The letter

प्रिय सत्य,
     हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी ख्वाइश पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से भी छुपा के रखा, क्या यही उसकी भूल थी ?

      मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया। 

      बाद में मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो तुम्हे विवाह के लिए मना नहीं किया था ? यह शिकायत आज भी है और शायद हमेशा रहे कि इन दो महीनो में तुम, यदि बाहर थे भी, तो कंपनी के किसी न किसी मुलाजिम से पीहू या मंगल तक अपने मुंबई में ट्रेनिंग करने की खबर तो पहुंचा सकते थे ? लेकिन तुमने ऐसा करना जरूरी नहीं समझा, जबकि तुम्हारी कंपनी के कई ट्रक माइंस और कंपनी के बीच रोज चलते थे। जरा सोचो सत्य, जिसका पूरा परिवार उसे छोड़ कर चला गया, बाबा ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया था, उसे लड़की को तन्हा उसके घर में छोड़कर चले गए, किस के भरोसे? 

      यदि कभी पीहू के दर्द को समझना हो, मेरे प्रति उसके प्रेम की तीव्रता का अंदाजा लगाना हो, तो उस पत्र में लिखें इन शब्दों को पढ़ना जो उसने मेरे लिए लिखा था, 
       एक दिन हमारे जीवन से सत्य-असत्य, पाप-पुण, मोह-माया, यथार्थ-कल्पना इत्यादि के भेद खत्म होने लगते हैं। जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान इन सभी की परिभाषाएं संकुचित होने लगती हैं। फिर इनका कोई मोल नहीं रह जाता है। मन का सूनापन, बेचैनिया, उदासी ये सभी जीवन में इतने प्रभावशाली और करीब होने लगते हैं कि अंत में यही हमारे लिए अंतिम सत्य बन जाते हैं। हमें अपने अवसाद से प्रेम होने लगता है। हम ऐसे गहन अंधकार में डूब जाते हैं, जिसमें फिर कोई रौशनी हो भी जाए तो आंखों को चुभने लगती है। आज-कल मैं एक ऐसे ही दौर से गुजर रही हूँ। तुम्हारी स्मृतियां किसी उजाले से कम नहीं। यह जितने ही प्रभावशाली ढंग से मेरे मन में उजागर होती हैं, उतनी ही कस के मैं अपनी आँखें भींच लेती हूँ..."

     मेरे जीवन में पीहू का स्थान क्या था ? उसके प्रति प्रेम की तीव्रता इसी बात से तुम लगा सकते हो कि यदि मुझे तुम तीनों में से किसी एक का चुनाव करना होता तो मैं निश्चित ही पीहू का चुनाव करता, और सच मानो सत्य, मैंने कर भी लिया था। उसकी खुशियों में अपनी खुशियों की ही नहीं, अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व की तलाश करने लगा था। लेकिन इन सब का आभास होते हुए भी, तुम्हारे और बाबा के चाहने पर, मैंने उसे छोड़ दिया, यह सोचकर न कि तुम लोगों के बीच वह खुशहाल ज़िंदगी जीएगी ? तुम सभी मिलकर उसे खुश रखोगे, उसके साथ रहोगे... क्या यह मेरी गलत सोच थी ? इस तरह पीहू ने जो कुछ मेरे लिए लिखा वह भी सही था। 

     मैंने भी उसके साथ वही किया जो उस लड़की ने कभी मेरे किया था; मुझे बिना कुछ बताएं वह चुपचाप मेरी जिंदगी से दूर चली गई। और पीहू ने मेरे साथ वही किया जो मैने उस लड़की के साथ किया। उसे बड़ी सहजता और सरलता से अपनी जिंदगी से जाने दिया। मैं मंगल को कम से कम एक पत्र तो लिख ही सकता था, लेकिन नहीं लिखा। 

     मैंने तुम्हारे कहने पर जब भी पीहू से तुम्हारे बारे में बात की उसने हर बार यही स्वीकार किया कि तुम उसके सबसे अच्छे दोस्त हो। तुम्हारे और उसके बीच वैवाहिक संबंधों की जब भी बात छेड़नी चाही, तो वह या तो खामोश हो गई या फिर उसने बातों की दिशा ही बादल दी। 

     अटारी में उस दिन तुम्हें पति के रूप में स्वीकार करने से पूर्व उसने बड़ी ही बेबसी के साथ मेरी आंखों में देखा था। उसकी वो नजर मेरी अंतर्मन में, जीवन के संपूर्ण अस्तित्व में आज भी समाई हुई है, मुझसे एक सवाल पूछते हुए, बताओ अब मैं क्या करूं ? यदि उस दिन मैंने उसे इशारा न किया होता, तो सच मानो, तुम रोते रहते, बिलखते रहते, रूठे रहते या फिर शायद तुम उसे छोड़ कर चले जाने की धमकी भी देते, तो भी वह कभी स्वीकार नहीं करती। एक मजबूत इच्छा शक्ति की लड़की ने मेरे एक इशारे पर अपनी समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया। बस उसी क्षण मैंने समझ लिया था कि मैं उसके जीवन में क्या स्थान रखता हूँ। मैंने एक पल में उसे पाया और दूसरे ही पल में उसे खो भी दिया। यदि अब तुम समझ सकते हो तो समझ लो मेरे दर्द को भी। 

