अंतिम सफर

10 अंतिम सफर

फिर हम दोनों चल पड़े। गांव के खेतों के बीच से गुजरती हुई, बगिया से उसके घर तक जाती टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी, जिस पर कभी मैं पीहू के साथ चला और शायद आज आखिरी बार।
दोपहर का समय धूप तेज थी, और लगभग डेढ़ किलोमीटर का फासला था। सूर्य की तपिश, पीछे छूटती हुई बगिया, उस बगिया के किसी कोने में बैठे या काम करते हुए मंगल और कमली। वह पंप हाउस, वो आम का पेड़ जिसकी छांव में मेरी पीहू से पहली मुलाकात हुई थी। उसी बगिया के खट्टे-मीठे अमरूद, गाजर, चुकंदर, अनार, बेर का स्वाद कोई कैसे भूल जाए ? ढेर सारी शराब और सिगरेट के धुएं में लिप्त मेरी आवारगी, ऐसी जिंदगी कैसे एक पल में कोई छोड़ जाए ?
और फिर कभी न भूलने वाले यादगार लम्हों को जहां हमने एक दूसरे के साथ जिया। पूरी ईमानदारी के साथ हमने एक दूसरे से अपने दिल की बातें शेयर की, गले लग एकदूसरे के लिए रोए। ... वो टीन-शेड जहां मेरी मुलाकात उसके उन फैमिली मेंबर्स से हुई जो हमारे बीच न रहे। वो मड़ैया, इसके आसपास हम खूब हंसे, रोए, साथ बैठकर खाना खाया, एक्टिंग की। जहां मैंने चांद सितारों के बीच अपनी रातें गुजारी। ... बेखुदी में मुझे सत्य समझ कर बात करती हुई पीहू के वो लब्ज़, "वो अच्छा इंसान है सत्य... ये पीहू उसे बहुत-बहुत पसंद करती है...", वही बगिया पीछे छूट रही थी।
यादें और न जाने कितनी यादें मेरे मन को बेचैन कर गई। मन भारी हो रहा था, लगा चक्कर आ जाएगा और मैं गिर पड़ूंगा। मैंने जल्दी से पीहू का हाथ पकड़ लिया, "पीहू किसी पेड़ की छांव में रुकते हैं, मुझे बेचैनी हो रही है ...", उसने घबरा कर मेरी तरफ देखा, "उफ़ ! तुम्हें तो बहुत पसीना आ रहा है, आओ कुछ देर इधर बैठते हैं...", उसने खेत की मेढ़ पर लगे बाँस के भीटे की तरफ इशारा करते हुए कहां। 
हम दोनों वहीं जमीन पर बैठ गए। उसने अपनी रुमाल से मेरे माथे और चेहरे के पसीने को पोछा और खुद को गिल्टी महसूस किया, "सॉरी ! मुझे तुम्हें अपने साथ चलने के लिए नहीं कहना चाहिए था.... तुम बाइक से ही चले जाते तो अच्छा रहता..."
मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, "नहीं सच मानो मुझे कोई परेशानी नहीं हो रही है, मैं तो खुद तुम्हारे साथ चलना चाहता था। लेकिन तुमने साथ चलने के लिए क्यों कहा... इसी तरह ख़ामोशी से चलते रहने के लिए ?"
उसने मेरी तरफ देखते हुए जवाब दिया, "नहीं सोचा तो बहुत कुछ था कि यह कहूंगी... वह कहूंगी। यह बात करूंगी... वह बात करूंगी। ... लेकिन पता नहीं क्यों जब भी कोशिश करती हूँ.... आवाज ही नहीं निकलती... उससे पहले आंखें भर आती है...", उसने अपने आंसू छुपाने के लिए चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था। मैंने अपनी हथेली से उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया और आंखों में उभर आए आंसुओं को अपनी उंगलियों से पोंछते हुए मैं भी रो पड़ा... आंखों में आंसू लिए उसकी तरफ देखते हुए, अपने बिखरे जज्बातों को समेटते हुए मैंने कहा...

   हो सके तो ए जिंदगी कुछ आहिस्ता चल,
   हम मनपसंद शख्स के साथ सफर में हैं।

"हां पीहू ! सच कहता हूँ, अब मुझे किसी मंजिल की तलाश नहीं, अब नहीं चलना मुझे किसी सफर में... सारे रास्ते तुम पर आकर खत्म हो गए... दिल कहता है, जिंदगी का यह सफर यहीं ठहर जाए... मैं तुम्हारे साथ बहुत से यादगार लम्हों को अभी जीना चाहता हूँ... मैं लौट कर आऊंगा। लेकिन प्लीज अभी चुप हो जाओ .. जज़्ब कर लो इन आंसुओ को... इनका बोझ में नहीं उठा सकूंगा... खुद को गुनहगार समझ लूंगा..."
उसने सिसकते हुए पूछा, "सच में तुम आओगे न...?"
"मैंने वादा किया है न ? मैं एकबार जरूर आऊंगा लेकिन तुम्हारी शादी के बाद। यहां तक की शादी में भी नहीं। एक और लग्न मंडप में बैठकर सारी रस्में देखने की हिम्मत अब मुझ में नहीं रह गई पीहू...", मैंने अपने आंसू खुद ही पोंछते हुए कहा, "मैं स्वार्थी और खुदगर्ज हो गया हूँ न... अब तुम भी बन जाओ... पर मैं कभी सोचूंगा ...
तू साथ किसी के चलती होगी, 
तो फिर वह कैसे चलता होगा,
अब कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको।
इक साथ तेरे चलने पर खुद को, 
सौ-सौ बार संभलते देखा है।

तुम्हारे साथ जीवन पथ पर चला तो संभल गया, या यूं कहो संभाल लिया तुमने मुझे। मैं यहां से बहुत सारी यादें लेकर जरूर जा रहा हूँ... लेकिन सच मानो टूटकर या बिखरकर नहीं जा रहा हूँ। एक मजबूत इंसान बनकर जा रहा हूँ... अब मेरे अंदर नियति के फैसले को स्वीकार करने की हिम्मत आ गई है। हम दोनों इस धरती के किसी भी कोने में रहे... एक-दूसरे की यादों में तस्वीर बनाकर सदैव जीवित रहेंगे... अब आध्यात्मिक प्रेम को स्वीकार करने और उसे जीने का समय आ गया है... हम किन्हीं भी लम्हों में कमजोर पड़ जाएं.… इससे पहले अब जुदा होना होगा..."
मेरे इतना कहते ही वह एकबार फिर मेरे कंधे पर सर रख रो पड़ी। मैंने उसके और खुद अपनी आंखों के आंसुओं को पोंछा, उसका हाथ मजबूती से थाम उठते हुए बोला, "चलो चलते हैं पीहू... जिंदगी का यह पल... यह सफर... सिर्फ और सिर्फ हम दोनों के नाम..."
कुछ दूर तक हम यूं ही चलते रहे, और चलती रही हमारी खमोशियां। कभी एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा देते... तो कभी हमारी नजरे एक दूसरे की नजरों से मिल कुछ क्षण के लिए ठहर-सी जाती... तो कभी कुछ देर में ही आने वाले जुदाई के लम्हों का ख्याल कर हमारे चेहरे उतर जाते। तो कभी मेरे कदम कुछ लड़खड़ाए, कुछ डगमगाए से जमीन पर पड़ते।
तो कभी "मुझे दुनियां बालों शराबी न समझो... ", "बेखुदी में सनम... उठ गए जो कदम...", "छलकाए जाम...", और "मुझको यारों माफ करना... मैं नशे में हूँ...," जैसे गीतों को मैं गुनगुना उठता। उसने कुछ मुस्कुराते हुए और मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "तुम्हें भी नशा होता है !! तुम्हें तो देवताओं का वरदान प्राप्त है न ?"
मैंने हंसकर कहा, "लौटा दिया यार, कुछ तो लिहाज रखना था तुम्हारी इन नशीली आंखों का ? अच्छा एक चीता सुनो..."
उसने भी हंसकर कहा, "भालू की तरह ?"
"हां...", मैंने भी हंसकर जवाब दिया, "भालू की तरह..."
"तो सुनाओ...?", उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा। 
मुझे अब किसी मंजिल की तलाश नहीं 
ये रास्ते ही बहुत हैं तेरे साथ चलने के लिए।
तू चलता चल साथ मेरे, मेरे हमराही,
तेरे बगैर ये जिंदगी आसां तो नहीं।।
उसने तारीफ करते हुए कहा, "वाह क्या बात है ! मैं भी कुछ कहूं ?"
"क्यों नहीं ... हमारी खुशनसीबी !! ... इरशाद ", मैने उत्सुकता से कहा।
कुछ देर सोचते के बाद उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा ,
इक रहगुज़र हमारी किस्मत को मंजूर नहीं,
यादें ही बहुत हैं तुझे प्यार करने के लिए।
तेरे अश्क मेरे अश्क में अब कोई फर्क नहीं,
एक कतरा ही बहुत है डूब जाने के लिए।

"वाह !! क्या बात है न पीहू ... काश मैने लिखा होता, देखो मैंने कहा था न, कि जब भी तुम कुछ लिखोगी बहुत अच्छा लिखोगी...", मैंने खुले मन से उसकी प्रशंसा करते हुए कहा।
उसने भी मुस्कुराते हुए कहा, "अब हमारे बीच मेरा क्या, तेरा क्या ?" 
मैने कहा, "सही है। यह बताओ, तुम्हारे ये डार्क गोल्डन और कर्ली हेयर शायद तुम्हें अपनी मम्मी से विरासत में मिले हैं न ? मैंने उनकी फोटो उस दिन एल्बम में देखी थी..."
उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बहुत तेज नजर है तुम्हारी। मेरी नानी स्वीडिश थीं। इंडिया ट्रिप में आई थी और मेरे नाना जो कि उन्हें पसंद आ गए, उनसे शादी कर ली। उनका एक ही बच्चा हुआ और वो थीं मेरी मां। मैने बहुत बचपन में उन्हें देखा था। उनके बालों का कलर गोल्डन था। मेरी मां का कुछ चेंज हो के डार्क गोल्डन हो गया और मेरा भी कुछ-कुछ चेंज ही हो गया, अब पता नहीं इस कलर को क्या कहेंगे..."
"ओह ! तो पूरी कहानी ये है... नानी जी तो अभी होंगी न...?", मैंने आतुरता से पूछा था और उसने उतनी ही मायूसी से जवाब दिया, "नहीं... कोई नहीं है, सब गए..."
मैने कुछ अफसोस जाहिर करते हुए कहा, "ओह! सो सॉरी, वैसे इस रंग और स्टाइल के बाल मैने आज तक नहीं देखे। तुम्हारे कर्ली बालों को देख कर मुझे किसी शायर की एक लाइन याद आ गई ... मुझे उसका नाम तो नहीं मलूम ... लेकिन तुम पर फिट बैठती है... काफ़िर हैं जो बंदे नहीं इस लाम के...!"
उसने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे ! हां ये तो मैने भी पढ़ी है, फिराक गोरखपुरी की जीवनी में इसका जिक्र आया था...", फिर उसने पूरा शेर सुनाया,
"लाम के मानिंद हैं गेसू मेरे घनश्याम के,
वे काफ़िर हैं जो बंदे नहीं इस 'लाम' के"
यहां पर लाम का अर्थ है, घुमावदार अर्थात कर्ली। लोग इस लाम को जोड़ के इस्लाम कहते है, और समझते भी हैं। है न ?
मैंने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, "वाह पीहू ! क्या बात है !! इसीलिए तो कहता हूँ कि तुमने सूरत के साथ-साथ सीरत भी खूब पाई है..."
उसने कुछ सकुचाते हुए कहा,  "अब इतनी भी तारीफ मत करो कि मुझे खुद पर ही गुरूर आ जाए..."
तो इसमें बुरा क्या है ? कभी-कभी खुद पर गुरुर करना भी लाज़िमी है। तभी तो हम जैसे तुम्हारे साथ चलने पर खुद को गौरांवित महसूस करेंगे..."
"ये लो... तुम तो उलटी गंगा बहा रहे हो... यहां तो मुझे इस बात का गुरूर है कि तुम जैसा उभरता हुआ राइटर मेरे साथ है..."
मैने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो तो ठीक है... एक दूसरे पर गुरुर करते रहें... एक दूसरे को कंपलीमेंट्स देते रहें... और यूं ही साथ चलते रहे..."
"साथ चलते रहे...", उसने खोए-खोए अंदाज में कहा, "लेकिन कब तक...?"
और मैं चुपचाप उसकी तरफ देखता रह गया। इस सवाल का जवाब तो मेरे पास भी नहीं था। मुझे चुप देखकर उसने पूछा, "अच्छा यह बताओ, तो क्या तुम मुझे इसलिए पसंद करते हो कि मैं खूबसूरत हूँ, पढ़ी लिखी हूँ...?"
"हां भी.. और नहीं भी...", मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
"मतलब ? मैं समझी नहीं... सीधे कहो। ये गोल-गोल क्यूं जवाब दे रहे हो... और कहते हो मै गोल-गोल घूमाती हूँ...", उसका लहजा शिकायती था।
"पसंद करने के लिए सुंदरता, ज्ञान ये सब जरूरी हो सकता है, लेकिन प्यार करने के लिए नहीं। उसके लिए एक अच्छा इंसान होना जरुरी है। व्यक्तित्व में मानवीय संवेदनाओं का विस्तार जरूरी है। मुझे तुम्हारी सहृदयता से प्यार है... तुमने मेरे दर्द को महसूस किया... अपना समझा... ये छोटी बात नहीं..."
"तुम ऐसा क्यूं सोचते हो कि मुझे तुमसे सिर्फ सिंपैथी है ?", उसने शिकायत लहजे में पूछा।
मैने उसे दूसरे ढंग से समझाना चाहा, "नहीं पीहू, मैंने यह नहीं कहा कि तुम्हें मुझसे केवल सिंपैथी है, मेरा मतलब काइंडनेस से है..."
"इसमें अंतर क्या है, एक ही बात तो है...?", उसने कुछ आश्चर्य से पूछा।
मैंने उसे और समझाने की कोशिश करते हुए कहा, "ऊपरी तौर पर देखा जाए तो कोई अंतर नहीं लेकिन एक छोटा सा अंतर होता है। सिंपैथी में दुख या दर्द को महसूस कर उन्हें शब्दों से जताया जाता है, किंतु काइंडनेस में शब्दों से जताने के साथ-साथ उसे दूर करने का प्रयास भी किया जाता है... और फिर कभी-कभी तो शब्दों की भी जरूरत नहीं होती है... यदि ये नहीं... तो प्यार भी नहीं... वो क्या कहते है... हां सच्चा प्यार... और वैसे भी मैं सच्चा प्यार, झूठा प्यार जैसे विचारों को नहीं मानता। यदि प्यार है, तो फिर है। नहीं है, तो फिर नहीं है। अब इसमें सच्चा क्या, झूठा क्या...?"
उसने मेरी कही बात का कोई खंडन या जवाब नहीं दिया। उसे चुप देखकर मैंने ही पूछा, "मेरी पोयम की आखिरी कड़ी सुनोगी...?"
उसने मेरी तरफ देखा, "आखिरी ...?"
"हां, एक दम अंतिम... ये कोई पोयम नहीं एक सवाल है, जिसे मेरा अंतर्मन मुझसे बार-बार पूछेगा..."
"तो सुनाओ... सॉरी पूछो खुद से.…"
"हां पीहू अक्सर मेरा हृदय, मेरा मन, मेरा अंतर्मन मुझसे पूछेगा...
जब नाम तेरा वह लेता होगा,
फिर तुझको कैसा लगता होगा। 
कोई फर्क नहीं पड़ता मुझको ?
कभी...
मेरे इकबार बुलाने पर तुझको, 
सौ-सौ बार पलटते देखा है।

मैंने कहा, उसने सुना, लेकिन चुप रही...
मैने पूछा, "किस सोच में पड़ गई...?"
अचानक उसने संजीदगी से पूछा, "तुमने अपनी पोयम की ये लाइंस क्या सोच कर कही...?"
मैंने सावलिया निगाह से उसकी तरफ देखते हुए पूछा, "तुम्हे न मालूम...?"
"न मालूम... तो बताओ अब...?", उसने कुछ गुस्से से पूछा।
अब मैं चुप था। कुछ देर चुप रहने के बाद मैने हिम्मत कर कहा, "....ये सुनो ! नाराज़ मत हो... मैने तो यूं ही..."
"नाराज़ !! वो भी तुमसे !!! तो सुनो तुम कहना जानते हो और कह देते हो, किसी के मन को लुभाना जानते हो तो लुभा लेते हो... किसी के दिल में उतरना जानते हो तो चुपचाप उतर जाते हो... किसी से दिल की बात कहनी हो तो कभी कविता में या फिर शायरी में कह जाते हो... सभी कलाएं आती है तुम्हें... लेकिन उनका क्या जिन्हें नहीं आती...?  सोचा है..? कभी तो उनकी आवाज बनो...?"
"शायद तुम ठीक कहती हो...सॉरी!",  मैने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
उसने शिकायती लहजे में कहा, "अभी भी, शायद ?"
मैं कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, 
    बिना स्वप्न के भी अब तुम नजर आते हो,
    जैसे चांद पे कोई सूरज नजर आता हो।

उसने पूछा, "अब यह क्या है…?"
"उनके दिल की बात जो कह नहीं पा रहे, शायद...", अंत में उसे चिढ़ाने के लिए शायद शब्द में जोर डालते हुए मैने कहा।। मेरी तरफ देख वह थोड़ा मुस्कुराई थी और फिर जवाब में कहा,
   जो दिल की नजरों से देखा आज तुझे,
   तू किसी आईने-सा मुझे नजर आता है।

"व... वाह !! पीहू, क्या बात है... देखा, बन गई न तुम राइटर... मैं कुछ दिन और रुका तो तुमसे माइलस्टोन लिखवा के ही छोड़ूंगा... अरे हां यार !! वो कविताएं हैं कहां..."
"मेरे पास हैं... बिल्कुल सुरक्षित... अभी उसे दुबारा पढ़ ही नहीं पाई... तुम्ही में उलझी रह गई न... मैं उसे बिल्कुल अकेले में पढूंगी... फिर यदि लगा कि कोई सुधार करना है तो अपने सजेशन के साथ सत्य से ज्ञान भैया के पास भेज दूंगी... सॉरी..."
मैने हंसते हुए कहा, "ये ! कोई बात नहीं... जब मैं दोबारा आऊंगा तब दे देना... कुछ अपनी तरफ से भी लिखना। लेकिन यह बताओ, मेरा रोग कब से पाल लिया... नहीं समझी ? मेरा मतलब सॉरी कहने का ?"
उसने भी हंसते हुए कहा, "रोग नहीं, आदत..."
