मैं तुम्हारी पीहू

मेरे वजूद के पिंजड़े में आज भी, 
फड़फड़ाते हैं तेरी यादों के परिंदे,
जज़्बात-ए-शीशाघर में जैसे,
उछाल फेंका हो पत्थर किसी ने।

प्रिय अजनबी,
नमस्ते, 
      यही तो कहा था न उस दिन, जब बगिया में तुमसे पहली बार मिली थी। क्यों नहीं पसंद आया ? तो और क्या लिखूं, तुम ही बताओ ? एक अजनबी की तरह ही तो तुम मेरी बगिया में आकर बैठ गए थे। तब क्या जानती थी कि एकदिन न जाने कितनी अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोए तुम्हे पत्र लिखूंगी। आज हृदय से स्वागत, जो तुम लौट के यहां फिर से आए। काश ! जीवित होती तो तुम्हारी राहों में फूल बिखेरती, तुम्हारे स्वागत में स्वागत गीत गाती, जल्दी लौट कर न आने के उलाहने देती, तुमसे रूठती भी और तुम मुझे मनाते। काश ! ऐसा होता।

   तो चलो पत्र की शुरुआत कुछ रोमांटिक अंदाज में करते हैं... एक ऐसे गीत के साथ जिसकी एक कड़ी मैं आज भी गनगुनाती हूँ:-

जिसमें जवान हो कर, बदनाम हम हुए,
उस शहर उस गली, उस घर को सलाम।
जिस ने हमें मिलाया, जिस ने जुदा किया,
उस वक़्त, उस घड़ी, उस पहर को सलाम।
ए प्यार तेरी, पहली नज़र को सलाम।

   तो लो, अब हो गई न एक रोमांटिक कहानी की शुरुआत ? ठीक उसी दिन की तरह जब पहली बार मैं तुमसे अपनी बगिया में मिली थी और तुमने मुझे पीछे से पुकारा था, "पीहू..."

      उस आवाज की कशिश मैं आज तक नहीं भूल पाई। उस दिन महसूस किया जैसे मैं वर्षों से इसी एक पुकार का इंतजार कर रही थी। तुम्हारी वह पुकार आज भी मेरी अंतरात्मा में समाई हुई है। जिसकी प्रतिध्वनि को मैं न जाने कितनी बार महसूस करती आई हूँ। लगता है जैसे कहीं से तुम चुपके से आ जाओगे और उसी तरह पुकारोगे, "पीहू...!!" लेकिन तुम तो ठहरे निर्मोही, कैसे आओगे ? ठीक कहती थी वह लड़की, "तुम बहुत निर्मोही हो..."

    या फिर आज की सुबह के साथ जब सूरज की पहली किरणों ने मोगरे और कनेर के ताजा फूलों को चूम कर इस दिन की शुरुआत की। कभी मुरझाने की कगार में खड़े दो पौधों को तुम्हारे सेवा-भाव के स्पर्श ने इन्हें जीवन दान दिया, देखो तो अब यह कितने बड़े हो गए हैं। सुर्ख लाल, पीले और सफेद रंग के न जाने कितने फूल इनमें रोज खिलते है। कनेर की हल्की-हल्की भीनी खुशबू और मोगरे की तीखी महक हर रात खिड़की से होते हुए अटारी तक पहुंचती है। कोई दूर से देखे तो उसे महसूस हो जैसे सुर्ख लाल रंग के जोड़े में एक दुल्हन अपने झक सफेद रंग की शेरवानी पहने दूल्हे को आलिंगनबद्ध किए खड़ी हैं। या फिर तुम्हारी कहानी के दो सितारे इस ज़मीं पर उतर आए हैं। एक कतार में लगे गेंदे, गुलाब, चमेली, गुड़हल और बनफूल के पौधों में भी ढेर सारे फूल खिलते हैं। और आज एक कोने में लगे सूरजमुखी के पेड़ में पहली बार एक फूल खिला है। बिल्कुल छोटा-सा ये फूल अपने प्रिय की तरफ देखते हुए लज्जा से मुस्कुरा रहा है। इसे मैने पिछले महीने ही लगाया था।

    कभी-कभी हम अपनी जिंदगी से खुद ही खिलवाड़ करते हैं, मजाक करते हैं, लेकिन वही जिंदगी जब हमसे मजाक कर ले, हम से ही खेल जाए, तो फिर ? तुमने सच कहा था... कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, सजाएं मिलती हैं ? 

    कभी तुमने कहा था कि मैं हर शाम अपने बालों को संवार, तैयार हो के खुद को आईने में देखा करूं। उस दिन तुम्हारे कहे के अर्थ को मैं समझ गई थी। तुम कहना चहते थे कि जिंदगी की भाग-दौड़ से थम कर कुछ पल इंसान को खुद के लिए जीना चहिए, खुद से बातें करनी चाहिए, खुद के लिए सोचना चाहिए। जो तुमने कहा उसे हर शाम पूरा किया। लेकिन पिछले दो महीने से मेरी जिंदगी थम-सी गई थी, इतनी कि कुछ होश ही न था कि क्या हो रहा है और क्या होगा।     
 
     लेकिन आज सत्य के छोड़ कर जाने के दुख का परित्याग कर, तुम्हारे कहे अनुसार खुद को संवारा। अपनी पसंद की साड़ी पहनी। फेस क्रीम, हल्की गुलाबी कलर की लिपस्टिक, माथे में बिंदिया, कुछ ज्वेलरी और भी छोटे-मोटे मेकअप किए। कुछ देर तक अपने आप को आईने में देखा और महसूस किया जैसे मेरी नजरों से तुम भी मुझे देख रहे हो। तुम्हें तो मैंने हमेशा ही याद किया, यदि आज लिखने बैठूं तो कागज कम पड़ जाएं, और लफ़्ज़ न जाने अपने कितने मायने खुद-ब-खुद खोज लेंगे। 

     जब इंसान जिंदगी में सब कुछ खो देता है केवल तभी उसमें स्वयं को प्राप्त करने की लालसा का जन्म होता है, और आज तुम्हें ये पत्र लिखने का अर्थ खुद को प्राप्त कर लेना है। कभी तुमने कहा था कि मैं लिखने की शुरुआत करूं, तो एक कविता लिखनी चाही, अधूरी रह गई। कलम की स्याही से अधिक आंसू टपकते, शब्द धुल जाते थे, तो क्या करती ? 

    फिर अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने की सोची, मन नहीं किया। वैसे भी क्या लिखती, जो अजनबी में तुम न लिखोगे ? अंत में तुम्हें पत्र लिखने का विचार आया, जिसमें बहुत कुछ ऐसा लिखने को था, जो मेरे मन में रह गया, या फिर उन लम्हों को फिर से तुम्हारे साथ जीना चाहती थी जो गुजर गए। चार दिन की वह मेरी जिंदगी थी जो मैंने तुम्हारे साथ गुजरी नहीं बल्कि जी थी। बहुत सी बातें थी जो तुमसे कहना चाहती थी, पूछना चाहती थी, लेकिन कुछ अधूरी रह गई। कुछ वादे थे जो मैने तुमसे किए थे। तुम्हारी कुछ अधूरी ख्वाहिशें थीं, जिन्हें आज पूरा कर रही हूँ।

     एक दिन हमारे जीवन से सत्य-असत्य, पाप-पुण, मोह-माया, यथार्थ-कल्पना इत्यादि के भेद खत्म होने लगते हैं। जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान इन सभी की परिभाषाएं संकुचित होने लगती हैं। फिर इनका कोई मोल नहीं रह जाता है। मन का सूनापन, बेचैनिया, उदासी ये सभी जीवन में इतने प्रभावशाली और करीब होने लगते हैं कि अंत में यही हमारे लिए अंतिम सत्य बन जाते हैं। हमें अपने अवसाद से प्रेम होने लगता है। हम ऐसे गहन अंधकार में डूब जाते हैं, जिसमें फिर कोई रौशनी हो भी जाए तो आंखों को चुभने लगती है। आज मैं ऐसे ही दौर से गुजर रही हूँ। तुम्हारी स्मृतियां किसी उजाले से कम नहीं। यह जितनी ही प्रभावशाली ढंग से मेरे मन में उजागर होती हैं, उतनी ही कस के मैं अपनी आँखें बंद कर लेती हूँ। 

    तुम सोचोगे कि आज ही क्यों तुम्हे पत्र लिखने की सोची जबकि तुम्हे यहां से गए तीन वर्ष होने को आए हैं ? तो फिर जान लो तुम इस जगह से गए हो, मेरे मन, मेरे हृदय, मेरे अंतर्मन,  मेरी अंतरात्मा, मेरी सोच से नहीं। मैंने तो तुम्हें हर दिन मन ही मन लिखा है। आज तो मैं उन्हें कागज में इकट्ठा कर रही हूँ। इसलिए अपने हृदय में यह भ्रम मत पाल लेना की सत्य के छोड़ जाने के शोक में डूब कर या फिर किसी अवसाद में आकर मैं तुम्हें यह पत्र लिख रही हूं। तो लो फिर शुरू करती हूँ...

    मैं पहले उस दिन को लिखती हूँ जिस दिन तुम मेरे पास से गए। मैं तुम्हें देखती रही, तुम कहते रहे, मैं सुनती रही और तुम मेरी आखों से ओझल हो गए। एक आस थी कि तुम लौट कर फिर आओगे, लेकिन तुम नहीं आए। मैं कुछ देर तक वही सीढ़ी के पास बैठी रोती रही। फिर निढाल-सी बिस्तर पर आकर लेट गई। हृदय के स्पंदन इतने कम महसूस हुए लगा जैसे इसी क्षण मैं मर जाऊंगी। सच कहूं यदि ऐसा हो गया होता तो अच्छा होता। कम से कम तुम रुक तो जाते। कहते हैं इंसान के मरने के बाद भी कुछ समय तक उसका मस्तिष्क जीवित रहता है, तो मैं उन लम्हों में एक बार तुम्हे फिर से जी भर के देख और महसूस तो कर लेती। हमारे बीच कुछ ऐसा अनकहा अभी भी रह गया है कि जिसे कहने के लिए महसूस करने के लिए हमें फिर मिलना होगा।

    उस समय इतना भी साहस न हुआ कि मैं तुम्हें जाते हुए कम से कम खिड़की से एकबार देख तो लूं। सच कहूं तो चाह कर भी उसे शाम मैं ठीक से रो न पाई, ना रोने का वादा जो लिया था तुमने कैसे उसे झूठा होते हुए देखती ? हृदय में उठती पीड़ा जब असहनीय हो गई, तो आंखें पत्थरा-सी गईं। कब बेहोश हो गई पता ही नहीं चला।

     जब उठी तो शाम को छः बज रहे थे। तुम्हारा अधूरा जाम अभी भी खिड़की में उसी तरह रखा था। उसे खिड़की से उठा रैक में रख फिर लेट गई। कुछ देर बाद ही सत्य आया और मेरे पास बैठ गया। उस शाम उसने बहुत कोशिश की कि मैं उठ जाऊं, लेकिन नहीं उठी। उसने ही बाबा के पूजा की तैयारी की। रसोई घर जा नहीं सकता था, तब मैं उठी, बाबा और सत्य को खाना खिलाया, खुद खाने का मन नहीं किया। मैं वापस इसी अटारी पर आकर लेट गई। कुछ देर बाद वह आया और बार-बार मुझसे बेडरूम में लेटने के लिए कहता रहा, लेकिन मै नहीं गई। थक-हारकर वह कुछ देर तक बैठा रहा फिर मुझे अकेला छोड़कर वह सोने चला गया। मैं बहुत देर तक जागती रही, फिर उठी और उस अधूरे जाम को पी के सो गई। 

    जब दूसरे दिन उठी तो मेरी दुनिया बदल चुकी थी, अब उस दुनिया में तुम नहीं थे। जितने भी थे मेरे मन में थे। फिर मैंने किसी से तुम्हारे बारे में कोई बात नहीं की। यदि कभी बाबा पूछते या सत्य पूछता तो मैं चुप ही रहती। मैंने तुम्हें अंतरात्मा में बसा लिया, अब तुम दुनिया के लिए कहां थे। लगभग चार-पांच दिन तक यही रूटीन चलता रहा। मैं घर के काम-काज करती, सबका ख्याल रखती, खाना बनाती, सबको खिलाती, सब उसी तरह चलता रहा, और साथ में एक प्रश्न मेरे अंतर्मन में कि तुम कैसे होंगे, कहां होंगे। क्या कभी याद करते भी होगे कि नहीं। 

    तुम्हारे पास तो तुम्हे याद करने के लिए तुम्हारी माइलस्टोन की नायिका थी। लेकिन मेरे पास तो केवल तुम थे न !! तो फिर क्यों चले गए मुझे छोड़कर ? अब तुमसे क्यों पूछती हूँ, तो चलो उसी से पूछती हूँ, जिसने तुम्हे कभी निर्मोही कहा था। तुम्हे कम से कम इतना तो समझाए कि तुम मुझे छोड़ कर न जाओ ।

     उससे कहती, मेरे पास जिंदगी है ही कितनी ? मेरे होने पर भी जब वह तुम्हारा है, जब न रही तो तुम्हारा ही होगा न ? मैं चाहूं तो लाख कमी गिना सकती हूँ उसकी, लेकिन जरा एक खूबी तो बताओ उसकी ?  फिर समझ लो उसी एक खूबी से मैने भी मोहब्बत की। मैंने उसकी आंखों में तुम्हें देखा, फिर भी उससे मोहब्बत की... उसे चाहा... प्यार किया, क्या तुम ऐसा कर पाती ? जब भी मैं उसकी बात करूंगी तो तुम खुद-ब-खुद आ ही जाओगी ? उसने तम्हारे साथ जिंदगी जीनी चाही और मैने उसके साथ, तो फिर क्या गलत हुआ ? क्या इतने से ही तुम मुझसे रूठ जाओगी, मुझसे नफरत करोगी या अपनी कंपीटीटर समझोगी ? मेरे लिए उसे प्यार करना खुद से प्यार करने के बराबर था, तो फिर कैसे न करती ? क्या इंसान का खुद से प्यार करना कोई गुनाह है ?

   अब तुमसे कहती हूँ, याद है ? मैंने चलती हुई राहों में तुमसे कहा था कि तुम कहना जानते हो और कह देते हो, मन को लुभाना जानते हो और लुभा लेते हो, किसी के दिल में उतरना जानते हो और उतर जाते हो... सभी कलाएं आती हैं तुम्हें... कभी उनके दिल की बात कहो जो कभी कह न पाए ? और बदले में तुमने मुझे एक छोटा सा शेर सुनाया था, जैसे चांद में कोई सूरज नजर आता हो...! असंभव सी बात ? याद है न ?

     चलो मैंने तो स्वीकार कर लिया था, पर अक्सर सोचती हूँ, कि यदि न किया होता तो ? अपने प्यार अपनी चाहतों को दिल में ही रखा होता, और सचमुच सामाज और दुनिया के बनाए रीति-रिवाजों में मैं सत्य की पत्नी होती, और फिर कहीं तुमसे मोहब्बत हो गई होती तो फिर क्या होता ? कैसे अपने दिल की बात तुम से कह पाती ? तब क्या होता ?

   उस वक्त शायद मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर पाती। लेकिन जरा सोचो, जिंदगी के किसी मोड़ पर इसका बोध होने पर मैं क्या करती ? तब तो पूरी किताब ही लिखनी पड़ती न ? कहते हैं मृत्यु के कुछ दिन पूर्व या कुछ पल पहले हम मन ही मन अपने पूरे जीवन का आकलन करते हैं, सच स्वीकार करते हैं...

   तो फिर जाओ, जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर, वर्षों बाद ही सही, मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी। तुम्हें स्वीकार या अस्वीकार से परे रख, हो सकता है तुम्हें प्यार भी कर लूं, लेकिन तुमसे कहूंगी नहीं। किंतु हां, तुम्हारे बारे में सोचूंगी, मन में अलग-अलग धारणाएं बनाऊंगी कि तुम क्या हो और क्या नहीं हो ? 

   हो सकता है प्रेम, कामना, आशक्ति से परे हट तुम्हें एक नए मुकाम में रख लूं। यदि उन लम्हों को तुम लिख सके तो समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो। हां दोस्त ! मेरे प्रियवर !! इसी वादे के साथ मैं तुम्हें एक बार फिर मिलूंगी।

  लेकिन आज जब साम्य के बिन्दु तक हम दोनों पहुंच ही गए तो अब खुद की ही बाते करूंगी तुमसे। आखिर तुम गए भी तो मुझे अपना कर्जदार बना कर, कैसे ? लिखूंगी, लेकिन अभी नहीं। उससे पहले कहने को और तुमसे पूछने को बहुत कुछ है। 

    वर्षों पहले मम्मी-पापा, भाई सभी चले गए। पिछले साल बाबा भी चले गए। ध्रुव भैया भी बहुत दूर ही हैं। केवल सत्य था मेरे पास, उसे भी गए हुए दो माह होने को आया, शायद वह भी लौटकर न आए। एक-एक करके सभी मेरे जीवन में आए और आकर चले भी गए। रह गई मैं, इतना बड़ा घर, जिसमें सांसों का बोझ उठाए मैं भटक रही हूँ। ये अटारी, ये खिड़की, सामने गौशाला, निकलती कच्ची सड़क, उसके पार शीशम का पेड़, जहां सत्य को पहली बार खड़े देखा था और तुम्हे जाते हुए आखिरी बार देखने की हिम्मत न जुटा पाई !! इसी बिस्तर पर पड़ी सुबकती रही, सिसकती रही, रोती रही !!!

   और देखो तो हम बिछड़े भी ठीक उसी तरह जैसे की मैंने स्वप्न में देखा था। पहले मैं भी इन सब चीजों को नहीं मानती थी, लेकिन हमारा मिलना और मिलकर यूं बिछड़ना शायद हमारी किस्मत थी। आज जब मैं तुम्हे पत्र लिख रही हूँ, तो उस दिन का एक अधूरा स्वप्न कल रात पूरा हुआ। तुम्हें जाते हुए देखने का स्वप्न। मैंने देखा, मेरे जिस्म में वही गहरे बादामी कलर का सूट है। मेरे बाल खुले हुए हैं। अटारी का बल्ब जल रहा है... पूरी अटारी में उजाला ही उजाला फैला है। एक हाथ से मैंने खिड़की की छड़ पकड़ रखी हैं, दूसरे हाथ में तुम्हारा अधूरा जाम है... तुम बाइक पर टिक कर खड़े हो... मुझे अपलक देखते हुए। मैंने अपना हाथ हिला कर तुम्हें अलविदा कहा और दूसरी तरफ से तुमने मुझे...

    उसके स्वप्न को पढ़ कर मेरे दिमाग में आंधियां चलने लगी। ठीक यही सब कुछ तो मैंने उस शाम देखा था। तो वह मेरा कोई भ्रम नहीं था ? लगभग तीन वर्ष बाद पीहू की प्रबल इच्छाशक्ति से उत्पन्न होने वाले स्वप्न को साकार होते हुए मैंने उसी दिन देख लिया था ? मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...

    तब क्या पता था, एक दिन इन्हीं आंखों में असंख्य आंसुओं को समेटे, तुम्हे याद करते हुए न जाने कितनी रातें गुजारनी पड़ेगी। इसी घर में तुम्हे ले कर मैं सत्य से लड़ी थी कि खबरदार जो वह तुम्हे यहां रहने के लिए तुमसे कहे। किसी भी कंडीशन में मैं अपनी अटारी तुम्हें रहने के लिए न दूंगी, और आज ? देखो तो उसी अटारी में मैं तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रही हूँ, और शायद अपने जीवन का अंतिम पत्र तुम्हें लिख रही हूँ।... लेकिन कहे देती हूँ, इसे पढ़ने के लिए तुम्हें स्वयं यहां आना पड़ेगा, मै इसे तुम्हारे पते पर पोस्ट करने से रही। देखो तुमने जैसा चाहा मैंने वैसा किया। तुमने जो कहा वह किया, तो फिर अब आ जाओ न ?

   ठीक है मानती हूँ, कोई रिश्ता नहीं, लेकिन हमारे बीच ब्वॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड वाला रिश्ता तो हमेशा से ही रहा न ? चलो इसे भी मत मानों, तो केवल दोस्त ही मान कर उसका हाल-चाल जानने के लिए आ जाओ... तुम वादा कर के गए थे न, कि तुम मेरी शादी के बाद एकबार ही सही, लेकिन आओगे ? तो अब आ जाओ... तुम झूठे साबित नहीं होगे। सत्य ने भी तुमसे कहा था कि तुम मुझे उसकी वाइफ बन जाने के लिए कन्वेंस कर लोगे तो वह ताउम्र तुम्हे मेरा बॉयफ्रेंड मानने के लिए तैयार हो जाएगा, तो अब उसे भी कोई एतराज नहीं होगा।

     कभी मैंने सोचा था कि जो अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद आत्महत्या तक करने की कोशिश तक कर सकता है तो फिर वही लड़का मुझसे प्यार कैसे कर सकता है ? सच कहूं तो प»हले मुझे भी यही लगता था, इस जिंदगी में प्यार एक ही बार होता होगा। जब भी तुम्हारी बातों में उसका जिक्र होता, तुम्हारे आंसुओं में उसे मुस्कुराते हुए देखती, जिसका नाम तक तुम नहीं लेते थे, तब मेरे दिल में अजीब-सी बेचैनी होती। यूं कह लो कुछ हद तक जेल्सी की भावना भी जगाती। क्यों ?

    यह तो मैं पहले से ही तय कर चुकी थी कि तुम्हारे मन से यह बात निकाल के रहूंगी कि जीवन में प्यार एक ही बार होता है। लेकिन यही सवाल तो एकदिन तुमने खुद मुझसे पूछ लिया, तब मैं क्या करती ? कुछ हद तक मैं तुम्हारे सामने एक्टिंग करने की कोशिश करना चाहती थी कि तुम्हें मुझसे धीरे-धीरे लगाव हो जाए, मेरे प्रति आकर्षण पैदा हो जाए और मैं जीत जाऊं। लेकिन जैसे ही तुम्हारे सामने जाती, तुमसे बातें करती, तो मुझे एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।  ऐसा क्यों होता था ? 

    उस दिन जब ज्ञान भैया ने मुझे बताया कि उसके बगैर तो तुम जीना ही नहीं चाहते थे, तो आश्चर्य हुआ। शायद जिस आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा मैंने दी, उसकी शुरुआत मेरे ही जीवन से होनी थी !! कहते हैं, नियति एक बार ऐसे व्यक्ति को हमारे सामने ला खड़ा करती है, जिसके साथ होने पर हमें ऐसे आध्यात्मिक प्रेम की अनुभूति होती है, और इस तरह से यह व्यक्तिपरक न होते हुए भी किसी एक व्यक्ति के पास होने पर ही महसूस होता है, क्यों ?

    आकर्षण, मोह और आसक्ति ये सभी भाव जब अपने सर्वोत्तम और शुद्धतम स्वरूप में होते हैं तभी आध्यात्मिक प्रेम का जन्म होता है। अब मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि हम दोनों के जीवन में यह अपने सर्वोत्तम स्वरूप में था और सदैव रहेगा। तुम जहां भी होगे, जिसके साथ भी होगे, आज तुम भी महसूस करते होगे।

     कभी सत्य के साथ एक ही बेडरूम में मैं बेखबर सोती थी और वह जगता था। तुम्हारे जाने के बाद उल्टा हो गया था। वह थका-हारा बेखबर-सा सोता और मैं जागती रहती, यह सोचते हुए कि तुम कहां होगे, कैसे होंगे, क्या कर रहे होगे, मुझे कभी याद भी करते होंगे कि नहीं ? जब मैं अपने इस जीवन के अस्तित्व में तुम्हारे होने या न होने की तलाश करती तब तुम्हारी कविता की ये पंक्तियां याद आती...

तू सोती होगी तो कैसी लगती होगी, 
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
अपनी राते भूल गया हूँ,
जब से तुझको प्रिय-बाहों में,
रातों को जगते देखा है।

    क्या सचमुच तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ? इसी अटारी में तुमने मेरी सांसों को उखड़ते हुए देखा था और मुझे डांटा भी था कि मैं इतना काम न किया करूं। तो आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं तुम्हें एक सच बताती हूँ। सांसों के टूटने की शुरुआत कॉलेज लाइफ में बैडमिंटन खेलते हुए मेरे बेहोश हो जाने पर ही हो चुकी थी।

     स्कूल के समय से ही हम भाई-बहनों की रुचि किताबों के साथ-साथ स्पोर्ट और क्लचरल प्रोग्राम में भी थी। रेसिंग, बैडमिंटन, हाई जंप इन सब में दोनों ही पार्टिसिपेट किया करती थे। एक दिन कॉलेज में बैडमिंटन खेलते हुए अचानक बेहोश के गिर पड़ी। सांस लेने में तकलीफ होने लगी... पहले तो सभी ने समझा की थकान की वजह से होगा, लेकिन मैंने इससे पहले भी महसूस किया था कि जब भी मैं ज्यादा मेहनत के काम करती हूँ... तो जल्दी थक जाती हूँ, और सांस लेने में भी दिक्कत होती है। एक दिन जब पापा को बताया तो उन्होंने मुझे एक अच्छे डॉक्टर को दिखाया...

   डॉक्टर ने पूरा चेकअप करने के बाद पापा को बताया कि जन्म से ही मेरे दिल में एक छोटा सा छेद था, जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जाएगी उसका आकार भी बढ़ता जाएगा। लगभग पच्चीस-तीस साल की उम्र में वह इतना बड़ा हो जाएगा कि दिल की धड़कने कम होती जाएंगी और मेरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होनी शुरू हो जाएगी। सांसे लेना मुश्किल होता जाएगा। आधुनिक दौर में दिल में छेद होना और उसका सफल आपरेशन होना सामान्य-सी बात है, लेकिन उसी डाक्टर ने पापा को बताया कि हार्ट के जिस पार्ट में छेद है, सर्जरी करना कठिन और बेहद रिस्की भी है। सफल होने के मात्र आठ-दस प्रतिशत ही चांसेस हैं, लेकिन वह अपने से बड़े डॉक्टर से कंसल्ट करेंगे कि क्या किया जा सकता है..."

     एक इत्तेफाक ही था कि उन दोनों के बीच के इस डिस्कशन को मैंने सुन लिया लेकिन जाहिर नहीं होने दिया था। उसके तीसरे दिन मेरा जन्मदिन था। चौथे दिन हम सभी दादी की डेथ में गांव आ गये , बीसवें दिन वह हादसा हुआ। पूरा का पूरा परिवार काल के गर्भ में समा गया। इस सच को अब मेरे सिवा कोई नहीं जानता। मैने सत्य, ध्रुव भईया को और न ही बाबा को कभी बताया।

     यदि मैंने सत्य को शुरू से ही किसी भी रिश्ते से दूर रखना चाहा, तो यही एकमात्र कारण नहीं था। जब कभी उसे अपने और विवाह के प्रति बहुत अधीर देखती तो सोचती कि उसे सब कुछ सच-सच बता दूं। फिर अगले ही पल एक अजीब-सा डर लगने लगता। सच जानने के बाद सत्य का रिएक्शन कैसा होगा ? या तो वह बेहद समझदार व्यक्ति की तरह मेरी जिंदगी से धीरे-धीरे या फिर एकदम से चला जाएगा, यह होता तो ठीक था लेकिन न गया तो फिर ? बिल्कुल नसमझो की तरह हर पल मेरे पास रहने की कोशिश की तो ? इस बात से बेखबर कि मुझे खुश रखने के एक्स्ट्रा एफर्ट से मुझे दर्द ही मिलेगा। तब मैं उसकी आंखों में प्रतिपल खुद को मरते हुए न देखती ? फिर उसके साथ मैं एक सामान्य जीवन कैसे जी पाती ?

   अब तुम्हें शिकायत हो सकती है कि ये सब मैंने तुम्हें क्यों नहीं बताया ? तुम भी तो मेरे जीवन में चार दिन के मेहमान बन के आए थे, सोचा क्यों तुम्हे परेशान करूं... लेकिन आज मानती हूँ, मैं गलत थी... तुमसे और ध्रुव भैया से बताना चाहिए था... या तो मैं मर चुकी होती या फिर तुम्हारे साथ जिंदगी जी रही होती... मेरी किस्मत में प्रतिपल यूं मरना तो न लिखा होता !!

    यहां से जाते समय तुम जिस मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे थे, उसी द्वंद्व से मैं भी गुजर रही थी। सत्य बेखबर सो रहा था और मैं सोफे में बैठी कुछ देर तक सोचती रही। तुम जा रहे थे, यह पीड़ा मेरे लिए असहनीय हो रही थी। मैं सोच रही थी कि तुम्हें कैसे रोकूं लूं, या फिर ऐसा कौन सा उपाय करूं कि तुम यहां जल्द ही लौट कर आओ। सच मानो मैंने तय कर लिया था कि तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम्हें एक निश्चित तारीख दूंगी कि उस तारीख तक मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी। तुमसे कहूंगी, मुझे हमारी जिंदगी के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला लेना है, तुम आओगे न ? तो मैं जानती हूँ कि तुम आते। तब तक मैं यहां बाबा, ध्रुव भईया और सत्य से बात कर लेती। यही सब सोच कर मैं कमरे से बाहर निकली थी कि बाबा बैठक में मिल गए और उन्होंने तुम्हें बुलाने के लिए मुझसे कहा। 

      तुम उनके पास गए और बाबा ने तुमसे वह मांग लिया जो उस दिन तुमसे वादा लिया था। याद करो जब तुम पार्टी की इजाजत लेने के लिए उनके पास गए थे ? मैंने समझ लिया कि बाबा क्या चाहते हैं। जब तुम मेरी जिंदगी से चले ही जा रहे थे तो फिर मैंने जीने की प्रति सभी लालसा का मन से परित्याग कर दिया। सोचा बाबा का फैसला जब हो ही चुका तो इस दुनिया से जाते-जाते उन्हें कोई और कष्ट क्यूं दूं। मेरे दोस्त तो मैं क्या करती ? उसी क्षण जब खुद को मार लेने का फैसला कर लिया, तो अब तुम्हें कैसे और किसके लिए रोकती ? इन सबके बावजूद मेरे मन की यही अभिलाषा थी कि तुम जाते-जाते ही सही कम से कम एक बार मुझसे पूछो तो सही, "पीहू !... क्या तुम्हें मुझसे प्यार है...?

     तुम्हारे कहे अनुसार घर के काम भी ज्यादा नहीं करती थी। बाहर के काम मंगल चाचा और कमली से करवा लेती, और घर के अंदर के सत्य से। वह हंसी-खुशी करता भी था। जब बाबा पूजा में होते तो वह साथ में रसोई में भी हेल्प करता था।

   एकदिन जब वह अपने घर से वापस लौट कर आया तो मैंने उसे काफी चिंतित देखा। पूछने पर उसने बताया कि उसकी शादी की बात चल रही है। मां और पिताजी का कहना है या तो तुम पीहू से शादी करो, हमें कोई एतराज नहीं, या फिर इनमें से कोई रिश्ता सिलेक्ट करो। हम कब तक लोगों को मना करते रहे, आखिर हमें भी तो समाज में रहना है। अब मैं उसे कैसे समझाती..?

      उस दिन शाम का ही वक्त था। मंगल गाय बछड़ों को बांध रहा था। इसी अटारी में इसी बात पर हमारी बहस हो गई। मैने कहा, "मन तो लिया तुम्हें अपना पति। क्या जरूरी है कि बारात सजे ? बाबा ने तुम्हे अपना लिया था, मैने भी अपना लिया, तो बता दो अपने घर वालों को कि हमारी शादी हो चुकी है.. इसमें दिक्कत क्या है ?"

    मेरी बात सुनकर उसने कुछ गुस्से से कहा,  "ऐसा नहीं होता... न समाज के सामने हमारी शादी हुई है न कोर्ट में रजिस्टर्ड हैं.. इस इलीगल शादी को कौन मानेगा ?"

     और मैंने भी गुस्से से उससे कह दिया, "फिर तुम्हे जो करना हो करो। शादी भी करनी हो तो कर लो।  लेकिन मैं नहीं करूंगी, और न ही किसी समाज के सामने स्वीकार करूंगी। यदि तुम्हें इस शर्त के साथ मेरे साथ रहना है तो रह सकते हो..."

    उसने भी गुस्से से सीढ़ियां उतरते हुए कहा, "...तो ठीक है, मैं जा रहा हूँ, अब लौटकर नहीं आऊगा। शादी करने का इरादा हो तो मंगल से घर में फोन करवा देना, मैं आ जाऊंगा..."

     फिर कुछ देर बाद ही उसे जाते हुए इसी खिड़की से देखा। मंगल ने रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह चला गया। जितनी सहजता से मैने तुम्हे जाने दिया, उतनी ही सहजता से उसे भी। 

    उसके बाद मैं उस सत्य को हमेशा तलाशती रही जब मैंने पापा के द्वारा अपने बर्थडे में दिए गए सूट को पहना था और उसने मुझसे कहा था, "तुमने इसे पहना तो सूट ने अपनी सुन्दरता पा ली... तुम्हारे पापा ने सच कहा था... आई विश ! यदि हमारी बेटी हो तो तुम जैसी ही हो, वह तुम पर जाए..."

     क्या पता मेरी कोख में जो नन्हा सा जीव पल रहा है, वह हमारी बेटी हो !! उसे भी छोड़ कर चला गया वो !!

   तो अब बताओ मैं किसे पुकारू ? तुम्हारे सिवा मेरी जिंदगी में कौन रह गया ? तुम न हो कर भी मेरे पास सदैव रहे। तुम तो मेरे जीवन के वह कृष्ण हो जिसे राधा हमेशा अपने अंतर्मन से पुकारती रही। तुम तो उस द्रोपदी के भी कृष्ण हो जिसने अपने मित्रता के धर्म का निर्वहन करने के लिए, अपनी मुरली को त्याग कर सुदर्शन चक्र धारण किया। तुम तो वो सारथी भी हो जिसने अपने मित्र के अपमान का बदला लेने के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में उसके पति के रथ की लगाम अपने हाथों में थाम ली। उसी मित्रता के धर्म को याद करके मैं तुम्हें पुकारती हूँ, तुम मेरे साथ न्याय करो ? मुझे सिंपैथी नहीं, तम्हारी काइंडनेस चाहिए। मैं तुम्हें एक बार फिर गले से लगा कर रोना चाहती हूँ।

   आज लाग-लपेट से दूर अंतरात्मा से तुमसे कहती हूँ मेरे दोस्त, प्यार तुमसे हुआ, तुम मेरे हर एक लम्हे में, मेरे वजूद के हर एक हिस्से में हो। जब भी तुम्हे याद करती हूँ तो आंसू बहते हैं, रोती हूँ, तड़पती हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद सत्य को भी याद करती हूँ। वह मेरे होने वाले इस बच्चे का पिता है, क्यों उसे छोड़ कर चला गया ? जिंदगी में सिर्फ यही शिकायत रहेगी उससे ? जब मैंने उसे अपना लिया था, बदला लेने के लिए ही सही जब मैंने तन-मन-धन सब कुछ अर्पित कर दिया तो इन परिस्थितियों में जब न तो बाबा है, न ध्रुव भैया है, मंगल चाचा और कमली के सिवा कोई नहीं,
 उसका मुझे छोड़कर चले जाना, मैं तुमसे पूछती हूँ, क्या उचित है ? मैंने विवाह के लिए उसे पहली बार तो मना नहीं किया था, तो इस बार ऐसा क्या हो गया ?  सब कुछ पा लेने के बाद उसे अचानक रीति रिवाज के अनुसार विवाह की जरूरत महसूस हुई ? क्यों ? 

    कभी सोचती कि विवाह के लिए मैंने अपनी सहमति दे दी होती तो शायद अच्छा ही होता। जब वचन और कर्म से सब कुछ उस पर न्योछावर कर दिया तो सामाजिक रूप से उसे स्वीकार करने में कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता ? लेकिन नहीं, अपनी सहमति देने से पूर्व मुझे अपने बारे में उसे सब कुछ सच-सच बताना पड़ता। बस यहीं पर आकर मैं रुक जाती थी। यदि न बताती तो कल को मेरे बाबा पर आरोप लगता कि एक मरणासन्न लड़की को हमारे बेटे के गले बांध दिया... या फिर शायद उनको खुशी ही होती ? 

    जाते समय तुमसे मांगा भी तो क्या मांगा... कि तुम यहां एक बार ही सही, अपनी मर्जी से लौट कर फिर से आओ !! प्यार, दोस्ती, चाहत इन सब से परे सिर्फ तुम्हे गले लगाकर इतना ही कहा होता, मत जाओ मेरे जीवन से... तो शायद... नहीं... नहीं... यक़ीनन तुम बाबा से किया हुआ वादा भी तोड़ देते... मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाते, और यदि जाते भी तो जल्द ही लौट कर आते।

    सच लिखा न ? हां... उस दिन मैंने समझ लिया था कि यही बात बाबा से मिलने से पहले तुम मुझसे कहना चाहते थे, जो संबंध तुमने मन ही मन मेरे प्रति स्वीकार कर लिया था, मै जान गई थी वह संबंध किसी भी वादे और रिश्ते से बढ़ कर था, फिर भी मैने तुम्हे जाने दिया !!

   मैंने ज्ञान भैया से केवल तुम्हारे बारे में या तुम्हारी प्रेमिका के बारे में ही नहीं पूछा था। मैंने तो तुम्हें पहले ही पढ़ और जान लिया था। और तुम्हारा प्यार ? वो तो तुम्हारी आंखों में झलकता था, तो फिर ये सब जानने की मुझे कोई जरूरत थी ही नहीं। मैंने तो तुम्हारा पूरा फैमिली बैकग्राउंड पूछा था। उस रात जाना, तुम हमसे कम नहीं हो। करोड़ों की संपत्ति है तुम्हारे पास। फिर एकदिन कितनी सहजता से सबकुछ छोड़ कर मेरे पास रुक जाना चाहते थे। बिना किसी रिश्ते के, मेरे सच्चे दोस्त बन कर। वैसे भी इन सभी भौतिक चीजों की आवश्यकता तुम्हारे जीवन में थी ही कहां ? तुम्हारे जीवन में तो शब्दों की अहमियत थी, मुझसे मिलने वाले निश्चल प्रेम की थी।

     आज मैने अपने पूरे परिवार को खोया, अंत में जिसे पति के रूप में अपनाया उसे भी जाने दिया और तुम जैसे इंसान को रोक न सकी, यही मेरी जिंदगी का हासिल रहा मेरे दोस्त। और अब ? कोख में एक नया जीवन लिए अपने इसी दर्द के साथ इस घर और बगिया के बीच भटकती रहती हूँ। अब आंसू भी नहीं निकलते, और निकले भी तो क्यूं ? कोई पोंछने वाला भी तो नहीं। सिर्फ दुख इस बात का है कि एक नया जीवन जो मेरे माध्यम से जन्म ले सकता है, अब उसे भी मेरे साथ ही जाना होगा। शायद यह भी कोई अभिशप्त जीव है, जिसे जन्म से पहले ही मृत्यु का महाभिशाप मिला है या फिर मुक्ति का... ?

    अभी तक बड़े ही धैर्य से मैने पत्र पढ़ा था। लेकिन पत्र के इस मोड़ पर आ कर मेरा धैर्य टूट गया। उसके दर्द उसकी पीड़ा और उसकी बेबसी को महसूस कर मैं पत्र के ऊपर अपना चेहरा रख रो पड़ा। कुछ देर रो लेने के बाद जब दिल कुछ हल्का हुआ तो मैने पत्र को आगे पढ़ना शुरू किया...

    जब भी मंगल और कमली मुझे उदास भटकते इधर-उधर देखते, तो दिलासा देते। मंगल चाचा तो कहते कि मैं तुम्हें खत लिख दूं या फिर उन्हें ही तुम्हारा पता लौटा दूं तो वही लिख देंगे, लेकिन मैं ही मना कर देती। 

    तीन साल होने को आए न, तुम्हें याद भी होऊंगी या नहीं, कौन जाने ? दिल कहता है तुम भूले नहीं होगे। लेकिन यदि सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होगे तो उसमें बाधा क्यों बनूं। तुम भी तो मुझे तब छोड़ कर गए थे, जब तुम्हें मेरी सबसे अधिक जरूरत थी, और आज मुझे तुम्हारी है !! जब तुम स्वार्थी न बन सके तो फिर मैं कैसे बन जाऊं ?

   देह-त्याग से दो-तीन घंटे पहले दोपहर को बाबा ने मुझे अपने पास बैठा कर तुम्हारे बारे में बहुत सारी बातें की थीं। मुझे नाइटेंगल वाली वह कहानी भी आर्द्रकंठ से सुनाई जो जाने से पहले तुमने उन्हें सुनाई थी, और उन्होंने स्वीकार किया था कि यह कहानी काल्पनिक होते हुए भी कितनी सच है। उन्होंने अफसोस से मुस्कुराते हुए मुझसे कहा था, मेरा ज्ञान तो किसी व्यक्ति की हाथ की रेखाएं और कुंडली पढ़कर भविष्य बताने का ज्ञान है। लेकिन उसने तो एक छोटी सी कहानी में तुम्हारी पूरी जिंदगी लिख दी। मैं जानती हूँ कि यह कहानी तुमने पहले नहीं लिखी होगी, बल्कि बाबा को हमारे बीच के संबंध को इनडायरेक्टली बताने के लिए सोच ली होगी। मेरी भी आँखें नम हुई और सोचा काश ये कहानी मैने लिखी होती...

     उस दिन उन्होंने यह भी बताया कि तुम तो यहां वापस लौट के आने के लिए जा रहे थे। किस तरह तुमने उनके पैर पकड़ कर उनसे मेरा साथ मांगा था। तुम मेरे लिए किस तरह से रोए थे। यह बताते हुए वो खुद भी रो पड़े थे,
      "...वह लड़का तुम्हारे लिए बहुत रोया था पीहू ! लेकिन तब मैं इसी भ्रम में था कि तुम और सत्य एक दूसरे को पहले से ही जानते थे, एक दूसरे को प्रेम भी करते थे। उस शाम बारिश में सत्य को मुझसे मिलाना सिर्फ एक बहाना था। उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि यह लड़का जबरदस्ती तुम्हारी जिंदगी में शामिल होना चाहता है... अपने जीवन की एक कमी को तुमसे भर लेना चाहता है... ऐसे स्वार्थी इंसान को मैं तुम्हें कैसे सौंप देता ?

     लेकिन आज मुझे कोई भ्रम नहीं हो रहा है... तुम्हारी आंखों की नमी में उसी लड़के के लिए प्यार देख रहा हूँ। तुम्हारी उदासियों में, तुम्हारे आंखों के इस सूनेपन में... मुझे वही लड़का नजर आ रहा है। तुम्हारे बाबा से अनजाने में अपराध हो गया पीहू !... और देखो तो क्षमा मांग कर वह गया... किन्हीं भी रिश्ते-नातों से दूर उसने सिर्फ तुम्हारे आस-पास रहना चाहा था। तुम्हारा सच्चा दोस्त बनकर, तुम्हारा हमदर्द बनकर। मैं उसे यह भी न दे सका !! उसके प्रति कठोर हो गया, और इस हद तक कि उसकी आंखों से बहते हुए गंगा-जमुना के जल के समान पवित्र और निश्चल आंसुओं को भी न देख सका। उसके प्रेम में वो ऊर्जा थी जो तुम्हारी किस्मत बदल सकती थी..."

   और उस दिन उन्होंने मुझसे सभी कुछ स्वीकार किया कि किस हद तक उन्होंने सत्य के चेहरे में तुम्हे लेकर इनसिक्योरिटी देखी और महसूस की थी। उस दिन उसने बाबा से कहा था, "बाबा ! सोचता हूँ, उसको यहीं रोक लूं... शायद पीहू भी चाहती है... ठीक ही तो है... दोनों किताबों के शौकीन है... उनकी बहुत-सी आदतें भी एक दूसरे से मैच करती हैं... पीहू और उसके बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है... आप लोगों के पास रहेगा... वैसे भी काम-काज के कारण मैं घर की तरफ ध्यान नहीं दे पाता हूँ... जहां तक मुझे पता है, उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे छोड़ के दूसरे से शादी कर ली है... एक बार तो सुसाइड करने की कोशिश भी कर चुका है। यहां रहेगा तो उसका भी मन लगा रहेगा... उसे आप लोगों का सहारा मिल जाएगा... भटक रहा है बेचारा इधर-उधर... आप क्या कहते हैं ?"

  पीहू के पत्र से मिली इस जानकारी ने मुझे चौका दिया। तो क्या उस दिन बाबा ने सच छुपाने से लिए अपनी ज्योतिष विद्या का सहारा लिया था ? उफ़ ! इंसान भी न जाने कितने मुखौटे पहनता है ? अभी और भी न जाने कितने सच सामने आना शेष हैं ? मैंने पत्र को देखा, अक्षर धुंधले हो रहे थे। अपनी आँखें पोंछ आगे पढ़ने लगा...

