मैं तुम्हारी पीहू
प्रिय अजनबी,
नमस्ते,
यही तो कहा था न, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आ के बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन अपने हृदय में संजोए न जाने कितनी अनुभूतियों को तुम्हे पत्र में लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां आए !!!
कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? जिससे गुनाह होता है, उसे भी, और जिसके साथ होता है, उसे भी।
कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी थम-सी गई थी, इतनी कि कुछ होश ही न था कि क्या हो रहा है और क्या होगा।
लेकिन आज सत्य के छोड़ कर जाने के दुख का परित्याग कर, तुम्हारे कहे अनुसार खुद को संवारा। अपनी पसंद की साड़ी पहनी। फेस क्रीम, हल्की गुलाबी कलर की लिपस्टिक, माथे में बिंदिया, कुछ ज्वेलरी और भी छोटे-मोटे मेकअप किए। कुछ देर तक अपने आप को आईने में देखा और महसूस किया जैसे मेरी नजरों से तुम मुझे देख रहे हो। तुम्हें तो मैंने हमेशा ही याद किया, यदि आज लिखने बैठूं तो कागज कम पड़ जाएं, और लफ़्ज़ न जाने अपने कितने मायने खुद-ब-खुद खोज लेंगे।
जब इंसान जिंदगी में सब कुछ खो देता है, तभी उसमें स्वयं को प्राप्त करने की लालसा का जन्म होता है, और आज तुम्हें ये पत्र लिखने का अर्थ खुद को प्राप्त कर लेना है।
कभी तुमने कहा था कि मैं लिखने की शुरुआत करूं, तो एक कविता लिखनी चाही, अधूरी रह गई। कलम की स्याही से अधिक आंसू टपकते, शब्द धुल जाते थे, तो क्या करती ?
फिर अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने की सोची, मन नहीं किया, वैसे भी क्या था लिखने को ? और अंत में तुम्हें पत्र लिखने का विचार आया, जिसमें बहुत कुछ था। बहुत सी बातें थी जो तुमसे कहना चाहती थी, पूछना चाहती थी। तो इसे ही लिखने का अब फैसला किया।
याद है मैंने चलती हुई राहों में तुमसे कहा था कि तुम कहना जानते हो और कह देते हो, मन को लुभाना जानते हो और लुभा लेते हो, किसी के दिल में उतरना जानते हो तो उतर जाते हो... सभी कलाएं आती हैं तुम्हें... कभी उनके दिल की बात कहो जो कभी कह न पाए ? और बदले में तुमने मुझे एक छोटा सा शेर सुनाया था, जैसे चांद में कोई सूरज नजर आता हो...! असंभव सी बात ? याद है ?
चलो मैंने तो स्वीकार कर लिया था, पर अक्सर सोचती हूँ, कि यदि न किया होता तो ? अपने प्यार अपनी चाहतों को दिल में ही रखा होता, और सचमुच सामाज और दुनिया के बनाए रीति-रिवाजों में मैं सत्य की पत्नी होती, और फिर कहीं तुमसे मोहब्बत हो गई होती तो फिर क्या होता ? कैसे अपने दिल की बात लिखती ?
तब तो पूरी किताब ही लिखनी पड़ती न ? कहते हैं मृत्यु के कुछ दिन पूर्व या कुछ पल पहले हम मन ही मन अपने पूरे जीवन का आकलन करते हैं, सच स्वीकार करते हैं...
फिर जाओ, जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर, वषों बाद ही सही, मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी। तुम्हें स्वीकार या अस्वीकार से परे रख, हो सकता है प्यार भी कर लूं, लेकिन तुमसे कहूंगी नहीं। किंतु हां, तुम्हारे बारे में सोचूंगी, मन में अलग-अलग धारणाएं बनाऊंगी कि तुम क्या हो और क्या नहीं हो ?
हो सकता प्रेम, कामना, आसक्ति से परे हट तुम्हें एक नए मुकाम में रख लूं। यदि उन लम्हों को तुम लिख सके तो समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो। हां दोस्त ! मेरे प्रियवर !! इसी वादे के साथ मैं तुम्हें एक बार फिर मिलूंगी।
लेकिन आज जब साम्य के बिन्दु तक हम दोनों पहुंच ही गए तो अब खुद की ही बाते करूंगी तुमसे। आखिर तुम गए भी तो मुझे अपना कर्जदार बना कर। कैसे ? लिखूंगी, लेकिन अभी नहीं। उससे पहले कहने को और तुमसे पूछने को बहुत कुछ है।
जिस सुबह तुम आए उसके तीन दिन पहले की वह शाम मैं कैसे भूल सकती हूँ। तुम्हारे आने से पहले ही कुदरत ने मुझे तुम्हारे आने का आभास कर दिया था। उस दिन मैंने दोपहर दो बजे तक काम किया। पूरा घर नीट एंड क्लीन किया। मन में एक अजीब सी हलचल मची हुई थी जैसे कोई आने वाला है। बाबा से डांट भी खाई। दोपहर को थोड़ा सा बुखार भी आ गया लेकिन मैं थकी नहीं, काम करती रही। फिर अटारी में जाकर चुपचाप लेट गई। लेकिन लिखा न, मन में एक अजीब सी हलचल मची हुई थी। थोड़ा-सा सो लेने के बाद जब शरीर कुछ हल्का हुआ तो खिड़की पर आकर खड़ी हो गई। महसूस हुआ जैसे मुझे किसी का इंतजार हो। यहां तक की सत्य भी आया तब भी मैं बेखबर उस तरह बाहर ताकती खड़ी रही।
सत्य ने मुस्कुराते हुए पूछा भी, कि क्या हुआ... कहां खोई हो ? मेरे आने का आभास भी न हुआ...?"
"पता नहीं क्यों आभास हुआ जैसे मैं किसी का इंतजार कर रही हूँ, जैसे कोई आने वाला है... देखो तो मेरा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है... कौन आने वाला है सत्य...?"
"अरे !!.... मुझे आना था और देखो मैं आ गया। तुम्हारी तबीयत नहीं ठीक है न इसलिए बेचैनी लग रही है, और मन में इस तरह से ख्याल आ रहे हैं। तुम आराम करो...", सत्य ने मुझे आराम करने के लिए कह के नीचे चला गया। उसी रात मैंने एक अजीब सा स्वप्न देखा।
"मैंने देखा, शाम का वक्त है... मैं अटारी में हूँ, किसी ने मुझे अपने गले से लगा रखा है... मैं लगातार रोती जा रही हूँ... मेरे साथ वह भी रो रहा है... फिर अचानक मुझे छोड़ अटारी की सीढ़ी उतरता जा रहा है... मैं रोती-सिसकती उसे पीछे से पुकार रह हूँ... लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और ना ही पलट कर मेरी तरफ देखा... बस सीढ़ियां उतरता जा रहा है, और मैं उसे उतारते हुए बस देखे जा रही हूँ...."
सत्य ने आश्चर्य से पूछा, "चेहरा तो दिखा होगा न... कौन था...?"
मैंने याद करने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई चेहरा उभर के सामने आया ही नहीं, सत्य से कहा, "नहीं, कुछ स्पष्ट नहीं दिखा। रोने के कारण मेरी आंखें भरी हुई थी शायद इसलिए न दिखा हो... एक धुंधली सी तस्वीर... जो एक छाया की तरह नजर आती थी... शायद कोई अजनबी था... चलो छोड़ो सपना था, ऐसे ही आ गया होगा। अब जरूरी थोड़ी की उनके अर्थ निकाले जाएं..."
बात आई गई हो गई। तीसरे दिन तुम्हें अपनी बगिया में देखा। देख के आभास हुआ कि शयद तुम ही थे जो उस दिन दिखे थे। और देखो तो हम बिछड़े भी ठीक उसी तरह जैसे की मैंने स्वप्न में देखा था। पहले मैं भी इन सब चीजों को नहीं मानती थी, लेकिन हमारा मिलना और मिलकर यूं बिछड़ना शायद हमारी नियति थी।
तीन साल पूरे होने को हैं, लेकिन तुम लौट कर न आए। वर्षों पहले मम्मी-पापा, भाई सभी चले गए। पिछले साल बाबा भी चले गए। ध्रुव भैया भी बहुत दूर ही हैं। केवल सत्य था मेरे पास, उसे भी गए हुए दो माह होने को आया, शायद वह भी लौटकर न आए। एक-एक करके सभी मेरे जीवन में आए और आ के चले भी गए। रह गई मैं, इतना बड़ा घर, जिसमें सांसों का बोझ उठाए मैं भटक रही हूँ। ये अटारी, ये खिड़की, सामने गौशाला, निकलती कच्ची सड़क, उसके पार शीशम का पेड़, जहां सत्य को पहली बार खड़े देखा था और तुम्हे जाते हुए आखिरी बार देखने की हिम्मत न जुटा पाई !! इसी बिस्तर पर पड़ी सुबकती रही, सिसकती रही, रोती रही !!!
लगभग तीन साल पहले इसी अटारी में पहले दिन मैने तुम्हे जानबूझ कर उपेक्षित किया था, और कोशिश की थी कि सत्य भी तुम्हें कोई अटेंशन न दे। अब शायद तुम समझ गए होगे कि मैने ऐसा क्यों किया था ? मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरे नजदीक आओ। लेकिन तब क्या पता था, एक दिन इन्हीं आंखों में असंख्य अश्रु बिंदुओं को समेटे, तुम्हे याद करते हुए न जाने कितनी रातें गुजारनी पड़ेगी। इसी घर में तुम्हे ले कर मैं सत्य से लड़ी थी कि खबरदार जो वह तुम्हे यहां रहने के लिए कहे। किसी भी कंडीशन में मैं अपनी अटारी तुम्हें रहने के लिए न दूंगी, और आज ? देखो तो उसी अटारी में मैं तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रही हूँ, और शायद अपने जीवन का अंतिम पत्र तुम्हें लिख रही हूँ।... लेकिन कहे देती हूँ, इसे पढ़ने के लिए तुम्हें स्वयं यहां आना पड़ेगा, मै इसे तुम्हारे पते पर पोस्ट करने से रही। देखो तुमने जैसा चाहा मैंने वैसा किया। तुमने जो कहा वह किया, तो फिर अब आ जाओ न ?
ठीक है मानती हूँ, कोई रिश्ता नहीं, लेकिन हमारे बीच ब्वॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड वाला रिश्ता तो हमेशा से ही रहा न ? चलो इसे भी मत मानों, तो केवल दोस्त ही मान कर उसका हाल-चाल जानने के लिए आ जाओ... तुम वादा कर के गए थे न, कि तुम मेरी शादी के बाद एकबार ही सही, लेकिन आओगे ? तो अब आ जाओ... तुम झूठे साबित नहीं होगे। सत्य ने भी तुमसे कहा था कि तुम मुझे उसकी वाइफ बन जाने के लिए कन्वेंस कर लोगे तो वह ताउम्र तुम्हे मेरा बॉयफ्रेंड मानने के लिए तैयार हो जाएगा, तो अब उसे भी कोई एतराज नहीं होगा।
कभी मैंने सोचा था कि जो अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद आत्महत्या तक करने की कोशिश तक कर सकता है तो फिर वही लड़का मुझसे प्यार कैसे कर सकता है ? सच कहूं तो पहले मुझे भी यही लगता था, इस जिंदगी में प्यार एक ही बार होता होगा। जब भी तुम्हारी बातों में उसका जिक्र होता, तुम्हारे आंसुओं में उसे मुस्कुराते हुए देखती, जिसका नाम तक तुम नहीं लेते थे, तब मेरे दिल में अजीब-सी बेचैनी होती। यूं कह लो कुछ हद तक जेल्सी की भावना भी जगाती। क्यों ? यह तो मैं पहले से ही तय कर चुकी थी कि तुम्हारे मन से यह बात निकाल के रहूंगी कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। लेकिन यही सवाल तो एकदिन तुमने खुद मुझसे पूछ लिया, तब मैं क्या करती ? कुछ हद तक मैं तुम्हारे सामने एक्टिंग करने की कोशिश करना चाहती थी कि तुम्हें मुझसे धीरे-धीरे लगाव हो जाए, मेरे प्रति आकर्षण पैदा हो जाए और मैं जीत जाऊं। लेकिन जैसे ही तुम्हारे सामने जाती, तुमसे बातें करती, तो मुझे एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। हां दोस्त मुझे भी एक्टिंग नहीं आती है, जो हुआ नेचुरल और रियल था। ऐसा क्यों हुआ ?
उस दिन जब ज्ञान भैया ने मुझे बताया कि उसके बगैर तो तुम जीना ही नहीं चाहते थे तो आश्चर्य हुआ। मेरे हृदय में सत्य के लिए जो स्थान तुम्हारे आने के पूर्व था वही स्थान आज भी है। उसके प्रति मेरे विचारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, तो फिर क्यों मेरे हृदय में तुम्हारे लिए एक अलग स्थान बन गया ? सत्य को रिप्लेस किए बिना ही तुम मेरे अंदर क्यों स्थापित हो गए ? शायद यही सब कुछ तुम्हारे साथ हुआ हो ? शायद जिस आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा मैंने दी, उसकी शुरुआत मेरे ही जीवन से होनी थी !!
