तुम कहां गए ? 25
संबंधों की इतनी घनिष्ठता के बाद रिश्तो का इतना प्लेटोनिक हो जाना गले नहीं उतरा था, बेवजह की बकबक करते हुए तुम्हारा एकदम से यूं खामोश हो जना मुझे अखरने लगा था, मेरे दोस्त। तभी तो तुम्हे सताने के लिए, तुम्हे ये एहसास दिनाने के लिए कि हां तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते, कोई महत्व नहीं रखते, मैंने भी तुम्हे दुगने भाव से उपेक्षित किया। जबकि वास्तविकता यही थी कि तुम सदैव ही मेरे अंदर ही रहे। तुम्हारी पावन प्रांजल देवमूर्ति को मैं खुद से कभी अलग और विस्थापित नहीं कर पाई। तुम मेरे जीवन के वह सूर्य हो जिससे निकली रश्मि किरणें जलकण से विछिन्न होकर सप्तरंगी और अद्भुत आकृत का निर्माण करती हैं, और वह इंद्रधनुष धरती के एक छोर को दूसरे छोर से मिलाता हुआ प्रतीत होता है। तुम मुझसे जब भी टकराते थे, तो यही होता था मेरे दोस्त। मैं अपने अस्तित्व के एक छोर से दूसरे छोर पर आ मिलती थी। तुम्हारी दृष्टि ही नहीं बल्कि तुम्हारे दृष्टिकोण में भी अपनी विशिष्टता पर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती। यदि तुम पर अपना अविश्वास ज...