मन चीखता। इस दर्द को सहन करना मेरे लिए कितना मुश्किल रहा होगा, कभी सोचना ? यह था खुद से बदला लेना। तुम्हे न रोक पाने का बदला। 
     अब जरा अपनी नाइटेंगल वाली कहानी याद करो। राजा के सामने उसका प्यारा बुलबुल अपने साथी को प्रतिपल याद करता, उसने राजा को गीत सुनना भी बंद कर दिया कैसा लगाता रहा होगा राजा को ? और एक रात उसी साथी को याद करते-करते मर भी गया और वह कुछ न कर सका। कैसा महसूस हुआ होगा उसे ? यह मेरा सत्य से बदला था। सही व्यक्ति से सही सवाल न पूछने का बदला। उसे तो मुझसे पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार था कि नहीं। लेकिन यदि कभी यही सवाल वह तुमसे पूछे तो इसका जवाब तुम जरूर देना, क्योंकि तुम किसी शीरी के फरहाद नहीं।
      यद्यपि बुलबुल की मृत्यु महात्माजी के सामने न हुई लेकिन जब कभी भी उसकी मृत्यु की खबर उन तक पहुंची होगी तो उन पर क्या गुजरी होगी ? यह था बाबा से बदला। साथी बुलबुल को राजमहल से दूर करने का बदला। मुझसे अथाह प्रेम रखने के बावजूद उस पर विश्वास न करने का बदला। मेरे जिंदगी के फैसले में खुद मुझे शामिल न करने का बदला। 
     यदि कभी साथी बुलबुल लौट कर राजमहल आया होगा और उसने पिजड़े में कैद बुलबुल की दर्दनाक मृत्यु को जाना होगा, तब उसके मन में कैसी पीड़ा उठी होगी ? उसे तुम महसूस करना। यह रहा तुमसे बदला। इन तीन वर्षों में कभी भी लौट के न आने का बदला। जानती हूँ भूले नहीं होगे मुझे, लेकिन मैं तुम्हें भूल जाऊं इस बात के लिए मुझे मजबूर करने का बदला। जरा सोचना, एक लड़की ने अपने परिवार के चाहने पर तुम्हार त्याग किया, और तुमने बाबा के चाहने पर मेरा। क्या फर्क रह गया तुम दोनों में ? वैसी भी मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर तुम्हारी नाइटिंगेल की कहानी मेरे न रहने पर ही पूरी होती है न ?
    एकदिन तुम भी मेरी तरह तड़पोगे, तुम्हारा मन भी रोएगा, अंतर्रात्मा चीखेगी लेकिन तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे। जब दर्द की इन्तहा हो जाएगी तो तुम्हारे होठों में एक फीकी मुस्कान आएगी। हंसते-मुस्कुराते तुम्हारी आंखों में आंसू आयेंगे। 
   अब मैं अपनी कहती हूँ, मन में एक ही लालच था कि कभी न कभी तो मैं सीढ़ी के उस आखिरी पायदान तक पहुंचूंगी जहां पर शायद तुम खड़े मिलोगे। 
   याद करो पहला दिन जब तुम पहली बार इस अटारी में आए थे। डिनर के बाद सत्य चला गया और मैं अटारी में ही अपनी बुक को सलीके से कैटिगरीवाइज़ जमा रही थी, और तुम खिड़की की छड़ पकड़े कभी बाहर तो कभी मेरी तरफ देखते। मैने तुम्हारे बिस्तर को ठीक किया और तुम्हारी ही दी हुई पोएट्री बुक को लिए हुए सीढ़ी उतर रही थी। याद आया ? तो फिर उसके आगे की मैं कहती हूँ, सीढ़ी के आखिरी पायदान में मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई दी, जैसे तुमने पीछे से मेरा नाम ले कर मुझे धीरे से पुकारा हो। तुम्हारी आवाज की वह कशिश वह अपनत्व मेरे शरीर, मेरी अंतरात्मा को झंकृत कर गई। मैं तुम्हारी तरफ पलटी तो देखा तुम मुझे एकटक देख रहे हो, मैं भी तुम्हे उसी तरह देखती कुछ देर तक खड़ी रही कि शायद तुम कुछ कहोगे। लेकिन तुम खामोश थे, मैं पूछना चाहती थी, क्यूं पुकारा मुझे ? लेकिन मेरे मुख से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। तब पता चला कि तुम्हारी पुकार मेरे मन का भ्रम है, यदि तुमने पुकारा होता तो कुछ कहते न ? और यह भ्रम केवल उस दिन नहीं कई बार हुआ। जब तुम थे तब भी और आज जब तुम मेरे पास नहीं हो तब भी।
    मैं कभी-कभी एक संभावना में जीती हूँ, जो पूरी हो सकती थी लेकिन न हुई। नहीं... नहीं... गलत लिख गई, जो मैं पूरी कर सकती थी लेकिन नहीं की।
एक सुखद स्वप्न जिसमें मैं और तुम, दो नहीं एक होते हैं। काश ! जिस दिन तुम जा रहे थे, तुमसे सब कुछ सच-सच बता देती। और तुमसे कहती कि मैं कोई सर्जरी नहीं करवाऊंगी, बस जितने दिन हूँ, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। फिर जल्द ही तुमसे विवाह भी करती। 
     तुम्हारे नाम की माथे में बिंदिया होती। गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर होता। हम मन, वचन और कर्म से एकदूसरे के होते, हमारी जायज़ संतान होती। और इस तरह आज हम दोनों सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होते। मैं तुम्हें लेडी नॉर्टन, कीट्स, शेली की पोयम सुनाती और तुम्हारी कहानियों को पढ़ती।
    तुम्हारे साथ मैं भी कुछ कविताएं लिखती। तब हमारा जीवन कितना उल्लासित और हर्षित होता। जीवन जीने के प्रति मेरे मन में भी चाहत होती। तब शायद इतनी जल्दी मैं मृत्यु के इतने करीब न होती, और जब कभी इस दुनिया को अलविदा कहती भी, तो हमारा अंश तुम्हारे पास होता।
    मैं यह सब इसलिए लिख रह हूँ, ताकि तुम जान जाओ की सत्य से विवाह न करने की एकमात्र वजह यह नहीं थी कि मैं दो-चार वर्ष की मेहमान थी। बात प्राथमिकता की थी और यह बात मैंने तुमसे ही सीखी। याद करो आखिरी दिन जब तुमने मुझसे कहा था कि तुम मुझे जिस रूप में रखना चाहो मैं रहने के लिए तैयार हूँ, यही बात जाते-जाते तुम बाबा से कह कर गए थे। तुम्हारे लिए प्राथमिक मैं थी, न की कोई रिश्ता। और यह बात तुमने अपने जीवन में पहली बार प्रमाणित नहीं की, इससे पहले भी कर चुके थे। शायद यही वजह है कि उस लड़की की शादी हो जाने के बाद भी तुमने उस पर कोई इल्जाम नहीं लगाया, उसे बेवफा नहीं समझा। क्योंकि उसका प्रेम तुम्हारे जीवन में प्राथमिक था, रिश्ता नहीं। जो नहीं बन पाया तो क्या हुआ ?
   इसी तरह तुम मेरे जीवन में प्रथम स्थान रखते थे। तुम्हें अपने पास रखने के लिए मुझे जो भी कीमत चुकानी पड़ती, मैं चुकाती। चाहे वह कीमत विवाह होती या विवाह पूर्व ही तुम्हे तन सौंप सत्य को यह एहसास दिलाना कि मैं उसकी कभी थी ही नहीं, या फिर बाबा के सम्मुख याचक बन तुम्हे मांग लेना या फिर ध्रुव भैया को बुला कर उनसे अपनी राखी के प्रतिदान के रूप में अपना साथ देने को कहना। सच मानो मैं यह सभी कर्म करती, यदि उस शाम हिम्मत जुटा कर तुम्हे रोक लेती। और तुम ? यह जान कर भी कि मेरे न रहने पर तुम्हें इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, मेरी यादों के सहारे जिंदगी जीने की कीमत !! लेकिन वह तुम चुकाते। क्योंकि हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे तो यह कर सकते थे। 
   मेरी यह कहानी पढ़ कर लोग मुझे चरित्रहीन और उच्चश्रृंखल प्रवृत्ति की लड़की का खिताब दे सकते हैं, तो फिर उन्हें दे लेने देना। तुम बुरा मत मानना। यह सच है कि मैंने शुरू में सत्य के विवाह करने की इच्छा को यह कह कर टाल दिया था कि पहले हम एक दूसरे को समझते हैं, फिर विवाह भी कर लेंगे। लेकिन जब मुझे आभास हो गया कि किसी भी दृष्टिकोण से मुझे सत्य से प्रेम नहीं है। तो मैं उससे विवाह करने के लिए तैयार क्यों हो जाती ? उसके बाद उसने जितनी बार भी मुझसे यह इच्छा जाहिर की, मैंने उसे स्पष्ट शब्दों में मना ही किया। यहां तक की यह भी कहा कि तुम जहां चाहे, वहां विवाह कर सकते हो, मैं या मेरे बाबा रोक नहीं लगाएंगे। यदि तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो तो भी चले जाओ। यह बात स्पष्ट रूप से मैंने तुम्हारे आने से तीन दिन पहले उस रात भी कही थी जिस रात मैने तुम्हारा स्वप्न देखा था। लेकिन वही बात को टाल गया तो मैं क्या करती। क्या उसे अपमानित करके यहां से भगा देती ? मैंने उस पर कोई बंदिश नहीं लगाई। न ही भावुकता में आकर मैंने उससे कोई वादा किया था और न ही मैंने कोई इमोशनल ड्रामा या ब्लैकमेल किया। 
     इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि मैंने हमेशा विवाह से इंकार ही किया ताकि वह किसी भी बंधन में न बंधे, हमेशा मुक्त रहे। तब भी वह तीन साल तक मेरे पास रहा, क्यों ? और आज मैंने ऐसी कौन सी नई बात कह दी कि वह चला गया ? उस नादान को कम से कम यह तो समझना चाहिए था कि पूरे गांव में वह मेरे पति की हैसियत से ही पहचाना जाने लगा था। बाबा हों या चाहे ध्रुव भैया हो, उसे सभी इसी रिश्ते से जानते थे। और अंत में मैंने शरीर सौंप कर उसे यह एहसास दिलाया कि अब मैं तुम्हें छोड़कर कहां जा सकती हूँ ? जिसने यह भी न सोचा हो कि लगातार दस-बारह दिनों तक जिसके साथ सेक्स किया वह प्रेग्नेंट भी हो सकती है, फिर भी वह छोड़ कर गया। यह जानते हुए भी की मंगल और कमली के सिवा इस सूनसान घर में मेरे लिए और कोई नहीं है ? मैं आज तक यह नहीं समझ पाई कि उसके जाने की वजह क्या थी। मुझसे अपमानित होना ? या फिर अपनी अहमियत सिद्ध करना ? या फिर तुम ? या फिर उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ?
    मंगल बिना बताए उसे लेने के लिए उसके घर गया। कमली से मुझे बाद में मालूम पड़ा। यदि मेरे सामने जाता तो मैं उसे कभी न जाने देती। मैं अब तो ईश्वर से प्रार्थना भी करती हूँ कि उसके आने से पहले ही मुझे इस शरीर से मुक्ति मिले। लेकिन उसके आने के पहले तक के लिए भी क्यों सोचूं ? मैं तो चाहूंगी कि यह पत्र समाप्त होते ही, मैं इस दुनिया को अलविदा कह दूं। क्रोध की पराकाष्ठा घृणा होती है। पहले सत्य पर क्रोध आया और वह क्रोध जब अपनी चरम सीमा को पार कर गया तो घृणा में बदल गया।
   आश्चर्य हो रहा है न ? तो इसका कारण ऊपर के संभावित सवाल में है। जिनका उत्तर निचले क्रम से मैं दे रही हूँ।
    उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ? बिल्कुल उसकी यह सोच सही है। जब मेरे अपने लोग और आसपास के लोग उसे मेरे पति के रूप में उसे स्वीकार कर चुके थे तो उसका यह सोचना वाजिब है। लेकिन मेरा शरीर पा लेने के बाद, उसका चले जाना, उसके प्रति उत्पन्न होने वाली घृणा का प्रमुख कारण है। 
    या फिर तुम ? नहीं बिल्कुल नहीं। तुम्हें गए तो तीन साल होने को हैं। यदि इसी कारण से उसे दूरी बनानी थी तो कब का बन चुका होता। मुझे तुम्हारी टीशर्ट पहने हुए देखना और फिर मेरी डायमंड रिंग को इंगेजमेंट फिंगर में पहने हुए देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। और फिर मेरी बातें जिसमें अक्सर तुम होते थे उसे सुनना, मेरी आंखों में तुम्हारे लिए बेशुमार मोहब्बत देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। इन सबके बावजूद वह तीन साल तक मेरे साथ रहा तो क्यों ? वास्तव में उसे मैं नहीं बल्कि उसे मेरे पति-पत्नी का रिश्ता चाहिए था। क्यों ? यह उसका मेरे प्रति मोह था या फिर कोई और लालच ? 
    अपनी अहमियत सिद्ध करना ? बिल्कुल हो सकता है। बाबा के जाने के बाद वह इस घर में मालिक की तरह रहा। उसने सोचा होगा चलो अब मैं देखता हूँ कि ये सब अकेले तुम कितना और कैसे मैनेज करती हो ? एक न एक दिन या तो बुलवाओगी या खुद मनाने आओगी। 
   मुझसे अपमानित होना ? नहीं, यदि विवाह से इंकार करना ही उसे अपना अपमान लगा तो यह तो मैं कई बार कर चुकी थी। 
     तुमने सच कहा था, कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, क्योंकि वे गुनाह, गुनाह नहीं, गुनाह-ए-अजीम होते हैं। उनकी सिर्फ सजा मिलती हैं। उसे भी जिसने गुनाह किया है और उसे भी जिसके प्रति गुनाह हुआ है। तुम्हारे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम्हें जाने दिया, मेरे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम फिर लौट के न आए। यह गुनाह हम दोनों से हुआ, तो फिर सजा मिलना तो तय था और मिली। खुद को सजा दे कर मैने अपराधबोध से मुक्ति पा ली और तुम्हें सजा दे कर तुम्हें किसी भी पछतावे से मुक्त कर दिया। सत्य मेरे द्वारा दी गई सजा से मुक्ति के लिए तड़पेगा। उसकी पत्नी होने के नाते यह अधिकार में तुम्हें देता हूँ कि उसे मुक्ति मिलनी चाहिए या नहीं। इसीलिए मैंने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर उसे पत्र में लिखा है कि जब तक तुम यहां एकबार नहीं आ जाते मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम एक बार यहां ना आ जाओ तुम अटारी में रखी मेरी बुक्स को वह किसी स्कूल या लाइब्रेरी को दान न करें। यह काम तुम करोगे। इसके लिए मैंने उसके उस बच्चों की सौगंध दी जो इस दुनिया में आने से पूर्व ही अपनी मां के साथ काल के गर्त में समा गया। पहली बार मैंने उसका भावनात्मक उपयोग किया, ताकि तुम एक बार यहां आ सको। इस पत्र को पढ़ सको और अपनी अमानत माइलस्टोन के लिए लिखी गई कविताएं ले जा सको।
      कभी सोचती हूँ, आध्यात्मिक प्रेम में शरीर का भला क्या महत्व, वह तो इससे परे होता है न ? कभी उसके विवाह को देख फिर मेरा त्याग कर तुम शरीर के मोह से मुक्त हुए और अब मैं भी हो गई। हम दोनों अब एक ही धरातल पर खड़े हैं, इसलिए लिखती हूँ कि अब इस शरीर का त्याग करने पर भी मुझे कोई कष्ट नहीं होगा।
   अब भी तुम्हारी इस टी-शर्ट में मेरी जान बसती है। उसे ही बार-बार पहनने का मन करता है, लेकिन थोड़ी देर में उतार कर अच्छे से सहेज के फिर से रख देती हूँ कि कहीं जल्दी पुरानी न हो जाए... उधड़ न जाए या फट न जाए।
      मुझे ऐसा क्यूं महसूस होता है कि जब तक तुम्हारी ये टी-शर्ट मेरे पास है, तुम मेरे पास न होकर भी मेरे पास ही रहोगे ? क्यूं महसूस होता है कि जैसे मेरे जीवन का और शायद उसके बाद का भी अस्तित्व इसी के जुड़ गया है ?  क्यूं जब भी इसे पहनती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि तुम मेरी रूह के साथ मेरे जिस्म से भी लिपट गए हो ? क्यूं जितनी बार भी इसे धुलती हूँ तो तुम्हारे परफ्यूम की खुशबू फिर से एक नए अंदाज में महक उठती है, और मेरे वजूद के हर हिस्से में समाती चली जाती है ?