कौन कहेगा कि गांव की इन टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुजरते हुए दो इंसान चल रहे थे। यहां तो चल रही थीं अनंत संवेदनाएं, अनकही भावनाएं। निष्कपट, छल और प्रपंच से दूर। ऐसी भवनाएं जो अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने पर निःसंकोच क्षमा याचना भी करती और उन्हें सहृदय क्षमादान भी मिलता। 
गांव की इसी सरजमीं पर दो अजनबी मिले। बहुत सारी असमानता लिए हुए ! एक लड़का तो दूसरी लड़की। एक प्यार में लुटा तो दूसरा प्यार की रूमानियत में डूबने को तैयार। एक आने वाले कल से बेफिक्र तो दूसरा भविष्य के सुखद स्वप्न संजोता हुआ। एक जिंदगी को बर्बाद करने पर अमादा, दूसरा उसके साथ अपनी जिंदगी को संवारने की कोशिशों में लगा हुआ। एक नशे में डूबने के लिए तैयार तो दूसरा उसे बचाने के लिए नशे के उसी दरिया में छलांग लगाने को तत्पर। एक अपने सभी वचनों से आजाद मुखर अभिव्यक्ति लिए, तो दूसरा रिश्तों के बंधन और वादों में बंधा हुआ।
इन सब के बावजूद एक समानता जिसने उन दोनों को एकदूसरे से आपस में इस तरह उलझा दिया कि अब चाह कर भी एकदूसरे से सुलझ नहीं सकते। सभी असमानताएं फीकी पड़ गई। साहित्य के प्रति रुचि और उनके बीच भावनाओं का सतत निर्मल प्रवाह जो उन्हें रुलाता भी है, और हंसता भी है। दोनों की अभिरुचि और उससे उत्पन्न एक-दूसरे के प्रति चाहत साम्य के ऐसे बिंदु पर आकर टिक गई, जहां गुरुता का अब कोई मोल नहीं। दोनों के बीच न तो कोई रिश्ता था और न ही होने की कोई संभावना। संवेदनाओं का बंधन और एक दूसरे के प्रति आदर और अटूट विश्वास। 
दुनिया में दो शब्द हैं, कमिटमेंट यानी प्रतिबद्धता और लायल्टी यानी वफा। कभी न कभी जिंदगी इंसान को ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देती है, जहां इनका कोई मोल नहीं रह जाता। अंतर्मन में स्थापित हो चुके एक सत्य के सामने ये शब्द हार जाते हैं, लेकिन फिर भी ये ताउम्र निभाए जाते हैं। इस डर से नहीं की दुनिया क्या कहेगी, बल्कि इस डर से कि कहीं हम स्वयं की नजरों से न गिर जाएं। चाहे इसके लिए हमें अपने आँसूं ही क्यों न पीने पड़े। चाहे किसी को कितना ही याद क्यों न करना पड़े। चाहे उसके लिए हम अंदर ही अंदर तड़पते रहे, रोते रहे। फिर भी हम उन्हें निभाते चले जाएंगे। सीधे और सरल शब्दों में कहें तो कभी-कभी हम जिंदगी में इतनी सारी वफाएं निभाते हैं कि हम स्वयं की ज़िंदगी के प्रति बेवफा हो जाते हैं, और इसकी कीमत कोई और नहीं एक न-एकदिन हम स्वयं चुकाते हैं। 
पीहू कोई नादान लड़की नहीं। यदि वह केवल समझदार, जहीन और मॉडर्न परिवेश में पली-बढ़ी लड़की होती तो अभी का अभी सत्य से सॉरी कह स्वयं के प्रति सारी वफाएं निभा लेती, फिर चाहे उस पर कोई कैसा भी इल्जाम लगाता, वह सब कुछ बर्दाश्त कर एक पल में फैसला ले लेती। आखिर यह उसकी अपनी ज़िंदगी थी, और इसे कैसे और किसके साथ जीना है, यह उसका अधिकार था। लेकिन अपने परिवार से मिले संस्कार उसे स्वयं के प्रति बेवफा हो जाने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
वह अपने हृदय की बाते, मेरे सामने तो कह सकती थी, उसे स्वीकार भी कर सकती थी, लेकिन बाबा और सत्य के सामने नहीं। क्यों ? जवाब कुछ भी हो, तो क्या इसलिए मैं उसे चरित्रहीन मान लेता ? निःसंदेह नहीं और कदापि नहीं। यही तो है रिश्तों के लिए त्याग और देवत्व का अभिशाप, और मैं खुद इस अभिशाप से बरी नहीं। और इसलिए मैंने सिर्फ उससे एक ही वादा किया था, उसकी शादी के बाद एकबार आने का। तब तक उसकी दुनिया बदल चुकी होगी। आज की ये स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी होगी और वह सत्य के साथ, सात वचनों में और मजबूती के साथ बंधी हुई मेरे सामने होगी। 
चलते हुई उसने अचानक ही पूछा,  "सिगरेट पियोगे?"
मुझे आश्चर्य हुआ, "सिंगरेट! और तुम!! लेकिन पैकेट तो बैग के साथ चला गया होगा ?"
"नहीं, आम के पेड़ के नीचे छूट गया था, मैने रख लिया। लेकिन चलते हुए नहीं ...", फिर उसने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा, "वहां बैठकर... आओ..."
हम उसी पोएट्री ट्री की छांव में बैठ गए। पीहू ने अपने प्रकृति प्रदत्त लॉकर से माचिस और सिगरेट का पैकेट निकला। मैंने थोड़ा-सा मजाक किया, "सिगरेट का पैकेट तो ठीक है, लेकिन माचिस वहां नहीं रखनी चाहिए ... तीलियों जल गई होती तो ?"
उसने माचिस की तीली से सिगरेट किसी अगरबत्ती की तरह जलते हुए कहा, "तो क्या होता, एक दिन इस शरीर को जलना तो है ?"
मैने उसे समझाते हुए कहा, "क्या पीहू ! कुछ भी बोलती रहती हो... लेकिन सिगरेट इस तरह नहीं जलेगी, अपने होठों में दबाओ, और कश खींचते हुए जलाओ..."
मेरे बताए अनुसार उसने जैसे ही सिगरेट का कश खींचा और धुआं उसके गले तक पहुंचा उसे खांसी आ गई। मुझे तो 8-10 दिन में सिगरेट पीनी आ गई थी, लेकिन मैं समझ गया कि इसे सिगरेट पीने का कोई तजुर्बा नहीं है। उसने खांसते हुए सिगरेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, "लो..."
मैंने सिगरेट लेते हुए पूछा, "एक बात बताओ पीहू ! तुमने पहले कभी शराब नहीं पी, सिगरेट भी नहीं पी, तो ये सब मेरे साथ क्यों...?"
उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बताया तो था, मैं तुम तक पहुंचना चाहती थी..."
"मुझ तक या मेरे दर्द तक...?"
"एक ही बात है...", उसने सहजता से कहा।
"तो तुम चाहती हो कि मैं यह सब छोड़ दूं ..?", मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा। 
क्या तुम नादान बच्चे हो कि मैं तुम्हें समझाऊं ? वैसे भी छोड़ने या न छोड़ने का फैसला तुम्हारा होना चाहिए... किसी से वादा करोगे तो फिर उसके न रहने पर वह टूट भी सकता है। लेकिन जब खुद से कोई वादा करोगे तो कभी नहीं टूटेगा। वैसे मैं चाहती हूं कि तुम छोड़ दो..."
"तुम्हें बता चुका हूँ कि मैं कोई वादा नहीं करता, लेकिन तुमसे किया... कसम तो नहीं, लेकिन हां मैं इन सब चीजों का कभी आदी नहीं बनूंगा..."
"एक बात बताओ, जब तुम्हारी नजरों में मैं सत्य के साथ कमिटेड थी... तो अपनी फिलिंग्स मेरे साथ शेयर करने की क्या जरूरत थी ? तुम चुपचाप नहीं जा सकते थे ? बोलो ? सत्य ने कहा और तुमने लव लेटर भी लिख दिया...!!"
"तो तुम्हे क्या लगता है कि मैने तुम्हे बहकाया है ? तुम्हारे साथ कोई फरेब किया है ? या फिर तुमसे झूठ कहा है...?"
"काश कि मुझे एहसास होता कि तुम झूठ कह रहे हो या मजाक कर रहे हो...", उसने मेरे हाथ से सिगरेट वापस लेते हुए कहा।
"तो फिर पूछने की वजह... ?"
उसने सिगरेट का एक कश खींचा... उसे फिर से खांसी आ गई। मैंने सिगरेट उसके हाथ से ले बूझकर फेंकते हुए कहा, "छोड़ो न पीहू, इसकी अब कोई जरूरत नहीं तुम मुझसे सीधे-सीधे बात कर सकती हो..."
उसने बात बदलते हुए पूछा, "मान लो कि तुम सत्य के स्थान पर होते और वह तुम्हारे स्थान पर... तो मेरे प्रति तुम्हारी सोच क्या होती ?"
"बस यही सोच कर परेशान हो...? यदि ऐसा होता तो मेरी प्राथमिकता तुम्हारी खुशी होती, मैं चाहता कि तुम मेरे साथ जिंदगी जियो न की गुजारो। हम जिसे प्यार करते हैं, अल्टीमेट उसकी खुशी ही तो चाहते हैं...?"
उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "हां शायद, यदि कोई लड़की तुमसे प्यार करे, कुछ दूर तुम्हारे साथ चले और फिर एक दिन तुमसे कहे कि मुझे तुमसे अधिक कोई और पसंद है, तो क्या यह सही है... ?"
"बिल्कुल सही नहीं है। लालच और स्वार्थ से प्रेरित होकर किसी का साथ छोड़ देना सही नहीं है, बशर्ते आपको उससे कभी प्रेम हुआ हो। बेहतर से बेहतरीन की तलाश कभी खत्म नहीं होती है पीहू। यदि तुमने मेरे और सत्य के संदर्भ में यह बात पूछी है तो पहले तुम खुद से कुछ सवाल पूछो कि क्या सत्य वास्तव में वह इंसान है जिसके साथ तुम जिंदगी जीना चाहती हो ? विवाह न करने के लिए बार-बार उसे मना करने का वास्तविक कारण क्या बाबा का तुमसे कंसल्ट न करना है ? सत्य की हाइट, पर्सनैलिटी, अपीरियंस, सुंदरता मुझसे श्रेष्ठ है। अधिकांश मामले में वह मुझसे कहीं बेहतर है। शायद इसीलिए बाबा के चाहने पर तुमने उसे एक रिश्ते में एक संभावना के साथ स्वीकार भी किया। लेकिन क्या उस संभावना की तलाश पूरी हुई ?"
