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तुम कहां गए - 17

  अच्छा ही हुआ कि तुम चले गए।       जब कोई इंसान अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण, अर्थपूर्ण, वैभवयुक्त क्षणों को जी रहा हो तो उसके इस नितांत एकांत के क्षणों में प्रतिरोध नहीं उत्पन्न करना चाहिए। ऐसा करने पर दोष लगता है, और स्वयं में भी अपराध बोध का एहसास होता है।      जिन पलों में तुमने मुझे छोड़ा तो मैं अपने जीवन के सार्थक, समर्पित, अर्थपूर्ण और वैभव युक्त जीवन को ही तो जी रही थी ! तब तुमने स्वयं को मुझसे दूर ही रखना उचित समझा और शायद यह दूसरी वजह रही होगी तुम्हारे चले जाने की, इसलिए तुम चले भी गए।       जानती हूं, तुम ऐसे नहीं थे कि स्वयं अपने आप को दोषी सिद्ध करते या किसी अपराध बोध से ग्रसित हो मुझसे नजरें झुका लेते। जिंदगी को आनंदपूर्वक गुजार लेने की चाह किसमें नहीं होती ? कौन है जो जिंदगी के कष्टों को भोगना चाहता है ? कौन है जो अपने मन मंदिर में एक तस्वीर लिए वेदना को ही अपना जीवन साथी बना लेता है ?     हां तुम ही बताओ ? ऐसा कौन सा व्यक्ति है जो सरलता का परित्याग कर दुर्गम रास्तों का चयन करता है ? शायद तुम्ही थे ! ! कौन जाने ? ...

तुम कहां गए - 16

      अविश्वास, अटूट विश्वास की प्रथम सीढ़ी होती है। अर्थात किसी पर भी किया गया अविश्वास जब विश्वास में परिवर्तित होता है तो वह अटूट हो जाता है।       अब हम कह सकते हैं कि एक अटूट विश्वास का जन्म एक अविश्वास से होता है। चाहे वह अविश्वास क्षण मात्र के लिए ही क्यों न हो।    मानवीय संवेदना से परे यदि कोई दुनिया होती है, तो वह दुनिया देवताओं की दुनिया है। उद्गम और उच्छृंखल लहरों का आवेग मन में उठे तूफान का प्रतिरूप ही होता है।    तो क्या राम का सीता के वियोग में यूं भटकना उनकी खोज करते हुए पुष्प लताओं, वाटिकाओं, वृक्ष कुंजों, पर्वत श्रृंखलाओं से बार - बार ये पूछना, - तुम देखी सीता मृगनयनी !      एक दूसरे की विरह वेदना में राधा और कृष्ण का संपूर्ण जीवन व्यतीत हो जाना, सामाजिक स्वीकार्यता के बावजूद एक दूसरे से दूर रहना, निरर्थक था ?     अपने जिस विराट रूप को प्राप्त करने के लिए कृष्ण कर्म योगी बने, उससे भी विराट स्वरूप राधा ने सिर्फ कृष्ण से प्रेम करके प्राप्त किया, और कृष्ण से एक पायदान ऊपर ही रहीं। राधे-कृष्ण कहलाई।...

तुम कहां गए - 15

  लेकिन यह भी मानू तो कैसे मानलू ? यदि इस दुनिया में तुम न होते तो मेरे मन में खामोशी होनी चाहिए, स्थिरता होनी चाहिए, शांति होनी चाहिए ? पर ऐसा क्यों नहीं है ?      मैं जानती हूं दो बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा, अनंत बिंदुओं से होकर गुजरती है. चाहे वह बिंदु कितने ही पास पास ही क्यों न हो।     अनंत, अनकाउंटेबल। वे तथ्य जो अपरिभाषित हैं। जिसकी, कोई परिभाषा ही न हो। उस अपरिभाषित तक पहुंचने के लिए तुमने भी न जाने कितने अनंत बिंदुओं को पार किया होगा ! मुझसे उपेक्षित होना यदि तुम्हारी नियति थी, तो मेरा यूं खामोश रहना मेरी नियति थी, मेरे दोस्त।        तुम्हारे नि:स्वार्थ सच्चे मन में उपजे प्रेम की परख कर के भी, मेरा यूं खामोश रहना, बेवजह तो न था ?  नि:संदेह मैंने तुम्हें भी और-सा ही समझा था। जिनके लिए प्रेम एक मनोरंजन, एकतरफा विश्वास होता है। जबकि तुम्हारे सभी विश्वासों की आधारशिला तो तुम्हारा मुझ पर अटूट विश्वास ही रहा था।  तुम तो मेरे विश्वास के साथ चलते रहे और मैंने खामोशी से तुम्हारे उसी विश्वास को तोड़ा था।     मेरा...

तुम कहां गए - 14

 अपनी सभी समस्याओं, सारी मजबूरियों को दरानिकार कर तुम्हारे प्रति यदि कोई जवाबदेही तय भी करती, तो तुम ही बताओ वह क्या होती ?       मान्यताएं टूटती हैं, अवधारणाएं बदलती हैं, किंतु किसके लिए ? किसी को जवाबदेही तो तय करनी होती है, उठानी भी पड़ेगी है।  यदि वह व्यक्ति ही न हो तो यह सब किसके लिए और क्यों ? तब सब कुछ व्यर्थ नहीं लगता ? माया - मोह का निरर्थक प्रपंच ?           तुम जहां भी हो, निष्कर्ष तो तुम्हे ही निकालने होंगे। जब तुम मेरी जिंदगी में कभी शामिल हो ही नहीं सकते थे, तो मैं तुमसे क्योंकर कोई संबंध रखती ?         यदि हमारे कर्मों के द्वारा पाप - पुण्य का निर्धारण होना होता तो बात कुछ और होती, लेकिन यहां तो विपरीत था। पाप पुण्य की परिभाषा से हमारे कर्म निर्धारित होने थे । जब मान्यताएं और अवधारणाएं दोनों के मापदंड पहले से ही तय हो चुके हो तो उसके बाद ? क्या शेष राह जाता है ?  उनके अधीन रहकर हम क्या पा लेते, यहां तो सिर्फ खोना ही होता।    माना कि कुछ पा लेने और कुछ खो जाने के डर से जीवन ...