आकर्षण, मोह और आसक्ति ये सभी भाव जब अपने सर्वोत्तम और शुद्धतम स्वरूप में होते हैं तभी आध्यात्मिक प्रेम का जन्म होता है। अब मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि हम दोनों के जीवन में यह अपने सर्वोत्तम स्वरूप में था और सदैव रहेगा। तुम जहां भी होगे, जिसके साथ भी होगे, आज तुम भी महसूस करते होगे।
कहते हैं नियति एक बार ऐसे व्यक्ति को हमारे सामने ला खड़ा करती है, जिसके साथ होने पर हमें ऐसे आध्यात्मिक प्रेम की अनुभूति होती है, और इस तरह से यह व्यक्तिपरक न होते हुए भी किसी एक व्यक्ति के पास होने पर ही महसूस होता है। क्यों ?
कभी सत्य की बाहों में सर रख मैं बेखबर सोती थी और वह जगता था। तुम्हारे जाने के बाद उल्टा हो गया था। वह थका-हारा बेखबर-सा सोता और मैं जागती रहती, यह सोचते हुए कि तुम कहां होगे, कैसे होंगे, क्या कर रहे होगे, मुझे कभी याद भी करते होंगे कि नहीं ? जब मैं अपने इस जीवन के अस्तित्व में तुम्हारे होने या न होने की तलाश करती तब तुम्हारी कविता की ये पंक्तियां याद आती...
तू सोती होगी तो कैसी लगती होगी,
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी राते भूल गया हूँ,
जब से तुझको प्रिय-बाहों में,
रातों को जगते देखा है।
क्या सचमुच तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ?
इसी अटारी में तुमने मेरी सांसों को उखड़ते हुए देखा था और मुझे डांटा भी था कि मैं इतना काम न किया करूं। तो आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं तुम्हें एक सच बताती हूँ। सांसों के टूटने की शुरुआत कॉलेज लाइफ में बैडमिंटन खेलते हुए मेरे बेहोश हो जाने पर ही हो चुकी थी।
मैं स्कूल के समय से ही मेरी रुचि किताबों के साथ-साथ स्पोर्ट में थी। रेसिंग, बैडमिंटन, हाई जंप इन सब में पार्टिसिपेट किया करती थी। एक दिन कॉलेज में बैडमिंटन खेलते हुए अचानक गिर पड़ी। सांस लेने में तकलीफ होने लगी... पहले तो सभी ने समझा की थकान की वजह से होगा लेकिन मैंने इससे पहले भी महसूस किया था कि जब भी मैं ज्यादा मेहनत के काम करती हूँ... तो जल्दी थक जाती हूँ, और सांस लेने में भी दिक्कत होती है। एक दिन जब पापा को बताया तो उन्होंने मुझे एक अच्छे डॉक्टर को दिखाया...
डॉक्टर ने पूरा चेकअप करने के बाद पापा से बताया कि जन्म से ही मेरे दिल में एक छोटा सा छेद था, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी उसका आकार भी बढ़ता जाएगा। लगभग पच्चीस-तीस साल की उम्र में वह इतना बड़ा हो जाएगा कि दिल की धड़कने कम होती जाएंगी और मेरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होनी शुरू हो जाएगी। सांसे लेना मुश्किल होता जाएगा। शायद इसी छेद से मेरे हृदय में तुम्हारा प्रवेश करना लिखा रहा हो...
सॉरी यार बुरा मत मानना.. थोड़ा सा मज़ाक किया है। आधुनिक दौर में दिल में छेद होना और उसका सफल आपरेशन होना सामान्य-सी बात है, लेकिन उसी डाक्टर ने पापा को बताया कि हार्ट के जिस पार्ट में छेद है, सर्जरी करना कठिन और बेहद रिस्की भी है। सफल होने के मात्र आठ-दस प्रतिशत ही चांसेस हैं, लेकिन वह अपने से बड़े डॉक्टर से कंसल्ट करेंगे कि क्या किया जा सकता है..."
एक इत्तेफाक ही था कि उन दोनों के बीच के इस डिस्कशन को मैंने सुन लिया था। उसके तीसरे दिन मेरा जन्मदिन था। चौथे दिन हम सभी दादी की डेथ में गांव आ गये , बीसवें दिन वह हादसा हुआ। पूरा का पूरा परिवार काल के गर्भ में समा गया। इस सच को अब मेरे सिवा कोई नहीं जानता। मैने सत्य को और न ही बाबा को कभी बताया।
अब तुम्हें अंदाजा हो गया होगा कि मैंने सत्य को किसी भी रिश्ते से दूर क्यों रखना चाहा था। जब कभी उसे अपने और विवाह के प्रति बहुत अधीर देखती तो सोचती कि उसे सब कुछ सच-सच बता दूं। फिर अगले ही पल एक अजीब-सा डर लगने लगता। सच जानने के बाद सत्य का रिएक्शन कैसा होगा ? या तो वह बेहद समझदार व्यक्ति की तरह मेरी जिंदगी से धीरे-धीरे चला जाएगा, यह होता तो ठीक था लेकिन न गया तो फिर ? बिल्कुल नसमझो की तरह हर पल मेरे पास रहने की कोशिश की तो ? इस बात से बेखबर कि मुझे खुश रखने के एक्स्ट्रा एफर्ट से मुझे दर्द ही मिलेगा। तब मैं उसकी आंखों में प्रतिपल खुद को मरते हुए न देखती ? फिर उसके साथ मैं एक सामान्य जीवन कैसे जी पाती ?
अब तुम्हें शिकायत हो सकती है कि ये सब मैंने तुम्हें क्यों नहीं बताया ? तुम भी तो मेरे जीवन में चार दिन के मेहमान बन के आए थे, जो सत्य के लिए सोचा था वही तुम्हारे लिए भी सोचा... क्यों तुम्हे परेशान करूं... लेकिन आज मानती हूँ, मैं गलत थी... तुमसे और ध्रुव भैया से बताना चाहिए था... या तो मैं मर चुकी होती या फिर तुम्हारे साथ जिंदगी जी रही होती... मेरी किस्मत में प्रतिपल यूं मरना तो न लिखा होता !!
तुम्हारी कहे अनुसार घर के काम भी ज्यादा नहीं करती थी। बाहर के काम मंगल चाचा और कमली से करवा लेती, और घर के अंदर के सत्य से। वह हंसी-खुशी करता भी था। जब बाबा पूजा में होते तो वह साथ में रसोई में भी हेल्प करता था।
एकदिन जब वह अपने घर से वापस लौट कर आया तो उसे मैंने काफी चिंतित देखा। पूछने पर उसने बताया कि उसकी शादी की बात चल रही है। मां और पिताजी का कहना है या तो तुम पीहू से शादी करो, हमें कोई एतराज नहीं, या फिर इनमें से कोई रिश्ता सिलेक्ट करो। हम कब तक लोगों को मना करते रहे, आखिर हमें भी तो समाज में रहना है। अब मैं उसे कैसे समझती...?
उस दिन शाम का ही वक्त था। मंगल गाय बछड़ों को बांध रहा था। इसी अटारी में इसी बात पर हमारी बहस हो गई और मैंने भी गुस्से से उससे कह दिया कि तुम्हें जो करना हो करो। शादी भी करनी हो तो कर लो। यदि जाना चाहते हो छोड़कर, तो चले भी जाओ, लेकिन मैं शादी नहीं करूंगी, और न ही किसी समाज के सामने स्वीकार करूंगी। यदि तुम्हें इस शर्त के साथ मेरे साथ रहना है तो रह सकते हो।
उसने भी गुस्से से सीढ़ियां उतरते हुए कहा, "...तो ठीक है, मैं जा रहा हूँ, अब लौटकर नहीं आऊगा। शादी करने का इरादा हो तो मंगल से घर में फोन करवा देना, मैं आ जाऊंगा..."
आज सोचती हूँ की विवाह के लिए मैंने अपनी सहमति दे दी होती तो शायद अच्छा ही होता। जब वचन और कर्म से सब कुछ उस पर न्योछावर कर दिया तो सामाजिक रूप से उसे स्वीकार करने में कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता ? लेकिन नहीं, अपनी सहमति देने से पूर्व मुझे अपने बारे में उसे सब कुछ सच-सच बताना पड़ता। बस यहीं पर आकर मैं रुक जाती थी। यदि न बताती तो कल को मेरे बाबा पर आरोप लगता कि एक मरणासन्न लड़की को हमारे बेटे के गले बांध दिया...
मंगल ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह चला गया। जितनी सहजता से मैने तुम्हे जाने दिया, उतनी ही सहजता से उसे भी। पढ़ के आश्चर्य हो रहा है न ? पर सच यही है। जाते समय तुमसे मांगा भी तो क्या मांगा... कि तुम यहां एक बार ही सही, लौट कर फिर से आओ !!
प्यार, मोहब्बत, दोस्ती, चाहत इन सब से परे सिर्फ तुम्हे गले लगाकर इतना ही कहा होता, मत जाओ मेरे जीवन से... तो शायद... नहीं... नहीं... यक़ीनन तुम बाबा से किया हुआ वादा भी तोड़ देते... मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाते, और यदि जाते भी तो जल्द ही लौट कर आते।
सच लिखा न ? हां... उस दिन मैंने समझ लिया था कि यही बात बाबा से मिलने से पहले तुम मुझसे कहना चाहते थे, जो संबंध तुमने मन ही मन मेरे प्रति स्वीकार कर लिया था, मै जान गई थी वह संबंध किसी भी वादे और रिश्ते से बढ़ कर था, फिर भी मैने तुम्हे जाने दिया !!
अपने पूरे परिवार को खोया, जिसे पति के रूप में अपनाया उसे भी जाने दिया और तुम जैसे इंसान को रोक न सकी, यही मेरी जिंदगी का हासिल रहा मेरे दोस्त। और अब ? कोख में एक नया जीवन लिए अपने इसी दर्द के साथ इस घर और बगिया के बीच भटकती रहती हूँ। अब आंसू भी नहीं निकलते, और निकले भी तो क्यूं ? कोई पोंछने वाला भी तो नहीं। सिर्फ दुख इस बात का है कि एक नया जीवन जो मेरे माध्यम से जन्म ले सकता है, अब उसे भी मेरे साथ ही जाना होगा। शायद यह भी कोई अभिशप्त जीव है जिसे जन्म से पहले ही मृत्यु का महाभिशाप मिला हो या फिर मुक्ति का... ?
अभी तक बड़े ही धैर्य से मैने पत्र पढ़ा था। लेकिन पत्र के इस मोड़ पर आ कर मेरा धैर्य टूट गया। उसके दर्द उसकी पीड़ा और उसकी बेबसी को महसूस कर मैं पत्र के ऊपर अपना चेहरा रख रो पड़ा। कुछ देर रो लेने के बाद जब दिल कुछ हल्का हुआ तो मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...
जब भी मंगल और कमली मुझे उदास भटकते इधर-उधर देखते, तो दिलासा देते। मंगल चाचा तो कहते कि मैं तुम्हें खत लिख दूं या फिर उन्हें ही तुम्हारा पता लौटा दूं तो वही लिख देंगे, लेकिन मैं ही मना कर देती हूँ।
तीन साल बीत गए न, तुम्हें याद भी होऊंगी या नहीं, कौन जाने ? और यदि सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होगे तो उसमें बाधा क्यों बनूं। तुम भी तो मुझे तब छोड़ कर गए थे, जब तुम्हें मेरी सबसे अधिक जरूरत थी, और आज मुझे तुम्हारी है !! जब तुम स्वार्थी न बन सके तो फिर मैं कैसे बन जाऊं ?
देह-त्याग से दो-तीन घंटे पहले दोपहर को बाबा ने मुझे अपने पास बैठा कर तुम्हारे बारे में बहुत सारी बातें की थीं। मुझे नाइटेंगल वाली वह कहानी भी आर्द्रकंठ से सुनाई जो जाने से पहले तुमने उन्हें सुनाई थी, और उन्होंने स्वीकार किया था कि यह कहानी काल्पनिक होते हुए भी कितनी सच है। उन्होंने अफसोस से मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था, मेरा ज्ञान तो किसी व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और कुंडली पढ़कर भविष्य बताने का ज्ञान है। लेकिन उसने तो एक छोटी सी कहानी में तुम्हारी पूरी जिंदगी लिख दी। मैं जानती हूँ कि यह कहानी तुमने पहले नहीं लिखी होगी, बल्कि बाबा को हमारे बीच के संबंध को इनडायरेक्टली बताने के लिए सोच ली होगी। मेरी भी आँखें नम हुई और सोचा काश ये कहानी मैने लिखी होती...
उस दिन उन्होंने यह भी बताया कि तुम तो यहां वापस लौट के आने के लिए जा रहे थे। किस तरह तुमने उनके पैर पकड़ कर उनसे मेरा साथ मांगा था। तुम मेरे लिए किस तरह से रोए थे। यह बताते हुए वो खुद भी रो पड़े थे, "...वह लड़का तुम्हारे लिए बहुत रोया था पीहू ! लेकिन तब तक तो मैं इसी भ्रम में था कि तुम और सत्य एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, एक दूसरे को प्रेम करते थे। उस शाम बारिश में सत्य को मुझसे मिलाना सिर्फ एक बहाना था। लेकिन आज मुझे कोई भ्रम नहीं हो रहा है... तुम्हारी आंखों की नमी में उसी लड़के के लिए प्यार देख रहा हूँ। तुम्हारी उदासियों में, तुम्हारे आंखों के इस सूनेपन में... मुझे वही लड़का नजर आ रहा है। तुम्हारे बाबा से अनजाने में अपराध हो गया पीहू !... और देखो तो क्षमा मांग कर वह गया... किन्हीं भी रिश्ते-नातों से दूर उसने सिर्फ तुम्हारे आस-पास रहना चाहा था। तुम्हारा सच्चा दोस्त बनकर, तुम्हारा हमदर्द बनकर। मैं उसे यह भी न दे सका !! उसके प्रति कठोर हो गया, और इस हद तक कि उसकी आंखों से बहते हुए गंगा-जमुना के जल के समान पवित्र और निश्चल आंसुओं को भी न देख पाया। उसके प्रेम में वो ऊर्जा थी जो तुम्हारी किस्मत बदल सकती थी..."