मैं कुछ देर तक खामोश रही फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "यह सवाल क्यों ?"
मैंने गंभीरता से कहा, "जरूरी हैं पीहू, क्योंकि हम किसी व्यक्ति विशेष से नहीं बल्कि अपनी स्वयं की पसंद से प्यार करते हैं। उसके जीवन में अपने अस्तित्व की तलाश करते हैं। अब मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम दिल से कहना कि इन सभी सवालों के जवाब क्या है ?
कुछ देर सोचते रहने के बाद उसने मुझसे कहा, "  इंसान की सभी फीलिंग हार्मोनिक केमिकल रिएक्शन का परिणाम है, और निर्णय दिमाग लेता है, न कि दिल। उसका काम तो ब्लड सरकुलेशन का है न। फिर भी कहते हो दिल से कहना ? संभव है ?"
मैने उसे समझाते हुए कहा, "मेरी समझ से यह एक प्रतीक है। दिल की बात का अर्थ यह हैं कि जो बात पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ कही जाए, स्वीकार की जाए। अपनी निर्मल और पवित्र भावनाओं को जो लालच और स्वार्थ से परे हो, से व्यक्त की जाए। यदि हमसे कोई कहता है कि मैं तुम्हें हृदय की गहराइयों से प्यार करता हूँ, तो इसका एक ही अर्थ होना चाहिए कि उसका प्रेम स्वार्थ और लालच से परे है... और रही बात हार्मोनिक केमिकल रिएक्शन की... तो मानता हूँ, मुझे इस बात से कोई इनकार नहीं। लेकिन किन फिलिंग्स के लिए और किस स्तर तक, यह महत्वपूर्ण है। सेक्स और अट्रैक्शन के लिए सच पूछो तो यही केमिकल रिएक्शन काम करता है, लेकिन क्या यह स्थाई होता है ? मसलन कोई किसी के साथ कितनी देर तक सेक्स कर सकता है ? कभी न कभी तो वह संतुष्ट के बिंदु तक पहुंचेगा... फिर उसके बाद ? वहीं दूसरी तरफ सोचो तो प्रेम के संतुष्टि की सीमा क्या होगी ? "
वह खामोश थी, मैंने उसे ध्यान से देखा, महसूस हुआ जैसे कि उसके अंतर्मन में कोई द्वंद्व चल रहा है। मुझे उसे इस द्वंद्व से बाहर निकालना होगा। मैने ही बात आगे बढ़ाई, "यदि ईमानदारी से मैं अपनी बात करूं तो मेरा प्रेम जो तुम्हारे प्रति हैं, वह पूर्णत: लालच और स्वार्थ से परे नहीं है। तुम खूबसूरत और जहीन लड़की हो, जिससे मेरी अभिरुचि, सोच और जिंदगी जीने के नजरिए में समानता है। मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम और आकर्षण स्वाभाविक और सहज है। लेकिन एक संभावित रिश्ते में होने के बावजूद जो प्रेम तुम्हारे मन में मेरे लिए है, वह स्वार्थ और किसी भी लालच से परे है। सत्य मेरा कोई दुश्मन नहीं है कि मैं उसका अहित चाहूं। यदि तुम मन से उसे अपना पति मानती हो या मान सकती हो तो फिर तुम्हे  इस रिश्ते को स्वीकार करना चाहिए, फिर चाहे बाबा के लिए तुम्हें अपने प्रेम का ही त्याग क्यों न करना पड़े, करो। लेकिन यही सबसे कठिन काम होता है। किसी से दूरी बना लेने से या उसकी तरफ से मुंह फेर लेने से यादें नहीं मिटती। उसके लिए प्यार नहीं मर जाता है। बस ठहर जाता है, और हम उस मोड़ से आगे बढ़ जाते है। लेकिन हमारे अंतरात्मा से प्रेम की भावना समाप्त नहीं होती है। अंतर्मन को एक ऐसे प्रेम की तलाश सदैव रहेगी जो दुनियादारी से परे हो... जिसे तुम पसंद कर सको...   याद है पीहू, हमारी पहली मुलाकात ? शराब, सिंगरेट और मेरा रूढ़ बिहेवियर। सिर्फ एक ढंग की चीज मेरे हाथ में थी, और वह थी पोयट्री बुक, जो तुम्हें पसंद आई... क्यों ? मैंने एक आशा से उन पेड़ों की थोड़ी बहुत सेवा कर दी जो तुम्हें पसंद आई, क्यों ? मेरी एक ही कहानी तुमने पढ़ी और कुछ कविताएं सुनी जो तुम्हे पसंद आईं, क्यों ?"
वह चुप, प्रश्नवाचक दृष्टि से बराबर मुझे देखे जा रही थी। मैने आगे कहा, "क्या इसलिए कि यह मेरी पसंद हैं ? सच पूछो तो नहीं... बल्कि इसलिए क्योंकि वास्तव में यह तुम्हारी पसंद हैं, इसीलिए मैं मानता हूँ कि इंसान सर्वप्रथम स्वयं की पसंद से प्रेम करता है..."
अचानक ही उसने मुझसे पूछ लिया, "तुम्हें मुझ में क्या पसंद आया ? देखो घूमा-फिरा कर बात मत करना सीधा-सीधा बताना... मैं मजाक में नहीं पूछ रही हूँ ?"
"ठीक है, मैं तुम्हें सीधा-सीधा ही बताता हूं... जब तुम्हे मेरे बारे में और अधिक मालूम पड़ा तो तुमने मेरे दर्द को समझा। जिस लड़के ने कुछ दिन पहले ही अपनी प्रेमिका की शादी हो जानेपर आत्महत्या तक करने की कोशिश की हो उसके लिए करुणा और दया तुम्हारे ह्रदय में जागी। इससे तुम्हारे मन में जिस प्रेम की उत्पत्ति हुई वह निश्चित ही किसी भी लालच और स्वार्थ से परे था। करुणा से भरे हृदय में यदि किसी के लिए प्रेम जागृत होता है तो वह बहारों के मौसम की रूमानियत में डूबे हुए प्रेम से अधिक स्थाई और स्वार्थ-रहित होता है। हम उसके दुःख और संताप को हरने की कोशिश करते है, अपना सर्वस्व त्याग कर उसकी खुशी चाहते हैं, यही तो है प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है। इस तरह हम प्रेम के उस मुकाम पर होते हैं, जहां आज तुम खड़ी हो पीहू ! मेरे लिए अनगिनत त्याग करने के द्वंद से लड़ती हुई...  रिश्ता और प्यार दोनों में फर्क होता है। किसी भी रिश्ते में प्यार और विश्वास का होना बहुत जरूरी है। जिस रिश्ते में यह नहीं रह जाता तो फिर ऐसे रिश्ते केवल निभाए जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो सात जन्मों के कुछ रिश्तों की परिणति डाइवोर्स पेपर में न होती... तुमने दुख सिर्फ जताया नहीं बल्कि मेरे दुख में शामिल हो गई, यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। यही तो सिंपैथी और किंडनेस के बीच का फर्क है..."
उसने कहा, "तुमने भी तो मेरे साथ यही किया..."
"हां पीहू, इसीलिए कहता हूँ हम कहीं से किसी के दोषी नहीं, हमने वही किया जो इंसानियत कहती है। और इस बीच हमें एक दूसरे से लगाव हो गया, प्रेम हो गया, तो क्या गलत हुआ ? लेकिन मैं तुम्हारा दोषी हूँ, और इस बात को मैं तहे दिल से स्वीकार भी करता हूँ। तुमने अभी सच कहा कि मुझे अपनी फिलिंग्स तुम्हारे साथ शेयर करने की जरूरत ही क्या थी ? मै चुपचाप क्यूं न चला गया ? चला जाता पीहू ! यदि मैं भी कोई नादान लड़का होता तो जरूर चला जाता। और फिर मैं जा ही तो रहा था। याद करो उस रात जब ज्ञान आया था। तुम्हारे साथ सीढ़ी से उतरने से लेकर ज्ञान के सामने हाथ जोड़ने तक की सभी बातों पर जब मैंने शांत मन से विचार किया तो मुझे महसूस हुआ कि तुम किस अंतर्द्वंद से गुजर रही हो। मैंने फिर उसी पल निर्णय लिया कि जब प्यार मुझे भी तुमसे है, तो फिर पहल मैं करूं या तुम, बात तो एक ही है न ? तुम्हारी आंखों में, तुम्हारे आचरण में यदि मैंने खुद के लिए प्यार न देखा होता तो शायद तुमसे प्यार होते हुए भी कहना मेरे लिए आसान नहीं होता। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए प्रेम नहीं है, और सच मानो तो किसी क्रम से परे पूरी इंटेंसिटी के साथ है। लेकिन मैंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति तुम्हारे सच्चे, निःस्वार्थ और लालच रहित प्रेम को महसूस करने के बाद ही की है।
मैं जानता हूँ कि मेरी तुम्हारे साथ जिंदगी जीने की लालसा शायद पूरी न हो, फिर भी मेरी यह अभिव्यक्ति तुम्हारे साथ जीवन भर एक सुखद याद बन के रहेगी। जिस लड़के के प्रति तुम्हारे हृदय में करुणा जागी, मन में चाहत जागी, जिसे प्रतिपल तुमने खुश देखना चाहा, उसने भी उतनी ही इंटेंसिटी के साथ तुमसे प्यार किया, तुम्हे चाहा... और इन्हीं यादों के साथ तुम भी सदैव मेरे हृदय में रहोगी... और रही बात पहले प्यार की तो ये सच है कि जिसके लिए हमारे मन में पहली बार इस भावना का जन्म होता है... हम जिसके लिए भी महसूस करते है... उसे कभी नहीं भुल पाते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि फिर हमें किसी से प्यार होता ही नहीं। और एक बात कहता हूँ, मै अपने माता-पिता की इकलौती संतान नहीं हूँ, कि मेरे शादी न करने से उनका वंश समाप्त हो जाएगा, या फिर मेरे ऊपर कोई बहुत बड़ी जिम्मेदारियां है। मैं सबसे छोटा हूँ। मैं सारी उम्र तुम्हारे साथ इसी तरह रह सकता हूँ। बिना किसी बंधन के... बगैर किसी रिश्ते के... लेकिन जो दुनिया मैंने देखी है, वह इस बात कि मुझे इजाजत नहीं देती। यदि मैं तुम्हारे साथ रहा तो हो सकता है एक दिन हमारे बीच की चाहत तुम्हारे और सत्य के रिश्ते को फीका न कर दे और वजह मुझे समझा जाएगा। तीसरे इंसान के रूप में मुझे परिभाषित किया जाएगा। और सच मानो पीहू, यदि प्यार को किसी क्रम में रखना जरूरी है... तो मैं दूसरा इंसान तो बन सकता हूँ... लेकिन किसी और के होते तीसरा इंसान बनना मुझे मंजूर नहीं..."
