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वह पत्र

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पुनरिश्च :     जैसा कि मैंने पीहू से कहा था, कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी मेरे अंतर्मन में ये कहानी हमेशा चलती रही, शायद इसलिए कि ये फिर्फ एक कहानी ही नहीं छोटे-छोटे लम्हे थे जो किरदारों ने एक साथ जिए। लेखक भी उन्हें किरदारों में से एक था।      भले ही राइटर ने इसे आज लिखा हो, लेकिन उसके जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। माइलस्टोन 18 साल की और अजनबी 23 साल की उम्र में शुरू हुई। माइलस्टोन से उसे लिखने की प्रेरणा मिली, उस लिखावट को तराशा अजनबी ने और उसे प्रेम की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के साम्य बिंदु पर दार्शनिक अंदाज दिया "आह! तुम कहां गए" ने।      एक ने उसे अवसाद से भर दिया, इतना की कभी उसने आत्महत्या तक करने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ दूसरी कहानी ने उसे जीवन को हर हाल में जीने और स्वीकार करने की लालसा मन में पैदा की। इतनी गहरे इमोशंस दिए कि उसे समझ आ गया कि हंसी-खुशी, दुख-दर्द यह सब जीवन का ही हिस्सा है, इन्हें एक समान भाव से जीना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए।  ...

मैं तुम्हारी पीहू

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प्रिय अजनबी, नमस्ते,        यही तो कहा था न, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आ के बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन अपने हृदय में संजोए न जाने कितनी अनुभूतियों को तुम्हे पत्र में लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां आए !!!     कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? जिससे गुनाह होता है, उसे भी, और जिसके साथ होता है, उसे भी।    कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी ...