एक पत्र
पुनरिश्च : जैसा कि मैंने पीहू से कहा था कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी मेरे अंतर्मन में यह कहानी हमेशा चलती रही। भले ही मैंने इसे आज लिखा हो लेकिन मेरे जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। माइलस्टोन 18 साल की और अजनबी 23 साल की उम्र में शुरू हुई। माइलस्टोन से लिखने की प्रेरणा मिली, उस लिखावट को तराशा अजनबी ने और उसे प्रेम की स्वीकार्यता और अस्वीकार्यता के साम्य बिंदु पर दार्शनिक अंदाज दिया "आह! तुम कहां गए" ने। एक ने मुझे अवसाद से भर दिया इतना की मैंने कभी आत्महत्या तक करने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ दूसरी कहानी ने जीवन को हर हाल में जीने और स्वीकार करने की लालसा मन में पैदा की। इतनी गहरे इमोशंस दिए कि मुझे समझ आ गया कि हंसी-खुशी, दुख-दर्द यह जीवन का ही हिस्सा है, इन्हें एक समान भाव से जीना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए। पीहू की मृत्यु ने मुझे कुछ महीनो तक उदास रखा, शोक में रखा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया तो मुझे पीहू और सत्य के जीवन से प्रेरणा मिली। यह सच है ...