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The letter

प्रिय सत्य,      हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी ख्वाइश पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से भी छुपा के रखा, क्या यही उसकी भूल थी ?       मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया।        बाद में मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो...