छोटी सी गुड़िया

    उस दिन पार्क में उसे देख, उससे बातें कर, उससे मिलकर, मुझे मॉरिसन का एक कथन याद आया था -
"शिक्षण एक कम परिपक्व व्यक्ति को ज्ञान की ओर अग्रेषित करना है"

    शिक्षक और शिक्षण के लिए यह एक मोटिवेशनल कॉन्सेप्ट हो सकता है।

   एक शाम मैं अपने मित्र के साथ अपने ही शहर के एक नवनिर्मित पार्क घूमने गया था। मित्र एक प्राइवेट स्कूल में कॉमर्स का टीचर था। 

    पार्क में कुछ आकर्षक प्राणी जैसे खरगोश, बंदर, सफेद चूहे, रंग बिरंगी चिड़िया इत्यादि। उन सभी को इस तरह जालियों के घर बना सहेज के रखा गया था कि आम जनता उन्हें दूर से देख सके, किंतु उन्हें परेशान न कर सके। 

    मेरा मित्र अति क्रांतिकारी स्वभाव का था।  व्यवस्था के प्रति उसमें इतना आक्रोश था कि कभी-कभी वह व्यवस्था के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ पदों पर आसीन व्यक्तियों को भी गाली देने में सभी मर्यादाओं की तिलांजलि दे दिया करता था।

    "साला इस देश का कुछ नहीं हो सकता। यहां सभी स्वार्थी और अपने-अपने में मरने वाले लोग हैं। बदलाव हो भी तो कैसे ? सबको अपने अपने हितों की पड़ी है। सभी अपनी-अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं। चाहे मंत्री हो, मिनिस्टर हो, अधिकारी हो, सभी को सिर्फ अपनी पड़ी है। साला सरकारी ऑफिस देखो चपरासी से लेकर बाबू तक की जेब गर्म करो तब कहीं जाकर काम होता है . . .

    वह कह रहा था और मैं उदासीन भाव से सुन रहा था। बिना अपने किसी राय मशवरे के। उसने अब मुद्दे की बात छेड़ी,

    "और साले को हम ? मर गए बीकॉम, एम काम करते करते। सोचा था, चलो कुछ न सही तो टीचर तो बन ही जाएंगे लेकिन यहां गवर्नमेंट के पास पढ़े-लिखों को सर्विस देने के लिए कोई ठोस प्लानिंग ही नहीं ! साला गलती हम लोगों की ही है, पढ़े-लिखे ज्यादा हो गए हैं, इसलिए अब हमारी वैल्यू कम हो गई है ....

    कहते कहते हुए एक जाली के घर के सामने रुक गया। उस जाली में सामान्य कद काठी के बंदर थे। कुछ लोग वहां पहले से ही खड़े थे और जाली के अंदर घूमने वाले बंदरों को छुप-छुपा के कुछ खिला-पिला रहे थे। 

     उस मित्र ने भी अपनी जेब से एक मुट्ठी चने निकाले जो उसने पार्क घुसते समय शायद स्वयं के खाने के लिए खरीदे थे। जाली के अंदर उसने हाथ थोड़ा-सा डाला। 

    एक बंदर उसकी तरफ आकर्षित हुआ शेष सभी किसी न किसी के हाथ से या किसी न किसी के द्वारा फेंके हुए दानों को चुन-चुन के खा रहे थे। 
    एक बंदर सभ्य था, उसने बड़ी शालीनता से मित्र के हाथ से चने खाने शुरू किए।

   अब वह आगे कह रहा था " सरकार जैसा चाहे हमे इन बंदरों की तरह नचाती है। अब देख लो, भर्ती भी कैसे होती है? यही टीचरों वाली ! कैसे अजीब-अजीब से नाम दिए गए अतिथि शिक्षक, संविदा शिक्षक गुरु जी. और पहले एलटीडी, यूटीडी, लेक्चरर, तब लगता था कि अच्छे जॉब में हैं!!