  आश्चर्य हो रहा है न पढ़ के ? अब तुम बताओ, ईर्षा, स्वामित्व और असुरक्षा का प्रेम के होने या न होने से क्या संबंध ? क्या उनके प्रदर्शन के बगैर प्रेम अप्रमाणित होता है ? तो फिर सत्य के प्रति तुम्हारे व्यवहार में और तुम्हारी आंखों में मुझे कोई ईर्षा क्यों न दिखाई दी ? प्रेम होने के बावजूद तुमने मुझ पर अपना हक नहीं जताया। शायद इसीलिए तुम्हारे अंदर किसी भी असुरक्षा की भावना ने जन्म नहीं लिया। तो क्या मैं मान लूं कि तुम मुझसे तटस्थ रहे ? नहीं, कैसे मान लूं ? मैं भी तो इन शब्दों से दूर ही रही। 

     झूठ नहीं लिखूंगी, थोड़ी देर के लिए जब तुम उस लड़की की तारीफ करते तो मुझे जलन होती थी। यदि वह अच्छी थी, तो फिर थी। इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है ? आखिर तुम्हारे व्यक्तित्व के विकास में, तुम्हारी सोच और समझ में उसका भी तो योगदान है। कैसे छीन लेती या कोशिश करती उसे तुमसे दूर करने की ? फिर तुम भी तो मुझे आधे-अधूरे ही मिलते न ? लेकिन हां, एक अफसोस जरूर होता, कि काश ! उसकी जगह कभी तुमसे मैं मिली होती या फिर इतना तो हुआ होता कि बाबा और मेरी जिंदगी में सत्य के आने के पहले तुम आए होते।

     कभी तुमसे यूं ही नहीं कहा था कि मेरे पास पैसे-रुपए, जमीन-जायदाद की कमी नहीं है। कमी थी तो सिर्फ एक ऐसे इंसान की जो मेरे पास ठहरता और मुझे समझता, जो यह न कहता कि तुम यह कर लो, तुम वह कर लो, बल्कि पूछता, पीहू ! आज तुमने क्या किया ? कौन-सी कहानी, नॉवेल या पोयम पढ़ी, कुछ मुझे भी पढ़ के सुनाओ न। मेरे मना करने पर कुछ जिद करता जैसे कि उस दिन लेडी नॉर्टन की कविता के लिए तुमने की थी। 

    आज जब सोचती हूँ तो आंसू आते है। उस दिन तुमने कैसे ज़िद की थी, "ये पीहू ! फिर से सुनाओ न प्लीज, मीनिंग के साथ...", उसी आम के पेड़ के नीचे लेट कर इस पोयम को गुनगुनाती हूँ, वो भी बीच में रुक-रुक के उसके मीनिंग भी अपने दृष्टिकोण से समझाती हूँ... लेकिन अब सुनने के लिए तुम हो कहां !!! यूं कोई देखे तो पागल समझे, लेकिन वहां कोई होता नहीं। हां एक दिन मंगल चाचा ने सुना तो मुस्कुरा के बोले, "बिटिया यहीं क्लास लगा लो बच्चो की..."

   एक ऐसा ही दिन था। मैं सुबह का नाश्ता बनाते हुए इसी पोयम को गुनगुना रही थी। सत्य ने सुना और उपहास से बोल, "इतनी किताबें मत पढ़ो की पागल हो जाओ, पता नहीं क्या बड़बड़ाती रहती हो..."

   मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बड़बड़ा नहीं रही हूँ, एक पोयम है उसे ही गुनगुना रही हूँ... तुम सुनोगे ?"

   वह लापरवाही से बोला, "न... मुझे समझ में न आएगी..."
    मैंने कहा, "कोई बात नहीं... मैं समझाऊंगी न... अच्छी पोयम है...सुन लो ?"
   वह उपेक्षा से बोला, "अंग्रेजी के चार अक्षर ज्यादा पढ़ लिए तो इतरा रही हो... तुम नाश्ता बनाओ... वैसे भी यार मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है... फैक्ट्री भी जाना है..."

   उस दिन सोचा, क्या यह वही सत्य है जिसे मेरी बातें पसंद थी, मेरी हर पसंद से प्यार था... लेकिन इसके आगे कुछ नहीं सोचा। मन में ख्याल आया कि हो सकता है किसी बात को लेकर स्ट्रेच हो... लेकिन उसी शाम जब मैं अटारी पर लेटी कीट्स की वही पोयम्स  पढ़ रही थी, तो आते ही बोला, "फाइनल ईयर का फॉर्म भर तो दिया है, कभी-कभी सिलेबस भी पढ़ लिया करो... ओवर कॉन्फिडेंस अच्छी बात नहीं..."

   उसकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा दी। हां सच... और क्या कर सकती थी ? देखा जाए तो उसकी बातें प्रैक्टिकल थी, मेरे प्रति फिक्र थी, लेकिन इनमें मैं कहां थी ?

   लेकिन कभी कोई था, जो एक पोयम मीनिंग के साथ मेरे मुख से दोबारा सुनने के लिए तरसता चला गया। कोई था, जो मुझसे कहता था तुम्हें जो पसंद हो वही करो। कोई था, जिसने मेरे अंदर उत्साह भरा कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ। कोई था, जो मेरी आंखों में आंसू की एक बूंद देखकर कहता तो कुछ नहीं था, बस चुपचाप गले लगा लेता था। कोई था, जो कहता कि हमें जिंदगी को गुजारना नहीं जीना चाहिए। कोई था, जिसे मेरे होने से प्यार था... आज तुमसे पूछतो हूँ, वह कौन था अजनबी ?

   जज्बातों में भटक गई, हां तो मैं लिख रही थी कि मुझे किससे दोस्ती करनी है, मुझे किसके साथ की जरूरत है, यह फैसला तो मुझे लेना चाहिए न ? तो फिर उसने बाबा से ऐसा क्यों कहा ? यदि कुछ कहना था तो मैं कहती ?

  बाबा को उस दिन बस इसी बात का भी पछतावा था कि सत्य के इस बात की पुष्ठि उन्होंने मुझसे क्यों नहीं की ? मेरी इच्छा जानने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की ? और उसकी एक ही वजह थी, बाबा का यह भ्रम कि मैं सत्य से पहले से ही प्यार करती थी, बारिश में सत्य का उनसे मिलना कोई इत्तेफाक नहीं, पूर्व नियोजित था। हां सच, इस रात सत्य के रुकने का आभास उन्हें हो गया था। मेरे चरित्र पर कोई संदेह नहीं था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि एक लड़के को बिना उनकी परमिशन के यदि मैने भरी बरसात में न जाने दिया तो वह मेरे लिए अजनबी कैसे हो सकता है...?

     काश ! बाबा को यह भ्रम न हुआ होता। जब बाबा ने तुमसे एकांत में मिलने की इच्छा जाहिर की तो पता नहीं क्यों मेरा मन किसी अज्ञात आशंका से घिर गया था। मुझे कुछ-कुछ आभास हो रहा था कि तुम्हारे साथ क्या होने वाला है। उस दिन मैंने गलती की। मुझे तुम्हारे साथ जाना चाहिए था। बाद में भले ही बाबा के कहने पर उनके सम्मान के लिए मैं वहां से चली आती। 

     तुम मुझसे एक सवाल पूछते-पूछते चले गए, "क्या जीवन में प्यार एक ही बार होता है...?", उस समय पूरे विश्वाश के साथ मैं कोई जवाब कैसे दे सकती थी ? दूसरी या तीसरी बार की तो छोड़ो, जबकि मैं पहली ही बार प्यार के होने या न होने के झूले में झूल रही थी !! और देखो तो, अंतिम रात और दिन जो जिंदगी मैने तुम्हारे साथ जी, उसी में मुझे मेरे सारे सवालों के जवाब मिले। मैने तुम्हे जताया भी, तुम समझे भी, लेकिन फिर भी जाते-जाते वही सवाल पूछ लिया। उसी क्षण मैं समझ गई कि बाबा ने तुमसे क्या मांगा होगा। यदि तुमने मुझसे पूछा होता, "बताओ पीहू ! क्या तुम्हे मुझसे प्यार है...?", तो इसका जवाब मैं जरूर देती। बल्कि भाग कर स्वयं बाबा के पास जाती, मेरे और सत्य के रिश्ते को लेकर जो भी गलतफहमी उनके मन में होती, उन्हें दूर करती। उनसे सच कहती और तुम्हे अपने जीवन में मांगती। हां मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर ! उस दिन मैं भी तुम्हारी तरह स्वार्थी बन जाती।

     लेकिन नहीं उस दिन तुम दोनों ही महानता के उच्चतम शिखर पर जा बैठे। भ्रम में एक ने कन्यादान किया तो दूसरे ने उस भ्रम को सही सिद्ध करने के लिए अपने प्रेम का त्याग किया। किसी ने जरूरत ही नहीं समझी कि मुझसे पूछे कि आखिर मैं क्या चाहती हूँ ? और शायद मेरा दोष यह था कि न चाहते हुए मैने यह सब स्वीकार किया ?

     सच पूछो तो उस पल मुझे उस लड़की से न तो कोई जलन हो रही थी, न ही कोई शिकायत कि उसने तुम्हें क्यों छोड़ा... निश्चित ही वह भी मेरी तरह मजबूर हो गई होगी। अंत में बाबा ने कहा था कि मैं तुम्हें अपने पास बुला लूं और अपने आप को आजाद कर लूं इस सोने के पिंजड़े से। लेकिन जब मैं सभी बंधनों से मुक्त हो गई, तो एकदूसरे को स्वीकार करने के लिए हम पास थे ही नहीं। पर तुम ही बताओ तब भी क्या यह संभव होता ?

    न मुझे गलत न समझना। मैं इसलिए नहीं लिख रही हूँ कि मैंने सत्य को बाबा के कहने पर अपना पति मान लिया था। बाबा ने तो पिंजड़े का दरवाजा खोल अपने वचन से मुझे मुक्त कर दिया था। मैं ही न उड़ पाई बावजूद इसके कि मुझे पूरा आभास था कि तुम्हे मेरा इंतजार आज भी होगा। शायद इसलिए कि तब मुझे खुद ही नहीं मालूम था कि और कितने दिनों तक मैं तुम्हारे साथ इस खुले आकाश में उड़ पाऊंगी, तुम्हारे पैरों को तकिया समझ इन ढलती हुई शामों को देख पाऊंगी, तुम्हारी कविताएं सुन पाऊंगी ? जब इतना निर्मोही मैं सत्य के प्रति न हो पाई तो तुम्हारे प्रति कैसे हो जाती ? और देखो तो अब वह समय नजदीक आ भी गया !!!

    लेकिन इन सबके बावजूद आज सोचती हूँ कि अंतिम दिन जब तुम अटारी की सीढ़ियां उतर रहे थे, काश ! उस समय कुछ हिम्मत करके बाबा से बात की होती। जिसका नाम सत्य है, उसे सच बता दिया होता तो इस जीवन में ये काश शब्द तो न होता। तुम मेरी नियति बन कर मेरे पास आए और ये मेरी भूल थीं कि मैंने अपनी किस्मत समझ के तुम्हे खुद से दूर जाने दिया। 

     या फिर काश !! उस रात मैं सत्य के साथ ही सो रही होती जब तुम्हे सत्य समझ कर अपनी फिलिंग तुम्ही से ही कह रही थी, "...वह बहुत अच्छा इंसान है, तुम्हारी पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", तब शायद वह खुद ही कुछ समझ जाता। 

    या फिर काश... उस वक्त भले ही मैं बाबा का सख्त विरोध न करती जब उन्होंने तुमसे अकेले में मिलने की इच्छा जताई थी, प्यार से इतना ही मांगा होता, "प्लीज बाबा, जो भी बात करनी है, मेरे सामने कीजिये...", तो शायद वे आसानी से इंकार न कर पाते... होने को बहुत कुछ हो सकता था लेकिन नहीं हुआ। यही हमारा प्रारब्ध है, यही मेरी किस्मत।

    या फिर काश !!! उस समय मै पूरी तरह होश में न होती जब तुमने मुझे अपनी बाहों में थाम रखा था और मैंने लिपटते हुए तुमसे "आई लव यू" कहा था।  तुम्हें पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न ? तो आज सच जान लो, जब मेरे कंधे के नीचे से तकिया निकली जा रही थी तो उस समय मैं होश में आ चुकी थी, लेकिन मैने बेखुदी का नाटक किया था। 

    जरा उन लम्हों को तुम ध्यान से सोचो जब मैंने एक पल के लिए अपनी आंखें खोली और तुम्हें देखा था। उसी वक्त मैं समझ गई थी कि मैं कहां और किसकी बाहों में हूँ। जब मैंने तुम्हें'आई लव यू' कहा और तुमने रोते हुए मेरे माथे को चूम कर आई टू' कहा था और मैने तुम्हे अपनी तरफ खींच कर गले लगा लिया था, उस पल मैं उतने ही होश में थी जितने कि तुम थे। 

     उस वक्त भी तुम दुविधा की स्थिति में थे, अचानक तुम्हें पता नहीं क्या हुआ कि तुम उस स्थिति से बाहर आए और तुमने भी मुझे उसी तरह गले से लगाया और मुझसे बोले थे, "मुझे भी तुमसे प्यार है पीहू...जानता हूँ... मैं तुम्हारे जीवन का सत्य नहीं, लेकिन झूठ भी तो नहीं। मैं तो तुम्हारे जीवन का प्यार हूँ, जो या तो होता है या फिर नहीं होता है... लेकिन मैं हूँ..."

    "और हमेशा रहूंगा !", लो पूरा कर दिया तुम्हारे अधूरे वाक्य को। अब तुम बताओ है न वही हू-ब-हू शब्द ? कभी मैंने कहा था कि मेरी मेमोरी बहुत शार्प है, यूं ही नहीं कहा था मेरे दोस्त। 

   कभी सोचती हूँ, उस रात जब मैने तुम्हारे हाथ से नींबू पानी पिया था और तुमने कितने प्यार और अपनत्व से अपने सीने में मेरे सर को सहलाते हुए मुझे पिलाया था। वो पल मुझे आज भी उसी तरह याद हैं... क्यों ? आज उसका भी जवाब मुझे मिल गया है।

    और अब  यह भी स्वीकार करने में मुझे कोई लज्जा नहीं है कि यदि उस रात मंगल चाचा न होते तो मैं बेखुदी का और नाटक करती। अपनी सारी हदें पार करती और तुमसे भी करवाती। उतार फेंकती लज्जा के आभूषण को। उस पल जब मैंने मन से तुम्हे प्यार कर लिया और तुम्हारी आंखों में अपने लिए प्यार देखा लिया था तो ऐसा कर जाना मेरे लिए कौन सी बड़ी बात होती ? तब बेखुदी में तुमसे लिपट कर तुम्हे और जी भर चूमती... प्यार करती। यदि तुम छुड़ाने की कोशिश भी करते तो मैं तुम्हें छोड़ती ही नहीं। और फिर कितनी देर तक तुम रोक पाते खुद को या मुझे ?  तुम्हारे अंदर ऐसी आग पैदा कर देती इसमें तुम स्वयं पतंगे की तरह जलकर मेरे अस्तित्व में खो जाते। तब शायद तुम इतनी आसानी से मुझे छोड़कर तो न जा पाते ? लेकिन होश में थी न, मंगल चाचा के सामने लज्जा रूपी आभूषण को कैसे उतर देती।

     तो क्या वह मौका मुझे नहीं मिला था ? तो तुम्हें जानकर यह आश्चर्य होगा कि उसी रात कुछ देर बाद ही मिला था। मुझे अच्छे से लिटा देने के बाद तुम और मंगल चाचा अपनी जगह पर चले गए। तुमने घड़े से निकाल कर पानी पिया, अपना मुख धोया और निश्चित हो कर अपनी चारपाई पर जा लेट गए। कुछ देर बाद मुझे भी नींद आ गई। जब आंख खुली तो जोरों की प्यास लग रही थी। मैंने देखा मंगल चाचा अपने स्थान पर नहीं थे। उनकी तलाश में जब मेरी निगाहें चारों तरफ गई तब मैंने उन्हें गेट की तरफ जाते हुए देखा। मैंने घड़े से पानी निकला और पीने के बाद बचे हुए पानी से अच्छे से मुंह धोया। इस बीच मंगल चाचा को अपने घर की तरफ जाते देखा। दूसरे ही पल उनके घर के दरवाजा के बंद होने की हल्की आवाज मुझे सुनाई दी। 

    फिर मैंने तुम्हारी तरफ देखा। तुम बेखबर से सो रहे थे। मैं तुम्हारे पास आई और तुम्हारी चारपाई पर ठीक उसी तरह बैठ गई जैसे कुछ देर पहले तुम मेरी चारपाई पर बैठे थे। चंद्रमा का हल्का-हल्का उजाला तुम्हारे चेहरे पर पड़ रहा था। कुछ देर तुम्हें गौर से देखती रही। अब तुम थे, मैं थी, खुली प्रकृति थी, और थे मेरे मन के सभी भाव जो ऊपर लिख चुकी हूँ। उस दिन पहली बार मैंने तुम्हें रति की निगाहों से देखा। तुम्हें उस पुरुष के रूप में देखा जिसे मैं हृदय से चाहने लगी थी, मन से प्यार करने लगी थी और जो मेरी अंतरात्मा में आ बसा था। मैं धीरे से तुम्हारी तरफ करवट लेकर लेट गई। तुम्हें कसकर अपनी बाहों में भर लेना चाहती थी, तुम्हें चूमना चाहती थी। एक उच्चश्रृंखल और उद्याम नदी की भांति अपने सागर में समाहित होना चहती थी। 

     प्रत्येक इंसान के जीवन में एकबार ही सही ऐसा लम्हा जरूर आता हैं, जहां कल्पना का स्थान यथार्थ से भी अधिक महत्वपूर्ण होता है। मैं अपनी उन्हीं कल्पनाओं के प्रत्येक बिंदु से गुजर रही थी। मैं हाथ बढ़ाकर तुम्हारे चेहरे को छू लेना चाहती थी, तुम्हारे बालों को धीरे-धीरे सहलाना चाहती थी। अपनी समस्त कल्पनाओं को तुम्हारे साथ हकीकत का रूप देना चाहती थी। लेकिन यह क्या, मेरे बढ़े हुए हाथ कांप क्यूं गए ? मैं डर गई, न जाने तुम मेरे प्रति क्या सोच बना लो ? इस पल को, मेरी इन हरकतों को कहीं तुम उन रातों से न जोड़ लो जो मैने सत्य के साथ एक ही बेडरूम और बिस्तर में गुजारी हैं ?

     उस दिन महसूस किया की एक स्त्री में पुरुष की तुलना में सेक्स की चाहत कितनी स्थाई और कितने गुना अधिक हो सकती है, लेकिन शायद उससे कई गुना उसे नियंत्रित कर लेने की क्षमता भी होती होगी। उस पल मैंने यह भी एहसास किया कि कुछ देर पहले तुम किस मानसिक स्थिति से गुजरे होगे, और तुमने अपने आप को कैसे नियंत्रित किया होगा ? उस पल तुम्हे ले कर मेरे मन में काम की भावना जरूर जागृति हुई किंतु उसमें वासना न थी। अपने प्रिय का आलिंगन कर उसके साथ शारीरिक सुख भोगने को कामवासना नहीं कह सकते। ये तो वो भाव हैं जो किसी भी आध्यात्मिक प्रेम से भी ऊपर होते हैं। 

    हां सचमुच उस रात मैंने खुले विचारों से तुम्हारे साथ सेक्स करना चाहा। मन में इच्छा जागृत हुई, तुम धरती बन जाओ और मैं बादल बन कर तुम पर छा जाऊं। यही मेरे इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है कि मैंने पहली बार जिस लड़के को लव यू कहा, वह तुम थे, जिसके साथ सेक्स करना चाहा, वह भी तुम थे, आज तक तुम्ही हो, फिर ये लफ्ज़ मेरी जुबान पर किसी और के लिए न आए। 

       और रही बात कल्पना की, तो फिर ऐसी कल्पना किसी और के लिए तो क्या कभी सत्य के लिए भी जागृत नहीं हुई, जिसे अंत में पति मान कर यह शरीर सौंपा। यदि तुम किसी लड़की की कल्पना में हो तो निश्चित ही उसके लिए तुम्हारा स्वरूप विराट और स्थाई होगा। उसकी कल्पना के प्रत्येक बिंदु में तुम संजीव और शाश्वत रहोगे। तुम्हारे जाने के बाद मैंने इसे प्रतिपल महसूस किया।

      उस रात मैं अपने मन के ये सारे भाव लिए तुम्हें देखती कुछ देर तक पड़ी रही। जब मन नियंत्रित और शांत हुआ, काम से वासना का अंत हुआ, तो बरबस ही मेरी आंखें भर आई। उस दिन मुझे पहली बार अपने सामने खड़ी मृत्यु को सोच कर मन दुखी हुआ। कुदरत से शिकायत भी हुई। मैं चीख-चीख के रोना चाहती थी। कई सवाल करना चाहती थी। क्यों मुझे मिली अल्प आयु ? और यदि मिली भी तो फिर क्यों मिलाया मुझे तुमसे। क्यों अंकुरित हुआ मेरे अंतर्मन के वृहद आकाश में तुम्हारे प्रति प्रेम का शाश्वत और विराट स्वरूप ? मुझे अपनी बेबसी पे रोना आ रहा था। 

    लेकिन मैं खुलकर रो भी तो नहीं पा रही थी। मन में यही ख्याल बार-बार आ रहा था कि कहीं तुम्हारी नींद न टूटे ? वैसे भी मुझे लेकर तुम बहुत परेशान हो चुके थे। मैं उसी तरह रोते हुए तुम्हें देखती पड़ी रही। जब हृदय की पीड़ा अपने तीव्रतम बिंदु पर पहुंच गई और उसे नियंत्रित करना मुझे मुश्किल नजर आया तो रोते हुए मैंने धीरे से तुम्हारे सर को चूमा और अपने बिस्तर पर औंधे मुंह आ गिरी। सुबकती रही, रोती रही और तुम इन सबसे बेखबर किसी देवता की तरह सो रहे थे। तुम पर क्रोध भी आ रहा था, क्यों मेरे मन की आवाज तुम तक नहीं पहुंच रही ? किस स्वप्न-लोक में डूबे हो कि तुम्हें मेरी आंखों के आंसू, और हृदय की पीड़ा और मेरे अंतर्मन में बसा तुम्हारे प्रति प्रेम तुम्हे न दिखाई दे रहा ? या फिर सब कुछ जानते हुए, महसूस करते हुए अनजान बने रहने का नाटक कर रहे हो, जैसे कि कुछ देर पहले मैं कर रही थी ? यह सभी बातें सोचकर मेरे हृदय में गहरी पीड़ा उठी और उस रात में सोई नहीं बल्कि बेहोश हुई थी। मंगल चाचा कब आए फिर क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं। जब सुबह जागी तो तुम्हें अपने पास ठीक उसी तरह बैठे पाया जैसे की रात में तुम्हारे पास मैं बैठी थी। और फिर आगे वही नाटक किया जैसे रात की किसी भी घटना की जानकारी मुझे नहीं है।

    अट्रैक्शन का साइंटिफिक रीज़न तो हो सकता है लेकिन प्रेम का नहीं। यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है और वह मन तुम थे। कुछ लोगों को कहते सुना था, आज भी मैगजीन में कभी-कभी पढ़ने को मिल जाता है कि आध्यात्मिक प्रेम की परिणित सेक्स है। फिर मैं तो बहुत छोटी सी जगह में रहती हूँ, ऐसी विचारधारा रखने वाले काम ही लोग मिलते हैं। कह लो न के बराबर। लेकिन तुम तो आजाद पंछी हो, एकदिन खुले आकाश में उड़ोगे, कहानियां भी लिखोगे। ऐसे न जाने कितने लोगों से मुलाकात होगी जो इस घटिया सोच पर यकीन रखते होंगे। 

     ऐसे लोगों से मेरी तरफ से एक सवाल पूछना, क्या सेक्स करते समय आंखों से आंसू निकलते हैं ? किसी की पीड़ा का एहसास होता है ? तो फिर प्रेम में क्यों होता है ?  शारीरिक मिलन एक पड़ाव है न कि प्रेम का अंत। इंसान अपनी कमजोरी को सिद्धांत बना लेता है। यदि आपका चित्त अर्थात मन स्थिर है, तो प्रेम की परिणीत कभी सेक्स नहीं हो सकता। 

     इसीलिए मैंने लिखा यह तो शरीर और आत्मा के बीच मन का संबंध होता है। यदि शरीर को आत्मिक सुख तक पहुंचना है तो उसे मन में प्रेम धारण करना होगा। केवल श्रृंगार ही नहीं करुण रस को भी शामिल करना होगा। तन भी उसी की तरफ आकर्षित होता है जिससे मन मिलता है। आखिर तन को भी तो आत्मिक सुख की जरूरत है। कहो गलत है क्या ? तुमसे नहीं पूछ रही हूँ तुम तो कह गए हो, "करुणा से उत्पन्न प्रेम, बहारों के मौसम में उत्पन्न प्रेम से कहीं अधिक स्थाई होता है..."

