Posts

The letter

प्रिय सत्य,      हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी ख्वाइश पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से भी छुपा के रखा, क्या यही उसकी भूल थी ?       मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया।        बाद में मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो...

अजनबी - 4 (वह पत्र)

Image
कहानी के बाद कभी मैंने सोचा था, एक कहानी फिर से शुरू हुई और शुरू होकर 12 नवंबर 2002 को खत्म भी हो गई। लेकिन मैं गलत था।  कहानी का एक किरदार शारीरिक बंधनों से पहले ही मुक्त हो चुका था। सत्य को छोड़कर मैं भी जीवन पथ पर आगे बढ़ गया। एक किरदार ने फिर दूसरे किरदार को अकेला और तन्हा छोड़ दिया। मंगल चाचा ने अपनी मुंह बोली बेटी को खो कर भी सत्य के साथ उसके संघर्ष में पूरी निष्ठा के साथ शामिल हो गया। हो सकता है कि यह बात उसके हृदय में हमेशा चुभती रही हो कि अंतिम क्षणों में सत्य पीहू के पास नहीं था। लेकिन था तो उसकी बेटी का पति, वह भी प्रायश्चित करता हुआ। तो फिर उसका साथ कैसे छोड़ देता ? लेकिन कहानी का एक ऐसा किरदार जिनसे मैं न तो कभी मिला और न ही देखा। बस उनके बारे में सुना था, एक ही बार फोन पर बात भी हुई । वह थे ध्रुव भैया। उनसे मिलने से पहले इस कहानी का अंत कैसे संभव था। वर्षों बाद 2025 में जल्दबाजी के कारण मैं अपने रिजर्व एसी-3 कोच में न चढ़कर एसी-2 कोच में चढ़ा दिया गया। रात्रि के लगभग 2 बज रहे थे। टीसी की कृपा से मुझे कोई असुविधा नहीं हुई। कुछ बर्थ खाली थी, शायद कुछ यात्री अपने...

मैं तुम्हारी पीहू

Image
मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी,  फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे, जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे, उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने। प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।    तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:- जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए, उस शहर उस गली, उस घर को सलाम। जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया, उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम। ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।    तो लो, अब हो...