और उस दिन उन्होंने मुझसे सभी कुछ स्वीकार किया कि किस हद तक उन्होंने सत्य के चेहरे में मुझे लेकर इनसिक्योरिटी देखी और महसूस की थी। उस दिन उसने बाबा से कहा था, "बाबा सोचता हूँ, उसको यहीं बुला लूं... शायद पीहू भी चाहती है... ठीक ही तो है बाबा... दोनों किताबों के शौकीन है... उनकी बहुत-सी आदतें भी एक दूसरे से मैच करती हैं... पीहू और उसके बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है... आप लोगों के पास रहेगा... वैसे भी काम-काज के कारण मैं घर की तरफ ध्यान नहीं दे पाता हूँ... जहां तक मुझे पता चला है उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे छोड़ के दूसरे से शादी कर ली है... एक बार तो सुसाइड करने की कोशिश भी कर चुका है। यहां रहेगा तो उसका भी मन लगा रहेगा... आप लोगों का सहारा मिल जाएगा उसे... भटक रहा है बेचारा... आप क्या कहते हैं ?"
पीहू के पत्र से मिली इस जानकारी ने मुझे चौका दिया। तो क्या उस दिन बाबा ने सच छुपाने से लिए अपनी ज्योतिष विद्या का सहारा लिया था ? उफ़ ! इंसान न जाने कितने मुखोटे पहनता है ? और भी न जाने कितने सच सामने आना शेष है ? मैंने पत्र को देखा, अक्षर धुंधले हो रहे थे। आँखें पोंछ आगे पढ़ने लगा...
आश्चर्य हो रहा है न पढ़ के ? अब तुम बताओ ईर्षा, स्वामित्व और असुरक्षा का प्रेम के होने या न होने से क्या संबंध ? क्या उनके प्रदर्शन के बगैर प्रेम अप्रमाणित होता है ? तो फिर सत्य के प्रति तुम्हारे व्यवहार में और तुम्हारी आंखों में मुझे कोई ईर्षा क्यों न दिखाई दी ? प्रेम होने के बावजूद तुमने मुझ पर उसका हक नहीं जताया। शायद इसीलिए तुम्हारे अंदर किसी भी असुरक्षा की भावना ने जन्म नहीं लिया। तो क्या मैं मान लूं कि तुम मुझसे तटस्थ रहे ? नहीं, कैसे मान लूं ? मैं भी तो इन शब्दों से दूर ही रही।
झूठ नहीं लिखूंगी, थोड़ी देर के लिए जब तुम उस लड़की की तारीफ करते तो मुझे जलन होती थी। यदि वह अच्छी थी, तो फिर थी। इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है ? आखिर तुम्हारे व्यक्तित्व के विकास में तुम्हारी सोच और समझ में उसका भी तो योगदान है। कैसे छीन लेती या कोशिश करती उसे तुमसे दूर करने की ? फिर तुम भी तो मुझे आधे-अधूरे ही मिलते न ? लेकिन हां, एक अफसोस जरूर होता, कि काश ! उसकी जगह कभी तुमसे मैं मिली होती या फिर इतना तो हुआ होता कि बाबा और मेरी जिंदगी में सत्य के आने के पहले तुम आए होते। कभी तुमसे यूं ही नहीं कहा था कि मेरे पास पैसे-रुपए, जमीन-जायदाद की कमी नहीं है। कमी थी तो सिर्फ एक ऐसे इंसान की जो मेरे पास ठहरता और मुझे समझता, जो यह न कहता कि तुम यह कर लो, तुम वह कर लो, बल्कि पूछता, पीहू ! आज तुमने क्या किया ? कौन-सी कहानी, नॉवेल या पोयम पढ़ी, कुछ मुझे भी पढ़ के सुनाओ न। मेरे मना करने पर कुछ जिद करता जैसे कि उस दिन लेडी नॉर्टन की कविता के लिए तुमने की थी। आज जब सोचती हूँ तो आंसू आते है। उस दिन तुमने कैसे ज़िद की थी, "ये पीहू ! फिर से सुनाओ न प्लीज, मीनिंग के साथ...", उसी आम के पेड़ के नीचे लेट कर इस पोयम को गुनगुनाती हूँ, वो भी बीच में रुक-रुक के उसके मीनिंग भी अपने दृष्टिकोण से समझाती हूँ... लेकिन अब सुनने के लिए तुम हो कहां !!! यूं कोई देखे तो पागल समझे, लेकिन वहां कोई होता नहीं। हां एक दिन मंगल चाचा ने सुना तो मुस्कुरा के बोले, "बिटिया यहीं क्लास लगा लो बच्चो की..."
एक ऐसा ही दिन था। मैं सुबह का नाश्ता बनाते हुए इसी पोयम को गुनगुना रही थी। सत्य ने सुना और उपहास से बोल, "इतनी किताबें मत पढ़ो की पागल हो जाओ, पता नहीं क्या बड़बड़ाती रहती हो..."
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बड़बड़ा नहीं रही हूँ, एक पोयम है उसे ही गुनगुना रही हूँ... तुम सुनोगे ?"
वह लापरवाही से बोला, "न... मुझे समझ में न आएगी..."
मैंने कहा, "कोई बात नहीं... मैं समझाऊंगी न... अच्छी पोयम है...सुन लो ?"
वह उपेक्षा से बोला, "अंग्रेजी के चार अक्षर ज्यादा पढ़ लिए तो इतरा रही हो... तुम नाश्ता बनाओ... वैसे भी यार मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है... फैक्ट्री भी जाना है..."
उस दिन सोचा, क्या यह वही सत्य है जिसे मेरी बातें पसंद थी, मेरी हर पसंद से प्यार था... लेकिन इसके आगे कुछ नहीं सोचा। मन में ख्याल आया कि हो सकता है किसी बात को लेकर स्ट्रेच हो... लेकिन उसी शाम जब मैं अटारी पर लेटी कीट्स की पोयम्स पढ़ रही थी, तो आते ही बोला, "सेकंड ईयर का फॉर्म भर तो दिया है, कभी-कभी सिलेबस भी पढ़ लिया करो... ओवर कॉन्फिडेंस अच्छी बात नहीं..."
उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा दी। हां सच... और क्या कर सकती थी ? देखा जाए तो उसकी बातें प्रैक्टिकल थी, मेरे प्रति फिक्र थी, लेकिन इनमें मैं कहां थी ?
लेकिन कभी कोई था, जो एक पोयम मीनिंग के साथ मेरे मुख से दोबारा सुनने के लिए तरसता चला गया। कोई था, जो मुझसे कहता था तुम्हें जो पसंद हो वही करो। कोई था, जिसने मेरे अंदर उत्साह भरा कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ। कोई था, जो मेरी आंखों में आंसू की एक बूंद देखकर कहता तो कुछ नहीं था, बस चुपचाप गले से लगा लेता था। कोई था, जो कहता कि हमें जिंदगी को गुजारना नहीं जीना चाहिए। कोई था, जिसे मेरे होने से प्यार था...आज तुमसे पूछतो हूँ, कौन था वह ?
जज्बातों में भटक गई, हां तो मैं लिख रही थी कि मुझे किससे दोस्ती करनी है, मुझे किसके साथ की जरूरत है, यह फैसला तो मुझे लेना चाहिए न ? तो फिर उसने बाबा से ऐसा क्यों कहा ? यदि कुछ कहना था तो मैं कहती ?
बाबा को उस दिन बस इसी बात का भी पछतावा था कि सत्य के इस बात की पुष्ठि उन्होंने मुझसे क्यों नहीं की ? मेरी इच्छा जानने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की ? और उसकी एक ही वजह थी, बाबा का यह भ्रम कि मैं सत्य से पहले से ही प्यार करती थी, बारिश में सत्य का उनसे मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, पूर्व नियोजित था। काश ! बाबा को यह भ्रम न हुआ होता। जब बाबा ने तुमसे एकांत में मिलने की इच्छा जाहिर की तो पता नहीं क्यों मेरा मन किसी अज्ञात आशंका से घिर गया था। मुझे कुछ-कुछ आभास हो रहा था कि तुम्हारे साथ क्या होने वाला है।
तुम मुझसे एक सवाल पूछते-पूछते चले गए, "क्या जीवन में प्यार एक ही बार होता है...?", उस समय पूरे विश्वाश के साथ मैं कोई जवाब कैसे दे सकती थी ? दूसरी या तीसरी बार की तो छोड़ो, जबकि मैं पहली ही बार प्यार के होने या न होने के झूले में झूल रही थी !! और देखो तो, अंतिम दिन जो जिंदगी मैने तुम्हारे साथ जी, उसी में मुझे सारे सवालों के जवाब मिले। मैने तुम्हे जताया भी, तुम समझे भी, लेकिन फिर भी जाते-जाते फिर वही सवाल पूछ लिया। उसी क्षण मैं समझ गई कि बाबा ने तुमसे क्या मांगा होगा। यदि तुमने मुझसे पूछा होता, "बताओ पीहू ! क्या तुम्हे मुझसे प्यार है...?", तो इसका जवाब मैं जरूर देती, बल्कि भाग कर स्वयं बाबा के पास जाती, मेरे और सत्य के रिश्ते को लेकर जो भी गलतफहमी उनके मन में होती, उन्हें दूर करती। उनसे सच कहती और तुम्हे मांगती। लेकिन नहीं उस दिन तुम दोनों ही महानता के उच्चतम शिखर पर जा बैठे। भ्रम में एक ने कन्यादान किया तो दूसरे ने इस भ्रम को सही सिद्ध करने के लिए अपने प्रेम का त्याग किया। किसी ने जरूरत ही नहीं समझी कि मुझसे पूछे कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ ? और शायद मेरा दोष यह था कि न चाहते हुए मैने यह सब स्वीकार किया ?
सच पूछो तो आज मुझे उस लड़की से न तो कोई जलन हो रही है, न ही कोई शिकायत कि उसने तुम्हें क्यों छोड़ा... निश्चित ही वह भी मेरी तरह मजबूर हो गई होगी। क्यों वह अक्सर एक ही आईने में अपनी सूरत के साथ तुम्हारी सूरत देखा करती थी ? शायद कुछ चेहरे, कुछ जोड़ियां आईने में ही कैद होकर रह जाने के लिए होती हैं। वास्तविक जीवन में उनका सह-अस्तित्व नहीं होता। और देखो तो मैने भी वही किया !! आज मुझे उसके प्यार की इंटेंसिटी भी समझ में आती है। महसूस कर सकती हूँ कि किसी को अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जी लेने की उम्मीद के न होते हुए भी उसे ही चाहते रहने का दर्द क्या होता है ? और शायद इसलिए मैं सत्य को भी अपनी नजर में हुए सभी दोषों से मुक्त करती हूँ। तुमसे भी कोई शिकायत नहीं कि तुमने किसी को चाहते रहने के बावजूद मुझसे बार-बार एक ही सवाल क्यूं पूंछा ?
अंत में बाबा ने कहा था कि मैं तुम्हें अपने पास बुला लूं और अपने आप को आजाद कर लूं इस सोने के पिंजड़े से। लेकिन जब मैं सभी बंधनों से मुक्त हो गई, तो स्वीकार करने के लिए तुम मेरे पास थे ही नहीं। पर तुम ही बताओ तब भी क्या यह संभव होता ?
न मुझे गलत न समझना। मैं इसलिए नहीं लिख रही हूँ कि मैंने सत्य को बाबा के कहने पर अपना पति मान लिया था। बाबा ने तो पिंजड़े का दरवाजा खोल अपने वचन से मुझे मुक्त कर दिया था। मैं ही न उड़ पाई बावजूद इसके कि मुझे पूरा आभास था कि तुम्हे मेरा इंतजार आज भी होगा। शायद इसलिए कि तब मुझे खुद ही नहीं मालूम था कि और कितने दिनों तक मैं तुम्हारे साथ इस खुले आकाश में उड़ पाऊंगी, तुम्हारे पैरों को तकिया समझ इन ढलती हुई शामों को देख पाऊंगी, तुम्हारी कविताएं सुन पाऊंगी ? जब इतना निर्मोही मैं सत्य के प्रति न हो पाई तो तुम्हारे प्रति कैसे हो जाती ? और देखो तो अब वह समय नजदीक आ भी गया !!!
लेकिन इन सबके बावजूद आज सोचती हूँ कि अंतिम दिन जब तुम अटारी की सीढ़ियां उतर रहे थे, काश ! उस समय कुछ हिम्मत करके बाबा से बात की होती। जिसका नाम सत्य है, उससे सच कह दिया होता तो इस जीवन में ये काश शब्द तो न होता। तुम मेरी नियति बन कर मेरे पास आए और ये मेरी भूल थीं कि मैंने अपनी किस्मत समझ के तुम्हे खुद से दूर जाने दिया।
या फिर काश !! उस रात मैं सत्य के साथ ही सो रही होती जब तुम्हे सत्य समझ कर अपनी फिलिंग तुम्ही से कह रही थी, "...वह बहुत अच्छा इंसान है, तुम्हारी पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", तब शायद वह खुद ही कुछ समझ जाता।
या फिर काश !!! उस समय कुछ होश में होती जब
तुमने मुझे अपनी बाहों में थाम रखा था और मैंने लिपटते हुए तुमसे "आई लव यू" कहा था। तब बेखुदी की कुछ और एक्टिंग कर लेती, तुमसे लिपट कर तुम्हे और जी भर चूम लेती... प्यार कर लेती। तुम्हारे अंदर ऐसी आग पैदा कर देती इसमें तुम स्वयं पतंगे की तरह जलकर मेरे अस्तित्व में खो जाते। तब शायद तुम इतनी आसानी से मुझे छोड़कर न जा पाते ?
