Posts

तुम कहा गए ? 30

    एक दौर ऐसा भी गुजरा था, जब तुम लिखा करते थे, और मैं पढ़ा करती थी। या यूं कहो बस पढ़ लिया करती थी। मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई रूहानी या फिर कोई रोमांटिक जज्बात न थे। अब ऐसे में तुम्हारा लिखा कुछ भी, कैसे भी, सामने आता तो मैं उसे बस पढ़ लिया करती थी।    बिना किसी संवेदना के, बिना किसी भाव के। प्रतिक्रिया देना तो दूर की बात है मैं तो उसे कुछ पल से अधिक याद भी नहीं रख पाती थी। यदि किसी भी अभिव्यक्ति के लिए मैं पत्थर दिल थी, तो फिर बताओ, ऐसे में मैं भला तुम्हें इबादत करने से कैसे रोक सकती थी . . . कैसे कहें अब तुमसे, हम तुम्हारी इबादत के काबिल नहीं, जब खुद को पत्थर बना लिया हमने। . . . रुक रुक कर चलती है, कुछ इस तरह से जिंदगी मेरी। वफाओं की तो अब बात नहीं, खामोश लबों से भी भला, कोई दुआ निकलती है कभी। तेरी निगाहों ने भी देखा होगा वो मंजर, कि सजदे में आकर भी, कोई मुराद पूरी होती नहीं ।। . . . कोई और ही शख्स था तेरे अंदर, जो जीता रहा अपनी जिंदगी, सहेज खुद मेरी यादों को, हर रोज मिटाता रहा यादें तेरी।।       मैने लिखा न कि तुम रूहानी, रोमांटिक औ...

तुम कहां गए ? 29

   जहां तक मैं जानती हूं, तुम एक अति संवेदनशील इंसान थे। भावनाएं तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण थी। और उनकी अभिव्यक्ति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण थी। तुमने अपनी समस्त भावनाओं को मुझसे व्यक्त किया या करना चाहा। शायद यह सोच कर कि मैं उन्हें समझूंगी, या फिर समझने का प्रयत्न करूंगी।     लेकिन मैंने कभी भी प्रत्यक्षत: तुम्हें यह ज्ञात नहीं होने दिया कि मैं किस हद तक और किस ऊंचाई तक तुम्हारी भावनाओं को देखती हूं। उनका सम्मान करती हूं ।      कभी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, और तुमने मुझे बेहद ही प्रैक्टिकल इंसान समझा। बस यहीं भूल कर गए तुम। तो फिर बताओ मुझे खुद से अधिक समझने का दावा करने वाले तुम, हां तुम ! मुझे समझ ही कहां पाए ?      जैसा कि मैं हमेशा भ्रम में रही कि मैं अपनी जिंदगी जी रही हूं, ठीक वैसा ही भ्रम तुमने भी तो अपने मन में मेरे लिए सजों रखा था।      संवेदनाएं आहत हुई, मुखर भावनाएं टूटी, तुम्हारी आंखें सजल हुई और भरी आंखों से तुमने मुझे देखा। और तुम्हें बस मेरी धुंधली सी तस्वीर नजर आई, इतनी कि तुम खुद भी भ्रम में पड़ गए। मुझ...

तुम कहां गए ? 28

    हृदय के मानसरोवर में तुम्हारी मनमोहक पावन प्रांजली मूर्ति स्थापित करने के बाद अब उसी में विसर्जित करने का क्या समय आ गया है, मेरे दोस्त?     कर भी दूं तो कैसे ? फिर इस सुने मन में क्या शेष रह जायेगा ?      मैं नहीं जानती कि इस सृष्टि का अभ्युदय कब हुआ और उसका विनाश कब होगा। लेकिन वे पल मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है जो मैंने तुम्हारे साथ गुजारे या तुम्हारे निकट होते हुए भी तुमसे दूर रहकर।       तुमसे प्रथम मिलन का वह पल मेरे लिए कोई विस्मयकारी नहीं था। मुझे उत्तेजित नहीं कर पाया। और न ही आश्चर्यचकित करने वाला था। हो भी तो क्यों तुम जैसे साधारण व्यक्ति से मिलना विस्मयकारी, उत्तेजक और आश्चर्यचकित करने वाला कैसे हो सकता था भला !!     यह कैसे लिख दूं कि तुमने एक रिश्ते का परित्याग किया जबकि तुमने मुझसे कोई रिश्ता बनाया ही नहीं ; यह भी कैसे लिख दूं कि तुम मेरी नियति थे, मेरे भाग्य में लिखे थे! होते तो आज इतनी दूर कैसे चले जाते । तुमने त्याग किया और मैंने उसे स्वीकार किया। सहर्ष न सही आंखों में आंसू लेकर भी नहीं, लेकिन ...

