अजनबी - 4 (वह पत्र)
पुनरिश्च : जैसा कि कभी राइटर ने पीहू से कहा था, कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी उसके अंतर्मन में ये कहानियां हमेशा चलती रही, शायद इसलिए कि ये फिर्फ एक कहानी ही नहीं छोटे-छोटे लम्हे थे जो कुछ किरदारों ने एक साथ जिए। राइटर भी उन्हें किरदारों में से एक था। भले ही राइटर ने इसे आज लिखा हो, लेकिन उसके जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। माइलस्टोन 18 साल की और अजनबी 23 साल की उम्र में शुरू हुई। माइलस्टोन से उसे लिखने की प्रेरणा मिली, उस लिखावट को तराशा अजनबी ने और उसे प्रेम की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के साम्य बिंदु पर दार्शनिक अंदाज दिया "आह! तुम कहां गए" ने। एक ने उसे अवसाद से भर दिया, इतना की कभी उसने आत्महत्या तक करने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ दूसरी कहानी ने उसे जीवन को हर हाल में जीने और स्वीकार करने की लालसा मन में पैदा की। इतनी गहरे इमोशंस दिए कि उसे समझ आ गया कि हंसी-खुशी, दुख-दर्द यह सब जीवन का ही हिस्सा है, इन्हें एक समान भाव से जीना चाहिए, स्वीकार करन...