     उस पल के बाद मैं तो खामोश हो गया लेकिन उसने हार नहीं मानी। कभी एक्टिंग के बहाने तो फिर कभी रोते हुए मुझे गले से लगाकर, मेरे हृदय में अपने लिए छुपे प्रेम को वह कुरेदती रही। प्रतिपल मुझे जताती रही कि उसे मुझसे प्यार है न कि तुमसे। मैं भी एक इंसान था सत्य, मेरे भी कुछ जज्बात थे। उससे प्यार होते हुए भी मैं खुद को और कितने समय तक के लिए रोक पाता; ? और अंत में हम दोनों ने ही खुले मन से एक दूसरे के प्रेम को स्वीकार किया। 

      जरा तुम गहराई से सोचना, मेरा ऐसा करने से कम से कम उसे इस बात का तो हमेशा संतोष तो रहा होगा कि जिस लड़के को उसने चाहा, जिसे अपनी बची-कुची जिंदगी में शामिल कर जिंदगी जीने के सपने देखे, उस लड़के ने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ उससे मोहब्बत की। स्वीकार्यता कोई बंधन नहीं, मुक्ति देता है। उसदिन हम दोनों ही न कह पाने के दर्द से मुक्त हुए थे।

    जल को जीवन का उद्गम माना जाता है, आधार माना जाता है। उसका नदी के शांत जल में, हम दोनों के चेहरों की परछाइयो के बीच में एल... ओ... व्ही... ई... अक्षरों का लिखना कई मायनों में एक संदेश था। उसने चाहत भरी नजरों से मेरी तरफ देखते हुए जैसे मुझे समझा रही हो, हमारी मोहब्बत पानी में लिखी इबारत की तरह है, जो भले ही किसी को न दिखाई दे, लेकिन इस जल में घुली हुई, हर बंधनों से मुक्त, निरंतर प्रवाहित होती रहेगी; और ये जीवन धारा एक किनारे को दूसरे किनारे से सदैव मिलाती रहेगी। 

   उसने कभी मुझे चलती हुई राहों में कहा था, किसी के साथ सहजता और सरलता से जीवन व्यतीत कर लेने को प्यार नहीं कह सकते, और देखो तो ये सच साबित हुआ। आज मुझे समझ में आ रहा है कि उसे सभी ऐतिहासिक प्रेम कहानियों में शीरीन और फरहाद की ही प्रेम-कहानी क्यूं पसंद थी। मैं मानता हूँ कि मुझ में लाख कमियां सही लेकिन फरहाद की तरह कोई न कोई खूबी तो रही होगी न ? यकीनन पीहू ने मेरी उसी खूबी से मोहब्बत की। वह जानती थी कि कभी न कभी मेरी भावुकता का फायदा उठाने की कोशिश भी की जाएगी। शायद इसीलिए उसने बार-बार मुझे सचेत किया था, "तुम किसी शीरीन के फरहाद मत बनना। सामने वाले इंसान को हम अपने जैसा निश्चल समझने की भूल कर लेते हैं, जबकि यह दुनिया चालक, धूर्त और फरेबी लोगों से भरी पड़ी है। 

    जाने की शाम को जब अटारी में पीहू को तन्हा छोड़ तुम्हारे बेडरूम में आया तो तुम्हे अपने बिस्तर में बिखरा सोते हुए देखा। तुम्हारे अंतर्मन की सारी थकान तुम्हारे चेहरे पर दिख रही थी, इस वक्त मुझे आभास हुआ कि इस समय तुम किस अंतर्द्वंद्व से गुजर रहे थे। यह आभास होते ही तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अथाह करुणा में जन्म लिया। तुम्हारे चेहरे की मासूमियत देखकर महसूस हुआ जैसे इस मृत्यु लोक में एक श्रापित और अभिशप्त देवता गहरी नींद सो रहा है। मैं तुम्हारे माथे को सहलाते हुए सिरहाने में कुछ देर तुम्हें देखते बैठा रहा। सोचता रहा, क्या इसी सोते हुए मासूम देवता ने हमारे साथ छल किया ? हां सत्य ! मैंने तो बाबा से मिलने के बाद उसी क्षण समझ लिया था कि बाबा का स्वभाव मेरे प्रति अचानक ही कठोर क्यों हो गया ? तब भी मेरे मन में तुम्हारे प्रति किसी कलुषित भावना ने जन्म नहीं लिया, जानते हो क्यों?