या फिर काश... उस वक्त भले ही मैं बाबा का सख्त विरोध न करती जब उन्होंने तुमसे अकेले में मिलने की इच्छा जताई थी, प्यार से इतना ही मांगा होता, "प्लीज बाबा, जो भी बात करनी है, मेरे सामने कीजिये...", तो शायद वे आसानी से इंकार न कर पाते... होने को बहुत कुछ हो सकता था लेकिन नहीं हुआ यही हमारा प्रारब्ध है, यही मेरी किस्मत।
तुम्हारी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर याद आती है, उनमें से एक जो तुम मुझसे कह कर गए थे कि कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद की जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं... यही आज मेरे जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। शायद इसलिए कि तुम मेरे जीवन का एक ऐसा भ्रम थे जो सत्य रूपी यथार्थ की धरातल पर आकर जीवंत हो गया। एक ऐसा सत्य जो आज मेरे पूरे वजूद को, मेरी जिंदगी को झूठा साबित कर गया। तुम उस अधूरे नशे की तरह थे जिसकी खुमारी उतारने के लिए मैं सुबह पी भी न पाई, और उसी खुमारी को लिए मैं अब तक भटक रही हूँ। आज सोचती हूँ तुममें ऐसी कौन सी बात थी जिसे याद करके मैं दिन-दिन भर सोचती रहती हूँ, भटकती रहती हूँ। तुम्हारी तलाश में बगिया जाती हूँ, लगता कि तुम आम के पेड़ की छांव में उसी जगह बैठे हो, मेरे इंतजार में...
लेकिन बाबा ने दुनिया छोड़ने से कुछ क्षण पहले मुझसे कहा था कि मैं शोक न करूं, तुम एक न एक दिन लौट कर आओगे। तुम्हारी नियति तुम्हें यहां लेकर आएगी। सत्य बाबा से दूर था, उसने कुछ स्पष्ट नहीं सुना होगा तभी तो उसने पूछा, बाबा किसके आने की बात कर रहे हैं। मैने बात टाल दी, "... मंगल को याद कर रहे हैं, जाओ बोला दो, शायद बाबा के प्रस्थान का समय...", फिर मैं रो पड़ी।
सत्य के जाने के बाद बाबा ने अपनी पेटी की तरफ इशारा करते हुए कहा था, "पीहू जाते समय उसने तुम्हारे लिए कुछ लिखा था... मुझे दे कर गया और कहा था कि पहले मैं खुद पढ़ लूं, फिर यदि उचित लगे तो तुम्हे दे दूं... लेकिन आज तक उसे पढ़ने की मेरी खुद की हिम्मत न हुए... वो उसी तरह संदूख की ऊपरी रैक में पड़ी है... जल्दी निकालो उसे... पढ़ो मैं मरने से पहले सुनना चाहता हूँ... जल्दी करो... मेरी सांसे टूट रही हैं..."
उस समय मेरे लिए ये सब अजीब-सा लग रहा था। मैं कभी बाबा को तो कभी संदूक को देखती। बाबा ने फिर कुछ तेज आवाज़ में कहा, "पीहू !!! देखो जल्दी करो... सत्य के आने से पहले उसे पढ़ो..."
मैंने उनके कहे अनुसार तुम्हारी लिखी हुई कविता ले कर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ गई। पढ़ने की हिम्मत तो मुझे खुद भी नहीं हो रही थी... न जाने तुम क्या लिख कर गए होंगे ? मन में अजीब सी बेचैनी उठने लगी... पढ़ने से पहले ही आंखे भर आने तो थी... लेकिन पढ़नी तो थी न...? तो फिर पढ़ी...
है मोहब्बत तेरी रूह से,
जा तुझे छोड़ दिया।
नजर की इकरार-ए-वफा,
जा तुझे छोड़ दिया।
मुश्किल से ये कुछ शब्द पढ़ पाई और आवाज़ रुक-सी गई। हृदय सागर से उठी न जाने कितनी लहरों ने इन आंखों के रास्ते अख्तियार किए। मन में भूली बिसरी यादों के न जाने कितने तूफान उठे। शरीर के रोम-रोम में पीड़ा का एहसास हुआ। मैं भी उन्हीं रास्तों से गुजर रही थी जिन रास्तों से शायद तुम लिखते वक्त गुजरे होंगे। बाबा का कांपता हुआ दाहिना हाथ मेरे सर पर था... अब इससे अधिक क्या लिखूं... बस उस वक्त मैं रोती जा रही थी... और पढ़ती भी जा रही थी...
इस दिल की अधूरी दास्ताँ है तू,
जा तुझे छोड़ दिया।
बुझा इस दिल से तेरी यादों का दिया,
खुद को स्याह रातों के हवाले किया।
बस यहीं पर मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैने रोते हुए बाबा से कहा, "बाबा... अब नहीं पढ़ी जाती... ये पोयम अपने मुझे पहले क्यूं न दी... हां बाबा पहले क्यूं न दी..."
बाबा ने मजबूत किंतु धीरे आवाज में कहा, "और भी हो तो पहले पूरा पढ़ो... फिर सब बताता हूँ..."
मैने आगे पढ़नी शुरू की...
ए दर्द-ए-इश्क अब इंतहा हो गई,
लगा गले जा तुझे छोड़ दिया।
ऐसी मोहब्बत ना हो अब किसे से,
सजदें कर जा तुझे छोड़ दिया।
तू आखिरी लब्ज़ है मेरी कहानी के,
लिख कर जा तुझे छोड़ दिया....
मै उसी तरह रोती जा रही थी... बाबा का हाथ बराबर मेरे सर को सहलाता रहा। जब कुछ देर बाद भी मैं शांत न हुई तो बाबा ने मुझे समझाते हुए कहा, "पीहू ! अब चुप हो जा... अब जाते हुए मुझे और शर्मिंदा मत कर... माफ कर अपने बाबा को... ग्रह-नक्षत्र, कुंडली, हाथ की रेखा इन सब को जीवन में बड़ा स्थान दिया। मैं समझ गया था कि उसने जरूर कुछ ऐसा लिखा होगा जिसे पढ़ने के बाद मेरा भी मन कही विचलित न हो जाए... इसलिए न तो खुद पढ़ा और न ही तुम्हें पढ़ने के लिए दिया... लेकिन मैं एक बात को भूल गया था कि प्रेम की ऊर्जा असीमित होती है, यह वह भाव है जहां ईश्वर के नियम भी बदल जाते हैं... उसने जिन संवेदनाओं और अनुभूतियों से गुजरते हुए अपने हृदय की पीड़ा लिखी होंगी वो कभी खाली नहीं जाती... उसके शब्द हम दोनों को मजबूर कर देते... इसलिए मैंने पहले भी तुमसे कहा है और आज फिर कहता हूँ या तो तुम उसे बुला लेना या फिर अपनी किस्मत समझ सत्य के साथ विवाह कर लेना... और ध्यान रखना यह उसकी आखिरी इच्छा थी कि ये कविता सत्य के हाथ न लगे...
और फिर बाबा चले गए। मैं उसी तरह गुमसुम बैठी रही। आंखों के आंसू सूख चुके थे, और दिल के दर्द अब दिल की धड़कन बन धड़क रहे थे। बाबा का हाथ मेरे सर पर न रहा। सत्य के पहुंचते ही मैने काग़ज़ का वह टुकड़ा ठीक उसी जगह रख लिया जहां कभी माचिस की डिबिया और सिगरेट का पैकेट छुपाया था। उस दिन सचमुच दिल जल गया।
सच लिखती हूँ, तुम्हारे जाने से एक मिनट पहले भी यदि यह पोयम मुझ तक पहुंच गई होती तो मैं तुम्हें नहीं जाने देती... चाहे उस शाम मुझे सब के सामने तुम्हे अपनी कसम ही क्यूं न देनी पड़ती... मैं देती और तुम्हे रोकती... क्या लिख के गए तुम ? बुझा दिल से तेरी यादों का दिया... खुद को स्याह रातों के हवाले किया ? क्या मैने तुम्हे इसी दिन के लिए समेटा था...सहेजा था... कि एक दिन फिर यूं ही टूट के, बिखर के चले जाओ...? तो फिर लो मेरे दोस्त ! आज तुम्हारी यह कविता तुम्हारे ही हवाले कर मैं अब इस दुनिया से जा रही हूँ... तुम्हारा यह इस्तीफा नामंजूर है मुझे। लेकिन कहती हूँ... फिर से मत बिखरना।
तुम्हें याद है, इसी अटारी में जब बाबा से मिलने से पहले तुमने मेरे पांव दबाए थे... और मैंने अधिकार पूर्वक दबवाये भी थे...? जरा तुम सोचना किस अधिकार से...? सचमुच उस शाम मेरे पांव दर्द कर रहे थे। मोहब्बत की राहों में तुम्हारे साथ चलते-चलते शायद मैं कुछ थक-सी गई थी। और सच पूछो तो इसीलिए पत्र के शुरुआत में मैने लिखा था कि तुम गए भी तो अपना कर्जदार बनाकर... अब मुझे उस कर्ज की अदाएगी तो करनी होगी न ? लेकिन इसके लिए तुम्हें यहां आना होगा।
मैं यह भी जानती हूँ यदि तुम यहां आए तो इस बुक की तलाश जरूर करोगे। सच, किसी के डर से ये सब पेटी में छुपा कर नहीं रख रही हूँ। बल्कि इसलिए कि यह सुरक्षित रहें और तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंच जाए। क्योंकि जब ये पत्र तुम्हें लिख रही हूँ मुझे भी अपनी मृत्यु अर्थात देह त्याग का पूर्वाभास हो चुका है। मेरे न रहने के बाद दुनिया के रीति-रिवाज के अनुसार इस घर को शुद्ध किया जाएगा। तब खासकर मेरे कपड़े मेरी चीजे या तो दान कर दी जाएंगी या फिर उन्हें गंगा या नर्मदा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। लेकिन मेरी बुक्स और मेरी यह पेटी रहेगी।
और यदि सत्य लौट के आया तो उन्हें कभी भी अपने से दूर नहीं होने देगा। मुझे मालूम है कि उसे इन सब बुक्स को पढ़ने में कोई खास इंटरेस्ट नहीं है, फिर भी मेरी बुक्स को वह संजो का रखना चाहेगा। क्योंकि वह जानता है कि मुझे इनसे कितना लगाव है। और वैसे भी यहां बुक्स को जलाना या जल में प्रवाहित करना पाप समझा जाता है...
अब किसी को जो और जैसे समझना हो समझे, कोई परवाह नहीं। मैंने तो किसी के साथ कोई छल नहीं किया, सिवाय तुम्हारे। सभी वादे और वफाएं निभाईं। अब स्वीकार करती हूँ, छले तो तुम गए। कभी किसी ने छोड़ देने की शर्त के साथ तुम्हें अपनाया और मैने खामोशी से उसी शर्त को पूरा किया।
जब तुम्हें याद करते हुए तुम्हारे लिए बुक्स अलग रखती या फिर तुम्हारी टी-शर्ट पहनती तो सत्य
धीरे से मुस्कुरा देता। एक दिन उसने कहा, मैं ही तुम्हें याद करती हूँ, तुम कभी नहीं करते होगे। फिर एक दिन उसने यह भी पूछा, "पीहू मेरे ख्याल से उसे तुमसे प्यार हो गया था... तुम्हे क्या लगता है ?"
देखो तो कितना विरोधाभाषी और गलत सवाल किया था उसने। उसे तो यह पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं। लेकिन नहीं, उसने नहीं पूछा, क्यों ? कभी तुमने मेरे लिए एक पत्र लिखा था। अपनी राइटिंग स्किल को दिखाने के लिए झूठा ही सही, लेकिन मुझे पहली नजर में सच लगा, क्यों ?
तुमने मेरे प्रति जो महसूस किया तुम कह गए लेकिन मैंने उसे जताया, पूरे मन से स्वीकार भी किया लेकिन तुम्हे रोक न पाई, क्यों ? जिंदगी में कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद इसलिए कि उनके जवाब भी एक सवाल ही होते है..."
मैंने भी इन तीन वर्षों में खुद से बहुत सारे सवाल किए हैं। मैं अक्सर पहले सत्य को क्यों अजनबी कहती रही ? क्या मेरे जीवन में किसी अजनबी का आना मेरी नियति थी, जिसका पूर्वाभास वह मुझे पहले से कराती रही ? क्या बाबा को मेरी असमय और गुमनाम मृत्यु का आभास पूर्व में ही हो चुका था ? क्या उन्हें मालूम पड़ गया था कि मेरी चिता को आग देने वाला भी कोई नहीं होगा और इसलिए उन्होंने सत्य को मेरे पति के रूप में पहले से ही निर्धारित कर दिया ?