    मैं तो प्राइवेट कर रहा हूं। साला झक मार के पढ़ाना पड़ता है। लेकिन मैंने देखा है कि कुछ जो सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं, वह उसी तरह पढ़ाते हैं। जैसी पेमेंट वैसे पढ़ाई का स्तर नहीं रखते। थोड़ा बहुत पढ़ाया, अपनी अटेंडेंस दी और फिर चले घर को।

    अब तू ही सोच मुझ जैसे टीचर घर आकर ट्यूशन या कोचिंग ना पढ़ाए तो वह कैसे जी लेगा ? ऊपर से अब इसमें भी प्राइवेट स्कूल तक रोक लगाई जा रही है। . . .  कभी कभी लगता है, हमसे अच्छे तो ये बंदर हैं।

स्पष्ट विरोधाभास !!

    कुछ देर पहले उसने सरकार पर इल्जाम लगाया था कि सरकार पढ़े लिखों को बंदरों की तरह नाचा रही है। अब खुद से अच्छा वह बंदरों को बता रहा था। मैं उससे कुछ कहता इससे पहले ही उसने मुझसे कहा, " ले तू भी खिला ले !"

 और उसने अपनी जेब से उसने कुछ चने निकाल कर मुझे थमा दिए। मैंने जैसे ही अपना हाथ जाली के अंदर डाला तो वह बंदर जो अभी तक मेरे मित्र को सुख दे रहा था कूदकर मेरे सामने आ गया और मेरे हाथों से चने उठाकर खाने लगा।

     मैंने अपने मित्र का वह एकमात्र बंदर भी छीन लिया था। मुझे इस बात का अफसोस होता कि उससे पहले पीछे से किसी ने पुकारा या यूं कहें पीछे से आवाज आई, "हेलो सर ! "

    हम दोनो पलटे, ठीक पीछे तीन लड़कियां खड़ी थी। एकबारगी तो मैंने यह सोचा कि हो न हो ये मेरे मित्र की स्टूडेंट होंगी। मैंने उसकी तरफ इस अंदाज से देखा जैसे मैं उससे पूछ रहा हूँ, "जानता है क्या ? "

 किंतु यह क्या? वह भी आंखें फाड़-फाड़ कर कभी मुझे तो कभी उन्हें देख रहा था। 

    उनमें से एक लड़की जिसने शायद आवाज दी थी, जी हां उसने मुझसे पूछा, "आपने नहीं पहचाना सर ?"

मैंने अपना सर इनकार में हिलाया "सॉरी..." 

    जवाब सुनकर उसे कुछ निराशा हुई, फिर उसने अपना नाम और परिचय दिया और यह भी बताया कि मैं कैसे और कब उसका टीचर रह चुका हूं।

     हां, एकदम से सामने देखकर मैं उसे बिल्कुल नहीं पहचान पाया था। वह मेरी स्मृतियों से ओझल हो चुकी थी, या शायद इसलिए कि हमारे बीच एक लंबे समय का अंतराल था ?

     नहीं, घटना कोई ज्यादा पुरानी नहीं थी, किंतु चेहरा बदल गया था, बात करने का ढंग बदल गया था। एक बेहद चपल और चंचल 7 - 8 वर्ष की बालिका  19-20 वर्ष की स्थिर बुद्धि से परिपूर्ण, शांत और नर्म लहजे में बात करने वाली लड़की में तब्दील हो चुकी थी।

     उन दिनों में मैं अपने ही शहर के एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में पढ़ाया करता था। कंप्यूटर बेसिक से लेकर कंप्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पढ़ने के लिए छोटी बड़ी उम्र से लेकर बड़े बुजुर्ग तक आया करते थे। 

     कंप्यूटर उन दिनों फुल क्रेज में था। 22-23 वर्ष की उम्र में एक तो कंप्यूटर टीचर ऊपर से जब मेरी उम्र से बड़े यहां तक कि कुछ सर्विस करने वाले व्यक्ति भी सीखने के लिए आते, तो मुझे बतौर टीचर बड़ी मुश्किल से स्वीकार कर पाते।

     वे दिन मेरे स्ट्रगल के दिन थे, मैं यह नहीं कहना चाहूंगा। बल्कि मैं अपनी उस टीचिंग कैरियर को इंजॉय कर रहा था। जब 22 वर्ष की उम्र में आप एक अच्छी संस्था के कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर हो तो भविष्य की चिंता करने के लिए तो अभी समय था। 