"मतलब ... ?", उसने आश्चर्य से पूछा।
"तो सुनो पीहू ! यदि थोड़ी देर के लिए मान लो वह लड़की आज भी मेरी ज़िन्दगी में प्रेमिका या पत्नी के रूप में होती, तो शायद इतनी आसानी से तुम मुझसे अपने प्यार को स्वीकार न कर पाती... कहीं न कहीं तुम्हारे मन में आता कि हम दोनों उस लड़की के साथ गलत कर रहे हैं..."
"ये रुको...", उसने मुझे बीच में रोकते हुए संजीदगी  से पूछा, "तो तुमने क्यों किया... क्या तुम्हें गलत नहीं लगा...?"
"नहीं... एक सच तुमने मुझे बताया तो एक सच मैं भी तुम्हे बताता हूँ। अंतर्मन का सच, जहां कोई भी इंसान मुश्किल से पहुंच पाता है। कभी-कभी हम अपने जीवन के बेहतर विकल्प को अपना प्यार समझने की भूल कर लेते हैं, बिना अपने आप को अच्छे से जाने समझे उसके अस्तित्व में खुद की तलाश करते हैं। जहां हम खुद को कभी नहीं पाते। भटकते रहते हैं... हां सच कह रहा हूं, उदाहरण अपना ही लेता हूँ। मैने कहा था न कि निश्छल प्यार को साबित करने के लिए मैने उसके कहने पर भी कभी उसकी सच्ची कसम तक न खाई। डरता था कि कही उसे कुछ हो न जाए। लेकिन हुआ क्या ? उसके अपने ही लोगों ने उसे जीते जी मार डाला। उसके पेरेंट्स ने उसके लिए मुझसे बेहतर विकल्प की तलाश की, न कि उसके प्यार की !! जो काम उसके पेरेंट्स ने किया, सभी-कभी वही काम हम खुद के लिए स्वयं करते हैं...
प्रत्येक रिश्ते का एक दायित्व होता है जिसकी पूर्ति कर्तव्य से की जाती है। इस आदान-प्रदान में एक-दूसरे के प्रति आपस में लगाव या जुड़ाव पैदा होता है, जिसे प्रेम नहीं उसकी परछाईं कह सकते हैं, जो उजाला न रहने पर साथ छोड़ जाती है, और तब बचता है केवल प्रेम का वास्तविक स्वरूप... और वही अंतर्मन में एक विचार के रूप में स्थापित हो जाता है। फिर उस विचार के गेयर में जो भी फिट बैठेगा, उसी से आपको प्रेम होगा... और यही कारण है कि प्रेम को सदैव एक एहसास एक भावना के रूप में चित्रित किया जाता है..
"तो क्या रिश्तो में आपसी समझ और प्रेम का होना जरूरी है, ये जितना होगा उतने ही अच्छे से हम उस रिश्ते को निभा सकते हैं, लेकिन प्रेम के लिए रिश्ते का होना जरूरी नहीं...?"
मैं खामोशी से उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, "हां, बिलकुल यही कहना चाहता हूँ... तुमने किसी के साथ कोई धोखा या फरेब नहीं किया है, और न ही मैने। मुझे और सत्य को आपस में मिक्सअप करने की तुम्हे जरूरत नहीं होनी चाहिए..."
"क्यों...", उसने आश्चर्य से पूछा था।
 मैंने शांत मन से कहा, "यही सवाल कभी खुद तुम स्वयं से पूछना..?"
वह कुछ नाराजगी से बोली, "देखो प्लीज... जाते-जाते मुझे दो-राहें में छोड़कर मत जाओ। खुल कर कहो ?"
"तो फिर एक और सच सुनों... अपने उन सवालों के जवाब सुनों जब तुमने दूसरे दिन इसी बगिया में शाम को पूछे थे। तुम्हे सत्य से प्यार कभी था ही नहीं, और न आज है... या यूं कह लो... कोशिशों के बावजूद भी तुम कर न पाई... ये बात मैने उसी दिन जान ली थी जिस दिन तुमने अटारी में मुझे खाना खिलाया था... अपने और सत्य के बारे में बताया था... और मैने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी आंखों में उसे देख सकता हूँ... अपना रिएक्शन याद करो...? मेरी आंखों में देखते हुए कहा था, बताओ मेरी आंखों में क्या दिखता है... सच कहता हूँ... न तो उस दिन सत्य दिखा... और न ही मैं... भले ही मज़ाक में कहा था कि मैं दिखता हूँ... लेकिन उस दिन तुम्हारी आँखें सूनी-सूनी लगीं... एक प्रतीक्षा... एक इंतजार... किसी एक लम्हों का जो तुम्हें समझ सके...?"
"अच्छा !! तो क्या तुम...", उसने बात अधूरी छोड़ दी।
"हां मैं तुम्हारे जीवन का वही एक लम्हा हूँ... जिसे मेरे यहां आने के पूर्व ही नियति ने स्वप्न के रूप में तुम्हे आभास करा दिया था, और अब तुम्हे उसी एक लम्हे से प्यार हो गया... लेकिन तुम आज भी बाबा के द्वारा स्वीकार किए गए रिश्ते में खुद को सत्य के साथ जोड़ के देखते रहना चाहती हो... जहां तुम खुद को कभी नहीं पाओगी पीहू। मैं तो तुम्हारी जिंदगी में बाद में आया, यदि स्वीकार करना होता तो तुमने सत्य को मेरे आने से पहले ही स्वीकार कर लिया होता। देखो, मैने जो समझा, जो महसूस किया, कह दिया।  तुम्हे हर्ट नहीं करना चाहा... यदि कुछ गलत कह दिया हो तो बुरा मत मानना....सॉरी..."
उसने मेरी तरफ देखते हुए हताश स्वर में कहा, "नहीं, इसकी जरूरत नहीं..."
कुछ देर चुप रहने के बाद उसने मुझसे पूछा, "तो क्या तुमने यह समझ लेने के बाद ही मुझसे कहा कि पीहू तुमसे प्यार है और बेशुमार है..."
"नहीं पीहू ! यदि तुम वास्तव में सत्य की पत्नी होती, या उससे तुम्हे प्यार होता, तब भी कहता। क्योंकि तुम्हारा व्यक्तित्व, तुम्हारा अस्तित्व अलग है। हम सभी का होता है। हां यह हो सकता है कि फिर तुम्हें गले से लगाने में संकोच होता। तुम्हे भी होता ? लेकिन कह तो सकता था न ? और  सच मानो, मैं जरूर कहता... और इस इंटेंसिटी के साथ कहता..."
"और यदि मैं एक्सेप्ट न करती तो...?"
"मैं तुमसे कभी पूछता ही नहीं... बल्कि अपने प्रेम को बस स्वीकार करता...?"
"ये कहानी-कविता, शेर-ओ-शयरी, इन सब का शौक कब से हुआ ?", उसने पूछा।
मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "पहले कोई शौक नहीं था, न लिखने का न पढ़ने का। मैथ्स और साइंस मेरे फेवरेट सब्जेक्ट थे... जैसे तुम्हारी आलमारी में बुक्स हैं न, उसी तरह कुछ बुक्स उसके पास थीं। जब कभी मुलाकात होती, वह मेरे घर आती या कभी मैं उसके घर जाता तो उसके हाथ में कोई न कोई नॉवेल होती। कभी-कभी मुझे भी पढ़ने को दे देती। मैं तो यह सोच के ले लिया करता कि चलो कोई तो उसकी चीज मेरे पास होगी। टीनएज के वो दिन भी क्या दिन थे पीहू। मैं अपनी तन्हाइयों में घंटों उस बुक को अपने सीने से लगाए लेटा रहता। महसूस होता जैसे वह मेरे साथ हैं और मेरे सीने में सर रख मेरे पास लेटी है..."
उसने जिज्ञासा से पूछा, "फिर ...?"
"फिर क्या ... धीरे धीरे पन्ने पलटने लगा ...
उसने मुस्कुराते हुए मेरी बात को मेरे ही अंदाज में पूरा करते हुए कहा, "... फिर धीरे-धीरे पढ़ने भी लगा। महसूस होता जैसे उसकी आंखों को पढ़ रहा हूँ ... है न ?", उसने चुटकी ली।
मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, "वाह ! क्या बात हैं... क्या इमेजिनेशन है...? महसूस होता कि जिन शब्दों को मैं पढ़ रहा हूँ, उसने भी पढ़े होंगे।  जिन पन्नों को मैं पलट रहा हूँ, उन पन्नों को उसने भी छुआ होगा, पलटा होगा। एक अजीब-सी कशिश एक अजीब-सा नशा छा जाता... यू नो व्हाट आई मीन ?"
"या वेरी वेल... वॉव !! व्हाट अ रोमांटिक लव स्टोरी ? अब जब राइटर बन ही गए हो तो अपनी कहानी लिखो न ? मैं तो कहती हूँ, एक मोटी सी नॉवेल लिखो... मैं भी पढूंगी... "
"अरे नहीं यार... वो तो तुम्हे लिखनी है... वैसे यदि कभी लिखूंगा तो पहले अजनबी लिखूंगा..."
