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The letter

प्रिय सत्य,      हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी ख्वाइश पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से भी छुपा के रखा, क्या यही उसकी भूल थी ?       मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया।        बाद में मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो...

अजनबी - 4 (वह पत्र)

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पुनरिश्च : मैं न तो राइटर हूँ न ही सत्य, और न ही पीहू। मैं आपको वो बातें बताने जा रहा हूँ जो राइटर ने अभी तक इस कहानी में नहीं लिखी। मैं उसके साथ-साथ चलता रहा, इस कहानी को घटित होते हुए देखता रहा। जैसा कि कभी राइटर ने पीहू से कहा था, कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी उसके अंतर्मन में ये कहानियां हमेशा चलती रही, शायद इसलिए कि ये फिर्फ एक कहानी ही नहीं छोटे-छोटे लम्हे थे जो कुछ किरदारों ने एक साथ जिए। राइटर भी उन्हें किरदारों में से एक था।      भले ही राइटर ने इसे आज लिखा हो, लेकिन उसके जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। टीनएज में माइलस्टोन और युवा अवस्था में अजनबी की।       पीहू की मृत्यु की जानकारी ने उसे कुछ महीनों तक शोक में रखा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया तो उसे पीहू और सत्य दोनों के जीवन से प्रेरणा मिली। यह सच है कि पीहू और राइटर दोनों ही ने एकदूसरे को अपने जीवन में शामिल कर ज़िंदगी जीनी चाही, लेकिन कुछ कारणों से ऐसा हो न सका।       एक लड़की जिसने अपने ...

मैं तुम्हारी पीहू

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मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी,  फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे, जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे, उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने। प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।    तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:- जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए, उस शहर उस गली, उस घर को सलाम। जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया, उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम। ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।    तो लो, अब हो...