   उस समय कंप्यूटर टीचिंग मेरा फुल टाइम कैरियर था। पार्ट टाइम में कंपटीशन एग्जाम की तैयारी भी कर लेता था। वर्किंग डेज में सुबह 8 से 1 बजे तक और फिर शाम को 5 से 8 बजे तक मेरी क्लासेज होती थी।

     एक दिन जब मैं रात को क्लास खत्म करके 8:30 बजे के लगभग घर पहुंचा तो एक वेल सूटेड-बूटेड अपरिचित व्यक्ति को अपने पिताजी से बात करते हुए देखा।

     पहले तो मैंने यही सोचा था कि यह जरूर मेरे पिताजी के जान-पहचान वाले होंगे। किंतु मुझे देखते ही पिताजी ने कहा - ' लीजिए - आ गए, यही हैं..."

   उन्होंने मुझे अपना परिचय देने के बाद मुझसे एक हेल्प मांगी ।

      उनकी एक छोटी-सी बेटी है, 3rd क्लास में। शहर के एक बड़े और इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं।  क्योंकि लगभग सभी प्राइवेट स्कूल का
अब उद्देश है कि बच्चों को निचले क्लास से ही कंप्यूटर ऐडेड कर दिया जाए, तो उसके लिए उन्होंने अन्य विषय की तरह कंप्यूटर सब्जेक्ट भी रखा है। उसकी भी थ्योरी और प्रैक्टिकल क्लास लगती हैं।

     समस्या यह है कि और सभी विषय में उस लड़की का इंटरेस्ट है किंतु कंप्यूटर पढ़ने पर नहीं है। उनकी रिक्वेस्ट थी कि मैं उनकी बेटी को कुछ समय के लिए कंप्यूटर घर आकर पढ़ा दिया करू। शायद उसका इंटरेस्ट जाग जाए।

      मेरे लिए यह मुश्किल था। दोपहर के वक्त उसकी स्कूल थी जब मैं खाली था। और जब मैं खाली नहीं होता था तो वह फ्री होती थी। अब बचता था रात के 8:00 से 9:00 के बीच का टाइम।

      मुश्किल, बेहद मुश्किल। हालांकि उसका घर कोई दूर नहीं था। लेकिन दिनभर थकने के बाद फिर उस छोटी सी बच्ची के साथ माथा-पच्ची करने का मेरा कोई इरादा नहीं था।

       मैंने मना कर दिया, फिर भी वे एक न माने और अंततः मुझे कहना पड़ा " ठीक है, मैं कल आकर देख लूंगा . . ."

    जब मैं उनके घर पहुंचा तो मेरा स्वागत एक पामेलियां डॉग ने किया। वह जोर-जोर से भौंकने लगा। शायद यह उनके घर की कॉल बेल थी। 

      जब मैं उसके स्टडी रूम में पहुंचा तो हालत खराब थी। ढेर सारी किताब कॉपी इधर-उधर बिखरी पड़ी थी और वह उन्हीं बिखरी हुई किताब कॉपियों के बीच शांत बैठी थी। 

     बिल्कुल फर्श पर, एक छोटी सी गुड़िया की तरह। जब उसके पिताजी ने उसे बताया कि मैं उसे कंप्यूटर पढ़ाऊंगा तो उसने बहुत ही अजीब नजर और कुछ घृणा से मुझे देखा।

     खैर, किताब कॉपियां समेटी गई। हम दोनों टेबल के आमने सामने बैठे थे, और कंप्यूटर की किताब सामने थी। मैंने उससे पूछा, "बताओ ! क्या दिक्कत है...? 

    और जवाब में उसने खामोशी से बुक की तरफ इशारा कर दिया। 

      मैं उसकी सरलता पर हंस पड़ा और किताब को एक तरफ हटाते हुए बोला "तो पहले इस दिक्कत को दूर करते हैं... अब ठीक ?"