पति ! मेरे जीवन में बाबा द्वारा निरूपित एक ऐसा रिश्ता जिसे बाद में ही सही मैंने अपनाने की कोशिश पूरी इमानदारी से की। यह सच है कि उसको लेकर पहले मेरी मन में जिज्ञासा थी। यह लड़का कौन है और यहां क्यों खड़ा रहता है ? क्या यह मेरे लिए आता है ? फिर धीरे-धीरे महसूस हुआ कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, शायद यह तो इसका जॉब है। पहली मुलाकात में मैंने महसूस किया कि वह एक अच्छा इंसान है। दुनियादारी से कुछ दूर सच्चा और इमानदार। उसमें ऐसी बहुत सी विशेषताएं हैं जो एक अच्छे पति में होनी चाहिए, लेकिन मेरा ध्यान उसके अंदर ऐसी किसी भी विशेषता की ओर नहीं गया। क्योंकि मैंने तो विवाह न करने का फैसला पहले से ही कर लिया था। लेकिन हां, वह एक अच्छा दोस्त बन सकता था और मैंने उसे पहले इसी रूप में स्वीकार किया।
बाबा द्वारा रिश्ता बना देने की बाद भी मैंने उसे एक लिमिट में ही अपनाया। मैं उसके साथ खुद को समय देना चाहती थी और जानना चाहती थी कि क्या कभी मैं इसे प्यार कर पाऊंगी या नहीं। और सच पूछो तो तुम्हारे आने के पूर्व ही मुझे इस बात का आभास हो चुका था कि सत्य का मेरी जीवन में क्या स्थान है। इसलिए लिखती हूँ, तीसरे इंसान होने का गिल्ट तुम अपने मन में मत पालना। लिखा न, तुमने मेरी आंखों में सत्य के लिए प्यार देखा क्योंकि तुम ऐसा देखना चाहते थे, और तुम्हें वही दिखा। मेरी मानो या न मानो, इंसान को वही दिखता है जो वह देखना चाहता है।
मेरी जीवन में तुम्हारा आना मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। मैं केवल इसलिए नहीं कह रही हूँ कि केवल तुम्हारी हॉबीज तुम्हारा इंटरेस्ट मुझसे मैच करता था और लिटरेचर में रुचि ही हम दोनों के बीच आकर्षण का केंद्र था। प्रमुख केंद्र था हमारे विचारों का मिलना। आपस में हमारे नजरिए जिसे कि हम दृष्टिकोण कहते हैं उनका मैच करना। तुम जितने भावुक थे, उतने ही प्रेक्टिकल। तुम्हारे व्यक्तित्व में इन दोनों का गजब का सामंजस्य था। जैसे कि पहली नजर के प्यार में तुम भी विश्वास नहीं करते थे और मैं भी नहीं करती थी। प्यार तो उस व्यक्ति से होगा जो तुम्हारी सोच, तुम्हारी विचारधारा, तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारी अभिरुचि से मेल खाता हो। तब तुम पूरी इंटेंसिटी के साथ उसे स्वीकार भी करोगे।
ये बातें जब पहली बार तुमने मुझसे कही तो सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन जब बात की गहराई तक पहुंची तो समझा कि इसमें गलत क्या है, यह तो बहुत नैचुरल है। प्रत्येक इंसान ऐसे ही व्यक्ति की चाहत तो अपनी जिंदगी में करता है। फिर तुम्हारा मुझसे कहना कि कभी-कभी हम जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं। फिर उसके ही अस्तित्व में हम अपनी तलाश करते और जहां हम खुद को कभी नहीं पाते हैं। ठीक उसी पल मुझे अपनी सभी शंकाओं का समाधान मिल गया। मैं समझ गई थी मुझे किसको किस स्थान पर रखना चाहिए।
याद करो हमारी मुलाकात का तीसरा दिन जब इसी अटारी में तुम्हारे बार-बार रोकने पर सत्य ने भावुकता में आकर मुझे और खुद को श्रापित कर लिया था। तब भी मैं किसी भी भावुकता के अधीन हो उससे कोई रिश्ता नहीं स्वीकार करना चाहा था, लेकिन नहीं बीच में तुम फिर कूद पड़े। फिर बाद में पता चला कि तुम तो मुझे उसके साथ विवाह के लिए तैयार भी करने वाले थे। लेकिन इस बारे में मैंने तुमसे कोई बात नहीं की, जानते हो क्यों ? क्योंकि यह सब को-एक्सीडेंटल हुआ। तुम कहीं से दोषी सिद्ध नहीं हो रहे थे। तुम्हारे सामने सत्य के लिए परेशान होना, बेचैनियां दिखाना, नजदीकियां बढ़ाना इन सबका एक ही कारण था, यह देखना कि इन सब का असर तुम पर क्या होता है ?
उस रात जब सत्य बाथरूम में था और मैं अटारी के नीचे वाले हॉल के फ्यूज बल्ब को चेंज करने आई थी। तुम और ज्ञान भैया अटारी में मुझे ले कर आपस में बातें कर रहे थे। जिज्ञासा से मैं दबे पांव सीढ़ी के पास खड़ी हो गई थी। नीचे अंधेरा होने से तुम लोगों का ध्यान मेरी तरफ नहीं गया। लेकिन मैने उस रात सब कुछ देखा और सुना। तुमने ज्ञान भैया से वादा किया कि तुम कभी देवदास नहीं बनोगे। जब तुम पोएट्री बुक में पैसे और अपनी पोयम के पन्ने दबा रहे थे। उस रात मैने तुम्हारे चेहरे को ध्यान से पढ़ा था, तुम्हारे दिल की हर एक फिलिंग तुम्हारे चेहरे पर लिखी थी।
ज्ञान भैया को मेरे और सत्य के बीच प्यार को ले कर शंका थी और तुमसे उन्होंने कहा भी था कि वे मुझसे बात करेंगे, लेकिन तुमने रोक दिया। बस उसी एक पल में मुझे वो मिल गया जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी। मुझे विश्वास हो गया, ज्ञान भैया न सही लेकिन एक न एक दिन तुम खुद ही मुझसे स्वीकार करोगे। उस रात सीढ़ी से उतरते हुए मैंने नशे में किसी व्यक्ति को या किसी मित्र को सहारा नहीं दिया था, बल्कि उस व्यक्ति को दिया था जिसे मैंने सर्वस्व मान लेने का इरादा कर लिया था। लेकिन इतनी जल्दी नहीं, मुझे तो तुम्हारे बारे में अभी बहुत कुछ जानना था, समझना था। मैंने कहा न पहली नजर के प्यार पर मैं विश्वास नहीं करती ओर इसीलिए मैंने उस दिन कहा था, "जब चढ़ेंगे तो यह अंतिम पायदान ही पहला पायदान होगा। मित्रता के आखिरी पायदान पर तो हम पहुंच ही चुके थे न ?
हां मेरे प्रियवर, वहीं से शुरू हुआ था मेरे प्यार का सफर, और एक दिन हम दोनों प्यार की सीढ़ी के सभी पायदान को पार कर इसी अटारी पर पहुंचे, जहां हमने एक साथ एक ही आईने में अपने चेहरे देखे। अंतिम बार तुम्हें गले लगा कर रोई। तुम्हारे कदमों में बैठ कर बाबा से अनजाने में हुए किसी भी गुनाह की मन ही मन ऊपर वाले से छमा याचना की और तुमसे मांगा कि तुम एकबार ही सही फिर यहां लौटकर मेरे लिए आओ...
अंत में... तन्हा तुम्हे उन्हीं सीढ़ियों को उतरते हुए देखा और मैं प्यार की ऊंचाइयों में अनिमेष खड़ी बस तुम्हे उतरते हुए देखती रह गई। क्या कभी तुमने किसी पहाड़ी की ऊंचाई पर खड़े इकलौते वृक्ष को देखा है, मैने देखा है। उसके दर्द और एकाकीपन को महसूस भी किया है...
एक दिन सत्य ने व्यंग्यात्मक और उलाहना भरे लहजे में कहा, "पीहू ! हमारे रिलेशन को तीन साल होने को हैं... लेकिन तुम न तो मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो रही हो और न ही कहती हो कि शायद अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं..."
जानते हो, उस दिन मैंने तुम्हारी ही टी-शर्ट पहन रखी थी। उसे गौर से देख कुछ मुस्कुराते हुए उसने व्यंग्यात्मक लहजे में आगे पूछा, "प्यार तो करती हो न मुझसे...?"
अब मैं इतनी नादान तो नहीं थी कि उसके कहने के अर्थ को समझ न सकूं... उस शाम तुम पर पहली बार क्रोध जागृत हुआ। दिल में आया कि मंगल को साथ ले सीधे तुम्हारे घर पहुंच जाऊं और तुम्हारा गिरेबां पकड़ तुमसे पूछूं कि बताओ किसके लिए छोड़ कर आए थे तुम मुझे ? एक जो अब रहे नहीं, और दूसरा जो इतने सालों बाद मुझसे पूछता है कि बताओ तुम्हारे दिल में क्या है ? अरे तुम्हें कुछ पूछना था तो तुमने उसी दिन मुझसे क्यूं न पूछा, जिस दिन बाबा से मेरे और तुम्हारे बारे में कहा था।
दिल में आया कि उसे सब कुछ सच-सच कह दूं। कह दूं कि हां तुमसे प्यार नहीं है, और जिससे करती हूँ, उससे कह चुकी। लेकिन तुमसे शादी न करने की एकमात्र वजह ये नहीं है। मरने वाली हूँ इसलिए नहीं कर रही, ताकि तुम किसी भी रिश्ते से मुक्त रहो, और शायद यह मेरा दुर्भाग्य है कि कुछ ज्यादा ही जी गई..."
लेकिन बहुत कुछ सोच के रुक गई। मैं जानती थी कि वह ज्ञान भैया का बेस्टफ्रेंड है। मेरी कहे को वह न जाने किस रूप में प्रस्तुत करे। और फिर बात तुम तक पहुंची तो क्या होगा ? तुम इस अपराध बोध से ग्रस्त न हो जाओगे कि तुमने मेरी जिंदगी खराब की और फिर तुम न जाने कौन सा कदम उठा लो, क्या कर जाओ, मेरी होने वाली मृत्यु को तुम कही अपने सर न ले लो... उस पल पहली बार मुझे तुम्हारी भावुकता से डर लगा था।
भावुकता !!! कभी तुमने ही कहा था कि भावुकता में लिए गए निर्णय जरूरी नहीं की सही साबित हों, लेकिन तुम खुद इस बात को कहां मानते थे।
यदि शीरीं और फरहाद की प्रेम कहानी को कुछ देर के लिए सच मान लिया जाय तो यह कहानी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। लोग अक्सर इन प्रेम कहानियों की रूमानियत को बरकरार रखने के लिए उन तथ्यों को बाहर निकाल कर फेंक देते हैं जो हमारे लिए शिक्षाप्रद हो सकती हैं। लोग अक्सर यही समझते हैं, और उन्हें यही बताया जाता है कि फरहाद शीरीं को पहले से चाहता था। जबकि यह सही नहीं है। शीरीं से उसकी पहली मुलाकात उसकी शादी के बाद ही हुई थी।
आर्मेनिया के बादशाह की बेटी शीरीं जो बेहद ही खूबसूरत और कला से मोहब्बत रखने वाली एक भावुक लड़की थी, उस पर ईरान का बादशाह खुसरो सम्मोहित हुआ। उसने शीरीं से विवाह करने की इच्छा जाहिर की। शीरीं को मालूम था कि उसके इंकार करने का नतीजा क्या होगा। बादशाह किस हद तक जा सकता है। तब उसने अपनी सुंदरता को लोक हित के लिए समर्पित कर दिया। शीरीं ने खुसरो का ये प्रस्ताव मान लिया। लेकिन उसके सामने लोकहित में एक शर्त रखी.अगर खुसरो पर्शिया के लोगों के लिए दुर्गम पहाड़ियों के बीच से दूध की नहर बनवाते हैं तो वह उनसे शादी करने को तैयार है. खुसरो ने यह शर्त स्वीकार कर लिया। इसके बाद ही शीरीं ने खुसरो से शादी की थी।
नहर खुदवाने का काम खुसरो ने फरहाद नाम के एक इंजीनियर को दिया. जो वास्तव में एक इंजीनियर नहीं शिल्पकार था। जिसने एक से बढ़कर एक बेहतरीन नक्काशी की थी, मूर्तियां बनाई थीं। पहाड़ियां दुर्गम थी, उनके पत्थरों को काटकर नहर निकालना एक चुनौती भरा काम था। जिसे एक बुद्धिमान और कुशल शिल्पी की देख-रेखा में ही किया जा सकता था।
बादशाह ने फरहाद को बुलवा कर शीरीं से मिलवाया ताकि उसकी सलाह पर फरहाद नहर की खुदाई करवा सके. तब खुसरो को कहां मालूम था कि वह अपनी पत्नी की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहा है जो सिर्फ पत्थरों को काटकर नहर ही नहीं निकल सकता बल्कि पत्थरों को तराश कर उन्हें शक्ल भी दे सकता है। कला से मोहब्बत करने वाली शीरीं की मुलाकात एक ऐसे कलाकार से हुई जो उसके लिए नहर का काम करने के लिए भी तैयार हो गया। वहीं फरहाद की मुलाकात एक ऐसी खूबसूरत और जहीन लड़की से हुई जिसने लोकहित के बारे में सोचा था। इसलिए कभी अपनी शादी की एक ही शर्त रखी। क्योंकि वह जानती थी की एक बादशाह ही वे साधन जुटा सकता है और इस कार्य को पूर्ण करने का जरिया बन सकता है। नहीं तो, यदि शीरीं को दौलत से मोहब्बत होती तो उसे कौन-सा पानी या दूध की कमी होने वाली थी, जो इस तरह की शर्त रखती ? इस तरह फरहाद शीरीं की खूबसूरती के साथ उसकी सोच से भी प्रभावित हुआ था और उसने इस लोकहित में शीरीं का पूरा साथ देने का फैसला लिया। लेकिन वह वास्तव में था तो एक कलाकार ही न ? उसने शीरीं की मूर्ति अपने दिल में ही स्थपित नहीं की बल्कि दुनिया के सामने भी प्रस्तुत कर दी। क्या गलत किया उसने ?
