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Showing posts from July, 2021

तुम कहां गए ? 25

     संबंधों की इतनी घनिष्ठता के बाद रिश्तो का इतना प्लेटोनिक हो जाना गले नहीं उतरा था, बेवजह की बकबक करते हुए तुम्हारा एकदम से यूं खामोश हो जना मुझे अखरने लगा था, मेरे दोस्त।    तभी तो तुम्हे सताने के लिए, तुम्हे ये एहसास दिनाने के लिए कि हां तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते, कोई महत्व नहीं रखते, मैंने भी तुम्हे दुगने भाव से उपेक्षित किया। जबकि वास्तविकता यही थी कि तुम सदैव ही मेरे अंदर ही रहे।     तुम्हारी पावन प्रांजल देवमूर्ति को मैं खुद से कभी अलग और विस्थापित नहीं कर पाई।      तुम मेरे जीवन के वह सूर्य हो जिससे निकली रश्मि किरणें जलकण से विछिन्न होकर सप्तरंगी और अद्भुत आकृत का निर्माण करती हैं, और वह इंद्रधनुष धरती के एक छोर को दूसरे छोर से मिलाता हुआ प्रतीत होता है। तुम मुझसे जब भी टकराते थे, तो यही होता था मेरे दोस्त। मैं अपने अस्तित्व के एक छोर से दूसरे छोर पर आ मिलती थी।      तुम्हारी दृष्टि ही नहीं बल्कि तुम्हारे दृष्टिकोण में भी अपनी विशिष्टता पर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती। यदि तुम पर अपना अविश्वास ज...

तुम कहां गए 24

अश्कों से भरी इन आंखों में, तेरी तस्वीर छुपा रखी है,  मिट ना जाए तू कहीं मेरी यादों से, अश्कों की दीवार बना रखी है। तुम्हें पा लेने की चाहत,  और खो देने का डर,  अपने जीवन में  यही एक,  इबारत लिखा रखी है। अब किसे रखूं मैं अपनी यादों में !! सारी यादें तेरे नाम लिखा रखी हैं। मेरी चाहत की अब ये इंतहा है, अब भी जो तू रूठा रहा तो, तेरी कब्र भी इस दिल में बना रखी है।      जानती हूं भावुकता और जज्बातों के अधीन रहते हुए जिंदगी में लिए गए निर्णय उतने सही नहीं होते हैं जितने कि हम चाहते हैं।        यदि कहूं कि मैं तुम्हें बेहद प्रेम करती हूं, तो इस में यह बात भी अंतर्निहित है कि कभी मैं तुम्हें बेहद प्यार नहीं करती थी।      यदि कहूं कि आज मैं सच कह रही हूं तो इसका एक अर्थ यह भी है कि मैंने कभी तुमसे झूठ भी कहा था। अर्थात प्रत्येक स्वविकार्य तथ्य का एक विरोधाभासी अस्वाविकार्य तथ्य पहले से मौजूद होता है।     कुछ होने या न होने के बीच का अंतर व्यापक होता है। यदि यह कहूं कि मैंने सदैव ही तुम्हें प्रेम किया है तब भी एक...

तुम कहां गए 23

    कभी सोचती हूं, तुम्हें सजा-ए-मौत लिखकर अपनी कलम तोड़ दूं।      मैं भी तुम्हें खारिज कर दूं अपनी जिंदगी से। लेकिन अगले ही पल सोचती हूं, यदि ऐसा कर दिया, तो ये सारे उलाहने, अपने दिल के सारे दर्द फिर किससे कहूंगी? किसे लिखूंगी?       मैं यह भी जानती हूं कि तुम मेरे द्वारा निर्धारित कोई भी सजा सहर्ष स्वीकार कर लोगे। तुम कहीं भी रहो मेरी बात तुम तक अवश्य पहुंचेगी, और तुम ? बड़े ही खामोशी के साथ बिना कोई सफाई दिए, वह सजा सहजता से स्वीकार कर लोगे।    वर्जनाएं आकर्षित करती हैं। सहजता और सरलता से प्राप्त कोई भी वस्तु या व्यक्ति कभी आकर्षित नहीं करता। वह दर्शनीय तो हो सकता है, किंतु आकर्षक नहीं।         यदि तुम चीखों, चिल्लाओ उत्पाद मचाओ, अपनी सफाई पेश करो, तो मैं अवश्य ही तुम्हें सजा-ए-मौत तक दे सकती हूं। लेकिन तुम्हारे लिए सहजता से स्वीकार कोई भी सजा मुझे स्वविकार्य नहीं।        तुम जहां भी रहो सुखी रहो, खुश रहो, ऐसी दुआएं मैं कभी भी नहीं मांग सकती। मैंने तुम्हारे लिए जो सजा निर्धारित की है वही सह...