    अब वह खुश थी। उसने मुझे अपने बारे में सब कुछ बताया, एक सांस में। उसे क्या पसंद है, क्या नहीं पसंद है, कौन-कौन से सब्जेक्ट उसके फेवरेट हैं, क्लास में उसके फेवरेट टीचर कौन है, फेवरेट गेम कौन सा है और उसकी बेस्ट फ्रेंड कौन सी है। 

     मैं लगभग उसे 10 मिनट तक केवल सुनता रहा, फिर मैंने उससे पूछा " अच्छा ! यह बताओ, तुम फुल एजुकेटेड पर्सन बनना चाहती हो या आफ एजुकेटेड ...?"

    जवाब में उसने दोनों हाथों की उंगलियों से हवा में एक रैक्टेंगल बनाया और बोली  "फुल... "

     जैसे कि बच्चों को सभी चीजें पूरी की पूरी चाहिए होती हैं। वे आधे से समझौता नहीं कर सकते। तो उसने भी वही किया। ऑप्शन फुल चुना। मैंने कहा " मालूम है, हाफ एजुकेटेड और फुल एजुकेटेड पर्सन में क्या अंतर है, क्या फर्क है ?"

 उसने इंकार ने सर हिलाया " नहीं "!

    मैंने उसे समझाते हुए बताया कि किसी भी क्षेत्र या क्राइटेरिया में आधा-अधूरा ज्ञान। यानी जिसे पूरा ज्ञान न हो। और जानती हो जिस युग में तुम जी रही हो, और आगे जा रही हो, कल तुम्हें इस कंप्यूटर एजुकेशन की बहुत जरूरत होगी। चाहे तुम डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो, किसी बड़ी कंपनी की मैनेजर बनो, कोई गवर्नमेंट ऑफिसर बनो या मुझ जैसा टीचर बनो... इन सभी में इसकी जरूरत पड़ेगी। यदि इसका तुम्हें ज्ञान नहीं होगा तो फिर तुम्हे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। तुम्हारे सारे ज्ञान यानी एजुकेशन आधी-अधूरी मानी जाएंगी। अब सोच लो इसे पढ़ना है या हमेशा आफ एजुकेटेड पर्सन बन के रहना है...?"

वह कुछ डरी और सहमी सी दिखी। आश्चर्य से पूछा " सच में !!

    और मैंने हां मे अपना सर हिलाया " बिल्कुल सच, अब जरा तुम ही सोचो यदि मुझे कंप्यूटर का नॉलेज ना होता, तो क्या मैं तुम्हें पढ़ाने आता...?"

 और शायद ठीक उसी वक्त, उसने मन में तय कर लिया कि वह कंप्यूटर पड़ेगी। किताब फिर से हम दोनों के सामने थी। छोटी-छोटी डेफिनेशन थीं। कंप्यूटर के छोटे-छोटे कॉन्सेप्ट थे। मैंने उसे बताएं, और कहा, " अगली क्लास में मैं तुमसे पूछूगा। तुम याद करके रखना। उसने इकरार में दोनों तरफ सर हिलाया " जी " और साथ में एक प्रश्न भी " आप कल आएंगे न ? " 

    मैंने कहां, " बिल्कुल, यदि याद करके सुनाने का वादा करो तो मैं जरूर आऊंगा "

    अगले 2 दिन मैं नहीं गया। समय नहीं मिला।

    तीसरे दिन जब गया तो उसने वह सारी डेफिनिशन मुझे एक सांस में सुनाई। मैं आश्चर्यचकित था, उसकी याददाश्त को देखकर। इतनी बढ़िया मेमोरी होने के बावजूद वह इस सब्जेक्ट से दूर थी।

   केवल इसलिए कि वह इसे पढ़ना नहीं चाहती थी। धीरे-धीरे उसकी बेरुखी दूर होने लगी। अब कंप्यूटर पढ़ने में या उसे पढ़ाने में मुझे किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं होती थी।

    मैं उसे जो कुछ भी पढ़ाता था, वह ध्यान से पढ़ती। उसे याद करती और फिर अगली क्लास में सुनाती। हां यह बात कुछ अलग थी कि मेरी अगली क्लास कभी भी दूसरे दिन या कंटिन्यू नहीं हो पाती थी। मैं बीच-बीच में गायब हो जाता था। 