बस यही बात तो शीरीं के दिल को छू गई होगी, तभी तो उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ फरहद से मोहब्बत की। फरहाद ने शीरीं के लिए असंभव से लग रहे काम को पूरा किया। मैं नहीं मानती कि उसने कोई दूध की नहर निकाली होगी लेकिन ईरान में उस समय पानी की उपलब्धता किसी दूध से कम नहीं थी। इसलिए उस स्थान, समय और परिवेश में दूध को पानी का पर्यायवाची माना जा सकता है। उसका पति अर्थात खुसरो बादशाह था। उसके अहंकार को चोट लगी कि कैसे उसकी पत्नी एक मजदूर से मोहब्बत कर सकती है।
यदि उसने शीरीं की नजरों से ही फरहद को देखा होता तो उसे भी मजदूर के अंदर एक कलाकार नजर आता। कहानी का अंत भावुकता में हुआ। धूर्त और चालाक लोग जो हमेशा से एक अच्छे इंसान के साथ करते आए हैं, वही खुसरो ने फरहद के साथ किया। शीरीं की मृत्यु की झूठी खबर उस तक पहुंचा दी गई और जिसका परिणाम था फरहद की आत्महत्या। अपराध किसी और ने किया और अपराधबोध से ग्रस्त हो शीरीं ने भी स्वयं की हत्या की।
तो ? अब सच कहना, तुमने भी फरहाद की तरह मेरे दिल-ओ-दिमाग में चल रही कशमकश को पढ़ न लिया था ? तुम अच्छी तरह समझ चुके थे मेरे लिए वह लोकहित मेरे बाबा थे। तभी तो जाते-जाते अपने पूछे गए सवाल का जवाब तुम खुद ही दे गए। क्या कहा था तुमने, "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है..."
यदि तुमने जान लिया था कि मैं सत्य से प्यार नहीं करती तो फिर तुम किस प्यार की बात कर रहे थे ? तुमने ऐसा क्यो कहा, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका..."
ऊपर और अंतिम के ये शब्द, "... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा...", मुझे गुमराह करने के लिए था न, ताकि मैं तुम्हारे कहे के अर्थ तक न पहुंच सकूं...? इन्हीं में उलझा के रह जाऊं...? तुम तो सिर्फ मुझसे इतना कहना चाहते थे, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका...", यहां पर प्रेम का कोई क्रम नहीं था। है न ? लेकिन शायद तुम भूल गए कि लिटरेचर जैसी जिंदगी तुम जरूर जी रहे थे लेकिन उस लिटरेचर को तो पढ़ मैं रही थी। तो फिर कैसे न समझ पाती ?
सोच रहे होगे कि मैने ये कहानी तुमसे क्यों कही ? पहली वजह तो तुम समझ ही गए होगे, दूसरी मैं अब लिखती हूँ। तो जान लो मैं तुम्हारे जीवन की वही शीरीं हूँ। तथाकथित वैवाहिक संबंधों में रहते हुए तुमसे मोहब्बत की, उतनी ही तीव्रता से जितनी तीव्रता से तुमने की, और फिर तुम्हें अपनी नजरों के सामने ही मर जाने दिया तो अपराध बोध तो जागृत होगा न ? आखिर तुम्हारी हत्या करने वाले लोग कौन थे, जिन्हें मैंने अपना माना था, तो फिर मैं दोष-मुक्त कैसे हुई ?
तब खुद के होने से घृणा होने लगी। क्या मतलब प्यार की देवी बने रहने का। क्या अर्थ रह जाता है इन ऊंचाइयों का जहां अब तुम ही नहीं। उसी पल से मैंने अपनी उन्नति नहीं अवनति के बारे में सोचना शुरु किया। फैसला लिया खुद को मार लेने का। जिसकी शुरुआत थी प्यार की उस सीढ़ी से उतरना, जिसके एक-एक पायदान को चढ़ कर हम इन ऊंचाइयों तक कभी पहुंचे थे। धीरे-धीरे मुझे यह भी विश्वास हो चला कि जिस वादे को निभाने के लिए तुमने मुझे छोड़ा यदि मैं उसे पूरा करूं लूं, मैं भी सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पहुंच जाऊं, तो तुम फिर से मिल जाओगे। जब तुम पर आया क्रोध शांत हुआ तब मुझे तुम्हारी रिस्पेक्ट, एडजेस्टमेंट और रिस्पॉन्सिबिलिटी वाली थ्योरी याद आई। तब पति-पत्नी के इस अधूरे रिश्ते को मैंने पूर्ण करने का फैसला लिया, वह था सत्य को स-शरीर अंगीकार करना...
इसी तरह जाड़ों के शुरुआत के ही दिन थे जब मैंने इसी अटारी को अपने मन मुताबिक सजाया। मन के लाखों अरमानो को सुहागसेज में बिखेर दिया। खुद भी दुल्हन की तरह सजी, गुलाबी साड़ी पहनी, माथे में सिंदूर लगाया और समय आने पर स्वयं को सत्य की बाहों के हवाले कर दिया। वह खुश था, उसने समझा होगा कि मैं अब उससे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन उसने नहीं पूछा, क्यों...?
मैं थी और सत्य था। केवल हम दोनों थे। उसकी बातें, उसकी हर एक छुअन मुझे उत्तेजित कर रही थी। सब कुछ उसी तरह हो रहा था, शायद जैसे एक नव-विवाहिता के जीवन में होता होगा। नई उमंग, नई चाहते, नए सपने, सभी कुछ जीवन में नया महसूस हो रहा था। हैरान थी, क्या यह वही सत्य है, जिसे अभी तक मैंने केवल अपना मित्र माना था, जिसकी बाहों में सर रखकर मैं सोया करती थी ? तो उस दिन उसकी छुअन में जो मैं महसूस कर रही थी, पहले क्यों नहीं किया ?
कामोंत्तेजित शारीरिक सुख प्राप्त करने का एहसास भी अलग ही होता है मेरे दोस्त ! जहां इंसान दुनिया की सारी फिलासफी, सुख-दुख, दर्द, मोह, माया, बंधन, सभी भूल कर उस सुख की अनुभूति करता है। सच लिखती हूँ, उन पलों में, मैं तुम्हें भी भूल गई। लेकिन क्या पता था इस शारीरिक सुख को प्राप्त करने के सफर की शुरुआत जितनी महीन और नाजुक होगी, उसका अंत उतने ही तेज धमाके के साथ होगा...?
वही सब कुछ मेरे साथ हुआ। चरमोत्कर्ष के बिंदु पर पहुंचकर मेरे मानस पटल के वृहद आकाश में एक धमाका हुआ। आसमान तेज रोशनी से भर गया। इस धमाके से असंख्य सितारे एक-एक कर बिखरते चले गए। इनमें से बेहद चमकदार सितारे धीरे-धीरे फिर इकट्ठा हुए। उनसे एक तस्वीर बनी, और फिर जो एक चेहरा उभर कर सामने आया उसे देख कर मेरे हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, शरीर बेजान-सा हो गया।
शेष बचे हुए सितारे टूट-टूट कर मेरी आंखों में ही समाते चले गए। मैने अपनी आँखें मूंद ली, बेजान जिस्म लिए पड़ी रही। कुछ क्षण बाद जब आंखे खोली तो वही सितारे मोती बन मेरी आंखों में चमक उठे। मेरे आंसुओं को देख सत्य ने सहानुभुति से मुझे खुद से लिपटा लिया, "सॉरी... फर्स्ट टाइम है न..."
बस, उसी पल से मैने कुछ भी सोचना बंद कर दिया। तुम कब याद आए कब नहीं, अब नहीं लिख सकती। बस इतना लिखती हूँ, तुम्हारी तरह स्वीकार करने की हिम्मत अब शायद मुझ में भी आ चुकी है। कष्ट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, पीड़ा होती है। और यही पीड़ा जब सहनशक्ति से बाहर हो जाती है, तो इंसान चीखता है, चिल्लाता है, आंसू बहाता है या फिर बिल्कुल गुमसुम हो जाता है। उस दिन सोचा था कि मेरे पास तुम्हारी ऐसी कौन-सी धरोहर थी जिसके लुट जाने का मैं शोक मना रही हूँ ? जिसकी चुभन और दर्द को महसूस कर मेरी आंखों में आंसू आ रहे है ? फिर भी आ रहे थे न ? क्यों ?
सच लिखती हूँ, उस रात का मन में कोई पछतावा नहीं, लेकिन कोई सुखद अनुभूति या सुनहरी यादें भी नहीं। क्यों ? क्या इसलिए कि जिससे मन मिले यदि उसी से शरीर भी मिले तो वो पल अविश्वमर्णीय होते हैं ? यहां तुम्हारा सिद्धांत सही साबित नहीं हुआ या फिर यह समझ लो सिद्धांत अधूरा था। काश ! उस दिन तुमने यह भी बताया होता कि इस सिद्धांत से अंतर्मन में स्थापित हो चुके प्रेम को किसी भी रिश्ते से विस्थापित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत तो उनके लिए सही हो सकता है, जिन्हें पहले किसी से प्रेम हुआ ही न हो। शरीर के चौबीस आयामों में स्पंदित हो चुके प्रेम को भला कौन सा सिद्धांत विस्थापित कर सका है। अब तो जितनी भी जिंदगी बची थी उसे जीनी नहीं गुजारनी थी, और मैंने तो इसके लिए भी अपने आप को तैयार कर लिया था, लेकिन अब किसके साथ...
बाद में मुझे यह भी समझ में आया कि उस दिन तुम प्रेम की सीढ़ी उतर कर भी मुझसे कहीं ऊंचे पायदान पर पहुंच गए थे। तुमने केवल सत्य और बाबा के लिए ही मेरा त्याग नहीं किया था, बल्कि वह त्याग मेरे लिए भी था। मैं चाहती तो तुम्हें रोक सकती थी, किंतु मौन रह गई। तुमने उस मौन को स्वीकार किया, सत्य के रूप में बाबा को बेहतर विकल्प देकर चले गए। मुझे किसी भी दुविधा में नहीं पड़ने दिया। सीढ़ी उतरते समय पीछे से मेरे पूछने पर "... अब कब आओगे अजनबी...?",
तुम कुछ पल के लिए रुके, फिर अपनी पीठ और सर दिवाल से टीका, कस कर अपनी आँखें बंद कर मुझसे बस यही कहा कि जब भी मैं तुम्हें पुकारूंगी... तुम मेरे पास चले आओगे। तुम्हारे वे शब्द मुझे आज भी याद हैं, ""पीहू... मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", उस समय न तो मेरी तरफ तुमने देखा और न ही मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। तुम नहीं चाहते थे न कि मैं किसी द्वंद्व में पड़ कमजोर हो जाऊं...?
कहते हैं, दो इंसानों की तुलना आपस में नहीं करनी चाहिए, लेकिन अब यह गुस्ताखी मुझे कर लेने दो। एक मुझसे सर्वस्व पा कर भी बेचैन है, अभी भी मुझसे और भी बहुत कुछ पाना चाहता है। तभी तो मुझे कस कर बंधनों में बांधना चाहा लेकिन बांध नहीं पाया। प्रतिपल छटपटाता रहा। वहीं दूसरी तरफ तुम !! छोटी सी उम्र में एक नहीं दो बार अपने प्रिय का त्याग कर शांत और स्थिर मन से चले गए... और ऐसे गए कि फिर लौट कर आए ही नहीं। क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ?
अब मेरी जिंदगी एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहां मुझे अपने शरीर से कोई मोह नहीं रह गया था। कौमार्य एक बार लुटाओ या फिर सौ बार, क्या फर्क पड़ता था। फिर मैंने सत्य को रोकने की कोशिश कभी नहीं की। उसने जब चाहा तब खुद को उसकी बाहों में समर्पित किया। और जब कभी उसने नहीं भी चाहा तो फिर मैंने चाहा, है न अजीब बात ? आखिर उसने बाबा की बड़ी सेवा की और घर में कैद एक लड़की के जीवन में पल दो पल की खुशियां लेकर आया था। इन सब का आखिर उसे कुछ तो प्रतिदान मिलना चाहिए, यह हक था उसका, जो दिया ? कभी सोचना। मैं तो अपनी कहती हूँ, मन में एक ही लालच था कि कभी न कभी तो मैं सीढ़ी के उस आखिरी पायदान तक पहुंचूंगी जहां पर शायद तुम खड़े मिलोगे। अदब लब्जो को एक किनारे रख सामान्य शब्दों में कहूं तो उन दिनों खूब मजे लूटे और उसके बाद उठाने वाले अंतर्मन के दर्द को भी सहन किया। हर अंत में एक तस्वीर बनती और फिर मेरे आंसुओं से धुंधली हो घुल भी जाती। चलो इसी बहाने ही सही, तुम दिख तो जाते थे।
कभी सोचती हूँ, आध्यात्मिक प्रेम में शरीर का भला क्या महत्व, वह तो इससे परे होता है न ? कभी उसके विवाह को देख फिर मेरा त्याग कर तुम शरीर के मोह से मुक्त हुए और अब मैं भी हो गई। हम दोनों अब एक ही धरातल पर खड़े हैं, इसलिए लिखती हूँ कि अब इस शरीर का त्याग करने पर भी मुझे कोई कष्ट नहीं होगा।
अब भी तुम्हारी इस टी-शर्ट में मेरी जान बसती है। उसे ही बार-बार पहनने का मन करता है, लेकिन थोड़ी देर में उतार कर अच्छे से सहेज के फिर से रख देती हूँ कि कहीं जल्दी पुरानी न हो जाए... उधड़ न जाए या फट न जाए।
मुझे ऐसा क्यूं महसूस होता है कि जब तक तुम्हारी ये टी-शर्ट मेरे पास है, तुम मेरे पास न होकर भी मेरे पास ही रहोगे ? क्यूं महसूस होता है कि जैसे मेरे जीवन का और शायद उसके बाद का भी अस्तित्व इसी के जुड़ गया है ? क्यूं जब भी इसे पहनती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि तुम मेरी रूह के साथ मेरे जिस्म से भी लिपट गए हो ? क्यूं जितनी बार भी इसे धुलती हूँ तो तुम्हारे परफ्यूम की खुशबू फिर से एक नए अंदाज में महक उठती है, और मेरे वजूद के हर हिस्से में समाती चली जाती है ?
