अजनबी - 4 (वह पत्र)

अंत की शुरुआत 

कभी मैंने सोचा था, जो कहानी 08 नंबर 1997 से शुरू हुई वो 12 नवंबर 2002 को खत्म हो गई। लेकिन मैं गलत था। कहानी का आखिरी पन्ना लिखा जाना तो अभी बकी था।
कहानी का एक किरदार शारीरिक बंधनों से मुक्त हो चुका था। मैं भी जीवन पथ पर आगे बढ़ ही गया था। सत्य पीहू की यादों को हृदय में संजोए, उसके काम को आगे बढ़ते हुए वहीं रह गया। एक किरदार ने फिर दूसरे किरदार को अकेला और तन्हा छोड़ दिया। मंगल अपनी मुंह बोली बेटी को खोकर भी सत्य के साथ उसके संघर्ष में पूरी निष्ठा के साथ शामिल रहा। हो सकता है कि यह बात उसके हृदय में हमेशा चुभती रही हो कि अंतिम क्षणों में सत्य पीहू के पास नहीं था। लेकिन था तो उसकी बेटी का पति, वह भी प्रायश्चित करता हुआ, तो फिर उसका साथ कैसे छोड़ देता ? लेकिन कहानी का एक ऐसा किरदार जिनसे मैं न तो कभी मिला और न ही कही देखा था। बस उनके बारे में सुना था, एक ही बार फोन पर बात भी हुई, वह थे ध्रुव भैया। उनसे मिलने से पहले इस कहानी का अंत कैसे संभव था।
वर्षों बाद देर होने की वजह से जल्दबाजी में मैं अपने रिजर्व एसी कोच में न चढ़कर दूसरे कोच में चढ़ गया था। रात्रि के लगभग 11 बज रहे थे। टीसी की सहृदयता से मुझे कोई असुविधा नहीं हुई। कुछ देर तक उन्हीं की सीट पर बैठा रहा। लगभग एक घंटे बाद वो मेरे पास आते हुए बोले, "अंदर एक लोअर बर्थ खाली है आप चाहे तो उसमें जा सकते हैं..."
"जी थैंक यू वेरी मच...", मैं अपना बैग लेकर उन्हें के साथ उस बर्थ तक पहुंचा। एसी फुल स्पीड में चल रही थी। मुझे कुछ-कुछ ठंड का अनुभव हुआ। मैंने अपने सिरहाने बैग रखा और चद्दर ओढ़ कर सो गया। सुबह लगभग 6 बजे मैं सो कर उठा। पंद्रह-बीस मिनट बाद वॉशरूम से जब लौटा तो अपने सामने वाली बर्थ पर, विंडो से कुछ सटकर लगभग उन्नीस-बीस साल की एक लड़की को एक किताब पढ़ते हुए देखा। एक चेहरा जो मेरी स्मृतियों में आज तक धुंधला न हो सका, उसे देख अचानक ही मेरी आंखों के समने आ गया। मैं कुछ पल के लिए आश्चर्यचकित अपलक उसे देखता रह गया। 
जब कुछ होश आया, तो मेरा ध्यान उसकी किताब पर गया। उसका कवर और नाम देखकर मुझे तेज झटका लगा। "वुथरिंग हाइट्स", यह कैसे हो सकता है!!
पलभर के लिए उसकी नज़रें मेरी तरफ उठी। मुझे अपनी तरफ यूं देखते-देख उसने भी कुछ असहजता महसूस की और अगले ही पल उसकी नज़रें फिर किताब पर झुक गई। मैं भी अपनी बर्थ पर विंडो से सट कर बैठ गया। मुझे आश्चर्य हुआ, इस जनरेशन में किताब के प्रति इतना प्रेम कौन रखता है ? रंग, रूप, कद, काठी यानी पूरा व्यक्तित्व आर्कषक था। चेहरे की शालीनता बता रही थी कि वह सभ्रांत और शिक्षित परिवार से संबंध रखती है। मेरे लिए आश्चर्य का विषय यह था कि उसका रूप ही नहीं, बालों का रंग, स्टाइल यहां तक कि पसंद भी पीहू से मैच कर रही थी। मैरून जींस के साथ व्हाइट कलर की टी-शर्ट उस पर फब रही थी। किताब पढ़ते हुए कभी-कभी वह मेरी तरफ भी देख लेती।
आधुनिकता की जिस स्तर पर वह दिख रही थी, उसके अनुसार तो इसके हाथ में उसके नजदीक रखा उसका आईफोन होना चाहिए था। उसके हाथ की उंगलियों को किताब के पन्ने पलटने की बजाय मोबाइल के टच स्क्रीन पर थिरकना चाहिए था। तभी मेरे हैंडसेट की रिंगटोन बज उठी। मेरे दोस्त द्वारा मेरी लोकेशन पूछी जा रही थी जो कि मुझे खुद मालूम नहीं थी। तभी मेरी नजर उसके पास बैठते हुए एक बेहद ही हैंडसम व्यक्ति की तरफ गई। हम दोनों में मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हुआ। मैंने उन्हीं से पूछा, "ट्रेन कहां तक पहुंची है...?"
लेकिन मेरे प्रश्न का जवाब उनके पास भी नहीं था। तभी उस लड़की ने अपना हैंडसेट उठाया और लाइव लोकेशन देखने के बाद धीरे से मुझे लाइव लोकेशन के बारे में बताया। लेकिन उसकी बात मैं सुन कहां रहा था। मेरी नजर तो उसकी मध्यिका में पहनी हुई रिंग पर अटक गई। मैंने सोचा, मेरी नजरों का धोखा भी हो सकता है, लेकिन कैसे मान लेता ? उस रिंग की बनावट, उसका फ्रेम और उस पर चमकता हुआ हीरा मुझसे चीख-चीख कर कह रहा था, मैं वही हूँ। उसके द्वारा कहे गए शब्दों को मैंने अपने दोस्त को उसी तरह बस दोहरा दिया था।
वही रंग वही रूप, वही पर्सनालिटी और किताबों के प्रति वही जुनून। एक पल के लिए मुझे महसूस हुआ जैसे कोई और नहीं मेरे सामने पीहू ही बैठी है। मेरे मन में हजारों सवाल चल रहे थे, और उसके जवाब में मेरे मन में एक नए सवाल ने जन्म लिया, "तो क्या इसके नजदीक बैठे हुए व्यक्ति ध्रुव भैया हैं ?"
हालांकि मुझे अब कोई शंका नहीं थी फिर भी अपनी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने पहले उनसे औपचारिक बातें करनी शुरू की। फिर धीरे-धीरे फ्रेंडली होता गया। उनकी बातों से तो पता चल गया कि वुथरिंग हाइट्स पढ़ने में तल्लीन यह लड़की उनकी बेटी है। हम लोगों की बातों के दौरान उसने अंग्रेजी में अपने पिता को धीरे से संबोधित करते हुए पूछा, "Vati ! What could have prompted her to underline this sentence? There is anything particularly special about it ?"
उसके पिता ने किताब अपने हाथ में लेते हुए कहा, "Show me...?"
अंडरलाइन शब्द सुनकर मैं भी उसे देखने के लिए उत्सुक हुआ। मैंने परवाह नहीं की कि उसके पिता या खुद वह मेरे बारे में क्या सोचेगी। मैंने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, May I... please ?"
अब मेरे मन में कोई शंका नहीं रह गई। इस पेज में तीन-चार पैराग्राफ के बाद एक और अंडरलाइन मिली,  There was a start and a troubled gleam of recollection..
मेरे होठों में एक मुस्कान आ गई। मैंने कुछ दूर तक आगे के पन्ने पलट कर देखें लेकिन किसी भी पेज में मुझे अंडरलाइन नहीं मिली। शायद इस बुक में की गई यह आखिरी अंडरलाइन थी। मैंने बुक वापस करते हुए कहा, "मुझे नहीं लगता, शायद किसी ने मज़ाक में किया होगा..."
पीहू ने कभी सच कहा था, कुछ सवालों के जवाब हमें भविष्य में मिलते हैं। इस लड़की को देखकर मेरे मन में जो भाव उठे थे, वर्षों पहले उसने उसे अंडरलाइन कर दिया था।
मैंने उसके पिता से उसकी तारीफ करते हुए कहा, "कम उम्र में लिटरेचर से इतना लगाव अब कहां देखने को मिलता है ? वह भी आज के दौर में प्रिंटेड बुक कौन पढ़ता है..?"
"मैं पढ़ती हूँ, क्या आपको कोई ऐतराज है...?", उसने मुझे तीखी नजरों से देखते हुए कहा। 
वही अंदाज, वही तीखी नजरे। उसकी यह बात सुनकर उसके पिता ने उसकी तरफ देखते हुए कुछ कहा, लेकिन उनकी भाषा मुझे समझ में नहीं आई। उसने भी मुस्कुराते हुए उसी भाषा में उनसे कुछ कहा। अंत में उसने मेरी तरफ देखते हुए कहां, "सॉरी.."
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "इट्स ओके..."
फिर उस संभ्रांत आदमी ने आह भरते हुए कहा, "हां सच कहते हैं आप। अब सब कुछ तो ऑनलाइन उपलब्ध है। पढ़ने की बजाय लोग ऑडियो बुक सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। शायद इसलिए प्रिंटेड बुक्स भी मिलनी कम हो गई हैं। यह तो इसकी बुआ की पसंद थी, उन्हीं की लाइब्रेरी से कुछ किताबें उठा लाई है... यह उन्हीं में से एक है.."
वैसे तो इस डायमंड रिंग ने मुझसे सारी कहानी कह दी थी, लेकिन तब भी मैंने अंजान बनते हुए पूछ ही लिया, "अच्छा !! तो इनकी बुआ लाइब्रेरी चलती हैं...?"
उस व्यक्ति की आंखों में आंसू झिलमिला उठे, "नहीं वह तो बरसों पहले बहुत कम उम्र में ही गुजर गई थी। तब इसका जन्म भी नहीं हुआ था..."
उनकी बातें सुनकर मेरी भी आंखों में आंसू छलक आए। मैं अब खुद को रोक न सका। अपनी जगह से उठकर उनके बगल में बैठ गया। मैंने पूरी संवेदना के साथ उनके हाथ पर अपनी हथेली रखते हुए कहा, "इस दु:ख में मैं पूरी संवेदना के साथ आपके साथ हूँ..."
इस बार लड़की ने मेरी बात सुन बहुत ही ध्यान से मुझे देखा फिर अपने पिता की तरफ, जैसे उसकी नज़रें पूछ रही हों कि यह कौन है ? क्या आप जानते हैं ? 
मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर उससे कहा, "नमस्ते !!"
उसने कहा तो कुछ नहीं पर उसने भी अपने हाथ जोड़ दिए। उसके पिता ने धीरे से उसे कुछ कहा। प्रत्युत्तर में उसने अपना विरोध जताया, "नो वाती...!!!"
उसके पिता ने याचना से कहा, "प्लीज़... आई... आई जस्ट कम..."
वो चले गए। मैंने उसकी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। इस बार आशा के विपरीत वह थोड़ा-सा मुस्कुराई, "स्मोक..."
"ओह !..."
मैं समझ गया कि पीहू को याद कर वह कुछ असमान्य हो गए थे। अपनी इस असहजता को छुपाने के लिए शायद उन्होंने स्मोक का बहाना किया था। मैं खामोशी से सर झुकाए बैठा रहा। तभी एक सुरीली आवाज सुन मैं चौंक गया। मैंने देखा, वह विंडो से बाहर देखते हुए एक पोयम गुनगुना रही थी। मेरे मुख से अनयास हो निकला, "लेडी नॉर्टन !!"
मेरे यह शब्द शायद उस तक पहुंचे और उसने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा, "हैव यू रीड दिस...?"
"नो ! आई डोंट... मेरी एक दोस्त थी, उसे यह पोयम बहुत पसंद थी, वर्षों पहले उसे गुनगुनाते हुए सुना था... उसके बाद अचानक आपके मुख से सुना..."
उसने मुझे ध्यान से देखते हुए फिर पूछा, "क्या आपको पसंद आई थी...?"
मेरे होठों में फीकी मुस्कान आ गई, "बहुत, इतनी कि मैने फिर दोबारा उसे सुनाने के लिए कहा था... लेकिन..."
"व्हाट हैपेंड...?"
"फिर कभी, कह कर उसने टाल दिया था..."
"फिर कभी उसने नहीं सुनाई...?"
"नहीं, फिर कभी मौका ही नहीं मिला..."
मेरे चेहरे की उदासी को पढ़ाते हुए उसने मुझे कहा, "सो सॉरी..."
"कोई बात नहीं, इसमें भला आप क्या कर सकती हैं... पर एक काम आप कर सकती हैं... आप ही मुझे सुना दीजिए...?"
उसने अपने हाथ से अपने पास खिसककर आने का इशारा करते हुए कहा, "जी जरूर... वैसे भी यह मेरी फेवरेट पोयम्स में से एक है..."
वह पोयम गुनगुनाती रही मैं सुनता रहा। पोयम के खत्म होने के बाद उसने मुझसे पूछा, "कैसी लगी...?"
मैंने कुछ अफसोस जाहिर करते हुए कहा, "सच कहूं तो कुछ समझ में आई और कुछ नहीं भी। क्या है न कि मेरी इंग्लिश इतनी अच्छी नहीं है..."
"अरे तो पहले बताना चाहिए था न ? लेट्स आई एक्सप्लेन इट..."
इस तरह वर्षों पूर्व किसी के द्वारा किया गया एक वादा उसने पूरा किया। पोयम की हर एक लाइन को पूरे इमोशन के साथ पढ़ा और उसके अर्थ को मुझे समझाया। 
मैंने उसे एक बार फिर धन्यवाद दिया।
उसने पूछा, "क्या आपको लिटरेचर में इंटरेस्ट है...?"
मैंने उससे कुछ नजर चुराते हुए कहा, "हाँ, लेकिन कोई खास नहीं, कभी-कभी पढ़ लेता हूँ..."
मैं अपने आप को कुछ और असहज महसूस करता, इससे पहले ही वहां से उठ अपनी जगह पर आकर बैठ गया। कुछ ही देर में उसके पिताजी भी आकर उसके नजदीक बैठ गए। ऐसा नहीं था कि पीहू से बिछड़ने के बाद मैंने कभी लेडी नॉर्टन की पोयम, "आई डू नॉट लव दे..." न पढ़ी हो। सच कहूं तो कई बार पढ़ी थी। उसके हिंदी मीनिंग के साथ। लेकिन मैंने उससे झूठ बोला, क्योंकि मैं चाहता था कि वह मुझे सुनाये और मैं सुनूं।
कुछ देर बाद वह अपने पिता के नजदीक थोड़ा-सा खिसकते हुए धीरे से बोले, "वाती ! ...."
जी हां वाती के अलावा सब कुछ मेरे लिए डैश-डैश ही था। एक अलग ही भाषा में बात हो रही थी। मैंने हैंडसेट उठया और एक शब्द सर्च किया, "वाती". कुछ मशक्कत के बाद मुझे पता चला। पढ़कर मैं मुस्करा उठा। 
बातों के बीच-बीच में उसकी निगाह मेरी तरफ भी उठती। क्या बातें हो रही होगी ? क्या उनकी बातों में मैं भी शामिल हूँ ? यही प्रश्न लिए मैं अपनी विंडो सीट पर बैठा रहा। ब्लैक कांच के उस पार पूरी दुनिया पीछे की तरफ भाग रही थी। लेकिन उनकी बातें अभी भी आगे चलती जा रही थी। कुछ देर बाद मैंने महसूस किया जैसे ट्रेन की रफ्तार धीरे-धीरे कम हो रही है। मैं समझ गया मेरा स्टेशन आने वाला है। कुछ देर बाद मैं उठाते हुए बोला, "अच्छा मैं चलता हूँ, मुझे यही उतरना है...?"
मानवता के नाते उन्होंने पूछा, "मैं आपकी हेल्प करूं ?"
"नहीं, मैंने दोस्त को फोन कर दिया है, वह प्लेटफॉर्म टिकट लेकर सीधे कोच में आएगा..."
तभी मेरे फोन की रिंग फिर बज उठी। मेरे दोस्त ने मुझे कंफर्म किया कि वह प्लेटफॉर्म में आ चुका है। उतरने वाले यात्रियों की संख्या कम थी। मैं सीट से उठा इस बार उसने कहा, "बाय..."
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "इंट्रोडक्शन तो दे दीजिए, फिर बाय कहिएगा। क्या नाम है आपका ?"
उसने धीरे से कहा, "सुचि.."
मैंने न सुनने का नाटक करते हुए कहा, "क्या शचि...?"
इस बार उसने कुछ तेज आवाज में कहा, "नहीं सुचि... वैसे शचि मेरी बुआजी का नाम था..."
"नाइस नेम। लेकिन बाय बाद में, पहले नमस्ते का आशीर्वाद तो ले लीजिए। आप दीर्घायु हों, यशस्वी बने... समझ में आया कि इसका इंग्लिश वर्जन.."
"नहीं मुझे समझ में आ गया...", फिर उसने कुछ गर्व से कहा, "शायद आपको मालूम नहीं, मुझे पांच भाषाएं आती है..."
मैंने भी थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा !! पांचवी कौन सी सीख ली...?"
मेरी बात सुनकर उसके चेहरे में आश्चर्य के भाव थे। उसने उसी भाव के साथ पूछा, "तो क्या आपको दूसरी चार भाषाओं के बारे में मालूम है...?"
मैंने सामान्य ढंग से कहा, "हां,... हिंदी, इंग्लिश, संस्कृत और मराठी... और अब शायद जर्मन ?"
उसकी आंखें संकुचित हुई, "आपको कैसे...?"
"बस यूं ही... ?"
"क्या हम कभी मिले हैं...?"
"जी हां... मिले हैं न...?"
"कब ?", उसने उत्सुकता से पूछा। 
"शायद पिछले जन्म में...", कहते हुए मैं मुस्कुरा दिया।
"जी...!!", इसके आगे वह कुछ न कह सकी। डर की कुछ परछाइयां मुझे उसके चेहरे में दिखाई दी। मैंने ही कहा, "ओके बाय..."
उसके पिता मेरा बैग लेते हुए बोले, "चलिए मैं भी चलता हूँ... वैसे दस मिनट तो रुकना ही है ट्रेन को..."
ट्रेन रुकती उससे पहले हम दरवाजे तक पहुंच गए थे।
उसके पिता ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "आप जानते हैं, सुचि मुझसे क्या कह रही थी...?"
मैंने थोड़ा-सा हंसते हुए कहा, "नहीं जर्मन भाषा मुझे बिल्नकुल भी नहीं आती... वो तो वाती शब्द को नेट में सर्च किया तो पता चला कि पूर्वी जर्मनी में पिता को अनौपचारिक रूप से वाती से संबोधित किया जाता है..."
"आपने सही कहा, इसका जन्म वही हुआ, वहीं के कॉलेज से लिटरेचर में डिग्री कर रही है। इसकी मां भी जर्मन है। कह लीजिए यह उसकी मातृभाषा है... अब मैं बताता हूँ कि उसने मुझसे क्या कहा। जब आपने उसे पहली बार देखा तो उसने महसूस किया जैसे आप उसे देखकर काफी चकित रह गए। ऐसा तभी होता है जब कोई जाना-पहचाना व्यक्ति वर्षों बाद हमारे सामने अचानक आ जाए... लेकिन आश्चर्य तो उसे भी हुआ था, ठीक वैसा ही उसने भी महसूस किया...? वह मुझसे यही पूछ रही थी कि क्या मेरी इनसे कभी बचपन में या किसी पार्टी या फंक्शन में पहले भी मुलाकात हुई है ? आपको बुरा न लगे, आप अनकंफर्ट महसूस न करे, इसलिए उसने जर्मन लैंग्वेज में बात की... और अब अपने पिछले जन्म की बात कर उसे तो डरा ही दिया...?"
"अरे नहीं उसे समझा दीजिएगा, मैंने मजाक किया था। वैसे देखा जाए तो उसने सही अंदाजा लगाया था। मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त या यूं कहिए गर्लफ्रेंड थी, कुछ-कुछ इन्हीं की तरह। उसे भी किताबों का बहुत शौक था। कभी यही बुक उसके पास भी देखी थी... यही सब देखकर मुझे आश्चर्य हुआ था..."
ट्रेन रुक चुकी थी। मेरा दोस्त सामने खड़ा था। उसने हाथ बढ़ाकर मुझे ट्रेन से नीचे उतारा। सामने ही रेलवे कैंटीन की विंडो थी। मैंने चाय और एक बॉटल पानी का आर्डर दिया..."
फिर मैने दोस्त को उसका सीट नंबर बताते हुए कहा, "पानी की बॉटल और चाय उस सीट पर बैठी सुनहरे बालों वाली लड़की को देकर कहना, पापा ने भिजवाया है..."
दोस्त चला गया। इस बीच चाय पीते हुए मैंने उनसे कहा, "भैया, हो सके तो अब मेरी बात ध्यान से सुनियेगा। आपको तसल्ली देने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि जीवन में जो देखा, आज जो महसूस किया वही बात आपसे कह रहा हूँ... श्रीकृष्ण ने गीता में ठीक ही कहा है। हे पार्थ ! ऐसा कौन सा युग था जब तुम नहीं थे, और मैं नहीं था। ऐसा कौन-सा युग होगा, जब हम नहीं होंगे... रिश्ते-नाते बदल जाते हैं, लेकिन आत्मा का स्वरूप वही रहता है..."
उनकी आंखें संकुचित हुई, "मतलब...?"
मैंने सीधे लफ्जों में कहा, "मेरा मतलब यह है कि अब आप अपनी बहन के मृत्यु के शोक से मुक्त हो जाइए, जो आपका था... वह लौट कर वापस आपके पास ही आ गया है..."
उन्होंने फिर सवालिया निगाह से मेरी तरफ देखा। मैंने ऐसी कोच की उसी विंडो की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिसके ब्लैक कांच के पीछे सुचि बैठी थी, "जैसे वो... और उसकी डायमंड रिंग..."
उन्होंने विस्मय से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "तो तुम वही हो जिससे मैंने कई साल पहले फोन पर बात की थी...?"
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा, "जी, ... मैं यह सब आपसे इसलिए कह रहा हूँ कि मैंने पीहू की बातों में, उसकी आंखों में, आपके लिए जो सम्मान और प्यार देखा था, ठीक वही सम्मान और प्यार मुझे आज सुचि की आंखों में दिखाई दिया। आप खुद सोचिए क्या किन्हीं दो इंसानो में इतनी समानता हो सकती है, जिनमें रंग, रूप, चेहरा, हाइट, पर्सनैलिटी, हेयर स्टाइल, यहां तक कि हॉबीज भी मैच करती हो ? पहली बार जब मैंने उसे देखा तो मैं यही सब देखकर हैरान था। मुझे महसूस हुआ जैसे पीहू अचानक ही मेरे सामने आ गई है। मुझे अच्छी तरह से याद है, एक दिन पीहू में मुझे स्वयं कहा था, "मैं रिश्ते में भले ही उनकी बहन हूँ, लेकिन वह मुझे अपनी बेटी की तरह मानते हैं...", तो लीजिए वह आपकी बेटी बनकर आ गई। 
उन्होंने मुझे गले से लगाया और अपने आंसू पोंछते हुए बोले, "क्या तुम्हें मालूम है, छः महीने पहले ही सत्य की हार्ट अटैक से मृत्यु हो चुकी है... लेकिन उसने पीहू की सोच को पूरा किया। अब वह गांव 25 वर्ष पहले का गांव नहीं रह गया। काफी सुसंस्कृत और सुशिक्षित हो गया है। वहां की स्कूल के पढ़े-लिखे कुछ लड़के तो आईएएस, आईपीएस में सिलेक्ट हुए हैं। लेकिन सत्य की मृत्यु के बाद ही इन सब का जल्द ही राजनीतिकरण हो गया... अब तो एनजीओ वाले काम देख रहे हैं... मैंने भी मुंबई में काम शुरू कर लिया है। पूरी खेती-बाड़ी का काम मंगल ही देखता है। उसका लड़का डीएसपी बन गया है, अब तो प्रमोशन भी होने वाला होगा..."
"आप मुंबई में कब सेटल हुए...?", मैंने पूछा। 
"जब पीहू की डेथ हुई उसके बाद ही सोचा था कि सेटल हो जाऊंगा लेकिन नहीं हो पाया। अभी भी आधा ही सेटल हूँ... सूचि की एजुकेशन वही हो रही है। अपने नाना-नानी के पास रहती है..."
"सत्य से कभी उसकी मुलाकात हुई...?", मैने पूछा।
"हां, लेकिन एक ही बार मुलाकात हुई है वो भी जब यह दो साल की थी। उसने पीहू की संपत्ति का पूरा हिस्सा इसी को रजिस्टर्ड कर दिया था और यह अंगूठी भी लौटा दी थी... हालांकि हमने बहुत कोशिश की कि वह दूसरी शादी कर ले लेकिन उसने नहीं की। मैंने सुचि को अडॉप्ट ही कर ले। तभी वह बात को हंस कर टाल गया। कहा कि एक ही बात है भैया आपकी बेटी है तो मेरी बेटी भी है, अडॉप्ट करने की क्या जरूरत है। उसके बाद बहुत सालों तक ना तो मैं आ पाया और न ही कभी सुचि आई। इसके बाद जब भी आई तो बंबई से आकर ही लौट गई कभी गांव आना हुआ ही नहीं। अभी 10 दिन पहले ही मेरे साथ पहली बार गई थी। तीन दिन हम दोनों रुके थे। मंगल भी उसे देखकर तुम्हारी तरह ही हैरान हुआ था। लौटते समय कुछ किताबें वहीं से लेकर आई है। 
"और आप जाते हैं ?"
"हां, मैं तो अक्सर जाता हूँ... लेकिन इतने वर्षों से एक सवाल सदैव मेरे मन में उठता रहा। जब अंतिम बार पीहू से मेरी बात हुई थी तो उसने मुझे इजाजत ली थी कि यह डायमंड रिंग वह तुम्हें देना चाहती है, और मैने इजाजत दे भी दी थी, यह कहते हुए कि अब यह तुम्हारी है, तुम जिसे देना चाहो दे सकती हो। तो क्या सत्य ने तुम्हें यह रिंग नही दी थी...?", कहते हुए उनकी आंखों में फिर आंसू झिलमिला उठे। 
"नहीं उसने तो खुद ही मेरी उंगली में पहनाई थी। लेकिन चलते समय मैंने ही उसे यह कहते हुए वापस कर दिया था कि जब कभी भी ध्रुव भैया की बेटी हो तो उसे दे देना..."
"तो यह इच्छा तुम्हारी थी, लेकिन क्यूं?", उन्होंने कुछ आश्चर्य से पूछा। 
"शायद इसलिए की वहां से लौटते समय मुझे इस बात का एहसास हो गया था कि इस परिवार में वह फिर से जन्म लेगी..."
मैं उनसे कुछ और कहता तभी सूचि मेरे दोस्त के साथ हमारे पास आकर खड़ी हो गई। फिर उसने अपने पिताजी से कहा, "मैं हिंदी लिटरेचर की कुछ बुक खरीद लूं, अभी तो ट्रेन चलने में टाइम है ?"
उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, "मुझे तो कोई आईडिया नहीं है, शायद इन्हें हो...?"
"आइए... देखते हैं..", मैंने कुछ दूर बगल में ही खुली बुक इंस्टॉल की तरफ इशारा करते हुए कहा, "बुक इंस्टॉल वाला मेरा दोस्त है..."
हम दोनों ही किताबें देखने लगे। इस बीच उसने कहा, "मैंने हिंदी लटरेचर ज्यादा नहीं पढ़ी है, इसलिए आप ही सजेस्ट कीजिए न ?"
मेरी नजर उसकी इंगेजमेंट फिंगर पर गई। उसमें हल्का सफेद रंग का निशान था। जैसे कोई अंगूठी बहुत दिनों तक उस फिंगर में कसके पहनी गई हो। उसने मुझे अपनी फिंगर की तरफ देखते-देख कहा, "अब आप औरों की तरह यह मत समझिएगा कि मैं इस फिंगर में भी अंगूठी पहनती हूँ... यह निशान बचपन से है... अब कोई बुक सजेस्ट कीजिए न ?"
"ओह ! हां...", फिर मैंने अचानक ही एक बुक की तरफ इशारा करते हुए कहा, "उसे देखिए न ?"
"कौन सी... ये वाली... ?"
"नहीं... उसके बगल वाली... पारिजात के फूल..."
तभी ट्रेन का तेज हॉर्न बजा। उस डरावने हॉर्न के बीच मेरी आवाज दब के रह गई। ध्रुव भैया पास आते हुए बोले, "जल्दी करो... ट्रेन चलने वाली है..."
"हा... बस अभी आई..."
अगले ही पल ट्रेन में हलचल हुई। वह जल्दी से किताब उठाते हुए बोली, "हाउ मच ?"
मैने ट्रेन की तरफ देखते हुए उससे कहा, "वह मैं सब देख लूंगा। आप जाइए, नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी..."
तभी उसके पिताजी ने उसे पीछे से फिर पुकार। इस बार वह उनकी तरफ दौड़ पड़ी। कुछ दूर पहुंचने के बाद उसने पलटते हुए मुझसे कहा, "थैंक्स...  वैसे आपका नाम...?"
मैंने तेज आवाज में कहा, "अजनबी ..."
"यू मीन स्ट्रेंजर...?"
मैं बस थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। उसने भी उसी तरह मुस्कुराते हुए कुछ ऊंचे स्वर में कहा, "सो... थैंक्स स्ट्रेंजर..."
अगले ही पल वह पलटी और ट्रेन की तरफ दौड़ गई।
ट्रेन में चढ़ने के बाद गेट पर रुक वह फिर पलटी। मेरी तरफ देखते हुए हाथ हिलाया और उनके पीछे से ध्रुव भैया ने भी। दरवाजे की रॉड पकड़े हुए उसकी मुट्ठी में डायमंड रिंग एक बार फिर अपनी पूरी क्षमता के साथ चमक उठी। 
वर्षों पूर्व सत्य के द्वारा कहे गए शब्द भी मुझे याद आए, "शायद उसने अंगूठी को अपनी उंगली पर इतना कस के पहन लिया था कि उसकी उंगली में सफेद रंग का गहरा निशान पड़ गया था..."
मैने बुक इंस्टॉल वाले दोस्त से पूछा, "कितने हुए...?"
"भाई तू एक के 130 दे दे..."
"क्यों, उसने कितनी बुक ली ?", मैने आश्चर्य से पूछा।
"दो..."
"तो फिर एक के क्यों ले रहा है...?"
"अब अपनी बुक के पैसे देगा...?"
"मेरी बुक !! मतलब ?", मैंने आश्चर्य से पूछा। 
उसने हंसते हुए कहा, "अरे वो तेरी माइलस्टोन भी ले गई... इत्तेफाकन उसी बुक के नीचे रखी थी जिसे तूने सजेस्ट किया था। जल्दबाजी में उसे भी उठा लिया.. मैंने सोचा तूने देखा होगा...?"
"नहीं देखा,  लेकिन वह तो मैंने तुझे..."
"पढ़ने के लिए दी थी, यही कहना चाहता है न ? तो सुन भई, मैंने पढ़ने के बाद उसे अपनी इंस्टॉल में रख लिया था.... सोचा था दोस्त ने किताब लिखी है, कुछ तो प्रचार-प्रसार करूं ? अब मुझे क्या मालूम था कि तेरा कोई अपना ही ले जाएगा...? वैसे देना चाहे तो दे दे ?"
"जरूर...", मैने हंसते हुए उसे दोनों बुक के पैसे दिये। इस तरह से मैं अपनी ही किताब का शायद पहला खरीददार बना और यह भी जाना कि मैंने कुछ देर पहले जो ध्रुव भैया से जो कहा, वह गलत नहीं था।
"वैसे थी कौन...?",  दोस्त ने पूछा। 
मेरे होठों में फिर से फीकी सी मुस्कान आ गई, "थी कोई अजनबी..."
इंसान एक ही जिंदगी में कई किरदार जीता है। पीहू से मिलना एक युग की शुरुआत थी और उससे बिछड़कर फिर उसका स्वरूप धारण किए हुए सुचि से मिलना और फिर बिछड़ना एक युग का अंत। गुजरे हुए इन कई वर्षों में सब कुछ बदल गया, यहां तक मैं भी। इस दौरान यदि कुछ शाश्वत रहा होगा तो वह थी उस डायमंड रिंग की चमक और उसकी उंगली पर निशान।  
तो क्या टीनेज मैं प्यार होना,  उससे बिछड़ना, उसका विवाह होना, अवसाद के गहन अंधकार में डूब कर आत्महत्या करने की कोशिश करना, ज्ञान का मेरे पास आना, सत्य का पीहू से मिलना और फिर उसके साथ मेरा पीहू तक पहुंचाना पूर्व निर्धारित था। क्या नियति ने इन सभी को माध्यम बनाया और हम दोनों को अपनी गलती सुधारने का एक मौका दिया ? 