  और यही वजह है कि एक ही बेडरूम शेयर करने के बावजूद सत्य के प्रति मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं जागी थी। लेकिन तुम्हारे लिए जागी। हम दोनों उस पड़ाव को एक साथ पार कर शारीरिक मोह से मुक्त होते, और वास्तव में वहीं से शुरू होता हमारे प्रेम का आध्यात्मिक सफर।

    लोगों को अक्सर यह भी कहते हुए सुना है कि नारी का मन, उसका हृदय बहुत गूढ़ होता है, ये गलत है, भ्रामक है। तुम ऐसा समझने की भूल जीवन में कभी मत करना। यदि उसके जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति को थोपा जाए जिसे वह मन से पसंद न करे, और फिर उससे चरित्र की उम्मीद की जाए, क्या यह संभव है ? क्योंकि अंततः इस शरीर को भी आत्मिक सुख प्राप्त करने के लिए मन में स्थापित प्रेम की ही तलाश होगी।

संगमरमर - सा जिस्म लिए लोग यहां से फना हुए,
रूहों के ताजमहल अब उनके न होने पर हंसते हैं।

    अब तुम्हारे लिए लिखती हूँ, ईश्वर करें तुम जियो हजारों साल, तुम्हे लंबी उम्र मिले। तुमने कम उम्र में एक लड़की से प्यार किया, उसने भी तुमसे किया, लेकिन तुम दोनों ही एक दूसरे की जिंदगी में न आ सके। फिर युवावस्था में हम दोनों मिले। हमने भी एक दूसरे को चाहा, प्यार किया, नहीं मिल सके। मेरे जाने का समय भी हो गया है, तो अब कोई संभावना भी नहीं। लेकिन तुम्हारे पास एक विकल्प है, यदि तुम्हें सुखद सांसारिक और पारिवारिक जिंदगी जीनी हो तो ऐसी लड़की को अब अपने जीवन में महत्व देना जो तुम्हें मन से पसंद करती हो। यह मैं नहीं कह रही, इस सिद्धांत को तो एक युग पहले रुक्मणी और कृष्ण ने स्थापित कर के दिखाया है। सीधे से अर्थों में जो भूल सत्य ने की वह तुम कभी न करना। अब चलो टॉपिक चेंज करते हैं...

   मेरी इंटेलिजेंसी तो तुमने देखी है अब मेरे प्यार की इंतहा देखना चाहोगे ? तो देखो...

   तेरी आंखों के छलकते पैमाने में नहीं, 
   तेरी आंसुओं में डूबना चाहता हूँ मैं ।"

    यह तुम्हारी कविता की दो लाइन है न, जो महुए के पेड़ के नीचे तुमने सुनाई थी ? आज भी याद है मुझे। तुम सोचते होंगे दो लाइन याद करने से क्या हो गया ? तो जान लो तुम्हारी सभी कविता मुझे उसी तरह याद है जैसा कि तुमने सुनाई थी। तुम एक बार सुना देते थे फिर मैं उसे मन ही मन कई बार दोहराती थी जैसे एक बच्चा एग्जाम के समय किसी प्रश्न के उत्तर को रटता है। क्योंकि मैं जानती थी कि उस समय तुम बस सुनाते जा रहे थे, लिख तो नहीं रहे थे। वह सभी तुम्हारी अमानत थी, कैसे छोड़ देती ? वे सभी इसी नोटबुक के पीछे लिख कर जा रही हूँ।

   इस पेड़ के नीचे तुमने कीट्स की व्हेन आई  हैव फियर के हिंदी अनुवाद की कुछ लाइन सुनाई थी। मुझे नहीं मालूम था, कि यह पोयम किस बुक में मिलेगी तो फिर मैंने कीट्स की सभी पोएट्री बुक्स बॉम्बे से उसी पब्लिशर को फोन करके मंगाई थी जिसमें कभी पापा काम किया करते थे। वे सभी इसी संदूक में रखी हुई हैं, लेकिन जिसमें यह पोएट्री है, वह तुम्हारे लिए अलमारी में ही अलग से रख छोड़ी हैं। जो किताबें मैं तुम्हारे लिए अलग से रखी हैं, वह सभी सत्य को मालूम है। उसी से पूछ लेना या फिर खुद ही ढूंढ लेना।

    कुछ कविताएं भले ही स्कूल के समय पढ़ी थी। सिलेबस में होने के कारण कई बार पढ़ते-पढ़ते कुछ कविताएं याद हो जाती थी और कुछ को याद करना पड़ता था। लेकिन जरा सोचो तुम्हारी कविताएं रट कर मुझे कौन,-सा एग्जाम पास करना था ? तो फिर क्यों सुग्गी की तरह रटतो थी। क्योंकि मुझे तुमसे जुड़ी हर चीज से मोहब्बत थी, है और रहेगी। शायद इसीलिए अब मुझे उस लड़की से भी कोई जलन नहीं जो तुम्हारी जिंदगी में पहली बार आई थी।

    यह है मेरे प्यार की इंटेंसिटी। हर रिश्ते में प्रेम का कुछ न कुछ अंश होता है। चाहे वह दोस्त हो या फैमिली मेंबर हो। लेकिन जिसके लिए प्रेम की तीव्रता सर्वाधिक होती है वह या तो ईश्वर होता है या फिर प्रियवर। और इस तरह से तुम मेरे प्रिय भी और मेरे इष्ट भी।

     सच कहूं तो यह बातें मुझे उस समय इतनी शिद्दत से महसूस नहीं हुई थी जब तक तुम मेरे करीब थे। जैसे ही तुम मुझसे दूर गए तब मैंने समझा कि मेरे जीवन से क्या चल गया। महसूस किया जैसे कोई दिल की धड़कन हीं चुरा ले गया। महसूस किया जैसे कोई मेरे होठों की मुस्कान छीन ले गया। महसूस किया जैसे मेरी आंखों ने कोई सजीला स्वप्न खो दिया। महसूस किया जैसे मेरे जीवन से कोई मुझे ही चुरा ले गया।

    आज यह भी सोचती हूँ कि मेरे मन की पीड़ा, दिल की बेचैनी और आंखों के सूनेपन को क्या बाबा और सत्य ने कभी न पढ़ा होगा ? तो फिर मंगल और कमली ने हर दिन क्यों पढ़ा, और मुझे क्यों दिलासा देते रहे ? 

     तुम्हारी बहुत सी बातें हैं जो अक्सर याद आती है, उनमें से एक जो तुम मुझसे कह कर गए थे कि कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि खुद की जिंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं... यही आज मेरे जीवन की एक बड़ी सच्चाई है। शायद इसलिए कि तुम मेरे जीवन का एक ऐसा भ्रम थे जो सत्य रूपी यथार्थ की धरातल पर आकर जीवंत हो गया। एक ऐसा सत्य जो आज मेरे पूरे वजूद को, मेरी जिंदगी को झूठा साबित कर गया। तुम उस अधूरे नशे की तरह थे जिसकी खुमारी उतारने के लिए मैं सुबह पी भी न पाई, और उसी खुमारी को लिए मैं अब तक भटक रही हूँ। आज सोचती हूँ तुममें ऐसी कौन सी बात थी जिसे याद करके मैं दिन-दिन भर सोचती रहती हूँ, भटकती रहती हूँ। तुम्हारी तलाश में बगिया जाती हूँ, लगता कि तुम आम के पेड़ की छांव में उसी जगह बैठे हो, मेरे इंतजार में...

     लेकिन बाबा ने दुनिया छोड़ने से कुछ क्षण पहले मुझसे कहा था कि मैं शोक न करूं, तुम एक न एक दिन लौट कर आओगे। तुम्हारी नियति तुम्हें यहां लेकर आएगी। सत्य बाबा से दूर था, उसने कुछ स्पष्ट नहीं सुना होगा तभी तो उसने पूछा, बाबा किसके आने की बात कर रहे हैं। मैने बात टाल दी, "... मंगल को याद कर रहे हैं, जाओ बोला दो, शायद बाबा के प्रस्थान का समय...", फिर मैं रो पड़ी।

     सत्य के जाने के बाद बाबा ने अपनी पेटी की तरफ इशारा करते हुए कहा था, "पीहू जाते समय उसने तुम्हारे लिए कुछ लिखा था... मुझे दे कर गया और कहा था कि पहले मैं खुद पढ़ लूं, फिर यदि उचित लगे तो तुम्हे दे दूं... लेकिन आज तक उसे पढ़ने की मेरी खुद की हिम्मत न हुई... वो उसी तरह संदूख की ऊपरी रैक में पड़ी है... जल्दी निकालो उसे... पढ़ो मैं मरने से पहले सुनना चाहता हूँ... जल्दी करो... मेरी सांसे टूट रही हैं..."

   उस समय मेरे लिए ये सब अजीब-सा लग रहा था। मैं कभी बाबा को तो कभी संदूक को देखती। बाबा ने फिर कुछ तेज आवाज़ में कहा, "पीहू !!! देखो जल्दी करो... सत्य के आने से पहले उसे पढ़ो..."

   मैंने उनके कहे अनुसार तुम्हारी लिखी हुई कविता ले कर उनके सिरहाने जमीन पर बैठ गई। पढ़ने की हिम्मत तो मुझे खुद भी नहीं हो रही थी... न जाने तुम क्या लिख कर गए होंगे ? मन में अजीब सी बेचैनी उठने लगी... पढ़ने से पहले ही आंखे भर आने तो थी... लेकिन पढ़नी तो थी न...? तो फिर मैने
पढ़ा...

है मोहब्बत तेरी रूह से, 
जा तुझे छोड़ दिया।
नजर की इकरार-ए-वफा,
जा तुझे छोड़ दिया।

      मुश्किल से ये कुछ शब्द पढ़ पाई और आवाज़ रुक-सी गई। हृदय सागर से उठी न जाने कितनी लहरों ने इन आंखों के रास्ते अख्तियार किए। मन में भूली बिसरी यादों के न जाने कितने तूफान उठे। शरीर के रोम-रोम में पीड़ा का एहसास हुआ। मैं भी उन्हीं रास्तों से गुजर रही थी जिन रास्तों से शायद तुम लिखते वक्त गुजरे होंगे। बाबा का कांपता हुआ दाहिना हाथ मेरे सर पर था... अब इससे अधिक क्या लिखूं... बस उस वक्त मैं रोती जा रही थी... और पढ़ती भी जा रही थी... 

इस दिल की अधूरी दास्ताँ है तू, 
जा तुझे छोड़ दिया।
बुझा इस दिल से तेरी यादों का दिया,
खुद को स्याह रातों के हवाले किया।

     बस यहीं पर मेरी सब्र का बांध टूट गया। मैने रोते हुए बाबा से कहा, "बाबा... अब नहीं पढ़ी जाती... ये पोयम अपने मुझे पहले क्यूं न दी... हां बाबा पहले क्यूं न दी..."
    बाबा ने मजबूत किंतु धीरे आवाज में कहा, "और भी हो तो पहले पूरा पढ़ो... फिर सब बताता हूँ..."
     मैने आगे पढ़नी शुरू की...

  दर्द-ए-इश्क अब इंतहा हो गई,
  लगा गले जा तुझे छोड़ दिया।
  ऐसी मोहब्बत ना हो अब किसे से,
  सजदें कर जा तुझे छोड़ दिया।
  तू आखिरी लब्ज़ है मेरी कहानी के,
  लिख कर जा तुझे छोड़ दिया....

   मै उसी तरह रोती जा रही थी... बाबा का हाथ बराबर मेरे सर को सहलाता रहा। जब कुछ देर बाद भी मैं शांत न हुई तो बाबा ने मुझे समझाते हुए कहा, "पीहू ! अब चुप हो जा... अब जाते हुए मुझे और शर्मिंदा मत कर... माफ कर अपने बाबा को... ग्रह-नक्षत्र, कुंडली, हाथ की रेखा इन सब को जीवन में बड़ा स्थान दिया। मैं समझ गया था कि उसने जरूर कुछ ऐसा लिखा होगा जिसे पढ़ने के बाद मेरा भी मन कही विचलित न हो जाए... इसलिए न तो खुद पढ़ा और न ही तुझे पढ़ने के लिए दिया... लेकिन मैं एक बात को भूल गया था कि प्रेम की ऊर्जा असीमित होती है, यह वह भाव है जहां ईश्वर के नियम भी बदल जाते हैं... उसने जिन संवेदनाओं और अनुभूतियों से गुजरते हुए अपने हृदय की पीड़ा लिखी होंगी वो कभी खाली नहीं जाती... उसके शब्द हम दोनों को मजबूर कर देते... इसलिए मैंने पहले भी तुमसे कहा है और आज फिर कहता हूँ या तो तुम उसे बुला लेना या फिर अपनी किस्मत समझ सत्य के साथ विवाह कर लेना... और ध्यान रखना यह उसकी आखिरी इच्छा थी कि ये कविता सत्य के हाथ न लगे... 

   और फिर बाबा चले गए। मैं उसी तरह गुमसुम बैठी रही। आंखों के आंसू सूख चुके थे, और दिल के दर्द अब दिल की धड़कन बन धड़क रहे थे। बाबा का हाथ मेरे सर पर न रहा। सत्य के पहुंचते ही मैने काग़ज़ का वह टुकड़ा ठीक उसी जगह रख लिया जहां कभी तुम्हारी माइलस्टोन के लिए लिखी कविताएं, माचिस की डिबिया और सिगरेट का पैकेट छुपाया था। उस दिन सचमुच दिल जल गया था।

    सच लिखती हूँ, तुम्हारे जाने से एक मिनट पहले भी यदि यह पोयम मुझ तक पहुंच गई होती तो मैं तुम्हें नहीं जाने देती... चाहे उस शाम मुझे सब के सामने तुम्हे अपनी कसम ही क्यूं न देनी पड़ती... मैं देती और तुम्हे रोकती... तुम होते तो फिर सब सही हो जाता। और ये क्या लिख के गए तुम ? 

     बुझा दिल से तेरी यादों का दिया,
     खुद को स्याह रातों के हवाले किया।

     क्या मैने तुम्हे इसी दिन के लिए समेटा था... सहेजा था... कि एक दिन फिर यूं ही टूट के, बिखर के चले जाओ...? तो फिर लो मेरे दोस्त ! आज तुम्हारी यह कविता तुम्हारे ही हवाले कर मैं अब इस दुनिया से जा रही हूँ... तुम्हारा यह इस्तीफा नामंजूर है मुझे। लेकिन कहती हूँ... फिर से मत बिखरना।

    तुम्हें याद है, इसी अटारी में जब बाबा से मिलने से पहले तुमने मेरे पांव दबाए थे... और मैंने अधिकार पूर्वक दबवाये भी थे...? जरा तुम सोचना किस अधिकार से...? सचमुच उस शाम मेरे पांव दर्द कर रहे थे। मोहब्बत की राहों में तुम्हारे साथ चलते-चलते शायद मैं कुछ थक-सी गई थी। और सच पूछो तो इसीलिए पत्र के शुरुआत में मैने लिखा था कि तुम गए भी तो अपना कर्जदार बनाकर... अब मुझे उस कर्ज की अदाएगी तो करनी होगी न ? लेकिन इसके लिए तुम्हें अब वहीं आना होगा, जहां कालचक्र से परे, प्रेम रूपी सरिता के सतत निर्मल प्रवाह में, दो किनारों पर खड़े हम दोनों, एक दूसरे से दूर ही सही किंतु अनुराग-अभिसिंचित जल तरंगे हमारे कदम चूमे। 

    मैं यह भी जानती हूँ यदि तुम यहां आए तो इस बुक की तलाश जरूर करोगे। सच, किसी के डर से ये सब पेटी में छुपा कर नहीं रख रही हूँ। बल्कि इसलिए कि यह सुरक्षित रहें और तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंच जाए। फिर तुम्हारी इच्छा जिसे चाहो पढ़ा देना, लेकिन पहले तुम पूरा पढ़ना। क्योंकि जब ये पत्र तुम्हें लिख रही हूँ मुझे भी अपनी मृत्यु अर्थात देह त्याग का पूर्वाभास हो चुका है। मेरे न रहने के बाद दुनिया के रीति-रिवाज के अनुसार इस घर को शुद्ध किया जाएगा। तब खासकर मेरे कपड़े मेरी चीजे या तो दान कर दी जाएंगी या फिर उन्हें गंगा या नर्मदा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। लेकिन मेरी बुक्स और मेरी यह पेटी रहेगी। 

    और यदि सत्य लौट के आया भी तो उन्हें कभी अपने से दूर नहीं होने देगा। मुझे मालूम है कि उसे इन बुक्स को पढ़ने में कोई खास रुचि नहीं है, फिर भी मेरी बुक्स को वह संजो का रखना चाहेगा। क्योंकि वह जानता है कि मुझे इनसे कितना लगाव है। और वैसे भी यहां बुक्स को जलाना या जल में प्रवाहित करना पाप समझा जाता है...

   अब किसी को जो और जैसे समझना हो समझे, कोई परवाह नहीं। मैंने तो किसी के साथ कोई छल नहीं किया, सिवाय तुम्हारे। सभी वादे और वफाएं निभाईं। अब स्वीकार करती हूँ, छले तो तुम गए। कभी किसी ने छोड़ देने की शर्त के साथ तुम्हें अपनाया और मैने खामोशी से उसी शर्त को पूरा किया। 

    जब तुम्हें याद करते हुए तुम्हारे लिए बुक्स अलग रखती या फिर तुम्हारी टी-शर्ट पहनती तो सत्य
धीरे से मुस्कुरा देता। एक दिन उसने कहा, मैं ही तुम्हें याद करती हूँ, तुम कभी नहीं करते होगे। फिर एक दिन उसने यह भी पूछा, "पीहू मेरे ख्याल से उसे तुमसे प्यार हो गया था... तुम्हे क्या लगता है ?"

   देखो तो कितना विरोधाभाषी और गलत सवाल किया था उसने। उसे तो यह पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं। लेकिन नहीं, उसने नहीं पूछा, क्यों ?  कभी उसने तुम्हारी राइटिंग स्किल देखने के लिए मेरे लिए एक प्रेम पत्र लिखवाया था। क्या उसने कभी पढ़ा या मुझे पढ़ने दिया ? याद करो मैं पढ़ती उससे पहले ही भूख लगने की बात कह के कैसे टाल गया था ? और यदि उस रात तुमने मेरे आई लव यू का जवाब आई टू के रूप में न दे मुझे नशे में समझ कर मेरे साथ कोई गलत हरकत करने का प्रयास किया होता तो दूसरे दिन मैं भी उसे पढ़ने की कोशिश न करती, या यूं कह लो फिर तुमसे मिलने की कोशिश ही न करती। 

      तुम वहीं बगिया में पड़े रहते। यदि घर आते भी तो भोजन करा के तुम्हे विदा कर देती और तुम चले जाते। न मैं तुमसे प्यार जताती और न ही उस रात की कोई याद दिला कर तुम्हें शर्मिंदा करती। लेकिन हां इस दिल से जरूर उतार देती। जब मैने तुमसे पत्र पढ़वाया तो तुमने बिल्कुल सहज भाव से पढ़ा। मुझे विश्वास ना हुआ, क्या वह यही आवाज है, जिसमें तुम अपने दिल की बात कहते हो, अपनी कविता पढ़ते हो ? मैं फौरन समझ गई कि तुम खुद को सत्य के रास्ते अलग रख, अपनी फिलिंग्स छुपा के चुपचाप चले जाना चाहते हो। लेकिन मुझे तो सच जानना था न, वो भी तुम्हारे मुख से उसी आवाज में, उसी इंटेंसिटी के साथ। तो फिर मैने तुमसे एक्टिंग करने के लिए कहा। तुम्हें अपनी नज़दीकियां दी, तुम्हे गले से लगाया, तुम्हारे हर शब्द में रोई और खुद भी स्वीकार किया। सच पूछो तो तुम्हे कुरेदा, तुम्हे मजबूर किया कि तुम मुझसे अपने दिल की बात कह सको। लेकिन नहीं तुमने तो मेरे भी दिल की बात कह दी। 

    जब तुमने मुझसे कहा कि मेरी आंखों में उस दिन तुमने न तो सत्य को देखा और न ही खुद को। दिखाई दिया तो एक सुनापन... एक प्रतीक्षा... एक इंतजार जो एक लम्हे की थी। तुमने कितनी आसानी और बेबाकी से मुझसे कह दिया कि मुझे सत्य से प्यार नहीं था, और न ही आज है। हां मैं उसे प्यार करने की कोशिश करती रही लेकिन कभी कामयाब नहीं हो सकी।

   और खुद के लिए कहा, "चला जाता पीहू ! यदि मैं भी कोई नादान लड़का होता तो जरूर चला जाता। तुम्हारी आंखों में, तुम्हारे आचरण में यदि मैंने खुद के लिए प्यार न देखा होता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, और सच मानो तो किसी क्रम से परे पूरी इंटेंसिटी के साथ है। मैंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति तुम्हारे सच्चे, निःस्वार्थ और लालच रहित प्रेम को महसूस करने के बाद ही की...."

    बस यह दो प्रमुख बातें थी जिसे सुन लेने के बाद
खुद के विजेता होने का भ्रम टूट गया। अभी तक तो मैं समझती रही कि मैंने तुम्हें कुरेदा, प्रेम अभिव्यक्ति के लिए तुम्हे मजबूर किया। लेकिन तुम तो कभी मजबूर थे ही नहीं, बस मुझे एहसास दिलाते रहे कि हां तुम मजबूर हो। तुमसे ही सीखा कि अपने प्रिय के प्रेम में सब कुछ हार जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है।

   लेकिन मैं तो उस समय की बात कर रही थी जब खुद के विजेता होने के भ्रम में थी। मैंने तुम्हें कुरेदा क्योंकि पहली नजर में ही पत्र में मेरे प्रति लिखी तुम्हारी प्रत्येक भावनाएं सच लगी, क्यों ? क्योंकि लिखी गई प्रत्येक भावना को तुम पहले ही मुझसे स्वीकार कर चुके थे। मैने उन्हें केवल शब्दों में नहीं तुम्हारे चरित्र में महसूस कर लिया था। इसलिए लिखती हूँ, अब कर लो सत्य से अपनी तुलना। दावा है, उन्नीस नहीं बीस ही पाओगे खुद को। 

    तुमने मेरे प्रति जो महसूस किया तुम कह गए लेकिन मैंने उसे जताया, पूरे मन से स्वीकार भी किया लेकिन तुम्हे रोक न पाई, क्यों ? जिंदगी में कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद इसलिए कि उनके जवाब भी एक सवाल ही होते है..." 

