अजनबी - 4 (वह पत्र)

पुनरिश्च:

मैं न तो राइटर हूँ न ही सत्य, और न ही पीहू। मैं आपको वो बातें बताने जा रहा हूँ जो राइटर ने अभी तक इस कहानी में नहीं लिखी। मैं उसके साथ-साथ चलता रहा, इस कहानी को घटित होते हुए देखता रहा। जैसा कि कभी राइटर ने पीहू से कहा था, कुछ कहानियों की नियति होती है, चलते रहना। वह कभी रुकती नहीं हैं। चाहे माइलस्टोन हो या अजनबी उसके अंतर्मन में ये कहानियां हमेशा चलती रही, शायद इसलिए कि ये फिर्फ एक कहानी ही नहीं छोटे-छोटे लम्हे थे जो कुछ किरदारों ने एक साथ जिए। राइटर भी उन्हें किरदारों में से एक था।
     भले ही राइटर ने इसे आज लिखा हो, लेकिन उसके जीवन में इनकी शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। टीनएज में माइलस्टोन और युवा अवस्था में अजनबी की।  
    पीहू की मृत्यु की जानकारी ने उसे कुछ महीनों तक शोक में रखा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया तो उसे पीहू और सत्य दोनों के जीवन से प्रेरणा मिली। यह सच है कि पीहू और राइटर दोनों ही ने एकदूसरे को अपने जीवन में शामिल कर ज़िंदगी जीनी चाही, लेकिन कुछ कारणों से ऐसा हो न सका।  
    एक लड़की जिसने अपने प्रेम का त्याग किया, जो मृत्यु का कारण लेकर पैदा हुई, जिसकी उसे जानकारी थी, फिर भी उसने लगातार लगभग तीन सालों तक जनकल्याण हेतु कार्य किया !! यही सबसे बड़ी वजह थी उसके शोक को दूर करने की। यदि राइटर की बात को अच्छी तरह से समझना है तो आप अपने आप को पीहू के स्थान पर रख के देखिए। आप मन में प्रतिपल उठते वैराग्य से खुद को कितने दिनों तक दूर रख पाएंगे ? ऐसे किरदार किस्से-कहानियों में देखने को मिलते हैं, वास्तविक जीवन में नहीं, लेकिन राइटर ने देखा ही नहीं उनके साथ जिंदगी के महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय पल जिए हैं।
    दोनों ही पत्र सील पैक थे, और सील के रूप में पीहू के हस्ताक्षर थे। राइटर ने तो अपना पत्र पढ़ लिया था, लेकिन सत्य का पत्र वह चाह कर भी नहीं पढ़ पाया। लगभग छः माह तक वह इसके पास उसी तरह सील बंद पड़ा रह। मन में बार-बार खयाल आता कि पीहू ने क्या लिखा होगा। यह तो तय था कि सत्य ने इन दोनों पत्रों को नहीं पढ़ा था और जो पत्र उसने पढ़े, उनमें से एक साधारण पत्र था, जो उसके सिरहाने लिखा मिला। जिसमें उसने भविष्य में होने वाली अपनी संभावित मृत्यु का कारण लिखा था।
    उसकी उंगली में डायमंड रिंग के साथ शरीर में पहने सभी आभूषण थे। घर में कोई चोरी नहीं, उसके शरीर के साथ भी किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं हुई थी। हां, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु के कारण और उसके प्रेग्नेंट होने की पुष्ठि हुई। चूंकि उसने अपने पत्र में सत्य को स्वयं पति के रूप में स्वीकारा किया था, फिर यही बयान मंगल, कमली, ध्रुव ने दिया। किसी के ऊपर कोई आपराधिक मामला नहीं बना। और फिर मृत्यु का कारण हार्टफेल 7 नवम्बर की रात 1 और 2 के बीच होना पाया गया। इसलिए कोई विशेष जांच पड़ताल नहीं हुई। दूसरा पत्र अलग से बेडरूम की कवर्ड में उसकी उसी बदामी कलर के सूट में सत्य को बाद में मिला। उस पत्र में उसकी इच्छा थी कि उसकी मुक्ति तभी है जब राइटर कम से कम एकबार वहां आए, और यह काम उसने सत्य को ही सौंपा था। उसके न आने तक उसकी किताबों को जस का तस उसी तरह रखने का आग्रह किया था। 
     वह पत्र रुला देने वाला था। उस पत्र में उसने सत्य पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि आखिरी दिन अपने कहे गए शब्दों के लिए क्षमा याचना की। यानी उस दिन उसने चार पत्र लिखे, दो सत्य के लिए, एक राइटर के लिए, और एक सामान्य पुलिस के लिए। सत्य के लिए लिखे गए व्यक्तिगत पत्र में उसने ध्रुव, मंगल और कमली सभी के लिए कुछ न कुछ लिखा था। उसे पढ़ कर ज्ञात होता था कि यह पत्र सबसे अंत में लिखा गया था। जिसमें किसी से कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि जाने-अनजाने में हुई गलती की सभी से क्षमा याचना थी। यानी उसने अपनी मृत्यु का बहुत ही शांत मन से स्वागत किया, ठीक उसी तरह जैसा कि कभी उसके पूछे जाने पर राइटर ने उससे कहा था। और शायद उस पत्र का ही प्रभाव था कि सत्य को राइटर से कोई शिकायत नहीं थी। तभी तो वह दोबारा राइटर को अपने साथ लेकर गया।
    जैसा कि पीहू ने सत्य को लिखा कि रिग्रेट यानी पछतावा, इंसान को जीने नहीं देता। वही पछतावा राइटर के अंदर भी चल रहा था। एक तो था उसे छोड़कर कर चले आने के बाद कभी वापस लौट कर न जाने का और दूसरा था सत्य को सच न बताने का, उसे भंवर जाल में छोड़कर चले आने का, जिसमें वह उम्र भर भटकता रहे। 
    जैसा कि उसने राइटर को लिखा था, "अब तुम अपने जीवन में उस लड़की को स्थान देना जो तुमसे प्रेम करती हो...",  राइटर काफी दिनों तक इसी बात में उलझा रहा कि उसे चाहा तो पीहू और माइलस्टोन की नायिका दोनों ने ही, और उतनी ही इंटेंसिटी के साथ राइटर ने भी उन्हें चाहा। तो फिर ऐसी क्या वजह थी की दोनों में से कोई एक भी उसकी जिंदगी में शामिल न हो सकी ? कारण कुछ भी रहा हो लेकिन सबसे प्रमुख कारण था नियति जिसे यह सब होने देना मंजूर न था।
     जब 2003 में वैवाहिक संबंधों में आने के लिए प्रस्ताव आया तो उसने मना नहीं किया। क्यूं ? कभी पीहू ने उससे कहा था कि उसके व्यक्तित्व में गजब की फ्लैक्सिबिलिटी है। लेकिन उसके पूर्व उसने एक काम किया, अपने रिग्रेट यानी कि पछतावे को दूर करना।
    सत्य को पत्र लिखा, उससे भी पीहू की तरह उससे क्षमा मांगी। पीहू के द्वारा खुद को लिखे गए पत्र की फोटोकॉपी और सत्य के लिए सीलबंद पत्र को उसी तरह पीहू के पते पर पोस्ट कर दिया। लगभग एक महीने बाद सत्य का जवाब आया। उसने भी पीहू के पत्र की एक फोटोकॉपी उसे भेजी और उसके लिए लिखे पत्र में उसने स्वीकार किया कि जो भी बाते पीहू ने लिखी हैं वह सब सच हैं। 
     उसके शक की शुरुआत उस रात से शुरू हो गई थी जब उसने डायमंड रिंग को पीहू के इंगेजमेंट फिंगर में देखी थी। उसने यही समझा था कि जरूर राइटर ने ही उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया होगा। उसे इस बात का दुख हुआ था कि जिसे उसने अपना दोस्त माना उसने ही इसके साथ यह किया। एक पल के लिए यही सोच लेता कि वह उसके दोस्त की पत्नी है... या फिर प्रेमिका ही है। तब भी उसने यही सोचा कि हो सकता है एक ही फिंगर में रिंग पहने-पहने उसे कुछ दिक्कत महसूस हुई। उसने दोनों पर ही विश्वास किया। नहीं तो उस रात वह पीहू को अकेला छोड़कर कभी न जाता। 
      फिर सुबह जब वह आया तो उसने एक दूसरे के हाथ पर हाथ रखे एक ही चारपाई पर बैठे हुए भी देखा। तब भी उसे यह एक इत्तेफाक ही लगा था। लेकिन आखिरी दिन उसके अंदर राइटर को लेकर असुरक्षा की भावना इतनी प्रबल हो गई कि उसे बाबा की शरण में जाना पड़ा। इस तरह उसे धीरे-धीरे यह महसूस हुआ कि राइटर एक चालक इंसान है, जो पीहू के लिटरेचर के प्रति रुचि का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है, और अपने जीवन की कमी की पूर्ति पीहू से करना चाहता है। पीहू उसे इनोसेंट ही लगी जो राइटर के चंगुल में फंसती जा रही थी। 
    अपनी इस भावना को वह न तो ज्ञान के सामने प्रदर्शित कर सकता था और न ही पीहू से कुछ कह या पूछ सकता था। उसे खुद आश्चर्य हो रहा था कि उस जैसे सुंदर, पढ़े लिखे और एक अच्छे फैमिली के वेल-सेटल्ड लड़के को छोड़कर पीहू ने राइटर में ऐसी कौन सी खूबी देख ली कि उसका आकर्षण उसकी तरफ बढ़ता जा रहा है, और उसका जवाब भी उसने खुद ही स्वयं को दिया था। उस समय उसे यह महसूस हुआ कि राइटर के प्रति पीहू का प्रेम, प्रेम नहीं एक क्षणिक आकर्षण है, जो आपस में लिटरेचर की पसंद से उत्पन्न हुआ है। उनके बीच दूर हो जाने पर यह खत्म हो जाएगा, और उसने वही दूरी बनाने के लिये बाबा को राइटर और पीहू के रिश्ते को लेकर भ्रमित किया।

    उसका यही सोचना गलत साबित हुआ। जैसे-जैसे दिन गुजरते जा रहे थे, वैसे-वैसे ही पीहू का प्रेम राइटर के प्रति बढ़ता ही जा रहा था। जिसे वह प्यार करता था,  इतना चाहता था, वही लड़की उसे अपना अच्छा दोस्त समझती रहे, वह इस दर्द से भी गुजरा है। पीहू ने अपने पत्र में सही लिखा है कि उसने पीहू से कभी भी इस बारे में इसीलिए कुछ नहीं पूछा कि उसके स्वीकार कर लेने पर उसके पास कोई आस न रह जाती। यह सब जानते हुए भी उसका लगातार कोशिश करते रहना, यह उसका निजी स्वार्थ या पीहू के प्रति प्रेम था, वह जो समझना चाहे, समझ सकता है।
    इन सब का आभास होते हुए भी अंत में पीहू के समर्पण को उसने स्वीकार किया। उसे पूर्ण आशा थी कि शायद वह सब कुछ भूल कर सामंजस्य के साथ एक रिश्ते की शुरुआत करना चाहती है। लेकिन तब भी उसका सामाजिक विधि के अनुसार विवाह करने से इनकार करना उसे क्रोधित कर गया। 
     क्षणिक गुस्से और आवेश में वह पीहू को छोड़ का गया जरूर था, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। और यह एक इत्तेफाक था कि कंपनी ने उसे अचानक ट्रेनिंग के लिए भेज दिया और एक महीने की ट्रेनिंग एक्सटेंड होकर दो महीने की हो गई थी। 
     लेकिन उसने इस बात से इंकार किया कि पीहू की प्रॉपर्टी को लेकर उसके मन में कोई लालच था और केवल उसके लिए वह उससे विवाह करना चाहता था। बाबा की अनुमति मिलने के बाद धीरे-धीरे उसे पीहू से गहरा प्यार हो गया। उसको छोड़कर दूसरे से शादी करने की कल्पना तक उसने नहीं की। उसके घर वाले बराबर उसे कहते थे की पीहू से शादी करो और समाज के सामने करो, ऐसे नहीं चलेगा। वह अभी भी नहीं कह सकता कि पीहू की संपत्ति को लेकर उसके माता-पिता में कोई लालच था या नहीं। वह उसके माता-पिता है, उन्हें कटघरे में कैसे खड़ा कर दे ?
