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Showing posts from October, 2021

गॉडफादर - 1

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            जब दरख़्त के साए उनके कद से लंबे हो चले ठीक तभी एक यात्री विमान चील की मानिंद रनवे की तरफ झपटा। लगभग चंद मिनटों बाद है दो अधेड़ व्यक्ति एयरपोर्ट से बाहर निकले और पार्किंग में खड़ी लग्जरी कार की तरफ बढ़े। उनमें से एक व्यक्ति समकालीन लेखक और दूसरा धनाढ्य, दोनों में गहरी मित्रता, जो स्कूल के जमाने से चली आ रही थी। उन्होंने एक दूसरे को नाम भी दे रखा था राइटर और वेल्दीमैन।           कुछ देर बाद कार शहर की भीड़भाड़ को चीरती हुई हाईवे पर दौड़ने लगी। खामोशी के एक लंबे अंतराल के बाद वेल्दीमैन ने कुछ दार्शनिक अंदाज में पूछा , " राइटर ! अपनों से दूर एक अजनबी शहर में, .... पराए लोगों के बीच मरना कितना तकलीफदेह होता है ...... तुमने कभी एहसास किया है ?"    हूं ......  राइटर ने सहमति से अपना सर कई बार हिलाया। फिर ओठों के बीच सिगरेट दबा तल्लीनता से लाइटर जलाने में व्यस्त हो गया।        " राइटर ! मुझसे न पूछोगे ? " ,     राइटर ने गहरी दृष्टि से वेल्थीमैन की तरफ देखा फिर हौले स...

आशाओं के दीप - 2

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      आशा के मुताबिक उसमें कोई पत्र नहीं था। उसमें कागज का एक छोटा सा टुकड़ा था और उसके नाम से एक डिमांड ड्राफ्ट। हिसाब के टुकड़े में मूलधन प्लस ब्याज मिलाकर जितना टोटल होता था, वह रकम डिमांड ड्राफ्ट में लिखी थी।     " ओह ! कितना शातिर और बदमाश निकला। तुम्हारे सारे सपने चुरा लिए और देखो भेजा भी तो क्या भेजा! पैसे वापस किए उसने !! हम लोगों ने क्या समझा और वह क्या निकला !!! "       पारुल भरपूर अपने दिल की भड़ास निकाल रही थी। लेकिन उसकी दीदी चुपचाप खामोशी से पथराई सी आंखों से कभी हिसाब के उस छोटे से कागज के टुकड़े को देखती तो कभी डिमांड ड्राफ्ट को। पल भर के लिए उसे भी महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके सारे सपने चुपके से चुरा भी लिए हो।           "  दीदी हम उसे ऐसे ही नहीं छोड़ेंगे। मैं तो उसकी क्लास लूंगी। मैं तो कहती हूं दीदी तुम्हें उससे कम से कम एक बार मिलना चाहिए। हम पता लगाएंगे शहर का नाम तो मालूम ही है। हम खोज निकलेंगे उसे। और फिर पूछेंगे, तुम न सही लेकिन मैं उससे जरूर पूछूंगी। उसने तुम्हारे साथ ऐसा क्यों कि...

आशाओं के दीप - 1

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        दीदी कब तक करोगी उसका इंतजार ? दो  साल कम नहीं होते ? वह आने से रहा। पक्का बिजनेसमैन निकला दीदी, सौ लगाए और लाखों लेकर चला गया।          पारुल ने दीदी के चेहरे में नजरें गड़ा दी। देखना चाहती थी कि उसकी बातों का उसकी दीदी पर क्या असर हुआ। लेकिन उसकी दीदी उसी तरह उदास स्वर में बोली, " उसने कहा था वह आएगा . .  उसने कहा था आशाओं के दीप कभी बुझने न देना . . ."        " तुम समझती क्यों नहीं दीदी . .",  पारुल कृतिम क्रोध दिखाते हुए बोली थी, " आशाओं के दीप जले और जलकर बुझ भी गए। कभी सोचती हूं . . . तुम्हारी उससे मुलाकात न होती तो अच्छा था . . . उससे कभी बात न होती तो अच्छा था . .  और उससे कभी मोहब्बत न होती तो और अच्छा होता।        पारुल उसी कृतिम क्रोध को लिए कमरे से बाहर चली गई। उसे यादों का मृदुल स्पर्श मिला।      " मुंबई वैरायटी शो ", प्रदर्शनी की जान हुआ करती थी। किशोरवय से लेकर उम्र दराज तक के लोग दर्शक दीर्घा में होते। मादक फिल्मी गानों की प्ले क...

