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अजनबी - 4 (वह पत्र)

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पुनरिश्च :     जैसा कि कभी राइटर ने पीहू से कहा था, कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी उसके अंतर्मन में ये कहानियां हमेशा चलती रही, शायद इसलिए कि ये फिर्फ एक कहानी ही नहीं छोटे-छोटे लम्हे थे जो कुछ किरदारों ने एक साथ जिए। राइटर भी उन्हें किरदारों में से एक था।      भले ही राइटर ने इसे आज लिखा हो, लेकिन उसके जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। माइलस्टोन 18 साल की और अजनबी 23 साल की उम्र में शुरू हुई। माइलस्टोन से उसे लिखने की प्रेरणा मिली, उस लिखावट को तराशा अजनबी ने और उसे प्रेम की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के साम्य बिंदु पर दार्शनिक अंदाज दिया "आह! तुम कहां गए" ने।      एक ने उसे अवसाद से भर दिया, इतना की कभी उसने आत्महत्या तक करने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ दूसरी कहानी ने उसे जीवन को हर हाल में जीने और स्वीकार करने की लालसा मन में पैदा की। इतनी गहरे इमोशंस दिए कि उसे समझ आ गया कि हंसी-खुशी, दुख-दर्द यह सब जीवन का ही हिस्सा है, इन्हें एक समान भाव से जीना चाहिए, स्वीकार करन...

मैं तुम्हारी पीहू

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मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी,  फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे, जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे, उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने। प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।    तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:- जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए, उस शहर उस गली, उस घर को सलाम। जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया, उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम। ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।    तो लो, अब फि...