क्या अब वह समय आ चुका है, उस कहानी को कागज में उतारने का जिसे वर्षों पूर्व कुछ किरदारों की नियति ने लिखना शुरू किया और जिसे पीहू के द्वारा लिखे गए पत्र ने अर्ध विराम दिया था ? ऐसे किरदार जो अक्सर किस्से-कहानियों में देखने को मिलते हैं, लेकिन मैने वास्तविक जीवन में देखा ही नहीं उनके साथ जिंदगी के महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय पल जिए थे। आखिर मैं भी तो पीहू के श्रापित जीवन का एक हिस्सा था जो उसके साथ इस धरती पर आता रहा... 


 कहानी के बाद
12 नवंबर 2002 को जब मैंने यही डायमंड रिंग सत्य को वापस देकर कनेर और मोगरे के कुछ फूल लेकर वहां से चला आया तब तक मैने तो अपना पत्र पढ़ लिया था, लेकिन सत्य का पत्र चाह कर भी नहीं पढ़ पाया। लगभग पांच माह तक वह मेरे पास उसी तरह सील बंद पड़ा रहा। मन में बार-बार खयाल आता रहा कि पीहू ने क्या लिखा होगा। यह तो तय था कि सत्य ने इन दोनों पत्रों को नहीं पढ़ा था और जो पत्र उसने पढ़े, उनमें से एक साधारण पत्र था, जो उसके सिरहाने लिखा मिला। जिसमें उसने भविष्य में होने वाली अपनी संभावित मृत्यु का कारण लिखा था।
घर में कोई चोरी नहीं, उसके शरीर के साथ भी किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं हुई थी। हां, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु के कारण और उसके प्रेग्नेंट होने की पुष्ठि हुई। चूंकि उसने अपने पत्र में सत्य को स्वयं पति के रूप में स्वीकारा किया था, फिर यही बयान मंगल, कमली, ध्रुव ने दिया। किसी के ऊपर कोई आपराधिक मामला नहीं बना। मृत्यु का कारण हार्टफेल 7 नवम्बर की रात 1 और 2 के बीच होना पाया गया। इसलिए कोई विशेष जांच पड़ताल नहीं हुई। दूसरा पत्र अलग से बेडरूम के कवर्ड में उसकी उसी बदामी कलर के सूट में सत्य को लगभग एक हफ्ते बाद में मिला। उस पत्र का ही प्रभाव था कि सत्य को मुझसे कोई शिकायत नहीं थी।
रिग्रेट यानी पछतावा, इंसान को जीने नहीं देता। वही पछतावा मेरे अंदर भी चल रहा था। वह था सत्य को सच न बताने का, उसे भंवर जाल में छोड़कर चले आने का, जिसमें वह उम्र भर भटकता रहे। इसबार जब मेरे विवाह की बात चली तो मैने मना नहीं किया। सत्य को पत्र लिखा और उससे क्षमा मांगी। पीहू के द्वारा खुद को लिखे गए पत्र की फोटोकॉपी और सत्य के लिए सीलबंद पत्र को उसी तरह पीहू के पते पर पोस्ट कर दिया। लगभग एक महीने बाद सत्य का जवाब आया। 


उसने लिखा,
प्रिय दोस्त,
पीहू ने हमेशा स्वप्न में दिखने वाली एक परछाई का जिक्र मुझसे किया। उसे सदैव महसूस होता रहा कि वह किसी न किसी का इंतजार कर रही है। मैं उसके इसी भ्रम को तोड़ने के लिए तुम्हें अपने साथ लाया था। अप्रत्यक्ष रूप से उसे यह बताना चाहता था कि देख लो, स्वप्न में दिखने वाली परछाई कैसी हो सकती है। यह सच है कि मैंने मान लिया था कि तुम्हें देखने के बाद उस परछाई से पीहू का मोह भंग हो जाएगा। लेकिन हुआ इसके विपरीत। पीहू ने तुम्हें सिर्फ देखा ही नहीं तुम्हें समझ भी लिया। 
      मेरे शक की शुरुआत उस रात से शुरू हो गई थी जब डायमंड रिंग को मैने उसकी इंगेजमेंट फिंगर में देखी थी। फिर अंतिम दिन सुबह जब आया तो तुम दोनों को एक दूसरे के हाथ पर हाथ रखे एक ही चारपाई पर बैठे हुए भी देखा। मुझे यह महसूस हुआ कि तुम एक चालक इंसान हो, जो पीहू के लिटरेचर के प्रति रुचि का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हो, और अपने जीवन की कमी की पूर्ति पीहू से करना चाहते हो। मुझे पीहू इनोसेंट ही लगी जो तुम्हारे जाल में फंसती जा रही थी। मैं इस भावना को न तो ज्ञान के सामने प्रदर्शित कर सकता था और न ही पीहू से कुछ कह या पूछ सकता था। बल्कि मुझे खुद आश्चर्य हो रहा था कि मुझ जैसे सुंदर, पढ़े लिखे और एक अच्छे फैमिली के वेल-सेटल्ड लड़के को छोड़कर पीहू ने तुम्हारे अंदर ऐसी कौन सी खूबी देख ली कि उसका आकर्षण तुम्हारी तरफ बढ़ता जा रहा है ?  उसका जवाब भी स्वयं को दिया था। तुम्हारे प्रति पीहू का प्रेम, प्रेम नहीं एक क्षणिक आकर्षण है, जो आपस में लिटरेचर की पसंद से उत्पन्न हुआ है। तुम दोनों के दूर हो जाने पर यह खत्म हो जाएगा, और मैने वही दूरी बनाने के लिये बाबा को भ्रमित किया।
लेकिन मेरा यही सोचना गलत साबित हुआ। जैसे-जैसे दिन गुजरते जा रहे थे, उसका प्रेम तुम्हारे प्रति बढ़ता ही जा रहा था। जिसे मैं प्यार करता था,  इतना चाहता था, वही लड़की उसे अपना अच्छा दोस्त समझती रहे, इस दर्द से भी गुजरा हूँ मैं। पीहू ने अपने पत्र में सही लिखा है कि मैने पीहू से कभी भी इस बारे में इसीलिए कुछ नहीं पूछा कि उसके स्वीकार कर लेने पर उसके पास कोई आस नहीं रह जाती। यह सब जानते हुए भी मेरा लगातार कोशिश करते रहना, निजी स्वार्थ या पीहू के प्रति प्रेम था, जो समझना चाहो समझ सकते हो। अंत में पीहू के समर्पण को मैने स्वीकार किया। पूर्ण आशा थी कि शायद वह सब कुछ भूल कर सामंजस्य के साथ एक रिश्ते की शुरुआत करना चाहती है। लेकिन तब भी उसका सामाजिक विधि के अनुसार विवाह करने से इनकार करना मुझे क्रोधित कर गया। 
क्षणिक गुस्से और आवेश में पीहू को छोड़ के गया जरूर था, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। यह एक इत्तेफाक था कि कंपनी ने मुझे अचानक ट्रेनिंग के लिए भेज दिया और पंद्रह दिन की ट्रेनिंग एक्सटेंड होकर दो महीने की हो गई थी। लेकिन पीहू की प्रॉपर्टी को लेकर मेरे मन में कोई लालच नहीं था। बाबा की अनुमति मिलने के बाद धीरे-धीरे मुझे पीहू से गहरा प्यार हो गया। उसे छोड़कर दूसरे से शादी करने की कल्पना तक नहीं की। मेरे घर वाले बराबर कहते थे की पीहू से शादी करो और समाज के सामने करो, ऐसे नहीं चलेगा। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि पीहू की संपत्ति को लेकर मेरे माता-पिता में कोई लालच न रहा होगा। 
जहां तक मैं मानता हूँ कि पीहू का मुझसे मिलना उसे अपने शोक से दूर करना था। उसने एक अच्छे मित्र की तरह मुझसे अपने निजी जीवन की सभी बातें साझा की। मेरे साथ हंसी, मुस्कुराई, पार्क घूमी, सिनेमा देखा। मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखा, मुझे हर पल खुशी देनी चाही। यह बात अलग है कि मैंने खुशी को सिर्फ वैवाहिक संबंधों में तलाशने की कोशिश की, यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी। आज मुझे अपने जीवन में उसकी कमी एक पत्नी के रूप में कम एक सहृदय मित्र के रूप में अधिक महसूस होती है। निश्चित ही मैंने अपना सबसे करीबी मित्र खो दिया है, जिसे मेरी परवाह थी। उसने मेरे लिए जो कुछ भी किया उसकी कमी मैं आज महसूस करता हूँ।  
तुम्हारे जाने के बाद मैंने महसूस किया कि तुमसे मिलने से पहले की पीहू अलग थी और तुमसे मिलने के बाद पीहू अलग है। इस परिवर्तन को सतही तौर पर तो नहीं देखा जा सकता था, केवल महसूस किया जा सकता था। जिसे मैंने कई बार किया भी। कम शब्दों में लिखूं तो तुम्हारे सानिध्य ने उसे एक ऐसी देव-मूर्ति में परिवर्तित कर दिया था, जिसे श्राप और वरदान दोनों देने की क्षमता प्राप्त हो चुकी थी। तुम उसके जीवन के शिल्पकार भी थे और प्राण-प्रतिष्ठार्थी भी। लेकिन एक ऐसा शिल्पकार जो मूर्ति को देवी-देवता के रूप में तराशता जरूर है, लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा हो जाने के बाद एकदिन उसे छूने के अधिकार से भी वंचित हो जाता है। 
उसकी मृत्यु ने मुझे पागल-सा कर दिया था। मैं दिन-रात यही सोचता रहा कि यदि वह तुमसे न मिली होती तो वह बहुत पहले ही मुझे स्वीकार कर लेती। और तब शायद वह मुझे अपने हार्ट डिजीज के बारे में भी बताती। समय पर इलाज होता है तो शायद वह बेमौत न मारती। धीरे-धीरे तुम मुझे वह शख्स नजर आ रहे थे, जिसने पीहू को मुझसे छीन लिया। उसकी मृत्यु के बाद मैं तुमसे हद से ज्यादा नफरत करने लगा। मैं सब कुछ भूल गया कि पीहू की इच्छा क्या थी। मैंने फैसला ले लिया कि तुम्हें किसी भी कीमत पर यहां लेकर नहीं आऊंगा। नहीं तो सोचो, यदि केवल पीहू की इच्छा मात्र से मैं तुम्हें यहां पर लाना चाहता तो तुम्हें यहां लाने में मुझे दो वर्ष न लगते। लेकिन मानव का स्वभाव होता है न, कि तुम जिससे घृणा करो, वह खुश रहे और तुम तड़पते रहो, कैसे बर्दाश्त कर पाता मैं ?
मैं तुम्हें साथ लाया। इरादा साफ था, मौका मिलते ही मैं तुमसे बदला लूंगा। या तो तुम्हें मार कर इन्हीं वादियों में कहीं दफन कर दूंगा और फिर ज्ञान से कह दूंगा कि तुम आए और चले गए। फिर कौन पूछने वाला था। या फिर ऐसा माहौल पैदा कर देता कि तुम खुद ही अपनी जान ले लेते। तुम जैसे भावुक इंसान के लिए दूसरा रास्ता मुझे अधिक उचित लगा। अब मैं तुम्हारी जान तो लेना चाहता था लेकिन तुम्हारे ही हाथों। वैसे भी तुम भावुकता में आकर एक बार यह काम तो कर ही चुके थे।
जिस रात तुम पीहू की नोटबुक अटारी में पढ़ रहे थे। मैंने सीढ़ियों पर खड़े होकर तुम्हे पढ़ते हुए कुछ देर तक देखा। तुम पढ़ने में इतना तल्लीन थे कि मुझे न देख पाये। मैं वापस अपने बेडरूम आ गया। मुझे नींद नहीं आ रही थी। मन में एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था कि आखिर तुम पढ़ क्या रहे हो ? मैं चुपके से फिर पहुंचा। तुम बेखबर सो रहे थे। मैं चुपचाप तुम्हारा बैग लेकर अपने बेडरूम में आ गया। पीहू ने जो पत्र तुम्हें लिखा था मैंने उसे पूरा पढ़ा। वह पत्र भले ही तुम्हें तुम्हारी यादों का फूलों भरा गुलदस्ता लगा हो,  लेकिन मेरे लिए कांटो भरा बिस्तर था। उस रात के बारे में उसने जो कुछ भी लिखा, उसे पढ़ने के बाद तो मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैं जानता था कि भले ही तुम्हारा कोई दोष नहीं, लेकिन दिल में आया कि अभी अटारी जाऊं और रिवाल्वर की सभी की सभी गोलियां तुम्हारे सीने में उतार दूं, फिर इसके बाद जो होना होगा होता रहेगा। बड़ी मुश्किलों से अपने आप को रोका था। उस रात ज्ञात हुआ, इंसान का देवता या राक्षस बन जाना कितना आसान होता है, लेकिन सबसे मुश्किल है खुद को इंसान बनाए रखना। अपने लिए भी पत्र देखा जो अभी भी सील बंद ही था। मन में आया कि मैं ही खोल कर पढ़ लूं। लेकिन यदि मैं ऐसा करता तो तुम जान जाते। फिर मैंने सोचा आखिर मेरे नाम का पात्र है तो तुम लेकर कहां जाओगे ? जाते समय या उससे पहले मुझे ही तो देकर जाओगे, तब पढ़ लूंगा।
दूसरे दिन तुम्हें अलमारी के सामने खड़ा हुआ देखा। तुमने रिवाल्वर देखी और उसे वापस रख दिया। मेरे मन में ख्याल आया, यदि तुम्हें आत्महत्या करनी होगी तो साधन क्या होगा ? तुम्हें रिवाल्वर देना, उसे चलाने का तरीका बताना, उसी साधन को जुटाना था। यह जानते हुए भी कि इस साधन से तुम मेरी भी हत्या कर सकते हो। तुम मरते या मैं, किसी न किसी को तो इस दर्द से मुक्ति मिलती। 
लेकिन नहीं, तुम तो मेरी सोच से सब कुछ विपरीत करते जा रहे थे। न तो तुम रोए और न ही भावुकता में फंसे। तुमने तो पीहू के अधूरे काम को पूरा करने का फैसला कर लिया और उस फैसले में ध्रुव भैया को भी शामिल कर लिया!! मैं अब चाह कर भी पीछे नहीं हट सकता था। अपने हृदय में तुम्हारे लिए नफरत लिए तुम्हारे साथ चलता रहा। 
जब मुझे समझ में आ गया कि तुम अपनी जान लेने से रहे, तो मैंने आखिरी दिन एक प्लान बनाया। रिवाल्वर में तुम्हारी उंगलियों के निशान तो थे ही। तो क्यों ना मैं ही तुम्हें गोली मार दूं और उसे आत्महत्या का आवरण पहना दूं। फंक्शन समाप्त होने के बाद मैं तुम्हें खोजते हुए तुम्हारे कमरे में गया तुम वहां नहीं मिले। मैंने ठंड के दस्ताने पहने हुए थे। बेहिचक तुम्हारे बैग से रिवॉल्वर निकली और तुम्हें खोजते हुए घाट में पहुंचा। तुम शायद पहली बार रो रहे थे, चीख रहे थे। मैं दबे पांव तुम्हारे पीछे पहुंचा। तुम झुक कर पानी पर कुछ लिख रहे थे। शायद, एल ओ व्ही ई। मुझे आश्चर्य हुआ अब तक तो तुम्हें पलट कर मुझे देखना चाहिए, क्योंकि पानी पर मेरी परछाई तो तुमने देखी ही होगी ? लेकिन नहीं तुम उसी तरह बैठे रहे ? तब मैंने ध्यान से देखा, पानी में मेरी परछाई तो कहीं थी ही नहीं। वहां तुम्हारी परछाई के साथ, पीहू की परछाई को देखा। मैं विस्मित, सच कहूं तो मेरे हाथ पांव ढीले पड़ गए। मेरे अंदर भय की एक लहर-
सी दौड़ गई। लेकिन कहते हैं न, नफरत की आग प्रबल होती है, तब भी मैंने तुम्हारी हत्या के उद्देश्य से रिवाल्वर निकाली, लेकिन लाख कोशिशें के बावजूद मैं उसका ट्रिगर नहीं दबा पाया। यूं कह लो दबा ही नहीं। जैसे वह रिवाल्वर पत्थर का कोई खिलौना हो।
आज जब मैं ठंडे दिमाग से सोचता हूँ तो पता हूं कि उस दिन जो कुछ भी हुआ वह नियति का फैसला था। तुम्हें मार कर मुझे क्षणिक सुख जरूर मिलता लेकिन उसके बाद का जीवन क्या होता ? जेल की सलाखें, उम्र कैद, यही सब न ? खुद के द्वारा निर्मित श्रापित जीवन से मुक्ति के लिए फिर यहां कौन भटकता ? जिसे देखने के लिए मैं तरस गया, कि कम से कम कोई एक सपना ही आ जाए जिसमें वह दिखाई दे जाए। वही मुझे जल में प्रतिबिंब के रूप में दिखी, वह भी तब, जब मेरे हाथ में रिवाल्वर थी और हृदय में तुम्हारे प्रति नफरत। उसे पलभर देखने के बाद मैं वहां से वापस चला आया। वापस रिवाल्वर तुम्हारे बैग में रखी। मंगल को भी तुम्हें खोजते हुए देखा। मैंने ही उससे कहा की एक बार नदी घाट की तरफ देख ले। 
रिवाल्वर लौटाते समय जो तुमने एक्टिंग की उसमें रिवाल्वर चली। यदि गोली होती तो निश्चित ही वह मुझे लगती, लेकिन उस शाम मेरे हाथ से क्यों नहीं चली ? शायद इसलिए कि उस समय तुमने जो सवाल किए थे वह सही थे ? या फिर नियति को मुझे समझाना थी कि मैं दोषी हूँ ?
तुम चले गए, मैं पत्र का इंतजार करता रहा कि तुम मुझे दोगे लेकिन चाह कर भी मैं तुमसे मांग नहीं पाया। हां बार-बार यह जताता रहा कि तुम कुछ भूले तो नहीं हो। मैं जानता था कि तुम मुझे भ्रमित कर रहे हो ताकि मैं था उम्र भर भटकता रहूं। लेकिन अंतिम समय जब तुमने कहा कि मैं यहां से बाहर निकल जाऊं तुम मेरे दोस्त हो तुम्हारा बुरा नहीं चाहूंगा। वह बात मेरे दिल को छू गई फिर मुझे किसी पत्र की कोई लालसा नहीं रह गई। इतने दिनों बाद उस पत्र को लौटाना वह भी उसी तरह सील बंद सिद्ध करता है कि तुम सदैव एक अच्छे इंसान बने रहे।
तुम्हारे जाने के बाद मेरी भी साहित्य में रुचि हो गई है। मैं भी अक्सर अब उन किताबों को पढ़ाता हूँ जिन्हें कभी पीहू ने पढ़ा होगा। शायद यही वजह है कि मैं तुम्हें कुछ ढंग का लिख पा रहा हूं। पीहू तो रही नहीं कि अब उससे मैं किसी भी प्रकार की क्षमा याचना कर सकूं लेकिन फिर सोचता हूँ, तुम तो हो न ? 
तुम्हारा सत्य।