   अब क्यूं अक्सर खुद से पूछती हूँ कि टाइम कितना हो गया होगा ? और उसके जवाब की तलाश में सोती हुई रात में अपने बेडरुम से बाहर निकल आंगन में आ कर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर आसमां में चांद सितारों की पोजीशन को देख अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ।
    शायद उस दिन तुमने ठीक कहा था कि कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं, जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। क्या वही काम मैने खुद स्वयं के लिए किया...? नहीं, बाबा के लिए भले ही सत्य बेहतर विकल्प रहा हो लेकिन मेरे लिए तो तुम ही थे, जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर मैं चली जाती। तुमसे झूठ बोल सकती थी कि मुझे भी पहले कुछ नहीं मालूम था। पीछे रह जाते तुम, तब तुम मुझसे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। 
   सही लिखा न ? तुम तो पहले से ही बिखरे हुए मुझ तक पहुंचे थे। मैं पूरे मन योग से तुम्हें संवारती, अपने नजरिया से एकत्र करती और फिर एक दिन तुम्हें बिखेर, स्वयं चली जाती ? तो फिर बताओ तुम क्या करते ? जरा शांत मन से सोचना क्या त्याग सिर्फ तुमने किया ? सत्य ने मेरी अभिरुचियों का सम्मान जरूर किया लेकिन उसके साथ जुड़ न पाया। मैने जो बुक्स के नाम उसे लिख के दिए उसने ला के दी,  लेकिन मुझे याद नहीं आता कि कभी उसने कोई कहानी या कोई छोटी सी कविता ही मेरे साथ पढ़ी हो या उनके विषय में डिस्कसन किया हो। यदि मैने कभी करना भी चाहा तो यह कह के टाल गया, "छोड़ो यार ये सब बेकार की बाते हैं...", या फिर, "...मैं तुम जैसा समझदार नहीं हूँ..."
   धीरे-धीरे यह समाज और उसके रीति रिवाज मुझसे ऊपर नजर आए। मुझे वैवाहिक बंधनों में बांधने की चाहत इतनी प्रबल हो चुकी थी कि उसने कभी भी मेरे इंकार की वजह पूरी ईमानदारी के साथ जानने की जरूरत ही नहीं समझी। वह इसे बहुत ही कैजुअल लेता था। उसने धीरे-धीरे अपने मन में मेरा अक्स बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज की लड़की के रूप में स्थापित कर लिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं। उसने कभी भी पूरी ईमानदारी से मेरे साथ जुड़ने की  कोशिश ही नहीं की। यदि करता तो मेरी अभिरुचियों में ही मुझे समझ पाता। वह तो मांग और पूर्ति पर आधारित बाजार के सिद्धांत की तरह मुझे अपनाना चाहता था। कैसे कामयाब हो जाता ? 
   मैने दार्शनिक, पौराणिक, और आधुनिक सभी तरह के लिटरेचर पढ़ें, और सच पूछो तो बहुत पढ़े, लेकिन कभी लिख नहीं पाई। जब भी कुछ लिखने की कोशिश की तो यही सोचा न जाने कैसा लिखूं ? किसी को पसंद आएगा कि नहीं ? लेकिन उस दिन बगिया से लौटते समय मैने बड़ी हिम्मत करके तुम्हे अपने जीवन की पहली चार लाइन सुनाई थी, तुम्हे याद तो होगी न...?
  इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
  यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
  तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
  एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।
     और फिर तुम्हारा ये कहना, "... वाह ! काश मैने लिखा होता...", मेरे दिल को छू गया। यहां पर बात आत्मप्रशंसा के आत्मिक-सुख की नहीं थी। बात तो थी इनकरेज करने की, किसी को हिम्मत देने की। कभी सत्य मेरी अधूरी रह गई एजुकेशन को लेकर चिंतित था। वह चाहता था कि मैं उसे पूरा करूं और कंपटीशन एग्जाम की तैयारी करूं और अंत में सर्विस करूं। मैं नहीं कहती कि उसकी सोच गलत थी लेकिन उसकी इस सोच में मैं कहां थी ? उसने यह नहीं पूछा कि पीहू तुम क्या करना चाहती हो, तुम्हारी पसंद क्या है ? उसकी समझ में मेरे लिए जो बेहतर लगा उसी को पूरा करना चाहा। लेकिन तुम मेरी जिंदगी में मेरे पैरेंट्स के अलावा वह पहले इंसान थे जिसने मुझसे ये पूछा था। और आज देखो तो उसी का नतीजा है कि अधूरी ही सही एक पोयम लिखी और तुम्हें इतना लंबा पत्र लिख रही हूँ...
   इसीलिए लिखा कि तुम मेरे लिए बेहतर विकल्प थे और मेरा प्यार भी। मेरा तुम्हे प्यार करना उतना ही कुदरती था जैसे इंसान खुद से प्यार करता है। किसी के त्याग को मौन रह के स्वीकार कर लेना उससे भी बड़ा त्याग होता है। तो मेरे प्रियवर ! अपनी इच्छाओं का, अपने बेहतर विकल्प का, और अपने प्यार का  त्याग सिर्फ तुमने ही नहीं मैंने भी किया, और सच पूछो तो तुमसे कहीं अधिक किया। तुम्हारे लिए तड़पी, रोई, पागलों की तरह घंटों-घंटों बगिया में उसी आम के पेड़ के नीचे बैठी रही। ढलते हुई शाम को देख लेडी नॉर्टन की वही पोयम गुनगुनाती रही। जब थक जाती तो अपनी चुनरी ओढ़ के वहीं लेट जाती। कुछ लिखने की कोशिश करती फिर अधूरा छोड़ देती, किसके लिए लिखती ? अब तो कोई कहने वाला भी तो नहीं था,  "पीहू ! काश मैने लिखा होता..."
     ज्ञान भैया ने तुमसे कहा था न, कि कभी-कभी न कहने का दर्द कह देने के दर्द से कहीं अधिक होता है, तो उन्होंने सच ही कहा था। यह तो अच्छा हुआ कि आखिरी दिन ही सही, तुम्हारे साथ-साथ मैने भी अपने अंतर्मन के सच को स्वीकार कर लिया। कुछ तुमसे कह दिया, जो नहीं कह पाई तो इस पत्र में लिख दिया। आज सोचती हूँ, यदि न किया होता तो ? फिर तो तुम्हे पूरी किताब ही लिखनी पड़ती, है न ? 
   यदि ऐसा न होता तो आम के पेड़ की छांव में या फिर चलतो हुई राहों में तुम्हें कस कर गले न लगाया होता। आज भी उस आईने को मैंने सहेज कर न रखा होता जिसमें अंतिम बार तुम्हारी सूरत के साथ अपनी सूरत देखी थी। आज भी जब कभी उसमें अपनी सूरत देखती हूँ तो क्यों चुपके से तुम भी आ जाते हो ? मैं महसूस करती हूँ कि जैसे मै तुम्हारे कंधे पर सर रख तुम्हे देख रही हूँ, तुम्हारे गाल को फिर से चूम रही हूँ। इन सभी पलों में मुझे समझ में आता है कि तुम मेरी जिंदगी में क्या मायने रखते थे... और आज भी रखते हो...
    तुम्हारे साथ मैने अपने जीवन के महज चार दिन ही तो जिए थे। उन चार दिनों में तुम्हारे साथ हंसी, रोई, तुम्हे गले लगाया, साथ में शराब पी, यहां तक कि सिगरेट पीने की कोशिश भी की। जो तुमने कहा, सुनती गई। वे सभी लम्हे मेरी निगाहों में आज भी कैद हैं। जहां जरूरत महसूस की तुम्हें डाटा भी, लेकिन कभी तुमसे नाराज नहीं हुई और न ही तुमसे रूठने का मन किया, क्यों ? शायद इसलिए कि लोगों को अक्सर कहते सुना है कि जिंदगी चार दिन की होती है, और यह चार दिन मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी। क्यों तुम्हारा मेरे साथ होना मेरे आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा पर भारी पड़ गया ?
      और इन सब का जवाब वही एक सवाल है, जो सत्य ने मुझसे कभी नहीं पूछा। उसे तो पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं, लेकिन नहीं, उसने कभी नहीं पूछा, क्यों ? 
    कहते हैं यदि किसी के मन में और हृदय में किसी के लिए प्रेम हो तो वह आंखों से छलकता है, फिर वह जमाने से भी नहीं छुपता। तो फिर मैं यह कैसे मान लूं कि जिस प्रीत को मंगल और कमली ने हमारी आंखों में देखा, उस प्रीत को सत्य ने न देखा होगा ? तुम याद करो वह आखरी दिन जब हम बगिया से घर तक साथ चलते हुए आए थे। उस दिन मेरी इच्छा का सम्मान सत्य ने ही किया था और उसने मेरा फेवर लिया था। वास्तव में वह अपनी इसी शंका की पुष्ठि करना चाहता था। हम दोनों घर देर से पहुंचे और उसे अपनी शंका सही प्रतीत हुई। उसके मन में असुरक्षा की भावना जागी जिसका जिक्र उसने अपने सामने अपने ही तरीके से बाबा से किया। तो फिर जवाब मालूम होने के बाद भी सवाल कैसे पूछता ? वह जानता था कि यदि उसने पूछ लिया तो पीहू झूठ नहीं बोलेगी। तब उसकी सभी संभावनाएं समाप्त न हो जाती ? मैं चाहूं या न चाहूं, वह तो मुझसे शादी करना चाहता था न ?
     उसने मुझसे एक रिश्ता चाहा था तो उसे मिला। लेकिन तुमने जो चाहा तुम्हे न मिला, यानी मेरा साथ, मेरी नजदीकियां। रिश्ते नातों से दूर मेरे साथ जिंदगी को जीने की ख्वाहिश तुम्हारी पूरी न हुई। इसका दोषी भी मैं तुम्हें ही मानती हूँ। किसी को प्यार की उन ऊंचाइयों पर ले जाकर न खड़ा कर दो जहां वह देवी या देवता बनने के लिए मजबूर हो जाए और फिर उस तक पहुंचने के लिए तुम खुद ही तरस जाओ। नियति ने तो तुम्हे वो रांझणा बना के रख दिया जो हीर की चौखट में न तो हीर की भिक्षा मांग सकता था और न ही उसे छीन के ले जा सकता था। 
   कभी - कभी मेरे मन में एक सवाल उठता कि सत्य मेरे जीवन में क्यों आया जिसका जवाब आज मुझे मिल गया है। नियति हमें एक दूसरे से मिलना चाहती थी और कारण उसे बनाया। 
    तुम यहां पर दोबारा क्यों आए हो ? आए हो या लाए गए हो ? यदि सत्य तुम्हें यहां लेकर आया है तो क्यों ? यदि वह तुम्हारे साथ अटारी पर नहीं है तो क्यों ? और यह पत्र यदि तुम रात को अकेले पढ़ रहे हो तो क्यों ? यदि वही मौसम है जिस मौसम में हम पहली बार मिले थे, और बाहर चंद्रमा की मद्धिम रोशनी चारों तरफ फैली हुई है, तो क्यों ? ....
    अचानक पूरी अटारी में अंधेरा छा गया, शायद लाइट गुल हो गई थी। पत्र के इस भाग को पढ़ते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे पूरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गई... बाहर खिड़की से आता हुआ चंद्रमा का हल्का-हल्का प्रकाश, और मेरे दिमाग में गूंजता हुआ एक प्रश्न, "आखिर मैं यहां क्यों हूँ..."
    एक हाथ में पत्र लिए मैं बिस्तर पर निढाल लेट गया। मेरी आंखें बंद, दिल की धड़कने तेजी से चल रही थी। सत्य और पीहू दोनों का नजरिया और एकदूसरे के प्रति सोच मेरे सामने आ चुकी थी। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित विवाह के लिए सत्य की मांग नाजायज नहीं थी। लेकिन नहीं, पीहू ने मौन रह के बाबा के कहे अनुसार न केवल रिश्ते को स्वीकार किया बल्कि अपने आचरण से जाहिर भी किया। उसे बाबा से खुल कर बात करनी चाहिए थी।
     सत्य की गलती यह थी कि जिस पल पीहू ने सशरीर उसे स्वीकार किया तो सत्य को दृढ़ता के साथ मना करना चाहिए था कि नहीं पहले तुम मुझसे सामाजिक रूप से विवाह करो, फिर ये सब बाद में होगा। लेकिन उसने भी अपनी मौन स्वीकृति दी, तो फिर पीहू उसकी पत्नी हुई न ? और केवल दस बारह दिन के बाद ही उसे छोड़ के केवल इसलिए भाग जाना कि अब पीहू सामाजिक रूप से विवाह के लिए तैयार नहीं, मुझे कहीं से उचित नहीं लग रहा था। पीहू ने तो उससे कहा नहीं होगा कि आओ पहले सेक्स कर लेते हैं फिर सबके सामने शादी करेंगे। बाबा ने कन्यादान कर दिया और तुमने स्वीकार किया, पति-पत्नी की तरह रहे, और एकदिन उसे छोड़ कर भाग गए, जबकि वह अकेली थी, बाबा भी गुजर चुके थे, और तुमने इतना कठोर निर्णय ले लिया !! अरे भागना था तो उसी दिन भाग गए होते न जिस दिन बाबा ने कंयादान किया था, या फिर तब जब पीहू ने पहली बार शादी के लिए मना किया होगा।
   और इस कहानी में यदि मैं अपने आप को कटघरे में खड़ा करूं तो कैसे और क्यों ? किसी तीसरे व्यक्ति के रूप में मैं खुद को निरूपित करू तो क्यों और किस हद तक ? यदि पीहू से मेरे विचार, मेरी आदतें, मेरा दृष्टिकोण मैच कर गया, और हमें एक दूसरे से प्यार हो भी गया तो इससे किसी का क्या नुकसान हुआ ? क्या पीहू से मेरी मुलाकात न हुई होती तो वह सत्य से शादी करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाती ? यदि हां, तो मुझसे मिलने से पहले भी वे दोनों चार महीने तक क्या कर रहे थे ? क्यों सत्य ने मुझसे कहा कि मैं पीहू को विवाह के लिए प्रेरित करूं... क्या सत्य को पूर्वानुमान हो चुका था कि पीहू के प्रेम के किसी भी खांचे में वह फिट नहीं बैठता है। मैंने तो ज्ञान से नहीं कहा था कि वह पीहू से मेरे बारे में बात करें और न ही उसने की, तो फिर ? जो भी बात की तो मेरी गुजरी जिंदगी के बारे में। जबकि उसके इस पत्र के अनुसार तब, जब वह प्यार की पहली सीढ़ी चढ़ चुकी थी। अधिक से अधिक ज्ञान से मेरे फैमिली बैकग्राउंड, मेरी प्रेमिका और आत्महत्या करने के प्रयास के बारे में जानकारी मिली होगी। इससे अधिक वह क्या बता सकता था ?
   अब सवाल यह नहीं है कि प्रेम क्या है, और क्यों होता है ? सवाल तो यह है कि किससे होता है या होगा। और शायद जिसका जवाब मैं पहले ही पीहू को दे भी चुका हूँ। नहीं तो और क्या कारण रहा होगा कि पीहू ने अपनी पूरी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मैने उसे। मुझसे ज्ञान में अधिक, लुक-वाइज और सुंदरता में मुझसे कहीं अधिक, यदि हमारे बीच कुछ मैच करता था तो वह था जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण अर्थात नजरिया, एकदूसरे की विचारधारा, अभिरुचि। एक साथ दिन भर रहने के बाद भी यही लगता कि अभी वक्त ही क्या हुआ है।
      हमने एक दूसरे को प्रभावित नहीं बल्कि चकित किया। अरे ! तुम भी यही सोचती हो ! वाह !! वंडरफुल !!! इस प्रेम में स्थिरता थी, सहजता थी। सोच में एक गहराई थी। दीवानगी सिर्फ इतनी थी कि हम एक दूसरे को दुःखी नहीं देख सकते थे। जब कभी मैं रोया तो उसने फौरन मुझे गले से लगा लिया, उसके रोने पर मैंने उसे गले लगा लिया, फिर हम दोनों ही एक दूसरे का दुःख महसूस कर रोए। कहना-सुनना बाद में होता रहा। बस यही तो हमने किया। नहीं तो कौन-सा हम दोनों ने चांद-सितारे तोड़कर एकदूसरे के हाथ में रख दिए ?