   वह मुझसे इतनी घुल मिल गई कि वह मुझे अपनी हर बात शेयर करने लगी थी। चाहे वह स्कूल की हों, चाहे वे घर की हों या चाहे उसके बड़े भाई की हों। मम्मी पापा तक की बातें वह मुझे बताती कि मम्मी ने उसे कब डांट...। पापा कब गुस्सा हुए।

      एक दिन उसने मुझसे एक अजीब सा प्रश्न पूछा - 
   "सर मेरे मम्मी-पापा इतने लड़ते-झगड़ते हैं, फिर भी एकसाथ क्यों रहते हैं...? अलग क्यों नहीं रहते ? कभी-कभी तो मेरा दिमाग खराब हो जाता है..." 

    मैं उसकी बातें सुनकर चौकन्ना हो गया। वह अपने माता-पिता की नोकझोंक को भी सीरियस लेने लगी थी। 

    मैंने उसे समझाते हुए कहा , "नहीं, लड़ाई झगड़ा नहीं होता होगा। बस ऐसे ही कंट्रोवर्सी में एक दूसरे के लिए कुछ कह देते होंगे... और फिर अलग कैसे हो जाएं ? आफ्टर आल उनकी तो शादी हुई है न ? "

" तो क्या शादी के बाद, एकसाथ रहना जरूरी है सर..?", मासूमियत से पूछा गया एक यक्ष प्रश्न।

 "बिल्कुल...", मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला।

   वह कुछ देर तक बिल्कुल चुप रही। फिर एकदम से बोली "सर ! आप मुझसे शादी कर लीजिए न... प्लीज!"

    मैं एकदम से चौंक पड़ा था। मैने उसकी तरफ ध्यान से देखा। उसके स्वर में कुछ याचना भी थी। ये बालिश्ते भर की लड़की और मुझसे शादी !! लेकिन उसके दिमाग में ये बात आई ही क्यूं ?

   और जो स्पेसिफिकेशन उसने दिया, उसे सुन कर मेरा दिमाग चकरा गया। कोई इतनी दूर की भी सोच सकता है भला !! कैसे ?

    उसने अपनी बात को बड़े बुजुर्गों की तरह से मुझे समझनी शुरू की  -

    "देखिए सर, जब आपकी, और मेरी शादी हो जायेगी तो आप और हम हमेशा साथ रहेंगे। रहेंगे न ? और तब मैं जब चाहूं आपसे कंप्यूटर पढ़ सकती हूं। पढ़ सकती हूं न ? . .  . और हां, तब आप गैप भी नहीं मारेगे..."
    अंतिम लाइन में मुझ पर कटाक्ष किया गया था। 

     मैं उसकी बात सुन कर दंग था। मैने उससे कुछ नर्म लहजे मैं कहां "यह कैसे हो सकता है? कहां मैं इतना बड़ा और तुम बिल्कुल छोटी-सी गुड़िया की तरह ! शादी तो लगभग हम उम्र वालों में होती है न ?"

     तब उसने एक प्रपोजल रखा , "अभी इंगेजमेंट कर लेते हैं... जब मैं बड़ी हो जाऊंगी तो शादी कर लीजिएगा... ?"

     यानी वह हर हाल में मुझे बतौर टीचर इंगेज रखना चाहती थी।

      "इसके लिए तो रिंग चाहिए होगी !!" इस बार मैने उसे टरकाना चाहा, "इसलिए रहने दो..."

      वह कुछ उदास हो गई, लेकिन नहीं उसने हार नही मानी "सर ! अभी आप मेरी ये पेन रख लीजिए, जब बड़ी हो जाऊंगी, खूब सारे पैसे कमाऊंगी तो मैं आप के लिए रिंग भी खरीदूगी...."

     मुझे इस बात का भी ध्यान रखना था कि उसकी बाल्यावस्था की सुकोमल भावनाओं को ठेस न लगे, लेकिन यदि उसकी दी हुई पेन मैं रख लेता हूं, तो यह भी अनुचित ही होगा। ठीक है, आज वह नसमझ है, छोटी बच्ची है, किंतु कल को वह बड़ी होगी, रिश्तों को समझने लायक होगी। तब ?