जवाब में मैंने लिखा,
प्रिय सत्य,
     हम एकदूसरे के पाप-पुण्य का निर्धारण न करें तो बेहतर है, यह हमारा काम नहीं है। कुछ गलतियां हम सभी से हुई, जो बाद में गुनाह-ए-अजीम हो गईं। पीहू गुमनाम और तन्हा मौत नहीं मरना चाहती थी। शायद इसीलिए कभी उसने मुझसे कहा था की मरते समय तुम मेरे पास रहना। उसकी एक आखिरी इच्छा पूरी न हो सकी। पर थैंक्स कि तुमने उसकी कुछ अन्य इच्छाओं की पूर्त्ति की। मंगल ने मुझे बताया था कि इसके लिए तुम्हें समाज के कुछ ठेकेदारों से लड़ना भी पड़ा और तुम लड़े। तुमने पीहू की इच्छा का सम्मान किया, और उसकी इच्छा अनुसार ही उसका अंतिम संस्कार भी किया।
मैं जनता था कि पीहू की संपत्ति को लेकर तुम्हारे मन में किसी भी तरह का लालच नहीं था, इस बात के लिए मैने कभी भी तुम्हें दोषी माना ही नहीं। उस दोपहर जब आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर पीहू सो रही थी और मैंने तुमसे जो भी बातें की, उसी पल मैने समझ लिया था कि तुम्हारे मन में कोई लालच नहीं है। तुम मुझे अच्छे लगे, तुम्हारी विचारधारा ने मुझे प्रभावित किया। मैंने पीहू के प्रति तुम्हारे मन में जो प्रेम देखा, मुझे वह कहीं से दूषित नजर नहीं आया। तो इसलिए लिखता हूँ कि तुम अपने समस्त अपराधबोध से भी मुक्त हो जाओ।  लालच, घृणा, प्रेम इत्यादि का मन में उदय होना स्वाभाविक है। लेकिन उसे सही समय पर नियंत्रित कर लेना यही एक अच्छे इंसान की पहचान है। मुझे आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करना और सफल न होने पर मेरी हत्या का प्रयास करना, लेकिन सही समय पर अपने आप को नियंत्रित कर लेना, दोनों ही मानवीय स्वभाव और गुण हैं। जहां तक मेरा मानना है कि उस दिन नदी के जल में तुमने स्वयं के वास्तविक स्वरूप को देखा होगा। तुम्हारा नाम सत्य है, और वही सत्य तुम्हे उस शाम दिखा। 
मुझे तुमसे जो भी शिकायत हुई सिर्फ इस बात को लेकर कि तुम उसे अकेला छोड़ कर क्यों चले गए, जबकि उसने पहली बार तो तुम्हे विवाह के लिए मना नहीं किया था ? यह शिकायत आज भी है और शायद हमेशा रहेगी। जरा सोचो सत्य, जिसका पूरा परिवार उसे छोड़ कर चला गया, बाबा ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया था, उस लड़की को तन्हा उसके घर में छोड़कर चले गए, किसके भरोसे ? यदि कभी पीहू के दर्द को समझना हो तो उस पत्र में लिखें इन शब्दों को पढ़ना जो उसने मेरे पत्र में लिखा है, 
"एक दिन हमारे जीवन से सत्य-असत्य, पाप-पुण, मोह-माया, यथार्थ-कल्पना इत्यादि के भेद खत्म होने लगते हैं। जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान इन सभी की परिभाषाएं संकुचित होने लगती हैं। फिर इनका कोई मोल नहीं रह जाता है। मन का सूनापन, बेचैनिया, उदासी ये सभी जीवन में इतने प्रभावशाली और करीब होने लगते हैं कि अंत में यही हमारे लिए अंतिम सत्य बन जाते हैं। हमें अपने अवसाद से प्रेम होने लगता है। हम ऐसे गहन अंधकार में डूब जाते हैं, जिसमें फिर कोई रौशनी हो भी जाए तो आंखों को चुभने लगती है। आज-कल मैं एक ऐसे ही दौर से गुजर रही हूँ। तुम्हारी स्मृतियां किसी उजाले से कम नहीं। यह जितने ही प्रभावशाली ढंग से मेरे मन में उजागर होती हैं, उतनी ही कस के मैं अपनी आँखें भींच लेती हूँ..."
मेरे जीवन में पीहू का स्थान क्या था ? उसके प्रति प्रेम की तीव्रता इसी बात से तुम लगा सकते हो कि यदि मुझे तुम तीनों में से किसी एक का चुनाव करना होता तो मैं निश्चित ही पीहू का चुनाव करता, और सच मानो सत्य, मैंने कर भी लिया था। उसकी खुशियों में अपनी खुशियों की ही नहीं, अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व की भी तलाश करने लगा था। लेकिन इन सब का आभास होते हुए भी, तुम्हारे और बाबा के चाहने पर, मैंने उसे छोड़ दिया, यह सोचकर न कि तुम लोगों के बीच वह खुशहाल ज़िंदगी जीएगी ? तुम सभी मिलकर उसे खुश रखोगे, उसके साथ रहोगे... क्या यह मेरी गलत सोच थी ? इस तरह पीहू ने जो कुछ मेरे लिए लिखा वह भी सही था। 
मैंने भी उसके साथ वही किया जो उस लड़की ने कभी मेरे साथ किया था। मुझे बिना कुछ बताएं वह चुपचाप मेरी जिंदगी से दूर चली गई। और पीहू ने मेरे साथ वही किया जो मैने उस लड़की के साथ किया। उसे बड़ी सहजता और सरलता से अपनी जिंदगी से जाने दिया। मैं मंगल को कम से कम एक पत्र तो लिख ही सकता था, या फिर वह मुझे लिख सकती थी ? लेकिन नहीं लिखा, क्यों ?
सच मानो मैंने भी तुम्हें हृदय से अपना सच्चा मित्र माना था। मैंने पूरी की पूरी कोशिश की थी कि उसके हृदय में तुम्हारा स्थान क्या है यह जान सकूं, जान भी गया था, लेकिन बताने में मुझे डर लगा। कैसे सहन कर पाओगे तुम ? और वैसे भी यह काम तो पीहू का था न...? मैंने तुम्हारे कहने पर जब भी पीहू से तुम्हारे बारे में बात की उसने हर बार यही स्वीकार किया कि तुम उसके सबसे अच्छे मित्र हो। तुम्हारे और उसके बीच वैवाहिक संबंधों की जब भी बात छेड़नी चाही, तो वह या तो खामोश हो गई या फिर उसने बातों की दिशा ही बादल दी। 
उस दोपहर जो कुछ भी अटारी में घटित हुआ, ठीक उसके कुछ क्षण पाले ही उसने मुझे जाता दिया था कि उसे तुमसे नहीं मुझसे प्यार है। उस दिन तुमने उसके हाथों में चलनी देखी, तुम्हे आश्चर्य भी हुआ था। लेकिन तुम उसके अर्थ को न समझ पाए। उसके भी शब्द मुझे आज भी उसी तरह से याद हैं। उसने कहा था, "चलो यार, अभी छोड़ो कौन किसकी जोड़ी...? लेकिन जाओ तुम भी क्या याद रखोगे.... तुम्हारे भी जीवन में कोई आया था जिसने भरी दोपहरी में सूरज को देखने के बाद फिर तुम्हारी सूरत को चलनी में देखा था...."
अटारी में उस दिन तुम्हें पति के रूप में स्वीकार करने से पूर्व उसने बड़ी ही बेबसी के साथ मेरी आंखों में देखा था। उसकी वो नजर मेरी अंतर्मन में, जीवन के संपूर्ण अस्तित्व में आज भी समाई हुई है, मुझसे एक सवाल पूछते हुए, बताओ अब मैं क्या करूं ? यदि उस दिन मैंने उसे इशारा न किया होता, तो सच मानो, तुम रोते रहते, बिलखते रहते, रूठे रहते या फिर शायद तुम उसे छोड़ कर चले जाने की धमकी भी देते, तो भी वह कभी स्वीकार नहीं करती। एक मजबूत इच्छा शक्ति की लड़की ने मेरे एक इशारे पर अपनी समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया। बस उसी क्षण मैंने समझ लिया था कि मैं उसके जीवन में क्या स्थान रखता हूँ। मैंने एक पल में उसे पाया भी और दूसरे ही पल में उसे खो भी दिया। यदि अब तुम समझ सकते हो तो समझ लो मेरे दर्द को भी। उस पल के बाद मैं तो खामोश हो गया लेकिन उसने हार नहीं मानी। कभी एक्टिंग के बहाने तो फिर कभी रोते हुए मुझे गले से लगाकर, मेरे हृदय में अपने लिए छुपे प्रेम को वह कुरेदती रही। प्रतिपल मुझे जताती रही कि उसे मुझसे प्यार है न कि तुमसे। मैं भी एक इंसान था सत्य, मेरे भी कुछ जज्बात थे। उससे प्यार होते हुए भी मैं खुद को और कितने समय तक के लिए रोक पाता ? और अंत में हम दोनों ने ही खुले मन से एक दूसरे के प्रेम को स्वीकार कर लिया था। 
जरा तुम गहराई से सोचना, मेरे ऐसा करने से कम से कम उसे इस बात का हमेशा संतोष तो रहा होगा कि जिस लड़के को उसने चाहा, जिसे अपनी जिंदगी में शामिल कर बची-कुची जिंदगी जीने के सपने देखे, उस लड़के ने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ उससे मोहब्बत की। स्वीकार्यता हमें किसी बंधन में नहीं बांधती बल्कि मुक्ति देती है। उस दिन हम दोनों ही न कह पाने के दर्द से मुक्त हुए थे।
जल को जीवन का उद्गम माना जाता है, आधार माना जाता है। उसका नदी के शांत जल में, हम दोनों के चेहरों की परछाइयो के बीच में एल... ओ... व्ही... ई... अक्षरों का लिखना कई मायनों में एक संदेश था। उसने चाहत भरी नजरों से मेरी तरफ देखते हुए जैसे मुझे समझाया हो, हमारी मोहब्बत पानी में लिखी इबारत की तरह है, जो भले ही किसी को न दिखाई दे, लेकिन इस जल में घुली हुई, हर बंधनों से मुक्त, निरंतर प्रवाहित होती रहेगी; और ये जीवन धारा एक किनारे को दूसरे किनारे से सदैव मिलाती रहेगी। 
उसने कभी मुझसे चलती हुई राहों में कहा था, किसी के साथ सहजता और सरलता से जीवन व्यतीत कर लेने को प्यार नहीं कह सकते, और देखो तो ये सच साबित हुआ। आज मुझे समझ में आ रहा है कि उसे सभी ऐतिहासिक प्रेम कहानियों में शीरीन और फरहाद की ही प्रेम-कहानी क्यूं पसंद थी। मैं मानता हूँ कि मुझ में लाख कमियां सही लेकिन फरहाद की तरह कोई न कोई एक खूबी तो रही होगी न ? यकीनन पीहू ने मेरी उसी एक खूबी से मोहब्बत की। वह जानती थी कि कभी न कभी मेरी भावुकता का फायदा उठाने की कोशिश भी की जाएगी। शायद इसीलिए उसने बार-बार मुझे सचेत किया था, "तुम किसी शीरीन के फरहाद मत बनना। सामने वाले इंसान को हम अपने जैसा निश्चल समझने की भूल कर लेते हैं, जबकि यह दुनिया चालक, धूर्त और फरेबी लोगों से भरी पड़ी है..."
जाने की शाम को जब अटारी में पीहू को तन्हा छोड़ तुम्हारे बेडरूम में आया तो तुम्हे अपने बिस्तर में निढाल और बिखरे से सोते हुए देखा। तुम्हारे अंतर्मन की सारी थकान तुम्हारे चेहरे पर दिख रही थी, उस वक्त मुझे आभास हुआ कि तुम किस अंतर्द्वंद्व से गुजर रहे हो। यह आभास होते ही तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में अथाह करुणा में जन्म लिया। तुम्हारे चेहरे की मासूमियत देखकर महसूस हुआ जैसे स्वर्ग-लोक का सुकमार किंतु किसी अक्षम्य अपराध से श्रापित और अभिशप्त कोई देवता इस मृत्यु लोक में गहरी नींद सो रहा है। मैं तुम्हारे माथे को सहलाते हुए सिरहाने में कुछ देर तक तुम्हें देखते बैठा रहा। सोचता रहा, क्या इसी सोते हुए मासूम देवता ने हमारे साथ छल किया ? हां सत्य ! मैंने तो बाबा से मिलने के बाद उसी क्षण समझ लिया था कि बाबा का स्वभाव मेरे प्रति अचानक ही कठोर क्यों हो गया ? तब भी मेरे मन में तुम्हारे प्रति किसी कलुषित भावना ने जन्म नहीं लिया। जानते हो क्यों...?
सोचा जो खुद अपने श्राप से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है, उसे मैं कोई और बद्दुआ क्यों दूं ? पीहू तुम्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती है, बेस्ट फ्रेंड्स हो तुम उसके !! कभी तुम उसके जीवन में खुशियां लेकर आए और उसके बदले में यदि तुमने प्यार चाहा तो तुम गलत कैसे हुए ? खेल तो नियति का था। सितारों की दुनिया में दो सितारों की कहानी लिखी गई और इस धरती में घटित हुई। हमारा मिलना और बिछड़ना सब कुछ वही तय हुआ, हमारे मिलने से पहले ही !! मेरा और पीहू का मिलना और घटनाओं का उसी तरह घटना, मात्र उस कहानी का रिप्ले था। मैंने लौटकर आने के इरादे को वहीं त्याग दिया। हां सत्य ! श्रापित जीवन केवल तुम नहीं बल्कि मैं और पीहू भी जी रहे थे। उसी क्षण भारी मन और रोते हृदय से मैने उसके लिए आखिरी कविता लिखी, "जा तुझे छोड़ दिया..."
मैने पीहू को ले कर कभी तुम्हारे प्रति कोई कटुता या जलन की भावना स्थाई रूप से नहीं रखी। हम दोनों ही स्वार्थी थे, मैने उसके त्याग में सुख देखा और तुमने उसके मिलन में !। लेकिन पीहू क्या चाहती थी, हमने कभी सोचा ही नहीं!! 
अंत में एक प्रश्न मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ, भूत, वर्तमान और भविष्य की समय रेखा पर हम दोनों एक साथ क्यों चलते रहे ? कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं जो या तो घटित हो चुकी थी या जो आगे होने वाली थी, उनका आभास ही नहीं उनके दृश्य हम दोनों को क्यों दिखाई देते रहें ?
सच कहूं तो अब उसकी मृत्यु के शोक से मैं अब दूर हो चुका हूँ। उसकी सुंदरता, उसका शरीर, कभी मेरे लिए था ही नहीं, और जो है उसकी मृत्यु संभव नहीं। वह तो सदैव मेरे पास रहेगा, जीवन के इस पार भी और जीवन के उस पार भी, ठीक नदी में प्रवाहित उस जल की तरह जो इस किनारे पर भी होता है और उस किनारे पर भी। उसी नदी की बहती हुई लहरों में हमारी मोहब्बत की कहानी सदैव के लिए अमिट अक्षरों में लिखी रहेगी... 
अब शायद तुम्हे समझ में आ गया होगा कि उसने अपना अंतिम संस्कार उसी नदी के किनारे क्यूं चाहा था। सच पूछो सत्य अब तुम इस कहानी का हिस्सा नहीं हो, इसलिए तुम बेवजह इस कहानी में खुद की तलाश मत करो। न ही हमारे प्रति कोई सैंपथी रखो। मुक्त कर लो खुद को, दूर हो जाओ अपने शोक से।रात में अलग-अलग समय में तुम्हारी घड़ी का बंद होना और मेरे द्वारा देख लेने के बाद उसका फिर से चालू हो जाना, तुम इसे क्या मानते हो ? जरा खुद से पूछना, क्या उसके बाद तुम्हारी घड़ी कभी बंद हुई ?
मैं भाग्यवादी, अंधविश्वासी और संयोग की दुनिया में जीने वाला इंसान नहीं, फिर इस कहानी को मेरे साथ ही क्यों गुजरना था ? अब सभी सच तुम्हारे सामने हैं। जिस काम को कभी पीहू ने शुरू किया उसे मन लगाकर करते रहो, इस बात से मैं तुम्हें कभी नहीं रोकूंगा। लेकिन इन सब के बीच अपना भी ध्यान रखना। तुम्हें भी जिंदगी जीने का अधिकार है। बेशक उसे याद रखो किंतु खुद को तकलीफ दे कर नहीं। 
मानता हूँ कि पीहू को तुमसे कुछ शिकायतें थी, पत्र में तुम्हारे लिए घृणा शब्द लिखना उन्हीं शिकायतों का अंतिम परिणाम था। तुम उसे अपने दिल में मत रखना। मैं दावे से कह सकता हूँ, वह तुमसे कभी घृणा कर ही नहीं सकती। नहीं तो उसी पत्र में उसने यह बात न लिखी होती, ".... जब भी तुम्हे याद करती हूँ तो आंसू बहते हैं, रोती हूँ, तड़पती हूँ, लेकिन इन सब के बावजूद सत्य को भी याद करती हूँ। वह मेरे होने वाले इस बच्चे का पिता है, क्यों उसे छोड़ कर चला गया ?"... भले ही उसने तुम्हें पति के रूप में या प्रेमी के रूप में मन से स्वीकार न कर पाई हो, लेकिन एक मित्र के साथ-साथ अपने बच्चे के पिता के रूप में स्वीकार कर लिया था; और एक मां अपने बच्चे के पिता से कभी घृणा या नफरत नहीं कर सकती। हो सके तो तुम भी विवाह करो, एक सुखी वैवाहिक जीवन जीयो जैसा की पीहू ने अपने अंतिम समय में तुमसे चाहा था।
और हां, रही बात मुझे मेरी हत्या करने की कोशिश करने की तो मुझे यह बात तो उसी दिन मालूम पड़ गई थी जब मैंने तुम्हें रिवाल्वर लौटाई थी। मैंने बलेट्स खोजने के लिए पूरा का पूरा बैग देख डाला, लेकिन वह कहीं नहीं मिलीं। मैंने सोचा कहीं गिर गई होंगी। फिर अचानक ध्यान आया एक बार रिवाल्वर को ओपन करके देख लूँ क्योंकि वो मुझे कुछ वजनी लगीं। देखा तो सभी बुलेट्स चेंबर में थी। अब जरा सोचो सत्य, यदि मैंने चेक न किया होता और फिर कहीं वह मजाक किया होता तो फिर क्या होता ? 
अब हम कोई पत्राचार नहीं करेंगे। मैं अब दोबारा वहां कभी भी नहीं आना चाहूंगा और न ही इसके लिए तुम मुझे कभी प्रेरित करोगे। इसकी वजह यह नहीं है कि मैं तुमसे नाराज हूँ, या नफरत करता हूँ, या फिर कि अब मेरे सामने एक नई जिम्मेदारियां होगी, बल्कि इसलिए कि अब मुझे ऐसा नहीं लगता कि वहां पर मेरी कोई जरूरत है। वह कर्मभूमि अब तुम्हारी है। 
कभी-कभी परिस्थितियों इंसान को दोषी बना देती हैं। खुद के कहे गए शब्द कांटों की तरह मन में चुभते हैं। मैंने कभी नियति को पवित्र जल की शपथ देते हुए दोषियों को कठोर से कठोर सजा देने के लिए कहना चाहा था, लेकिन इस वक्त उसने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उसके शब्द मैं आज तक नहीं भूला, "श्राप देने से इंसान खुद भी श्रापित होता है..."
प्रार्थना में शक्ति होती है और यही मानते हुए मैं सच्चे मन से प्रार्थना करता हूँ कि यदि नियति हमारी भूलों को क्षमा न कर सके तो भी, कोई कठोर सजा न दे। क्योंकि मैं आज मानता हूँ कि वास्तव में कोई दोषी था ही नहीं, क्योंकि हम मनुष्य है, जो अपनी संवेदनाओं से परे नहीं, और शायद इसलिए हम कुछ हद तक लालची और स्वार्थी भी होते हैं...
तुम्हारा 
एक अजनबी दोस्त।