      मैंने भी इन तीन वर्षों में खुद से बहुत सारे सवाल किए हैं। मैं अक्सर पहले सत्य को क्यों अजनबी कहती रही ? क्या मेरे जीवन में किसी अजनबी का आना मेरी नियति थी, जिसका पूर्वाभास वह मुझे पहले से कराती रही ? क्या बाबा को मेरी असमय और गुमनाम मृत्यु का आभास पूर्व में ही हो चुका था ? क्या उन्हें मालूम पड़ गया था कि मेरी चिता को आग देने वाला भी कोई नहीं होगा और इसलिए उन्होंने सत्य को मेरे पति के रूप में पहले से ही निर्धारित कर दिया ? 

     पति ! मेरे जीवन में बाबा द्वारा निरूपित एक ऐसा रिश्ता जिसे बाद में ही सही मैंने अपनाने की कोशिश पूरी इमानदारी से की। यह सच है कि उसको लेकर पहले मेरी मन में जिज्ञासा थी। यह लड़का कौन है और यहां क्यों खड़ा रहता है ? क्या यह मेरे लिए आता है ? फिर धीरे-धीरे महसूस हुआ कि नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, शायद यह तो इसका जॉब है। पहली मुलाकात में मैंने महसूस किया कि वह एक अच्छा इंसान है। दुनियादारी से कुछ दूर सच्चा और इमानदार। उसमें ऐसी बहुत सी विशेषताएं हैं जो एक अच्छे पति में होनी चाहिए, लेकिन मेरा ध्यान उसके अंदर ऐसी किसी भी विशेषता की ओर नहीं गया।  क्योंकि मैंने तो विवाह न करने का फैसला पहले से ही कर लिया था। 

     लेकिन हां, वह एक अच्छा दोस्त बन सकता था और मैंने उसे पहले इसी रूप में स्वीकार किया। पूरी ईमानदारी से लिखती हूँ और जैसा कि तुम भी मानते हो, मैंने सत्य को प्यार करने की कोशिश की। मैं उससे शादी न भी कर पाऊं तो कम से कम उसे प्यार तो कर लूं, लेकिन नहीं कर पाई, क्यों ? यह सवाल मैंने भी खुद से कई बार पूछा था और जिसका जवाब जिंदगी ने मुझे तुमसे मिला कर दिया। मेरी अंतरात्मा को, मेरी इन नजरों को प्रतीक्षा तो उस एक लम्हे की थी जो तुम थे, तो फिर प्रेम उससे कैसे हो जाता ?

    यकीनन इसीलिए बाबा द्वारा रिश्ता बना देने की बाद भी मैंने उसे एक लिमिट में ही अपनाया। मैं उसके साथ खुद को समय देना चाहती थी और जानना चाहती थी कि क्या कभी मैं इसे प्यार कर पाऊंगी या नहीं। और सच पूछो तो तुम्हारे आने के पूर्व ही मुझे इस बात का आभास हो चुका था कि सत्य का मेरी जीवन में क्या स्थान है। इसलिए लिखती हूँ, तीसरे इंसान होने का गिल्ट तुम अपने मन में कभी मत पालना। 

    मेरे जीवन में तुम्हारा आना कई मायनों में मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। मैं केवल इसलिए नहीं कह रही हूँ कि केवल तुम्हारी हॉबीज तुम्हारा इंटरेस्ट मुझसे मैच करता था और लिटरेचर में रुचि ही हम दोनों के बीच आकर्षण का एकमात्र केंद्र था। प्रमुख केंद्र था हमारे विचारों का मिलना। आपस में हमारे दृष्टिकोण का मिलना। तुम जितने भावुक थे, उतने ही प्रेक्टिकल। तुम्हारे व्यक्तित्व में इन दोनों का गजब का समन्वय और सामंजस्य था। जैसे कि पहली नजर के प्यार में तुम भी विश्वास नहीं करते थे और न ही मैं करती थी। प्यार तो उस व्यक्ति से होगा जो तुम्हारी सोच, तुम्हारी विचारधारा, तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारी अभिरुचि से मेल खाता हो। तब तुम पूरी इंटेंसिटी के साथ उसे स्वीकार भी करोगे। 

    ये बातें जब पहली बार तुमने मुझसे कही तो सुनकर मुझे बुरा लगा। लेकिन जब बात की गहराई तक पहुंची तो समझा कि इसमें गलत क्या है, यह तो बहुत नैचुरल है। प्रत्येक इंसान ऐसे ही व्यक्ति की चाहत तो अपनी जिंदगी में करता है। फिर तुम्हारा मुझसे कहना कि कभी-कभी हम जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं। फिर उसके ही अस्तित्व में हम अपनी तलाश करते और जहां हम खुद को कभी नहीं पाते हैं। ठीक उसी पल मुझे अपनी सभी शंकाओं का समाधान मिल गया। मैं समझ गई थी मुझे किसको किस स्थान पर रखना चाहिए।

     याद करो हमारी मुलाकात का तीसरा दिन जब इसी अटारी में तुम्हारे बार-बार रोकने पर सत्य ने भावुकता में आकर मुझे और खुद को श्रापित कर लिया था। तब भी मैंने किसी भी भावुकता के अधीन हो उससे कोई रिश्ता नहीं स्वीकार करना चाहा था, लेकिन नहीं बीच में तुम फिर कूद पड़े। फिर बाद में पता चला कि तुम तो मुझे उसके साथ विवाह के लिए तैयार भी करने वाले थे। लेकिन इस बारे में मैंने तुमसे कोई अधिक बात नहीं की, जानते हो क्यों ? क्योंकि यह सब को-एक्सीडेंटल हुआ। तुम कहीं से दोषी सिद्ध नहीं हो रहे थे। यदि होते तो उसी दिन तुम्हारा गिरेबान पकड़ कर तुम्हें एक थप्पड़ मारती और कहती, "कौन होते हो मेरी जिंदगी का फैसला करने वाले... यदि यह जिंदगी मेरी है तो यह फैसला मैं ही करूंगी न कि तुम। किससे प्यार करूं और किससे शादी करूं..." और यह भी पूछती, "क्या किसी को प्यार करना या न करना हमारे बस में होता है...? मैंने तो तुम्हें प्यार नहीं करना चाहा था फिर तुम से ही क्यों हो गया, बताओ...?"

    तुम्हारे सामने सत्य के लिए परेशान होना, बेचैनियां दिखाना, नजदीकियां बढ़ाना इन सबका एक ही कारण था, यह देखना कि इन सब का असर तुम पर क्या होता है ? लेकिन तुम तो बस मुस्कुरा के रह जाते थे। एक महान अभिनेता की तरह अपने मन के सभी भावों को छुपा ले जाते थे। मैं तुम्हारे अंतर्मन को पढ़ना चाहती थी, और हुआ क्या ? धीरे-धीरे तुम मेरे अंतर्मन को पढ़ते चले गए। उसके बाद अपने शब्दों से मेरी जो तस्वीर तुमने बनाई वह मेरे लिए खुद एक नई पीहू की तस्वीर थी। 

   उस रात जब सत्य बाथरूम में था और मैं अटारी के नीचे वाले हॉल के फ्यूज बल्ब को चेंज करने आई थी। तुम और ज्ञान भैया अटारी में मुझे ले कर आपस में बातें कर रहे थे। जिज्ञासा से मैं दबे पांव सीढ़ी के पास खड़ी हो गई थी। नीचे अंधेरा होने से तुम लोगों का ध्यान मेरी तरफ नहीं गया। लेकिन मैने उस रात सब कुछ देखा और सुना। तुमने ज्ञान भैया से वादा किया कि तुम कभी देवदास नहीं बनोगे। जब तुम पोएट्री बुक में पैसे और अपनी पोयम के पन्ने दबा रहे थे। उस रात मैने तुम्हारे चेहरे को ध्यान से पढ़ा था, तुम्हारे दिल की हर एक फिलिंग तुम्हारे चेहरे पर लिखी थी। 

   ज्ञान भैया को मेरे और सत्य के बीच प्यार को ले कर शंका थी और तुमसे उन्होंने कहा भी था कि वे मुझसे बात करेंगे, लेकिन तुमने रोक दिया। फिर सत्य की फैमिली के बारे में तुम्हे बताया, सुनकर मुझे भी आश्चर्य हुआ था। लेकिन अगले ही पल उन सबका बिहेवियर मुझे याद आया। मैं तो इन सब से दो महीने पहले ही मिल चुकी थी न। सभी को मेरा बैकग्राउंड और मेरी प्रॉपर्टी की जानकारी लेना महत्वपूर्ण लगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि मुझे क्या पसंद है और क्या नहीं। सच लिखती हूँ, उस पल भी सत्य के प्रति मेरा यकीन नहीं डगमगाया। मुझे उसकी मित्रता पर पूरा भरोसा था। हो सकता है उसके घर वाले इस विचारधारा के हों लेकिन उसको मैंने इस विचारधारा से मुक्त ही रखा था।

    बस उसी एक पल में मुझे वो मिल गया जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी। मुझे विश्वास हो गया, ज्ञान भैया न सही लेकिन एक न एक दिन तुम खुद ही मुझसे स्वीकार करोगे। उस रात सीढ़ी से उतरते हुए मैंने नशे में किसी व्यक्ति को या किसी मित्र को सहारा नहीं दिया था, बल्कि उस व्यक्ति को दिया था जिसे मैंने सर्वस्व मान लेने का इरादा कर लिया था। लेकिन इतनी जल्दी नहीं, मुझे तो तुम्हारे बारे में अभी बहुत कुछ जानना था, समझना था। मैंने कहा न पहली नजर के प्यार पर मैं विश्वास नहीं करती और इसीलिए मैंने उस दिन कहा था, "जब चढ़ेंगे तो यह अंतिम पायदान ही पहला पायदान होगा। मित्रता के आखिरी पायदान पर तो हम पहुंच ही चुके थे न ?

     हां मेरे प्रियवर, वहीं से शुरू हुआ था मेरे प्यार का सफर, जिसे कुदरत ने तुम्हारे आने से पहले ही निर्धारित कर दिया था। एकदिन हम दोनों प्यार की सीढ़ी के सभी पायदान को पार कर इसी अटारी पर पहुंचे, जहां हमने एक साथ एक ही आईने में अपने चेहरे देखे। अंतिम बार तुम्हें गले लगा कर रोई। तुम्हारे कदमों में बैठ कर बाबा से अनजाने में हुए किसी भी गुनाह की मन ही मन ऊपर वाले से छमा याचना की और तुमसे मांगा कि तुम एकबार ही सही फिर यहां लौटकर मेरे लिए आओ...

    अंत में... तन्हा तुम्हे उन्हीं सीढ़ियों को उतरते हुए देखा और मैं प्यार की ऊंचाइयों में अनिमेष खड़ी बस तुम्हे उतरते हुए देखती रह गई। क्या कभी तुमने किसी पहाड़ी की ऊंचाई पर खड़े इकलौते वृक्ष को देखा है, मैने देखा है। उसके दर्द और एकाकीपन को अब तक महसूस भी किया है... वो सब सुना जो स्वप्न की परछाईं न कह सकी। मन को शांति मिली और सहसा यकीन नहीं हुआ की पांच वर्ष पूर्व मेरे हृदय मेरे मन की बात कोई तुमसे कैसे कह कर चला गया। उस दिन यह भी महसूस किया कि तुम्हारे जीवन में प्यार एक ही बार आया क्योंकि दोनों बार तुम्हारी मुलाकात एक ही किरदार से हुई। कुछ अनकही रह गई थी शायद, जो एक दूसरे से तुम कह न पाए। वह तुमसे जो ना कह पाई मैंने कहा, और तुम जो उससे न कह सके वह मैंने सुना। 

     तुम्हे याद है वह कविता, तुमसे मिलकर चाहा है तुमको... थक शून्य पथ पर चलते-चलते ? तुमने छोटी-छोटी पर्चियों में माइलस्टोन के लिए जो कविताएं लिखी थीं, इसी नोटबुक पर पीछे लिखी हुई तुम्हें मिल जाएंगी। दो-तीन अपनी तरफ से लिखी हैं, जो उसके मन की बात तुमसे कह सके। समझ लेना यह उसका मुझ पर कर्ज था।

    तुम्हारे जाने के कुछ दिनों बाद जब मेरा मन स्थिर हुआ तो मैंने उसके बारे में सोचा जो तुम्हारे जीवन में पहली बार आई थी, और सच पूछो बहुत दूर तक सोचा। बिल्कुल निष्पक्ष, उसकी जगह पर खड़े होकर सोचा, तो समझ में आया कि वह किस दर्द से गुजरी होगी। नियति में तुम दोनों की कुछ अधूरी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए तुम्हें मेरे जीवन में भेजा। जहां तक तुमने अपनी कहानी मुझे बताई कि तुम दोनों गांव-घर, लोक-लाज के कारण कभी एकांत में मिल ही न पाए। अपने मन की बात एकदूसरे से पूरी तरह न कर पाए। और देखो, हम दोनों बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की तरह पूरे चार दिनों तक एकसाथ एकदूसरे के पास रहे। खूब हंसी-मजाक और मौज-मस्ती की। एकदूसरे से दिल की बात कही, एक दूसरे को गले लगा कर रोए भी।

       यह सब करते हुए हम कभी भी अपनी हद को पार नहीं की कर सके। इस दिल में हसरत होते हुए भी मैं तुम्हारे होठों को कभी छू तक न पाई। बात सिर्फ अपनी ही क्यों करूं, तुम्हारी भी क्यूं न कर लूं ? तुमने सिर्फ उन लम्हों को पूरा किया जो उसके साथ अधूरे रह गए। जो उसके साथ किया मेरे साथ रिपीट नहीं किया। दो उदाहरण देती हूँ। पहला, तुमने कभी केवल प्रेम भाव से मुझे गले नहीं लगाया जब भी लगाया तो मुझे दिलासा देने या फिर अपनी करुणा देने के लिए। दूसरा, पहली नजर में ही देखकर मुझसे प्यार न करना। बेशक तुमने मुझे अपनाया लेकिन खुद भी बिना किसी दाग धब्बे के तुम मेरी जिंदगी से चले भी गए। 

     तुमने मुझे यह भी बताया था की बिछड़ते समय तुम उसे गले लगा कर रो भी न सके, तो मुझे गले लगा कर रो लिया, मुझे दिलासा दे दिया। जो उससे एक बात कहना चाहते थे, वह मुझसे कह गए कि मैं तुम्हें बेवफा कभी नहीं समझूंगा। और उसके मन की बात मैंने तुमसे कह दी। तुम्हारे पैर छूकर तुमसे अपने लोगों के गुनाहों की माफी मांग ली, और तुम्हे चार बाते भी सुना दी। 

     सच पूछो तो आज मुझे समझ में आता है कि क्यों वह अक्सर एक ही आईने में अपनी सूरत के साथ तुम्हारी सूरत देखा करती थी ? शायद कुछ चेहरे, कुछ जोड़ियां आईने में ही कैद होकर रह जाने के लिए होती हैं। वास्तविक जीवन में उनका कोई सह-अस्तित्व होता ही नहीं। और देखो तो मैने भी वही किया !! आज मुझे उसके प्यार की इंटेंसिटी भी समझ में आती है। महसूस कर सकती हूँ कि किसी को अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जी लेने की उम्मीद के न होते हुए भी उसे ही चाहते रहने का दर्द क्या होता है ? 

    जब उस एक्ट को तुम्हारे साथ प्ले किया उस वक्त मैंने खुद को उसी लड़की के रूप में महसूस किया था। तुमसे लिपट कर रोने वाली लड़की पीहू नहीं वही थी, जिसने तुम्हारे साथ जिंदगी जीने के सपने देखे और उन्हें बिखरता हुआ भी महसूस किया। उस लड़के के दर्द को भी महसूस किया जिसे जिस्म नहीं जिंदगी जीने के लिए अपने प्यार का साथ चाहिए था, क्योंकि वह जिंदगी को गुजरना नहीं बल्कि जीना चाहता था।

     यह भी समझ में आया कि हम दो अलग-अलग होते हुए भी हमारी शख्सियत एक-सी थी। जिंदगी जीने के दृष्टिकोण एक थे, हमारी रुचि अभिरुचि और शायद तुम्हारे प्रति प्रेम की तीव्रता भी एक जैसी ही थी। नहीं तो इतनी सहजता से तुम मुझसे प्यार नहीं कर पाते। तुम समझ सकते हो कि मेरे लिए यह स्वीकार करना कितना कठिन रहा होगा लेकिन सच को स्वीकार करना चाहिए। यह भी तुम्हीं से सीखा। मेरे प्रीति तुम्हारे प्रेम की भावना उतनी ही निश्चल थी जितनी की उसके प्रति रही होगी। नहीं तो कोई इतनी सहजता से उस लड़की से मोहब्बत नहीं कर सकता था जो किसी के साथ एक ही बेडरूम शेयर करती हो।

     मैं यह सब बाते हवा में नहीं लिख रही हूँ बल्कि महसूस करके लिख रही हूँ। तुम्हारे स्थान पर यदि मैं होती तो मेरे लिए इतना सहज कभी नहीं होता। और दावा है कि यदि तुम्हारे स्थान पर सत्य होता तो उसके लिए तो नमुमकिन ही होता। 

    एक दिन तुमने मुझसे कहा भी था यदि मैं सत्य के साथ फिजिकल होती भी तो भी तुम्हारे प्यार में कोई कमी नहीं होती, और न ही तुम्हें कोई फर्क पड़ता। और मान लो कोई उच्चतम श्रेणी का वर्जिन है भी, लेकिन वह तुमसे प्यार नहीं करता है, उसे तुमसे मोहब्बत ही नहीं, कभी मन से तुम्हारा आलिंगन न कर पाए तो फिर ऐसी वर्जिनिटी का क्या करोगे तुम ? अचार डालोगे या किसी शोरूम में प्रदर्शनी के लिए रखोगे ? इसी थॉट पर मैंने एक छोटी सी कविता लिखी है, चाहे तो तुम माइलस्टोन में शामिल कर लेना,

दुनिया के प्रचलित पैमानों पर, 
जब उसने तुमको तौला होगा। 
हां तब तक थी तुम वर्जिन, 
उसने भी यह जाना होगा। 
लेकिन प्रथम आलिंगन के एहसासों को, 
भीगे-भीगे होठों के पहले-पहले चुंबन को,
किसने किस पैमाने से जाना होगा ?

     वर्जिनिटी तो टेस्ट की जा सकती है, उसे जांचा परखा भी जा सकता है। प्रचलित पैमानों  से काफी हद तक उसका अनुमान भी लगाया जा सकता है। लेकिन यदि तुमने किसी को अपनी बाहों में भरकर प्यार किया हो, उसके होठों को या माथे को चूमा हो, उसके गालों को प्यार से सहलाया हो, उसके रोने पर उसे गले से लगाकर खुद भी रोए हो, उसके आंसू पोछे हों, एकसाथ हंस हो, मुस्कुराया हो, तो फिर उन्हें मापने का पैमाना क्या होगा ? कोई उसकी माप कैसे करेगा ? दिल के शबनमी शर्मीले जज्बातों को, भौतिकता के किस तराजू में तौलेंगा ?

    यदि तुम कभी अजनबी लिखो तब मेरी तरफ से उसके लिए एक बात जरूर लिखना कि वह मुझे खुद से अलग न समझे। मुझसे नफरत न करें। मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी न समझे। क्योंकि नियति ने उसके कुछ अधूरे काम को पूरा करने के लिए मुझे तुमसे मिलाया था। और वह काम मैंने पूरी ईमानदारी से किया है। 
   मैं नहीं जानती कि वह दिखने में कैसी रही होगी। कद-काठी, रूप-रंग मुझसे मैच करता रहा होगा कि नहीं ? लेकिन एक बात तो है, तुम्हारे प्रति हम दोनों के प्रेम की इंटेंसिटी एक जैसी रही होगी। हम दोनों की कुछ आदतें और स्वभाव भी आपस में मिलते-जुलते रहे होंगे। मेरे व्यक्तित्व में कुछ हद तक तुम्हें उसका अक्स नजर आया होगा। तभी तो तुम सहजता से मेरे प्रेम को स्वीकार कर मेरे साथ अपनी जिंदगी जीने की चाहत को जागृत कर पाए होगे। नहीं तो क्या इन पांच वर्षों में तुम्हें कोई सुंदर लड़की न मिली होगी ? 

   उस दिन जब बेखुदी में मैं अपने आप में ही बड़बड़ा रही थी, जिन लम्हों की याद मुझे नहीं है। मेरे बहुत पूछने पर मंगल ने मुझे बताया था कि तुम कैसे तड़प गए थे जब मैने नशे में ही सही उसे भला-बुरा कहने और बद्दुआ देने की कोशिश की थी। तुमने मुझे हर उस वक्त रोका जब भी मैंने उसके खिलाफ बोलने की कोशिश की। आज मृत्यु की दहलीज पर खड़ी मैं अपने उन सभी कहे की उससे माफी मांगती हूँ, और ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उसे मेरी कोई बद्दुआ न लगे। वह जहां भी रहे सुखी वैवाहिक जीवन जिए। इसी में तुम्हारा भी सुख है, जैसा कि तुमने कहा था। 

    यदि मैं सत्य के साथ वास्तविक रूप से वैवाहिक संबंधों में हो गई होती और फिर तुम मुझसे मिलने के लिए आए होते, तो मैं तुम्हारा स्वागत कैसे करती और तुम्हे किस रूप में अपनाती ? यह मेरे जीवन का अधूरा काम है, जो अब उसे पूरा करना होगा। यह उस पर मेरा कर्ज है जो उसे चुकाना होगा।

     अब तुम दोनों के लिए इस हृदय से, सच्चे मन के साथ यही दुआ निकलती है, अलग-अलग ही सही तुम दोनों खुश रहो, तुम दोनों सदैव के लिए एक दूसरे के हृदय में स्थापित रहो। 

   अब मैं अपनी कहानी में लौटती हूँ। मैं बात करती हूँ उन दिनों की जब सत्य मेरे जीवन में था और तुम जा चुके थे। एकदिन उसने व्यंग्यात्मक और उलाहना भरे लहजे में कहा, "पीहू ! हमारे रिलेशन को तीन साल होने को हैं... लेकिन तुम न तो मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो रही हो और न ही अपनी सहमति देती हो ? शायद अब तुम्हे मेरी जरूरत नहीं...?"

   जानते हो, उस दिन मैंने तुम्हारी ही टी-शर्ट पहन रखी थी। उसे गौर से देख कुछ मुस्कुराते हुए उसने व्यंग्यात्मक लहजे में आगे पूछा, "प्यार तो करती हो न मुझसे...?"

    अब मैं इतनी नादान तो नहीं थी कि उसके कहने के अर्थ को समझ न सकूं... उस शाम तुम पर पहली बार क्रोध जागृत हुआ। दिल में आया कि मंगल चाचा को साथ ले सीधे तुम्हारे घर पहुंच जाऊं और तुम्हारा गिरेबां पकड़ तुमसे पूछूं कि बताओ किसके लिए छोड़ कर आए थे तुम मुझे ? एक जो अब रहे नहीं, और दूसरा जो इतने सालों बाद मुझसे पूछता है कि बताओ तुम्हारे दिल में क्या है ? अरे तुम्हें कुछ पूछना था तो तुमने उसी दिन मुझसे क्यूं न पूछा, जिस दिन बाबा से मेरे और तुम्हारे बारे में बात की थी ?