अब क्यूं अक्सर खुद से पूछती हूँ कि टाइम कितना हो गया होगा ? और उसके जवाब की तलाश में सोती हुई रात में अपने बेडरुम से बाहर निकल आंगन में आ कर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर आसमां में चांद सितारों की पोजीशन को देख अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ।
शायद उस दिन तुमने ठीक कहा था कि कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं, जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। क्या वही काम मैने खुद स्वयं के लिए किया...? नहीं, बाबा के लिए भले ही सत्य बेहतर विकल्प रहा हो लेकिन मेरे लिए तो तुम ही थे, जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर मैं चली जाती। तुमसे झूठ बोल सकती थी कि मुझे भी पहले कुछ नहीं मालूम था। पीछे रह जाते तुम, तब तुम मुझसे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते।
सही लिखा न ? तुम तो पहले से ही बिखरे हुए मुझ तक पहुंचे थे। मैं पूरे मन योग से तुम्हें संवारती, अपने नजरिया से एकत्र करती और फिर एक दिन तुम्हें बिखेर, स्वयं चली जाती ? तो फिर बताओ तुम क्या करते ? जरा शांत मन से सोचना क्या त्याग सिर्फ तुमने किया ? सत्य ने मेरी अभिरुचियों का सम्मान जरूर किया लेकिन उसके साथ जुड़ न पाया। मैने जो बुक्स के नाम उसे लिख के दिए उसने ला के दी, लेकिन मुझे याद नहीं आता कि कभी उसने मेरे साथ कोई कहानी या कोई छोटी सी कविता ही मेरे साथ पढ़ी हो या उनके विषय में डिस्कसन किया हो। यदि मैने कभी करना भी चाहा तो यह कह के टाल गया, "छोड़ो यार ये सब बेकार की बाते हैं...", या फिर, "...मैं तुम जैसा समझदार नहीं हूँ..."
धीरे-धीरे यह समाज और उसके रीति रिवाज मुझसे ऊपर नजर आए। मुझे वैवाहिक बंधनों में बांधने की आरजू इतनी प्रबल हो चुकी थी कि उसने कभी भी मेरे इंकार की वजह पूरी ईमानदारी के साथ जानने की जरूरत ही नहीं समझी। वह इसे बहुत ही कैजुअल लेता था। उसने शायद धीरे-धीरे अपने मन में मेरा अक्स बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज की लड़की के रूप में स्थापित कर लिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं। उसने कभी मेरे साथ जुड़ने की ईमानदारी के साथ कोशिश ही नहीं की। यदि करता तो मेरी अभिरुचियों में ही मुझे समझ पाता। यदि मैंने उससे कहा और फिर वह समझा तो यह प्यार कहां रह गया ? यह तो मांग और पूर्ति पर आधारित बाजार का एक सिद्धांत बन गया न ?
मैने दार्शनिक, पौराणिक, और आधुनिक सभी तरह के लिटरेचर पढ़ें, और सच पूछो तो बहुत पढ़े, लेकिन कभी लिख नहीं पाई। जब भी कुछ लिखने की कोशिश की तो यही सोचा न जाने कैसा लिखूं ? किसी को पसंद आएगा कि नहीं ? लेकिन उस दिन बगिया से लौटते समय मैने बड़ी हिम्मत करके तुम्हे अपने जीवन की पहली चार लाइन सुनाई थी, तुम्हे याद तो होगी न...?
इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
तेरे अश्क मेरे अश्क में अब फर्क ही क्या,
एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।
और फिर तुम्हारा ये कहना, "... वाह ! काश मैने लिखा होता...", मेरे दिल को छू गया। यहां पर बात आत्मप्रशंसा के आत्मिक-सुख की नहीं थी। बात तो थी इनकरेज करने की, किसी को हिम्मत देने की। कभी सत्य मेरी अधूरी रह गई एजुकेशन को लेकर चिंतित था। वह चाहता था कि मैं उसे पूरा करूं और कंपटीशन एग्जाम की तैयारी करूं और अंत में सर्विस करूं। मैं नहीं कहती कि उसकी सोच गलत थी लेकिन उसकी इस सोच में मैं कहां थी ? उसने यह नहीं पूछा कि पीहू तुम क्या करना चाहती हो, तुम्हारी पसंद क्या है ? उसकी समझ में मेरे लिए जो बेहतर लगा उसी को पूरा करना चाहा। लेकिन तुम मेरी जिंदगी में मेरे पैरेंट्स के अलावा वह पहले इंसान हो जिसने मुझसे ये पूछा था। और आज देखो तो उसी का नतीजा है कि अधूरी ही सही एक पोयम लिखी और तुम्हें इतना लंबा पत्र लिख रही हूँ...
इसलिए लिखा कि तुम मेरे लिए बेहतर विकल्प थे और मेरा प्यार भी। मेरा तुम्हे प्यार करना उतना ही कुदरती था जैसे इंसान खुद से प्यार करता है। किसी के त्याग को मौन रह के स्वीकार कर लेना उससे भी बड़ा त्याग होता है। तो मेरे प्रियवर ! अपनी इच्छाओं का, अपने बेहतर विकल्प का, और अपने प्यार का त्याग सिर्फ तुमने ही नहीं मैंने भी किया, और सच पूछो तो तुमसे कहीं अधिक किया। तुम्हारे लिए तड़पी, रोई, पागलों की तरह घंटों-घंटों बगिया में उसी आम के पेड़ के नीचे बैठी रही। ढलते हुई शाम को देख लेडी नॉर्टन की वही पोयम गुनगुनाती रही। जब थक जाती तो अपनी चुनरी ओढ़ के वहीं लेट जाती। कुछ लिखने की कोशिश करती फिर अधूरा छोड़ देती, किसके लिए लिखती ? अब तो कोई कहने वाला भी तो नहीं था, "पीहू ! काश मैने लिखा होता..."
ज्ञान भैया ने तुमसे कहा था न कि कभी-कभी न कहने का दर्द कह देने के दर्द से कहीं अधिक होता है, तो उन्होंने सच ही कहा था। यह तो अच्छा हुआ कि आखिरी दिन ही सही, तुम्हारे साथ-साथ मैने भी स्वीकार कर लिया। कुछ तुमसे कह दिया, जो नहीं कह पाई तो इस पत्र में लिख दिया। आज सोचती हूँ, यदि न किया होता तो ? फिर तो तुम्हे पूरी किताब ही लिखनी पड़ती, है न ?
यदि ऐसा न होता तो आम के पेड़ की छांव में या फिर चलतो हुई राहों में तुम्हें कस कर गले न लगाया होता। आज भी उस आईने को मैंने सहेज कर न रखा होता जिसमें अंतिम बार तुम्हारी सूरत के साथ अपनी सूरत देखी थी। और जब कभी उसमें अपनी सूरत देखती हूँ तो क्यों चुपके से तुम भी न आ जाते हो ? मैं महसूस न करती कि जैसे मै तुम्हारे कंधे पर सर रख तुम्हे देख रही हूँ, तुम्हारे गाल को फिर से चूम रही हूँ। इन सभी पलों में मुझे समझ में आता है कि तुम मेरी जिंदगी में क्या मायने रखते थे... और आज भी रखते हो... शायद नहीं यक़ीनन !
तुम्हारे साथ मैने अपने जीवन के महज चार दिन ही तो जिए थे। उन चार दिनों में तुम्हारे साथ हंसी, रोई, तुम्हे गले लगाया, साथ में शराब पी, यहां तक कि सिगरेट पीने की भी कोशिश की। जो तुमने कहा, सुनती गई। वे सभी लम्हे मेरी निगाहों में आज भी कैद हैं। जहां जरूरत महसूस की तुम्हें डाटा भी, लेकिन कभी तुमसे नाराज नहीं हुई और न ही तुमसे रूठने का मन किया, क्यों ? शायद इसलिए कि लोगों को अक्सर कहते सुना है कि जिंदगी चार दिन की होती है, और यह चार दिन मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी। क्यों तुम्हारा मेरे साथ होना मेरे आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा पर भारी पड़ गया ?
और इन सब का जवाब वही एक सवाल है, जो सत्य ने मुझसे कभी नहीं पूछा। उसे तो पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं, लेकिन नहीं, उसने कभी नहीं पूछा, क्यों ?
कहते हैं यदि किसी के मन में और हृदय में किसी के लिए प्रेम हो तो वह आंखों से छलकता है, फिर वह जमाने से भी नहीं छुपता। तो फिर मैं यह कैसे मान लूं कि जिस प्रीत को मंगल और कमली ने हमारी आंखों में देखा, उस प्रीत को सत्य ने न देखा होगा ? तुम याद करो वह आखरी दिन जब हम बगिया से घर तक साथ चलते हुए आए थे। उस दिन मेरी इच्छा का सम्मान सत्य ने ही किया था और उसने मेरा फेवर लिया था। वास्तव में वह अपनी इसी शंका की पुष्ठि करना चाहता था। हम दोनों घर देर से पहुंचे और उसे अपनी शंका सही प्रतीत हुई। उसके मन में असुरक्षा की भावना जागी जिसका जिक्र उसने अपने सामने अपने ही तरीके से बाबा से किया। तो फिर जवाब मालूम होने के बाद भी सवाल कैसे पूछता ? वह जानता था कि यदि उसने पूछ लिया तो पीहू झूठ नहीं बोलेगी। तब उसकी सभी संभावनाएं समाप्त न हो जाती ? मैं चाहूं या न चाहूं वह तो मुझसे शादी करना चाहता था न ?
उसने मुझसे एक रिश्ता चाहा था तो उसे मिला। लेकिन तुमने जो चाहा तुम्हे न मिला, यानी मेरा साथ, मेरी नजदीकियां। रिश्ते नातों से दूर मेरे साथ जिंदगी को जीने की ख्वाहिश तुम्हारी पूरी न हुई। इसका दोषी भी मैं तुम्हें ही मानती हूँ। किसी को प्यार की उन ऊंचाइयों पर ले जाकर न खड़ा कर दो जहां वह देवी या देवता बनने के लिए मजबूर हो जाए और फिर उस तक पहुंचने के लिए तुम खुद ही तरस जाओ। नियति ने तो तुम्हे वो रांझणा बना के रख दिया जो हीर की चौखट में न तो हीर की भिक्षा मांग सकता था और न ही उसे छीन के ले जा सकता था।
कभी - कभी मेरे मन में एक सवाल उठता कि सत्य मेरे जीवन में क्यों आया जिसका जवाब आज मुझे मिल गया है। इसकी दो वजह हैं। पहली बाद में, पहले दूसरी बताती हूँ, यदि मंगल सत्य को लेने गया है तो वह उसे अब लेकर ही आएगा। मै रहूं या न रहूं, दोनों ही स्थितियों में अब वह अपने पति धर्म को निभाएगा। न रही तो वही मेरा अंतिम संस्कार करेगा। यदि रही तो अंतिम समय में मेरे पास होगा। और दूसरी वजह बताने से पहले मैं तुमसे कुछ सवाल पूछना चाहती हूँ...
तुम यहां पर दोबारा क्यों आए हो ? आए हो या लाए गए हो ? यदि सत्य तुम्हें यहां लेकर आया है तो क्यों ? यदि वह तुम्हारे साथ अटारी पर नहीं है तो क्यों ? और यह पत्र यदि तुम रात को अकेले पढ़ रहे हो तो क्यों ? यदि वही मौसम है जिस मौसम में हम पहली बार मिले थे, और बाहर चंद्रमा की मद्धिम रोशनी चारों तरफ फैली हुई है, तो क्यों ? ....
अचानक पूरी अटारी में अंधेरा छा गया, शायद लाइट गुल हो गई थी। पत्र के इस भाग को पढ़ते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे पूरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गई... बाहर खिड़की से आता हुआ चंद्रमा का हल्का-हल्का प्रकाश, और मेरे दिमाग में गूंजता हुआ एक प्रश्न, "आखिर मैं यहां क्यों हूँ..."