सत्य ने मेरी बात मान ली और फिर उसने कभी भी मेरे जीवन में कोई दखल नहीं दिया और न ही उसने कोई पत्र भेजा। पीहू को लेकर हम दोनों इतने खामोश हो गए या यूं कहें इतने अंतर्मुखी हो गए कि फिर इसका जिक्र भी किसी से नहीं किया। यहां तक की ज्ञान से भी कुछ नहीं कहा। ज्ञान को आगे चल कर इतना भर पता चला कि पीहू मुझसे प्रेम जरूर करती थी, लेकिन बाबा के कारण कभी स्वीकार न कर सकी। अंत में बाबा के न रहने पर लिव-इन रिलेशन में रहते हुए सत्य से शादी की, और हार्ट प्रॉब्लम के कारण कुछ महीनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। शायद इसीलिए उसने पीहू के बारे में मुझसे फिर कोई बात नहीं की। 
शादी के लगभन आठ वर्ष बाद मेरी मुलाकात फिर ज्ञान से हुई। बातों ही बातों में सत्य का जिक्र हुआ और उसने बताया कि वह अभी भी वहीं है, उसने विवाह नहीं किया और शायद कभी करेगा भी नहीं। वह पीहू के द्वारा शुरू किए गए कार्य को ही आगे बढ़ा रहा है। उस दिन मुझे मानवीय प्रवृत्ति की एक बात समझ में आई, यदि किसी अच्छे इंसान से अज्ञानतावश या क्षणिक लालच में आकर कोई अपराध या भूल हो भी जाए तो उसका बोध होने पर वह अपने आप को कभी क्षमा नहीं करता है, भले ही वह दूसरों के बड़े से बड़े अपराध को क्षमा कर दे, और यह सजा नहीं प्रायश्चित कहलाता है। यदि हम प्रायश्चित कर ले तो फिर किसी को भी दंड देने का कोई अधिकार नहीं। इस तरह सत्य ने अपनी सजा स्वयं निर्धारित की। अपने जीवन के लक्ष्य को सीमित कर पीहू क्या चाहती थी इस बात पर अधिक ध्यान दिया और ज्ञान के मुताबिक वह काफी हद तक कामयाब भी हो रहा था। अब आप वह पत्र पढ़िए जो पीहू ने सत्य के लिए लिखा था।

प्रिय सत्य !
यदि उसके आने से पहले या उसके पढ़ने से पहले तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो फिर कहती हूँ, एक बार नहीं कई बार पढ़ना और खुले मन और विचारों से पढ़ना, एक सहृदय मित्र और इंसान बनकर पढ़ना, या फिर इस बच्चे के पिता बन कर ही पढ़ लेना। तब निश्चित ही इस पत्र की गहराई को तुम समझ पाओगे।
कभी अपने बॉयफ्रेंड से मैंने कहा था कि काश ! वह मेरी जिंदगी में तुम्हारे आने से पहले आया होता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। तो अब तुमसे कहती हूँ कि अच्छा ही हुआ कि फिर तुम मेरी जिंदगी में आए और माध्यम बने उसे मेरी जिंदगी में लाने का। कहते हैं एक दोस्त का सबसे बड़ा फर्ज होता है, अपने दोस्त को खुश रखना, उसकी हर जायज़ इच्छा को पूरी होते हुए देखना, तो इस नाते तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहे जिसने अपना फर्ज अनजाने में ही सही लेकिन ईमानदारी से निभाया। तो फिर आज तुमसे कहती हूँ कि अब तुम मेरे कहने पर उसे दोबारा यहां लेकर आओ और जब तक वह यहां न आ जाए तब तक मेरी इन बुक्स को जहां रखी हैं, वही रखे रहेने देना। अब उसे ही निर्णय लेने देना कि इनका क्या करना है। यह अधिकार केवल उसका है। अब तो मान लो कि मेरे और उसके बीच का संबंध नाजायज नहीं था, यदि होता, तो नियति ने हम दोनों के मिलन का माध्यम तुम्हें न बनाया होता ?
काश ! तुम हमेशा वही सत्य बन कर मेरे पास रहे होते जिसे मैंने पहली बार इसी अटारी में पूरे विश्वास के साथ गले लगा कर अपने हृदय के सभी दुख-दर्द कहे थे। झूठ नहीं लिखूंगी, बाबा के द्वारा बना देने के बाद भी मैंने तुम्हें किसी भी रिश्ते-नाते से दूर रखना चाहा। वजह थी कि मैं अपनी मृत्यु को सामने खड़ा देखती और सोचती पता नहीं कब मेरी ओर चल पड़े ? फिर धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि तुम वह नहीं हो जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश है, या फिर जिसका इंतजार मैं कर रही हूँ। तो फिर ऐसे में तुम्हें मैं क्या दे सकती थी ? न तो मेरे पास जिंदगी थी और न ही तुम्हारे प्रति प्रेम... बस एक मित्रता का भाव था, और सच मानो मैंने इसे पूरी वफ़ा के साथ निभाया। 
तुम भी साधारण ढंग से सोचोगे तो मन में आएगा कि मेरे बॉयफ्रेंड में ऐसी कौन सी खूबी थी जो तुम्हारे अंदर नहीं थी ? छोटी-छोटी कविताएं, कहानियां, शायरी कहने वाला एक हमउम्र साधारण शक्ल-सूरत वाला लड़का तुमसे श्रेष्ठ कैसे हो गया कि तुम मोहब्बत की जंग में उससे हार गए। तो जान लो, प्रश्न श्रेष्ठता का नहीं अपनी पसंद का था। किसी और की नजरों में या फिर चाय तुम स्वयं अपनी नजरों में खुद को उससे श्रेष्ठ समझते रहे हो, तो वह भी मैं स्वीकार करती हूँ, हो सकता है तुम गलत नहीं हो। लेकिन मेरी नजरों से देखो, तो वह वो व्यक्ति था जिसने मुझे ही नहीं मंगल तक को समझा दिया कि पंछियों का झूठा खाने से कोई बीमारी नहीं होती। इस प्रकृति में उनका भी हक और हिस्सा होता है। 
इतनी कम उम्र में इतनी व्यापक सोच !! और जब भावुकता में आ जाए तो उससे बच्चा कोई दूसरा नहीं। मैं भी पहले सोचती थी वह बहुत बड़ा एक्टर है। लेकिन धीरे-धीरे एहसास हुआ, यह तो एक ऐसा इंसान जो अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करता है... कोई एक्टिंग नहीं करता। जब भी उसे सच कहना होता है तो वह नजरे झुका के बातें करता है। और जब झूठ बोलना होता है तो सीधे आंखों में देखकर बातें करता है; जैसे उसकी निगाहें सामने वाले से पूछ रही हों, बताओ कितना सच है या कितना झूठ ?
उसके बाद मंगल ने कभी भी सुबह और शाम को पेड़ में बैठे पंछियों को आधे घंटे से पहले नहीं उड़ाया, और उसके जाने के बाद मैंने जो भी अमरुद अपने बगिया के खाए वह सुग्गा के झूठे थे। दिल में एक ही आरजू थी, शायद यह सुग्गा इस देश से उड़कर उसके देश में कभी तो पहुंच जाए और वह भी उसी सुग्गा का कोई जूठा फल खा ले ? कहते हैं जूठा खाने से प्यार बढ़ता है, प्यार न सही दूरियां तो कम होती ? ऐसी मोहब्बत थी हमारे बीच और मेरे जीवन में उसका स्थान। 

जानती थी मेरी सोच वृहद थी, जिसका पूरा होना संभव नहीं था, फिर भी मैं ऐसा चाहती थी ! तुमसे पूछती हूँ क्यों ? है कोई जवाब ? ठीक है इसका जवाब मैं देती हूँ, वही बात कहती हूँ कि अपनी पसंद की हर इंसान को तलाश होती है। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी, जो मेरी प्यास थी। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। वह भी तो स्वीकार करता था कि यदि वह 19 है तो तुम 20 नहीं बल्कि 30 हो, लेकिन क्या सचमुच ? तो आओ मैं उसके व्यक्तित्व की कुछ बाते लिखती हूँ, जो केवल हम दोनों के बीच रहीं और शायद जिनका आभास तुम्हें भी हुआ हो लेकिन तुम स्वीकार नहीं कर पाए। 

मैं और मेरे सारे दुःख-दर्द उसके जीवन में प्राथमिक स्थान रखते थे। वह सब कुछ छोड़कर बिना किसी रिश्ते के मेरे साथ रहना चाहता था। उसने जाते-जाते बाबा से यही एक चीज तो मांगी थी, लेकिन हुआ क्या ? कहो, मुझसे बेहतर तो तुम जानते होगे ? अपने प्रेम के प्रति इतना ईमानदार कि उस रात जब उसकी नजर में मै बेखुदी में थी, मुझसे लाख मोहब्बत होते हुए भी, मेरे बार-बार उसे गले लगा कर आई लव यू कहने पर भी, मेरे होंठों का उसके होठों के नजदीक होते हुए भी मुझे किस तक न किया !! क्योंकि उस वक्त उसे आभास था कि मैं अपने होश में नहीं हूँ, और आई लव यू शब्द मैं तुम्हारे लिए कह रह हूँ। 

उसने भी एक सहृदय मित्र की तरह ही मुझे गले लगाया। एक अच्छे पेरेंट्स की तरह मेरी माथे को चूमकर आई टू भी कहा। मेरी सेवा करता रहा, मेरे लिए फिकरमंद रहा, लेकिन प्रतिफल में उसने कुछ नहीं चाहा, जो कुछ चाहा मैने चाहा, पहल मैने की। 
मंगल चाचा के घर चले जाने के बाद मैं उसके साथ उसी के बिस्तर मे आधे घंटे तक उसे देखती हुई पड़ी रही। जो वह न कर सका मैं उसके साथ करना चाहती थी। उसे अपनी बाहों में भर के जी भर चूमना चाहती थी। मैं अपनी आत्मा और शरीर की सारी हदें पार कर, उसकी होना चाहती थी, किसी भी कीमत पर। 


तुम्हे याद है सत्य, कभी आपस में हमने एक खेल खेला था, वही गंगा नदी का उद्गम स्थान ? तुमने बड़े ही रोमांटिक अदाज में अपनी तर्जनी को पहली बार मेरे मांथे, मेरी नाक, मेरे होंठ, मेरे सीने के बीच से गुजारते हुए पेट तक ले गए थे ? याद आया ?  मैंने तुमसे कहा भी था कि तुम्हें कोई कैसे डंप कर सकता है ? उस दिन के बाद मैंने कई बार कोशिश की कि तुम्हारे लिए अपने अंतर्मन में पति-पत्नी या फिर प्रेमी-प्रेमिका वाली फीलिंग को महसूस कर सकूं ? कई बार तुम्हें खुद छेड़ने की कोशिश भी की, लेकिन मेरे अंतर्मन में ऐसी कोई भावना जागृत नहीं हो पाती थी।

 लेकिन यहां तो सब कुछ विपरीत था, वह निश्चिन्त खुले आकाश के नीचे सो रहा था, और मैं उसे केवल सोते हुए देख रही थी। न तो वह मुझे छू रहा था, न ही गंगा नदी के उद्गम स्थान का एहसास करा रहा था। फिर भी पता नहीं क्यूं उस रात मात्र उसे देखकर, मेरे मन में सभी भाव जागृत हो रहे थे। क्या इसलिए कि मैंने शराब पी रखी थी या किसी नशे में थी ? यह भी कैसे मान लूं ? इससे पहले पिछली तीन रातों में शराब पीने के बाद मैं तुम्हारे साथ ही सोई थी, तो फिर मेरे मन में ऐसे भाव क्यों जागृत नहीं हुए ? इसके साक्षी तो तुम खुद हो न ?
कभी मैंने उससे पूछा था, "बताओ ! दुनिया की सबसे मीठी चीज क्या है...?", उस दिन उसने कोई जवाब नहीं दिया था, वही प्रश्न आज मैं तुमसे नहीं करूंगी, बल्कि उसका जवाब दूंगी। तो सुनो, अपने प्रिय या प्रियवर को कसकर अपनी बाहों में भरकर उसके होठों को चूम लेना, ये दुनिया का वह सुख है जिसका एहसास सबसे मीठा होता है, और उस रात मैं जिंदगी के इसी मीठे एहसास से गुजरना चाहती थी। वह मेरी कल्पना के प्रत्येक बिंदु में समाहित था। 
अब इससे अधिक तुम्हें क्या लिखूं सत्य ? सब कुछ भूल कर मैं सिर्फ तुम्हारी हो गई, यही नाटक करते हुए मैंने तुम्हारे साथ जिंदगी के अंतिम कुछ दिन वैवाहिक संबंधों में जीना चाहा। लेकिन आज महसूस होता है, यह एक फरेब था। अपने अंतर्मन के सच को झुठलाना, एक ऐसा छल जो मैंने खुद ही स्वयं के साथ किया।

यदि आज यह सब स्वीकार करने में तुम मुझे चरित्रहीन भी समझना चाहो तो समझ लेना, लेकिन मैंने तुम्हें कोई धोखा दिया या मरने के आखिरी पल तक अपने अंतर्मन के सच को तुमसे छुपाया, इस अपराधबोध से तो मुक्ति मिलेगी, और शायद तुम्हें भी ? अब तुम अपने आप को बखूबी दिलासा दे सकते हो कि तुमने अपनी चरित्रहीन पत्नी का त्याग करके कोई अपराध नहीं किया। लेकिन फिर भी कहती हूँ, जरा सोचना... यह बात तो तुम्हें आज मालूम पड़ रही है न ? उस दिन तो मालूम न थी, जब तुम मुझे छोड़ कर गए थे ?
मैंने विवाह के लिए तुम्हे सदैव मना किया, लेकिन देखो तो !! उसे अपने जीवन में शामिल कर जिंदगी जीने की लालसा इतनी प्रबल थी कि अंतिम दिन ही सही मैंने उसे विवाह के लिए स्वयं ही प्रपोज किया था, क्यों ? चलो तो फिर यह भी जान लो। जिस पल मैंने उसे वैवाहिक संबंधों के लिए प्रपोज किया, उस पल मैंने यही सोचा था, जो व्यक्ति बिना किसी संबंध के ताउम्र मेरे साथ रहने के लिए तैयार है, यदि किसी भी संबंध में मुझसे जुड़ गया तो सोचो, किस हद तक वह मेरे साथ अपनी वफाएं निभाता ? हम दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति जो भावनाएं अंतर्निहित थीं, उन भावनाओं के लिए पति-पत्नी के रिश्ते से बढ़कर और कौन सा संबंध हो सकता था ? एक ऐसा हमसफर, एक ऐसा हमराही मेरे साथ होता, जिसे मैं मन, वचन और कर्म से अपना सकती थी। लेकिन ? शायद मैं भूल गई थी कि उसी दिन चलती हुई राहों में मैंने अपनी किस्मत के फैसले को स्वीकार कर लिया था जिस पल मैंने उसे अपनी पहली शायरी सुनाई थी...
इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।

