मैं तेरे गांव की छोरी हूं

मैं तेरे गांव की छोरी हूं,
 तू मेरे गांव का बूढ़ा है।
पकड़ के चूहा लटका दूंगी 
जो तू मुझको छेड़ा है।

आना-जाना दुश्वार किया,
तूने ऐसा व्यवहार किया,
मोहन को भी बदनाम किया,
मुरलीवाला भी अब सोचेगा,
राधा को क्यों बदनाम किया?
मैं तेरी मार की मारी हूं,
तू मेरे प्यार का मारा है।
मैं तेरे गांव की छोरी हूं,
तू मेरे गांव का बुढ़ा है।

तू मरण-सेज पर लेटा है,
मैं प्रिय-सेज पर लेटी हूं,
इतना भी ज्ञान न आता है?
यूं तो तू बदमाश बहुत है,
मैं भी कुछ कम चालाक नहीं,
तू मुझको जिस रस्ते घेरा है,
मैं दूजे से फिर आती हूं।
मैं तेरे गांव की छोरी हूं,
तू मेरे गांव का बुढ़ा है।
पकड़ के चूहा लटका दूंगी,
जो तू मुझको छोड़ा है।

कान पकड़कर बैठक करवा लूंगी,
सरे आम पब्लिक से पिटवा दूंगी,
या फिर,
गांव के पागल कुत्तों को,
 तेरे पीछे दौड़ा दूंगी।
तुझको! तेरे ही घर में बंधवा दूंगी,
या फिर,
थाने के बैरक में डलवा दूंगी।
अबकी जो तू मुझको छेड़ा है?
मैं तेरे गांव की छोरी हूं,
तू मेरे गांव का बुढ़ा है।

क्यों करता बदनाम मुझे?
हाथ फेर सर पे, दे आशीष मुझे,
बचपन में मेरे गाल को चूमा है।
अब क्यों डर लगता है,
मुझको तेरी नादां बदमाशी से?
तू भी तो बचपन में, 
मेरे साथ का खेला है ?
बनकर जब काठ का घोड़ा,
तू भी तो टिक-टिक दौड़ा है?
मैं तेरे गांव की छोरी हूं,
तू मेरे गांव का बूढ़ा है।
पकड़ के चूहा लटका दूंगी,
जो तू मुझ को छेड़ा है।।

Shailendra S.

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