      तब क्या होगा? वह तो यही सोचेगी न कि मैंने उसकी इस अज्ञानता और कमउम्र की नसमझी का गलत फायदा उठाया था ? निर्णय मुझे लेना था, और मैंने निर्णय लिया। कुछ सोच-विचार कर उसकी दी हुई पेन रख ली, फिर उसे समझाते हुए बोला, "वैसे इसकी कोई जरूरत नहीं है, मैं तुम्हे वैसे ही पढ़ाऊंगा, तुम बस पढ़ो, और देखो मम्मी-पापा की सभी बातें किसी को भी मत बताया करो..."

     मैंने उसे लगभग दो साल तक पढ़ाया। इस बीच वह उसी तरह बातें करती रही, पढ़ती रही।

   चुकी उसके पिता ने मुझसे मदद मांगी थी, पेमेंट की कोई बात नहीं हुई थी। इसलिए प्राश्रमिक की बात न तो मैने की और न ही उन्होंने कभी पूछा। जो मन में आता तो दे देते और मैं चुपचाप रख लेता।

   उसे पढ़ते समय मुझे यही एहसास होता, जैसे कि मैं खुद अपनी बेटी को पढ़ा रहा हूं। दिल में यह भी आता कि, हे ईश्वर ! यदि मेरी बेटी हो तो इसी तरह की हो, बिल्कुल छोटी-सी गुड़िया की तरह।

       4th क्लास में वह कंप्यूटर में अच्छे नंबरों से पास हुई। कुछ दिन पीछे पता चला की उसके पापा ने कहीं दूसरी जगह घर ले लिया था, इसलिए अब वो यहां नहीं रहते। शिफ्ट होने से पहले वह अपने पापा के साथ मुझसे मिलने के लिए मेरे घर आई थी, लेकिन मैं किसी जरूरी काम से शहर से बाहर गया था, इसलिए मुलाकात नहीं हो पाई..."

     मैं धीरे-धीरे उसे भूल सा गया। आगे की जिंदगी स्ट्रगल से भरी थी। गुजरे चेहरे याद न रहे। वही बचपन का एक चेहरा सामने खड़ा था , "हां, तो कहो, कैसी हो, किस क्लास में पहुंची ?"

  " सर ! स्कूल की क्लास नही, कॉलेज में हूँ, इंजीनियरिंग कालेज पूना में...", उसने कुछ मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

   "अरे वाह ! किस सब्जेक्ट से ?", मैं प्रशंसा भरी नजरों से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

     तब उसने मुस्कुराते हुए कहा " सी. एस.  से"

 " सी.एस. से !! " मैने आश्चर्य से पूछा "  तुम्हें तो कंप्यूटर से डर लगता था न ?"

    "था  सर, अब नहीं, आपकी हाफ एजुकेटेड पर्सन वाली बात हमेशा याद रही " फिर उसने शिकायत भरे लहजे में कहा , " देखिए न सर, मैं आपको और आपकी कही बातों को आज तक नहीं भूली, और एक आप है कि मुझे भूल गए !! मै स्कूल जाते समय कभी कभी अपनी बस से, आपको घर के सामने देखा करती थी, न्यूज पेपर पढ़ते हुए"

    मैंने तपाक से कहा "तो अच्छा ! तुम इसीलिए नहीं भूली!! तुम तो देख लिया करती थी, लेकिन मैं तो नहीं देख पाता था न ? शायद इसी लिए मैं भूल गया ?"

 औपचारिक बातों के बाद उसने हमेशा की तरह मुझसे एकदम से पूछा , "सर ! मैंने आपको एक पेन दी थी, क्या आपको याद है ?"

    जब उसने मुझे अपने बारे में बताया तो यह घटना भी मुझे उस वक्त याद आ चुकी थी। जिंदगी का पहला प्रपोजल ! भला कैसे भूल जाता ?

    लेकिन प्रत्यक्षत: मैंने उससे यही कहा - " पेन !! कौन सी पेन ? मुझे तो कुछ याद नहीं...?"