तो फिर हैं सत्य, उसकी यादें आज भी हैं मेरे साथ !! आंसू का एक कतरा ही क्यों, मैंने तो उसकी आंखों में स्वयं के लिए आँसुओं का समुंदर लहराते हुए देखा है। जिस समय वह रोते हुए इसी अटारी की सीढ़ियों को उतर रहा था, तो मेरे मन में भी गहरी वेदना ने जन्म लिया। उसी वेदना में आज सुख की अनुभूति होती है। चलो कोई तो था जो मेरे लिए रोता-रोता चला गया !! बस यही एक आत्मिक सुख तो बचा है मेरे पास उसे भी कैसे छोड़ दूं ? आज उसके वही आँसूं मेरे लिए सबसे बड़ी धरोहर है। सबसे बड़ी पूंजी है, मान लो कि इस जीवन की सबसे बड़ी कमाई है। इसीलिए मैं दावे के साथ कह सकती हूँ, वह भी मुझे भूला नहीं होगा। क्योंकि वही आँसूं तो उसने भी मेरी आँखों में देखे होंगे न ? उन आँसुओं में कोई भेद था क्या ?
मैंने उसका दिल रखने के लिए उसे विवाह के लिए प्रपोज नहीं किया था। सच में मैं ऐसा चाहती थी। मैं उसे बाबा के सामने उसी तरह से प्रस्तुत करना चाहती थी जो वास्तव में वह था। इसके लिए मैं कोई न कोई रास्ता भी निकाल लेती, यदि तुमने अचानक ही बाबा को हम दोनों के बीच लाकर खड़ा न कर दिया होता। या फिर जाते समय जो उसने कविता लिखी, वह बाबा को न देकर मुझे दी होती, तो मैं उसे उसी दिन ही रोक लेती, उसे अपने जीवन से कभी नहीं जाने देती। चाहे इसके लिए मुझे उसे अपनी सौगंध ही क्यूं न देनी पड़ती।
अब मैं प्रेम की किसी फिलासफी में नहीं जाऊंगी सत्य। मैं तुमसे सिर्फ एक साधारण-सी बात पूछूंगी। किसी भी रिश्ते को अंतर्मन से स्वीकार करने के लिए आपस में विचारों का मिलना जरूरी होता है न, तो प्रेम संबंध इससे अछूता कैसे रह सकता है ? हां सत्य यह सच है, मैं स्प्रिचुअल जीवन जी रही थी और तुम मेट्रलिस्टिक। कहने का अर्थ यह है कि हम एक दूसरे के टाइप के थे ही नहीं, जैसा कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड ने कभी तुमसे कहा था। उस समय तुम मासूम थे, दुनियादारी से परे थे और उसे महफिलों का बयफ्रेंड चहिए था। जो उसके साथ पार्टी इंजॉय कर सके, इतने खुले विचारों का हो कि अपनी महबूबा को किसी दूसरे की बाहों में नाचते-थिरकते देख सके, जो तुम बन न सके और उसने तुम्हारे साथ ब्रेकअप कर लिया। जैसा कि तुमने मुझे स्वयं बताया था, वैसे वह हर लिहाज से एक अच्छी लड़की थी। तो फिर मैं कहा गलत हुई ?
जिस समय तुम मेरी जिंदगी में आए उस समय मेरे जीवन में सिर्फ लिटरेचर का ही प्रभाव नहीं था, बल्कि मेरी संभावित मृत्यु ने मुझे ऐसा बना दिया था। मैं भौतिकता से परे होती चली गई। एक ऐसी अध्यात्मिक दुनिया जहां किसी को पा लेने का कोई सपना नहीं किसी को खो देने का कोई डर भी नहीं। बस बची हुई जिंदगी को अपने मन मुताबिक इंसान के साथ जीना चाहती थी, और तुम ? तुम तो जिंदगी के उसे दौर में थे, जहां इंसान नए-नए सपने संजोता है। सुखद भविष्य की चाह में वर्तमान को परिश्रम की आग में झोंक देता है। उसके मन में किसी को पा लेने की खुशी, रिश्तो में बांध लेने की चाहत प्रबल होती है। अपने जीवन में हर्ष और उल्लास के सभी साधन जुटाना चाहता है।
अब यदि तुम्हें सच को स्वीकार करने की हिम्मत है, तो स्वीकार कर लो। मैं तुम्हारा एक ऐसा ही एक साधन थी न कि प्यार। जिंदगी के किसी भी मोड़ पर मैं तुम्हारा साथ न छोड़ दूं, इसलिए तुम मुझे वैवाहिक बंधन में बांध लेना चाहते थे। कहो तो झूठ है ? ऐसा इंसान किसी को अपनी सैंपथी तो दे सकता है किंतु काइंडनेस नहीं। लेकिन कहते हैं नियति अर्थात प्रकृति अपना खेल खेलती है। उसने तुम्हारे माध्यम से ही मेरे सामने एक ऐसे इंसान को लाकर खड़ा कर दिया जिसने पीहू को पीहू से मिला दिया। जो मेरे देखे अधूरे स्वप्न को पूरा करने के लिए मेरी जिंदगी में आ गया। 
अभी भी तुम कल्पना कर सकते हो तो थोड़ा-सा और कर लो। एक व्यक्ति जिसे जिंदगी से कोई मोह नहीं, जीवन जीने के प्रति उदासीन हो चुका था। क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, उसे खुद पता नहीं था, तो फिर क्यूं भूले-भटके मेरी ही बगिया में आ बैठा ? उसे भी तो प्रतिपल क्यों आभास होता रहा, जैसे कि वह पहले भी यहां आ चुका है ? मैं जब भी रोई मुझे गले लगा कर वह भी मेरे साथ रोया, और जब वह दुखी हुआ तो ठीक यही मैंने भी किया। क्यों ? शायद इसलिए की हम दोनों ही जीवन और मृत्यु को निकट से महसूस कर चुके थे। किसी को प्राप्त कर लेने या खो देने की चाहत से दूर हम एक साथ जिंदगी को जीना चाहते थे। प्रेम तो उसी से होता है न जिसके साथ हम जिंदगी को जीना चाहते हैं। नहीं तो जिंदगी गुजारने के लिए सामंजस्य के सिद्धांत तो होते ही है। लेकिन ये सब कब और कितने दिनों तक किसी के काम आते हैं ? मैं भी उसके साथ जिंदगी जीने के लिए किसी भी हद को पार काने के लिए तैयार थी, लेकिन ? तुमने तो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उसे बाबा के सामने ले जा कर खड़ा कर दिया ? इतना ही नहीं अपने परिवार के लालच और अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए मुझे विवाह के लिए तैयार करना चाहा। तुमसे अधिक तो वो ही चाहते थे कि तुम मुझी से विवाह करो। 
क्या सिर्फ इसकी एकमात्र वजह मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम था ? इल्जाम नहीं लग रही बल्कि जो देखा, जैसा महसूस किया, उसे ही लिख रही हूँ। तुम्हारे सभी फैमिली मेंबर्स से मिलने के बाद बहुत दिनों तक मैने सोचा, तब इस निष्कर्ष में पहुंच पाई। उन्हें मेरे ज्ञान, मेरे स्वभाव, मेरी रुचि से कोई मतलब नहीं था। हां मेरी सुंदरता की खूब तारीफ करते। शायद उन्होंने मुझे और लड़कियों की तरह ही समझ लिया था, जो अपने रूप सुंदरता की तारीफ सुन फूल के कुप्पा हो जाती हैं, और उसी एहसान के बोझ के तले दबे सब कुछ स्वीकार करती चली जाती हैं। उन्होंने जब भी मुझसे पूछा तो यही पूछा कि मेरे बाबा के पास संपत्ति कितनी है, रुपए पैसे कितने होंगे और उनके न रहने पर मालिकाना हक कितने लोगों के बीच विभाजित होगा। हो सकता है, तुम इनसे परे रहे हो, लेकिन बार-बार यह कहना कि या तो तुम पीहू से शादी करो या फिर रिश्तो के लिए आए संबंधों में से किसी को स्वीकार करो, तुम्हारी बातों को झूठा साबित नहीं करते थे ?
फिर मेरी जिंदगी में एक ऐसा लड़का आया जिसके पास मुझसे कम कुछ भी न था, लेकिन वह सब कुछ छोड़ कर मेरे पास रुकना चाहता था, ठहरना चाहता था, मेरे साथ जिंदगी जीना चाहता था, बिना किसी रिश्ते-नाते के। याद करो, कभी तुमने ही मेरे और ज्ञान भईया के सामने उससे यहीं रुकने के लिए कहा था न ? तो फिर उसके साथ बगिया से घर तक पहुंचने के बीच ऐसा क्या महसूस कर लिया कि तुम्हारा इरादा बदल गया ? हमें कुछ देर हो गई और तुम डर गए ? तो फिर यदि कहीं वह रुक जाता तो ? कितने दिनों तक उसे तुम मेरे नजदीक सहन कर पाते ? क्या उस दिन उसने यह न सोचा होगा कि इसके पहले तो बाबा को उससे कोई शिकायत नहीं थी, फिर इतना रूखा और अजीब बर्ताव उसी दिन उसके साथ क्यों हुआ ? अचानक ही बाबा उसके लिए इतने कठोर क्यों हो गए ? वह तुम्हें उसी दिन ही समझ गया था, फिर भी तुम्हारे उज्जवल चरित्र को सभी के सामने उज्जवल ही रहने दिया, यहां तक की मेरे सामने भी। उसने सबके मन की बात पढ़ ली और शायद इसीलिए चुपचाप यहां से चला गया। बिना हंगामा किये, बिना कुछ कहे, बिना कोई इल्जाम लगाए। कोई बड़ी बात नहीं की इस षड्यंत्र में उसने मुझे भी भागीदार समझा हो, आखिरकार बाबा का संदेश लेकर मैं ही तो उसके पास गई थी न ? 
वह मेरे प्रेम के लिए नहीं तरस रहा था, न ही मुझसे कोई सहारा चहता था, अरे उसने तो इस तरह का प्रेम बहुत कम उम्र में पा लिया था, और उसी उम्र में उसका त्याग भी कर चुका था। वह भिखारी नहीं था, लेकिन बाबा के सामने तुमने तो उसे भिखारी बना दिया !! उसने प्रेम की प्यास तो मेरी आंखों में देखी, जिसने पूरी इज्जत और सम्मान के साथ उसे स्वीकार किया। 
मुझे वो दिन आज भी याद है जब मैं उसके साथ पहली बार नदी पार के मंदिर में गई। वह मंदिर वही था जिसमें उसके साथ खुद को देवी मां के सामने घुटने के बल बैठे हुए पीछे से देखा था। मंदिर का प्रवेश द्वार और उसके अंदर का स्वरूप देख कर मैं खुद हैरान थी। इतना ही नहीं स्वप्न में जो और जिस रंग के कपड़े हमने पहने थे, ठीक उसी तरह के कपड़े हम उस दिन भी पहने हुए थे। तुम्हारे पूछे जाने पर जिसका ज़िक्र मैंने तुमसे भी किया था। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है कि उस आदिवासी लड़के ने मंगल से ये क्यूं कहा कि उसने हम दोनों को कुछ दिन पहले ही एक साथ मंदिर में देखा था, जबकि हम वहां तो पहली बार ही गए थे न ? मैं उसी पल समझ गई थी कि उसका मेरी जिंदगी में आना महज एक संयोग नहीं पूर्व निर्धारित था।
मैने नदी के किनारे पत्थर में बैठे हुए उसकी आंखों में कुछ देर तक देखा था। मन में एक ही लालसा थी, कही तो उसकी नजरों में मुझे या मेरे प्रेम को पा लेने की याचना दिखे, लेकिन नहीं दिखी। स्थिर और गहरी नजरों ने मुस्कुराते हुए मुझसे सिर्फ इतना कहा, तुम जैसा चाहोगी वैसा होगा। तो क्या उसे मुझसे प्रेम नहीं था ? था, लेकिन अपने प्रेम का आवरण वह मुझे नहीं पहनना चाहता था। सीधे शब्दों में कहूं तो मुझे मजबूर नहीं करना चाहता था। सब कुछ उसने मुझ पर छोड़ दिया था। सीधे शब्दों में कहूं तो उसकी आंखों में मुझे जो प्रेम दिखा वह किसी लालच से परे था। 
वह भी जिंदगी जीना चाहता था गुजरना नहीं। और जिंदगी जीने के लिए आपकी पसंद का इंसान आपके साथ होना चाहिए। बस यही तो जरूरी होता है। वह प्रेम के क्रम की प्रत्येक अवधारणा से परे था। पहला प्रेम, दूसरा प्रेम, तीसरा प्रेम इत्यादि से अलग और इसे उसने हम सबके सामने जताया भी और बताया भी, जब उसने मेरी तारीफ तुम्हारे और ज्ञान भैया के सामने की। उसे प्रेम के होने या न होने पर यकीन था। यदि प्रेम है, तो वह किसी भी क्रम से परे हैं, और यदि नहीं है, तो फिर कोई बात ही नहीं ? आपके जीवन में व्यक्ति के आने का क्रम तो हो सकता है किंतु प्रेम का नहीं। क्योंकि यह तो मन का भाव है, जो सदैव एक जैसा होता है। लेकिन हां उसकी तीव्रता अलग-अलग हो सकती है, और सच पूछो उसके प्रति जो मेरे हृदय में जो प्रेम था उसकी तीव्रता सर्वाधिक थी, जैसे कि कभी उस लड़की के प्रति उसके हृदय में रही होगी।
जिस व्यक्ति से ये एहसास पहली बार मिलता है वो हमारे लिए यादगार होता है; और हम प्रेम को उस व्यक्ति विशेष से सदैव के लिए जोड़कर रखने की भूल कर लेते हैं। ऐसी मूर्खता केवल वही करते हैं जिन्हें सिर्फ चेहरे से प्यार होता है, फिजिकल अपीरियंस से मोहब्बत होती है। फिर ऐसे इंसानों को तो सात बार मोहब्बत हो सकती है न !! क्योंकि मैं ही नहीं यह दुनिया मानती है, कि इस धरती में एक ही शक्ल-सूरत के कम से कम सात इंसान तो होते ही हैं ? 
तुम अच्छी तरह से जानते थे कि बाबा तुम्हे पसंद करते है और मैं उनकी मर्जी के खिलाफ कभी नहीं जाऊंगी, तो तुमने उनका सहारा लिया ? और उसका त्याग देखो, मुझसे लाख मोहब्बत सही लेकिन वह मुझे किसी भी दुविधा में नहीं डालना चाहता था। उस दिन बाबा ने उससे क्या कहा, उसने कुछ नहीं बताया। मरने के पूर्व बाबा ने एक-एक बात मुझे बताई थी। किस तरह उसने पैर पकड़ के बाबा से मुझे मांगा था, उफ़ ! और मैं दुविधा में रही कि वह मुझे छोड़ कर चला गया। एक तरह से देखा जाए तो उसने भी मुझे कुछ नहीं कहा, जाते समय जो कुछ भी कहा तो उसी लड़की से कहा, जिससे जुदा होते समय वह कुछ न कहा पाया। सिर्फ मेरे लिए इतना था, "मुझे तुम्हारे होने से प्यार है पीहू, चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो...", इन्हीं शब्दों में मैं आज उसे देखने की कोशिश करती हूँ, और शायद वह भी करता हो। क्योंकि उसने कभी मुझसे कहा था कि शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं विजन होता है। आज मेरे अंतर्मन में भी उसके लिए एक विजन है, 
तू गया मेरी जिंदगी से किसी हवा के झोंके की तरह,
कि बाद इसके धड़कनें भी तरस गई सांस लेने के लिए।

इसी अटारी में अंतिम दिन उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा था, "तुम्हें खुद पर बहुत गुरूर है...,?", और मैंने कहा, "... पहले था, लेकिन माइलस्टोन के लिए लिखी गई तुम्हारी कविताओं को पढ़कर जाता रहा..."
मैं जो उससे कह न पाई यही एक बात थी, आज तुमसे कहती हूँ सत्य। हर लड़की को अपनी सुंदरता या अपनी खूबियों पर गुरुर होता है, वो गुरूर मुझ में भी था। लेकिन जब मैंने माइलस्टोन के लिए उसके द्वारा लिखी गई कविताओं को पढ़ा, महसूस किया तब समझ में आया कि उसके जीवन में आने वाली वह लड़की कितनी महत्वपूर्ण रही होगी, जिसके जुदा होने के बाद भी उसके प्रति इतने खूबसूरत एहसास हैं। एक ऐसी लड़की ने उससे मोहब्बत की, उसे बदल कर रख दिया, वो भी बिना कहे, बिना जताए। तो अब तुम ही बताओ मुझे किस बात का गुरुर होता ? उसने कभी उस लड़की से मेरी तुलना नहीं की, कभी उसका जिक्र खुद से नहीं करना चाहा। वह जानता था कि उसके ऐसा करने पर मैं हर्ट होती, इसलिए उसने मुझे एक अलग ही मुकाम पर रखा। वो तो मैं ही थी जिसने कुरेद-कुरेद कर उसके बारे में उससे पूछा। 
इसी अटारी पर मैंने उससे पूछा था, "हम दोनों में कोई तो समानता होगी जो तुम मुझसे प्यार कर बैठे ?"
वह सिर्फ मुस्कुरा के रह गया, तब मैं आगे पूछा, "चलो समानता न सही अंतर ही बता दो... मैं बुरा नहीं मानूंगी...?"
"हां वो मैं बता सकता हूँ...", उसने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा था...
वो दर्द भरी दुपहरी थी, तू सुकून भरी शाम है।
वो धीरे-धीरे जलती थी, तू धीरे-धीरे ढलती है।।
कितनी सही बात कही थी न उसने ? आज ज़िन्दगी धीरे-धीरे ढल ही तो रही है।
जाने से पहले उसने मेरे बाल संवारे, मेरे पैरों को दबाते हुए मुझे एक वचन दिया। और देख लेना सत्य, कभी यदि तुम उससे दोबारा मिले तो उसे अपना वचन निभाते हुए पाओगे। जब तक मैं इस धरती में हूँ वह मेरा इंतजार करेगा; और इसीलिए मैं चाहती हूँ कि वह यहां पर एकबार आए। मेरी मृत्यु को स्वीकार कर, जी भर के रो ले और फिर जीवन-पथ पर आगे बढ़ जाए।
अब अपनी कहती हूँ, उस दिन मैंने क्या किया। 
मैंने एक ही आईने में उसकी सूरत के साथ अपनी भी सूरत देखी। उसके गाल को चूमा, और बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसकी तरफ कुछ देर तक देखती रही। मैं उस पल चाहती थी कि वह मुझे अपनी बाहों में ले कर प्यार करे, मुझे भी किस करे। यहां तक की यदि उसने मेरे होठों को चूमने की कोशिश भी की होती तो भी मैं उसे न रोकती। लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया, बस आईने में मेरी तरफ देखता रहा। और मैं ? चाह कर भी उसके होठों को न छू पाई बावजूद यह जानते हुए कि वह भी अपने सारे दुख-दर्द भूल कर मेरे साथ जिंदगी जीना चाहता है। उसी पल मैने निर्णय ले लिया था कि उसका प्यार पाने के लिए यदि मुझे उससे विवाह भी करना पड़ा तो मैं करूंगी।
कभी एकांत के लम्हों में मैं उसकी बाहों में थी, और कभी दुनियादारी से बेखबर झिलमिल सतारों भरे आसमान के नीचे वह सो रहा था, और उसे देखते हुए मैं ठीक उसके बगल में लेटी रही। उस समय न तो हमे कोई देख रहा था और न ही हमारे कृत्य को कोई परिभाषित करने वाला था। 
    लेकिन तब भी, मन में प्रबल इच्छा होते हुए भी हम एकदूसरे को रति भाव से चूम तक न सके। मेरे मन में बस यही ख्याल था, और यही ख्याल उसके मन में भी अवश्य आया होगा कि यदि इस भाव से हम एकदूसरे को कभी चूमेंगे भी तो एकदूसरे के संज्ञान में। 