  लेकिन यह भी सच है कि पीहू के बार-बार मना करने पर एकदिन उसने अपने पेरेंट्स को अपनी शादी करने के लिए स्वतंत्र भी कर दिया था, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी वजह से उसके पेरेंट्स को कोई तकलीफ हो, कोई बदनामी हो। फिर भी वे यही चाहते थे कि पीहू ही उसकी धर्मपत्नी बने।
    आगे पत्र में सत्य ने अपने, पीहू और राइटर के बीच संबंध पर लिखा, 
     जहां तक मैं मानता हूँ कि पीहू का मुझसे मिलना उसे अपने शोक से दूर करना था। उसने एक अच्छे मित्र की तरह मुझसे अपने निजी जीवन की सभी बातें साझा की। मेरे साथ हंसी, मुस्कुराई, पार्क घूमी, सिनेमा देखा। मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखा, मुझे हर पल खुशी देनी चाही। यह बात अलग है कि मैंने खुशी को सिर्फ वैवाहिक संबंधों में तलाशने की कोशिश की, यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी। आज मुझे अपने जीवन में उसकी कमी एक पत्नी के रूप में कम एक सहृदय मित्र के रूप में अधिक महसूस होती है। निश्चित ही मैंने अपना सबसे करीबी मित्र खो दिया है, जिसे मेरी परवाह थी। उसने मेरे लिए जो कुछ भी किया उसकी कमी मैं आज पूरी शिद्दत से महसूस करता हूँ।
     बाबा के गुजर जाने के कुछ दिनों बाद मैंने एक दिन हंसी-हंसी में इसी अटारी में उससे पूछा था, 'चलो मैं तो तुम्हारे लिए एक अच्छा मित्र हूँ लेकिन तुम्हारे जीवन में उसका स्थान क्या था या है ?' तब उसने होठों में एक मुस्कान आ गई, कुछ सोचते हुए उसने कहा था, 'वह मेरे जीवन की वास्तविक कहानी का एक काल्पनिक पात्र है, जिसका स्वरूप यथार्थ से अधिक व्यापक, सुंदर और सत्य है...'
     तब मुझे पहली बार एहसास हुआ कि तुमसे मिलने से पहले की पीहू अलग और तुमसे मिलने के बाद पीहू अलग है। इस परिवर्तन को सतही तौर पर तो नहीं देखा जा सकता था, केवल महसूस किया जा सकता था, जिसे मैंने कई बार किया भी। कम शब्दों में लिखूं तो तुम्हारे सानिध्य ने उसे एक ऐसी देव-मूर्ति में परिवर्तित कर दिया था, जिसे श्राप और वरदान दोनों देने की क्षमता प्राप्त हो चुकी थी। तुम उसके जीवन के शिल्पकार भी थे और प्राण-प्रतिष्ठार्थी भी। लेकिन तुम मेरे लिए क्या थे ? तो लिखता हूँ, तुम एक ऐसे शिल्पकार थे जो मूर्ति को देवी-देवता के रूप में तराशता है और एकदिन उनकी प्राण-प्रतिष्ठा हो जाने के बाद उसे छूने के अधिकार से वंचित हो जाता है।
     उसके जाने के बाद मेरी भी साहित्य में रुचि हो गई है, मैं भी अक्सर अब उन किताबों को पढ़ाता हूँ जिन्हें कभी पीहू ने पढ़ा रहा होगा। शायद यही वजह है कि मैं तुम्हें कुछ ढंग का लिख पा रहा हूं... पीहू तो रही नहीं कि अब उससे मैं किसी भी प्रकार की क्षमा याचना कर सकूं लेकिन फिर सोचता हूँ, तुम तो हो न ? मानता हूँ उसकी इच्छा थी कि तुम एक बार यहां आओ लेकिन उसकी इच्छा में अब मेरी भी इच्छा सम्मिलित हो चुकी थी। क्योंकि मैं इस सोच से बाहर आना चाहता था कि पीहू ने तुमसे अपने प्यार को स्वीकार किया था या नहीं। चलते समय तुमसे पूछने की वजह भी यही थी। मैंने तो उसकी नजरों में तुम्हारे लिए प्यार देख लिया था। आज उसके पत्रों से स्पष्ट हो गया है कि उसने भी तुमसे अपने प्रेम को स्वीकार किया था तो अब मैं अपराधी सिद्ध हुआ। उस देवी का जो भी अभिशाप होगा, मैं सहर्ष धारण करूंगा।
    जवाब में राइटर ने लिखा कि हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई। पीहू गुमनाम मौत नहीं मरना चाहती थी और इसीलिए उसने कभी मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी यह आखिरी इच्छा पूरी न हो सकी। उसने अपनी संभावित मृत्यु को अपने परिजनों और हम दोनों से छुपा के रखा शायद यह उसकी गलती थी। मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। 
      उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी से मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारे विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंमें पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आई। मुझे तुमसे जो भी शिकायत थी सिर्फ इस बात को लेकर थी कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तुम्हें विवाह के लिए तो मना नहीं किया था ? और यह शिकायत आज भी है की इन दो महीनो में तुम यदि बाहर थे भी, तो कंपनी के किसी न किसी मुलाजिम से पीहू या मंगल तक अपने मुंबई में ट्रेनिंग करने की खबर पहुंचा सकते थे। लेकिन तुमने ऐसा करना जरूरी नहीं समझा, जबकि तुम्हारी कंपनी के कई ट्रक माइंस और कंपनी के बीच रोज चलते थे।
     मेरे जीवन में पीहू का स्थान क्या था ? उसके प्रति प्रेम की तीव्रता इसी बात से तुम लगा सकते हो कि यदि मुझे तुम तीनों में से किसी एक का चुनाव करना होता तो मैं निश्चित ही पीहू का करता, उसकी खुशियों का करता। यह आभास हुए भी तुम्हारे और बाबा के चहने पर मैं पीहू को छोड़ कर चला आया। यह सोचकर कि तुम लोगों के बीच वह खुशहाल ज़िंदगी जीएगी, यही मेरी गलत सोच थी। इस तरह पीहू ने जो कुछ मेरे लिए लिखा वह भी सही था। 
     मैंने भी उसके साथ वही किया जो उस लड़की ने कभी मेरे किया था; और पीहू ने मेरे साथ वही किया जो मैने उस लड़की के साथ किया। उसे बड़ी सहजता और सरलता से अपनी जिंदगी से जाने दिया। 
    मैं मंगल को कम से कम एक पत्र तो लिख ही सकता था, लेकिन नहीं लिखा। मैंने तुम्हारे कहने पर जब भी पीहू से तुम्हारे बारे में बात की उसने हर बार यही स्वीकार किया कि तुम उसके अच्छे दोस्त हो। तुम्हारे और उसके बीच वैवाहिक संबंधों की जब भी बात छेड़ी, तो वह या तो खामोश हो गई या फिर उसने बातों की दिशा ही बादल दी। 
     अटारी में उस दिन तुम्हें पति के रूप में स्वीकार करते समय उसने बड़ी ही बेबसी के साथ मेरी नजरों में देखा था। उसकी वो नजर मुझसे सिर्फ यही पूछ रही थी कि बताओ अब मैं क्या करूं। यदि उस दिन मैंने उसे इशारा न किया होता, तो सच मानो, तुम रोते रहते, या फिर शायद तुम उसे छोड़ कर चले जाने की धमकी भी देते, तो भी वह कभी भी स्वीकार नहीं करती। एक मजबूत इच्छा शक्ति की लड़की ने मेरे एक इशारे पर अपनी समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया। बस उसी क्षण मैंने समझ लिया था कि मैं उसके जीवन में क्या स्थान रखता हूँ। मैंने एक पल में उसे पाया और दूसरे ही पल में उसे खो भी दिया। यदि अब तुम समझ सकते हो तो समझ लो मेरे दर्द को भी। 
     उस पल के बाद मैं तो खामोश हो गया लेकिन उसने हार नहीं मानी। कभी एक्टिंग के बहाने तो फिर कभी रोते हुए मुझे गले से लगाकर, मेरे हृदय में अपने लिए छुपे प्रेम को वह कुरेदती रही। प्रतिपल मुझे जताती रही कि उसे मुझसे प्यार है न कि तुमसे। मैं भी एक इंसान था, मेरे भी कुछ जज्बात थे। उससे प्यार होते हुए भी मैं खुद को और कितने समय तक के लिए रोक पाता; और अंत में हम दोनों ने ही खुले मन से एक दूसरे के प्रेम को स्वीकार किया। 
    जल को जीवन का उद्गम माना जाता है। नदी के शांत जल में हम दोनों के चेहरों की परछाई के बीच में उसका लव शब्द लिखना कई मायनों में एक संदेश था। हमारी मोहब्बत पानी में लिखी इबारत की तरह है, जो भले ही किसी को न दिखाई दे लेकिन इस जल में घुली हर बंधनों से मुक्त निरंतर प्रवाहित होती रहेगी; और ये जीवन धारा एक किनारे को दूसरे किनारे से सदैव मिलाती रहेगी। 
   उसने कभी मुझे चलती हुई राहों में कहा था कि किसी के साथ सहजता और सरलता से जीवन व्यतीत कर लेने को प्यार नहीं कह सकते, ये सच साबित हुआ। आज मुझे समझ में आ रहा है कि उसे सभी ऐतिहासिक प्रेम कहानियों में शीरीन और फरहाद की कहानी क्यूं पसंद थी। मैं मानता हूँ कि मुझ में लाख कमियां सही लेकिन फरहाद की तरह कोई न कोई खूबी तो रही होगी ? यकीनन पीहू ने मेरी उसी खूबी से मोहब्बत की। वह जानती थी कि कभी न कभी मेरी भावुकता का फायदा उठाने की कोशिश की जाएगी। शायद इसीलिए उसने बार-बार मुझे सचेत किया था, "तुम किसी शीरीन के फरहाद मत बनना। सामने वाले इंसान को हम अपने जैसा निश्चल समझने की भूल कर लेते हैं, जबकि यह दुनिया चालक, धूर्त और फरेबी लोगों से भरी पड़ी है। 
    जाने की शाम को जब तुम्हे अपने बेडरूम में बेखबर सोते हुए देखा तो तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अथाह करुणा में जन्म लिया। तुम्हारे चेहरे की मासूमियत देखकर महसूस किया कि जैसे इस मृत्यु लोक में एक श्रापित और अभिशप्त देवता गहरी नींद सो रहा हो। मैं तुम्हारे बालों और माथे को सहलाते हुए सिरहाने में कुछ देर तुम्हें देखते बैठा रहा। 
   सोचता रहा, क्या इसी सोते हुए मासूम व्यक्ति ने हमारे साथ छल किया ? तब भी मेरे मन में तुम्हारे प्रति किसी कलुषित भावना ने जन्म नहीं लिया, जानते हो क्यों?