    दिल में आया कि उसे सब कुछ सच-सच कह दूं। कह दूं कि हां तुमसे प्यार नहीं है, और जिससे करती हूँ, उससे कह चुकी। लेकिन तुमसे शादी न करने की एकमात्र वजह ये नहीं है। मरने वाली हूँ इसलिए नहीं कर रही, ताकि तुम किसी भी रिश्ते से मुक्त रहो, और शायद यह मेरा दुर्भाग्य है कि कुछ ज्यादा ही जी गई..."

   लेकिन बहुत कुछ सोच के रुक गई। मैं जानती थी कि वह ज्ञान भैया का बेस्टफ्रेंड है। मेरी कहे को वह न जाने किस रूप में प्रस्तुत करे। और फिर बात तुम तक पहुंची तो क्या होगा ? तुम इस अपराध बोध से ग्रस्त न हो जाओगे कि तुमने मेरी जिंदगी खराब की और फिर तुम न जाने कौन सा कदम उठा लो, क्या कर जाओ, मेरी होने वाली मृत्यु को तुम कही अपने सर न ले लो... उस पल पहली बार मुझे तुम्हारी भावुकता से डर लगा था।

    भावुकता !!! कभी तुमने ही कहा था कि भावुकता में लिए गए निर्णय जरूरी नहीं की सही साबित हों, लेकिन तुम खुद इस बात को कहां मानते थे। तो फिर आओ वह समय आ चुका हैं जब मैं अपना एक वादा पूरा करूं, शीरी-फरहाद की प्रेम कहानी सुनाने का वादा।

     यदि इस कहानी को कुछ देर के लिए सच मान लिया जाय तो यह कहानी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। लोग अक्सर इन प्रेम कहानियों की रूमानियत को बरकरार रखने के लिए उन तथ्यों को बाहर निकाल कर फेंक देते हैं जो हमारे लिए शिक्षाप्रद हो सकती हैं। लोग अक्सर यही समझते हैं, और उन्हें यही बताया जाता है कि फरहाद शीरीं को पहले से चाहता था। जबकि यह सही नहीं है। शीरीं से उसकी पहली मुलाकात उसकी शादी के बाद ही हुई थी।

    आर्मेनिया के बादशाह की बेटी शीरीं जो बेहद ही खूबसूरत और कला से मोहब्बत रखने वाली एक भावुक लड़की थी, उस पर ईरान का बादशाह खुसरो सम्मोहित हुआ। उसने शीरीं से विवाह करने की इच्छा जाहिर की। शीरीं को मालूम था कि उसके इंकार करने का नतीजा क्या होगा। बादशाह किस हद तक जा सकता है। तब उसने अपनी सुंदरता को लोक हित के लिए समर्पित कर दिया। शीरीं ने खुसरो का ये प्रस्ताव मान लिया। लेकिन उसके सामने लोकहित में एक शर्त रखी.अगर खुसरो पर्शिया के लोगों के लिए दुर्गम पहाड़ियों के बीच से दूध की नहर बनवाते हैं तो वह उनसे शादी करने को तैयार है. खुसरो ने यह शर्त स्वीकार कर लिया। इसके बाद ही शीरीं ने खुसरो से शादी की थी।

     नहर खुदवाने का काम खुसरो ने फरहाद नाम के एक इंजीनियर को दिया. जो वास्तव में एक इंजीनियर नहीं शिल्पकार था। जिसने एक से बढ़कर एक बेहतरीन नक्काशी की थी, मूर्तियां बनाई थीं। पहाड़ियां दुर्गम थी, उनके पत्थरों को काटकर नहर निकालना एक चुनौती भरा काम था। जिसे एक बुद्धिमान और कुशल शिल्पी की देख-रेखा में ही किया जा सकता था।

     बादशाह ने फरहाद को बुलवा कर शीरीं से मिलवाया ताकि उसकी सलाह पर फरहाद नहर की खुदाई करवा सके. तब खुसरो को कहां मालूम था कि वह अपनी पत्नी की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करवा रहा है जो सिर्फ पत्थरों को काटकर नहर ही नहीं निकल सकता बल्कि पत्थरों को तराश कर उन्हें शक्ल भी दे सकता है। कला से मोहब्बत करने वाली शीरीं की मुलाकात एक ऐसे कलाकार से हुई जो उसके लिए नहर का काम करने के लिए भी तैयार हो गया। वहीं फरहाद की मुलाकात एक ऐसी खूबसूरत और जहीन लड़की से हुई जिसने लोकहित के बारे में सोचा था। इसलिए कभी अपनी शादी की एक ही शर्त रखी। 

      क्योंकि वह जानती थी की एक बादशाह ही वे साधन जुटा सकता है और इस कार्य को पूर्ण करने का जरिया बन सकता है। नहीं तो, यदि शीरीं को दौलत से मोहब्बत होती तो उसे कौन-सा पानी या दूध की कमी होने वाली थी, जो इस तरह की शर्त रखती ? इस तरह फरहाद शीरीं की खूबसूरती के साथ उसकी सोच से भी प्रभावित हुआ था और उसने इस लोकहित में शीरीं का पूरा साथ देने का फैसला लिया। लेकिन वह वास्तव में था तो एक कलाकार ही न ? उसने शीरीं की मूर्ति केवल अपने दिल में ही स्थपित नहीं की, बल्कि दुनिया के सामने भी प्रस्तुत कर दी। क्या गलत किया उसने ? 

   बस यही बात तो शीरीं के दिल को छू गई होगी, तभी तो उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ फरहद से मोहब्बत की। फरहाद ने शीरीं के लिए असंभव से लग रहे काम को पूरा किया। मैं नहीं मानती कि उसने कोई दूध की नहर निकाली होगी लेकिन ईरान में उस समय पानी की उपलब्धता किसी दूध से कम नहीं थी। इसलिए उस स्थान, समय और परिवेश में दूध को पानी का पर्यायवाची माना जा सकता है। उसका पति अर्थात खुसरो बादशाह था। उसके अहंकार को चोट लगी कि कैसे उसकी पत्नी एक मजदूर से मोहब्बत कर सकती है ?

     यदि उसने शीरीं की नजरों से ही फरहद को देखा होता तो उसे भी मजदूर के अंदर एक कलाकार नजर आता। कहानी का अंत भावुकता में हुआ। धूर्त और चालाक लोग जो हमेशा से एक अच्छे इंसान के साथ करते आए हैं, वही खुसरो ने फरहद के साथ किया। शीरीं की मृत्यु की झूठी खबर उस तक पहुंचा दी गई और जिसका परिणाम था फरहद की आत्महत्या। अपराध किसी और ने किया और अपराधबोध से ग्रस्त हो शीरीं ने भी स्वयं की हत्या की। 

   तो ? अब सच कहना, तुमने भी फरहाद की तरह मेरे दिल-ओ-दिमाग में चल रही कशमकश को पढ़ न लिया था ? तुम अच्छी तरह समझ चुके थे मेरे लिए वह लोकहित मेरे बाबा थे। तभी तो जाते-जाते अपने पूछे गए सवाल का जवाब तुम खुद ही दे गए। क्या कहा था तुमने,  "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है..."

    यदि तुमने जान लिया था कि मैं सत्य से प्यार नहीं करती तो फिर तुम किस प्यार की बात कर रहे थे ? तुमने ऐसा क्यो कहा, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका..."

     ऊपर और अंतिम के ये शब्द, "... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा...", मुझे गुमराह करने के लिए था न, ताकि मैं तुम्हारे कहे के अर्थ तक न पहुंच सकूं...? इन्हीं में उलझा के रह जाऊं...? तुम तो सिर्फ मुझसे इतना कहना चाहते थे, "...और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका...", यहां पर प्रेम का कोई क्रम नहीं था। है न ? लेकिन शायद तुम भूल गए कि लिटरेचर जैसी जिंदगी तुम जरूर जी रहे थे लेकिन उस लिटरेचर को तो पढ़ मैं रही थी। तो फिर कैसे न समझ पाती ?

   इसीलिए मैंने तुमसे चलती हुई राहों में कभी कहा था कि तुम किसी शीरी के फरहाद मत बनना। भावुकता में आ कर कोई भी फैसला मत लेना। सामने वाले को अपने जैसा समझने कि भूल मत करना। पूरी दुनिया तुम जैसी नहीं है मेरे दोस्त ! लालच, प्रपंच और षड्यंत्र से भरी पड़ी है यह दुनिया। 

    ये कहानी तुमसे क्यों कही ? पहली वजह तो तुम समझ ही गए होगे, दूसरी मैं अब लिखती हूँ। तो जान लो मैं तुम्हारे जीवन की वही शीरीं हूँ। तथाकथित वैवाहिक संबंधों में रहते हुए तुमसे मोहब्बत की, उतनी ही तीव्रता से जितनी तीव्रता से तुमने की, और फिर तुम्हें अपनी नजरों के सामने ही मर जाने दिया तो अपराध बोध तो जागृत होगा न ? आखिर तुम्हारी हत्या करने वाले लोग कौन थे, जिन्हें मैंने अपना माना था, तो फिर मैं दोष-मुक्त कैसे हुई ? 

     तब खुद के होने से घृणा होने लगी। क्या मतलब प्यार की देवी बने रहने का। क्या अर्थ रह जाता है इन ऊंचाइयों का जहां अब तुम ही नहीं। उसी पल से मैंने अपनी उन्नति नहीं अवनति के बारे में सोचना शुरु किया। फैसला लिया खुद को मार लेने का। जिसकी शुरुआत थी प्यार की उस सीढ़ी से उतरना, जिसके एक-एक पायदान को चढ़ कर हम इन ऊंचाइयों तक कभी पहुंचे थे। धीरे-धीरे मुझे यह भी विश्वास हो चला कि जिस वादे को निभाने के लिए तुमने मुझे छोड़ा यदि मैं उसे पूरा करूं लूं तो मैं भी सीढ़ी के आखिरी पायदान पर पहुंच जाऊंगी, जहां तुम फिर से मिल जाओगे। जब तुम पर आया क्रोध शांत हुआ तब मुझे तुम्हारी रिस्पेक्ट, एडजेस्टमेंट और रिस्पॉन्सिबिलिटी वाली थ्योरी याद आई। तब पति-पत्नी के इस अधूरे रिश्ते को मैंने पूर्ण करने का फैसला लिया, वह था सत्य को स-शरीर अंगीकार कर उसे अपने पति का दर्जा देना...

     इसी तरह जाड़ों के शुरुआत के ही दिन थे जब मैंने इसी अटारी को अपने मन मुताबिक सजाया। मन के लाखों अरमानो को सुहागसेज में बिखेर दिया। खुद भी दुल्हन की तरह सजी, गुलाबी साड़ी पहनी, माथे में सिंदूर लगाया और समय आने पर स्वयं को सत्य की बाहों के हवाले कर दिया। वह खुश था, उसने समझा होगा कि मैं अब उससे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा, क्यों...?

    मैं थी और सत्य था। केवल हम दोनों थे। उसकी बातें, उसकी हर एक छुअन मुझे उत्तेजित कर रही थी। सब कुछ उसी तरह हो रहा था, शायद जैसे एक नव-विवाहिता के जीवन में होता होगा। नई उमंग, नई चाहते, नए सपने, सभी कुछ जीवन में नया महसूस हो रहा था। हैरान थी, क्या यह वही सत्य है, जिसे अभी तक मैंने केवल अपना मित्र माना था, कभी-कभी जिसकी बाहों में सर रखकर मैं बेखबर सोया करती थी ? और बाद में जिससे हजार शिकायतें हुईं; घृणा के हद तक नफरत भी इस मन में पैदा हुई; तो उस दिन उसकी छुअन में जो मैं महसूस कर रही थी, वह क्या था ? सामंजस्य, समझौता या फिर जिस्म की परिभाषा ?

     कामोंत्तेजित शारीरिक सुख प्राप्त करने का क्षणिक सुख का एहसास भी अलग ही होता है मेरे दोस्त ! जहां इंसान दुनिया की सारी फिलासफी, सुख-दुख, दर्द, मोह, माया, बंधन, सभी भूल कर उस सुख की अनुभूति करता है। सच लिखती हूँ, उन पलों में, मैं तुम्हें भी भूल गई। लेकिन क्या पता था इस शारीरिक सुख को प्राप्त करने के सफर की शुरुआत जितनी महीन और नाजुक होगी, उसका अंत उतने ही तेज धमाके के साथ होगा...?

     वही सब कुछ मेरे साथ हुआ। चरमोत्कर्ष के बिंदु पर पहुंचकर मेरे मानस पटल के वृहद आकाश में एक धमाका हुआ। आसमान तेज रोशनी से भर गया। इस धमाके से असंख्य सितारे एक-एक कर बिखरते चले गए। इनमें से बेहद चमकदार सितारे धीरे-धीरे फिर इकट्ठा हुए। उनसे एक तस्वीर बनी, और फिर जो एक चेहरा उभर कर सामने आया उसे देख कर मेरे हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, शरीर बेजान-सा हो गया। 

     शेष बचे हुए सितारे टूट-टूट कर मेरी आंखों में ही समाते चले गए। मैने अपनी आँखें मूंद ली, बेजान जिस्म लिए पड़ी रही। कुछ क्षण बाद जब आंखे खोली तो वही सितारे मोती बन मेरी आंखों में चमक उठे। मेरे आंसुओं को देख सत्य ने सहानुभुति से मुझे खुद से लिपटा लिया, "सॉरी... फर्स्ट टाइम है न..."

     बस, उसी पल से मैने कुछ भी सोचना बंद कर दिया। तुम कब याद आए कब नहीं, अब नहीं लिख सकती। बस इतना लिखती हूँ, तुम्हारी तरह स्वीकार करने की हिम्मत अब शायद मुझ में भी आ चुकी है। कष्ट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, पीड़ा होती है। और यही पीड़ा जब सहनशक्ति से बाहर हो जाती है, तो इंसान चीखता है, चिल्लाता है, आंसू बहाता है या फिर बिल्कुल गुमसुम हो जाता है। उस दिन सोचा था कि मेरे पास तुम्हारी ऐसी कौन-सी धरोहर थी जिसके लुट जाने का मैं शोक मना रही हूँ ?  जिसकी चुभन और दर्द को महसूस कर मेरी आंखों में आंसू आ रहे है ? फिर भी आ रहे थे न ? क्यों ? 

     सच लिखती हूँ, उस रात का मन में कोई पछतावा नहीं, लेकिन कोई सुखद अनुभूति या सुनहरी यादें भी नहीं। क्यों ? क्या इसलिए कि जिससे मन मिले यदि उसी से शरीर भी मिले तो वो पल अविश्वमर्णीय होते हैं। यहां तुम्हारा सिद्धांत सही साबित नहीं हुआ या फिर यह समझ लो सिद्धांत अधूरा था। 

    काश ! उस दिन तुमने यह भी बताया होता कि इस सिद्धांत से अंतर्मन में स्थापित हो चुके प्रेम को किसी भी रिश्ते से विस्थापित नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत तो उनके लिए सही हो सकता है, जिन्हें पहले किसी से प्रेम हुआ ही न हो। शरीर के चौबीस आयामों में स्पंदित हो चुके प्रेम को भला कौन सा सिद्धांत विस्थापित कर सका है ? अब तो जितनी भी जिंदगी बची थी उसे जीनी नहीं गुजारनी थी, और मैंने तो इसके लिए भी अपने आप को तैयार कर लिया था, लेकिन अब किसके साथ...

   बाद में मुझे यह भी समझ में आया कि उस दिन तुम प्रेम की सीढ़ी उतर कर भी मुझसे कहीं ऊंचे पायदान पर पहुंच गए थे। तुमने केवल सत्य और बाबा के लिए ही मेरा त्याग नहीं किया था, बल्कि वह त्याग मेरे लिए भी था। मैं चाहती तो तुम्हें रोक सकती थी, किंतु मौन रह गई। तुमने उस मौन को स्वीकार किया, सत्य के रूप में बाबा को बेहतर विकल्प देकर चले गए। मुझे किसी भी दुविधा में नहीं पड़ने दिया। सीढ़ी उतरते समय पीछे से मेरी सिसकिया सुन तुम कुछ पल के लिए रुके, फिर अपनी पीठ और सर दिवाल से टीका, कस कर अपनी आँखें बंद कर मुझसे जो कहा वे शब्द मुझे आज भी याद हैं, ""पीहू ! ... मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", उस समय न तो मेरी तरफ तुमने देखा और न ही मेरी तरफ हाथ बढ़ाया। तुम नहीं चाहते थे न कि मैं किसी द्वंद्व में पड़ कमजोर हो जाऊं...? और अंत में जाते-जाते मुझे निर्दोष भी साबित कर गए।

   कहते हैं, दो इंसानों की तुलना आपस में नहीं करनी चाहिए, लेकिन अब यह गुस्ताखी मुझे कर लेने दो। एक मुझसे सर्वस्व पा कर भी बेचैन था, अभी भी मुझसे और भी बहुत कुछ पाना चाहता था, तभी तो मुझे कस कर बंधनों में बांधना चाहा, लेकिन बांध नहीं पाया। प्रतिपल छटपटाता रहा। वहीं दूसरी तरफ तुम !! छोटी सी उम्र में एक नहीं दो बार अपने प्रिय का त्याग कर शांत और स्थिर मन से चले गए... और ऐसे गए कि फिर लौट कर न आए। क्या सचमुच त्याग में इतना सुख मिलता है ? 

   अब मेरी जिंदगी एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहां मुझे अपने शरीर से कोई मोह नहीं रह गया था। कौमार्य एक बार लुटाओ या फिर हजार बार, क्या फर्क पड़ता था। फिर मैंने सत्य को रोकने की कोशिश कभी नहीं की। उसने जब चाहा तब खुद को उसकी बाहों में समर्पित किया। और जब कभी उसने नहीं चाहा तो फिर मैंने चाहा। 

     अदब लब्जो को एक किनारे रख सामान्य शब्दों में लिखूं तो उन दिनों मैने खूब मजे लूटे, है न ? आखिर सत्य ने बाबा की बड़ी सेवा की और घर में कैद एक लड़की के जीवन में पल दो पल की खुशियां लेकर आया। इन सब का आखिर उसे कुछ तो प्रतिफल मिलना चाहिए, यह हक था उसका, जो दिया ? या फिर मैने तुम्हारे साथ चीटिंग की ? प्यार का ढोंग तुमसे करती रही और अंत में शादी की, अपना तन सौंपा भी तो उस व्यक्ति को जिससे कोई मोहब्बत न थी ? यदि तुम ऐसा सोचते हो तो फिर गलत सोचते हो। आओ जान लो उसके आगे का सच, मैंने तो बदला लिया था। सत्य से, बाबा से, तुमसे और सच पूछो तो सबसे बड़ा बदला स्वयं से था।

     जिसे मन दिया उसे तन से अपना न बना पाई, और जिसे शरीर दिया उसे कभी हृदय और मन से न अपना सकी। कामवासना की आग में हर दिन तुम्हारी यादों को जलाती, जब वह आग ठंडी हो जाती तो उन्हीं यादों की बची हुई ताजा गर्म राख को पूरे शरीर पर लपेट लेती। हर अंत में एक तस्वीर बनती और फिर मेरे आंसुओं से घुल भी जाती। चलो इसी बहाने ही सही, तुम दिख तो जाते थे।  मेरा हृदय रोता, मन रोता, अंतर्मन चीखता। इस दर्द को सहन करना मेरे लिए कितना मुश्किल रहा होगा, कभी सोचना ? यह था खुद से बदला लेना। तुम्हे न रोक पाने का बदला। 

     अब जरा अपनी नाइटेंगल वाली कहानी याद करो। राजा के सामने उसका प्यारा बुलबुल अपने साथी को प्रतिपल याद करता, उसने राजा को गीत सुनना भी बंद कर दिया कैसा लगाता रहा होगा राजा को ? और एक रात उसी साथी को याद करते-करते मर भी गया और वह कुछ न कर सका। कैसा महसूस हुआ होगा उसे ? यह मेरा सत्य से बदला था। सही व्यक्ति से सही सवाल न पूछने का बदला। उसे तो मुझसे पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार था कि नहीं। लेकिन यदि कभी यही सवाल वह तुमसे पूछे तो इसका जवाब तुम जरूर देना, क्योंकि तुम किसी शीरी के फरहाद नहीं।

      यद्यपि बुलबुल की मृत्यु महात्माजी के सामने न हुई लेकिन जब कभी भी उसकी मृत्यु की खबर उन तक पहुंची होगी तो उन पर क्या गुजरी होगी ? यह था बाबा से बदला। साथी बुलबुल को राजमहल से दूर करने का बदला। मुझसे अथाह प्रेम रखने के बावजूद उस पर विश्वास न करने का बदला। मेरे जिंदगी के फैसले में खुद मुझे शामिल न करने का बदला। 

     यदि कभी साथी बुलबुल लौट कर राजमहल आया होगा और उसने पिजड़े में कैद बुलबुल की दर्दनाक मृत्यु को जाना होगा, तब उसके मन में कैसी पीड़ा उठी होगी ? उसे तुम महसूस करना। यह रहा तुमसे बदला। इन तीन वर्षों में कभी भी लौट के न आने का बदला। जानती हूँ भूले नहीं होगे मुझे, लेकिन मैं तुम्हें भूल जाऊं इस बात के लिए मुझे मजबूर करने का बदला। जरा सोचना, एक लड़की ने अपने परिवार के चाहने पर तुम्हार त्याग किया, और तुमने बाबा के चाहने पर मेरा। क्या फर्क रह गया तुम दोनों में ? वैसी भी मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर तुम्हारी नाइटिंगेल की कहानी मेरे न रहने पर ही पूरी होती है न ?