      क्योंकि पीहू तुम्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती थी, बेस्ट फ्रेंड्स थे तुम उसके !! कभी तुम उसके जीवन में खुशियां लेकर आए थे, और उसके बदले में तुमने प्यार चाहा, तो तुम गलत कैसे हुए ? खेल तो नियति का था। सितारों की दुनिया में दो सितारों की कहानी लिखी गई जो इस धरती में घटित हुई। हमारा मिलना और बिछड़ना सब कुछ वही तय हुआ, हमारे मिलने से पहले ही !! मेरा और पीहू का मिलना और घटनाओं का उसी तरह घटना, मात्र उस कहानी का रिप्ले था। ठीक उसी पल मैंने पीहू को छोड़ देने का फैसला लिया और रोते हुए उसके लिए आखिरी कविता लिखी, "जा तुझे छोड़ दिया..."

      मैने पीहू को ले कर कभी तुम्हारे प्रति कोई कटुता या जलन की भावना स्थाई रूप से नहीं रखी, मैं चला आया फिर कभी न लौटने के लिए। हम दोनों ही स्वार्थी थे, मैने उसके त्याग में सुख देखा और तुमने मिलन में !। लेकिन पीहू क्या चाहती थी, हमने कभी सोचा ही नहीं यार। क्यों ?

      और अंत में एक प्रश्न मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ, भूत, वर्तमान और भविष्य की समय रेखा पर हम दोनों एक साथ क्यों चलते रहे ? कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं जो या तो घटित हो चुकी थी या जो आगे होने वाली थी, उनका आभास ही नहीं उनके दृश्य मुझे क्यों दिखाई देते रहे ? पीहू को क्यों आभास हुआ कि कोई अजनबी उसके जीवन में आने वाला है और एक दिन उसे छोड़कर चला भी जाएगा ? 

     यह हम दोनों के जीवन का एक ऐसा रहस्य है, जिसके बीच हम सदैव जीते रहेंगे। सच कहूं तो उसकी मृत्यु के शोक से मैं अब दूर हो चुका हूँ। उसकी सुंदरता, उसका शरीर, कभी मेरे लिए था ही नहीं और जो था उसकी मृत्यु संभव नहीं। वह तो सदैव मेरे पास रहेगा, जीवन के इस पार भी और जीवन के उस पार भी, ठीक नदी में प्रवाहित उस जल की तरह जो इस किनारे पर भी होता है और उस किनारे पर भी। उसी नदी की बहती हुई लहरों में हमारी मोहब्बत की कहानी सदैव के लिए अमिट अक्षरों से लिखी रहेगी... 

   अब शायद तुम्हे समझ में आ गया होगा कि उसने अपना अंतिम संस्कार उसी नदी के किनारे क्यूं चाहा था।  सच पूछो सत्य तुम इस कहानी का हिस्सा नहीं हो, इसलिए तुम बेवजह इस कहानी में खुद की तलाश मत करो। न ही हमारे प्रति कोई सैंपथी रखो, मुक्त कर लो खुद को, दूर हो जाओ अपने शोक से।

    यदि नहीं तो अब कुछ घटनाओं को निष्पक्ष भाव से जरा सोचो,  मेरे आने के तीन दिन पहले ही पीहू को किसी अजनबी के आने का आभास क्यों हुआ ?  यहां पहली बार आने पर ही मुझे यह आभास क्यों होता रहा कि जैसे मैं यहां पर पहले भी आ चुका हूँ ? क्यों आम के पेड़ के नीचे एक लड़की को सर तक चुनरी ओढ़ कर लेटे हुए देखा ? जैसे कि बाद में पीहू मेरी याद में लेटा करती थी। क्यों मंगल, कमली, बाबा के चेहरे मुझे जाने-पहचाने से लगे। नदी पार के मदिर का पीहू के स्वप्न में आना और बाद में उसकी पुष्ठि उस आदिवासी लड़के द्वारा भी की गई, जिसने हमें कुछ दिन पहले ही इस मंदिर में एक साथ देखा था ? हम ठीक उसी तरह क्यों बिछड़े जैसा कि उसने स्वप्न में देखा था ? 

       जब मैंने पहली बार अटारी की तरफ देखा तो मुझे ठीक उसी तरह की हालत में हूँ-ब-हूँ पीहू जैसी एक लड़की लेटी हुई नजर आई, जिस हालत में आगे चल कर पीहू ने अपने जीवन की अंतिम सांसे ली होंगी। उसकी खुली हुई आंखें सीढ़ी के अंतिम पायदान पर किसके लिए टिकी थी ? और बाहर आने पर क्यों मैने खिड़की की छड़ पकड़े हुए उसी लड़की को देखा जैसे कि उसे किसी के आने का इंतजार हो ? पीहू के द्वारा देखे गए आखरी स्वप्न को जाते-जाते साकार रूम में मैने उसी शाम क्यूं देख लिया था ? और सबसे अंत में, रात में अलग-अलग समय में तुम्हारी घड़ी का बंद होना और मेरे द्वारा देख लेने के बाद उसका फिर से चालू हो जाना, तुम इसे क्या मानते हो ? जरा खुद से पूछना, क्या उसके बाद तुम्हारी घड़ी कभी बंद हुई ?

    मैं भाग्यवादी अंधविश्वासी और संयोग की दुनिया में जीने वाला इंसान नहीं, फिर इस कहानी को मेरे साथ ही क्यों गुजरना था ?

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