      क्योंकि पीहू तुम्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त समझती थी, बेस्ट फ्रेंड्स थे तुम उसके !! कभी तुम उसके जीवन में खुशियां लेकर आए थे और उसके बदले में तुमने प्यार चाहा, तो तुम गलत कैसे हुए ? खेल तो नियति का था। सितारों की दुनिया में दो सितारों की कहानी लिखी गई जो इस धरती में घटित हुई। हमारा मिलना और बिछड़ना सब कुछ वही तय हुआ, हमारे मिलने से पहले ही !! नहीं तो पीहू ने स्वप्न में और उस लड़के ने प्रत्यक्षतः हम दोनों को एक साथ मंदिर में न देखा होता, जबकि वहां हम तो पहली बार गए थे। मेरा और पीहू का मिलन और घटनाओं का इस तरह घटना मात्र उसका का रिप्ले था। ठीक उसी पल मैंने पीहू को छोड़ देने का फैसला लिया और रोते हुए उसके लिए आखिरी कविता लिखी, "जा तुझे छोड़ दिया..."

  मैने पीहू को ले कर कभी तुम्हारे प्रति कोई कटुता या जलन की भावना स्थाई रूप से नहीं रखी, मैं चला आया फिर कभी नहीं गया। हम दोनों ही स्वार्थी थे, मैने उसके त्याग में सुख देखा और तुमने मिलन में। लेकिन पीहू क्या चाहती थी, हमने कभी सोचा ही नहीं। क्यों ?
    अभी तक हमने उसके जीवन को अपने-अपने नजरिए से देखा और अलग-अलग धारणाएं बनाई। पीहू ऐसी रही होगी या पीहू ऐसी नहीं रही होगी। अब कुछ घटनाओं को निष्पक्ष भाव से जरा सोचना।
    मेरे आने के तीन दिन पहले ही पीहू को किसी अजनबी के आने का आभास क्यों हुआ ? हम ठीक उसी तरह क्यों बिछड़े जैसा कि उसने स्वप्न में देखा था ? नदी पार के मदिर का पीहू के स्वप्न में आना और जिसकी पुष्टि बाद में उस आदिवासी लड़के द्वारा भी की गई। उसने हमें कुछ दिन पहले ही इस मंदिर में एक साथ क्यों और कैसे देख लिया था ?
    अब अपनी और तुम्हारी कहता हूँ। ज्ञान के घर में मैंने जब पहली बार तुम्हें देखा तो मैंने ज्ञान से क्यों पूछा, क्या मैं इस लड़के से पहले मिल चुका हूँ ?  यहां पहली बार आने पर ही मुझे यह आभास क्यों होता रहा कि जैसे मैं यहां पर पहले भी आ चुका हूँ ? क्यों आम के पेड़ के नीचे एक लड़की को सर तक चुनरी ओढ़ कर लेटे हुए देखा ? क्यों मंगल, कमली, बाबा के चेहरे मुझे जाने-पहचाने से लगे। किसी के बताए बिना ही मुझे कैसे मालूम पड़ गया कि सामने वाला कमरा रसोई घर है ? जब मैंने पहली बार अटारी की तरफ देखा तो मुझे ठीक उसी तरह की हालत में एक हूँ-ब-हूँ पीहू जैसी एक लड़की लेटी हुई नजर आई जिस हालत में आगे चल कर पीहू ने अपने जीवन की अंतिम सांसे ली होंगी। उसकी खुली हुई आंखें सीढ़ी के अंतिम पायदान पर किसके लिए टिकी थी ? और बाहर आने पर क्यों मैने खिड़की की छड़ पकड़े हुए उसी लड़की को देखा जैसे कि उसे किसी के आने का इंतजार हो ? पीहू के द्वारा देखे गए आखरी स्वप्न को जाते-जाते साकार रूम में मैने उस शाम क्यूं देख लिया था ? और सबसे अंत में, रात में अलग-अलग समय में तुम्हारी घड़ी का बंद होना और मेरे द्वारा देख लेने के बाद उसका फिर से चालू हो जाना, तुम इसे क्या मानते हो ? जरा खुद से पूछना, क्या उसके बाद तुम्हारी घड़ी कभी बंद हुई ?
   और अंत में एक प्रश्न मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ, भूत, वर्तमान और भविष्य की समय रेखा पर हम दोनों एक साथ क्यों चलते रहे ? कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं जो या तो घटित हो चुकी थी या जो आगे होने वाली थी, उनका आभास ही नहीं उनके दृश्य मुझे क्यों दिखाई देते रहे ? पीहू को क्यों आभास हुआ कि कोई अजनबी उसके जीवन में आने वाला है और एक दिन उसे छोड़कर चला भी जाएगा ? 
   यह हम दोनों के जीवन का एक ऐसा रहस्य है, जिसके बीच हम सदैव जीते रहेंगे। सच कहूं तो उसकी मृत्यु के शोक से मैं अब दूर हो चुका हूँ। उसकी सुंदरता, उसका शरीर, कभी मेरे लिए था ही नहीं और जो था उसकी मृत्यु संभव नहीं। वह तो सदैव मेरे पास रहेगा, जीवन के इस पार भी और जीवन के उस पार भी, ठीक नदी में प्रवाहित उस जल की तरह जो इस किनारे पर भी होता है और उस किनारे पर भी। उन्हें बहती हुई लहरों में हमारी मोहब्बत की कहानी सदैव के लिए अमिट अक्षरों से लिखी रहेगी...
   अब सभी सच तुम्हारे सामने हैं। चाहो तो जिस काम को कभी पीहू ने शुरू किया उसे मन लगाकर करते रहो लेकिन इन सब के बीच अपना भी ध्यान रखना। तुम्हें भी जिंदगी जीने का अधिकार है। बेशक उसे याद रखो किंतु खुद को तकलीफ दे कर नहीं। रही बात डायमंड रिंग की तो उसे ध्रुव को वापस कर दो या फिर समय आने पर उसकी बेटी या उसके बेटे की पत्नी को उपहार स्वरूप दे देना। अब तुम्हें जैसी जिंदगी जीनी हो जिओ और जैसी मुझे अब जीनी है मैं जिऊंगा। 
     अंत में राइटर ने यह भी लिखा कि मानता हूँ कि पीहू को तुमसे कुछ शिकायतें थी, पत्र में तुम्हारे लिए घृणा शब्द लिखना उन्हीं शिकायतों का अंतिम परिणाम था। तुम उसे अपने दिल में मत रखना। मैं दावे से कह सकता हूँ, वह तुमसे कभी घृणा कर ही नहीं सकती। नहीं तो उसी पत्र में उसने यह बात न लिखी होती, ".... जब भी तुम्हे याद करती हूँ तो आंसू बहते हैं, रोती हूँ, तड़पती हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद सत्य को भी याद करती हूँ। वह मेरे होने वाले इस बच्चे का पिता है, क्यों उसे छोड़ कर चला गया ?"... 