अक्सर मुझे देख कर !

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अक्सर मुझे देख कर, तुम्हारी ही बातें करते हैं लोग, हां सच! मैं कुछ भी नहीं पूछता, फिर भी ! सब कुछ बताते हैं,  तुम्हारे बारे में लोग। न जाने क्यों यह भी पूछते हैं कि,  मैं तुमसे कहीं नाराज तो नहीं? फिर भी मैं कुछ नहीं कहता ! हां चुप रहता हूं !! तब बड़ी हमदर्दी से,  लोग मुझसे कहते हैं, संभालो खुद को,  अक्सर दिल में ही तो, बिजलियां गिरा करती हैं दोस्त!! फिर भी मैं कुछ नहीं कहता,  चुप रहता हू, और तब ? और भी बारीकी से बताते हैं लोग। कैसे कुछ ने तुम्हें उदास देखा था, कैसे कुछ ने तुम्हें हंसता भी देखा था। किसी की याद में गुमसुम, अपने घर के सामने ही, कल बैठा हुआ भी देखा था। चलती राह के मुसाफिरों को रोक, मेरे बारे में पूछते हुए भी देखा था। नादान हैं, न जाने कौन सी कहानियां बनाते हैं लोग? हां, मैं जानता हूं, मुझे पता है ! बस यह कहानियां ही तो है, जो अक्सर मुझे सुनाते हैं लोग ।। और भी ना जाने,  क्या-क्या बताते हैं लोग। जैसे वे गवाह हो,  तुम्हारी तन्हाइयों के, जैसे वे गवाह हों,  तुम्हारी रुसवाईयों के, जैसे वे गवाह हों,  मेरी बेबाफाइओ के, कुछ ...

न जाने क्या पा लिया उसने !

ना जाने क्या कह गया वह जमाने से, अपना ही शहर छोड़ गया मेरे आने से। बमुश्किल खोज पाया था मैं उसे, फिर क्यों रूठा है ? लौट कर न आने से। शायद तुमसे ही कुछ कह गया हो मेरे बारे में अब तुम भी बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से। ना जाने क्या पा लिया, उसने किसी खजाने से ? क्या कम थे ये मोती, जो गिरे मेरी आंखों से? ना जाने क्या पा लिया, उसने चुप रह जाने से? बमुश्किल छोड़ा होगा उसने भी, किसी के समझाने से। बताओ कुछ तो कह गया होगा वह तुमसे? अब तुम्ही बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से।। Shailendra S.

आशिकी भी फातिया न पढ़ेगी

  ख्वाब को अपने अधूरा मत छोड़ शैलेंद्र, जागने पर तुझे बेचैनियां मिलेंगी। गर टूट कर बिखर गए राह में तो क्या, खुद को समेट अभी तो मंजिल मिलेगी। कौन है जो जज्ब कर लेगा तेरे एहसास, उम्मीद से ही शमा- ए - महफिल जलेगी। दफन तो होना है सभी को ब-दस्तूर, तोड़ मायूसी की कब्र रोशनी दिखेगी। गर अधूरे छोड़ ख्वाब मर भी गया, तेरी आशिकी भी फातिया न पढ़ेगी। जिंदादिली से अभी तो चल वरना ? मुर्दा को चलता देख दुनिया भी हंसेगी।। Shailendra S.