  मैं कुछ देर तक इन्हीं विचारों में खोया रहा। एकाएक मुझे आभास हुआ जैसे किसी ने मुझे पुकाईरा हो। कौन हो सकता है, शायद सत्य हो ? मै उठकर बैठ गया। मैंने कंफर्म करना चाहा, धीरे से पुकारा, "सत्य ..", लेकिन कोई जवाब न मिला।
    मैंने सोचा मेरा वहम होगा। मैं लेटने ही वाला था कि फिर किसी ने मुझे पुकारा इस बार की आवाज पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट थी।
   अब तक खिड़की से आते प्रकाश का मैं आदी हो गया था। मुझे अब अटारी में सब कुछ लगभग स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मैंने सीढ़ी के पास खड़े होकर नीचे झांक कर देखा, घुप अंधेरे के सिवा वहां भी कोई नहीं था । मैंने फिर भी कंफर्म करना चाहा, मैंने फिर धीरे से पुकारा "सत्य !..."
    लेकिन अचानक मेरे दिमाग में धमाका हुआ, आखिर मैं सत्य को पुकार ही क्यों रहा हूँ। जहां तक मुझे समझ में आ रहा था, दोनों बार की आवाज तो किसी लड़की की आवाज थी। अभी तक मेरा ध्यान क्यों न गया ? यही सब सोचते हुए मैं जैसे ही पलटा फिर से किसी ने मुझे पुकारा और इस बार की आवाज कुछ ऐसी थी जैसे किसी ने दूर से पुकारा हो। उस आवाज में अथाह करुणा थी।
     अगले ही पल मैंने खुद को खिड़की के पास खड़े हुए पाया। बाहर गौशाला, उसके सामने सड़क, सड़क के उस पार शीशम का पेड़, और उस पेड़ के नीचे खड़ी एक चमकदार परछाई।
    यदि कोई काल्पनिक कहानी लिख रहा होता तो निश्चित है यह सब मैं कभी नहीं लिखता। क्योंकि मैंने विज्ञान पढ़ा है, और जिसका प्रमाण नहीं, जो निराधार है, विज्ञान उसे नहीं मानता है। तो फिर मेरी कल्पना में भी उसका कोई स्थान नहीं होता। लेकिन यह कहानी तो मेरे जीवन का एक अंश है, और जिसे मैं घटते हुए देखा रहा था, महसूस कर रहा था और जिसका प्रमाण मेरे सामने, जीता-जागता खड़ा था। उसे कैसे अनदेखा कर देता ? उसे कैसे और क्यों न लिखता ? 
    न तो मैं शराब के नशे में हूँ, और न ही मैं इसका आदी हूँ। पांच साल पहले जब मैं यहां से गया था तब से लेकर आज तक मैने कभी-कभार ही पिया था, वो भी लिमिट में। मैंने उससे वादा किया था कि मैं देवदास नहीं बनूंगा, और मैंने ये वादा पूरी ईमानदारी से निभाया था। तो मैं यह भी मानने के लिए तैयार नहीं कि नशे में होने से या उसका आदी होने से मेरे दिमाग के न्यूरॉन्स ने एक इल्यूजन या भ्रम की स्थिति पैदा की है, बिल्कुल नहीं। 
     तभी मैंने देखा वह परछाई कुछ कदम चलाते हुए सड़क पर आई। अब पूरा का पूरा चंद्रमा का मद्धिम प्रकाश उस पर पड़ रहा था। उसकी नज़रें बिल्कुल खिड़की पर लगी हुई थी। चंद्रमा की उस शुभ्र ज्योत्स्ना में वह बेहद शांत लग रही थी। 
     पता नहीं क्यूं मेरे अंदर का डर चला गया और दुविधा एक पल में दूर हो गई। उसे सामने देखकर मन में प्रसन्नता हुई। अब मेरे अंदर रंच मात्र का भय नहीं रह गया। पल भर के लिए मैं भूल गया कि पीहू मर चुकी है। दोनों हाथ से खिड़की की छड़ पकड़े उसकी तरफ मैं एकटक देखता रहा। मेरा शरीर बिल्कुल हल्का हो गया। लगा, जैसे मैं जीवन और मृत्यु से परे हो चुका हूँ। मन के सभी शोक और संताप प्रकृति में ही कहीं विलीन हो गए।
   उसे यूं सामने देख मेरी आँखें भर आई और होठों में फीकी मुस्कान दौड़ गई। हमारी नियति ने हमें एक बार फिर एकदूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन कितने विपरीत !! शारीरिक बंधनों में बंधा हुआ आज मैं उसकी अटारी पर था और वह सभी बंधनों से मुक्त बाहर खड़ी थी।  
    मृत्यु से मुझे डर नहीं और पीहू से डरने की कोई वजह नहीं। यदि यह उसकी आत्मा है, तो भी नहीं।यदि केवल मेरे मन का भ्रम है, तो भी नहीं।  और फिर जिसके न रहने पर मैं रोया, दर्द में तड़पा, उसे एक बार देखने और मिलने के लिए तरसा, उसके सामने आते ही मैं डर जाऊं ?
  पलट कर जैसे ही मैं चारपाई तक पहुंचा लाइट आ गई। मेरे हाथ में अभी भी वह नोटबुक थी। मैं आराम से बैठ पत्र को आगे पढ़ने लगा...
    कभी-कभी मैं सोचती थी कि तुम क्या थे, राइटर, एक्टर या फिर डायरेक्ट ? तुमने एक्टिंग की तो बिल्कुल नॉर्मल इंसान की तरह, जब लिखा तो गहरी बातें, और डायरेक्ट किया तो पीहू को पीहू से ही मिला दिया। अरे पागल यह भी न सोचा यदि पीहू, पीहू से मिल गई तो सिर्फ तुम्हारी होकर रह जाएगी ? 
   जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे तुमने, मैंने भी देखें लेकिन उन सब का हासिल क्या था ? हमारा तुम्हारा मिलना ?  सत्य का मेरे जीवन में आना मेरे अपनों की मुक्ति थी, और तुमसे मिलना, मेरा खुद से मुक्त हो जाना !! अब मैं खुद की कहां रही !!!
    क्या जानती थी कि मैं खुद अपने आप को ऐसे बंधन में बांध लूंगी जिससे दूर जाना मेरे बस में नहीं होगा। फिर एक दिन तुम आए, सोने के पिंजरे में कैद बुलबुल की बगिया में आ कर चुपचाप बैठ गए।
    मैं तुम्हें जब भी सोचती हूँ तो कोई अध्यात्म कोई दर्शन कोई फिलासफी मेरे काम क्यूं नहीं आती ? तुम बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। यदि उन सभी बातों का अर्थ निकालती हूँ तो सिर्फ तुम्हारा चेहरा ही क्यों नज़र आता है ? 
    बिछोह के अंतिम पलों में कभी मेरी अटारी की सीढियों को उतरते समय तुमने मुझसे कहा था, पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो। जानती हूँ उस पल तुमने कोई एक्टिंग नहीं की थी। तो फिर आओ, मैं तुम्हें हृदय से, मन से, और अंतर्मन से पुकार रही हूँ, असंख्य सितारों की तरह मेरी आंखों से झिलमिलाते, चमकते आ जाओ। मुझे गले से लगा लो, मेरे आंसुओं को पोंछ लो, मेरे साथ जी भर के रो लो। तुम्हारी ही बात तुम्हे याद दिलाती हूँ, सैम्पेथी नहीं कॉन्डनेस चाहिए जो मुझे मेरे अंतर्मन के दर्द से मुझे मुक्ति दिला दे... शायद तुम्हारी पीहू का इस धरती से जाने का समय नजदीक आ चुका है। जब न रही तो फिर किससे कहोगे पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो। तो उसे विदा करने ही आ जाओ। देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ मैं उतनी ही बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ मुझे..."
    कभी इसी अटारी में मैंने तुमसे पूछा था कि यदि कुदरत तुम्हें अपनी मृत्यु के चुनाव का अवसर दे तो कैसी मृत्यु चाहोगे। इस पर तुमने कहा था, "यदि नियति मुझे मेरी मृत्यु का चुनाव करने दे तब मैं एक ऐसी मौत मरना चाहूंगा जिसमें मेरे प्रिय की प्रतिक्षा हो... एक आस हो उसके आने की... मेरी आंखे खुली हुई हों... और मेरे दिल की धड़कन आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जाए। एक ऐसी मृत्यु जिसमें जीवन का संगीत हो...जिसकी स्वर-लहरी अपने चरम पर पहुंचकर धीरे-धीरे शांत हो... उसके सभी सुर मेरे हृदय में समाहित होते चले जाएं... वीणा की ऐसी झकार जो तार टूटने के बाद भी कुछ देर तक गूंजती रहे... मैं जीवन का यही संगीत सुनते हुए अपने प्रिय की प्रतीक्षा में मृत्यु का वरण करना चाहूंगा..."
   उसदिन तुम्हारे द्वारा कही गई यह बात मेरे अंतर्मन में इस कदर बैठ गई कि मैं फिर कभी भूल ही न पाई। तो चलो अच्छा ही हुआ, जिंदगी के इस रंगमंच में अपनी अंतिम सांस लेते हुए इस किरदार को अभिनय के लिए तुम एक स्क्रिप्ट तो देकर गए। मुझे याद आती हैं, तुम्हारे बाहों की बंदिशें, तुम्हारे लफ़्ज़ों की रुमानियत, संगीत जिसकी लहरों में मेरा मन आज भी तैरता है। कुछ पा लेने और खो देने के डर से दूर मैं क्यों ऐसे संसार में पहुंच गई हूं जहां तुम हो, सिर्फ तुम हो।
     अब यही मेरे मन की भी आखिरी इच्छा है, जब मैं यह संसार छोडूं तो मेरी आंखें खुली हो, और मैं तुम्हें सीढ़ी के आखिरी पायदान पर खड़े एकटक देखती रहूं। इसीलिए अब मैने अपनी चारपाई खिड़की के कुछ और पास कर ली है, और उसी तरफ सर करके लेटती हूँ। शायद मरते समय ही सही तुम आ जाओ। यदि नियति ने मेरे न रहने पर ही तुम्हारे आने को निर्धारित कर रखा है, तो लिखती हूँ, फिर तुम किसी शीरी के फरहाद बन के मत आना।
   तुम्हे याद है, इसी बगिया में तुमने मुझे कविता के रूप में एक कहानी सुनाई थी, दो सितारों की कहानी ? शायद हम दोनों उस कहानी के वही दो सितारे हैं, जो एकदूसरे के करीब आए, एकदूसरे के मन को लुभाए। फिर हमारे मन में एकदूजे के साथ जिंदगी को जीने की लालसा जागी। लेकिन मेरे पास जिंदगी बची ही कहा थी मेरे दोस्त। पर जो भी थी मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी, लेकिन...देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की ये दुनिया... ये सूरज, चन्द्र, ग्रहों, उपग्रहों की दुनिया, इनके आगे तो बाबा भी हारे।
       जिन्हें मैने अपने जीवन में ईश्वर का स्थान दिया, वो एक पछतावा लिए इस दुनिया से गए। शायद उनके लिए नियति ने यही सजा निर्धारित की थी। लेकिन उनकी सजा क्या है जिन्हें महसूस हुआ कि हमारे साथ रहने पर संपूर्ण सृष्टि के नियम भंग हो जाएंगे, ब्रह्मांड हिल जाएगा, न जाने इस धरती में कितने भूकंप आ जाएंगे...? याद करो तुम अपनी कहानी...
   उनके नजदीकी आकर्षण से,
   मन में उठती लहरों से,
   दिल की सच्ची बातों से, 
   कुछ और करीब आने से, 
   सृष्टि नियम बिगड़ते देखा।
   सब मिलकर जा प्रभु से बोले। 
   दूर करो अब इन दो तारों को,
   प्रेम में पागल इन दो न्यारों को।
   तो क्या इन देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की  सजा यह नहीं हो सकती...?  जो किया छल इन सितारों से... जाओ अब हर युग में तुम भी... इन्हीं सितारों से छले जाओगे...?  दो सितारी के मध्य खींची गई विभाजन रेखा क्या इनकी हथेली में इनकी किस्मत रेखा बन के न उभरेगी ? ईश्वर तो करुणामयी होता है... उत्पात तो इन्होंने मचाया, ईश्वर को भी नियति से श्रापित होने को मजबूर किया ? 
    मैने तुमसे यूं ही नहीं कहा था, कि तुम मेरी नियति बन के आये और मैने तुम्हे अपनी किस्मत समझ जाने दिया। तो फिर अब तुम उनकी नियति बनाकर आओ। जब भी तुम्हारे बारे में सोचती हूँ तो मन में हूक सी उठती है। यदि उसने हम दोनों की आंखों में एक दूसरे के लिए प्यार देख भी लिया था तो भी उस नादान को यह तो सोचना चाहिए था कि जो चार महीने तक एक बिस्तर में होने के बाद भी उसकी हम-बिस्तर न हुई, कभी भी विवाह के लिए अपनी सहमति न दी तो उस लड़की के हृदय और मन में उसके लिए कितना और किस स्तर का प्रेम रहा होगा ?
       बाबा की एक भूल, वही ग्रहों, उपग्रहों, सूर्य, चंद्र की दुनिया से स्थापित एक रिश्ते का दंभ पाले मेरे संपूर्ण जीवन का परमेश्वर बन गया। जब उसने बाबा से हम दोनों के बारे में बात की होगी, उस क्षण बाबा ने हम दोनों के बारे में क्या सोचा होगा ? उसके कुछ शब्दों में बाबा के हृदय में हजारों शंकाओं को न जन्म दे दिया होगा ? मुझे छोड़कर जाने के अपराध से तो मैंने उसे उसी दिन मुक्त कर दिया था जब मैंने उसे अपने चित से निकाल फेंका। लेकिन इस अपराध से उसे मैं कैसे मुक्त कर दूं ? वह मेरा ही नहीं हमारे बीच निश्छल प्रेम का अपराधी है। इसलिए तुम्हें पुकारती हूँ, जब भी तुम आना तो नियति बन कर आना। एक अजनबी की तरह ही निष्पक्ष भाव से अपना फैसला देना।
     या मेरे जीवन के स्वाति नक्षत्र बन के आना। तुम्हें मेरा नाम बहुत प्यार लगता था न ? अपने शब्दों में दी गई परिभाषा को पूरा करने के लिए आना। मैं नहीं जानती कि जीवन और मृत्यु के बीच क्या संबंध है ? मरने के बाद इंसान कहां जाता है, यह भी नहीं पता। लेकिन मैं यही रहूंगी, तुम मुझे पुकारना, पीहू... पीहू... पीहू... और तुम देखना मैं दौड़ती-भागती जहां भी रहूंगी, जिस दुनिया में भी रहूंगी तुमसे मिलने आऊंगी। फिर चाहे इसके लिए मुझे कितने ही आयाम ही क्यूं न पार करने पड़े, मैं करूंगी। लेकिन मेरे प्रियवर, मेरे इष्ट, मेरे दोस्त मैं आऊंगी, और जरूर आऊंगी।
     या फिर हे राधे के प्रिय !!! हां मैं तुम्हे पुकारती हूँ, तुम वही कृष्ण बन के आना। न्याय करना मेरे साथ। एक अधूरी कहानी जिसे कालचक्र पूरा न कर सका, उसे तुम पूरा करना... अपने प्रिय मित्र के चरित्र का हनन करने, उसके अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए, तुम्हे उसके पति का सारथी भी बनना पड़े, तो वह भी बन जाना। नहीं तो फिर कोई जरूरत नहीं इस कुरुक्षेत्र को तुम्हारी ? तुम जहां हो वहीं भले...
तुम्हारे इंतजार में,
तुम्हारी पीहू।
   
      लाइट फिर गुल हो गई। मैने बिस्तर को ठीक किया। नोटबुक और कपड़े को समेट कर बैग में सुरक्षित रख उसे चारपाई के नीचे खिसका दिया। मैं बिस्तर पर लेट गया। अगले ही पल मेरी आंखे थकान से बंद हो गई। तभी महसूस हुआ जैसे कोई कुर्सी पर आकर चुपचाप बैठ गया हो। मैंने आंख खोलनी चाही लेकिन खुली नहीं।
       मैने उससे पूछा, "पीहू !... क्या तुम सचमुच हो या मेरे मन का कोई भ्रम हो...?"
  उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि कोई उठा और मेरी सिरहने की ज़मीन के पास घुटने के बल बैठ गया। एक अजीब-सा सम्मोहन, एक अजीब सा नशा, एक अजीब सी मदहोशी मेरे अंदर सामने लगी। मैं हाथ बढ़ाकर उसे छू लेना चाहता था, लेकिन मेरे हाथ नहीं उठ रहे थे... मुझे महसूस हुआ जैसे मैं धीरे-धीरे एक स्वप्नलोक में जाने लगा हूं .. मैंने बड़ी मुश्किल से उसे फिर पुकारा, "पीहू ! मेरी पलके बोझिल क्यों हो रही है... मुझे नींद क्यूं आ रही है... "
     एक शांत स्वर सुनाई दिया, "तुम थक गए हो... देखो रात बहुत हो गई है... अब सो जाओ..."
    मैंने खोई-खोई आवाज में उससे फिर पूछा, "पीहू टाइम कितना हुआ होगा...?"
    "एक बज के सत्ताईस मिनट..."
     "अच्छा ! इतना एक्यूरेट...!!!"
     "हां... सत्य की रिस्टवॉच से देख कर बताया है... अब तुम सो जाओ..."
    "सत्य सो गया क्या ?", मैने पूछा।
     "हां... मैगजीन पढ़ते-पढ़ते सो गया। कल मंगल चाचा से कह के कूलर का पानी निकलवा देना। और उसे समझा देना कि दक्षिण की तरफ पैर करके नहीं सोते हैं, दोष लगता है..."
    उसके आगे का मुझे कुछ होश नहीं सुबह उठा तो सात बज चुके थे। 
    मैं अटारी से नीचे आया। जब गैलरी पहुंचा तो बेडरूम का दरवाजा अध-खुला था। मैंने कमरे में प्रवेश करते हुए सत्य को पुकारा लेकिन वह कमरे में नहीं था। और फिर मैंने कमरे में जो कुछ भी देखा तो उसे देखकर मैं हैरान रह गया। ठीक सब कुछ उसी तरह था जैसा कल रात पीहू ने मुझे बताया था। इंडिया टुडे मैगजीन तकिया में रखी हुई थी। तकिया उठा कर देख उसके नीचे पीयू की तस्वीर थी। कूलर में पानी भरा हुआ था और तकिया की दिशा बता रही थी कि सोते समय सत्य का सर उत्तर दिशा की तरफ रहा होगा। ड्रेसिंग टेबल पर सत्य की रिस्ट वॉच मिली मैंने उठा कर देखा वह बंद थी। उसमें 1:27 am हुए थे। यह वही समय है जो रात को मुझे पीहू ने बताया था। तो क्या रात को पीहू से बात करना मेरा कोई भ्रम नहीं था। मैं कमरे से बाहर आ गया।
    तभी पीछे से मंगल आता हुआ दिखाई दिया मैंने उसे अपने पास बुलाया, "मंगल कूलर का पानी खाली कर उसे खिड़की से निकाल लो और पीछे स्टोर रूम में रख दो। लेकिन रुको पहले कमरे का सेटअप करवाओ..."
    पीहू के कहे अनुसार मैंने कमरे का सेट अप करवाया तब तक बाथरुम से सत्य भी नहा कर आ चुका था। उसने पूछा, "यह सब क्या किया..?"
   मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "दुनिया में वास्तु नाम की भी कोई चीज होती है न, और खबरदार दक्षिण की तरफ पैर करके सोए तो..."
     सत्य ने हंसते हुए कहा, "यार तुम भी मॉडर्न युग में यह सब बातें कर रहे हो...?"
    "मैं मॉडर्न युग में हूं इसीलिए ऐसी बातें कर रहा हूं अच्छा यह बताओ पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों का फ्लो किस दिशा से किस दिशा की तरफ होता है..."
    "अब एक्सप्लेन करने की जरूरत नहीं है भाई समझ गया...", फिर वह मंगल से बोला, "कूलर खोलने के बाद गाय को भी देख लेना... न हो तो गाय और बछिया को ले जा के बगिया में आम के पेड़ के नीचे ही बांध दो... कमली देखती रहेगी"
   मंगल अपने काम में जुट गया। ब्रेकफास्ट करने के बाद सत्य फैक्ट्री और मैं मंगल के साथ गांव की मुख्य बस्ती की तरफ आ गए। कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात की और तय कार्यक्रम के अनुसार उन सभी व्यक्तियों से भी मिले जिनका ग्यारह तारीख को महत्वपूर्ण योगदान हो सकता था।
    लगभग एक बजे हम वापस घर आए। मैंने अटारी से अपना बैग निकाला, घर में फिर से ताला लगवाया और फिर मंगल के साथ बगिया आ गया। कमली खाना तैयार कर हम दोनों का ही इंतजार कर रही थी। कुछ देर मुझे विचारों में डूबा देख कमली ने पूछा था, "क्या बात है सर जी, क्या सोच रहे हैं...?"
  "कुछ नहीं..."
   कुछ देर में मंगल आ गया था, लेकिन सत्य इसके साथ नहीं था। मंगल ने मुझे बताया कि सत्य आज कैंटीन से खा कर आया है और उसने कहा है कि सर जी को वहीं सुरक्षित रखो और ध्यान देना शायद कल इस क्षेत्र में चीते का मूवमेंट देखा गया है। 
   "मंगल लगता है आज रात पानी बरसेगा, देखो तो आसमान में बादल छाए हुए हैं। ठंड भी थोड़ा बढ़ गई है। लगता है आसपास कहीं बरस ही रहा है। मंगल ने मिट्टी के बर्तन में आग जलाते हुए कहा। "सब का इंतजाम है अपने पास आप चिंता ना लीजिए..."
   "वह तो मैं देख ही रहा हूं मंगल लेकिन यह बताओ कल का क्या प्रोग्राम है ?", मैंने मंगल से पूछा था। 
   उसने कुछ याद करते हुए कहा, "अरे ठीक याद दिलाया सर जी... भइया जी ने कुछ कार्ड दिए है, गांव के कुछ प्रमुख व्यक्तियों को देना है। उन्होंने विधायक जी से भी फोन पर चर्चा की है, शायद वह भी आएंगे। भैया जी ने टेंट हाउस में सभी सामान बुक कर दिया है। 10 तारीख को दोपहर तक पहुंच जाएगा... सुबह गांव वालों को कार्ड बांटने के बाद दोपहर को बस्ती फिर चलेंगे वहां भी जगह निर्धारित कर लेते हैं..."
    मैंने अपनी सहमति जताते हुए कहा, "हां यह ठीक रहेगा, कल बस्ती चलेंगे और सभी कुछ कहां और कैसे होगा फाइनल कर लेंगे..."
   कमली ने खाना परोसा और हम लोग खाकर चुपचाप लेट गए। कुछ देर बाद मंगल सो गया। मैंने भी आंख बंद कर ली लेकिन थकान के बावजूद मुझे नींद नहीं आ रही थी। यह वही जगह थी जहां पर आज से 5 वर्ष पूर्व हम एकसाथ हंसे थे, मुस्कुराए थे, रोए थे और भविष्य में लिखी जाने वाली माइलस्टोन के दो टीनएजर किरदारों की एक्टिंग करते हुए मैने उससे कहा था, "...मुझे तुम्हारा शरीर नहीं तुम चाहिए, हां तुम चाहिए... इस जीवन्मे तुम्हारा साथ चाहिए... मैं तुम्हारे साथ जिंदगी जीना चाहता हूँ, तुम्हारे बगैर गुजारना नहीं..."
    तभी मुझे महसूस हुआ की कोई मेरे माथे को सहलाते हुए धीरे से बोला। "रोओ मत... सब ठीक होगा, अब तुम आ गए न..."
     मैंने आंख खोलने की लाख चेष्टा की लेकिन वह खुली नहीं। बस मैं धीरे से इतना पूछ पाया, "पीहू तुम आ गई ? टाइम कितना हुआ होगा ?"
    जवाब मिला, "दस बज कर पच्चीस मिनट..."
    "इतना एक्यूरेट..."
     इस बार जवाब के स्थान पर हल्की-सी हंसी सुनाई दी। जवाब कुछ देर बाद मिला, "हां, तुम थक गए हो, अब सो जाओ..."
   फिर एक अजीब-सा नशा, अजीब-सी मदहोशी छाने लगी। शरीर बिल्कुल हल्का हो गया।
    दूसरा दिन ठीक उसी तरह से गुजरा जैसा की मंगल ने पहले से निर्धारित किया था। बस्ती में सब कुछ फाइनल कर लेने के बाद हम लोग फिर शाम को बगिया पहुंचे। मैंने मंगल से कहा, "मंगल आज मैं घर पर रुकूंगा। कल दस तारीख है न, ओम और कुसुम आयेंगे, और उनके साथ दूसरे लोग भी होंगे उन्हें गाइड करना होगा। मेरे ख्याल से उन सभी को तैयार करना होगा कि वे हमारे साथ बस्ती चले और दस की रात हमारे साथ वहीं रुके, लेकिन दिक्कत यही है कि उनके घर वालों से परमिशन कैसे मिलेगी...?"
    मंगल ने विश्वास के साथ कहां,"आप चिंता न कीजिए सर जी, सब रास्ते निकलेंगे, अब जो ठान लिया है वह तो करेंगे ही..."
    शाम को लगभग 6 बजे जब हम घर पहुंचे तो ताला बंद था मतलब सत्य अभी फैक्ट्री से नहीं आया था। मंगल ने मेरा बैग अटारी में रखा। फिर वह गाय-बछिया के इंतजाम में जुट गया। लगभग आधे घंटे के बाद सत्य आया और उधर मंगल भी अपने काम से फुर्सत हो गया था। मंगल ने इच्छा जाहिर की, "सर जी थोड़ी-थोड़ी हो जाय, काफी थकान लगी हुई है..."
  सभी इंतजाम के साथ हम लोग अटारी पर आ गए। मैंने सत्य से पूछा, "कल मंगल बता रहा था कि विधायक जी से तुम्हारी बात हुई है ?"
   सत्य ने मुझे समझाते हुए कहा, "सब कुछ सेट हो गया है। कंपनी मैनेजमेंट के सभी प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया है, उनमें से आधे तो आयेंगे ही। रही बात विधायक जी की तो वह ऐसा मौका नहीं छोड़ने वाले हैं ? आखिर पूरे क्षेत्र के वोट का सवाल है, एक दो कार्य होंगे। अब रही बात गांव की तो उनको मंगल, तुम और पीहू के स्टूडेंट देख ही लोगे ?"
   मंगल ने पूछा, "जी भइया जी, देख लूंगा वैसे कल टेंट का समान कब तक आएगा ?"
   "मैं सुबह 10 बजे जाऊंगा तो कोशिश करूंगा कि दोपहर 12 और 1 बीच सभी सामान गांव आ जाए फिर तुम आगे का देख लेना..."
   मैने सुझाव दिया, "कल कुछ पुराने स्टूडेंट आयेंगे, मैं उनसे भी बात करूंगा, तब तक मंगल तुम गांव चले जाना और लोगों को एकबार फिर सभी जानकारी दे देना..."
     सभी प्लानिंग सेट हो जाने के बाद मंगल चला गया। डिनर बना और हम दोनों ने साथ खाया। सत्य अपने रूम में चला गया और मैं अटारी में वापस आ गया।
    दिन भर की भाग दौड़ के साथ ही पूरा शरीर भी थक चुका था। चारपाई में आंखे बंद कर लेट गया। हल्की सी आहट महसूस हुई जैसे मेरे सिरहाने पर कोई कुर्सी किसका के बैठा हो। मैंने आंखें खोलनी चाही लेकिन नहीं खुली। एक अजीब सा नशा, एक मदहोशी मेरे मन में समाती चली गई, लगा जैसे किसी का नर्म मुलायम हाथ बराबर मेरे माथे को सहला रहा था। धीरे-धीरे मैं गहरी नींद सो गया। रात को जब मेरी नींद खुली तो मैंने देखा बल्ब और पंखा दोनों के स्विच बंद थे। नाइट बल्ब जल रहा था, और मेरे सिरहाने रखा मुलायम कम्बल कंधे तक अच्छे से ओढ़ाया हुआ था। मन में प्रश्न जागा, क्या सत्य आया था ? या फिर...
   मैं बिस्तर से उठा और खिड़की की छड़ पकड़ कर खड़ा हो गया। बाहर देखा हल्की चांदनी बिखरी हुई थी। मुझे बाहर कोई नहीं दिखा। 








   जब सुबह नींद खुली तो सूरज की हल्की सुनहरी धूप खिड़की से होते हुए दीवाल पर टकरा रही थी और खिड़की की सुंदर सी छाया दीवाल में बनी थी। मैं उठा और बिस्तर को ठीक से समेट कर एक किनारे रख दिया और नीचे आ गया। मंगल को गौशाला के पास काम करते हुए देख उससे बोला, "काम जल्दी से निपटा लो और तैयार रहो, आज पीहू के कुछ स्टूडेंट आयेंगे... याद है न ?"
   "जी याद है, आप तैयार रहिए बस 10 मिनट का काम है मैं भी तैयार हो के आता हूँ..."
   9 बजे मंगल के आने के बाद सत्य पूर्व निर्धारित कार्य को संपन्न करने के लिए फैक्ट्री की तरफ चला गया और मैं मंगल के साथ बच्चों के आने का इंतजार करने लगा।
   लगभग दस बजे सुमन और ओम के साथ तकरीबन आठ दस लड़के और आए। सभी से परिचय हुआ। बहुतों से मैं पहले ही मिल चुका था। होने वाले कार्यक्रम की सभी को रुपरेखा बताई और सभी को सहयोग करने के लिए आमंत्रित भी किया। सभी में एक अपूर्व उत्साह का संचार दिखाई दे रहा था। कुछ करने का जज्बा अपनों के लिए। यह तय किया गया कि भागीरथ के साथ चार लड़के मंगल और मेरे साथ बस्ती चलेंगे और बाकी के सभी गांव वालों को होने वाले कार्यक्रम के प्रति जागरूक करेंगे और अधिक से अधिक संख्या में आने के लिए कहेंगे। सभी मंगल के साथ मुख्य बस्ती चले गए और मैं सड़क की तरफ ही गौशाला के पास कुर्सी में बैठ फैक्ट्री की तरफ से आने वाले ट्रैक्टर का इंतजार करने लगा। 




 शरीर भी पूरी तरह से थक चुका था


 छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के माड़िया जाति में परंपरा घोटुल को मनाया जाता है, घोटुल में आने वाले लड़के-लड़कियों को अपना जीवनसाथी चुनने की छूट होती है। घोटुल को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है।इस परंपरा पर उठे विवादों के कारण इसका चलन काफी कम हुआ है। आजवेलेन्टाइन डे के मौके पर dainikbhaskar.com आपको बता रहा हैं इस खास परंपरा के बारे में। क्या होता है घोटुल में 
-यह छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले और साउथ के कुछ इलाकों में खासतौर पर मनाया जाता है।
-घोटुल देश के कई जनजातीय समुदायों में पॉपुलर है। इसमें गांव के बच्चे या जवान एक साथ रहते हैं।
-घोटुल एक प्रकार का बैचलर्स डोरमिटरी होता है। जहां सभी आदिवासी लड़के-लड़कियां रात में बसेरा करते हैं।
-घोटुल में उस जाति से रिलेटेड आस्थाएं, नाच-संगीत, कला और कहानियां भी बताई जाती हैं।
-गांव के सभी कुंवारे लड़के-लड़कियां शाम होने पर गांव के घोटुल घर में जाते हैं ।
-अलग-अलग इलाकों की घोटुल परम्पराओं में अंतर होता है। कुछ में जवान लड़के-लड़कियां घोटुल में ही सोते हैं तो कुछ में वे दिन भर वहां रहकर रात को अपने-अपने घरों में सोने जाते हैं।
-कुछ में नौजवान लड़के-लड़कियां आपस में मिलकर जीवन-साथी चुनते हैं। हालांकि यह परंपरा अब धीरे-धीरे कम हो रही है।
क्या है चेलिक और मोटियारी
घोटुल गांव के किनारे बनी एक मिट्टी की झोपड़ी होती है। कई बार घोटुल में दीवारों की जगह खुला मंडप होता है। शाम को लड़के-लड़कियां यहां धीरे-धीरे एकट्ठे होने लगते हैं और वे ग्रुप में गाते हुए ही घोटुल तक पहुंचते हैं। लड़कों का ग्रुप अलग बनता है एवं लड़कियों का अलग।
घोटुल में कुछ अधेड़ लोग भी आते हैं, लेकिन वे दूर बैठकर ही नाच-गाना देखते हैं। घोटुल में लड़कों को चेलिक और लड़कियों को मोटियारी कहा जाता है।
पहले से कम हुआ घोटुल का चलन
बस्तर में बाहरी दुनिया के कदम पड़ने से घोटुल का असली चेहरा बिगड़ा है। यह खास सोशल एक्टीविटी आखिरी सांसे गिन रही है। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में घोटुल आज भी अपने बदले हुए रूप में देखा जा सकता है।

घोटुल में लड़के-लड़कियां के एक दूसरे के साथ समय बिताने से उन्हें एक दूसरे को समझने का मौका मिलता है। वे यहीं शादी के रिश्ते की भी शुरुआत करते हैं। बाहरी लोगों के यहां आने और फोटो खींचने, वीडियो फिल्म बनाने के कारण ही यह परंपरा बन्द होने की कगार पर है।

बना नक्सलियों की आंखों की किरकिरी
अबूझमाड़ की इस आदिवासी संस्कृति पर देश-विदेश से लोग रिसर्च करने आते हैं। पर यह परंपरा माओवादियों को नापसंद है। इसके लिए उन्होंने बकायदा कई जगह फरमान जारी कर इसपर बंदिश लगाने की कोशिश की है। उनकी नजर में यह एक तरह का स्वयंवर है।
उनके मुताबिक आदिवासियों का जवान लड़के-लड़कियों को इतनी आजादी देना ठीक नहीं है। उनका मानना है कि कई जगह पर इस परम्परा का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है और लड़कियों का शारीरिक शोषण भी किया जा रहा है। कई इलाकों में यह परम्परा पूरी तरह बंद तो नहीं हुई है, लेकिन कम जरूर हो रही है।


(शैलेन्द्र एस.)



