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The letter

प्रिय सत्य,      हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी ख्वाइश पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से भी छुपा के रखा, क्या यही उसकी भूल थी ?       मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया।        बाद में मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो...

अजनबी - 4 (वह पत्र)

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कहानी के बाद ऐसे किरदार किस्से-कहानियों में देखने को मिलते हैं, वास्तविक जीवन में नहीं, लेकिन मैने देखा ही नहीं उनके साथ जिंदगी के महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय पल जिए हैं। दोनों ही पत्र सील पैक थे, और सील के रूप में पीहू के हस्ताक्षर थे। राइटर ने तो अपना पत्र पढ़ लिया था, लेकिन सत्य का पत्र वह चाह कर भी नहीं पढ़ पाया। लगभग छः माह तक वह इसके पास उसी तरह सील बंद पड़ा रह। मन में बार-बार खयाल आता कि पीहू ने क्या लिखा होगा। यह तो तय था कि सत्य ने इन दोनों पत्रों को नहीं पढ़ा था और जो पत्र उसने पढ़े, उनमें से एक साधारण पत्र था, जो उसके सिरहाने लिखा मिला। जिसमें उसने भविष्य में होने वाली अपनी संभावित मृत्यु का कारण लिखा था। घर में कोई चोरी नहीं, उसके शरीर के साथ भी किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं हुई थी। हां, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु के कारण और उसके प्रेग्नेंट होने की पुष्ठि हुई। चूंकि उसने अपने पत्र में सत्य को स्वयं पति के रूप में स्वीकारा किया था, फिर यही बयान मंगल, कमली, ध्रुव ने दिया। किसी के ऊपर कोई आपराधिक मामला नहीं बना। मृत्यु का कारण हार्टफेल 7 नवम्बर की रात 1 और 2 के बीच ...

मैं तुम्हारी पीहू

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मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी,  फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे, जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे, उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने। प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।    तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:- जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए, उस शहर उस गली, उस घर को सलाम। जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया, उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम। ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।    तो लो, अब हो...