मैं तेरे गांव की छोरी हूं

मैं तेरे गांव की छोरी हूं,  तू मेरे गांव का बूढ़ा है। पकड़ के चूहा लटका दूंगी  जो तू मुझको छेड़ा है। आना-जाना दुश्वार किया, तूने ऐसा व्यवहार किया, मोहन को भी बदनाम किया, मुरलीवाला भी अब सोचेगा, राधा को क्यों बदनाम किया? मैं तेरी मार की मारी हूं, तू मेरे प्यार का मारा है। मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। तू मरण-सेज पर लेटा है, मैं प्रिय-सेज पर लेटी हूं, इतना भी ज्ञान न आता है? यूं तो तू बदमाश बहुत है, मैं भी कुछ कम चालाक नहीं, तू मुझको जिस रस्ते घेरा है, मैं दूजे से फिर आती हूं। मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। पकड़ के चूहा लटका दूंगी, जो तू मुझको छोड़ा है। कान पकड़कर बैठक करवा लूंगी, सरे आम पब्लिक से पिटवा दूंगी, या फिर, गांव के पागल कुत्तों को,  तेरे पीछे दौड़ा दूंगी। तुझको! तेरे ही घर में बंधवा दूंगी, या फिर, थाने के बैरक में डलवा दूंगी। अबकी जो तू मुझको छेड़ा है? मैं तेरे गांव की छोरी हूं, तू मेरे गांव का बुढ़ा है। क्यों करता बदनाम मुझे? हाथ फेर सर पे, दे आशीष मुझे, बचपन में मेरे गाल को चूमा है। अब क्यों डर लगता है, मुझको तेरी ना...

आउट ऑफ सिलेबस 2

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नोट: यदि इस का पहला पार्ट नहीं पढ़ा है तो उसे अवश्य पढ़ें ले। वह आपको इसी ब्लॉग में मिल जाएगा। _--------------_     कहानी को जहां विराम दिया गया, वहां घटनाएं घटी और तीन पात्र एक दूसरे से जुदा हुए, अपनी अलग-अलग जिंदगी जीने के लिए।  कुछ सीख, सिद्धांत और अवधारणाओं के साथ कहानी रुक गई । या यूं कह लीजिए की कहानी को यदि मैंने ठीक उसके दो-तीन वर्ष के बाद लिख दिया होता तो वही उसका अंत होता।       लेकिन नहीं, जब मैं इस कहानी को लिख रहा हूं, घटनाएं घट चुकी हैं। इसलिए कहानी को अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता। उसे उसके अंजाम तक पहुंचाना नितांत आवश्यक है।       जो अवधारणाएं बनी, और जो कहानी के अंत में बनेगी, वह लेखक की व्यक्तिगत हो सकती है। किंतु आगे की कहानी कहने से पहले मैं इतना अवश्य लिखना चाहता हूं कि " लड़के ऐसे ही होते हैं या लड़कियां ऐसी ही होती हैं " इस सोच को अपने कवर्ड में रखकर ताला मार दीजिए, और खुले दिमाग से आगे पढ़िए।              हम तीनों एक साथ जुदा हुए और लगभग 6 वर्ष बाद जब मिले तो तीनों ...

कलयुग में तीन युगों का

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कलयुग में सतयुग का,  अब तो आरंभ करो। हरिश्चंद्र से-सत्य पुरुष का,  अब धारा में अवतार करो। तारामती की बलिदान शक्ति का   अब हर नारी में संचार करो।। गगन-भेदी हुंकार करो,   हां राम, धनुष टंकार करो। खड़ा दसों बुराई का रावण,   अब दिव्यास्त्र संधान करो। अमृत घट लिए नाभि में तो क्या,    हां राम! अब तुम संघार करो।। बाल्यावस्था में ही, अत्याचारी कंस का, कर भीषण आघात, मुष्ठि प्रहार करो। सबल पुरुष की वीर सभा में, खड़ी द्रोपदी की करुण पुकार सुनो। शस्त्र-त्याग, अर्जुन खड़ा बीच कुरुक्षेत्र, भगवत गीता का संचार करो। अधर्म पक्ष में खड़े भीष्म तो क्या, उन पर भी बाणों की बौछार करो। पुत्र-मोह, धर्म-विरुद्ध, हैं खड़े गुरुदेव, उन पर भी द्रष्टधुम तुम वार करो। युद्ध क्षेत्र के भगोड़े दुर्योधन पर, हां भीम! तुम अंतिम प्रहार करो।। इस कलयुग में भी तीन युगों-सा, हे पुरुषोत्तम!! तुम न्याय करो।। Shailendra S.