तुम कहा गए 22

   जिंदगी को जी लेना और गुजार लेना दोनों में फर्क होता है, मेरे दोस्त !        सशर्त जिंदगी गुजारी तो जा सकती हैं, जी नहीं जा सकती! जिंदगी जी लेने के लिए यह आवश्यक है कि वह सभी बंधनों और शर्तों से मुक्त हो। किसी के होने या न होने को समय से नहीं मापा जा सकता।      समय तो वह यूनिट है जिससे घटनाओं की अवधि या जिसे हम अब समयावधि कह सकते हैं को व्यक्त करना है। शायद इसीलिए ही तुम भी कहते थे कि इस दुनिया में समय नाम की कोई चीज नहीं होती। अब देखो तो मैं तुम्हारी ही भाषा बोलने लगी हूं !      आश्चर्य किंतु इस निर्धारित सत्य जिससे होकर गुजरना ही था। जिस समयावधि के लिए तुम मेरी जिंदगी में निर्धारित थे, वह गुजर चुका है। अब इसलिए मेरे लिए यह समय भी किसी काम का नहीं।       यदि हम जिंदगी अपने तरीके से नहीं जी सके, उसे शर्तों के बंधनों में बांधकर रखा तो अब पछताना कैसा ? यह तो हमारे ही द्वारा स्वीकार किया गया निर्धारित सत्य था।     काश, हम यह कर पाते, काश कि हम यह कह पाते, कि काश ऐसा हुआ होता, कि काश ऐसा न हुआ ह...

तुम कहां गए 21

   स्वयं पर मोहित होना अज्ञानता की पराकाष्ठा है।      पंच तत्वों से बने स्थूल शरीर की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आश्चर्यजनक किंतु सत्य है कि मानव के सूक्ष्म शरीर के निर्माण में सम्मिलित 18 तत्त्वों में सभी प्रकार की इंद्रियां, काम, क्रोध, मद, लोभ इत्यादि जैसे तत्व भी सम्मिलित हैं।     स्थूल और सूक्ष्म शरीर की उत्पत्ति का एकमात्र कारण जीव और उसकी आत्मा में पारस्परिक संतुलन है, जो प्राकृतिक है।        इसलिए इसे सभी शरीरों का कारण भी कहते हैं।  शरीर की परिभाषा इतनी सरल कहां कि हम उसे सही-सही समझ सके, मेरे दोस्त।        24 तत्व से बने स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर यानी प्राकृतिक शरीर। अब जरा मेरी लिखी बात पर ध्यान पूर्वक विचार करो -    "जिसे देखकर मन में उठी तरंगे, आपके शरीर को हिला कर रख दे " -      क्या अब भी कहोगे कि मैं भौतिकता से परे नहीं सोचती हूं ? मैं विश्वास करती हूं, कि प्रत्येक वैराग में राग स्वत: ही समाहित है। इसके बगैर वैराग्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती।    ...