    भले ही उसने तुम्हें पति के रूप में या प्रेमी के रूप में स्वीकार न किया हो, लेकिन अपने बच्चे के पिता के रूप में स्वीकार कर लिया था; और एक मां अपने बच्चे के पिता से कभी घृणा या नफरत नहीं कर सकती। हो सके तो तुम भी विवाह करो, बाकी हम ईश्वर पर छोड़ दें तो बेहतर होगा। अब हम कोई पत्राचार नहीं करेंगे। मैं अब दोबारा वहां कभी भी नहीं आना चाहूंगा और न ही इसके लिए तुम मुझे कभी प्रेरित करोगे। और इसकी वजह यह नहीं है कि मैं तुमसे नाराज हूँ, या नफरत करता हूँ, या फिर कि अब मेरे सामने एक नई जिम्मेदारियां होगी, बल्कि इसलिए कि अब मुझे ऐसा नहीं लगता कि वहां पर मेरी जरूरत है। वह कर्मभूमि अब तुम्हारी है। 
     सत्य की इच्छा के अनुसार, दो सितारों की कहानी जो कभी पीहू को कविता के रूप में सुनाई थी, उसे लिखते हुए अंत में लिखा कि कभी-कभी परिस्थितियों इंसान को दोषी बना देती हैं। खुद के कह गए शब्द कांटों की तरह मन में चुभते हैं। मैंने कभी नियति को पवित्र जल की शपथ देते हुए दोषियों को कठोर से कठोर सजा देने के लिए कहा था। आज अपने शब्द वापस लेता हूँ और नियति से प्रार्थना करता हूँ कि वह तुम्हारी भूलों को यदि क्षमा न कर सके तो भी तुम्हे कोई कठोर सजा न दे। क्योंकि आज मानता हूँ कि वास्तव में कोई दोषी था ही नहीं, क्योंकि हम मनुष्य है, जो अपनी संवेदनाओं से परे नहीं। और शायद इसलिए हम कुछ हद तक लालची और स्वार्थी भी होते हैं। 
     सत्य ने राइटर की बात मान ली और फिर उसने कभी भी उसके जीवन में कोई दखल नहीं दिया और न ही उसे कोई पत्र भेजा। पीहू को लेकर वे दोनों इतने खामोश हो गए या यूं कह लो इतने अंतर्मुखी हो गए कि फिर इसका जिक्र भी फिर किसी से नहीं किया। यहां तक की ज्ञान से भी कुछ नहीं कहा। न उसने और न ही सत्य ने। ज्ञान को आगे चल कर इतना भर पता पड़ा कि पीहू राइटर से प्रेम जरूर करती थी, लेकिन बाबा के कारण कभी स्वीकार न कर सकी। अंत में बाबा के न रहने पर लिव-इन रिलेशन में रहते हुए सत्य से शादी की, और हार्ट प्रॉब्लम के कारण कुछ महीनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। शायद इसीलिए उसने पीहू के बारे में राइटर से फिर कोई बात नहीं की। यहां तक की उसके मृत्यु के बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी। वह नहीं चाहता था कि उसके दोस्त राइटर को अब कोई दु:ख हो। 
      सत्य के कहने पर कि पीहू की इच्छा थी कि राइटर वहां एकबार जाए, शायद इसलिए भी उसने यह बात राइटर से छुपा के रखी। क्योंकि दोनों जानते थे कि यदि एक बार राइटर को मालूम पड़ गया कि पीहू अब इस दुनिया में नहीं है, तो शायद वह कभी भी वहां जाने के लिए तैयार नहीं होगा। और सत्य को उपयुक्त मौका ज्ञान की शादी में मिला जब राइटर उस शादी में शरीक होने के लिए गया।
    राइटर का दोबारा वहां जाना खुद उसके कई सवालों का जवाब था। क्यों प्रथम बार जाने पर उसे वह स्थान जाना-पहचाना नजर आया। उसे पहली बार में ही वे दृश्य दिखे जो उसके चले आने के बाद घटित होने वाले थे। वह अलग-अलग समय रेखा पर एक साथ क्यों चलता रहा।
     और पीहू ने भी तो उसके आने की प्रतीक्षा की थी, मंदिर में खुद को उसके साथ बैठे देखा और बाद में उसे जाते हुए भी देखा था। लेकिन दोनों के साथ ऐसा क्यों हुआ ? संयोग, दैवी-योग... या फिर सितारों की दुनिया का कोई खेल था जो दूर आसमान के पीछे तय हुआ और इस धरती में घटित हुआ ? 
     शादी के लगभन आठ वर्ष बाद राइटर की मुलाकात फिर से ज्ञान से हुई। बातों ही बातों में सत्य का जिक्र हुआ और उसने बताया कि वह अभी भी वहीं है, उसने विवाह नहीं किया और शायद कभी करेगा भी नहीं। वह पीहू के द्वारा शुरू किए गए कार्य को ही आगे बढ़ा रहा है। पीयू के हिस्से की जो भी संपत्ति उसे कानूनन मिली उसकी रजिस्टर्ड वसीयत ध्रुव के पुत्र और पुत्री के नाम बराबर-बराबर कर दी हैं।
     उस दिन राइटर को मानवीय प्रवृत्ति की एक बात समझ में आई, यदि किसी अच्छे इंसान से अज्ञानतावश या क्षणिक लालच में आकर कोई अपराध या भूल हो भी जाए तो उसका बोध होने पर वह अपने आप को कभी क्षमा नहीं करता है, भले ही वह दूसरों के बड़े से बड़े अपराध को क्षमा कर दे, और यह सजा नहीं प्रायश्चित कहलाता है। यदि आप प्रायश्चित कर ले तो फिर किसी को भी आपको दंड देने का कोई अधिकार ही नहीं रह जाता। इस तरह उसने अपनी सजा स्वयं निर्धारित की। अपने जीवन के लक्ष्य को सीमित कर पीहू क्या चाहती थी इस बात पर अधिक ध्यान दिया और ज्ञान के मुताबिक काफी हद तक कामयाब भी हो रहा था। आज पीहू से सशरीर मिले राइटर को लगभग 30 वर्ष गुजरने को हैं, लेकिन जब कभी वह सूनसान और मन को भयभीत कर देने वाले क्षेत्र में अकेला रहा तो उसे अपने आसपास पीहू के होने का आभास होता रहा। फिर उसे अपने एकांत से कभी डर नहीं लगा। महसूस होता जैसे वह अकेला नहीं है, तो फिर डर किस बात का ? 
   रही बात उसकी मृत्युपरांत उसे देखने की, तो उसके मुताबिक उसने उसे दो बार ही देखा है। पहली बार उसी शीशम के पेड़ के नीचे और दूसरी बार नदी के जल में अपने करीब बैठे हुए। वह नहीं कहता कि आप यकीन कीजिए, यह उसके मन का भ्रम भी हो सकता है। किसी से दूर हो जाना या दूर चले जाने पर किसी रिश्तों में बंध जाने को मूव ऑन नहीं कहा जा सकता, जब तक की उसकी स्मृतियां आपके पास हैं। 
      सत्य की रिस्टवाच का उसी समय पर बार-बार बंद हो जाना, नदी के किनारे उसी पत्थर पर बैठे हुए जब उसके हृदय में पीड़ा उठी और जब उसने रो-रो कर पीहू को पुकारा तो उसके प्रतिबिंब का जल में प्रकट होना, फिर एक तूफान का आना, तूफान आने के बाद भी जल का स्थिर और शांत रहना, एक बवंडर का नदी के पानी से उठकर उसकी समाधि पर आकर शांत होना, और सबसे बड़ी बात हर रात पीहू को अपने नजदीक बैठे हुए महसूस करना, उससे बातें करना, उसका अहसास होना, इन सब का उसके पास कोई जवाब नहीं है।
     वहां से लौटने पर भी इस तरह उसके साथ तभी होता जब वह बहुत ही एकांत में होता था। इसका राइटर के पास एक कारण है, और वह है अंतर्मन का सुरक्षा कवच। जब दिमाग किसी बात को ले कर डरने लगता है, तब आपका अंतर्मन दिमाग को स्वतः ही एक सुरक्षा कवच देना शुरू कर देता है, और राइटर के लिए वह सुरक्षा कवच है, उसके अंतर्मन में स्थापित एक विचार कि जब तक पीहू उसके आस-पास है, तो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसके अंतर्मन में बैठे इस विचार ने ही सदैव उसकी रक्षा की, उसे हर भय से मुक्त रखा। वरना ऐसी क्या बात थी कि उसे अधिकतर सूनसान जगहों में ही रहना पड़ा और उसका कोई नुकसान नहीं हुआ। इंसान तो दूर उसे किसी दैवी या भूतप्रेत जैसी किसी बाधा ने भी कभी परेशान नहीं किया। लेकिन इन सब के होते हुए भी पीहू ने उसके वैवाहिक जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जब भी वह घर-परिवार के बीच रहा तो उसने कभी भी अपनी उपस्थिति का आभास तक नहीं होने दिया।
    इस दौरान उसने कुछ कहानियां भी लिखी लेकिन  अधिकांश कहानियां उसी दौर की थी भले ही वह बाद में प्रकाशित हुई हों। फिर धीरे-धीरे वह लिखने से दूर होता चला गया। उसे महसूस हुआ जैसे उसकी यह राइटिंग स्किल उससे दूर चली गई। 
     एक दिन अचानक उसने फिर कलम उठाई और "आह! तुम कहां गए...", लिखा। क्या पीहू की लिखी बात सच हुई, "मैं तुम्हें जिंदगी के हर उस मोड़ पर मिलूंगी जब तुम उदास होगे या फिर.... तो फिर जाओ मेरे प्रियवर, वर्षों बाद ही सही मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी। अपने एक नए रूप में, अपने एक नए अंदाज में, शायद तुमसे प्यार भी कर लूं लेकिन स्वीकार नहीं करूंगी। यदि उन लम्हों को तुम लिख सके तो मैं समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो..."
    इस बारे में मैंने राइटर से कुछ भी नहीं पूछा, आखिर उसका भी व्यक्तिगत जीवन है, यदि उसे कहना होगा या लिखना होगा तो तो वह लिखेगा, यदि नहीं तो फिर नहीं... इसके लिए मैं उसे बाध्य नहीं कर सकता।
    आज उसके मन में पीहू और सत्य दोनों के लिए करुणा है, और एक दुआ भी, "यदि इस ब्रह्मांड में किसी पुनर्जन्म की कोई अवधारणा है, तो मैं नियति और ईश्वर दोनों से वह प्रार्थना करता हूँ कि अब पीहू सत्य की हो। उसके मन में सत्य के लिए प्रेम की वही तीव्रता हो जो इस जन्म में उसके लिए थी..."
      अब आप वह पत्र पढ़िए जो पीहू ने सत्य के लिए लिखा था। उसके बाद राइटर के इस जीवन में इस कहानी का अंत होना है। 

प्रिय सत्य !
     यदि उसके आने से पहले या उसके पढ़ने से पहले तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो फिर कहती हूँ, एक बार नहीं कई बार पढ़ना और खुले मन और विचारों से पढ़ना, एक सहृदय मित्र और इंसान बनकर पढ़ना, या फिर इस बच्चे के पिता बन कर ही पढ़ लेना। तब निश्चित ही इस पत्र की गहराई को तुम समझ पाओगे।
     कभी अपने बॉयफ्रेंड से मैंने कहा था कि काश !. वह मेरी जिंदगी में तुम्हारे आने से पहले आया होता लेकिन ऐसा हुआ नहीं । तो अब तुमसे कहती हूँ कि अच्छा ही हुआ कि फिर तुम मेरी जिंदगी में आए और माध्यम बने उसे मेरी जिंदगी में लाने का। कहते हैं एक दोस्त का सबसे बड़ा फर्ज होता है, अपने दोस्त को खुश रखना, उसकी हर जायज़ इच्छा को पूरी होते हुए देखना, तो इस नाते तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहे जिसने अपना फर्ज अनजाने में ही सही लेकिन ईमानदारी से निभाया।  तो फिर आज तुमसे कहती हूँ कि अब तुम मेरे कहने पर उसे दोबारा यहां लेकर आओ और जब तक वह यहां न आ जाए तब तक मेरी इन बुक्स को जहां रखी हैं, वही रखे रहेने देना। अब उसे ही निर्णय लेने देना कि इनका क्या करना है। यह अधिकार केवल उसका है। अब तो मान लो कि मेरे और उसके बीच का संबंध नाजायज नहीं था, यदि होता, तो नियति ने हम दोनों के मिलन का महत्व तुम्हें न बनाया होता ?
