मैं तुम्हारी पीहू
प्रिय अजनबी, नमस्ते, यही तो कहा था न, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आ के बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन अपने हृदय में संजोए न जाने कितनी अनुभूतियों को तुम्हे पत्र में लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां आए !!! कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? जिससे गुनाह होता है, उसे भी, और जिसके साथ होता है, उसे भी। कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी ...