एक पत्र

प्रिय सत्य !
     यदि उसके आने से पहले या उसके पढ़ने से पहले तुम यह पत्र पढ़ रहे हो तो फिर कहती हूँ, एक बार नहीं कई बार पढ़ना और खुले मन और विचारों से पढ़ना, एक सहृदय मित्र और इंसान बनकर पढ़ना, तब निश्चित ही इस पत्र की गहराई को तुम समझ पाओगे

     कभी अपने बॉयफ्रेंड से मैंने कहा था कि काश ! वह मेरी जिंदगी में तुम्हारे आने से पहले आया होता लेकिन ऐसा हुआ नहीं । तो अब तुमसे कहती हूँ कि अच्छा ही हुआ कि फिर तुम मेरी जिंदगी में आए और माध्यम बने उसे मेरी जिंदगी में लाने का। कहते हैं एक दोस्त का सबसे बड़ा फर्ज होता है, अपने दोस्त को खुश रखना, उसकी हर इच्छा को पूरी होते हुए देखना, तो इस नाते तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त रहे जिसने अपना फर्ज अनजाने में ही सही लेकिन ईमानदारी से निभाया। तो फिर आज तुमसे कहती हूँ कि अब तुम मेरे कहने पर उसे दोबारा यहां लेकर आओ और जब तक वह यहां आ न जाए तब तक मेरी इन बुक्स को जहां रखी हैं वही रखे रहेने देना। अब उसे ही निर्णय लेने देना कि इनका क्या करना है। 

     काश ! तुम हमेशा वही सत्य बन कर मेरे पास रहे होते जिसे मैंने पहली बार इस अटारी में पूरे विश्वास के साथ गले लगा कर अपने हृदय के सभी दुख दर्द कहे थे। झूठ नहीं लिखूंगी, बाबा के द्वारा बना देने के बाद भी मैंने तुम्हें किसी भी रिश्ते नाते से दूर रखना चाहा। वजह थी कि मैं अपनी मृत्यु को सामने खड़ा देखती और सोचती पता नहीं कब मेरी ओर चल पड़े ? फिर धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि तुम वो नहीं हो जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी। तो फिर ऐसे में तुम्हें मैं क्या दे सकती थी ? ना तो मेरे पास जिंदगी थी और न ही तुम्हारे प्रति प्रेम... बस एक मित्रता का संबंध था और सच मानो मैंने इसे पूरी ईमानदारी और वफ़ा के साथ निभाया। तुम भी साधारण ढंग से सोचोगे तो मन में आएगा कि मेरे बॉयफ्रेंड में ऐसी कौन सी खूबी थी जो तुम्हारे अंदर नहीं थी ? छोटी-छोटी कविताएं, कहानियां, शायरी कहने वाला एक हमउम्र साधारण शक्ल-सूरत वाला लड़का तुमसे श्रेष्ठ कैसे हो गया कि प्यार की जंग में तुम उससे हार गए। तो वही बात कहती हूँ कि अपनी पसंद की हर इंसान को तलाश होती है। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे मेरे अंतर्मन को तलाश थी, जो मेरी प्यास थी।

      मैं प्रेम की किसी फिलासफी में नहीं जाऊंगी, मैं तुमसे सिर्फ एक साधारण-सी बात कहूंगी। किसी भी रिश्ते को हृदय से निभाने के लिए आपस में विचारों का मिलना जरूरी होता है, तो प्रेम संबंध इससे अछूता कैसे रह सकता है ? मैं स्प्रिचुअल जीवन जी रही थी और तुम मेट्रलिस्टिक। कहने का अर्थ यह है कि हम एक दूसरे के टाइप के थे ही नहीं, जैसा कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड ने कहा था। तुम मासूम थे, दुनियादारी से परे थे और उसे महफिलों का बयफ्रेंड चहिए था, जो उसके साथ पार्टी इंजॉय कर सके, इतने खुले विचारों का कि अपनी महबूबा को किसी दूसरे की बाहों में भी नाचते थिरकते देख सके, जो तुम बन न सके और उसने तुम्हारे साथ ब्रेकअप कर लिया। वैसे वह हर लिहाज से एक अच्छी लड़की, जैसा कि तुमने मुझे स्वयं बताया था। 

      जिस समय तुम मेरी जिंदगी में आए उस समय मेरे जीवन में सिर्फ लिटरेचर का ही प्रभाव नहीं था, बल्कि मेरी संभावित मृत्यु ने मुझे ऐसा बना दिया। मैं भौतिकता से परे होती चली गई। एक ऐसी अध्यात्मिक दुनिया जहां किसी को पा लेने का कोई सपना नहीं किसी को खो देने का कोई डर नहीं। बस बची हुई जिंदगी को अपने मन मुताबिक इंसान के साथ जीना चाहती थी, और तुम ? तुम तो जिंदगी के उसे दौर में थे, जहां इंसान नए-नए सपने संजोता है। सुखद भविष्य की चाह में वर्तमान को परिश्रम की आग में झोंक देता है। उसके मन में किसी को पा लेने की खुशी, रिश्तो में बांध लेने की चाहत प्रबल होती है। अपने जीवन में हर्ष और उल्लास के सभी साधन जुटाना चाहता है। मैं तुम्हारा एक ऐसा ही साधन थी न कि प्यार। मैं किसी भी मोड़ पर तुम्हारा साथ न छोड़ दूं, इसलिए तुम मुझे विवाह-बंधन में बांध लेना चाहते थे। कहो तो झूठ है ? ऐसा इंसान किसी को अपनी सैंपथी तो दे सकता है किंतु काइंडनेस नहीं। लेकिन कहते हैं नियति अर्थात प्रकृति अपना खेल खेलती है। उसने तुम्हारे माध्यम से मेरे सामने एक ऐसे इंसान को लाकर खड़ा कर दिया जिसने पीहू को पीहू से मिला दिया।

     अभी भी तुम कल्पना कर सकते हो तो थोड़ा-सा और कर लो एक व्यक्ति जिसे जिंदगी से कोई मोह नहीं, जीवन जीने के प्रति उदासीन हो चुका था। क्या कर रहा है, कहां जा रहा है, उसे खुद पता नहीं था। भूले-भटके मेरी इस बगिया में आ बैठा। हम दोनों को एक दूसरे से मिलने और बिछड़ने के पूर्व में ही आभास हो चुका था। उसने पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ जब मैं रोई मुझे गले लगा कर वह भी मेरे साथ रोया, और जब वह दुखी हुआ तो ठीक यही मैंने भी किया। क्यों ? शायद इसलिए की हम दोनों ही जीवन और मृत्यु को निकट से महसूस कर चुके थे। किसी को प्राप्त कर लेने या खो देने की चाहत से दूर हम एक साथ जिंदगी को जीना चाहते थे। और प्रेम उसी से होता है न जिसके साथ हम जिंदगी को जीना चाहते हैं न कि गुजरना। मैं भी उसके साथ जिंदगी जीने के लिए किसी भी हद को पार काने के लिए तैयार थी, लेकिन ? तुमने तो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उसे बाबा के सामने खड़ा कर दिया ? इतना ही नहीं अपने परिवार के लालच और अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मुझे विवाह के लिए तैयार करना चाहा। तुमसे अधिक तो वो चाहते थे कि तुम मुझी से विवाह करो। नहीं तो भला मेरी आंखों में प्रतिपल उसकी तस्वीर, इंगेजमेंट फिंगर में उसके नाम से पहनी अंगूठी, उसकी टीशर्ट को देख कर भी भला कौन स्वाभिमानी पुरुष मुझसे ही विवाह करना चाहता ? लेकिन तुमने चाहा, क्यों ? 

      क्या सिर्फ इसकी एकमात्र वजह मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम था ? इल्जाम नहीं लग रही बल्कि जो देखा, जैसा महसूस किया, उसे ही लिख रही हूँ। तुम्हारे सभी फैमिली मेंबर्स से मिलने के बाद बहुत दिनों तक मैने सोचा, तब इस निष्कर्ष में पहुंच पाई। उन्हें मेरे ज्ञान, मेरे स्वभाव, मेरी रुचि से कोई मतलब नहीं था। हां मेरी सुंदरता की खूब तारीफ करते। शायद उन्होंने मुझे और लड़कियों की तरह ही समझ लिया था जो अपने रूप सुंदरता की तारीफ सुन फूल के कुप्पा हो जाती हैं, और उसी एहसान के बोझ के तले दबे सब कुछ स्वीकार करती चली जाती हैं।उन्होंने जब भी मुझसे पूछा तो यही पूछा कि मेरे बाबा के पास संपत्ति कितनी है, रुपए पैसे कतने हैं और उनके न रहने पर इसका मालिकाना हक कितने लोगों के बीच विभाजित होगा। हो सकता है, तुम इनसे परे रहे हो, लेकिन बार-बार यह कहना कि या तो तुम पीहू से शादी करो या फिर रिश्तो के लिए आए संबंधों में से किसी को स्वीकार करो, उनकी बातों को झूठा नहीं साबित करता था ? जिनकी बातें झूठी थी वे इंसान कितने सच्चे रहे होंगे, बताओ तो जरा मुझे ? 