     काश ! तुम हमेशा वही सत्य बन कर मेरे पास रहे होते जिसे मैंने पहली बार इसी अटारी में पूरे विश्वास के साथ गले लगा कर अपने हृदय के सभी दुख-दर्द कहे थे। झूठ नहीं लिखूंगी, बाबा के द्वारा बना देने के बाद भी मैंने तुम्हें किसी भी रिश्ते-नाते से दूर रखना चाहा। वजह थी कि मैं अपनी मृत्यु को सामने खड़ा देखती और सोचती पता नहीं कब मेरी ओर चल पड़े ? फिर धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि तुम वह नहीं हो जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश है। तो फिर ऐसे में तुम्हें मैं क्या दे सकती थी ? न तो मेरे पास जिंदगी थी और न ही तुम्हारे प्रति प्रेम... बस एक मित्रता का भाव था, और सच मानो मैंने इसे पूरी वफ़ा के साथ निभाया। 
    तुम भी साधारण ढंग से सोचोगे तो मन में आएगा कि मेरे बॉयफ्रेंड में ऐसी कौन सी खूबी थी जो तुम्हारे अंदर नहीं थी ? छोटी-छोटी कविताएं, कहानियां, शायरी कहने वाला एक हमउम्र साधारण शक्ल-सूरत वाला लड़का तुमसे श्रेष्ठ कैसे हो गया कि तुम मोहब्बत की जंग में उससे हार गए। तो जान लो, प्रश्न श्रेष्ठता का नहीं अपनी पसंद का था। किसी और की नजरों में या फिर तुम अपनी नजरों में खुद को उससे श्रेष्ठ समझते रहे हो तो वह भी मैं स्वीकार करती हूँ, हो सकता है तुम गलत नहीं हो, लेकिन मेरी नजरों से दखो, तो वह वो व्यक्ति था जिसने मुझे ही नहीं मंगल तक को समझा दिया कि पंछियों का झूठा खाने से कोई बीमारी नहीं होती। इस प्रकृति में उनका भी हक और हिस्सा होता है। 
    इतनी कम उम्र में इतनी व्यापक सोच !! और जब भावुकता में आ जाए तो उससे बच्चा कोई दूसरा नहीं। मैं भी पहले सोचती थी वह बहुत बड़ा एक्टर है। लेकिन धीरे-धीरे एहसास हुआ, यह तो एक ऐसा इंसान जो अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करता है... कोई एक्टिंग नहीं करता। जब भी उसे सच कहना होता है तो वह नजरे झुका के बातें करता है। और जब झूठ बोलना होता है तो सीधे आंखों में देखकर बातें करता है; जैसे उसकी निगाहें सामने वाले से पूछ रही हों, बताओ कितना सच है या कितना झूठ ?
    उसके बाद मंगल ने कभी भी सुबह और शाम को पेड़ में बैठे पंछियों को आधे घंटे से पहले नहीं उड़ाया, और उसके जाने के बाद मैंने जो भी अमरुद अपने बगिया के खाए वह सुग्गा के झूठे थे। दिल में एक ही आरजू थी, शायद यह सुग्गा इस देश से उड़कर उसके देश में कभी तो पहुंच जाए और वह भी उसी सुग्गा का कोई जूठा फल खा ले ? कहते हैं जूठा खाने से प्यार बढ़ता है, प्यार न सही दूरियां तो कम होती ? ऐसी मोहब्बत थी हमारे बीच और मेरे जीवन में उसका स्थान। 
     जानती थी मेरी सोच वृहद थी जिसका पूरा होना संभव नहीं था, फिर भी मैं ऐसा चाहती थी ! तुमसे पूछती हूँ क्यों ? है कोई जवाब ? ठीक है इसका जवाब मैं देती हूँ, वही बात कहती हूँ कि अपनी पसंद की हर इंसान को तलाश होती है। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी, जो मेरी प्यास थी। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। वह भी तो स्वीकार करता था कि यदि वह 19 है तो तुम 20 नहीं बल्कि 30 हो, लेकिन क्या सचमुच ? तो आओ मैं उसके व्यक्तित्व की कुछ बाते लिखती हूँ, जो केवल हम दोनों के बीच रहीं और शायद जिनका आभास तुम्हें भी हुआ हो लेकिन तुम स्वीकार नहीं कर पाए। 
     मैं और मेरे सारे दुःख-दर्द उसके जीवन में प्राथमिक स्थान रखते थे। वह सब कुछ छोड़कर बिना किसी रिश्ते के मेरे साथ रहना चाहता था। उसने जाते-जाते बाबा से यही एक चीज तो मांगी थी, लेकिन हुआ क्या ? कहो, मुझसे बेहतर तो तुम जानते होगे ? अपने प्रेम के प्रति इतना ईमानदार कि उस रात जब उसकी नजर में मै बेखुदी में थी, मुझसे लाख मोहब्बत होते हुए भी, मेरे बार-बार उसे गले लगा कर आई लव यू कहने पर भी, मेरे होंठों का उसके होठों के नजदीक होते हुए भी उसने मुझे किस तक न किया, क्योंकि उस वक्त उसे आभास था कि मैं अपने होश में नहीं हूँ, और आई लव यू शब्द मैं तुम्हारे लिए कह रह हूँ। उसने भी एक सहृदय मित्र की तरह ही मुझे गले लगाया। एक अच्छे पेरेंट्स की तरह मेरी माथे को चूमकर आई टू भी कहा। मेरी सेवा करता रहा, मेरे लिए फिकरमंद रहा, लेकिन प्रतिफल में उसने कुछ नहीं चाहा, जो कुछ चाहा मैने चाहा, पहल मैने की। 
     मंगल चाचा के घर चले जाने के बाद मैं उसके साथ उसी के बिस्तर मे आधे घंटे तक उसे देखती हुई पड़ी रही। जो वह न कर सका मैं उसके साथ करना चाहती थी। उसे अपनी बाहों में भर के जी भर चूमना चाहती थी। मैं अपनी आत्मा और शरीर की सारी हदें पार कर, उसकी होना चाहती थी, किसी भी कीमत पर। 
       तुम्हे याद है सत्य, कभी आपस में हमने एक खेल खेला था, वही गंगा नदी का उद्गम स्थान ? तुमने बड़े ही रोमांटिक अदाज में अपनी तर्जनी को पहली बार मेरे मांथे, मेरी नाक, मेरे होंठ, मेरे सीने के बीच से गुजारते हुए पेट तक ले गए थे ? एक बार नहीं पूरे तीन बार इस खेल को खेला था हमने। याद आया ?  मैंने तुमसे कहा भी था कि तुम्हें कोई कैसे डंप कर सकता है ? उस दिन के बाद मैंने कई बार कोशिश की कि तुम्हारे लिए अपने अंतर्मन में पति-पत्नी या फिर प्रेमी-प्रेमिका वाली फीलिंग को महसूस कर सकूं ? कई बार तुम्हें खुद छेड़ने की कोशिश भी की, लेकिन मेरे अंतर्मन में ऐसी कोई भावना जागृत नहीं हुई। लेकिन यहां तो सब कुछ विपरीत था, वह निश्चिन्त खुले आकाश के नीचे सो रहा था, और मैं उसे केवल सोते हुए देख रही थी। न तो वह मुझे छू रहा था न ही गंगा नदी के उद्गम स्थान का एहसास करा रहा था। फिर भी पता नहीं क्यूं उस रात मात्र उसे देखकर, मेरे मन में सभी भाव जागृत हो रहे थे। क्या इसलिए कि मैंने शराब पी रखी थी या किसी नशे में थी ? यह भी कैसे मान लूं ? इससे पहले पिछली तीन रातों में शराब पीने के बाद मैं तुम्हारे साथ ही सोई थी, तो फिर मेरे मन में ऐसे भाव क्यों जागृत नहीं हुए ?
      कभी मैंने उससे पूछा था, "बताओ ! दुनिया की सबसे मीठी चीज क्या है...?", उस दिन उसने कोई जवाब नहीं दिया था, वही प्रश्न आज मैं तुमसे नहीं करूंगी, बल्कि उसका जवाब दूंगी। तो सुनो, अपने प्रिय या प्रियवर को कसकर अपनी बाहों में भरकर उसके होठों को चूम लेना, ये दुनिया का वह सुख है जिसका एहसास सबसे मीठा होता है, और उस रात मैं जिंदगी के इसी मीठे एहसास से गुजरना चाहती थी। वह मेरी कल्पना के हर एक बिंदु में समाहित था। 
      अब इससे अधिक तुम्हें क्या लिखूं सत्य ? सब कुछ भूल कर मैं सिर्फ तुम्हारी हो गई, यही नाटक करते हुए मैंने तुम्हारे साथ जिंदगी के अंतिम कुछ दिन वैवाहिक संबंधों में जीना चाहा। लेकिन आज महसूस होता है, यह एक फरेब था। अपने अंतर्मन के सच को झुठलाना, एक ऐसा छल जो मैंने खुद के साथ किया। यदि आज यह सब स्वीकार करने में तुम मुझे चरित्रहीन भी समझना चाहो तो समझ लेना, लेकिन मैंने तुम्हें कोई धोखा दिया या मरने के आखिरी पल में किसी सच को तुमसे छुपाया, इस अपराधबोध से तो मुक्ति मिलेगी, और शायद तुम्हें भी ? अब तुम अपने आप को बखूबी दिलासा दे सकते हो कि तुमने अपने चरित्रहीन पत्नी का त्याग करके कोई गुनाह नहीं किया। लेकिन फिर भी कहती हूँ, जरा सोचना... यह बात तो तुम्हें आज मालूम पड़ रही है न ? उस दिन तो मालूम न थी जब तुम मुझे छोड़ कर गए थे ?
       मैं तुम्हें शादी के लिए सदैव मना करती रही लेकिन देखो तो, उसे अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जीने की लालसा इतनी प्रबल थी कि अंतिम दिन ही सही मैंने उसे शादी के लिए स्वयं ही प्रपोज किया था। करने का रास्ता भी निकाल लेती, यदि तुमने बाबा को हम दोनों के बीच ला कर खड़ा न कर दिया होता। या फिर जाते समय जो उसने कविता लिखी, वह बाबा को न देकर मुझे दी होती, तो मैं उसे उसी दिन ही रोक लेती, उसे अपने जीवन से कभी नहीं जाने देती।
   अब मैं प्रेम की किसी फिलासफी में नहीं जाऊंगी, मैं तुमसे सिर्फ एक साधारण-सी बात कहूंगी। किसी भी रिश्ते को हृदय से निभाने के लिए आपस में विचारों का मिलना जरूरी होता है, तो प्रेम संबंध इससे अछूता कैसे रह सकता है ? 
   हां सत्य यह सच है, मैं स्प्रिचुअल जीवन जी रही थी और तुम मेट्रलिस्टिक। कहने का अर्थ यह है कि हम एक दूसरे के टाइप के थे ही नहीं, जैसा कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड ने कभी तुमसे कहा था। उस समय तुम मासूम थे, दुनियादारी से परे थे और उसे महफिलों का बयफ्रेंड चहिए था, जो उसके साथ पार्टी इंजॉय कर सके, इतने खुले विचारों का हो कि अपनी महबूबा को किसी दूसरे की बाहों में नाचते-थिरकते देख सके, जो तुम बन न सके और उसने तुम्हारे साथ ब्रेकअप कर लिया। जैसा कि तुमने मुझे स्वयं बताया था, वैसे वह हर लिहाज से एक अच्छी लड़की थी। तो फिर मैं कहा गलत हुई ?
      जिस समय तुम मेरी जिंदगी में आए उस समय मेरे जीवन में सिर्फ लिटरेचर का ही प्रभाव नहीं था, बल्कि मेरी संभावित मृत्यु ने मुझे ऐसा बना दिया। मैं भौतिकता से परे होती चली गई। एक ऐसी अध्यात्मिक दुनिया जहां किसी को पा लेने का कोई सपना नहीं किसी को खो देने का कोई डर भी नहीं। बस बची हुई जिंदगी को अपने मन मुताबिक इंसान के साथ जीना चाहती थी, और तुम ? तुम तो जिंदगी के उसे दौर में थे, जहां इंसान नए-नए सपने संजोता है। सुखद भविष्य की चाह में वर्तमान को परिश्रम की आग में झोंक देता है। उसके मन में किसी को पा लेने की खुशी, रिश्तो में बांध लेने की चाहत प्रबल होती है। अपने जीवन में हर्ष और उल्लास के सभी साधन जुटाना चाहता है।
    अब यदि तुम्हें सच को स्वीकार करने की हिम्मत है, तो स्वीकार कर लो। मैं तुम्हारा एक ऐसा ही साधन थी न कि प्यार। जिंदगी के किसी भी मोड़ पर मैं तुम्हारा साथ न छोड़ दूं, इसलिए तुम मुझे विवाह-बंधन में बांध लेना चाहते थे। कहो तो झूठ है ? ऐसा इंसान किसी को अपनी सैंपथी तो दे सकता है किंतु काइंडनेस नहीं। लेकिन कहते हैं नियति अर्थात प्रकृति अपना खेल खेलती है। उसने तुम्हारे माध्यम से ही मेरे सामने एक ऐसे इंसान को लाकर खड़ा कर दिया जिसने पीहू को पीहू से मिला दिया। जो मेरे देखे अधूरे स्वप्न को पूरा करने के लिए मेरी जिंदगी में आया। 
     अभी भी तुम कल्पना कर सकते हो तो थोड़ा-सा और कर लो। एक व्यक्ति जिसे जिंदगी से कोई मोह नहीं, जीवन जीने के प्रति उदासीन हो चुका था। क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, उसे खुद पता नहीं था, तो फिर क्यूं भूले-भटके मेरी ही बगिया में आ बैठा ? उसे भी तो प्रतिपल आभास होता रहा, जैसे कि वह पहले भी यहां आ चुका है। शायद इसलिए कि मैंने उससे पहली बार बिछड़ने का स्वप्न देखा और उसने यहां खुद के दूसरी बार आने का पूर्वाभास किया।
    जब हम दोनों को एक दूसरे से मिलने और बिछड़ने के पहले ही इसका पूर्वाभास हो चुका था, तब भी उसने पूरी ईमानदारी के साथ जब मैं रोई मुझे गले लगा कर वह भी मेरे साथ रोया, और जब वह दुखी हुआ तो ठीक यही मैंने भी किया। क्यों ? शायद इसलिए की हम दोनों ही जीवन और मृत्यु को निकट से महसूस कर चुके थे। किसी को प्राप्त कर लेने या खो देने की चाहत से दूर हम एक साथ जिंदगी को जीना चाहते थे। और प्रेम तो उसी से होता है न जिसके साथ हम जिंदगी को जीना चाहते हैं न कि गुजरना।
      मैं भी उसके साथ जिंदगी जीने के लिए किसी भी हद को पार काने के लिए तैयार थी, लेकिन ? तुमने तो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उसे बाबा के सामने ले जा कर खड़ा कर दिया ? इतना ही नहीं अपने परिवार के लालच और अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मुझे विवाह के लिए तैयार करना चाहा। तुमसे अधिक तो वो ही चाहते थे कि तुम मुझी से विवाह करो। नहीं तो भला मेरी आंखों में प्रतिपल उसकी तस्वीर, इंगेजमेंट फिंगर में उसके नाम से पहनी अंगूठी, उसकी टीशर्ट को देख कर भी भला कौन स्वाभिमानी पुरुष मुझसे ही विवाह करना चाहता ? लेकिन तुमने चाहा, क्यों ? 
      क्या सिर्फ इसकी एकमात्र वजह मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम था ? इल्जाम नहीं लग रही बल्कि जो देखा, जैसा महसूस किया, उसे ही लिख रही हूँ। तुम्हारे सभी फैमिली मेंबर्स से मिलने के बाद बहुत दिनों तक मैने सोचा, तब इस निष्कर्ष में पहुंच पाई। उन्हें मेरे ज्ञान, मेरे स्वभाव, मेरी रुचि से कोई मतलब नहीं था। हां मेरी सुंदरता की खूब तारीफ करते। 
     शायद उन्होंने मुझे और लड़कियों की तरह ही समझ लिया था, जो अपने रूप सुंदरता की तारीफ सुन फूल के कुप्पा हो जाती हैं, और उसी एहसान के बोझ के तले दबे सब कुछ स्वीकार करती चली जाती हैं। उन्होंने जब भी मुझसे पूछा तो यही पूछा कि मेरे बाबा के पास संपत्ति कितनी है, रुपए पैसे कितने होंगे और उनके न रहने पर मालिकाना हक कितने लोगों के बीच विभाजित होगा। हो सकता है, तुम इनसे परे रहे हो, लेकिन बार-बार यह कहना कि या तो तुम पीहू से शादी करो या फिर रिश्तो के लिए आए संबंधों में से किसी को स्वीकार करो, तुम्हारी बातों को झूठा नहीं साबित करता था ? जिसकी बातें झूठी थी वो इंसान कितना सच्चा होगा, बताओ तो जरा मुझे ? 
    फिर मेरी जिंदगी में एक ऐसा लड़का आया जिसके पास मुझसे कम कुछ भी न था, लेकिन वह सब कुछ छोड़ कर मेरे पास रुकना चाहता था, ठहरना चाहता था, मेरे साथ जिंदगी जीना चाहता था, बिना किसी रिश्ते-नाते के। याद करो, कभी तुमने ही मेरे और ज्ञान भईया के सामने उससे यहीं रुकने के लिए कहा था न ? तो फिर उसके साथ बगिया से घर तक पहुंचने के बीच ऐसा क्या महसूस कर लिया कि तुम्हारा इरादा बदल गया ? हमें कुछ देर हो गई और तुम डर गए ? तो फिर यदि कहीं वह रुक जाता तो ? कितने दिनों तक उसे तुम मेरे नजदीक सहन कर पाते ? क्या उस दिन उसने यह न सोचा होगा कि इसके पहले तो बाबा को उससे कोई शिकायत नहीं थी, फिर इतना रूखा और अजीब बर्ताव उसी दिन उसके साथ क्यों हुआ ? अचानक ही बाबा उसके लिए इतने कठोर क्यों हो गए ? वह तुम्हें उसी दिन ही समझ गया था, फिर भी तुम्हारे उज्जवल चरित्र को सभी के सामने उज्जवल ही रहने दिया, यहां तक की मेरे सामने भी। उसने सबके मन की बात पढ़ ली और शायद इसीलिए चुपचाप यहां से चला गया। बिना हंगामा किये, बिना कुछ कहे, बिना कोई इल्जाम लगाए। हो सकता है इस षड्यंत्र में उसने मुझे भी भागीदार समझा हो, आखिरकार बाबा का संदेश लेकर मैं ही तो उसके पास गई थी न ? 
     वह मेरे प्रेम के लिए नहीं तरस रहा था, न ही मुझसे कोई सहारा चहता था, अरे उसने तो इस तरह का प्रेम बहुत कम उम्र में पा लिया था, और उसी उम्र में उसका त्याग भी कर चुका था। वह भिखारी नहीं था, लेकिन बाबा के सामने तुमने तो उसे भिखारी बना दिया !! उसने प्रेम की प्यास तो मेरी आंखों में देखी, जिसने पूरी इज्जत और सम्मान के साथ उसे स्वीकार किया। 
     मुझे वो दिन आज भी याद है जब मैं उसके साथ पहली बार नदी पार के मंदिर में गई। वह मंदिर वही था जिसमें उसके साथ खुद को देवी मां के सामने घुटने के बल बैठे हुए पीछे से देखा था। मंदिर का प्रवेश द्वार और उसके अंदर का स्वरूप देख कर मैं खुद हैरान थी। इतना ही नहीं स्वप्न में जो और जिस रंग के कपड़े हमने पहने थे, ठीक उसी तरह के कपड़े हम उस दिन भी पहने हुए थे। तुम्हारे पूछे जाने पर जिसका ज़िक्र मैंने तुमसे भी किया था। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है कि उस आदिवासी लड़के ने मंगल से ये क्यूं कहा कि उसने हम दोनों को कुछ दिन पहले ही एक साथ मंदिर में देखा था, जबकि हम वहां तो पहली बार ही गए थे न ? मैं उसी पल समझ गई थी कि उसका मेरी जिंदगी में आना महज एक संयोग नहीं पूर्व निर्धारित था। फिर भी मैंने उसे दिन अपने स्वप्न का जिक्र उससे नहीं किया, क्यों ? 
     मैने नदी के किनारे पत्थर में बैठे हुए उसकी आंखों में कुछ देर तक देखा था। मन में एक ही लालसा थी, कही तो उसकी नजरों में मुझे या मेरे प्रेम को पा लेने की याचना दिखे, लेकिन नहीं दिखी। उसकी स्थिर और गहरी नजरों ने मुझसे मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना कहा तुम जैसा चाहोगी वैसा होगा। तो क्या उसे मुझसे प्रेम नहीं था ? था, लेकिन अपने प्रेम का आवरण वह मुझे नहीं पहनना चाहता था। सीधे शब्दों में कहूं तो मुझे मजबूर नहीं करना चाहता था। सब कुछ उसने मुझ पर छोड़ दिया था। सीधे शब्दों में कहूं तो उसकी आंखों में मुझे जो प्रेम दिखा वह किसी लालच से परे था। 
      वह भी जिंदगी जीना चाहता था गुजरना नहीं। और जिंदगी जीने के लिए आपकी पसंद का इंसान आपके साथ होना चाहिए। बस यही तो जरूरी होता है। वह प्रेम के क्रम की प्रत्येक अवधारणा से परे था। पहला प्रेम, दूसरा प्रेम, तीसरा प्रेम इत्यादि से अलग और इसे उसने हम सबके सामने जताया भी और बताया भी, जब उसने मेरी तारीफ तुम्हारे और ज्ञान भैया के सामने की। उसे प्रेम के होने या न होने पर यकीन था। यदि प्रेम है, तो वह किसी भी क्रम से परे हैं, और यदि नहीं है, तो फिर कोई बात ही नहीं ? आपके जीवन में व्यक्ति के आने का क्रम तो हो सकता है किंतु प्रेम का नहीं। क्योंकि यह तो मन का भाव है, जो सदैव एक जैसा होता है। लेकिन हां उसकी तीव्रता अलग-अलग हो सकती है, और सच पूछो उसके प्रति जो मेरे हृदय में प्रेम था उसकी तीव्रता सर्वाधिक थी। जैसे कि कभी उस लड़की के प्रति उसके हृदय में रही होगी।
     जिस व्यक्ति से ये एहसास पहली बार मिलता है वो हमारे लिए यादगार होता है; और हम प्रेम को उस व्यक्ति विशेष से सदैव के लिए जोड़कर रखने की भूल कर लेते हैं। ऐसी मूर्खता केवल वही करते हैं जिन्हें सिर्फ चेहरे से प्यार होता है, फिजिकल अपीरियंस से मोहब्बत होती है। फिर ऐसे इंसानों को तो सात बार मोहब्बत हो सकती है न !! क्योंकि मैं ही नहीं यह दुनिया मानती है, कि इस धरती में एक ही शक्ल-सूरत के कम से कम सात इंसान तो होते ही हैं ? 
    तुम अच्छी तरह से जानते थे कि बाबा तुम्हे पसंद करते है और मैं उनकी मर्जी के खिलाफ कभी नहीं जाऊंगी, तो तुमने उनका सहारा लिया ? और उसका त्याग देखो, मुझसे लाख मोहब्बत सही लेकिन वह मुझे किसी भी दुविधा में नहीं डालना चाहता था। उस दिन बाबा ने उससे क्या कहा, उसने कुछ नहीं बताया। मरने के पूर्व बाबा ने एक-एक बात मुझसे बताई थी। किस तरह उसने पैर पकड़ के बाबा से मुझे मांगा था, उफ़ ! और मैं दुविधा में रही कि वह मुझे छोड़ कर चला गया। एक तरह से देखा जाए तो उसने भी मुझे कुछ नहीं कहा, जाते समय जो कुछ भी कहा तो उसी लड़की से कहा, जिससे जुदा होते समय कुछ न कहा पाया। सिर्फ मेरे लिए इतना था, "मुझे तुम्हारे होने से प्यार है पीहू, चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", इन्हीं शब्दों में मैं आज उसे देखने की कोशिश करती हूँ, और शायद वह भी करता हो। क्योंकि उसने कभी मुझसे कहा था कि शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं विजन होता है।
     इसी अटारी में अंतिम दिन उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा था, "तुम्हें खुद पर बहुत गुरूर है...,?", और मैंने कहा, "... पहले था, लेकिन माइलस्टोन के लिए लिखी गई तुम्हारी कविताओं को पढ़कर जाता रहा..."
     मैं जो उससे कह न पाई यही एक बात थी, आज तुमसे कहती हूँ सत्य, हर लड़की को अपनी सुंदरता या अपनी खूबियों पर गुरुर होता है, वो गुरूर मुझ में भी था। लेकिन जब मैंने माइलस्टोन के लिए उसके द्वारा लिखी गई कविताओं को पढ़ा, महसूस किया तब समझ में आया कि उसके जीवन में आने वाली वह लड़की कितनी महत्वपूर्ण रही होगी, जिसके जुदा होने के बाद भी उसके प्रति इतने खूबसूरत एहसास हैं। एक ऐसी लड़की ने उससे मोहब्बत की, उसे बदल कर रख दिया, वो भी बिना कहे, बिना जताए। तो अब तुम ही बताओ मुझे किस बात का गुरुर होता ? उसने कभी उस लड़की से मेरी तुलना नहीं की, कभी उसका जिक्र खुद से नहीं करना चाहा। वह जानता था कि उसके ऐसा करने पर मैं हर्ट होती, इसलिए उसने मुझे एक अलग ही मुकाम पर रखा। वो तो मैं ही थी जिसने कुरेद-कुरेद कर उसके बारे में उससे पूछा। 
    जाने से पहले उसने मेरे बाल संवारे, मेरे पैरों को दबाते हुए मुझे एक वचन दिया। और देख लेना सत्य, कभी यदि तुम उससे दोबारा मिले तो उसे अपना वचन निभाते हुए पाओगे, जब तक मैं इस धरती में हूँ वह मेरा इंतजार करेगा; और इसीलिए मैं चाहती हूँ कि वह यहां पर एकबार आए। मेरी मृत्यु को स्वीकार कर, जी भर के रो ले और फिर जीवन-पथ पर आगे बढ़ जाए। 
     अब अपनी कहती हूँ, उस दिन मैंने क्या किया...
 मैंने एक ही आईने में उसकी सूरत के साथ अपनी भी सूरत देखी। उसके गाल में किस किया, और बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसकी तरफ कुछ देर तक देखती रही। मैं उस पल चाहती थी कि वह मुझे अपनी बाहों में ले कर प्यार करे, मुझे भी किस करे। यहां तक की यदि उसने मेरे होठों को चूमने की कोशिश भी की होती तो भी मैं उसे न रोकती। लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया, बस आईने में मेरी तरफ देखता रहा। और मैं ? चाह कर भी उसके होठों को न छू पाई बावजूद यह जानते हुए कि वह भी अपने सारे दुख-दर्द भूल कर मेरे साथ जिंदगी जीना चाहता है। उसी पल मैने निर्णय ले लिया था कि उसका प्यार पाने के लिए मुझे यदि उससे शादी भी करनी पड़ी तो मैं करूंगी।
     साजिशन उसे भी मेरी जिंदगी से दूर कर दिया ? काश ! उस शाम तुमने उसके आंसुओं को देखा होता, उसके दर्द को महसूस किया होता ? उसकी ही बात क्यूं करू अपनी भी करती हूँ। मैं न सही तुम तो मुझे अपनी पत्नी मानते थे ? तो फिर तुमने अपनी पत्नी का हाल भी देखा होता। उस शाम मैं उसकी पीठ से लिपट कर जी भर रोई, उसके कदम पकड़ कर सभी के संभावित गुनाहों की मुआफी मांगी। लेकिन उसने यही कहा, "नहीं पीहू, वो मेरे भी बाबा है...", ये थी उसके प्यार की इंतहा, और मेरी ? 
     जानते हुए भी कि मैं इसके जीवन की पहली लड़की नहीं जिसे उसने चाहा, हा सत्य इतना तो मैं समझ गई थी कि उस लड़की के साथ जिंदगी जीने की उसकी चाहत पूरी भले न हुई हो लेकिन उसके जीवन से वह लड़की कभी गई ही नहीं, फिर भी मैने उससे प्यार किया, ये थी मेरे प्यार की इंतहा। 
      इतना मान-सम्मान और एकदूसरे से जुड़ी हर चीज से मोहब्बत करने वाले दो इंसान को देखते ही देखते उनकी जिंदगी से दूर कर दिया गया !! तो फिर मेरी अंतरात्मा कैसे क्षमा कर देती उन लोगों को ? लेकिन मैंने सबको क्षमा किया, तुम्हे भी किया, लेकिन अपने आप को कैसे कर देती ? मैंने खुद को सजा दी, शायद इसलिए कि मैं अच्छी तरह से जानती थी, मेरे ऐसा करने से सभी दोषियों को अपने आप सजा मिल जाएगी। जैसे कि सोने के पिंजड़े में कैद उस बुलबुल ने स्वयं को दी। लेकिन तुम क्या जानो, यह कहानी तो उसने बाबा से कही थी, तुमसे नहीं। कविता के रूप में एक कहानी उसने मुझे भी सुनाई थी, दो सितारों की कहानी। जब मिलो तो तुम भी सुन लेना।
   तुमने मुझसे एक रिश्ता चाहा तो तुम्हे दिया, तन और धन से दिया। हो सकता है एक दिन मन से भी देती। हृदय से भी अपना लेती। इसके लिए जरूरी था कि तुम मेरे पास ठहरते, लेकिन तुमसे तो यह भी न हुआ। और एक था जो बिना किसी लालच के बिना मतलब के मेरे पास रुकने के लिए तैयार था। तुलना नहीं कर रही, बता रही हूँ। क्या ऐसे इंसान के साथ तुम्हें छल करना शोभा दिया ? किस गौरव की अनुभूति कर ली तुमने ? जब मैंने उसके पैर छूकर मन ही मन सबके लिए क्षमा मांगी, तो उसमें तुम्हारा नाम भी था। क्योंकि मेरे सिक्स सेंस को अंदाजा हो गया था कि क्या और किसके द्वारा हुआ होगा।
     मैंने तो तुम्हें अपना मित्र माना था न ? तुम वह पहले पुरुष थे जिसके साथ मैंने एक ही बिस्तर शेयर किया। पहली बार गले लगी, अपने सारे दुख-दर्द कहे थे। पहले दिन ही कितने विश्वास के साथ एक ही बिस्तर पर मैं तुम्हारे साथ सोई थी। यह बात भी सही है कि पहले-पहल मैंने तुम्हें किसी भी रिश्ते से दूर सिर्फ इसलिए रखना चाहा कि मैं कुछ वर्षों या महीनों की मेहमान थी लेकिन प्रमुख वजह यह थी कि मैं पहली नजर के प्यार पर यकीन नहीं करती थी। हम दोनों का मन आपस में न मिल पाया तो उसमें भला उसका क्या दोष ? हम सभी ने मिलकर उसे क्यों सजा दी ? 