तुम कहां गए ? 27

    लेकिन शायद उस दिन मैं तुम से अधिक खुद का ही उपहास कर रही होऊंगी। जब तुम ही ना रहोगे, तो फिर मेरी हंसी का क्या अर्थ रह जाता है? मैं तुम्हारी हंसी उड़ा कर तुम्हें विवश देखना चाहती हूं। हां सच कहूं तो मैं तुम्हें अपना जैसा बनते देखना चाहती हूं।      मैं एक आस लेकर एकटक तुम्हें देखते रहना चाहती हूं। और यह भी चाहती हूं कि तुम मुझे उसी तरह उपेक्षित करते रहो जैसा की मैंने कभी तुम्हें किया था, इतना ही विवश ! हां मेरे दोस्त।     तुम चाहकर भी मेरे किसी आस का उत्तर न दे सको, आगे बढ़ कर उसे स्वीकार न कर सको, न ही मुझे तुम गले से लगा सको। तो फिर जरा सोचो मेरे दोस्त, उस वक्त तुम्हारे दिल में क्या गुजरेगी?    बस मैं तुम्हें भी इतना ही विवश देखना  चाहती हूं, एकदम मजबूर। तब शायद उस दिन तुम्हें इस बात का एहसास होगा कि उस वक्त मेरी विवशता क्या रही होगी जब तुम किसी आस से मेरी तरफ देखते थे, और मैं तुम्हें उपेक्षित करने के लिए इतना ही मजबूर थी, जितना की उस वक्त तुम होगे? अब देखो न ! भूत, वर्तमान और भविष्य किस तरह एकाकार हो गए हैं !      हां...

तुम कहां गए 26

    अनंत ब्रह्मांड के विस्तार में यदि पृथ्वी एक कण मात्र है, तो हमारा अस्तित्व? जरा सोचो तो क्या होगा, मेरे दोस्त ? हमारा मन और उसमें उत्पन्न इच्छाएं, कितनी सार्थक और महत्वपूर्ण हो सकती हैं, तब उनका विस्तार क्या होगा?      एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए कितने आयाम पार करने होंगे? मन के इस विस्तार की जटिलता में सार्थकता क्या है? क्या कभी सोचा है तुमने?      मैंने जब भी सोचा, तो मन की सारी आतुरता, व्याकुलता और जटिलता को एक शांत सरोवर की तरह स्थिर पाया। ब्रह्मांड के अनंत विस्तार को एक अदृश्य कण में परिवर्तित होते हुए देखा।     जब मैं दिन भर के काम से फुर्सत होती हूं और तब भी जब अपने आप को थका हुआ महसूस नहीं करती , तब मैं अक्सर इन सब के बारे में सोचती हूं, और चाहती हूं कि मैं सोचते सोचते इतना थक जाऊं कि जब सब कुछ एक बिंदु में समाहित हो जाए तब मैं उसे अपने अंदर महसूस करू। एक छोटा सा बिंदु जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड का यह अनंत विस्तार समाहित है।     हम अपनी कल्पना में एक संभावना की तलाश करते हैं। संभावना ! किसी भी कार्य के ...

तुम कहां गए ? 25

     संबंधों की इतनी घनिष्ठता के बाद रिश्तो का इतना प्लेटोनिक हो जाना गले नहीं उतरा था, बेवजह की बकबक करते हुए तुम्हारा एकदम से यूं खामोश हो जना मुझे अखरने लगा था, मेरे दोस्त।    तभी तो तुम्हे सताने के लिए, तुम्हे ये एहसास दिनाने के लिए कि हां तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते, कोई महत्व नहीं रखते, मैंने भी तुम्हे दुगने भाव से उपेक्षित किया। जबकि वास्तविकता यही थी कि तुम सदैव ही मेरे अंदर ही रहे।     तुम्हारी पावन प्रांजल देवमूर्ति को मैं खुद से कभी अलग और विस्थापित नहीं कर पाई।      तुम मेरे जीवन के वह सूर्य हो जिससे निकली रश्मि किरणें जलकण से विछिन्न होकर सप्तरंगी और अद्भुत आकृत का निर्माण करती हैं, और वह इंद्रधनुष धरती के एक छोर को दूसरे छोर से मिलाता हुआ प्रतीत होता है। तुम मुझसे जब भी टकराते थे, तो यही होता था मेरे दोस्त। मैं अपने अस्तित्व के एक छोर से दूसरे छोर पर आ मिलती थी।      तुम्हारी दृष्टि ही नहीं बल्कि तुम्हारे दृष्टिकोण में भी अपनी विशिष्टता पर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती। यदि तुम पर अपना अविश्वास ज...

तुम कहां गए 24

अश्कों से भरी इन आंखों में, तेरी तस्वीर छुपा रखी है,  मिट ना जाए तू कहीं मेरी यादों से, अश्कों की दीवार बना रखी है। तुम्हें पा लेने की चाहत,  और खो देने का डर,  अपने जीवन में  यही एक,  इबारत लिखा रखी है। अब किसे रखूं मैं अपनी यादों में !! सारी यादें तेरे नाम लिखा रखी हैं। मेरी चाहत की अब ये इंतहा है, अब भी जो तू रूठा रहा तो, तेरी कब्र भी इस दिल में बना रखी है।      जानती हूं भावुकता और जज्बातों के अधीन रहते हुए जिंदगी में लिए गए निर्णय उतने सही नहीं होते हैं जितने कि हम चाहते हैं।        यदि कहूं कि मैं तुम्हें बेहद प्रेम करती हूं, तो इस में यह बात भी अंतर्निहित है कि कभी मैं तुम्हें बेहद प्यार नहीं करती थी।      यदि कहूं कि आज मैं सच कह रही हूं तो इसका एक अर्थ यह भी है कि मैंने कभी तुमसे झूठ भी कहा था। अर्थात प्रत्येक स्वविकार्य तथ्य का एक विरोधाभासी अस्वाविकार्य तथ्य पहले से मौजूद होता है।     कुछ होने या न होने के बीच का अंतर व्यापक होता है। यदि यह कहूं कि मैंने सदैव ही तुम्हें प्रेम किया है तब भी एक...