"क्यूं...?"
"तुमने वादा जो लिया है... ?"
"वो तो तुम्हे लिखनी पड़ेगी लेकिन पहले अपनी कहानी लिखना उसके बाद अजनबी... पहला हक उसका बनता है..."
"अच्छा !!! बड़े हक की बात कर रही हो...?"
 उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्यूं नहीं करना चाहिए क्या ? मेरा कोई हक नहीं...?"
"क्यों नहीं है, पूरा हक है। लेकिन बात हक की नहीं है, बात दिल टूटने की है। किसी के जज्बातों को ठेस पहुंचाने की है। चलो अपना टूटा तो टूटा। अब मेरे कारण अपनों के अपनों का क्यों टूटे ..?"
"किन अपनों के अपनों की बात कर रहे हो ..?", उसने कुछ अनजान बनते हुए पूछा। 
"देखो यार ! मान लो कि मैंने लिख दी और कहीं वो नॉवेल उसके हसबैंड ने पढ़ ली तो ? और यही बात अजनबी के लिए भी है ? चलो सत्य को तो मैं जानता हूँ। वह भी मुझे जानता है। मानलो उसे काफी हद तक मैं एक्सप्लेन भी कर ले जाऊं, लेकिन कहीं न कहीं उसके दिल को भी ठेस लगेगी पीहू। अब बात रही मेरी कहानी की, तो उसके हसबैंड को तो मैं बिल्कुल भी नहीं जानता न। पता नहीं किस स्वभाव का हो। मुझ पर विश्वास करेगा कि नहीं करेगा... फिर अपनी पत्नी के प्रति उसके मन में क्या धारणा बने ?
"जब तुम समझाओगे तो क्यों नहीं समझेगा ..?"
"नहीं पीहू, रिश्तों में कहीं न कहीं दरार आ ही जाती है। मन न जाने कहां-कहां भटकने लगता है। प्यार रहा होगा तो किस हद तक रहा होगा, कितनी दूर तक रहा होगा। खास कर फिजिकल रिलेशन को ले कर... रहा होगा कि न रहा होगा। और वैसे भी वह मुझसे डायरेक्ट बात थोड़े करेगा,  लेकिन उससे करेगा न ? इसीलिए कहता हूँ एक तरीका है, तुम ऐसा करो, मैं तुम्हें सब कुछ बता देता हूँ, शुरू से लेकर अंत तक। कुछ पोएम्स तो हैं ही, कुछ और लिख लेंगे। नाम, स्थान और पता बदल कर मेरी कहानी तुम लिख दो। एक लेडी राइटर का नाम होने पर किसी को कोई शक भी नहीं होगा, ठीक है...?"
"ठीक है... लेकिन रही बात सब कुछ बताने की तो धीरे-धीरे तो सब कुछ बता चुके हो ...", फिर उसने दोहरे अर्थ में मेरी तरफ देखते हुए आगे कहा, "सच बताओ... कोई और सीक्रेट भी है क्या... हुं ? अब मुझसे कह सकते हो यार, मैं किसी से थोड़े न कहने जाऊंगी...?"
मैंने शरमाते हुए कहा, "तुम भी... ऐसा कोई सीक्रेट नहीं..."
"हां ... अब तो तुम ऐसा ही कहोगे... रहा भी होगा तो कौन-सा तुम बताने वाले हो ? कम से कम मुझे तो नहीं...?"
"अरे यार, तुम हद करती हो... पागल हो क्या... सच कह रहा हूं...", मैंने कुछ गुस्से से कहा।
वह खिलखिला कर हंस पड़ी, "अच्छा-अच्छा नाराज मत हो, मान लिया। मैं तो बस तुम्हे छेड़ रही थी। झूठ कहना होता तो तुम मेरी नजरों में नजरे डाल कर बोलते, यूं न शरमाते। जानने लगी हूँ तुम्हे। लेकिन सच कहते हो, चाहे हसबैंड हो या वाइफ, एतराज केवल फिजिकल रिलेशन को ले कर होता है। मन के घोड़े सिर्फ उसी दिशा में दौड़ते हैं...?"
"शायद इसलिए कि मन के अंदर क्या है कोई झांक कर देख नहीं पाता, या यूं कह लो कोई देखना भी नहीं चाहता, दोनों बातें हैं न। अब हमें चलना चाहिए", मैने उठते हुए कहा, "घर में सभी इंतजार कर रहे होंगे..."
उसने एक आह भरते हुए कहा,  "हां चलेंगे, अभी थोड़ा रुको। बड़ी अजब दुनियां है न। कोई आपके मन को छू ले तो कोई बात नहीं, वो चल जाएगा। लेकिन शरीर छू लिया तो आप दोषी... कलंकित..."
"हम दुनिया को क्यूं इल्जाम दें ? आखिर हम भी तो इसी दुनिया के हैं न !! कोई चांद सितारों से थोड़े न आए हैं..."
उसने आसमान की तरफ देख कुछ उदासी से कहा, "क्या पता यार !! ... शायद वहीं से आए हों... कौन जाने...?"
"ऐसा विचार क्यूं आया...?", मैंने मुस्कुराते हुए पूछा था।
वह खोए-खोए स्वर में बोली, "वो इसलिए कि चार दिनों में कौन किसे इतने अच्छे से समझ सकता है... जो सिंपैथी और काइंडनेस के अंतर को भी समझा जाए ? भाई की तत्वीरा देख कर या फिर अपनी फैमिली को याद कर शोक में डूबी एक लड़की को उसी के हमउम्र का एक अजनबी लड़का सहज भाव से गले लगा खुद रो पड़ा हो ? और उस लड़की ने उसके स्पर्श और उसके इस आचरण का कोई विरोध नहीं किया बल्कि उसे अच्छा लगा। तो फिर कहो वह कितना अजनबी हुआ ?"
हवा के झोंके से उसके चेहरे पर बिखर आए कर्ली और सिल्की जुल्फों को मैने सलीके से हटाया फिर उसकी गहरी बदामी आंखों में देखते हुए कहा, "शायद इसलिए कि तुम स्पर्श की भाषा को अच्छे से समझती हो..."
उसके गालों की गुलाबी आभा बढ़ गई। उसने भी मेरी आंखों में निर्मेष देखते हुए कहा, "तुम मेरी आंखों में ऐसे न देखा करो, और जाते-जाते तो न ही देखो..."
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "क्या करूं मुझे अच्छी लगती है, तो देखता हूँ, यूं ही नहीं कहा था कि इन आंखों में कूद जाने का मन करता है, वह भी बिना सेफ्टी किट के..."
उसने उसी तरह मुझे देखते हुए कहा, "सत्य को मेरी नोज अच्छी लगती है, और तुम्हे मेरी आईस... तो क्या मेरे बॉडी के अदर पार्ट्स फालतू हैं..."
मेरी मुस्कुराहट हंसी में बदल गई, "नहीं हैं..."
"ये तुम हंसे क्यों?"
"इसके लिए मेरे पास एक फिलॉसफी है, मेरा अपना दृष्टिकोण... आंखों के सिवा अदर पार्ट्स जैसे नोज लिप्स, चीक, ब्रेस्ट और भी, इन्हें देखकर सेक्स की भावना जागृत हो सकती है। लेकिन आंखे ? उसमें डूब कर देखो तो मन को एक अजीब-सा सुकून मिलता है। हृदय की धड़कन बढ़ जाती है और उस स्पंदन से वास्तविक प्रेम और करुणा का जन्म होता है..."
"क्या वास्तव में सच्चे प्रेम का जन्म करुणा से होता है... मुझे तुम्हारी यह फिलासफी नहीं समझ में आती ?"
मैने उसे समझाते हुए कहा, "कहा न कि मैं सच्चे प्रेम और झूठे प्रेम जैसे शब्दों पर यकीन नहीं करता। प्रेम या तो होता है या तो नहीं होता है। जो झूठा है वह प्रेम हो नहीं सकता। उदाहरण तुम्हारे सामने कई बार आया फिर भी मन में यह संशय है ? तो फिर याद करो वो एक्ट जो तुमने मेरे साथ किया था। सीन कट होने के बाद भी तुम मुझसे लिपट कर रोती ही जा रही थी... उस पल तो तुम्हें यह भी याद नहीं रहा कि वहां सत्य, मंगल, ज्ञान सभी हैं... क्यूं पीहू ? इसीलिए न कि वो सीन मेरी रियल-लाइफ से संबंधित था। मेरे साथ यह सब घटित हुआ और इस तरह से हुआ... यही सब सोच कर तुम रो रही थी न...? 
"हां, उस एक्ट में जो पोयम थी, उसी को सोच के लिखी थी न..? 
"कौन सी... वो स्वप्न सुंदरी वाली ?"
"हां... तुम एक बार फिर सुनाओ न ?"
"मुझे याद नहीं... सच, लिखने के बाद दोबारा पढ़ी नहीं, अभी बस लिख दी..."
"मैं सुनाऊं... मुझे याद है...?"
"हा सुनाओ...?"
अपनी आंखों में कुछ आंसुओं को समेटे उसने मेरी तरफ देखते हुए वहीं कविता सुनाई...

  स्वप्न सुंदरी बन क्यों, 
  अब छलती है यह माया। 
  जैसे प्रेम, प्रेम न हो,  
  हो जैसे चंदा की छाया। 
  पाकर अतुलित जीवन निधि,
  आह! फिर मैंने तुमको क्यों खोया..." 

कविता के समाप्त होने पर उसने कहा, "काश ये कविता मैने लिखी होती..."
मैंने धीरे से मुस्कुराते हुए पूछा, "मैने तो उसे याद करते हुई लिखी, तुम किसके लिए लिखती ?"
