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मैं तुम्हारी पीहू

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प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आ के बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन अपने हृदय में संजोए न जाने कितनी अनुभूतियों को तुम्हे पत्र में लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां आए !!!     कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? जिससे गुनाह होता है, उसे भी, और जिसके साथ होता है, उसे भी।    कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी ...

अजनबी 3

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यादें ! यादें !! सुखद यादों के साथ रुला देने वाली न जाने कितनी यादें बसी है इस दिल में।   "ये ! सो गए क्या...?", किसी ने मेरा कंधा हिलाते हुए पुकारा और इस पुकार के साथ ही टूट गया यादों का विहंगम स्वप्निल संसार।       "ऊं....", मैंने अपनी आंखें खोली, " कौन ...?"     "मै सत्य, ... सो गए क्या ?",     मैंने पूरी तरह से अपनी आंखें खोली, देखा सामने सत्य और मंगल खड़े हैं।      "नहीं यार ... दो-तीन दिनों से जाग रहा हूँ न, सोने को अच्छे से मिला नहीं तो तुम्हारा इंतजार करते-करते नींद आ गई..."       खान पीना बना, सभी ने खाया। माहौल कोई पार्टी का था नहीं। सत्य ने अपने साथ चलने के लिए कहा तो मैंने मना कर दिया, "मैं यही ठीक हूं, मंगल के पास। सुबह चलेंगे अभी तुम जाओ और आराम करो..."     सत्य के जाने के बाद मंगल ने मड़ैया के सामने ही  मेरी खाट बिछाई। बिस्तर लगाया और खुद मेरी चारपाई के पास पत्थर में बैठ गया। गुजरी हुई रात की हर एक तस्वीर यादें बनकर मेरे साथ थी। सुखद यादें आज मुझे रुला रहीं थीं।  ...