तुम कहां गए ? - 1
उसका यूं मिलना, मिलकर यूं बिछड़ना, किसी रोमांटिक कहानी की शुरुआत नहीं हो सकती। सितंबर माह की उमस-भरी गर्मी और तीखी धूप भरी दोपहर, और सरे-राह चलते उसका, मुझसे यूँ मिलना। सच, न हवा की नरमी थी, न बादल की रिमझिम, न कोई पुरवाई, न कोई ढलती सांझ का छितिज। न चंद्रमा की श्वेत धवल चंचल चांदनी भरी रात। कुछ भी तो ऐसा नहीं था, जिसे मैं एक रोमांटिक कहानी की शुरुआत कह सकूं। शायद इसलिए कि इस कहानी का अंत भी निचाट गर्मी भरे दिनों की दोपहर की तरह ही होना था। प्रश्न भावुकता का नहीं यथार्थ का था। संयोग भी एक यथार्थ था, और वियोग भी। लेकिन हां, इस मिलन और बिछोह के बीच भावुकता के कुछ पल, हृदय के स्पंदन, भावनाओं का वेग, आवेग, आंसू , दर्द, प्रतीक्षा के कुछ पल है। समंदर से उठती लहरों का साहिल पर आकर यू बिखरना, फिर सिमट कर उसी तरफ लौट जाना, उसी में विलीन हो जाना, सभी कुछ तो नियत के हाथ...