वह खामोश रही। अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर ली।
कुछ देर बाद मैंने ही उससे कहा, "पीहू तुमने समझाया मुझे कि संवेदनाओं को महसूस कर किसी के हृदय के दर्द को अपना बना लेना क्या होता है... और अब नज़रे फेर रही हो...?"
कुछ देर बाद उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखें भरी हुई थी। वह रोती उससे पहले मैंने उसे अपनी बाहों में समेट लिया।
कुछ देर बाद वह खोए-खोए से अंदाज में बोली, "आज तुमने कहा था न कि काश पीहू सत्य के आने से पहले मैं तुम्हारी जिंदगी में आया होता...?"
"हां याद है..."
फिर उसने भी अपनी बाहों में मुझे भरते हुए शांत स्वर में कहा, "अपने मन में चल रहे सभी अंतर्द्वंद से दूर होते हुए, बिल्कुल शांत हृदय से अब मैं जो कहती हूँ तुम सुनो। मैं भी स्वीकार करती हूँ कि काश ऐसा हुआ होता। बल्कि उससे भी पहले की बात कहती हूँ... काश ! तुम्हारे गाँव में मेरी नानी का घर होता... काश ! टीनएज में तुम्हारे गाँव मैं गई होती... काश ! गाँव की उन गलियों में तुमसे मेरी मुलाकात हुई होती... काश ! सितारों से भरे आसमान के नीचे तुम्हे कहानियां मैंने सुनाई होती... काश ! सावन के बरसते हुए पहले दिन तुम्हारे घर मैं गई होती... काश ! उस दिन टॉवल से तुमने मेरे बाल सुखाये होते... काश ! उस दिन सीने से तुमने मुझे लगाया होता... काश ! उस दिन....
आखिरी के शब्द कहते-कहते उसका चेहरा मेरे चेहरे के बिल्कुल सामने आ गया था। पलके झुकी हुई और होठ थरथराते हुए। मैंने कांपती हुई आवाज में उसका नाम पुकारा, "पीहू...!"
उसने धीरे से कहा, "हुं..."
मैंने भी धीरे से कहा, "तुम्हारे चेहरे में शीतल चांदनी की स्थिरता है। तुम्हारे होठों में सूरज की सारी तपिश है... सत्य ने सही कहा था। गंगा नदी का उद्गम तुम्हारे माथे से होता है। तुम्हारे होठों को चूमती हुई तुम्हारे ही दिल में समाती है। जिसकी पवित्रता मुझे तुम्हारे संपूर्ण व्यक्तित्व में दिखाई देती है। मैंने तो मजाक में ही तुम्हें गर्लफ्रेंड कहा था। लेकिन अब देखो, इस शब्द से भी कहीं दूर हम पहुंच चुके हैं। कल जब तुम्हारे साथ मैं मंदिर गया तो मुझे एक अलग ही एहसास हुआ। एहसास हुआ कि जैसे हमारा संबंध सिर्फ इन चार दिनों का नहीं है..."
उसने प्यार से मेरी गालों में हाथ फेरा। फिर मेरी आंखों में देखती हुई बोली, "मत रोओ, तुमने सच कहा, आज महसूस करते हो न ? इस संबंध को हमने नहीं नियति ने निर्धारित किया है। शायद इसीलिए हम दोनों को कहीं न कहीं आभास होता रहा कि हम पहले भी मिल चुके हैं। मैंने तो स्वप्न में दिखी एक परछाई से प्यार किया, जब मैं रोते हुए उसे रोकने की कोशिश कर रही थी। ये संबंध कहीं दूर सितारों की दुनिया में बना और जिसे पूरा करने के लिए तुम उन्हीं सितारों की दुनियां से उतर के मेरे सामने आ खड़े हुए... सत्य का स्वभाव अच्छा है, गुड लुकिंग है, एजुकेटेड है। सही पूछो तो बिल्कुल एक अच्छे हसबैंड की पूरी खूबियां हैं। मुझसे प्यार भी करता है। यही तो बाबा ने सोचा होगा ? तुम भी यही बात कहते हो ? बात-बात में उससे खुद की तुलना करते हो... खुद को उन्नीस और उसे तीस कहते हो... शायद किसी और लड़की के लिए तुम अठहरा भी हो सकते हो, लेकिन मेरे लिए नहीं। जानते हो क्यूं ? क्योंकि तुमने अभी सही कहा है कि इंसान स्वयं की पसंद से प्यार करता है, और तुम मेरी पसंद हो... हर इंसान की अपनी पसंद और नापसंद होती है। तुम्हारे अंदर कुछ ऐसी बात हैं... जो मुझे पसंद हैं, तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ...? तुमने अभी बताया कि तुम्हें भी पहले कहानी, कविताएं, शायरी इनमें कोई इंटरेस्ट नहीं था... तुम्हारे अंदर यह रुचि तब जागी जब वो तुम्हारे जीवन में आई... उसने तुमसे कभी नहीं कहा इन्हें पढ़ने के लिए, बस मिलने पर वह तुम्हें कोई न कोई बुक दे देती थी। धीरे-धीरे तुम उसे पढ़ने लगे। उसने खुद के लिए तुम्हें बदलने की कोशिश नहीं की, बस उसने जताया कि देखो मुझे यह पसंद है, और तुमने उसकी पसंद से भी मोहब्बत कर ली और इस तरह की कि उसकी पसंद आज भी तुम्हारे पास है। यह तुम्हारे व्यक्तित्व की फ्लैक्सिबिलिटी है ? यहां तो लोग स्वयं के अहंकार की दुनियां में जीते है, इसका परित्याग करना हर किसी के बस की बात नहीं !! यहां राधा बनने के लिए कृष्ण रंग में रंगना होता है... और कृष्ण बनने के लिए राधा के रंग जैसा उज्जवल मन धारण करना पड़ता है। इसलिए तुमने सही कहा है कि मैं चाह कर भी सत्य को प्यार नहीं कर पाई...
कविता में सवाल उससे पूछा, "आह ! फिर मैने तुमको क्यूं खोया ?", लेकिन जवाब मेरे पास है... जब तक उसकी पसंद तुम्हारे साथ है... तुम उसे कभी नहीं खो सकते... जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर वह तुम्हें मिलती रहेगी, शायद मेरी तरह...", फिर उसने मेरे गले में अपनी दोनों बाहों की माला पहनाते हुए आद्र कंठ से कहा, "तो सुनो जवाब...
  तुमसे मिलकर चाहा है तुमको, 
  थक शून्य पथ पर चलते-चलते। 
  खुद को खो कर पाया है तुमको, 
  पुलकित जीवन-रस भरते-भरते। 
  चिर शांत अवचेतन मन में, 
  तुम सजीव हृदय वाटिका मेरी। 
  पल्लवित हृदय वाटिका के पुष्पों को, 
  अब मैं तुमको ही अर्पण करती हूँ।

उसने आगे कहा, "मैने उसके बारे में तुमसे जो कुछ भी कहा यदि उसे या तुम्हे बुरा लगा हो तो जीवन में जब कभी उससे मिलो तो मेरी तरफ से सॉरी कहना..."
उसके द्वारा कही गई हर बात में सच्चाई थी। वीणा के तार की दर्द भरी एक ऐसी झंकार जो सीधे मेरे दिल में उतरती गई, और उसकी दर्द में डूबी हर एक सिसकी, हर एक आह, मुझे रुला गई। उस पल मैं सोचने पर विवश हो गया, अपने हृदय की बात कविता में इतनी संजीदा ढंग से पीहू ने मुझसे कैसे कह दी ? इस कविता के प्रत्येक शब्द मेरे अंतस में उतर गए। कुछ देर बाद जब वह शांत हई तो मैने उसके माथे को चूमते हुए कहा, "एक दिन हम न रहेंगे, लेकिन ये प्यार के रास्ते रहेंगे... और रहेंगे हमारी यादों के माइलस्टोन। कुछ कहानियां कभी खत्म नहीं होती... उनकी नियति होती है बस चलते रहना !!... फिर किसी गाँव में दो अजनबी मिलेंगे... किसी पगडंडी पर इसी तरह साथ-साथ चलेंगे... फिर कहीं सितारों भरे आसमान के नीचे एक टीनएजर लड़की अपने टीनएजर बॉयफ्रेंड को कहानी सुनाएगी... फिर कोई बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड से कहेगा, मुझे तुम्हारा जिस्म नहीं तुम चाहिए... इस जीवन में तुम्हारा साथ चाहिए... मैं जिंदगी गुजारना नहीं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ...न होकर भी हम उन लम्हों में रहेंगे। हम तो अभिनय करने वाले लोग हैं न... रहे न रहे, लेकिन ये किरदार हमेशा रहेंगे...चलो अब चलते हैं, घर पर सभी इंतजार कर रहे होंगे... उठो..."
लेकिन वह उसी तरह मेरे कंधे में सर रखे हुए बोली, "तुम्हे शराब और सिगरेट पीते देखा तो कुछ पल के लिए महसूस हुआ कि शायद तुम्हारी ये पसंद है, तो मैने इनसे भी प्यार कर लिया। फिर तुम्हारे हाथ में पोएट्री बुक देखी, तो लगा यह तो मेरी पसंद है। जब हमने एक दूसरे की पसंद से भी मोहब्बत कर ली, तो फिर हम जुदा क्यों हों... बताओ ? "
उसकी निरीह आँखों की बेचैनियों ने मेरे पूरे अस्तित्व को हिला दिया। अब मैं क्या जवाब दूं ? कुछ देर तक मैं उसे यूं ही देखता रहा फिर बड़ी मुश्किल से बोल पाया, "पीहू माइंडस्टोन के लिए कविता सोची थी, तुमसे कहूं...?"
उसने चेहरा उठाकर मेरी आंखों में देखा, फिर भावुक स्वर में बोली, "कभी तुम सत्य की बातें करते हो, कभी माइलस्टोन की बातें करते हो, कभी बाबा की, तो कभी मंगल की; क्या तुम्हें मैं न दिखाई देती ?"