       मैं पूरी तरह से अनजान बन गया ।  शायद इसलिए कि इस वक्त उसकी बातों को उसी से कहना कहीं से उचित नहीं लगा। अब वह समझदार है, कोई नादान बच्ची नहीं !

      उस वक्त की नसमझी आज की शर्मिंदगी बन सकती थी, और मैं उसे शर्मिंदा होते हुए कैसे देख लेता ? उसका टीचर जो ठहरा।

    मैने विषय बदल दिया। उसके पापा मम्मी, बड़े भैया के बारे में पूछने लगा। चलते वक्त उसने मुझे विश किया " सर आज टीचर्स डे है, ये पेन आप के लिए, एक गिफ्ट है "

   "ओह ! थैंक्स, अब मुझे विश्वास हो चला है कि तुम मेरी वो एक अच्छी स्टूडेंट हो, जो पार्क में भी पेन लेकर चलती है...?"

     उसके साथ उसकी दोनों सहेलियां भी हंस पड़ी , " हां सर ! यह बात तो है, यह बड़ी पढ़ाकू है "

    वह चली गई । मैं उसे जाते हुए देखता रह गया। उसे रोक कर यह भी न बता पाया कि जिस दिन पहली बार उसने मुझे पेन दी थी उस दिन भी टीचर्स डे ही था। और मैंने उस दिन यही सोच कर पेन अपने पास रखा ली थी कि एक स्टूडेंट द्वारा टीचर के लिए दिया गया एक उपहार है।

    मेरा यह स्पेसिफिकेशन उसे शर्मिंदा कर सकता था।

    संबंध रिश्तो के मोहताज नहीं होते। वे समय से भी परे होते हैं।  किसी भी उम्र से परे।

    उस दिन मैंने उसे पार्क में उसी रूप में देखा जैसा कि पहली बार मेरे मन में आया था कि काश ! यदि मेरी बेटी हो तो इसी की तरह की हो। आज जब कभी अपने शिक्षक द्वारा किसी स्टूडेंट को प्रताड़ित होने या फिर अभद्र व्यवहार करने की खबर पढ़ता हूं, तो मन आहत होता है। कैसे लोग हैं वे, जो ऐसा कर जाते हैं ? क्या इंसान कहलाने लायक भी हैं ?

     मेरे मित्र ने उस बंदर को दोबारा चने खिलाने की कोशिश की लेकिन वह आकर्षित नहीं हुआ। वह अब किसी और के हाथ से मजे ले-ले कर चने खा रहा था। उसने मेरे मित्र को अनदेखा कर दिया था। 

     उपेक्षा भाव से आहत मेरे मित्र ने चने खुद अपने मुंह में डालकर चबाते हुए कहा  "चलो चलते हैं, वैसे इस लड़की को तुमने कब पढ़ाया था ?"

    जब यह चौथी कक्षा में थी, और शायद उसी दौर में, जब मैं भी तुम्हारी जैसी सोच रखता था "

    वह तिलमिला गया। मैं समझ गया, मेरी भाषा गलत है, मेरे कहने का अंदाज गलत है।

    मैंने उसे समझाते हुए कहा, "यदि इस प्रोफेशन में पैसे नहीं है, तो कोई दूसरा कर लो, लेकिन इसके प्रति पूरी निष्ठा रखो। हम समाज बदलने की बात करते हैं, और जो समाज को बदल सकते हैं, नई व्यवस्थाये स्थापित कर सकते हैं, उनमें वह सोच नहीं पैदा करते हैं ? जरा सोचो कि यदि हमारे टीचर्स ने भी हमें पढ़ाते समय बेईमानी की होती, तो क्या हम इस मुकाम पर होते ? नहीं न? 

   तो फिर हम क्यों आने वाली जनरेशन को वह सोच वो शिक्षा नहीं दे सकते ? यदि व्यवस्थाएं बदलनी है, उनमें सुधार लाना है, तो शिक्षा का स्तर बेहतर करना होगा, उसके प्रति गद्दारी नहीं चलेगी।

    प्रतिउत्तर में वह धीरे से मुस्कुरा दिया था। शायद उसकी यह मुस्कान मौन स्वीकृति रही होगी ?

Shailendra S.

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