  
छोटे से कस्बे का छोटा सा बस स्टैंड था। तीन-चार बसें थी। कुछ क्षेत्रीय गांव की तरफ जाने वाली, उन्हीं में से एक शहर के लिए थी। चाय पीते हुए जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी, मैंने सत्य से कहा, "तुम अपना टाइम क्यों बर्बाद करते हो मैं इसी बस से निकल जाता हूं l..."
     कुछ देर न नुकर करने के बाद आखिरकार वह मान ही गया। हमने चाय खत्म की और बस के पास गया। कुछ देर बाद लौटा, "ये लो टिकट, बस जाने में अभी लगभग आधे घंटे शेष हैं। अपना ख्याल रखना और जो मैंने कहा है भूलना मत ... और पहुंचते ही ज्ञान से फोन करवा देना, उसे फैक्ट्री का नंबर मालूम है, वह मुझे खबर कर देगा... और एक बात पूछनी थी… यदि तुम बुरा न मानो तो...?"
    बस यहीं पर आकर वह खामोश हो गया। जब वह कुछ देर तक कुछ नहीं बोला तो मैंने ही कहा, "नहीं, पूछो कौन सी बात... ?"
   "नहीं कुछ नहीं.... बस ऐसे ही...", उसने दूसरी तरफ देखते हुए और अपने मन की सारी बेचैनी छुपाते हुए मुझसे बोला।
    लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा था, न कह पाने के दर्द से वह भी गुजर रहा था। उसकी बेचैनियां बढ़ती जा रही थी। वह कभी मेरी तरफ देखाता तो कभी दूर किसी दुकान की तरफ। तो कभी बस की तरफ तो कभी चारों तरफ की भीड़ में उसकी निगाहें खो जाती। मैंने मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "सत्य तुम्हें जो पूछना है मुझसे पूछ सकते हो... कोई भी बात मन में न रखो..."
    कुछ पल मेरी तरफ देखने के बाद बड़ी मुश्किल से उसने पूछा, "क्या तुम पीहू से प्यार करते थे... प्लीज मुझसे झूठ मत बोलना..."
    मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा और पूरे विश्वाश से कहा, "हां करता था..."
   "क्या पीहू भी तुमसे...?", उसने कुछ संकोच से पूछा था। नजरे झुकी हुई थी।
    एक पल के लिए लगा कि मैं सत्य की मदद कर सकता हूं। कह दूं उसे, सब कुछ जो हमारे बीच घटित हुआ, जो पीहू ने मेरे लिए महसूस किया और मैंने पीहू के लिए। बयां कर दूं उसकी मोहब्बत को। बता दूं सारी बातें जो हमारे और पीहू के बीच हुई थी।
     उसे एहसास दिलाऊं कि हमारे बीच सिर्फ दोस्ती का रिश्ता नहीं था, और न ही केवल प्यार का था, बल्कि उससे कहीं अधिक दूर निकल चुका था। जहां हम एक दूसरे का सम्मान करते थे तो दूसरी तरफ एक दूसरे के दर्द को महसूस कर रोते भी थे। 
      उसे यह भी एहसास दिला दूं की किस तरह पीहू ने मुझे अपने गले से लगाया था, जहां हमारे दिल की धड़कनों ने एक दूसरे की धड़कनों को महसूस किया था। हर एक जज्बात, हर एक एहसास, मै उसे बता दूं कि किस तरह उसने तुम्हारा नाम मिटा कर मेरा नाम लिखा था। उसे दे दूं वह नोटबुक जिसमें मेरे लिए पीहू ने पत्र लिखा था।
    और अंत में यह भी बता दूं कि वह कविता जिसे लेकर तुम इस भ्रम में हो कि पीहू ने तुम्हारे लिए लिखी थी, वह कभी भी तुम्हारे लिए थी ही नहीं।  उस कविता के हर एक भाव, शब्दों के जज्बात सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए थे। 
     और इन सब का एक प्रमाण भी था, पीहू का तुम्हारे के लिए लिखा गया अंतिम पत्र जिसमें उसकी आखिरी इच्छा थी, "यदि मैं इस दुनिया में न रही तो तुम मुझसे वादा करो की एक बार उसे यहां लेकर आओगे... पता नहीं क्यों मुझे आभास होता है कि मेरी आत्मा को मुक्ति तब तक नहीं मिलेगी जब तक कि वह एकबार यहां न आ जाए..."
   बस यही याद आते ही मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी। तो पीहू ने सच लिखा था, "कुछ सवालों के जवाब, सवाल ही होता हैं...", सत्य का यह अधूरा सवाल मेरे मन में बार-बार उठ रहे एक सवाल का पूरा जवाब था और वह था, "आखिर सत्य मुझे यहां लाया क्यों हैं... आखिर उसके मन में क्या चल रहा है..."
  मैं अपनी आँखें बंद कर कुर्सी से पीठ टीका बैठ गया। सोचता रहा, तो यह पीहू की मुक्ति के लिए मुझे नहीं लाया था, यह तो खुद अपनी मुक्ति चहता है... अपने अपराधबोध से मुक्ति... मुझे जवाब देना है... जो मुझे पीहू के लिखे पत्र में ही मिलने थे। अब पूरा का पूरा पत्र मेरी नजरों के सामने था और उसकी कुछ लाइन मैं हाईलाइट कर रहा था। 
   "पीहू ! हमारे रिलेशन को तीन साल होने को हैं... लेकिन तुम न तो मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो रही हो और न ही कहती हो कि शायद अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं... प्यार तो करती हो न मुझसे...?  गिरेबां पकड़ तुमसे पूछूं कि बताओ किसके लिए छोड़ कर आए थे तुम मुझे ? एक जो अब रहे नहीं, और दूसरा जो इतने सालों बाद मुझसे पूछता है कि बताओ तुम्हारे दिल में कौन है ? अरे तुम्हें कुछ पूछना था तो तुमने उसी दिन मुझसे क्यूं न पूछा, जिस दिन बाबा से मेरे और तुम्हारे बारे में कहा था। दिल में आया कि उसे सब कुछ सच-सच कह दूं। कह दूं कि हां तुमसे प्यार नहीं है, और जिससे करती हूँ, उससे कह चुकी। लेकिन तुमसे शादी न करने की एकमात्र वजह ये नहीं है। मरने वाली हूँ इसलिए नहीं कर रही, ताकि तुम किसी भी रिश्ते से मुक्त रहो, और शायद यह मेरा दुर्भाग्य है कि कुछ ज्यादा ही जी गई... लेकिन बहुत कुछ सोच के रुक गई... मेरी होने वाली मृत्यु को तुम कही अपने सर न ले लो... उस पल पहली बार मुझे तुम्हारी भावुकता से डर लगा था..."
   "उसने शायद धीरे-धीरे अपने मन में मेरा अक्स बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज की लड़की के रूप में स्थापित कर लिया..."
    "बाबा के लिए भले ही सत्य बेहतर विकल्प रहा हो लेकिन मेरे लिए तो तुम ही थे, जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर मैं चली जाती। तुमसे झूठ बोल सकती थी कि मुझे भी पहले कुछ नहीं मालूम था। पीछे रह जाते तुम, तब तुम मुझसे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। तुम तो पहले से ही बिखरे हुए मुझ तक पहुंचे थे। मैं पूरे मन योग से तुम्हें संवारती, अपने नजरिया से एकत्र करती और फिर एक दिन तुम्हें बिखेर, स्वयं चली जाती ? तो फिर बताओ तुम क्या करते ?"
   "कहानी का अंत भावुकता में हुआ। धूर्त और चालाक लोग जो हमेशा से एक अच्छे इंसान के साथ करते आए हैं, वही खुसरो ने फरहद के साथ किया। शीरीं की मृत्यु की झूठी खबर उस तक पहुंचा दी गई और जिसका परिणाम था फरहद की आत्महत्या। अपराध किसी और ने किया और अपराधबोध से ग्रस्त हो शीरीं ने भी स्वयं की हत्या की..." 
   लेकिन नहीं पीहू ! मैं तुम्हें और नहीं मरने दूंगा।  इस अधूरे काम को अब मुझे पूरा करने दो। तुमने ही कहा था न कि मेरे व्यक्तित्व में भावुकता और व्यावहारिकता का अद्भुत सामंजस्य है। तो अब अपनी ही कहीं बात पर विश्वास करने का समय आ गया है।
    मेरे सच कह देने से सत्य का तुम्हारे प्रति मोह भंग हो जाएगा। तुम्हे बेवफा मानकर आसानी से मूव ऑन कर लेगा। लेकिन नहीं यह नियति के फैसले के विरुद्ध है। सत्य से जो गुनाह-ए-अज़ीम हुआ है, वह काबिल-ए-माफी नहीं। पहला, अपने क्षणिक भावनाओं के आवेग में बह कर तुम्हे और खुद को जन्म-जन्मांतर के लिए श्रापित करने का गुनाह। और दूसरा, तुम्हे तन्हा छोड़ कर चले जाने का गुनाह। यदि वह कंपनी के काम से मुंबई जा रहा था तो तुम्हे सब कुछ सच बता गले लगा कर जाना चाहिए था। यूं एहसास दिला कर नहीं कि जाओ मैं तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ।
    और देखो तो नियति ने न्यायाधीश की कुर्सी पर लाकर मुझे बैठा दिया और कहा, अब करो फैसला तुम। सत्य को हमेशा के लिए इन्हीं यादों के भंवर में फंसाए रखना चाहते हो या फिर उसे मुक्त करना चाहते हो ? उसकी मुक्ति मेरे सच बोलने पर है, और झूठ बोलने पर उम्र कैद की सजा।
     अब सत्य को यहां पर अकेला ही भटकना होगा पीहू ! एक श्रापित जीवन जीते हुए। जैसा कि उसने कभी तुमसे कहा था, "पीहू तुम मर के देखो, इन नजरों में तब भी तुम्हारी ही तस्वीर होगी...", यह तो उसका खुद को दिया श्राप था। जब उसने अपनी सजा स्वयं निर्धारित कर ली है, तो अब मैं उसमें कोई अवरोध क्यों पैदा करूं।
     लेकिन कैसे ?.... और देखो तो इसका जवाब मुझे तुम्हारे द्वारा लिखे पत्र में मुझसे पूछे गए एक सवाल में ही मिला, "... क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ?"
   पीहू ! आज सत्य मुझसे पूछता है कि तुम्हे मुझसे प्यार था कि नहीं ? तो ठीक है मैं जवाब दूंगा इसे। 
    तुम्हारे द्वारा सुनाई गई लेडी नॉर्टन की पोयम में है इसका जवाब। जिसका अर्थ मैं पूरी तरह से उस दिन नहीं समझ पाया था, और जिसे मीनिंग के साथ सुनने की लालसा लिए मैं यहां से चला गया था। वह पोयम जिसे तुमने कभी सत्य को सुनानी चाही थी, लेकिन उसने सुनने से इनकार कर दिया था। यहां से लौटने के बाद मैंने इस पोयम को पढ़ा था और सच पूछो कई बार पढ़ा था, तो फिर आज उस पोयम को मैं सत्य को अपने ढंग से समझाऊंगा।
   
    भ्रम !! जो नहीं है, उसके होने का आभास, बेहद ही उलझा देने वाला होता है। यदि कोई भ्रम अंतर्मन में स्थापित हो जाए तो उससे बड़ा सत्य फिर कुछ भी प्रतीत नहीं होता। मैं सत्य के माइंड गेम को समझ रहा था। यदि मैं एक बार स्वीकार कर लूं कि पीहू को मुझसे मोहब्बत थी, तो यह किसी भी अपराधबोध से मुक्त हो जाएगा। निकल जाएगा इन यादों से दूर। अपने ही दिए गए श्राप से मुक्ति पा लेगा। लेकिन यह तो नियत के फैसले की विरुद्ध होगा न !! तो सत्य तुम्हारी सजा यही है कि अब तुम जिंदगी भर इसी भ्रम में रहो की पीहू ने सिर्फ तुमसे मोहब्बत की। हमने बहुत त्याग किया, अब त्याग करने की बारी तुम्हारी है। मैं किसी शीरी का फरहद नहीं, मैं तो पीहू का राइटर हूँ, आखिर उसी की कलम तो थाम रखी है मैने।
 "सॉरी यार... शायद मुझे ये नहीं पूछना चाहिए था...?", सत्य ने मेरे कंधे में अपना हाथ रखते हुए कहा।
    मैंने अंदर ही अंदर खुद को मजबूत किया। अपनी आँखें खोली फिर उसकी आंखों में आंखें डाल कर देखते हुए कहा, "नहीं, अच्छा हुआ कि तुमने मुझसे पूछा। तो जान लो, यह सच है कि उस समय मैं जिस मानसिक स्थिति में गुजर रहा था, तो मेरा झुकाव धीरे-धीरे पीहू की तरफ होने लगा था। तुम्हारी तरह मैं भी उसके साथ जिंदगी जीना चहता था। मैंने अप्रत्यक्ष रूप से अपने दिल की बात उससे कहने की कोशिश भी की, लेकिन उसने कभी भी मेरी बातों को संजीदगी से नहीं लिया, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था।
    उसने सिर्फ मुझे अपना एक अच्छा दोस्त समझा जो जीवन में कुछ खो कर तुम सबके बीच में पहुंचा था। तुम सभी से अधिक समय उसने मेरे साथ बिताया। तो जाहिर है, मेरे इमोशंस को उसने ही अधिक समझा होगा। उसने मुझे भावनात्मक रूप से सपोर्ट किया, लेकिन एक दायरे में रह कर, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था। 
   हम दोनों जब भी अकेले में बात करते तो उन बातों में अधिक से अधिक तुम ही होते थे। तुम्हारे प्यार, तुम्हारी चाहतों का जिक्र ही हमेशा होता था। वह मुझे बताती कि वह तुमसे किस हद तक प्यार करती है, और तुम भी उससे करते हो... अपने प्यार अपनी चाहतों के बीच में उसने कभी भी मुझे नहीं आने दिया, क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था।
    मेरे इतना कहने पर सत्य की आँखें भर आईं, "सो सॉरी यार ... मैंने पूछ कर तुम्हें और अपने प्यार दोनों को लज्जित किया ..."
    मैंने उसकी आंखों में उसी तरह देखते हुए कहा, "कोई बात नहीं, यदि मन में कोई शंका हो तो उसे दूर कर लेना चाहिए। जब मैं तुम लोगों की जिंदगी में आया और उसे मेरे विषय में जानकारी मिली तो उसे दुख हुआ। उसने स्वयं को मेरी प्रेमिका के स्थान पर रख और मुझे तुम्हारे स्थान पर रखकर विचार किया होगा कि एक न एक दिन तुम्हारे साथ भी यही तो होगा... 