यह थी एक दूसरे के प्रति हमारे प्रेम की इंटीग्रिटी। नहीं तो तुम ही बतओ कौन था वहां जो हमें कटघरे में खड़ा करता ? मानती हूँ, हमने इससे पहले एक दूसरे को गले से लगाया एक दूसरे के माथे को चूमा भी लेकिन उस समय मन में रति भाव न होकर अपने प्रिय की सभी वेदनाओं को आत्मसात करने के करुण भाव थे। आईने में उसकी सूरत देखते हुए रति भाव से प्रथम बार मैंने उसके गालों को चूमा था और मेरी नजरें एक पल के लिए शर्म से झुक गई थी। वह 'चिक किस' मेरे जीवन में किसी भी 'लिब किस' से अधिक प्रभावशाली रहा। और तुम्हें क्या-क्या लिखूं सत्य ? अब शायद तुम समझ सकते हो कि मृत्यु की दहलीज में खड़ी मैं, तुमसे अधिक उसे क्यूं याद कर रही हूँ ? क्या शायद इसलिए कि यदि कोई पुरुष किसी स्त्री की कल्पनाओं में होता है तो उसका स्वरूप विराट और स्थाई होता हैं ? यदि ऐसा है, तो फिर जान लो, निश्चित ही वह मेरी कल्पनाओं के सभी बिंदुओं में समाहित था, और आज भी है।
अब तुम्हीं कहो सत्य, कैसे भूल जाऊं मैं कि साजिशन उसे मेरी जिंदगी से दूर कर दिया गया ? काश ! उस शाम तुमने उसके आंसुओं को देखा होता, उसके दर्द को महसूस किया होता ? उसकी ही बात क्यूं करू अपनी भी करती हूँ। मैं न सही तुम तो मुझे अपनी पत्नी मानते थे ? तो फिर तुमने अपनी पत्नी का हाल ही देखा होता ? उस शाम मैं उसकी पीठ से लिपट कर जी भर रोई, उसके कदम पकड़ कर सभी के संभावित गुनाहों की मुआफी मांगी। लेकिन उसने यही कहा, "नहीं पीहू, वो मेरे भी बाबा है..."
जानते हुए भी कि मैं इसके जीवन की पहली लड़की नहीं जिसे उसने चाहा, हा सत्य इतना तो मैं समझ गई थी कि उस लड़की के साथ जिंदगी जीने की उसकी चाहत भले ही पूरी न हुई हो, लेकिन उसके जीवन से वह लड़की कभी गई भी नहीं, फिर भी मैने उससे प्यार किया, ये थी मेरे प्यार की इंतहा। 
इतना मान-सम्मान और एकदूसरे से जुड़ी हर चीज से मोहब्बत करने वाले दो इंसान को देखते ही देखते उनकी जिंदगी से दूर कर दिया गया !! तो फिर मेरी अंतरात्मा कैसे क्षमा कर देती उन लोगों को ? लेकिन मैंने सबको क्षमा किया, तुम्हे भी किया, लेकिन अपने आप को कैसे कर देती ? मैंने खुद को सजा दी, शायद इसलिए कि मैं अच्छी तरह से जानती थी, मेरे ऐसा करने से सभी दोषियों को अपने आप सजा मिल जाएगी। जैसे कि सोने के पिंजड़े में कैद उस बुलबुल ने स्वयं को दी। लेकिन तुम क्या जानो, यह कहानी तो उसने बाबा से कही थी, तुमसे नहीं। कविता के रूप में एक कहानी उसने मुझे भी सुनाई थी, दो सितारों की कहानी। जब मिलो तो तुम भी सुन लेना।
तुमने मुझसे एक रिश्ता चाहा तो तुम्हे दिया, तन और धन से दिया। हो सकता है एक दिन मन से भी देती। हृदय से भी अपना लेती। इसके लिए जरूरी था कि तुम मेरे पास ठहरते, लेकिन तुमसे तो यह भी न हुआ। और एक था जो बिना किसी लालच के बिना मतलब के मेरे पास रुकने के लिए तैयार था। तुलना नहीं कर रही, बता रही हूँ। क्या ऐसे इंसान के साथ तुम्हें छल करना शोभा दिया ? किस गौरव की अनुभूति कर ली तुमने ? जब मैंने उसके पैर छूकर मन ही मन सबके लिए क्षमा मांगी, तो उसमें तुम्हारा नाम भी था। क्योंकि मेरे सिक्स सेंस को अंदाजा हो गया था कि क्या और किसके द्वारा हुआ होगा।
मैंने तो तुम्हें अपना मित्र माना था न ? तुम वह पहले पुरुष थे जिसके साथ मैंने एक ही बिस्तर शेयर किया। पहली बार गले लगी, अपने सारे दुख-दर्द कहे थे। पहले दिन ही कितने विश्वास के साथ एक ही बिस्तर पर मैं तुम्हारे साथ सोई थी। यह बात भी सही है कि पहले मैंने तुम्हें किसी भी रिश्ते से दूर सिर्फ इसलिए रखना चाहा कि मैं कुछ वर्षों या महीनों की मेहमान थी लेकिन प्रमुख वजह यह थी कि मैं पहली नजर के प्यार पर यकीन नहीं करती थी। हम दोनों का मन आपस में न मिल पाया तो उसमें भला उसका क्या दोष ? हम सभी ने मिलकर उसे क्यों सजा दी ? 
यदि कोई भींगी आंखों से, रोते हृदय से, सिसकती आत्मा से, बिना कोई उलाहना दिए, बिना कोई बद्दुआ दिए, चला जाए, तो कहते हैं उसकी आह लगती है। उस आह से ईश्वर को पीड़ा होती है, नियति रूठती है। आह ! जो कलेजा चीर देती है... दिल के टुकड़े-टुकड़े कर देती है। और उस शाम मैंने ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना की थी कि वह आह सिर्फ मुझे लगे। मैं चाहती तो इस पत्र को खुला छोड़ सकती थी। अपने हस्ताक्षर से सील बंद करने की जरूरत ही नहीं थी। क्योंकि इस पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा, जो उसके पत्र में न लिखा हो। जब यह पत्र इसी तरह सील बंद तुम तक पहुंचेगा तब शायद तुम उसकी ईमानदारी और सच्चाई को समझोगे। जो तुम्हारे नाम से लिखे पत्र की चोरी न कर सका, छुप कर पढ़ न सका, तो तुम्हारी कथित पत्नी को तुमसे कैसे चुरा लेता। जो कुछ भी हुआ मेरी सहमति से हुआ।
उस रात तुम मुझे बेहोश उसके पास छोड़कर चले गए थे, यह उसी का उत्तर है। अब तो तुम समझ गए होंगे न कि मुझे उससे प्यार क्यों न होता ? हमारी विचारधारा, हमारी सोच, हमारी रुचि, अभिरुचि ही नहीं हमारा चरित्र भी एक दूसरे से मिलान करता था; और ऐसे व्यक्ति को तुमने कटघरे पर खड़ा किया ? उस दिन तो मैंने समझा था कि शायद मैं जो सोच रही हूँ, गलत भी हो सकता है। यह इच्छा पूर्णत: बाबा की भी हो सकती है, खामोश रह गई। लेकिन जब दो साल बाद मालुम पड़ा कि वह सचमुच तुम्हारे द्वारा प्रेरित थी... तो बहुत अफसोस हुआ। मैं बाबा के सामने शर्मिंदा हुई कि ऐसे इंसान को मैंने अपना मित्र माना ? और बाबा मेरे सामने शर्मिंदा थे कि ऐसे इंसान को उन्होंने मेरे पति के रूप में निर्धारित किया ? तो फिर कैसे अपने अंतर्मन और आत्मा में बसे प्रेम को तुम्हें दे सकती थी ? वो तो मेरे पास बचा ही नहीं था; जिसका था वह अपने साथ ही ले गया। अब सोचो सत्य तुम्हें मिला क्या ? सिर्फ मेरा जिस्म ? 
बावजूद इन सब के भी मैं तुम्हें अंतर्मन से न सही लेकिन अपने इस चंचल मन से वरण करती। उसे नियंत्रित कर अपनी सारी वफाएं देती। तन-मन-धन या फिर मन, वचन और कर्म से भी। लेकिन अंतर्मन से तब भी नहीं, क्योंकि तुम मानो या न मानो मन और अंतर्मन में भेद होता है। 
और तो कोई मेरा रिश्तेदार नहीं और न ही कोई निकटतम सगा संबंधी, सिवाय ध्रुव भैया के। तुम्हारे जाने के बाद एकदिन मैने ध्रुव भैया से फोन में बात की और उनसे ये सब कुछ स्वीकार किया। उसके बारे में भी बताया और यह भी कि अब तुम मेरे पति हो। इसलिए अब उन्हें भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं होगा। जैसी मैं उनके लिए थी, अब वैसे ही तुम होगे। तो अपने ही दिए गए श्राप के मुताबिक अपनी नजरों में मेरी तस्वीर लिए या तो तुम यही भटकते रहो, अब अपना ही किया वादा निभाओ, यह जानते हुए कि मुझे तुमसे कोई मोहब्बत नहीं थी, या फिर यहां से दूर चले जाओ। जियो एक खुशहाल जिंदगी, दूसरी शादी करो, छोड़ दो मेरा मोह। या फिर अपनी दुल्हन को चाहो तो ले आओ इसी घर में रखो, और जियो उसके साथ एक नई जिंदगी। मैं किसी भी रूप में कोई बाधा नहीं पहुंचाऊंगी, तुम्हारा कोई नुकसान नहीं करूंगी। तुम्हारे घर वालों को जो मुझसे चाहिए था वह उन्हें मैंने दे दिया। तो मैं अब तुम सभी से मुक्त हुई न ? अब जो और जितनी भी बची हूँ, उसकी हूँ। एक दिन वह अवश्य आएगा, और मुझे यहां से ले कर चला भी जाएगा। तो फिर तुम्हें मुझसे डरने की कोई जरूरत ही नहीं। यही तो जाते समय मैंने उससे मांगा था।
रिग्रेट यानी पछतावा, यदि कोई है तो सिर्फ इस बात का है, जब मेरे अपने लोगों ने उस पर इल्जाम लगाया, उसे मेरी जिंदगी से दूर करने का फैसला लिया, तो मैंने उसका साथ नहीं दिया। भले ही उसका हाथ पकड़ कर न खड़ी होती लेकिन उसे मेरी जिंदगी से क्यों दूर किया जा रहा है, यह तो पूछ ही सकती थी ? उसे रोकना तो दूर, मैं यह भी न कर पाई !! यह तो कर सकती थी न ? लेकिन नहीं किया।

"उमा क्षमा श्रापहुँ ते भारी।
अपने कर्म जांहि अपकारी।"
यह बात कभी भगवान शिव ने माता सती से कहीं थी। अर्थात किसी को बद्दुआ या दंड देने से अच्छा है, उसे क्षमा कर देना। यही उसने किया। उसने किसी को बद्दुआ नहीं दी, किसी के प्रति अपने मन में कोई दुर्भावना नहीं रखी। किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया और अपनी समस्त चाहतों के साथ हम सभी की जिंदगी से खुद को दूर कर लिया। उसने सारे फैसले नियति पर छोड़ दिए और खुद इसे अपनी किस्मत समझ चुपचाप यहां से चला गया।

 उसकी यादों में मेरा प्रतिपल तड़पना, भटकना, रोना ये नियति का फैसला था। मैंने स्वीकार किया, लेकिन कब तक ? खुद की जान नहीं ले सकती थी, बाबा जो जीवित थे। और उसके बाद भी कैसे ले लेती ? कभी मैंने ही तो उसे बिखरने से बचाया, जीवन जीने की प्रेरणा दी थी, तो उसकी प्रेरणा को झूठा कैसे होने देती।
पागलों की तरह दो महीने भर भटक लेने के बाद अचानक ही मेरे मन में ख्याल आया,  कहते हैं प्रत्येक प्राणी का जन्म निर्धारित समय में कुछ पूर्व-निर्धारित कार्यों को पूर्ण करने के लिए होता है। मैं सोचने लगी आखिर मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है। यही प्रश्न बार-बार दिमाग में उठता। और एक दिन मेरी मुलाकात बगिया में भगीरथ से हुई। मुझे उसकी कही बात याद आई। मुझे एक रास्ता दिखा और मैंने मन ही मन फैसला लिया। बच्चे जो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन साधनों के अभाव में, पढ़ नहीं पा रहे हैं, उन्हें शिक्षित करने में उनकी मदद करना। एक दिन जब उसके साथ मैं उसकी बस्ती में गई। वहां की गरीबी, अशिक्षा, गंदगी देखकर मन में एक और लालसा ने जन्म लिया, उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना। 
मैंने उस दिन नदी घाट के उसी पत्थर पर बैठकर बहुत देर तक सोचा जहां कभी मैं उसके साथ बैठी थी। सच पूछो तो उस दिन जीवन जीने के प्रति मन में लालसा ने जन्म लिया था। जहां मैं सब कुछ भूल गई, यहां तक की अपनी संभावित मृत्यु को भी। मैने भी उसके साथ जिंदगी जीनी चाही थी। उसी पत्थर पर उस दिन मैं भगीरथ के साथ बैठी थी। आज उस बच्चे के चेहरे में जिंदगी जीने के प्रति उत्साह देख रही थी। मेरे सारे प्रश्नों के जवाब मुझे मिल चुके थे। उसी दिन मैं भूल गई कि कभी डॉक्टर ने मेरे पापा से कहा था कि मुझे हार्ड वर्क नहीं करना है, खुद को थकने नहीं देना है।
अचानक मेरे मन में ख्याल आया, मुझे तो ईश्वर ने इच्छा मृत्यु का वरदान दिया है। मृत्यु का साधन तो लेकर मैं खुद ही पैदा हई हूँ !! तभी अपने जीवन काल में कुछ पूर्व-निर्धारित कार्यों को पूर्ण करने का मैने फैसला लिया। अपने आप को परिश्रम की आग में झोंक दिया। बाबा और तुम्हारी सेवा तो करती ही थी; लेकिन अब जीवन का एक लक्ष्य था। मंगल को साथ लेकर मैं अपनी कर्मभूमि में कूद गई। 

जो भी समय मिला उसमें बच्चों को पढ़ाया। गरीब और असहाय लोगों के लिए साधन जुटाने का प्रयास किया। लिखने का अर्थ यह है कि खुद को इतना थका लिया कि आज मेरा हृदय स्वयं त्यागपत्र देने को तैयार है। उसके स्पंदन धीरे-धीरे समाप्ति की कगार में हैं। अब प्रत्येक पल मृत्यु का इंतजार है, उसी तरह जैसा कि कभी उसने हमारे सामने अपनी मृत्यु के लिए कहा था। उसे जो भला-बुरा कहना था, मैने वह लिख दिया और तुमसे जो कहना था वह भी इस पत्र में लिख दिया।
अंत में एक ही बात लिखूंगी, तुम्हे बार-बार विवाह के लिए मना किया और न ही अपने जीवन का कोई सच तुमसे बताया, तुम्हार दिल दुखाया। यदि इस बात के लिए तुम मुझे अपना अपराधी मानते हो, तो यह भी ठीक है, स्वीकार करती हूँ। लेकिन साथ ही साथ
तुम भी निर्धारित कर लो अपने आप के लिए कोई सजा, नहीं तो एक न एक दिन नियति निर्धारित करेगी। इसलिए मन में यह ख्याल आते हुए भी, 'किसका रस्ता देखे... ये दिल ये सौदाई', लेकिन मैं उसका रस्ता देख रही हूँ, और देखती रहूंगी।
इसके आगे अब नहीं लिख सकूंगी, लगातार पूरा दिन लिखती ही तो रही हूँ। फिर इन सब को व्यवस्थित रखना भी तो है ? मृत्यु के कुछ पूर्व ही इंसान बड़ा दयालु और क्षमावान हो जाता है, तो शायद इसलिए मैंने तुम्हें अपने प्रति किए गए किसी भी अपराध और उपेक्षा के लिए क्षमा किया। शायद तुम भी मुझे कर सको ? यदि नहीं तो कोई बात नहीं। यदि कोई पुनर्जन्म होता है तब हमारी बैलेंस-शीट तो बराबर होनी ही है।
इसी आशा के साथ अब तुम्हे अलविदा...
तुम्हारी मृत पत्नी
पीहू !

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