    यदि कोई भींगी आंखों से, रोते हृदय से, सिसकती आत्मा से, बिना कोई उलाहना दिए, बिना कोई बद्दुआ दिए, चला जाए, तो कहते हैं उसकी आह लगती है। उस आह से ईश्वर को पीड़ा होती है, नियति रूठती है। आह ! जो कलेजा चीर देती है... दिल के टुकड़े-टुकड़े कर देती है। और उस शाम मैंने ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना की थी कि वह आह सिर्फ मुझे लगे। मैं चाहती तो इस पत्र को खुला छोड़ सकती थी। अपने हस्ताक्षर से सील बंद करने की जरूरत ही नहीं थी। क्योंकि इस पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा, जो उसके पत्र में न लिखा हो। जब यह पत्र इसी तरह सील बंद तुम तक पहुंचेगा तब शायद तुम उसकी ईमानदारी और सच्चाई को समझोगे। जो तुम्हारे नाम से लिखे पत्र की चोरी न कर सका, छुप कर पढ़ न सका, तो तुम्हारी कथित पत्नी को तुमसे कैसे चुरा लेता। जो कुछ भी हुआ मेरी सहमति से हुआ।
      उस रात तुम मुझे बेहोश उसके पास छोड़कर चले गए थे, यह उसी का उत्तर है। अब तो तुम समझ गए होंगे न कि मुझे उससे प्यार क्यों न होता ? हमारी विचारधारा, हमारी सोच, हमारी रुचि, अभिरुचि ही नहीं हमारा चरित्र भी एक दूसरे से मिलान करता था; और ऐसे व्यक्ति को तुमने कटघरे पर खड़ा किया। उस दिन तो मैंने समझा था कि यह इच्छा पूर्णत: बाबा की है, खामोश रह गई। लेकिन जब दो साल बाद मालुम पड़ा कि वह तुम्हारे द्वारा प्रेरित थी... तो बहुत अफसोस हुआ। मैं बाबा के सामने शर्मिंदा हुई कि ऐसे इंसान को मैंने अपना मित्र माना ? और बाबा मेरे सामने शर्मिंदा थे कि ऐसे इंसान को उन्होंने मेरे पति के रूप में निर्धारित किया ? तो फिर कैसे अपने अंतर्मन और आत्मा में बसे प्रेम को तुम्हें दे सकती थी ?  वो तो मेरे पास बचा ही नहीं था; जिसका था वह अपने साथ ही ले गया। अब सोचो सत्य तुम्हें मिला क्या ? सिर्फ मेरा जिस्म ? 
   बावजूद इन सब के भी मैं तुम्हें अंतर्मन से न सही लेकिन अपने इस चंचल मन से वरण करती। उसे नियंत्रित कर अपनी सारी वफाएं देती। तन-मन-धन या फिर मन, वचन और कर्म से भी। लेकिन अंतर्मन से तब भी नहीं, क्योंकि तुम मानो या न मानो मन और अंतर्मन में भेद होता है। 
      और तो कोई मेरा रिश्तेदार नहीं और न कोई निकटतम सगा संबंधी है, सिवाय ध्रुव भैया के। तुम्हारे जाने के बाद एकदिन मैने ध्रुव भैया से फोन में बात की और उनसे ये सब कुछ स्वीकार किया। उसके बारे में भी बताया और यह भी कि अब तुम मेरे पति हो। इसलिए अब उन्हें भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं होगा। जैसी मैं उनके लिए थी, अब वैसे ही तुम होगे। तो अपने ही दिए गए श्राप के मुताबिक अपनी नजरों में मेरी तस्वीर लिए या तो तुम यही भटकते रहो, अब अपना ही किया वादा निभाओ, यह जानते हुए कि मुझे तुमसे कोई मोहब्बत नहीं थी, या फिर यहां से दूर चले जाओ। जियो एक खुशहाल जिंदगी, दूसरी शादी करो, छोड़ दो मेरा मोह। या फिर अपनी दुल्हन को चाहो तो ले आओ इसी घर में रखो, और जियो उसके साथ एक नई जिंदगी। मैं किसी भी रूप में कोई बाधा नहीं पहुंचाऊंगी, तुम्हारा कोई नुकसान नहीं करूंगी। तुम्हारे घर वालों को जो मुझसे चाहिए था वह उन्हें मैंने दे दिया। तो मैं अब तुम सभी से मुक्त हुई न ? अब जो भी बची हूँ, उसकी हूँ। एक दिन वह अवश्य आएगा, और मुझे लेकर यहां से ले कर चला भी जाएगा। तो फिर तुम्हें मुझसे डरने की कोई जरूरत ही नहीं। यही तो जाते समय मैंने उससे मांगा था।
     रिग्रेट यानी पछतावा, यदि कोई है तो सिर्फ इस बात का है, जब मेरे अपने लोगों ने उस पर इल्जाम लगाया, उसे मेरी जिंदगी से दूर करने का फैसला लिया, तो मैंने उसका साथ नहीं दिया। भले ही उसका हाथ पकड़ कर न खड़ी होती लेकिन उसे मेरी जिंदगी से क्यों दूर किया जा रहा है, यह तो पूछ ही सकती थी ? उसे रोकना तो दूर, मैं यह भी न कर पाई !! यह तो कर सकती थी न ? लेकिन नहीं किया।

"उमा क्षमा श्रापहुँ ते भारी।
अपने कर्म जांहि अपकारी।"

    यह बात कभी भगवान शिव ने माता सती से कहीं थी। अर्थात किसी को बद्दुआ या दंड देने से अच्छा है, उसे क्षमा कर देना। यही उसने किया। उसने किसी को बद्दुआ नहीं दी, किसी के प्रति अपने मन में कोई दुर्भावना नहीं रखी। किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया और अपनी समस्त चाहतों के साथ हम सभी की जिंदगी से खुद को दूर कर लिया। उसने सारे फैसले नियति पर छोड़ दिए और खुद इसे अपनी किस्मत समझ चुपचाप यहां से चला गया। उसकी यादों में मेरा प्रतिपल तड़पना, भटकना, रोना ये नियति का फैसला था। मैंने स्वीकार किया, लेकिन कब तक ? खुद की जान नहीं ले सकती थी, बाबा जो जीवित थे। और उसके बाद भी कैसे ले लेती ? कभी मैंने ही तो उसे बिखरने से बचाया, जीवन जीने की प्रेरणा दी थी, तो उसकी प्रेरणा को झूठा कैसे होने देती।
   पागलों की तरह दो महीने भर भटक लेने के बाद अचानक ही मेरे मन में ख्याल आया,  कहते हैं प्रत्येक प्राणी का जन्म निर्धारित समय में कुछ पूर्व-निर्धारित कार्यों को पूर्ण करने के लिए होता है। मैं सोचने लगी आखिर मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है। यही प्रश्न बार-बार दिमाग में उठता। और एक दिन मेरी मुलाकात बगिया में भगीरथ से हुई। मुझे उसकी कही बात याद आई। मुझे एक रास्ता दिखा और मैंने मन ही मन फैसला लिया। बच्चे जो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन साधनों के अभाव में, पढ़ नहीं पा रहे हैं, उन्हें शिक्षित करने में उनकी मदद करना। एक दिन जब उसके साथ मैं उसकी बस्ती में गई। वहां की गरीबी, अशिक्षा, गंदगी देखकर मन में एक और लालसा ने जन्म लिया, उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना। 
    मैंने उस दिन नदी घाट के उसी पत्थर पर बैठकर बहुत देर तक सोचा जहां कभी मैं उसके साथ बैठी थी। सच पूछो तो उस दिन जीवन जीने के प्रति मन में लालसा ने जन्म लिया था। जहां मैं सब कुछ भूल गई, यहां तक की अपनी संभावित मृत्यु को भी। मैने भी उसके साथ जिंदगी जीनी चाही थी। उसी पत्थर पर उस दिन मैं भगीरथ के साथ बैठी थी। आज उस बच्चे के चेहरे में जिंदगी जीने के प्रति उत्साह देख रही थी। मेरे सारे प्रश्नों के जवाब मुझे मिल चुके थे। उसी दिन मैं भूल गई कि कभी डॉक्टर ने मेरे पापा से कहा था कि मुझे हार्ड वर्क नहीं करना है, खुद को थकने नहीं देना है।
   अचानक मेरे मन में ख्याल आया, मुझे तो ईश्वर ने इच्छा मृत्यु का वरदान दिया है। मृत्यु का साधन तो लेकर मैं खुद ही पैदा हई हूँ !! तभी अपने जीवन काल में कुछ पूर्व-निर्धारित कार्यों को पूर्ण करने का मैने फैसला लिया। अपने आप को परिश्रम की आग में झोंक दिया। बाबा और तुम्हारी सेवा तो करती ही थी; लेकिन अब जीवन का एक लक्ष्य था। मंगल को साथ लेकर मैं अपनी कर्मभूमि में कूद गई। जो भी समय मिला उसमें बच्चों को पढ़ाया। गरीब और असहाय लोगों के लिए साधन जुटाने का प्रयास किया। लिखने का अर्थ यह है कि खुद को इतना थका लेना चाहती थी कि एकदिन मेरा दिल स्वयं फट जाए। और देखो तो आज वही हो रहा है। हृदय के स्पंदन धीरे-धीरे समाप्ति की कगार में हैं। अब प्रत्येक पल मृत्यु का इंतजार है, उसी तरह जैसा कि कभी उसने हमारे सामने अपनी मृत्यु के लिए कहा था। उसे जो भला-बुरा कहना था, मैने वह लिख दिया और तुमसे जो कहना था वह भी इस पत्र में लिख दिया।
     अंत में एक ही बात लिखूंगी, तुम्हे बार-बार विवाह के लिए मना किया और न ही अपने जीवन का कोई सच तुमसे बताया, तुम्हार दिल दुखाया। यदि इस बात के लिए तुम मुझे अपना अपराधी मानते हो, तो यह भी ठीक है, स्वीकार करती हूँ। लेकिन साथ ही साथ
तुम भी निर्धारित कर लो अपने आप के लिए कोई सजा, नहीं तो एक न एक दिन वो अवश्य आयेगा और मुझे अपने साथ ले जाएगा। क्योंकि वह मेरी नियति है। इसलिए मन में यह ख्याल आते हुए भी, किसका रस्ता देखे ये दिल ये सौदाई, मैं उसका रस्ता देख रही हूँ, और देखती रहूंगी।
       इसके आगे अब नहीं लिख सकूंगी, लगातार पूरा दिन लिखती ही तो रही हूँ। फिर इन सब को व्यवस्थित रखना भी तो है ? मृत्यु के कुछ पूर्व ही इंसान बड़ा दयालु और क्षमावान हो जाता है, तो शायद इसलिए मैंने तुम्हें अपने प्रति किए गए किसी भी अपराध और उपेक्षा के लिए क्षमा किया। शायद तुम भी मुझे कर सको ? यदि नहीं तो कोई बात नहीं। यदि कोई पुनर्जन्म होता है तब हमारी बैलेंस-शीट तो बराबर हो ही जाएगी।
इसी आशा के साथ अब तुम्हे अलविदा...
तुम्हारी मृत पत्नी
पीहू !

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