    उसकी इस भावना का प्रदर्शन उस एक्ट में हुआ जब वह मेरी बाह पकड़ कर लगातार रोती रही। यहीं से शुरू हुआ दर्द और आंसुओं का संबंध। प्रिय की समस्त वेदनाओं को वफा, बेवफा, पाप और पुण्य जैसे शब्दों की परिभाषाओं से परे हो कर उसे स्वीकार करने का संबंध। उसे मुझ जैसे व्यक्ति से प्रेम नहीं था। प्रेम था तो मेरे आंसुओं से, मेरे दर्द से, मेरी वेदना से। उसे अपनी होने वाली मृत्यु के बारे में अच्छी तरह से मालूम था कि एकदिन वह स्वयं तुम्हें छोड़कर इस दुनिया से चली जाएगी और तुम मेरी तरह ही तड़पोगे, रोओगे, भटकोगे। 
     उसने सोचा, जो जिंदगी यह लड़का जी रहा है, वही जिंदगी एक दिन तुम को जीनी पड़ेगी। तब वह दिलासा देने के लिए तुम्हारे पास नहीं होगी। तभी तो उस लड़के के दु:ख से दु:खी होकर जितनी बार भी उसे गले लगाया, तो वास्तव में तुम्हे गले लगाया था, तुम्हे दिलासा दिया था,  क्यों  ? क्योंकि उसे मुझसे प्यार नहीं था।
    उस वक्त उसकी नजर में हम दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे ही नहीं। शायद इसीलिए उसकी भावनाएं, उसकी ऊर्जा और उसका प्रवाह हम दोनों के लिए एक-सी थी, और वह थी अपने प्रिय की समस्त वेदनाओं को आत्मसात करना। उसे गले लगा उसके दुख-दर्द में शामिल हो उसके लिए अश्रु बहाना। मेरे जीवन में आकर उसने मेरी प्रेमिका के इसी एक अधूरे कार्य को पूरा किया और भविष्य में तुम्हारे प्रति अपने कार्य को भी, जब वह इस दुनियां में स-शरीर न होगी। उस समय मेरे प्रति जो भौतिक प्रेम पीहू के हृदय में तुम्हे दिखाई दिया होगा वह वास्तव में आज के सत्य के लिए एक आध्यात्मिक प्रेम था। एक ऐसा प्रेम जो सदैव के लिए होता है, कालचक्र से परे होता है और किसी के होने या ना होने का मोहताज नहीं होता है..
    अब मेरी बात ध्यान से सुनों, पीहू को हार्ट में प्रॉब्लम है, इस बात को पीहू के अलावा कौन जनता था ? क्या बाबा जानते थे, नहीं न ? तो फिर तुमसे विवाह करने में उसे क्या दिक्कत थी ? वह बाद में तुमसे झूठ बोल सकती थी कि पहले उसे भी जानकारी नहीं थी। सत्य तुम उसके लिए बेहतर विकल्प ही नहीं उसके प्यार भी थे,  जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर चली जाती। पीछे रह जाते तुम, तब तुम उससे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया ? जानते हो क्यों ? क्योंकि वह तुम्हे सच्चा प्यार करती थी, लेकिन तुमने क्या किया, उसे छोड़ कर चले गए न ? तुम्ही ने बताया कि जब उसकी मृत्यु हुई थी तो वह प्रेग्नेंट थी ? तो फिर मुझे बताओ पत्नी या प्रेमिका का ऐसा कौन सा धर्म है जो उसने नहीं निभाया ? जब पहली बार वह तुम्हारे साथ सेक्स के तैयार हुई तो क्या तुमने कुछ पूछा या उससे कहा कि नहीं पीहू हम पहले समाज के सामने शादी कर लेते हैं, ये सब तो बाद में भी हो सकता है ? मुझे नहीं लगता कि तुमने पूछा होगा या कुछ कहा होगा। उसके शारीरिक समर्पण को तुमने विवाह की स्वीकृत समझने की भूल की। और सच कहूं तो यह भूल नहीं थी तुम्हारे अंदर का ललच था कि इसके बाद पीहू कहां जाएगी, उसे तो तैयार होना ही होगा। लेकिन तब भी वह तैयार न हुई तो तुम्हारे अभिमान को ठेस पहुंची... उसकी इस उपेक्षा में तुम्हे बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज लड़की नजर आई, और फिर तुमने दुगने भाव से उसे उपेक्षित किया... अब शायद तुम समझ गए होंगे कि तुमसे विवाह न करने का उसका फैसला तुम्हारे हित में था, ताकि तुम किसी भी सामाजिक रिश्ते नाते में उससे दूर रहो... तुमने समझा कि पति के रूप में तुम्हें अपना कर भी पीहू तुम्हे उपेक्षित कर रही है, तुम्हारा त्याग कर रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि पूरी तरह से पत्नी के रूप में अपना कर तुमने उसका त्याग किया। 
    कुछ रोज पहले ही तुमने मुझसे पूछा था कि क्या मैंने कभी कोई वास्तविक कहानी भी लिखी है... तो जान लो इसीलिए नहीं लिखता। वास्तविक कहानियां किरदारों को सही आईना दिखाती हैं... जो उन्हें मंजूर नहीं। और फिर एक किरदार दूसरे किरदार को इसी तरह अकेला छोड़कर भाग जाता है।
    मैंने लिखा न कि सत्य मेरा दुश्मन नहीं। मैंने हृदय से उसका कभी बुरा कभी नहीं चाहा। इस बीच बस स्टार्ट हो चुकी थी। पीहू सच कहती थी कि मैं किसी की नजर से नजर मिला कर झूठ बोल सकता हूँ, लेकिन अब मुझे सच कहना था।
    मैने अपनी नज़रें उसकी नजरों से हटाते हुए कहा, "...लेकिन मैं दिल से चाहता हूँ कि तुम यहां से निकल जाओ। इन यादों से दूर भाग जाओ। जितना यहां रहोगे, ये यादें उतनी ही शिद्दत के साथ तुम्हारा पीछा करती रहेंगी... तुम्हें जीने नहीं देंगी, तुम प्रतिपल मरते रहोगे... मुझे तो पीहू ने बचा लिया लेकिन तुम्हे बचाने के लिए यहां कोई दूसरी पीहू नहीं मिलेगी... प्लीज सत्य मै सच कह रहा हूं ... तुम्हारा दोस्त हूँ न, इसलिए तुम्हे समझा रहा हूँ... पीहू जैसे किरदार को तो मरना ही था तो वह मर गई... लेकिन तुम्हें तो जिंदा रहना है न ? कैसे यह भी तुम्हें तय करना है ? ... चालों चलते हैं, शायद बस चलने वाली है..."
 और फिर मैं बस में चढ़कर अपनी सीट पर बैठ गया। सत्य नीचे खड़ा था। बस चल पड़ी मैंने खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर कहा, "चलता हूँ... अपना ध्यान रखना... और जो कहा है उस पर शांत मन से विचार करना..."
   बस आगे बढ़ती जा रही थी और सड़के पीछे छूटती जा रही थी। सत्य भी पीछे रह गया। शायद गांव की उन्हीं गलियों में, उसी बगीचे में, उसी धर में। अपनी अनगिनत यादों के साथ, खुद के लिए दिए गए श्राप से श्रापित जीवन को जीने के लिए वचनबद्ध। लेकिन मैं अब अपने सभी वादों और वचनों से मुक्त हो चुका हूँ। पहली बार की तरह इस बार मैंने कोई गलती नहीं की। मैने पीहू को नहीं छोड़ा, उसे अपने साथ ले आया। उसके पत्र की अंतिम कुछ पंक्तियां मेरे मन में अभी भी गूंज रहीं थी.... उसने लिखा था...
    बिछोह के अंतिम पलों में कभी मेरी अटारी की सीढियों को उतरते समय तुमने मुझसे कहा था कि तुम जब भी मुझे पुकारोगी... मैं तुम्हारी पास आ जाऊंगा। पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो।... जानती हूँ उस पल तुमने कोई एक्टिंग नहीं की थी। तो फिर आओ, मैं तुम्हें हृदय से, मन से, और अंतर्मन से पुकार रही हूँ। असंख्य सितारों की तरह मेरी आंखों से झिलमिलाते, चमकते बाहर आ जाओ। मुझे गले से लगा लो, मेरे आंसुओं को पोंछ लो, मेरे साथ जी भर के रो लो। तुम्हारी ही बात तुम्हे याद दिलाती हूँ, सैम्पेथी नहीं कॉन्डनेस चाहिए जो मुझे मेरे अंतर्मन के दर्द से मुक्ति दिला दे... तो देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ मैं उतनी बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ न अजनबी, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ अपनी पीहू को..."
   मैंने तो अपना वादा निभाया। अपनी पीहू को अपने साथ ले कर जा रहा हूँ, यदि सत्य की कोई पीहू बची हो तो उसे रखे अपने पास, मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं। पीहू की यादों और अपने श्रापित जीवन के साथ भटकते रहना अब उसकी नियति है तो भला मैं क्या कर सकता हूँ। तो सत्य तुम अब खड़े रहो उसी अटारी में प्रेम की उन्हीं ऊंचाइयों पर देवत्व का अभिशाप लिए जहां कभी पीहू खड़ी थी, अकेले और तन्हा। शायद यही तुम्हारा प्रायश्चित है। 
   और मैं ? मैं भी उसी अटारी की सीढ़ी के आखिरी पायदान में अपनी उसी पीहू के साथ खड़ा हूँ जो मेरी है... और अनंत काल के लिए मेरी रहेगी। नहीं चाहिए हमे देवी-देवताओं-सा जीवन, इंकार करते हैं हम। हम तो वही भले जहां एक साथ हो।
     सच मानो यदि पीहू से केवल मुझे मोहब्बत होती, वह सिर्फ मेरा प्यार होती तो मैं स्वयं हाथ पकड़ कर तुम्हे इस भंवर से बाहर निकालने में मदद करता। लेकिन नहीं, वह सिर्फ मेरी मोहब्बत नहीं, बल्कि सर्वप्रथम मेरी गर्लफ्रेंड यानी मित्र थी। जिसने कभी मुझे टूटने से बचाया, अपने दृष्टिकोण से सहेजा, मुझे जीना सिखाया। उसने मेरे साथ मित्रता के उसी धर्म का निर्वहन किया जैसा कि कभी तुम्हारे साथ किया था। मुझसे मोहब्बत करना उसका व्यक्तिगत और निजी मामला था उसमें हम कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते और ना ही हमें करना ही चाहिए।
     यदि तुम इंसान हो और तुम्हारे अंदर कोई इंसानियत जीवित है... तो जरा याद करो, बारिश में भींगी हुई उस रात को, जब तुम पहली बार पीहू से मिले थे। अनजाने में बाबा से बोले गए एक झूठ की उसे सजा मिली, किसके लिए ? उसने तुम्हें अपना मित्र माना था और उसे चिंता थी कि यदि इतनी रात को तुम वापस गए तो कहीं तुम्हारे साथ कोई हादसा न हो जाए और उसने तुम्हे रोक लिया था। लेकिन तुम उसे अकेला छोड़कर भाग गए ? तुमने अपने मित्रता के धर्म का निर्वहन क्यों नहीं किया ? अपने प्यार के लिए न सही अपने मित्र के लिए तो रुक सकते थे न ? लेकिन नहीं रुके ? तो फिर... तुम मित्रता के धर्म का पालन न करने और एक रिश्ते को अस्वीकार करने के दोषी पाए जाते हो ?
   लो सत्य ! जो उसने चाहा वह पूरा हुआ। मैं तुम्हारी सोच का सरथी बन, तुम्हारे रथ को कुरुक्षेत्र के उसी स्थान पर ले जाकर खड़ा कर दिया, जहां से तुम्हे केवल अब पीहू और अपने कर्म दिखाई देंगे। पछतावे और अपराधबोध के असंख्य तीर क्षण-प्रतिक्षण तुम्हारी आत्मा को छलनी करते रहेंगे। भ्रम !! जो नहीं है, उसके होने का आभास, तुम्हें जीवन भर उलझा के रखेगा, "पीहू ने सिर्फ तुमसे मोहब्बत की..." 
   और सच मानो, यदि पीहू से मैने सिर्फ प्रेम किया होता, तो मैं तहे दिल से तुम्हे क्षमा कर देता, लेकिन इससे पहले वह मेरी मित्र थी। तो फिर कैसे ? यदि मुझे अपने इस धर्म के पालन के लिए किसी गांधारी का श्राप भी धारण करना पड़ा तो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगा। मैं जा रहा हूँ, अब इस कुरुक्षेत्र को मेरी कोई जरूरत नहीं।
     एक बात और जान लो, प्रकृति अर्थात नियति जो मनुष्य की अनजानी भूलों पर भी उसे कठोर दंड देती है, तुम उसके दोषी पाए गए। वैसे भी कभी तुमने ही कहा था, "पीहू तुम अब मर के देख ही लो, इन नजरों में तुम्हारी ही तस्वीर होगी...", तो फिर भटकों वही तस्वीर लिए।
    इसलिए मैं अब किसी भी अपराधबोध से मुक्त हूँ कि मैंने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया। मैने तो तुम्हारे सामने दोनों विकल्प रखें, अभी भी फैसला तुम्हे ही करना है। एक भ्रम में ही उलझे रहना चाहते हो, या उससे बाहर आना चाहते हो। दोनों में ही तुम्हारी मुक्ति है। 
    बस कस्बे को पार कर एक दूसरे कस्बे के नजदीक पहुंची। चढ़ने वालों की संख्या बहुत अधिक थी। बस रुकती इससे पहले ही एक लड़की लगभग भागती हुई खिड़की के पास आई और मुझसे पूछा, "क्या आपके बगल वाली सीट खाली है ?"
   "जी हां ... खाली है ...", मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया। 
    तब उसने अपने हाथ में पकड़ा न्यूज पेपर मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा "प्लीज इसे उस सीट मे रख दीजिए और रिजर्व कर लीजिए मेरे लिए ..."
   जैसा उसने कहा मैंने किया। बस रुकते ही वह मेरे पास आई।
    "थैंक्स ...क्या मैं विंडो तरफ बैठ सकती हूँ, इफ यू डोंट माइंड ...?", उसने कुछ संकोच से पूछा। 
   "स्योर, आ जाइए ...", और हमने सीट एक्सचेंज कर ली। बस की लगभग सभी सीट भर चुकी थी। दो-तीन आदमी गैलरी में खड़े थे। जब बस चली थी तो मुश्किल से पंद्रह-बीस सवारियां थीं। मैंने उत्सुकता से पूछा, "बहुत लोग चढ़े यहां से, पूरी बस भर गई ?"
    "अधिकांशत: कॉलेज और स्कूल स्टूडेंट हैं, दो-तीन दिन की छुट्टियां थी न, और आज संडे था। कल से स्कूल-कॉलेज खुल जाएंगे। इसीलिए सब लोग जा रहे हैं... वैसे आप ?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
   "मैं अपने एक दोस्त से मिलने आया था... यहीं पीछे वाले कस्बे में...", मैने संक्षिप्त जवाब दिया।
   मेरी बात पूरी होती इससे पहले पीछे बैठे लड़की ने उसे पुकारा, "ये सुनो पीहू ! जब कहानी पूरी पढ़ लेना तो मुझे भी देना, मैं भी पढ़ूंगी ..."
   "हां... ठीक है, अभी तो पढ़नी शुरू की थी कि बस आ गई, रुक पढ़ कर दे रही हूँ...", उसने कुछ पीछे मुड़ते हुए कहा।
    इस नाम को सुनकर एक पल के लिए मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। तो क्या मेरे बगल में बैठी इस लड़की का नाम पीहू है ? अब मैने उसे ध्यान से देखा। लगभग अठारह बीस साल की उम्र, हल्की गोरी रंगत, आइस ब्लू कलर का सलवार सूट, उसी से मैच करता दुपट्टा, ओवल शेप चेहरा, काली आंखे, खुले हुए बाल जिसे बड़े सलीके से हेयर बैंड लगाकर पीछे बांधा गया था। कानों में ब्ल्यू कलर के छोटे-छोटे झुमके, गले में पतली सुनहरी चैन। वह कहानी पढ़ने में व्यस्त थी। अचानक ही उसकी निगाह मुझ पर गई। मुझे अपनी तरफ यूं ध्यान से देखते देख थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा, "क्या देख रहे हैं...?"
   उसकी आशा की विपरीत मैंने उससे खुद ही एक प्रश्न पूछ लिया, "आपका नाम पीहू है ...?"
   उसने आश्चर्य से पूछा, "जी हां ... लेकिन क्यों ? मेरा मतलब आप क्यों पूछ रहे हैं ?"
   "यहां मैं जिस दोस्त से मिलने आया था उसका भी नाम पीहू था..."
   "था...? मतलब .. क्या वो अब ...?", उसने बात अधूरी छोड़ दी। 
    "जी हां ! दो साल पहले उसकी डेथ .."