तुम कहां गए 20

   तुम मेरी आह से निकले वो आंसू हो, जिन्हें मैंने कभी पलकों में भी न आने दिया। डर था पलकों में आए तो कहीं यादें न धुंधली हो जाए। पलकों से लुढ़के तो कहीं मेरे जीवन से जुड़ा तुम्हारा अस्तित्व ही न बह जाएं। बेशकीमती अश्क कही जाया न हो जाए, उनमें तुम जो ठहरे हुए से हो।    प्रेम के विस्तार में ब्रह्मांड की अविनाशी, अनंत शक्तियां अंतर्निहित है। और शायद इसीलिए प्रेम की सीमाओं का विस्तार भी अनंत से कहीं अधिक है।      हम प्रेम पर अविश्वास तो जाता सकते है, लेकिन उसके वजूद को झुठला नहीं सकते। जिस तरह की हम शरीर के अस्तित्व को नश्वर मान सकते हैं, किंतु आत्मा रूपी उर्जा को नहीं। जो रिश्तो में सिमट जाए, जो बंधनों में बंध जाए जो स्थूल से सूक्ष्म होने पर अपने अस्तित्व को गवां दे, वह प्रेम कैसा? यह तो उसके होने का भ्रम मात्र है.      प्रेम को मैं दो जवां दिलों के बीच की धरोहर या बपौती नहीं मानती मेरे दोस्त। प्रेम तो वह भावना है जो एक सबल द्वारा एक निर्बल को सहारा देकर, छोटे से बच्चे को दुलार देकर, बड़े बुजुर्गों को सम्मान देकर, रोते को हंसा कर, अपने प्रि...

तुम कहां गए - 19

     शून्य आयाम से लेकर अनंत आयाम तक की दुनिया ही हमारी दुनिया होती है। जिसमें किसी के होने का या न होने का एहसास होता है।     शून्य अर्थात कुछ भी नहीं और अनंत अर्थात अनकाउंटेबल अनडिफाइंड। कुछ नहीं और सब कुछ के बीच ही कुछ होता है।     इसलिए लिखती हूं कि सब कुछ सदैव के लिए नहीं रहता, और न ही सदैव के लिए होता ही है। एक न एक दिन चाहे वह अनंत ही क्यों न हो अपरिभाषित ही क्यों न हो, सब कुछ नष्ट होना ही है। एक दिन सारे ब्रह्मांड, सारी सृष्टिया नष्ट होगी। और केवल बचेगा शून्य अर्थात कुछ नहीं।      स्मृतियां भी सदैव के लिए साथ नहीं रहती। ब्रेन डेड एवरी थिंग्स डेड।      इसलिए मैं तुमसे कोई वादा नहीं करती, और न ही कर सकती हूं। सदैव तुम्हें याद रखूंगी ऐसा कोई वादा हो ही नहीं सकता। लेकिन हां, जब तक यह ब्रेन डेड नहीं होता और मेरी स्मृतियां रहेंगी, तब तक तुम मेरी स्मृतियों में जिंदा रहोगे, भले ही चाहे तुम भौतिक रूप से कहीं भी किसी भी स्थान पर मर ही क्यों न जाओ।      तुम्हारी दुनिया में आत्मा होगी सब कुछ। लेकिन मेरी दुन...

तुम कहां गए - 18

    शब्दों का सर्वोत्तम क्रम वाक्य नहीं विजन होता है मेरे दोस्त!    एक प्रश्न, जब एक पुकार बन जाए, तो वह पुकार मन की सारी व्यथा कह देता है। अंतर्मन की सारी अभिव्यक्ति, जिज्ञासा, देख लेने की चाहत, कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा, झुंझलाहट, खीझ, सभी कुछ तो समाहित होता है उस पुकार में।      जैसे कोई प्रिय वस्तु खो जाए, और हम उसे ढूंढते रहे, तो उस तलाश में मन के सारे भावों की अभिव्यक्ति दृश्य होती है ।    मेरे अंतर्मन में एक प्रश्न जागा - तुम कहां गए ? इस एक प्रश्न में तुम्हें पुनः देख लेने की चाहत, जिज्ञासा और कुछ पा लेने की अभिलाषा जागृत होने लगी।       और जब प्रत्युत्तर में तुम सामने न आए तो मन की सारी झुंझलाहट, समाहित होकर एक उलाहना बन गई - कहां गए तुम ? शब्द वही रहे किंतु उनका क्रम बदल गया।        जब इस प्रश्न से मन की सारी  हलचल और अशांति समाप्त हो गई तब यही प्रश्न एक पुकार बन गया, तुम कहा गए ...      इस पुकार में जो व्यग्रता थी, मन में हलचल थी, जब सब कुछ शांत हो गया, मन की सारी झुंझलाहट दू...