    एकदिन तुम भी मेरी तरह तड़पोगे, तुम्हारा मन भी रोएगा, अंतर्रात्मा चीखेगी लेकिन तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे। जब दर्द की इन्तहा हो जाएगी तो तुम्हारे होठों में एक फीकी मुस्कान आएगी। हंसते-मुस्कुराते तुम्हारी आंखों में आंसू आयेंगे। 

   अब मैं अपनी कहती हूँ, मन में एक ही लालच था कि कभी न कभी तो मैं सीढ़ी के उस आखिरी पायदान तक पहुंचूंगी जहां पर शायद तुम खड़े मिलोगे। 

   याद करो पहला दिन जब तुम पहली बार इस अटारी में आए थे। डिनर के बाद सत्य चला गया और मैं अटारी में ही अपनी बुक को सलीके से कैटिगरीवाइज़ जमा रही थी, और तुम खिड़की की छड़ पकड़े कभी बाहर तो कभी मेरी तरफ देखते। मैने तुम्हारे बिस्तर को ठीक किया और तुम्हारी ही दी हुई पोएट्री बुक को लिए हुए सीढ़ी उतर रही थी। याद आया ? तो फिर उसके आगे की मैं कहती हूँ, सीढ़ी के आखिरी पायदान में मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई दी, जैसे तुमने पीछे से मेरा नाम ले कर मुझे धीरे से पुकारा हो। तुम्हारी आवाज की वह कशिश वह अपनत्व मेरे शरीर, मेरी अंतरात्मा को झंकृत कर गई। मैं तुम्हारी तरफ पलटी तो देखा तुम मुझे एकटक देख रहे हो, मैं भी तुम्हे उसी तरह देखती कुछ देर तक खड़ी रही कि शायद तुम कुछ कहोगे। लेकिन तुम खामोश थे, मैं पूछना चाहती थी, क्यूं पुकारा मुझे ? लेकिन मेरे मुख से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। तब पता चला कि तुम्हारी पुकार मेरे मन का भ्रम है, यदि तुमने पुकारा होता तो कुछ कहते न ? और यह भ्रम केवल उस दिन नहीं कई बार हुआ। जब तुम थे तब भी और आज जब तुम मेरे पास नहीं हो तब भी।

    मैं कभी-कभी एक संभावना में जीती हूँ, जो पूरी हो सकती थी लेकिन न हुई। नहीं... नहीं... गलत लिख गई, जो मैं पूरी कर सकती थी लेकिन नहीं की।
एक सुखद स्वप्न जिसमें मैं और तुम, दो नहीं एक होते हैं। काश ! जिस दिन तुम जा रहे थे, तुमसे सब कुछ सच-सच बता देती। और तुमसे कहती कि मैं कोई सर्जरी नहीं करवाऊंगी, बस जितने दिन हूँ, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। फिर जल्द ही तुमसे विवाह भी करती। 

     तुम्हारे नाम की माथे में बिंदिया होती। गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर होता। हम मन, वचन और कर्म से एकदूसरे के होते, हमारी जायज़ संतान होती। और इस तरह आज हम दोनों सुखी वैवाहिक जीवन जी रहे होते। मैं तुम्हें लेडी नॉर्टन, कीट्स, शेली की पोयम सुनाती और तुम्हारी कहानियों को पढ़ती।

    तुम्हारे साथ मैं भी कुछ कविताएं लिखती। तब हमारा जीवन कितना उल्लासित और हर्षित होता। जीवन जीने के प्रति मेरे मन में भी चाहत होती। तब शायद इतनी जल्दी मैं मृत्यु के इतने करीब न होती, और जब कभी इस दुनिया को अलविदा कहती भी, तो हमारा अंश तुम्हारे पास होता।

    मैं यह सब इसलिए लिख रह हूँ, ताकि तुम जान जाओ की सत्य से विवाह न करने की एकमात्र वजह यह नहीं थी कि मैं दो-चार वर्ष की मेहमान थी। बात प्राथमिकता की थी और यह बात मैंने तुमसे ही सीखी। याद करो आखिरी दिन जब तुमने मुझसे कहा था कि तुम मुझे जिस रूप में रखना चाहो मैं रहने के लिए तैयार हूँ, यही बात जाते-जाते तुम बाबा से कह कर गए थे। तुम्हारे लिए प्राथमिक मैं थी, न की कोई रिश्ता। और यह बात तुमने अपने जीवन में पहली बार प्रमाणित नहीं की, इससे पहले भी कर चुके थे। शायद यही वजह है कि उस लड़की की शादी हो जाने के बाद भी तुमने उस पर कोई इल्जाम नहीं लगाया, उसे बेवफा नहीं समझा। क्योंकि उसका प्रेम तुम्हारे जीवन में प्राथमिक था, रिश्ता नहीं। जो नहीं बन पाया तो क्या हुआ ?

   इसी तरह तुम मेरे जीवन में प्रथम स्थान रखते थे। तुम्हें अपने पास रखने के लिए मुझे जो भी कीमत चुकानी पड़ती, मैं चुकाती। चाहे वह कीमत विवाह होती या विवाह पूर्व ही तुम्हे तन सौंप सत्य को यह एहसास दिलाना कि मैं उसकी कभी थी ही नहीं, या फिर बाबा के सम्मुख याचक बन तुम्हे मांग लेना या फिर ध्रुव भैया को बुला कर उनसे अपनी राखी के प्रतिदान के रूप में अपना साथ देने को कहना। सच मानो मैं यह सभी कर्म करती, यदि उस शाम हिम्मत जुटा कर तुम्हे रोक लेती। और तुम ? यह जान कर भी कि मेरे न रहने पर तुम्हें इससे भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, मेरी यादों के सहारे जिंदगी जीने की कीमत !! लेकिन वह तुम चुकाते। क्योंकि हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते थे तो यह कर सकते थे। 

   मेरी यह कहानी पढ़ कर लोग मुझे चरित्रहीन और उच्चश्रृंखल प्रवृत्ति की लड़की का खिताब दे सकते हैं, तो फिर उन्हें दे लेने देना। तुम बुरा मत मानना। यह सच है कि मैंने शुरू में सत्य के विवाह करने की इच्छा को यह कह कर टाल दिया था कि पहले हम एक दूसरे को समझते हैं, फिर विवाह भी कर लेंगे। लेकिन जब मुझे आभास हो गया कि किसी भी दृष्टिकोण से मुझे सत्य से प्रेम नहीं है। तो मैं उससे विवाह करने के लिए तैयार क्यों हो जाती ? उसके बाद उसने जितनी बार भी मुझसे यह इच्छा जाहिर की, मैंने उसे स्पष्ट शब्दों में मना ही किया। यहां तक की यह भी कहा कि तुम जहां चाहे, वहां विवाह कर सकते हो, मैं या मेरे बाबा रोक नहीं लगाएंगे। यदि तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो तो भी चले जाओ। यह बात स्पष्ट रूप से मैंने तुम्हारे आने के तीन दिन पहले उस रात भी कही थी जिस रात मैने तुम्हारा स्वप्न देखा था। लेकिन वही बात को टाल गया तो मैं क्या करती। क्या उसे अपमानित करके यहां से भगा देती ? मैंने उस पर कोई बंदिश नहीं लगाई। न ही भावुकता में आकर मैंने उससे कोई वादा किया था और न ही मैंने कोई इमोशनल ड्रामा या ब्लैकमेल किया। 

     इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि मैंने हमेशा विवाह से इंकार ही किया ताकि वह किसी भी बंधन में न बंधे, हमेशा मुक्त रहे। तब भी वह तीन साल तक मेरे पास रहा, क्यों ? और आज मैंने ऐसी कौन सी नई बात कह दी कि वह चला गया ? उस नादान को कम से कम यह तो समझना चाहिए था कि पूरे गांव में वह मेरे पति की हैसियत से ही पहचाना जाने लगा था। बाबा हों या चाहे ध्रुव भैया हो, उसे सभी इसी रिश्ते से जानते थे। और अंत में मैंने शरीर सौंप कर उसे यह एहसास दिलाया कि अब मैं तुम्हें छोड़कर कहां जा सकती हूँ ? जिसने यह भी न सोचा हो कि लगातार दस-बारह दिनों तक जिसके साथ सेक्स किया वह प्रेग्नेंट भी हो सकती है, फिर भी वह छोड़ कर गया। यह जानते हुए भी की मंगल और कमली के सिवा इस सूनसान घर में मेरे लिए और कोई नहीं है ? मैं आज तक यह नहीं समझ पाई कि उसके जाने की वजह क्या थी। मुझसे अपमानित होना ? या फिर अपनी अहमियत सिद्ध करना ? या फिर तुम ? या फिर उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ?

    मंगल बिना बताए उसे लेने के लिए उसके घर गया। कमली से मुझे बाद में मालूम पड़ा। यदि मेरे सामने जाता तो मैं उसे कभी न जाने देती। मैं अब तो ईश्वर से प्रार्थना भी करती हूँ कि उसके आने से पहले ही मुझे इस शरीर से मुक्ति मिले। लेकिन उसके आने के पहले तक के लिए भी क्यों सोचूं ? मैं तो चाहूंगी कि यह पत्र समाप्त होते ही, मैं इस दुनिया को अलविदा कह दूं। क्रोध की पराकाष्ठा घृणा होती है। पहले सत्य पर क्रोध आया और वह क्रोध जब अपनी चरम सीमा को पार कर गया तो घृणा में बदल गया।

   आश्चर्य हो रहा है न ? तो इसका कारण ऊपर के संभावित सवाल में है। जिनका उत्तर निचले क्रम से मैं दे रही हूँ।

    उसका अहंकार की अब मैं जाऊंगी ही कहां ? बिल्कुल उसकी यह सोच सही है। जब मेरे अपने लोग और आसपास के लोग उसे मेरे पति के रूप में उसे स्वीकार कर चुके थे तो उसका यह सोचना वाजिब है। लेकिन मेरा शरीर पा लेने के बाद, उसका चले जाना, उसके प्रति उत्पन्न होने वाली घृणा का प्रमुख कारण है। 

    या फिर तुम ? नहीं बिल्कुल नहीं। तुम्हें गए तो तीन साल होने को हैं। यदि इसी कारण से उसे दूरी बनानी थी तो कब का बन चुका होता। मुझे तुम्हारी टीशर्ट पहने हुए देखना और फिर मेरी डायमंड रिंग को इंगेजमेंट फिंगर में पहने हुए देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। और फिर मेरी बातें जिसमें अक्सर तुम होते थे उसे सुनना, मेरी आंखों में तुम्हारे लिए बेशुमार मोहब्बत देखना उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। इन सबके बावजूद वह तीन साल तक मेरे साथ रहा तो क्यों ? वास्तव में उसे मैं नहीं बल्कि उसे मेरे पति-पत्नी का रिश्ता चाहिए था। क्यों ? यह उसका मेरे प्रति मोह था या फिर कोई और लालच ? 

    अपनी अहमियत सिद्ध करना ? बिल्कुल हो सकता है। बाबा के जाने के बाद वह इस घर में मालिक की तरह रहा। उसने सोचा होगा चलो अब मैं देखता हूँ कि ये सब अकेले तुम कितना और कैसे मैनेज करती हो ? एक न एक दिन या तो बुलवाओगी या खुद मनाने आओगी। 

   मुझसे अपमानित होना ? नहीं, यदि विवाह से इंकार करना ही उसे अपना अपमान लगा तो यह तो मैं कई बार कर चुकी थी। 

     तुमने सच कहा था, कुछ गुनाहों की मुआफी नहीं होती, क्योंकि वे गुनाह, गुनाह नहीं, गुनाह-ए-अजीम होते हैं। उनकी सिर्फ सजा मिलती हैं। उसे भी जिसने गुनाह किया है और उसे भी जिसके प्रति गुनाह हुआ है। तुम्हारे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम्हें जाने दिया, मेरे प्रति प्रेम होने के बावजूद तुम फिर लौट के न आए। यह गुनाह हम दोनों से हुआ, तो फिर सजा मिलना तो तय था और मिली। खुद को सजा दे कर मैने अपराधबोध से मुक्ति पा ली और तुम्हें सजा दे कर तुम्हें किसी भी पछतावे से मुक्त कर दिया। सत्य मेरे द्वारा दी गई सजा से मुक्ति के लिए तड़पेगा। उसकी पत्नी होने के नाते यह अधिकार में तुम्हें देता हूँ कि उसे मुक्ति मिलनी चाहिए या नहीं। 

      इसीलिए मैंने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर उसे पत्र में लिखा है कि जब तक तुम यहां एकबार नहीं आ जाते मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी। जब तक तुम एक बार यहां ना आ जाओ तुम अटारी में रखी मेरी बुक्स को वह किसी स्कूल या लाइब्रेरी को दान न करें। यह काम तुम करोगे। इसके लिए मैंने उसके उस बच्चों की सौगंध दी जो इस दुनिया में आने से पूर्व ही अपनी मां के साथ काल के गर्त में समा जाएगा। पहली बार मैंने उसका भावनात्मक उपयोग किया, ताकि तुम एक बार यहां आ सको। इस पत्र को पढ़ सको और अपनी अमानत माइलस्टोन के लिए लिखी गई कविताएं ले जा सको।

      कभी सोचती हूँ, आध्यात्मिक प्रेम में शरीर का भला क्या महत्व, वह तो इससे परे होता है न ? कभी उसके विवाह को देख फिर मेरा त्याग कर तुम शरीर के मोह से मुक्त हुए और अब मैं भी हो गई। हम दोनों अब एक ही धरातल पर खड़े हैं, इसलिए लिखती हूँ कि अब इस शरीर का त्याग करने पर भी मुझे कोई कष्ट नहीं होगा।

   अब भी तुम्हारी इस टी-शर्ट में मेरी जान बसती है। उसे ही बार-बार पहनने का मन करता है, लेकिन थोड़ी देर में उतार कर अच्छे से सहेज के फिर से रख देती हूँ कि कहीं जल्दी पुरानी न हो जाए... उधड़ न जाए या फट न जाए।

      मुझे ऐसा क्यूं महसूस होता है कि जब तक तुम्हारी ये टी-शर्ट मेरे पास है, तुम मेरे पास न होकर भी मेरे पास ही रहोगे ? क्यूं महसूस होता है कि जैसे मेरे जीवन का और शायद उसके बाद का भी अस्तित्व इसी के जुड़ गया है ?  क्यूं जब भी इसे पहनती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि तुम मेरी रूह के साथ मेरे जिस्म से भी लिपट गए हो ? क्यूं जितनी बार भी इसे धुलती हूँ तो तुम्हारे परफ्यूम की खुशबू फिर से एक नए अंदाज में महक उठती है, और मेरे वजूद के हर हिस्से में समाती चली जाती है ?

   अब क्यूं अक्सर खुद से पूछती हूँ कि टाइम कितना हो गया होगा ? और उसके जवाब की तलाश में सोती हुई रात में अपने बेडरुम से बाहर निकल आंगन में आ कर खड़ी हो जाती हूँ, और फिर आसमां में चांद सितारों की पोजीशन को देख अनुमान लगाने की कोशिश करती हूँ।

    शायद उस दिन तुमने ठीक कहा था कि कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं, जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। क्या वही काम मैने खुद स्वयं के लिए किया...? नहीं, बाबा के लिए भले ही सत्य बेहतर विकल्प रहा हो लेकिन मेरे लिए तो तुम ही थे, जिसके साथ हंसी-खुशी जितनी भी जिंदगी बची थी, जी कर मैं चली जाती। तुमसे झूठ बोल सकती थी कि मुझे भी पहले कुछ नहीं मालूम था। पीछे रह जाते तुम, तब तुम मुझसे कोई सवाल या कोई शिकायत नहीं कर पाते। 

   सही लिखा न ? तुम तो पहले से ही बिखरे हुए मुझ तक पहुंचे थे। मैं पूरे मन योग से तुम्हें संवारती, अपने नजरिया से एकत्र करती और फिर एक दिन तुम्हें बिखेर, स्वयं चली जाती ? तो फिर बताओ तुम क्या करते ? जरा शांत मन से सोचना क्या त्याग सिर्फ तुमने किया ? सत्य ने मेरी अभिरुचियों का सम्मान जरूर किया लेकिन उसके साथ जुड़ न पाया। मैने जो बुक्स के नाम उसे लिख के दिए उसने ला के दी,  लेकिन मुझे याद नहीं आता कि कभी उसने कोई कहानी या कोई छोटी सी कविता ही मेरे साथ पढ़ी हो या उनके विषय में डिस्कसन किया हो। यदि मैने कभी करना भी चाहा तो यह कह के टाल गया, "छोड़ो यार ये सब बेकार की बाते हैं...", या फिर, "...मैं तुम जैसा समझदार नहीं हूँ..."

   धीरे-धीरे यह समाज और उसके रीति रिवाज मुझसे ऊपर नजर आए। मुझे वैवाहिक बंधनों में बांधने की चाहत इतनी प्रबल हो चुकी थी कि उसने कभी भी मेरे इंकार की वजह पूरी ईमानदारी के साथ जानने की जरूरत ही नहीं समझी। वह इसे बहुत ही कैजुअल लेता था। उसने धीरे-धीरे अपने मन में मेरा अक्स बॉम्बे में पली-बढ़ी एक खुली मिजाज की लड़की के रूप में स्थापित कर लिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं। उसने कभी भी पूरी ईमानदारी से मेरे साथ जुड़ने की  कोशिश ही नहीं की। यदि करता तो मेरी अभिरुचियों में ही मुझे समझ पाता। वह तो मांग और पूर्ति पर आधारित बाजार के सिद्धांत की तरह मुझे अपनाना चाहता था। कैसे कामयाब हो जाता ? 

   मैने दार्शनिक, पौराणिक, और आधुनिक सभी तरह के लिटरेचर पढ़ें, और सच पूछो तो बहुत पढ़े, लेकिन कभी लिख नहीं पाई। जब भी कुछ लिखने की कोशिश की तो यही सोचा न जाने कैसा लिखूं ? किसी को पसंद आएगा कि नहीं ? लेकिन उस दिन बगिया से लौटते समय मैने बड़ी हिम्मत करके तुम्हे अपने जीवन की पहली चार लाइन सुनाई थी, तुम्हे याद तो होगी न...?

  इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
  यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
  तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
  एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।

     और फिर तुम्हारा ये कहना, "... वाह ! काश मैने लिखा होता...", मेरे दिल को छू गया। यहां पर बात आत्मप्रशंसा के आत्मिक-सुख की नहीं थी। बात तो थी इनकरेज करने की, किसी को हिम्मत देने की। कभी सत्य मेरी अधूरी रह गई एजुकेशन को लेकर चिंतित था। वह चाहता था कि मैं उसे पूरा करूं और कंपटीशन एग्जाम की तैयारी करूं और अंत में सर्विस करूं। मैं नहीं कहती कि उसकी सोच गलत थी लेकिन उसकी इस सोच में मैं कहां थी ? उसने यह नहीं पूछा कि पीहू तुम क्या करना चाहती हो, तुम्हारी पसंद क्या है ? उसकी समझ में मेरे लिए जो बेहतर लगा उसी को पूरा करना चाहा। लेकिन तुम मेरी जिंदगी में मेरे पैरेंट्स के अलावा वह पहले इंसान थे जिसने मुझसे ये पूछा था। और आज देखो तो उसी का नतीजा है कि अधूरी ही सही एक पोयम लिखी और तुम्हें इतना लंबा पत्र लिख रही हूँ...

   इसीलिए लिखा कि तुम मेरे लिए बेहतर विकल्प थे और मेरा प्यार भी। मेरा तुम्हे प्यार करना उतना ही कुदरती था जैसे इंसान खुद से प्यार करता है। किसी के त्याग को मौन रह के स्वीकार कर लेना उससे भी बड़ा त्याग होता है। तो मेरे प्रियवर ! अपनी इच्छाओं का, अपने बेहतर विकल्प का, और अपने प्यार का  त्याग सिर्फ तुमने ही नहीं मैंने भी किया, और सच पूछो तो तुमसे कहीं अधिक किया। तुम्हारे लिए तड़पी, रोई, पागलों की तरह घंटों-घंटों बगिया में उसी आम के पेड़ के नीचे बैठी रही। ढलते हुई शाम को देख लेडी नॉर्टन की वही पोयम गुनगुनाती रही। जब थक जाती तो अपनी चुनरी ओढ़ के वहीं लेट जाती। कुछ लिखने की कोशिश करती फिर अधूरा छोड़ देती, किसके लिए लिखती ? अब तो कोई कहने वाला भी तो नहीं था,  "पीहू ! काश मैने लिखा होता..."

     ज्ञान भैया ने तुमसे कहा था न, कि कभी-कभी न कहने का दर्द कह देने के दर्द से कहीं अधिक होता है, तो उन्होंने सच ही कहा था। यह तो अच्छा हुआ कि आखिरी दिन ही सही, तुम्हारे साथ-साथ मैने भी अपने अंतर्मन के सच को स्वीकार कर लिया। कुछ तुमसे कह दिया, जो नहीं कह पाई तो इस पत्र में लिख दिया। आज सोचती हूँ, यदि न किया होता तो ? फिर तो तुम्हे पूरी किताब ही लिखनी पड़ती, है न ? 

   यदि ऐसा न होता तो आम के पेड़ की छांव में या फिर चलतो हुई राहों में तुम्हें कस कर गले न लगाया होता। आज भी उस आईने को मैंने सहेज कर न रखा होता जिसमें अंतिम बार तुम्हारी सूरत के साथ अपनी सूरत देखी थी। आज भी जब कभी उसमें अपनी सूरत देखती हूँ तो क्यों चुपके से तुम भी आ जाते हो ? और मैं महसूस करती हूँ कि जैसे मै तुम्हारे कंधे पर सर रख तुम्हे देख रही हूँ, तुम्हारे गाल को फिर से चूम रही हूँ। इन सभी पलों में मुझे समझ में आता है कि तुम मेरी जिंदगी में क्या मायने रखते थे... और आज भी रखते हो...

    तुम्हारे साथ मैने अपने जीवन के महज चार दिन ही तो जिए थे। उन चार दिनों में तुम्हारे साथ हंसी, रोई, तुम्हे गले लगाया, साथ में शराब पी, यहां तक कि सिगरेट पीने की कोशिश भी की। जो तुमने कहा, सुनती गई। वे सभी लम्हे मेरी निगाहों में आज भी कैद हैं। जहां जरूरत महसूस की तुम्हें डाटा भी, लेकिन कभी तुमसे नाराज नहीं हुई और न ही तुमसे रूठने का मन किया, क्यों ? शायद इसलिए कि लोगों को अक्सर कहते सुना है कि जिंदगी चार दिन की होती है, और यह चार दिन मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी। क्यों तुम्हारा मेरे साथ होना मेरे आध्यात्मिक प्रेम की परिभाषा पर भारी पड़ गया ?

      और इन सब का जवाब वही एक सवाल है, जो सत्य ने मुझसे कभी नहीं पूछा। उसे तो पूछना चाहिए था कि मुझे तुमसे प्यार हुआ था कि नहीं, लेकिन नहीं, उसने कभी नहीं पूछा, क्यों ? 

    कहते हैं यदि किसी के मन में और हृदय में किसी के लिए प्रेम हो तो वह आंखों से छलकता है, फिर वह जमाने से भी नहीं छुपता। तो फिर मैं यह कैसे मान लूं कि जिस प्रीत को मंगल और कमली ने हमारी आंखों में देखा, उस प्रीत को सत्य ने न देखा होगा ? तुम याद करो वह आखरी दिन जब हम बगिया से घर तक साथ चलते हुए आए थे। उस दिन मेरी इच्छा का सम्मान सत्य ने ही किया था और उसने मेरा फेवर लिया था। वास्तव में वह अपनी इसी शंका की पुष्ठि करना चाहता था। हम दोनों घर देर से पहुंचे और उसे अपनी शंका सही प्रतीत हुई। उसके मन में असुरक्षा की भावना जागी जिसका जिक्र उसने अपने सामने अपने ही तरीके से बाबा से किया। तो फिर जवाब मालूम होने के बाद भी सवाल कैसे पूछता ? वह जानता था कि यदि उसने पूछ लिया तो पीहू झूठ नहीं बोलेगी। तब उसकी सभी संभावनाएं समाप्त न हो जाती ? मैं चाहूं या न चाहूं, वह तो मुझसे शादी करना चाहता था न ?