अर्धनारीश्वर

ऑफिस का माहौल उसके लिए बिल्कुल नया था। स्कूल, कॉलेज के जमाने में राह चलते कुछ मनचलों को सीटी मारते, कमैंट्स करते उसने देखा और सुना था। किंतु यहां सभ्य और सुसंस्कृत वातावरण में उसे ऐसा माहौल मिलेगा उसने कल्पना नहीं की थी।     बात - बात पर निकम्मी और बेहूदी हंसी मजाक करने वाले, और गुडलक कह कर जबरन पीठ थपथपा देने वाले, बिना किसी अचीवमेंट के वेल्डन कहते हुए अपना हाथ बढ़ाकर इस आशा के साथ कि वह उन से हाथ मिला लेगी, और तब वे अपने पुरुषत्व का परिचय देंगे। और ना जाने कितनी ही ललचाई और स्वप्नदर्शी आंखे जिनमें शायद उस से गले मिलते, उसके साथ लिपटते, चूमते दृश्य को कैद करने की क्षमता लिए, येसे न जाने कितने लोगों को उसे रोज सामना करना पड़ता था। आश्चर्य तो उसे तब होता जब इस श्रेणी में उम्रदराज भी होते, शायद स्त्री देह से इनकी जिज्ञासाएं अभी भी समाप्त नहीं हुई थी।       उसका एक वर्ष का अनुभव उसे प्रतीत होता जैसे 10-20 साल उसे इन्हीं के बीच रहते गुजरा हो। हर रोज उसे मर कर फिर जीना पड़ता था।        मोहित !! उसका सब कुछ, दोस्त, पति, हमदर्द। उसके यू लाचार ह...

तुम्हारे लिए

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         उस दिन वह खुद नहीं उठा, बल्कि उठाया गया। मां तो हमेशा कहती कि बेटा जल्दी उठा करो। जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। लेकिन वह कभी भी सुबह जल्दी नहीं उठ पाता था। आज की सुबह अचानक ही उसकी पालतू बिल्ली चूहे को पकड़ने के चक्कर में उसके ऊपर ही कूद पड़ी। और उसे उठना ही पड़ा। बिल्ली को चूहा मिला या ना मिला, उसे नहीं मालूम। लेकिन वह हड़बड़ा कर बिस्तर छोड़ खड़ा हो गया और  अपनी पालतू बिल्ली को जी भर कोसा।      झटका इतना तेज था कि वह दुबारा सोने का प्रयास न कर सका। सर्दी के दिनों की बेहद ठंडी सुबह थी वह। उसने देखा मां अपने सुबह के रूटीन कामकाज में व्यस्त है। घड़ी में छोटा वाला कांटा 5 को पार कर चुका था  वह बाहर आया तो मां को आश्चर्य हुआ, " आज इतनी सुबह कैसे उठ गया ! "  उसने छोटा सा संक्षिप्त जवाब दिया, "  अपनी इस बिल्ली को संभाल के रखो नहीं तो मैं किसी दिन इस का गला काट दूंगा। यह जब देखो तब चूहे को पकड़ती रहती है "  उसने मूंह हाथ धोए, कपड़े पहने और बाहर की तरफ चल निकला। मां ने फिर पूछा, " इतनी सुबह कहां ज...

छोटी सी गुड़िया

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उस दिन पार्क में उसे देख, उससे बातें कर, उससे मिलकर मुझे मॉरिसन का एक कथन याद आया था - " शिक्षण एक कम परिपक्व व्यक्ति को ज्ञान की ओर अग्रेषित करना है "  शिक्षक और शिक्षण के लिए यह एक मोटिवेशनल कॉन्सेप्ट हो सकता है। एक शाम मैं अपने मित्र के साथ अपने ही शहर के एक नवनिर्मित पार्क घूमने गया था। मित्र एक प्राइवेट स्कूल में कॉमर्स का टीचर था।  पार्क में कुछ आकर्षक प्राणी जैसे खरगोश, बंदर, सफेद चूहे, रंग बिरंगी चिड़िया इत्यादि। उन सभी को इस तरह जालियों के घर बना सहेज के रखा गया था कि आम जनता उन्हें दूर से देख सके, किंतु उन्हें परेशान न कर सके।  मेरा मित्र अति क्रांतिकारी स्वभाव का था।  व्यवस्था के प्रति उसमें इतना आक्रोश था कि कभी-कभी वह व्यवस्था के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ पदों पर आसीन व्यक्तियों को भी गाली देने में सभी मर्यादाओं की तिलांजलि दे दिया करता था। " साला इस देश का कुछ नहीं हो सकता। यहां सभी स्वार्थी और अपने-अपने पर मरने वाले लोग हैं। बदलाव हो भी तो कैसे ? सबको अपने अपने हितों की पड़ी है। सभी अपनी-अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं। चाहे मंत्री हो, मिनिस्टर हो...