    फिर मेरी जिंदगी में एक ऐसा लड़का आया जिसके पास मुझसे कम कुछ भी न था, लेकिन वह सब कुछ छोड़ कर मेरे पास रुकना चाहता था, ठहरना चाहता था, मेरे साथ जिंदगी जीना चाहता था, बिना किस रिश्ते नाते के। याद करो, कभी तुमने ही मेरे और ज्ञान भईया के सामने उससे यहीं रुकने के लिए कहा था न ? तो फिर उसके साथ बगिया से घर पहुंचने के बीच ऐसा क्या महसूस कर लिया कि तुम्हारा इरादा बदल गया ? हमें कुछ देर हो गई और तुम डर गए ? तो फिर यदि कहीं वह रुक जाता तो कितने दिनों तक उसे तुम मेरे नजदीक सहन कर पाते ? तुम अच्छी तरह से जानते थे कि बाबा तुम्हे पसंद करते है और मैं उनकी मर्जी के खिलाफ कभी नहीं जाऊंगी, तो तुमने उनका सहारा लिया ? उसका त्याग देखो, मुझसे लाख मोहब्बत सही लेकिन वह मुझे किसी भी दुविधा में नहीं डालना चाहता था। उस दिन बाबा ने उससे क्या कहा उसने मुझसे कुछ नहीं बताया। मरने के पूर्व बाबा ने एक-एक बात मुझ से बताई थी, तब मैं भी जान पाई, पहले तो केवल अनुमान ही लगाया था।

     तुमने साजिशन उसे भी मेरी जिंदगी से दूर कर दिया जो मेरी खुशी चाहता था ? काश ! उस शाम तुमने उसके आंसुओं को देखा होता, उसके दर्द को महसूस किया होता ? उसकी ही बात क्यूं करूं अपनी भी करती हूँ। मैं न सही तुम तो मुझसे अपनी पत्नी मानते थे ? तो फिर तुमने अपनी पत्नी का हाल भी देखा होता ? उस शाम मैं उसकी पीठ से लिपट कर जी भर रोई, उसके कदम पकड़ कर सभी के गुनाहों की मुआफी मांगी। लेकिन उसने यही कहा, "नहीं पीहू, वो मेरे भी बाबा है...", ये थी उसके प्यार की इंतहा, और मेरी ? जानते हुए भी कि मैं इसके जीवन की पहली लड़की नहीं जिसे उसने चाहा, फिर भी मैने उससे प्यार किया, ये थी मेरे प्यार की इंतहा।

      इतना मान सम्मान और मुझसे जुड़ी हर चीज से  मोहब्बत करने वाले इंसान को देखते ही देखते मेरी जिंदगी से दूर कर दिया गया !! तो फिर मेरी अंतरात्मा कैसे क्षमा कर देती उन लोगों को ? लेकिन मैंने सबको क्षमा किया, तुम्हे भी किया, लेकिन अपने आप को कैसे कर देती ? मैं खुद को सजा दी क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानती थी कि मेरे ऐसा करने से सभी दोषियों को अपने आप सजा मिल जाएगी। तुमने एक रिश्ता चाहा तो तुम्हे दिया, तन, मन और धन से दिया। लेकिन अपने अंतर्मन और आत्मा में बसे प्रेम को तुम्हें कभी न दे सकी, वो तो तुम्हारे लिए कभी था ही नहीं, जिसके लिए था, वो तो अपने साथ ही ले गया। 

      और तो कोई मेरा रिश्तेदार नहीं और न कोई निकटतम सगा संबंधी है, सिवाय ध्रुव भैया के। तुम्हारे जाने के बाद एकदिन मैने ध्रुव भैया से फोन में बात की और उनसे स्वीकार किया तुम मेरे पति हो, इसलिए अब उन्हें भी कोई ऑब्जेक्शन नहीं होगा। जैसी मैं उनके लिए थी, अब वैसे ही तुम होगे। तो अपने ही दिए गए श्राप के मुताबिक अपनी नजरों में मेरी तस्वीर लिए तुम यही भटकते रहो, अब अपना ही किया वादा निभाओ, यह जानते हुए कि मुझे तुमसे कोई प्रेम नहीं था। शायद यही नियत ने तुम्हारे लिए सजा मंजूर की है। स्वीकार कर लो या फिर यहां से दूर चले जाओ। जियो एक खुशहाल जिंदगी, दूसरी शादी करो, छोड़ दो मेरा मोह। अपनी दुल्हन को चाहो तो ले आओ इसी घर में रखो और जियो उसके साथ एक नई जिंदगी। मैं किसी भी रूप में कोई बाधा नहीं पहुंचाऊंगी, तुम्हारा कोई नुकसान नहीं करूंगी। तुम्हारे घर वालों को जो मुझ से चाहिए था वह उन्हें मैंने दे दिया। तो मैं अब तुम सभी से मुक्त हुई न ? अब जो भी बची हूँ, उसकी हूँ। एक न एक दिन वो आयेगा और मुझे अपने साथ ले जाएगा।
अलविदा !!
तुम्हारी मृत पत्नी
पीहू !

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