     उसने मुझसे एक रिश्ता चाहा था तो उसे मिला। लेकिन तुमने जो चाहा तुम्हे न मिला, यानी मेरा साथ, मेरी नजदीकियां। रिश्ते नातों से दूर मेरे साथ जिंदगी को जीने की ख्वाहिश तुम्हारी पूरी न हुई। इसका दोषी भी मैं तुम्हें ही मानती हूँ। किसी को प्यार की उन ऊंचाइयों पर ले जाकर न खड़ा कर दो जहां वह देवी या देवता बनने के लिए मजबूर हो जाए और फिर उस तक पहुंचने के लिए तुम खुद ही तरस जाओ। नियति ने तो तुम्हे वो रांझणा बना के रख दिया जो हीर की चौखट में न तो हीर की भिक्षा मांग सकता था और न ही उसे छीन के ले जा सकता था। 

   कभी - कभी मेरे मन में एक सवाल उठता कि सत्य मेरे जीवन में क्यों आया जिसका जवाब आज मुझे मिल गया है। नियति हमें एक दूसरे से मिलना चाहती थी और कारण उसे बनाया। 

    तुम यहां पर दोबारा क्यों आए हो ? आए हो या लाए गए हो ? यदि सत्य तुम्हें यहां लेकर आया है तो क्यों ? यदि वह तुम्हारे साथ अटारी पर नहीं है तो क्यों ? और यह पत्र यदि तुम रात को अकेले पढ़ रहे हो तो क्यों ? यदि वही मौसम है जिस मौसम में हम पहली बार मिले थे, और बाहर चंद्रमा की मद्धिम रोशनी चारों तरफ फैली हुई है, तो क्यों ? ....

    अचानक पूरी अटारी में अंधेरा छा गया, शायद लाइट गुल हो गई थी। पत्र के इस भाग को पढ़ते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे पूरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गई... बाहर खिड़की से आता हुआ चंद्रमा का हल्का-हल्का प्रकाश, और मेरे दिमाग में गूंजता हुआ एक प्रश्न, "आखिर मैं यहां क्यों हूँ..."

    एक हाथ में पत्र लिए मैं बिस्तर पर निढाल लेट गया। मेरी आंखें बंद, दिल की धड़कने तेजी से चल रही थी। सत्य और पीहू दोनों का नजरिया और एकदूसरे के प्रति सोच मेरे सामने आ चुकी थी। सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित विवाह के लिए सत्य की मांग नाजायज नहीं थी। लेकिन नहीं, पीहू ने मौन रह के बाबा के कहे अनुसार न केवल अधमने मन से रिश्ते को स्वीकार किया बल्कि अपने आचरण से जाहिर भी किया। उसे बाबा से खुल कर बात करनी चाहिए थी।

     सत्य की गलती यह थी कि जिस पल पीहू ने सशरीर उसे स्वीकार किया तो सत्य को दृढ़ता के साथ मना करना चाहिए था कि नहीं पहले तुम मुझसे सामाजिक रूप से विवाह करो, फिर ये सब बाद में होगा। लेकिन उसने भी अपनी मौन स्वीकृति दी, तो फिर पीहू उसकी पत्नी हुई न ? और केवल दस बारह दिन के बाद ही उसे छोड़ के केवल इसलिए भाग जाना कि अब पीहू सामाजिक रूप से विवाह के लिए तैयार नहीं, मुझे कहीं से उचित नहीं लग रहा था। पीहू ने तो उससे कहा नहीं होगा कि आओ पहले सेक्स कर लेते हैं फिर सबके सामने शादी करेंगे। बाबा ने कन्यादान कर दिया और तुमने स्वीकार किया, पति-पत्नी की तरह रहे, और एकदिन उसे छोड़ कर भाग गए, जबकि वह अकेली थी, बाबा भी गुजर चुके थे, और तुमने इतना कठोर निर्णय ले लिया !! अरे भागना था तो उसी दिन भाग गए होते न जिस दिन बाबा ने कंयादान किया था, या फिर तब जब पीहू ने पहली बार शादी के लिए मना किया होगा।

      और इस कहानी में यदि मैं अपने आप को कटघरे में खड़ा करूं तो कैसे और क्यों ? किसी तीसरे व्यक्ति के रूप में मैं खुद को निरूपित करू तो क्यों और किस हद तक ? यदि पीहू से मेरे विचार, मेरी आदतें, मेरा दृष्टिकोण मैच कर गया, और हमें एक दूसरे से प्यार हो भी गया तो इससे किसी का क्या नुकसान हुआ ? क्या पीहू से मेरी मुलाकात न हुई होती तो वह सत्य से शादी करने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाती ? यदि हां, तो मुझसे मिलने से पहले भी वे दोनों चार महीने तक क्या कर रहे थे ? क्यों सत्य ने मुझसे कहा कि मैं पीहू को विवाह के लिए प्रेरित करूं... क्या सत्य को पूर्वानुमान हो चुका था कि पीहू के प्रेम के किसी भी खांचे में वह फिट नहीं बैठता है। मैंने तो ज्ञान से नहीं कहा था कि वह पीहू से मेरे बारे में बात करें और न ही उसने की, तो फिर ? जो भी बात की तो मेरी गुजरी जिंदगी के बारे में। जबकि उसके इस पत्र के अनुसार तब, जब वह प्यार की पहली सीढ़ी चढ़ चुकी थी। अधिक से अधिक ज्ञान से मेरे फैमिली बैकग्राउंड, मेरी प्रेमिका और आत्महत्या करने के प्रयास के बारे में जानकारी मिली होगी। इससे अधिक वह क्या बता सकता था ?

   अब सवाल यह नहीं है कि प्रेम क्या है, और क्यों होता है ? सवाल तो यह है कि किससे होता है या होगा। और शायद जिसका जवाब मैं पहले ही पीहू को दे भी चुका हूँ। नहीं तो और क्या कारण रहा होगा कि पीहू ने अपनी पूरी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मैने उसे। मुझसे ज्ञान में अधिक, लुक-वाइज और सुंदरता में मुझसे कहीं अधिक, यदि हमारे बीच कुछ मैच करता था तो वह था जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण अर्थात नजरिया, एकदूसरे की विचारधारा, अभिरुचि। एक साथ दिन भर रहने के बाद भी यही लगता कि अभी वक्त ही क्या हुआ है।

      हमने एक दूसरे को प्रभावित नहीं बल्कि चकित किया। अरे ! तुम भी यही सोचती हो ! वाह !! वंडरफुल !!! इस प्रेम में स्थिरता थी, सहजता थी। सोच में एक गहराई थी। दीवानगी सिर्फ इतनी थी कि हम एक दूसरे को दुःखी नहीं देख सकते थे। जब कभी मैं रोया तो उसने फौरन मुझे गले से लगा लिया, उसके रोने पर मैंने उसे गले लगा लिया, फिर हम दोनों ही एक दूसरे का दुःख महसूस कर रोए। कहना-सुनना बाद में होता रहा। बस यही तो हमने किया। नहीं तो कौन-सा हम दोनों ने चांद-सितारे तोड़कर एकदूसरे के हाथ में रख दिए ?

  मैं कुछ देर तक इन्हीं विचारों में खोया रहा। एकाएक मुझे आभास हुआ जैसे किसी ने मुझे पुकाईरा हो। कौन हो सकता है, शायद सत्य हो ? मै उठकर बैठ गया। मैंने कंफर्म करना चाहा, धीरे से पुकारा, "सत्य ..", लेकिन कोई जवाब न मिला।

    मैंने सोचा मेरा वहम होगा। मैं लेटने ही वाला था कि फिर किसी ने मुझे पुकारा इस बार की आवाज पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट थी।

   अब तक खिड़की से आते प्रकाश का मैं आदी हो गया था। मुझे अब अटारी में सब कुछ लगभग स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मैंने सीढ़ी के पास खड़े होकर नीचे झांक कर देखा, घुप अंधेरे के सिवा वहां भी कोई नहीं था । मैंने फिर भी कंफर्म करना चाहा, मैंने फिर धीरे से पुकारा "सत्य !..."

    लेकिन अचानक मेरे दिमाग में धमाका हुआ, आखिर मैं सत्य को पुकार ही क्यों रहा हूँ। जहां तक मुझे समझ में आ रहा था, दोनों बार की आवाज तो किसी लड़की की आवाज थी। अभी तक मेरा ध्यान क्यों न गया ? यही सब सोचते हुए मैं जैसे ही पलटा फिर से किसी ने मुझे पुकारा और इस बार की आवाज कुछ ऐसी थी जैसे किसी ने दूर से पुकारा हो। उस आवाज में अथाह करुणा थी।

     अगले ही पल मैंने खुद को खिड़की के पास खड़े हुए पाया। बाहर गौशाला, उसके सामने सड़क, सड़क के उस पार शीशम का पेड़, और उस पेड़ के नीचे खड़ी एक चमकदार परछाई।

    यदि कोई काल्पनिक कहानी लिख रहा होता तो निश्चित है यह सब मैं कभी नहीं लिखता। क्योंकि मैंने विज्ञान पढ़ा है, और जिसका प्रमाण नहीं, जो निराधार है, विज्ञान उसे नहीं मानता है। तो फिर मेरी कल्पना में भी उसका कोई स्थान नहीं होता। लेकिन यह कहानी तो मेरे जीवन का एक अंश है, और जिसे मैं घटते हुए देखा रहा था, महसूस कर रहा था और जिसका प्रमाण मेरे सामने, जीता-जागता खड़ा था। उसे कैसे अनदेखा कर देता ? उसे कैसे और क्यों न लिखता ? 

    न तो मैं शराब के नशे में हूँ, और न ही मैं इसका आदी हूँ। पांच साल पहले जब मैं यहां से गया था तब से लेकर आज तक मैने कभी-कभार ही पिया था, वो भी लिमिट में। मैंने उससे वादा किया था कि मैं देवदास नहीं बनूंगा, और मैंने ये वादा पूरी ईमानदारी से निभाया था। तो मैं यह भी मानने के लिए तैयार नहीं कि नशे में होने से या उसका आदी होने से मेरे दिमाग के न्यूरॉन्स ने एक इल्यूजन या भ्रम की स्थिति पैदा की है, बिल्कुल नहीं। 

     तभी मैंने देखा वह परछाई कुछ कदम चलाते हुए सड़क पर आई। अब पूरा का पूरा चंद्रमा का मद्धिम प्रकाश उस पर पड़ रहा था। उसकी नज़रें बिल्कुल खिड़की पर लगी हुई थी। चंद्रमा की उस शुभ्र ज्योत्स्ना में वह बेहद शांत लग रही थी। 

     पता नहीं क्यूं मेरे अंदर का डर चला गया और दुविधा एक पल में दूर हो गई। उसे सामने देखकर मन में प्रसन्नता हुई। अब मेरे अंदर रंच मात्र का भय नहीं रह गया। पल भर के लिए मैं भूल गया कि पीहू मर चुकी है। दोनों हाथ से खिड़की की छड़ पकड़े उसकी तरफ मैं एकटक देखता रहा। मेरा शरीर बिल्कुल हल्का हो गया। लगा, जैसे मैं जीवन और मृत्यु से परे हो चुका हूँ। मन के सभी शोक और संताप प्रकृति में ही कहीं विलीन हो गए।

   उसे यूं सामने देख मेरी आँखें भर आई और होठों में फीकी मुस्कान दौड़ गई। नियति ने हमें एक बार फिर हमे एकदूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन कितने विपरीत !! शारीरिक बंधनों में बंधा हुआ आज मैं उसकी अटारी पर था और वह इन सभी बंधनों से मुक्त बाहर खड़ी थी।  

    मृत्यु से मुझे डर नहीं और पीहू से डरने की कोई वजह नहीं। यदि यह उसकी आत्मा है, तो भी नहीं।यदि केवल मेरे मन का भ्रम है, तो भी नहीं। और फिर जिसके न रहने पर मैं रोया, दर्द में तड़पा, उसे एक बार देखने और मिलने के लिए तरसा, उसके सामने आते ही मैं डर जाऊं ?

  अचानक लाइट आ गई। मैने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा सामने कहीं कोई नहीं था। मेरे हाथ में अभी भी वह नोटबुक थी। मैं आराम से बैठ पत्र को आगे पढ़ने लगा...

    कभी-कभी मैं सोचती थी कि तुम क्या थे, राइटर, एक्टर या फिर डायरेक्ट ? तुमने एक्टिंग की तो बिल्कुल नॉर्मल इंसान की तरह, जब लिखा तो गहरी बातें, और डायरेक्ट किया तो पीहू को पीहू से ही मिला दिया। अरे पागल यह भी न सोचा, यदि पीहू, पीहू से मिल गई तो सिर्फ तुम्हारी होकर रह जाएगी ? 

   जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे तुमने, मैंने भी देखें लेकिन उन सब का हासिल क्या था ? हमारा तुम्हारा मिलना ?  सत्य का मेरे जीवन में आना मेरे अपनों की मुक्ति थी, और तुमसे मिलना, मेरा खुद से मुक्त हो जाना !! अब मैं खुद की कहां रही !!!

    क्या जानती थी कि मैं खुद अपने आप को ऐसे बंधन में बांध लूंगी जिससे दूर जाना मेरे बस में नहीं होगा। फिर एक दिन तुम आए, सोने के पिंजड़े में कैद बुलबुल की बगिया में आ कर चुपचाप बैठ गए।

    मैं तुम्हें जब भी सोचती हूँ तो कोई अध्यात्म कोई दर्शन कोई फिलासफी मेरे काम क्यूं नहीं आती ? तुम बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। यदि उन सभी बातों का अर्थ निकालती हूँ तो सिर्फ तुम्हारा चेहरा ही क्यों नज़र आता है ? 

    बिछोह के अंतिम पलों में कभी मेरी अटारी की सीढियों को उतरते समय तुमने मुझसे कहा था, पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो। जानती हूँ उस पल तुमने कोई एक्टिंग नहीं की थी। तो फिर आओ, मैं तुम्हें हृदय से, मन से, और अंतर्मन से पुकार रही हूँ, असंख्य सितारों की तरह मेरी आंखों से झिलमिलाते, चमकते हुए आ जाओ। मुझे गले से लगा लो, मेरे आंसुओं को पोंछ लो, या फिर मेरे साथ जी भर के रो लो। तुम्हारी ही बात तुम्हे याद दिलाती हूँ, सैम्पेथी नहीं कॉन्डनेस चाहिए जो मेरे अंतर्मन के दर्द से मुझे मुक्ति दिला दे...

   कहते हैं मरते समय इंसान को जोरों की प्यास लगती है, यदि यह सच है तो अब मुझे इसकी भी परवाह नहीं कि मेरे पास मुझे पानी पिलाने के लिए कोई होगा या नहीं। उस रात बेखुदी में जब मैं तुम्हें सत्य समझ कर अपने दिल की बातें तुमसे ही कह रही थी, और तुम कुछ घबराए से मुझे होश में लाने के लिए नींबू-पानी पिला रहे थे, बेखबर इस बात से कि मैं तो पहले से ही होश में आ चुकी थी, फिर भी बेहोशी का नाटक करती रही। 

     सच तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी, बल्कि उस आत्मिक सुख की अनुभूति करना चाहती थी जो सिर्फ अपने प्रियवर से मिल सकतो थी। अपने लिए तुम्हे परेशान देखा, अपने जज्बातों को नियंत्रित करते देखा।

    तुम्हारे सीने पर सर रखकर तुम्हारी बाहों के घेरे में तुम्हारे ही हाथों से पानी पिया। इनकी भी स्मृति मेरे पास है, और शायद इसलिए जब मरते समय तुम्हारी पीहू को प्यास लगेगी तो वह इस धरती से प्यासी न जाएगी। 

      शायद तुम्हारी पीहू का इस धरती से जाने का समय नजदीक आ चुका है। जब न रही तो फिर किससे कहोगे, "पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", तो उसे विदा करने ही आ जाओ। देखो मैने सभी फ़र्ज़ पूरे कर लिए। बाबा को विदा किया, सत्य को जो चाहिए था उसे दे दिया, अब खुद में सिर्फ मैं उतनी ही बची हूँ, जितनी तुम्हारी हूँ। फिर आओ, अपना किया वादा निभाओ और अपने साथ ले जाओ मुझे..."

    कभी इसी अटारी में मैंने तुमसे पूछा था कि यदि कुदरत तुम्हें अपनी मृत्यु के चुनाव का अवसर दे तो कैसी मृत्यु चाहोगे। याद है न, इस पर तुमने कहा था, "यदि नियति मुझे मेरी मृत्यु का चुनाव करने दे तब मैं एक ऐसी मौत मरना चाहूंगा जिसमें प्रिय की प्रतिक्षा हो... एक आस हो उसके आने की... मेरी आंखे खुली हुई हों... और मेरे दिल की धड़कन आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जाए। एक ऐसी मृत्यु जिसमें जीवन का संगीत हो... जिसकी स्वर-लहरी अपने चरम पर पहुंचकर धीरे-धीरे शांत हो... उसके सभी सुर मेरे हृदय में समाहित होते चले जाएं... वीणा की ऐसी झकार जो तार टूटने के बाद भी कुछ देर तक गूंजती रहे... मैं जीवन का यही संगीत सुनते हुए अपने प्रिय की प्रतीक्षा में मृत्यु का वरण करना चाहूंगा..."

   उसदिन तुम्हारे द्वारा कही गई यह बात मेरे अंतर्मन में इस कदर बैठ गई कि मैं फिर कभी भूल ही न पाई। तो चलो अच्छा ही हुआ, जिंदगी के इस रंगमंच में अपनी अंतिम सांस लेते हुए इस किरदार को अभिनय के लिए तुम एक स्क्रिप्ट तो देकर गए। मुझे याद आती हैं, तुम्हारे बाहों की बंदिशें, तुम्हारे लफ़्ज़ों की रुमानियत, संगीत जिसकी लहरों में मेरा मन आज भी तैरता है। कुछ पा लेने और खो देने के डर से दूर, मैं ऐसे संसार में पहुंच गई हूं जहां तुम हो, सिर्फ तुम हो।

     अब यही मेरे मन की भी आखिरी इच्छा है, जब मैं यह संसार छोडूं तो मेरी आंखें खुली हो, और मैं तुम्हें सीढ़ी के आखिरी पायदान पर खड़े एकटक देखती रहूं। इसीलिए अब मैने अपनी चारपाई खिड़की के कुछ और पास कर ली है, और उसी तरफ सर करके लेटती हूँ। शायद मरते समय ही सही तुम आ जाओ। यदि नियति ने मेरे न रहने पर ही तुम्हारे आने को निर्धारित कर रखा है, तो लिखती हूँ, फिर तुम किसी शीरी के फरहाद बन के मत आना।

   तुम्हे याद है, इसी बगिया में तुमने मुझे कविता के रूप में एक कहानी सुनाई थी, दो सितारों की कहानी ? शायद हम दोनों उस कहानी के वही दो सितारे हैं, जो एकदूसरे के करीब आए, एकदूसरे के मन को लुभाए। फिर हमारे मन में एकदूजे के साथ जिंदगी को जीने की लालसा जागी। लेकिन मेरे पास जिंदगी बची ही कहा थी मेरे दोस्त। पर जो भी थी मैं तुम्हारे साथ जीना चाहती थी, लेकिन... देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की ये दुनिया... ये सूरज, चन्द्र, ग्रहों, उपग्रहों की दुनिया, इनके आगे तो बाबा भी हारे।

       जिन्हें मैने अपने जीवन में ईश्वर का स्थान दिया, वो एक पछतावा लिए इस दुनिया से गए। शायद उनके लिए नियति ने यही सजा निर्धारित की थी। लेकिन उनकी सजा क्या है जिन्हें महसूस हुआ कि हमारे साथ रहने पर संपूर्ण सृष्टि के नियम भंग हो जाएंगे, ब्रह्मांड हिल जाएगा, न जाने इस धरती में कितने भूकंप आ जाएंगे...? याद करो तुम अपनी कहानी...

   उनके नजदीकी आकर्षण से, मन में उठती लहरों से, दिल की सच्ची बातों से, कुछ और करीब आने से, सृष्टि नियम बिगड़ते देखा। सब मिलकर जा प्रभु से बोले। दूर करो अब इन दो तारों को, प्रेम में पागल इन दो न्यारों को...

   तो क्या इन देव, दानवों, यक्ष, किन्नरों की कोई सजा नहीं...? ईश्वर तो करुणामयी होता है... उत्पात तो इन्होंने मचाया, ईश्वर को भी नियति से श्रापित होने पर मजबूर किया ? 

    मैने तुमसे यूं ही नहीं कहा था, कि तुम मेरी नियति बन के आये और मैने तुम्हे अपनी किस्मत समझ जाने दिया। तो एकबार फिर तुम नियति बनाकर आओ। जब भी तुम्हारे बारे में सोचती हूँ तो मन में हूक सी उठती है। यदि उसने हम दोनों की आंखों में एक दूसरे के लिए प्यार देख भी लिया था तो भी उस नादान को यह तो सोचना चाहिए था कि जो चार महीने तक एक बिस्तर में होने के बाद भी उसकी हम-बिस्तर न हुई, कभी भी विवाह के लिए अपनी सहमति न दी तो उस लड़की के हृदय और मन में उसके लिए कितना और किस स्तर का प्रेम रहा होगा ?

       बाबा की एक भूल, वही ग्रहों, उपग्रहों, सूर्य, चंद्र की दुनिया से स्थापित एक रिश्ते का दंभ पाले मेरे संपूर्ण जीवन का परमेश्वर बन गया। जब उसने बाबा से हम दोनों के बारे में बात की होगी, उस क्षण बाबा ने हम दोनों के बारे में क्या सोचा होगा ? उसके कुछ शब्दों में बाबा के हृदय में हजारों शंकाओं को न जन्म दे दिया होगा ? मुझे छोड़कर जाने के अपराध से तो मैंने उसे उसी दिन मुक्त कर दिया था जब मैंने उसे अपने चित से निकाल फेंका। लेकिन इस अपराध से उसे मैं कैसे मुक्त कर दूं ? वह मेरा ही नहीं हमारे बीच निश्छल प्रेम का अपराधी है। इसलिए तुम्हें पुकारती हूँ, जब भी तुम आना तो नियति बन कर आना। एक अजनबी की तरह ही निष्पक्ष भाव से अपना फैसला देना।

     या मेरे जीवन के स्वाति नक्षत्र बन के आना। तुम्हें मेरा नाम बहुत प्यार लगता था न ? अपने शब्दों में दी गई परिभाषा को पूरा करने के लिए आना। मैं नहीं जानती कि जीवन और मृत्यु के बीच क्या संबंध है ? मरने के बाद इंसान कहां जाता है, यह भी नहीं पता। लेकिन मैं यही रहूंगी, तुम मुझे पुकारना, पीहू... पीहू... पीहू... और तुम देखना मैं दौड़ती-भागती जहां भी रहूंगी, जिस दुनिया में भी रहूंगी तुमसे मिलने आऊंगी। फिर चाहे इसके लिए मुझे कितने ही आयाम ही क्यूं न पार करने पड़े, मैं करूंगी। लेकिन मेरे प्रियवर, मेरे इष्ट, मेरे दोस्त मैं आऊंगी, और जरूर आऊंगी।

     या फिर हे राधे के प्रिय !!! हां मैं तुम्हे पुकारती हूँ, तुम वही कृष्ण बन के आना। न्याय करना मेरे साथ। एक अधूरी कहानी जिसे कालचक्र पूरा न कर सका, उसे तुम पूरा करना... अपने प्रिय मित्र के चरित्र का हनन करने, उसके अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए, तुम्हे उसके पति का सारथी भी बनना पड़े, तो वह भी बन जाना। नहीं तो फिर कोई जरूरत नहीं इस कुरुक्षेत्र को तुम्हारी ? तुम जहां हो वहीं भले...
तुम्हारे इंतजार में,
तुम्हारी पीहू।

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