एक हाथ में पत्र लिए मैं बिस्तर पर निढाल लेट गया। मेरी आंखें बंद, दिल की धड़कने तेजी से चल रही थी। सत्य और पीहू दोनों का नजरिया और एकदूसरे के प्रति सोच मेरे सामने आ चुकी थी। मुझे कोई पूरी तरह गलत या सही नजर नहीं आया। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे और गलत भी। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित विवाह के लिए सत्य की मांग नाजायज नहीं थी। यदि पीहू की मजबूरी थी तो उसे इतना लंबा इंतजार न करने की बजाय अपनी संभावित मृत्यु के बारे में सत्य को पहले ही बताना चाहिए था। लेकिन नहीं उसने मौन रह के बाबा के कहे अनुसार न केवल रिश्ते को स्वीकार किया बल्कि अपने आचरण से जाहिर भी किया।
सत्य की गलती यह थी कि जिस पल पीहू ने सशरीर उसे स्वीकार किया तो सत्य को दृढ़ता के साथ मना करना चाहिए था कि नहीं पहले तुम मुझसे सामाजिक रूप से विवाह करो, फिर ये सब बाद में होगा। लेकिन उसने भी अपनी मौन स्वीकृति दी, तो फिर पीहू उसकी पत्नी हुई न ? और बाद में केवल दस बारह दिन के बाद ही उसे छोड़ के केवल इसलिए भाग जाना कि अब पीहू सामाजिक रूप से विवाह के लिए तैयार नहीं, मुझे कहीं से उचित नहीं लग रहा था। पीहू ने तो उससे कहा नहीं होगा कि आओ पहले सेक्स कर लेते हैं फिर सबके सामने शादी करेंगे। बाबा ने कन्यादान कर दिया और तुमने स्वीकार किया, पति-पत्नी की तरह रहे, और एकदिन उसे छोड़ कर भाग गए, जबकि वह अकेली थी, बाबा भी गुजर चुके थे, और तुमने इतना कठोर निर्णय ले लिया !!
अरे भागना था तो उसी दिन भाग गए होते न जिस दिन बाबा ने कंयादान किया था, या फिर तब जब पीहू ने पहली बार शादी के लिए मना किया होगा।
और इस कहानी में यदि मैं अपने आप को कटघरे में खड़ा करूं तो कैसे और क्यों ? किसी तीसरे व्यक्ति के रूप में मैं खुद को निरूपित करू तो किस हद तक ? यदि पीहू से मेरे विचार, मेरी आदतें, मेरा दृष्टिकोण मैच कर गया, और हमें एक दूसरे से प्यार हो भी गया तो इससे किसी का क्या नुकसान हुआ ? क्या पीहू से मेरी मुलाकात न हुई होती तो वह सत्य से शादी करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाती ? यदि हां, तो मुझसे मिलने से पहले भी वे दोनों छह महीने तक क्या कर रहे थे ? क्यों सत्य ने मुझसे कहा कि मैं पीहू को विवाह के लिए प्रेरित करूं... क्या सत्य को पूर्वानुमान हो चुका था कि पीहू के प्रेम के किसी भी खांचे में वह फिट नहीं बैठता। मैंने तो ज्ञान से नहीं कहा था कि वह पीहू से मेरे बारे में बात करें। और न ही उसने की, तो फिर ? जो भी बात की तो मेरी गुजरी जिंदगी के बारे में। जबकि उसके इस पत्र के अनुसार तब, जब वह प्यार की पहली सीढ़ी चढ़ चुकी थी। अधिक से अधिक ज्ञान से मेरे फैमिली बैकग्राउंड, मेरी प्रेमिका और आत्महत्या करने के प्रयास के बारे में जानकारी मिली होगी। इससे अधिक वह क्या बता सकता था।
अब सवाल यह नहीं है कि प्रेम क्या है, और क्यों होता है ? सवाल तो यह है कि किससे होता है या होगा। और शायद जिसका जवाब मैं पहले ही पीहू को दे भी चुका हूँ। नहीं तो और क्या कारण रहा होगा कि पीहू ने अपनी पूरी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मैने उसे। मुझसे ज्ञान में अधिक, लुक-वाइज और सुंदरता में मुझसे कहीं अधिक, यदि हमारे बीच कुछ मैच करता था तो वह था जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण अर्थात नजरिया, एकदूसरे की विचारधारा, अभिरुचि। एक साथ दिन भर रहने के बाद भी यही लगता कि अभी वक्त ही क्या हुआ है। हमने एक दूसरे को प्रभावित नहीं बल्कि चकित किया। अरे ! तुम भी यही सोचती हो ! वाह !! वंडरफुल !!! इस प्रेम में स्थिरता थी, सहजता थी। दीवानगी सिर्फ इतनी थी कि हम एक दूसरे को दुःखी नहीं देख सकते थे। जब कभी मैं रोया तो उसने फौरन मुझे गले से लगा लिया, उसके रोने पर मैंने उसे गले लगा लिया, फिर हम दोनों ही एक दूसरे का दुःख महसूस कर रोए। कहना-सुनना बाद में होता रहा। बस यही तो हमने किया। नहीं तो कौन-सा हम दोनों ने चांद-सितारे तोड़कर एकदूसरे के हाथ में रख दिए ?
मैं कुछ देर तक इन्हीं विचारों में खोया रहा। एकाएक मुझे आभास हुआ जैसे किसी ने मुझे पुकारा हो। कौन हो सकता है, शायद सत्य हो ? मै उठकर बैठ गया। मैंने कंफर्म करना चाहा, धीरे से पुकारा, "सत्य ..", लेकिन कोई जवाब न मिला।
मैंने सोचा मेरा वहम होगा। मैं लेटने ही वाला था कि फिर किसी ने मुझे पुकारा इस बार की आवाज पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट थी।
अब तक खिड़की से आते प्रकाश का मैं आदी हो गया था। मुझे अब अटारी में सब कुछ लगभग स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मैंने सीढ़ी के पास खड़े होकर नीचे झांक कर देखा, घुप अंधेरे के सिवा वहां भी कोई नहीं था । मैंने फिर भी कंफर्म करना चाहा, मैंने फिर धीरे से पुकारा "सत्य !..."
लेकिन अचानक मेरे दिमाग में धमाका हुआ, आखिर मैं सत्य को पुकार ही क्यों रहा हूँ। जहां तक मुझे समझ में आ रहा था, दोनों बार की आवाज तो किसी लड़की की आवाज थी। अभी तक मेरा ध्यान क्यों न गया ? यही सब सोचते हुए मैं जैसे ही पलटा फिर से किसी ने मुझे पुकारा और इस बार की आवाज कुछ ऐसी थी जैसे किसी ने दूर से पुकारा हो। उस आवाज में अथाह करुणा थी।
अगले ही पल मैंने खुद को खिड़की के पास खड़े हुए पाया। बाहर गौशाला, उसके सामने सड़क, सड़क के उस पार शीशम का पेड़, और उस पेड़ के नीचे खड़ी एक चमकदार परछाई।
यदि कोई काल्पनिक कहानी लिख रहा होता तो निश्चित है यह सब मैं कभी नहीं लिखता। क्योंकि मैंने विज्ञान पढ़ा है, और जिसका प्रमाण नहीं, जो निराधार है, विज्ञान उसे नहीं मानता है। तो फिर मेरी कल्पना में भी उसका कोई स्थान नहीं होता। लेकिन यह कहानी तो मेरे जीवन का एक अंश है, और जिसे मैं घटते हुए देखा रहा था, महसूस कर रहा था और जिसका प्रमाण मेरे सामने, जीता-जागता खड़ा था। उसे कैसे अनदेखा कर देता ? उसे कैसे और क्यों न लिखता ?
न तो मैं शराब के नशे में हूँ, और न ही मैं इसका आदी हूँ। पांच साल पहले जब मैं यहां से गया था तब से लेकर आज तक मैने कभी-कभार ही पिया था, वो भी लिमिट में। मैंने उससे वादा किया था कि मैं देवदास नहीं बनूंगा, और मैंने ये वादा पूरी ईमानदारी से निभाया था। तो मैं यह भी मानने के लिए तैयार नहीं कि नशे में होने से या उसका आदी होने से मेरे दिमाग के न्यूरॉन्स ने एक इल्यूजन या भ्रम की स्थिति पैदा की है, बिल्कुल नहीं।
तभी मैंने देखा वह परछाई कुछ कदम चलाते हुए सड़क पर आई। अब पूरा का पूरा चंद्रमा का मद्धिम प्रकाश उस पर पड़ रहा था। उसके शरीर में वही टीशर्ट और जींस थी जो उस वक्त मेरी चारपाई पर रखी थी। उसकी नज़रें बिल्कुल खिड़की पर लगी हुई थी। चंद्रमा की उस शुभ्र ज्योत्स्ना में वह बेहद शांत और दिलकश लग रही थी।
पता नहीं क्यूं मेरे अंदर का डर चला गया और दुविधा एक पल में दूर हो गई। उसे सामने देखकर मन में प्रसन्नता हुई। अब मेरे अंदर रंच मात्र का भय नहीं रह गया। पल भर के लिए मैं भूल गया कि पीहू मर चुकी है। दोनों हाथ से खिड़की की छड़ पकड़े उसकी तरफ मैं एकटक देखता रहा। मेरा शरीर बिल्कुल हल्का हो गया। लगा, जैसे मैं जीवन और मृत्यु से परे हो चुका हूँ। मन के सभी शोक और संताप प्रकृति में ही कहीं विलीन हो गए।
उसे यूं सामने देख मेरी आँखें भर आई और होठों में फीकी मुस्कान दौड़ गई। हमारी नियति ने हमें एक बार फिर एकदूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन कितने विपरीत !! शारीरिक बंधनों में बंधा हुआ आज मैं उसकी अटारी पर था और वह सभी बंधनों से मुक्त बाहर खड़ी मेरे इंतजार में...
मेरा शक सही था। उसने इशारे से मुझे नीचे आने के लिए कहा। मैंने खिड़की से बहार हाथ निकाल उसे अपनी तरफ आने का इशारा करते हुए से कहा, "तुम ही आ जाओ ..."
उसने फिर इशारा किया, "नहीं ... तुम आओ .."
मैंने अपने दाहिने हाथ का पंजा उसको दिखाते हुए इशारे से कहा, "पांच मिनट रुको..."
मैने भूत-प्रेत के डरावने क़िस्से भी सुने थे और कुछ बड़े होने पर हॉरर मूवीज भी देखी। बचपन में बड़े-बुजुर्गों से सुन रखा था कि यदि कोई रात को पुकारे या कोई परछाई अपने पास बुलाए तो उसके पास नहीं जाना चाहिए। लेकिन वह केवल परछाई नहीं, और न ही उसकी पुकार डर पैदा करने वाली थी। अब जो भी हो, यदि वह बुला रही है तो मुझे जाना चाहिए, "तो ठीक है पीहू !! तुम करो थोड़ा सा इंतजार... मै आ रहा हूँ..."। बेखबर इस बात से कि अब हमारी दुनिया एक नहीं है। उसकी दुनिया के रूल्स एंड रेगुलेशंस क्या है, और इस दुनिया से कितने अलग होंगे ? होंगे तो फिर होंगे, अब किसे परवाह ?
मृत्यु से मुझे डर नहीं और पीहू से डरने की कोई वजह नहीं। यदि यह उसकी आत्मा है, तो भी नहीं।यदि केवल मेरे मन का भ्रम है, तो भी नहीं। और फिर जिसके न रहने पर मैं रोया, दर्द में तड़पा, उसे एक बार देखने और मिलने के लिए तरसा, उसके सामने आते ही मैं डर जाऊं ?
पलट कर जैसे ही मैं चारपाई तक पहुंचा लाइट आ गई। मेरे हाथ में अभी भी वह नोटबुक थी। मैं आराम से बैठ पत्र को आगे पढ़ने लगा...
कभी-कभी मैं सोचती थी कि तुम क्या थे, राइटर, एक्टर या फिर डायरेक्ट ? तुमने एक्टिंग की तो बिल्कुल नॉर्मल इंसान की तरह, जब लिखा तो गहरी बातें, और डायरेक्ट किया तो पीहू को पीहू से ही मिला दिया। अरे पागल यह भी न सोचा यदि पीहू, पीहू से मिल गई तो सिर्फ तुम्हारी होकर रह जाएगी ?
जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे तुमने, मैंने भी देखें, लेकिन उन सब का हासिल क्या था ? हमारा तुम्हारा मिलना ? सत्य का मेरे जीवन में आना मेरे अपनों की मुक्ति थी, और तुमसे मिलना, मेरा खुद से मुक्त हो जाना !! अब मैं खुद की कहां रही !!!
क्या जानती थी कि मैं खुद अपने आप को ऐसे बंधन में बांध लूंगी जिससे दूर जाना मेरे बस में नहीं होगा। फिर एक दिन तुम आए, सोने के पिंजरे में कैद बुलबुल की बगिया में आ कर चुपचाप बैठ गए। तब भी मैं तुम्हें नहीं पहचान पाई !!
मैं तुम्हें जब भी सोचती हूं तो कोई अध्यात्म कोई दर्शन कोई फिलासफी मेरे काम क्यूं नहीं आती ? तुम बड़ी-बड़ी बातें करते थे। यदि उन सभी बातों का अर्थ निकालती हूँ तो सिर्फ तुम्हारा चेहरा ही क्यों सामने आता है ?
बिछोह के अंतिम पलों में कभी मेरी अटारी की सीढियों को उतरते समय तुमने मुझसे कहा थ, "तुम जब भी मुझे पुकारोगी... मैं तुम्हारी पास आ जाऊंगा..."
पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो।... जानती हूँ, उस पल तुमने कोई एक्टिंग नहीं की थी। तो फिर आओ, मैं तुम्हें हृदय से, मन से, और अंतर्मन से पुकार रही हूँ। असंख्य सितारों की तरह मेरी आंखों से झिलमिलाते, चमकते आ जाओ। मुझे गले से लगा लो, मेरे आंसुओं को पोंछ लो, मेरे साथ जी भर के रो लो। तुम्हारी ही बात तुम्हे याद दिलाती हूँ, सैम्पेथी नहीं कॉन्डनेस चाहिए जो मेरे अंतर्मन के दर्द से मुझे मुक्ति दिला दे... तो देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ उतनी बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ न अजनबी, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ अपनी पीहू को..."
तुम्हारे इंतजार में,
तुम्हारी पीहू।
Comments
Post a Comment