    "और आप उसकी डेथ के बाद उससे मिलने आए थे ..?", उसके चेहरे में आश्चर्य के भाव थे। 
    "जी ... मुझे उसकी डेथ के बारे में खबर नहीं थी। जब यहां पर आया तो उनके हस्बैंड से यह खबर मिली...", मेरे चेहरे में उदासी साफ झलक रही थी। 
  "ओह नो ! वेरी सॉरी !!! आप बुरा न माने तो एक बात पूछूं ...", उसने दु:ख जताते हुए मुझसे कहा। 
   "जी पूछिए..."
   "वह आपकी फ्रेंड थीं या गर्लफ्रेंड थीं...?", उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा था।
     मैंने उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया बस सीट से अपना सर टिका लिया। मेरी आंखें खुद-ब- खुद बंद हो गई। एक चेहरा मेरी निगाहों में आकर ठहर गया। एक हंसता-मुस्कुराता चेहरा, मेरे साथ रोता हुआ, दुख में मुझे गले लगा के दिलासा देता हुआ चेहरा। न जाने कितनी यादें पल भर में मेरी नजरों के सामने से गुजरने लगी... । 
    बस आगे बढ़ती जा रही थी। छूटते जा रहे थे शरीर और उससे जुड़े मोह-माया के बंधन, जिसकी शुरुआत बहुत पहले उसी अटारी पर उससे अंतिम मुलाकात से हुई थी। 
     कभी मैंने पीहू से कहा था कि हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद अपनी जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते है। दुनिया क्या कहेगी, क्या सोचेगी, इसी में उलझे रह जाते हैं। हम कभी अपने बारे में नहीं सोचते हैं..."
   और फैसला लिया था, अच्छा इंसान होने की यदि यही परिभाषा है तो फिर इतना अच्छा इंसान नहीं बनाना है मुझे, जहां खुद अपनी आत्मा को कष्ट देकर दूसरों के लिए जिंदगी कुर्बान की जाती है, दुनियादारी के बारे में सोचा जाता है। ऐसे लोग, ऐसी दुनिया जो एक दिन खुद तुम्हें छोड़कर चली जएगी उसके लिए मैं पीहू को त्याग दूं। एक बार की गई गलती मैं दोबारा जीवन में नहीं दोहराना चाहता था और इसीलिए मैंने निर्णय लिया था कि मैं आज यहां से जाने के बाद जल्द ही लौट कर वापस आऊंगा। जब सत्य को कोई एतराज नहीं तो फिर मैं इतना क्यों सोच रहा हूँ ?  हमारे बीच पति-पत्नी या फिर प्रेमी-प्रेमिका के रिश्ते का होना ही तो जरूरी नहीं। हमारी रुचि, अभिरुचि, दृष्टिकोण, सोच, विचार सभी कुछ तो मैच करते हैं, तो क्या उसके पास रहने के लिए ये प्राप्त नहीं ? अब मुझे जिंदगी जीने के लिए सिर्फ उसका साथ चाहिए था। जहां हम दो रचयिता एक ही कलम से अपने एक स्वप्निल संसार की रचना करेंगे, बस बाबा को कोई एतराज न हो...
    यही सब सोचते हुए पीहू के कहने पर मैं बाबा से मिलने के लिए बैठक पहुंचा, तो उन्हें आंगन पार कर दरवाजे से बाहर निकलते हुए देखा। उनसे मिलने के लिए मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया। घर के पास एक नीम का पेड़ था जिसमें बैठने के लिए उसके चारों तरफ मिट्टी का चौकोर चबूतरा बनाया गया था। बाबा उसी में बैठ गए और इशारे से मुझे भी बैठने के लिए कहा। उनके पैर छूने के बाद मैं भी कुछ डिस्टेंट से उनके पास बैठ गया। उनका पहला सवाल था, "जा रहे हो...?"
   "...", मैं खामोश रहा।
   "शराब कब से पी रहे हो ....?", उनके दूसरे सवाल ने मुझे थोड़ा-सा विचलित किया।
   "जी... यही कोई आठ-दस दिनों से..."
    "हु... बस आठ दस दिनों से !!.. चलो कोई बात नहीं ... हो सके तो छोड़ दो, यह बुरी आदत है...", बाबा ने मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा, "नियत की फैसले को स्वीकार करो और अब जाओ यहां से..."
    उफ़ ये नियति !! मुझे सहन न हुआ तो मैंने बाबा की विचारधारा का खंडन किया, "बाबा क्या सब कुछ नियति निर्धारित करती है ? कुछ हमारे कर्म भी जीवन की दिशा को निर्धारित करते होंगे न ? जो प्राप्त हो जाए उसे कर्मफल और जो न प्राप्त हो उसे नियति मानकर हम संतोष कर ले ? यदि विधि के विधान ही सब निर्धारित कर देते हैं तो फिर हमारे जीवन में कर्म का क्या महत्व ?"
    उत्तर में बाबा के होठों में हल्की सी मुस्कान आ गई, "अच्छा ! तो फिर यह बताओ ऐसा कौन सा कर्म शेष रह गया था जो तुम उसे प्राप्त न कर सके...? उसके साथ जीवन जी लेने की लालसा को पूर्ण न कर सके...? उसे पराया होते हुए सिर्फ देखते रह गए...? अपने प्रिय व्यक्ति को खोकर तुम शोक में ऐसे डूबे कि एकबार आत्महत्या तक करने की कोशिश कर चुके ? और अब अपने जीवन की इस कमी को तुम पीहू से भर लेना चाहते हो...?"
   बाबा की बात सुनकर मैं अवाक रह गया, "बाबा !!!... ये सब आपको कैसे मालूम ?"
    बाबा ने शांत मन से कहा, "यदि तुम सोचते हो कि यह सब मुझे पीहू ने बताया है तो गलत हो तुम। यह सब तुम्हारी हाथ की रेखाओं में लिखा है, तुम्हारे माथे में लिखा है, जिसे मैं पढ़ सकता हूँ। इसीलिए कहता हूँ कि पीहू के जीवन में तुम्हारा जो कार्य था वह तुम पूर्ण कर चुके। अब यहां रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं..."
    इस बार मैंने फिर विरोध किया लेकिन मेरे विरोध में याचना थी, "बाबा ! आपने मेरे बारे में जो बताया वो सब सच है। लेकिन यदि नियति का सहारा लेकर या मेरी एक कमी के कारण कि मैं शराब पीता हूँ, मुझे उसकी जिंदगी से दूर करना चाहते हैं... तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसी क्षण मैं शराब पीने की बात तो दूर उसे छूने की भावना तक का परित्याग कर सकता हूँ, लेकिन मुझे उसकी जिंदगी से दूर मत कीजिए..."
   "मैं जानता हूं कि तुम ऐसा कर सकते हो... लेकिन तुम्हे जाना होगा...", बाबा के चेहरे में एक अजीब सी कठोरता थी। उनकी यह कठोरता देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं रो पड़ा...
    "बाबा !! इतने कठोर न बनिए !! मेरे बारे में न सही लेकिन उसके बारे में तो सोचिए, मैं उसके जीवन में कोई देवता या मसीहा बन कर नहीं आया हूँ, एक सच्चा मित्र बनकर आया हूँ। उसे मेरी जरूरत है, मुझे उसकी जरूरत है, या यूं कह लीजिए हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। अच्छा ठीक है, मैं उसे किसी भी रिश्ते के लिए मजबूर नहीं करूंगा... प्लीज बाबा मान जाइए...?"
   मैं कुछ देर तक उनके जवाब की प्रतीक्षा करता रहा लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। मै उठा, बाबा के पैर छूते हुए कहा, "बाबा सॉरी, आपको समझे बिना अनजाने में आपसे बहस कर गया... आपके आदेश का पालन होगा। अब स्वयं की इच्छा से मैं यहां कभी दोबारा नहीं आऊंगा..."
   उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा, "नहीं, एक बार फिर तुम्हारी नियति तुम्हें लेकर यहां आएगी, लेकिन तब मैं नहीं रहूंगा। यह समझ लो यह तुमसे मेरी अंतिम मुलाकात है... इसलिए समझा रहा हूँ। अपनी हृदय से शोक की भावना का त्याग कर जीवन पथ पर आगे बढ़ जाओ..."
    "जी बाबा ...", मैंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और जाने के लिए पलटा। दो कदम चलने के बाद ही बाबा ने मुझे पुकारा, "सुनो !! पीहू अभी नादान है... उसे दुनियादारी कभी कोई ज्ञान नहीं है उसके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा, मैं समझ सकता हूँ... और वह निर्णय में ले चुका हूँ। तुम कोई आशा लेकर यहां से मत जाना..."
     भवनाओं के प्रबल वेग ने मेरे कदम ही नहीं रोक दिए बल्कि मैं वापस लौटकर बाबा के पास आया। उनके सामने घुटने के बल बैठ उनकी गोद में सर रख छोटे बच्चों की तरह रोते हुए बोला, "बाबा !! ... मुझे माफ कर दीजिए... मैं कोई सफाई नहीं दे रहा हूं... बल्कि ईश्वर को साक्षी मानकर आपसे एक बात कहता हूँ ... हां मानता हूँ कुछ पल के लिए मैं स्वार्थी हो गया था। आपने सच कहा, मैं अपने जीवन में प्यार की कमी को पीहू से भर लेना चाहता था। उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर उसके साथ जिंदगी जीना चाहता था। लेकिन बाबा इसके लिए क्या मैं सत्य का हृदय दु:खाता ? क्या आपके वचनों को झूठा होते हुए देखता ?  नहीं बाबा नहीं... आपने तो उसका कन्यादान किया है न। यह विचार आते ही मैंने अपनी इस लालसा का भी त्याग कर दिया। लेकिन सच कहता हूँ बाबा, आज उसे छोड़कर जाने का मन नहीं हो रहा है। पता नहीं क्यूं उससे दूर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ। बाबा क्यों लगता है कि जैसे मेरी सांसे रुक जाएंगी। मैं मर जाऊंगा। कभी किसी ने न चाहते हुए मेरा त्याग किया, और मुझे निर्मोही कहां। और वही त्याग आप मुझसे मांग रहे हैं ?  तो फिर बाबा किया, अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग किया लेकिन एक लालसा का त्याग करने के लिए न कहिए। मैं उसके पास रहना चाहता हूँ, किसी रिश्ते में न सही लेकिन एक मित्र के रिश्ते से रहने दीजिए...?"
    बाबा खामोश थे। कुछ देर बाद कुछ गुस्से से बोले, "तुम समझते क्यों नहीं हो, शायद तुम्हारे यहां पर रहने से सब कुछ बिखर जाए... किसी की जिंदगी तबाह हो जाए... लेकिन नहीं तुम्हे तो अपनी पड़ी है... कितने स्वार्थी इंसान हो तुम... मैंने कहा न, मैं उसका बाबा हूँ... उसके भले बुरे के लिए मैं सोच सकता हूँ... इस मामले में मुझे तुम्हारी कोई राय नहीं चाहिए..."
   मैंने उन्हें ध्यान से देखा उनका क्रोध उनकी लाचारी को दर्शा रहा था, "बाबा आप गुस्सा मत होइए... पीहू कहती है, मैं किसी की भी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोल सकता हूँ... तो फिर ठीक है बाबा... यही सही!! मै उसकी आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोलूंगा... कह दूंगा कि प्यार जिंदगी में एक ही बार होता है... और वह मैं कर चुका..."
     कुछ देर जी भर रो लेने के बाद मैंने अपने आंसुओं को पोंछा, "लेकिन बाबा आपसे झूठ नहीं कहूंगा। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ... और जानते हैं बाबा, आपसे मिलने से पहले मन ही मन मैंने एक फैसला लिया था कि मैं वापस लौट कर जल्द ही आऊंगा। पीहू जिस रूप में मुझे अपने पास रखना चाहेगी, मैं उसके पास रहूंगा। बाबा ईश्वर साक्षी है, मैंने किसी लालच या सिर्फ अपने जीवन में किसी कमी को पूर्ण करने के लिए पीहू से प्रेम नहीं किया बल्कि उसकी शख्सियत ही ऐसी है कि धीरे-धीरे मुझे उससे प्यार हो गया..."
   बाबा ने दिलासा देते हुए मुझसे कहा, "नियति अर्थात प्रकृति तुमसे वही मांगती है जो तुम उसे दे सकते हो। तुम्हारे अंदर त्याग करने की अद्भुत क्षमता है,  इसलिए हर बार आवश्यकता पड़ने पर तुमसे वही मांगती है। पीहू का अस्तित्व तुम्हारे लिए नहीं है... यह तुम अच्छी तरह से जान लो... मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिष-शास्त्री नहीं हूँ। लेकिन जहां तक मुझे ज्ञान है उसी के आधार पर कह रहा हूँ कि यहां पर रुक जाना तुम्हारी नियति नहीं है। पीहू तुम्हारी नहीं, सत्य की है। अब जाओ..."
     "जी बाबा आप जो चाहते है वही होगा ... लेकिन सच मानिए बाबा ! मेरा उसके प्रति प्रेम किसी भी भौतिक चाहत से परे था, अब भी है, और सदैव रहेगा। यदि मेरे जीवन में इसी तरह का प्रेम मेरी नियति है, तो मैं उसे अब हृदय से स्वीकार करता हूँ... किन्हीं भी लम्हों में आप अपने आप को मेरा दोषी मत मानिएगा। बाबा ! कभी-कभी मैं छोटी-छोटी कहानियां लिखता हूँ, जाने से पहले अपनी ही लिखी एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहता हूँ...?"
   बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, "हां क्यों नहीं, पीहू ने बताया था कि तुम कहानियां लिखते हो, साहित्य में रुचि है तुम्हारी... सुनाओ मैं सुनूंगा..."