तुम कहां गए - 13

   कालिदास के मेघदूत के यक्ष की तरह श्रापित अभिशप्त जीवन जीने का श्राप तो तुम मुझसे ले ही चुके, वह भी बिना किसी सवाल - जवाब के। यह मेरे अंतर्मन से निकली एक चित्कार है, जो तुम्हारे अंतर्मन तक अवश्य पहुंचेगी।      ओह ! ये मुझसे क्या हो गया, मैं तो ऐसी ही न थी। चलो जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ। अब यही मान लेती हूं, शायद यही तुम्हारी नियति थी, और आज भी है।    ऐसा नहीं है कि मैं बहुत दुखी हूं या तुमसे मैं बहुत ही क्रोधित हूं, जो मैने तुम्हें यह अभिशप्त जीवन जीने का श्राप दिया। कहीं कुछ ऐसा है, जो पहले घटित हुआ होगा, और जिसका परिणाम मेरी यह चित्कार है।     भरी महफिल तुम्हे तन्हा देखा कई बार खुद मेरे साथ होते हुए भी कहीं और खोया हुआ-सा पाया। तब मन होता कि पूछू , तुम किस दुनिया में रहते हो ? और बताओ तो, कौन सी दुनिया से आए हो?       जब मेरे पास आकर भी तुम्हारा मन स्थिर नहीं होता है, तो तुम मेरे पास आते ही क्यों हो ? हमेशा कहीं और जाने के लिए तैयार । मैं खुद को जब भी  तुम्हारी आंखों में देखती, सहम सी जाती। मुझे दिखाई देता...

तुम कहां गए - 12

    मेरे जीवन की सभी मान्यताएं, सभी अवधारणाएं जिस मजबूत सिद्धांत पर टिकी थी वह आधारशिला अब कहां गई ! हां तुम ही बताओ कहां गईं ?      जिन सिद्धांतों की आधारशिला में मैंने अपना जीवन टिकाया, उसे मजबूती दी, मुझे विश्वास था कि वे अडिग है। ये सिद्धांत सार्वभौमिक है, इन सिद्धांतों का कोई तोड़ नहीं,  इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। तो फिर आज क्यों ये सभी सार्वभौमिक सिद्धांत जिनका कि कोई अपवाद न था, मेरे लिए मिथ्या साबित हुए। यह सब क्या है, मेरे दोस्त ?       यह मेरे मन की दुर्बलता है या कि उन लहरों की प्रबलता, जो मेरे अंतर्मन से उठती हैं, और जिन्हें मैं तुम्हारी ही तरफ मोड़ देती हूं। फिर वही लहरें तुमसे टकरा कर वापस कई-कई गुनी शक्ति और वेग से, मुझसे ही आ टकराती हैं, और मेरे इन सिद्धांतों को तार-तार कर देती है ?     मेरी जीवन शैली देखकर, यदि तुम यह समझते थे कि, मेरा मन स्थिर है, शांत है और जिसमें तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है, तो तुम सच समझते थे। तुम गलत नहीं थे मेरे दोस्त।       सुनकर आश्चर्य हो रहा है न ! तो सुनो मेरे दो...

तुम कहां गए - 11

  तो फिर आज क्यों उद्गम और उच्चश्रंखल आकांक्षाओं के दीप मेरे अंतर्मन में तुम्हारे लिए प्रज्वलित हो रहे हैं ? यदि तुम्हारा मिलन और फिर तुम्हारा बिछड़ना नियति थी, महज एक संयोग था तो फिर आज क्यों मेरा मन उन्हीं पलों को जी लेना चाहता है ?  मुझे ऐसा क्यों महसूस होता है कि मेरे जीवन की वह अदम्य प्यास तुम्हारी उसी मृगतृष्णा के आडंबर से ही बुझेगी ? कभी लगता था कि यदि पल भर के लिए मेरा मन विचलित हुआ तो संपूर्ण सृष्टि हिल जाएगी, ऐसा लगता था कि इस धरती में न जाने कितने भूकंप आ जाएंगे ?  तो फिर आज क्यों जब मैं तुम्हें पुकारती हूं - हां तुम कहां गए ! तो यह संपूर्ण  सृष्टि उसी तरह शांत निर्विकार भाव से मुझे अपलक देख रही है, मेरे मन में उठे तूफान से कोई धरती क्यों नहीं हिलती ? क्यों सभी कुछ अपनी जगह पर स्थिर और शांत हैं ?   मैं क्यों अपने उन्हीं तैतीस करोड़ देवी देवताओं के साथ रहते हुए भी खुद को अकेला पाती हूं ? मेरे मन में उठने वाली लहरें तुम तक क्यों नहीं पहुंच पाती ?  क्यूं ? क्यूं ?? क्यूं ??? जिन्हें मैं कभी यथार्थ मानती थी तो फिर आज क्यों वे सभी अर्थात मुझे छदम प्रत...