   मैंने उनकी गोद में उसी तरह अपना सर रखे हुए कहना शुरू किया,
   किसी वन में एक महात्मा जी कुटी बना के रहते थे। एक दिन उन्होंने ध्यान दिया कि एक बुलबुल प्रत्येक सुबह और शाम उनकी कुटी में आकर गीत गाता है। धीरे-धीरे महात्मा को उस पंक्षी से लगाव हो गया। वैसे दिनभर वह जंगल में खुले आसमान में घूमता लेकिन शाम को महात्मा के पास उनकी कुटी में बने अपने घोंसले में लौट आता। वह उन्हें रोज गीत सुनाता और महात्मा जी खाने-पीने के लिए कुछ दाने डाल देते। एक दिन उस राज्य का राजा महात्मा जी के पास भूले भटके पहुंचा। शाम का वक्त था। उसने भी बुलबुल का गीत सुना। उसे बुलबुल का गीत और उसकी सुंदरता पसंद आई। उसने महात्मा जी से उस पक्षी को मांग लिया।
   महात्मा जी को भी अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका था। उन्हें भी उस मासूम पक्षी की चिंता थी। अच्छे भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने उसे राजा को भेट कर दिया। 
    राजा ने उसके लिए एक खूबसूरत सोने का पिंजड़ा बनवाया और खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने दिए। उसके पिंजरे को अपने विशेष शयन कक्ष की खिड़की के पास टंगवा दिया। बुलबुल खुश था। सुंदर राजमहल, रहने के लिए सोने का पिंजरा, खाने के लिए अच्छे-अच्छे फल और दाने। वह राजा को रोज सुबह-शाम गीत सुनाता। दिन भर राजा राजकाज के काम में व्यस्त रहता और बुलबुल अकेला उसी खिड़की से बाहर खुले आसमान को देखता बैठा रहता। जब शाम को राजा अपने शयन कक्ष में पहुंचता तो बुलबुल उनसे बहुत सारी बातें करता। राजा भी दिन भर की हुई घटनाओं के बारे में उसे बताता। धीरे-धीरे राजा को बुलबुल से अतिशय लगाव हो गया। बुलबुल की मीठी-मीठी बातें उसका गीत राजा की जरूरत बन गया।
      एक दिन भूले भटके एक दूसरा बुलबुल उसी खिड़की पर आकर बैठा। उसे देखकर पिंजरे में कैद बुलबुल को अपने दिन याद आए। खिड़की पर बैठे बुलबुल ने उसे बाहर की दुनिया की बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें बताई।  फिर दोनों ने एक साथ गीत गाया। राजा के आने पर वह बुलबुल खुले आसमान में वापस उड़ गया। दूसरे दिन वह फिर आया। फिर उसने बाहर की दुनिया की नई-नई बातें उसे बताई। दोनों ने एक साथ गीत गया। यही क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा। पिंजरे में कैद बुलबुल खुश रहने लगा। अब वह दुगने भाव से राजा को भी गीत सुनाता। उसे हर शाम अपने साथी बुलबुल का इंतजार रहता। 
     इंतजार के पल उससे काटे न कटते। तब उसे  धीरे-धीरे अपनी जिंदगी नीरस लगने लगी। उसे महसूस हुआ पिंजरा चाहे सोने का हो या फिर लोहे का, पिंजरा ही होता है। वह भी उस बुलबुल के साथ अपनी पूरी आजादी से खुले आसमान में उड़ना चाहता था। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर गीत गाना चाहता था। खुली हवा में सांस लेना चाहता था। बारिश में भीगना चाहता था। लेकिन वह चाह कर भी ऐसा कुछ नहीं कर सकता था।
    एक दिन उसने अपने हृदय की बात राजा को बताई। उसने कहा कि वह भी अपने साथी बुलबुल के साथ खुले आसमान में उड़ना चाहता है। किसी पेड़ की डाली पर बैठकर उसके साथ गीत गाना चहता है, बारिश में भींगना चाहता है और अपनी मेहनत से किसी पेड़ की डाली में अपना एक घोंसला बनाना चाहता है। 
    राजा ने उसके सामने कुछ नहीं कहा, लेकिन वह समझ गया कि यदि दूसरा बुलबुल यहां आता रहा तो...? राजा डर गया। उसे बुलबुल से बहुत प्यार था। यदि उसका प्यारा बुलबुल यहां से चला गया तो वह दिन भर की बातें किससे करेगा ? अपना दुख-दर्द किससे कहेगा ? सुंदर-सुंदर गीत गाकर उसका दिल फिर कौन बहलायेगा ? प्यारे बुलबुल के बिना क्या उसका जीवन स्वयं नीरस न हो जाएगा ? राजा स्वयं चिंताग्रस्त हो गया। लेकिन उसने अपनी चिंता बुलबुल से जाहिर नहीं की।
    और एकदिन वही महात्मा जी राजा से मिलने राज-दरबार में आए। राजा ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और अपने राजमहल में विशेष अतिथि के रूप में एक दिन के लिए ठहर जाने का निवेदन किया। महात्मा ने सोचा कि चलो इसी बहाने वह अपने प्यारे बुलबुल से भी मिल लेंगे। राजा ने महात्मा को राजमहल के उसी विशेष शयनकक्ष में ठहराया जहां वह अपने प्यारे बुलबुल के साथ रहता था। बुलबुल ने उनसे ढेर सारी बातें की, उन्हें भी बहुत अच्छे-अच्छे गीत सुनाए।
      जब शाम हुई तो उसका साथी बलबुल मिलने आया। उसकी मुलाकात महात्मा जी से भी हुईं। उसने आदर-पूर्वक महात्मा जी को प्रणाम किया। फिर रोज की तरह ही दोनों ने एकदूसरे से गुजरे हुए दिन के बारे में ढेर सारी बातें की। दोनों ने एक साथ गीत गया। इस बीच दोनों ही एक दूसरे में इतना खो गए कि उन्हें महात्मा जी और राजा की उपस्थिति का भी ज्ञान न रहा। महात्मा जी की पारखी नजरों से यह बात छुपी न रह सकी। वे बहुत चिंतित हो गए। उन्हें अपने बुलबुल के भविष्य को लेकर फिर चिंता हुई। इतना अच्छा राजमहल, इतनी अच्छी सुख सुविधा, इतनी अच्छी सुरक्षा उसे और कहां मिलेगी। उन्होंने जाते समय अपने बुलबुल से कहा कि जब उसका साथी बुलबुल उससे कल मिलने आए तो उसे उनके पास भेज दे, वो भी उससे मिलना चाहते हैं, उसका गीत फिर से सुनना चाहते हैं ।
     फिर पता नहीं बाबा क्या हुआ मैं नहीं जनता। यह भी नहीं जानता कि महात्मा जी ने उस बुलबुल से क्या कहा होगा। कुछ कहा होगा या कुछ मांगा होगा ? हां सच में बाबा, मैं बिल्कुल नहीं जनता। लेकिन हुआ ये कि फिर वह बुलबुल दोबारा अपने साथी बुलबुल से मिलने नहीं आया !! सोने के पिंजरे में कैद बुलबुल राजमहल में उसका रोज शाम को इंतजार करता रहा... रोता रहा, उसकी याद में तड़पता रहा। धीरे-धीरे जीवन जीने के प्रति उसकी लालसा खत्म होने लगी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। अब वह राजा से भी कम ही बात करता। उसने गीत सुनाना भी बंद कर दिया। अब वह अक्सर बीमार रहने लगा। राजा ने बहुत कोशिश की लेकिन कोई दवाई कोई हमदर्दी काम न आई। राजा को उसके गीत से प्रेम था, और जब बुलबुल ने गाना ही छोड़ दिया तो धीरे-धीरे राजा भी उसके प्रति उदासीन होता चला गया।  
    और जानते है बाबा फिर क्या हुआ ?  एक रात जोर से बदल गरजे, तेज हवाएं चली, पूरी रात जमकर बरसात हुई, आसमान जी भर के रोया। आंधी से राजमहल के सभी चिराग बुझ गए। घुप अंधेरा जैसे मृत्यु के देवता ने पूरे राजमहल को घेर लिया हो। स्वयं राजा को रात भर नींद न आई। लाखों बेचैनियां लिए वह भी टहलता रहा। 
    दूसरे दिन एक नई सुबह हई। बारिश बंद हुई। आसमान बिल्कुल साफ और स्वच्छ हो गया । सूरज की सुनहरी किरणों से सोने का पिंजड़ा जगमगा उठा। राजा ने पिंजरे के पास जा कर देखा, उसका प्यार बुलबुल सोने के पिंजड़े से आजाद हो चुका था।
   मैं उठा, बाबा की तरफ देखा उनकी आंखों से आंसू छलक आए थे। बड़ी हिम्मत करके मैंने उनके आंसू पोछे, "नहीं बाबा रोते नहीं... यह तो महज़ एक कहानी है... सच थोड़े न है... वैसे भी कुछ तो मेरे लिए छोड़ दीजिए... अब चलता हूँ.... इजाजत दीजिए..."
    और फिर बाबा को पुनः प्रणाम कर, उन्हें उसी तरह बैठा छोड़ मैं वापस चल पड़ा था। 
    जब मैंने आंखें खोली तो मेरी आंखों के कोर भीगे हुए थे। विंडो सीट पर बैठी उस लड़की की नजरे मुझ पर टिकी हुई थीं। मैने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, "सॉरी..."
    वह मुझे गौर से देखती रही फिर उसने अपनी रुमाल मेरी तरफ बढ़ाई। मैंने हाथ के इशारे से मना करते हुए कहा,, "नो थैंक्स, इट्स ओके..."
   उस लड़की ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, "नो... इट्स नॉट ओके..."
   उसके द्वारा कहे गए इन शब्दों से मुझे तेज झटका लगा। मैं उसकी तरफ देखता रह गया और फिर जब कुछ न सूझा तो कांपते हाथों से उसकी रुमाल थाम ली। अपने आंसू पूछते हुए और बात बदलते हुए पूछा, "आप पढ़ती हैं... ?"
    "जी ... बीएससी सेकंड ईयर..."
     मैंने पेपर की तरफ इशारा करते हुए उससे फिर पूछा, "साइंस की स्टूडेंट हैं... और कहानी पढ़ती हैं..."
    "हां मुझे पसंद है... और जरूरी नहीं की साइंस का स्टूडेंट कहानियां न पढ़े...", फिर उसने पेपर को पीछे अपनी सहेली की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो तुम पढ़ लो, मै बाद में पढ़ लूंगी..."
    बस चलती, अपने कुछ स्टॉप पर रूकती और फिर आगे बढ़ जाती। ठीक उसी तरह हमारी बातें होती। कुछ पल के लिए ठहरती फिर शुरू हो जाती। बातों के इस सिलसिले में मैंने उससे पूछा, "अपने नाम का अर्थ आपको मालूम है...?"
   "नहीं ... आपको तो मालूम ही होगा ? तो बता दीजिए ?", उसने उत्सुकता से पूछा।
   "पपिहा पक्षी को जानती हैं...?", मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा। 
   "यूं मीन... हॉक कुक्कू... हां याद आया !! ... वह पीहू ... पीहू बोलता है ... है न ? तो इसका मतलब क्या ? यह तो उसकी बोली है..."
   "हां आप सच कहती हैं। लेकिन इसे और डीप सेंस में सोचिए। वह पक्षी केवल बरसात का पानी पीता है... कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि वह केवल स्वाति नक्षत्र का पानी पीता है। वह पीहू ... पीहू बोलकर उस नक्षत्र को पुकारता है। यह उसकी एक करुण पुकार है, जो प्रकृति से अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र के लिए होती है।
     इसलिए इस पक्षी को चातक अर्थात जैकोबिन कुक्कू भी कहते हैं। तो मेरे कहने का अर्थ यह है कि आपका नाम एक प्यासे पक्षी की करुण पुकार है, जो अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वाति नक्षत्र को पुकारता है। पीहू ... पीहू ... पीहू ... का अर्थ यह हुआ, प्यासा हूँ... प्यासा हूँ... प्यासा हूँ... संपोज यू लव समवन एंड ही इज आउट आफ योर साइट एंड वाइल सर्चिंग फॉर हिम देन यू से, चातक-सी अंखियों में प्यास लिए, स्वाति नक्षत्र को खोजा करती हूँ..."
   "वाह वंडरफुल !! ... आपने तो इस नाम पर फुल पीएचडी कर रखी है... शी वास वेरी लकी !!! ... आपको तो राइटर होना चाहिए, वैसे क्या करते हैं आप...?", उसने मुस्कुराते हुए पूछा। 
    "प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पड़ता हूँ..."
    बातों का सिलसिला चलता रहा। कभी वह मेरे बारे में कुछ पूछ लेती तो कभी मैं उसके बारे में कुछ पूछ लेता। सफर कटता जा रहा था। कुछ देर बाद ही मंजिल आ गई। बस रुकती उससे पहले पीछे बैठी लड़की ने उसे पेपर वापस करते हुए कहा, "पीहू !! कहानी पढ़ना, बहुत अच्छी है..."
    मैं बस से नीचे आया। टेंपो की भीड़ उतरती सवारियों को घेर कर खड़ी हो गई। आपस में होड़ लगी थी। मैंने एक टेंपो में अपना बैग रखा और उससे पूछा, "गवर्नमेंट रेस्ट हाउस की गली तक चलना है, चलोगे...?"
    "जी... बैठिए दो-तीन सवारी और मिल जाए फिर चलता हूं..."
   वह लड़की मुझसे चंद कदम दूर खड़ी थी। एक दूसरे से नजर मिलते ही वह थोड़ा सा मुस्कुराते हुए मेरे पास आई। वह कुछ पूछती इससे पहले मैंने पूछा, "मैं रेस्ट हाउस तरफ जा रहा हूँ, क्या आपको भी चलना है...?"
   "नहीं मेरे पापा मुझे लेने के लिए आ रहें होंगे। मैं न मिली तो परेशान होंगे। मैं तो आपसे एक बात पूछने के लिए आई थी। मेरा नाम तो जान लिया और अपना नाम बताया ही नहीं...?"
   उसके एक कंधे पर बैग लटका हुआ था और दूसरे हाथ में वह न्यूज़ पेपर था। मैंने मुस्कुराते हुए उसके हाथ से न्यूजपेपर ले लिया। उस पेज को खोला जिस पर कहानी छपी थी। कहानी के टाइटल के नीचे लिखे नाम पर अपनी उंगली रखते हुए उसे दिखा दिया।
     वह आश्चर्यचकित मुझे देखते हुए बोली, "ओह ! तो आप सचमुच राइटर है... तब तो आपका ऑटोग्राफ लेना चाहिए..."
    "नहीं... बिल्कुल नहीं। अभी इतना बड़ा राइटर नहीं बना हूँ... लेकिन जरा रुकिएगा, मुझे आपसे एक फेवर चाहिए..."। 
     मैने टेंपो में रखे बैग से अपनी डायरी निकाली, उसके कुछ पन्ने फाड़ उसे देते हुए बोला, "ये आपके लिए..."
   उसने पहले पेज के टॉप में लिखे हुए टाइटल को पढ़ते हुए पूछा, "सोने का पिंजड़ा... ये क्या है... कोई कहानी है क्या...?"
  मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "हां... अब ये कहानी आपकी है... इसी पेपर में पब्लिशिंग के लिए एक पता लिखा है, नए राइटर के लिए एक कंपटीशन भी है जिसमें सेलेक्ट होने वाली कहानियों को पब्लिश किया जाएगा। इसे ए - 4 साइज के पेपर में अपनी हैंडराइटिंग में लिखकर अंत में अपना पूरा नाम, पता के साथ अपने हस्ताक्षर कर दीजिएगा। फिर एक लिफाफे में अच्छे से फोल्ड करके अखबार में लिखे पते पर पोस्ट कर दीजिएगा...
    वह बच्चों की तरह खुश होते हुए बोली, "अच्छा ! मेरे नाम से छपेगी...?"
   मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "ऑफकोर्स और कुछ दिनों बाद आपको प्राइज या फिर न्यूमेरशन का चेक भी आ जाएगा... इसलिए यदि बैंक में अकाउंट न खुला हो तो खुलवा लीजिएगा..."
    "पैसों का मैं करूंगी क्या... आप अपना पता दे दीजिए मैं आपको भेज दूंगी...", उसने शालीनता से कहा।
   "मेरी तरफ से गिफ्ट समझिएगा, और मिले पैसों से अपने लिए अपनी पसंद की बुक खरीदिएगा...", फिर मैंने कुछ संजीदगी से कहा, "संकोच मत कीजिए, रख लीजिए, इस कहानी को आपके नाम का इंतजार था। इंकार मत कीजिए..."
   उसने मुझे गहरी दृष्टि से देखते हुए कहा, "मैं समझ गई... इसीलिए आपने फेवर शब्द का यूज़ किया था..."
   मैंने भी उसे ध्यान से देखा। उसकी आंखें गहरी बदामी रंग की नहीं हैं, चेहरे का रंग बहुत गोरा नहीं है, हंसते समय गालों में डिंपल नहीं पड़ते हैं, उसके बाल भी स्विडिश स्टाइलिश डार्क गोल्डन और कर्ली नहीं हैं, इन सबके बावजूद उसके पास एक चीज है, उसका नाम "पीहू..."।
    तभी टेंपो वाले ने कहा, "भैया जी बैठिए... चलते हैं..."
    मैंने उसकी तरफ एक बार फिर देखा। मेरे लबों में फीकी-सी मुस्कान आ गई और आंखों कुछ भर आईं। पीहू ने पहली बार बिछड़ते समय सच कहा था,  "मै तुम्हे जिंदगी के हर उस मोड़ पर मिलूंगी जब तुम उदास होगे, अपने आप को अकेला महसूस करोगे... अपने एक नए रूप में... एक नए अंदाज में..."
   अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए मैने कहा ... "पीहू !! इसे भेजना, ये जरूर पब्लिश होगी। अपना ख्याल रखना... अच्छे से पढ़ना... अब मैं चलता हूँ..."
    अपने आंसुओं को धीरे से पोंछते हुए मैं टेंपो में चुपचाप बैठ गया। टेंपो वाले ने गेयर डाला और वह एक झटके से पीछे छूट गई। मैंने मुड़कर देखा और मुस्कुराते हुए अपना हाथ हिला दिया। प्रतिउत्तर में उसने भी मुस्कुरा कर मेरी तरफ अपना दाहिना हाथ हिलाया, "बाय..."
( कहानी "अजनबी " से)


✍️
(शैलेन्द्र एस.)

जो लोग मुझे जानते हैं, तो वो जानते हैं।
जैसा मैं दिखाता हूँ वह हूँ नहीं,
और जो मैं हूँ, लोग उसे देखना नहीं चाहते।

भटकती रह गई एक रात मेरी,
तुम्हारे बाजुओं में सो न पाई।
बहुत कुछ होता है दुनिया में लेकिन,
यही एक चीज़ थी जो हो न पाई।
तसल्ली अपनी अपने पास रखो, 
मुझे दर्द की ये रातें हैं प्यारी।
ये मेरा इश्क है, मेरा ही रहेगा,
मुझको जरूरत ही नहीं है तुम्हारी।
(मनोज मुंतशिर)

जिंदगी भर की कमाई है ये ज़िद,
सबा को प्यार करने के लिए,
मुझे सब की भी जरूरत नहीं।

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