मैंने उसके आँसूं  पोंछते  हुए कहा, "दिखाई देती हो, और सच पूछो बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देती हो। लेकिन मैं क्या करूं पीहू, शायद तुम्हारे इस प्रश्न का जवाब उसी कविता में है..."
"अच्छा तो सुनाओ...", उसने अपना सर फिर से मेरे कंधे में रखते हुए कहा। 
उसकी यह हालत देखकर मेरे भी अंदर ना जाने कहां से इतनी भावुकता आ गई, मैंने कहा, "यदि मैं तुम्हारे साथ मुस्कुराया हूँ, हँसा हूँ, तो सच मानो मैंने तुम्हारी हर बेचैनियों को महसूस किया है...तुम्हारे हर दर्द में मैं भी रोया हूँ पीहू...
वो बेचैन उदासी की रातें तेरी, 
मैं भी तो उन रातों का जागा हूँ।
ख्वाबों कि स्वप्निल दुनिया में तेरी, 
मैं भी तो इन बाहों में सोया हूँ। 
अनजान नहीं था आहों से तेरी, 
तुझसे लिपटकर मैं भी तो रोया हूँ।
खुद्दार अमानत है तू उसकी, 
बेवजह बेवफा नहीं कहलाया हूँ।
प्रेम-अगन का प्रेम-लगन का दोषी बन,
लो फिर तुम्हे अलविदा मैं कहता हूँ।
अंतिम लाइन सुनकर वह एकदम से चौंक उठी। अविश्वास से मेरी तरफ देखते हुए उसकी आंखें खुली की खुली रह गई। बड़ी मुश्किल से उसके मुख से एक ही शब्द निकला, "अलविदा !!..."
उसकी यह हालत देखकर मेरी भी आंखें भर आई, "हां पीहू, अलविदा ! समझ लो, तुम मेरे जीवन की वही रोमांटिक कहानी हो, जिसका अंत आंसुओं से भींगा है, लेकिन जिसके किरदार बिछड़ कर भी एक-दूसरे के अंतर्मन में बसते हैं। रही बात पसंद की तो शराब और सिगरेट मेरी पसंद न तो कभी थे और न ही कभी होंगे। मेरी पसंद तो तुम हो... अब तुम खुद से ही प्यार कर लो, मैं समझूंगा तुमने मुझसे प्यार कर लिया..."
वह गुमसुम-सी कुछ पल तक चुपचाप बैठी रही, फिर उसके होठों में एक फीकी सी मुस्कान आई। उसने कहा, "जो तुमने कहा, वह मान लिया। काश ! कभी मैने तुम्हे शीरी-फरहाद की लव स्टोरी सुनाई होती... नहीं सुना पाई। लेकिन चलती हुई राहों में मैं भी तुमसे एक बात कहती हूँ... तुम कभी भी किसी शीरी के फरहाद मत बनना... सुना न ? मेरी ये बात हमेशा याद रखना... अब चलो... इस अधूरी कहानी को पूरा करते हैं..."
मैने उसका हाथ पकड़ उठते हुए कहा, "पहले न सुनाई तो क्या हुआ.. अब सुना दो न... देखो ये तो मुझे मालूम है... कि शीरी के कहने पर फरहाद ने दूध की नहर निकाल दी... लेकिन इससे अधिक मैं कुछ भी नहीं जानता... प्लीज सुनाओ न ..."
उसने चलते हुए कहा, "नहीं अभी नहीं। बड़ी स्टोरी है न, फिर कभी। अभी तो तुमसे अपनी कहनी है... तुम्हारी सुननी है..."
मैने उलाहना भरे स्वर में कहा, "भगवान न करे तुम जैसी संगदिल गर्लफ्रेंड किसी को मिले... लेडी नॉर्टन की पोयम दोबारा न सुनाई और ये कहानी भी नहीं... छोटे बच्चे की तरह बहला देती हो... तो क्या ये सारे वादे किसी और जन्म में पूरा करोगी...?"
होठों में फीकी मुस्कान लिए वह बोली, "नहीं, जो वादे किए हैं, इसी जन्म में पूरा करूंगी। और रही बात छोटे बच्चे होने की, तो वो तुम हो। मैं रोती हूँ तो तुम भी रो देते हो... मैं हंसती हूँ तो तुम भी हंस देते हो... तो फिर बताओ मुझे... यह तो एक नासमझ छोटा बच्चा ही करता है न...? इसीलिए कहा है कि कभी भी किसी शीरी के फरहाद मत बनना... अब बड़े हो जाओ।"
"ठीक है याद रखूंगा... अब तुम अपनी कहो..."
कुछ पल खामोशी से चलने के बाद उसने पूछा, "सच में ये टी-शर्ट तुम मुझे दे दोगे...?"
"कोई शक है ?...  लेकिन पूछा क्यूं ?"
"कहीं उस दिन के एक्टिंग का रिम्युनिरेशन तो नहीं...?"
"अरे नहीं, उसके लिए तो तुम्हे ऑस्कर मिलना चाहिए... कहीं से लगा ही नहीं कि वह महज एक्टिंग थी... सो नेचुरल...?"
उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "तो क्या तुमने एक्टिंग की थी...?"
मैं भी उसी अंदाज में उसकी तरफ देखते हुए कहा, "मैंने तुमसे पहले भी कहा है कि मैं इतना अच्छा एक्टर नहीं हूँ जो अपने कैरेक्टर के लिए रो सके। जब भी हंसा या रोया तो खुद के लिए... मैंने तुम्हारे साथ कभी कोई एक्टिंग की ही नहीं पीहू, जो भी था या है, सब वास्तविक है..."
"एक बात और पूंछू.…?", उसने बात बदलते हुए कहा।
"कोई खास बात है...?"
"नहीं कोई खास बात नहीं... ये तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए खरीदी है न, ... यदि उन्होंने पूछा... कहां छोड़ आए तो...?"
"तो कहूंगा छोड़ नहीं आया... गिफ्ट कर दिया है... मुझसे अधिक उस पर अच्छी लगती है..."
"यदि उन्होंने पूछा किसे दे कर आए हो... कौन है, तो ?"
"तो कह दूंगा कि पीहू को दे आया..."
"पूछा कि ये पीहू कौन है...?"
"अब तुम ही बता दो क्या कहूंगा...?"
उसने सोचते हुए, कुछ इठलाते हुए और कुछ तिरछी नजरों से मुझे देखते हुए कहा, "उनसे कहना... कहना कि... जिसे तुम पसंद करते हो..."
"कहने को तो कह दूंगा... लेकिन एक प्रॉब्लम है... वो अगले ही दिन यहीं धरना दे देंगी... "
"वो भला क्यूं...?"
"बताया न, ब्रोकन हार्ट हूँ... उन्हें बहू की सख्त जरूरत है...", मैंने हंसते हुए कहा। 
वह भी हंसी, "अच्छा !... तो उन्हें जरूरत है.!!.. तुम्हे नहीं...? और क्या जरूरी है कि मैं उन्हें पसंद आ ही जाऊं ?"
"क्यों नहीं ? तुम में क्या बुराई है ? इंडियन नयन-नक्श, अंग्रेजों की तरह गोरा रंग और स्वीडिश डार्क गोल्डन बाल तो हैं ही। ज्ञान में भी श्रेष्ठ... कुल गोत्र भी श्रेष्ठ। सब मिलाकर इस पृथ्वी लोक की अदभुत सुंदरी, किसे पसंद न आएगी...?"
वह खुश होने का नाटक करते हुए बोली, "वाव ! मैं इतनी सुंदर हूँ ? अच्छा तो ये बताओ... तुम्हें मुझमें सबसे अधिक क्या पसंद है ?... मेरा मतलब मेरी सुंदरता या ज्ञान ?"
मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "अब देखो मुझे उलझाओ मत... एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति न पैदा करो। मैं तुम लड़कियों के स्वभाव को अच्छी तरह से जनता हूँ... फसाती हो..."
"अरे वाह जी ! तो अब यही बात दो... कितनी लड़कियों को जानते हो... और अब तक कितनी लड़कियों ने तुम्हे फसाया है ?"
"अभी तक तो नहीं। हां... पर इतना जरूर जान गया हूं कि अब तुम मुझे फसाने की कोशिश कर रही हो। तो सुनो, उतारो टी-शर्ट... मुझे वापस करो... इतने सारे सवाल इसी की वजह से हो रहे हैं न ...", मैंने खीझने का अभिनय करते हुए कहा।
उसने मुझसे दूर हटते हुए कहा, "भूल कर भी हाथ न लगाना, अब न दूंगी..."
उसकी बात सुन मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया फिर संजीदगी से बोला, "एक बात कहनी थी..."
उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्या..?"
"अपने रूड बिहेवियर के लिए सॉरी... और उन सभी बातों के लिए भी जो शायद मुझे तुमसे नहीं कहनी चाहिए थी... लेकिन कह दी..."
उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा, "तुम सॉरी बहुत बोलते हो... कहा न मत बोला करो। इस तरह से बार-बार सॉरी बोलने पर कही गई बातों का महत्व कम हो जाता है। वे बातें भी जो शायद मुझे बहुत पसंद भी आई हों..."
"अच्छा !!... तो लो अब नहीं कहता... वैसे इतने अच्छे थॉट्स आते कहां से हैं...", मैंने हंसते हुए पूछा। 
उसने ब्रेन की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यहां से... लो घर आ गया... याद है न पीछे से जाना है...?"
"हां, याद है...", फिर मैंने मजाक करते हुए आगे कहा, "पीहू! जो तुमने पैसे दिए थे वो तो सारे खत्म हो गए... यार कुछ और दे दो न ? यही समझ लेना इतने दिनों तक इंटरटेनमेंट किया तुम्हारा, उसी की मजदूरी मांग रहा हूँ...?"
"मजदूरी ! मुझे तो न लगता कि मजदूरी लायक कोई काम किया है तुमने...?", उसने तिरछी नजर से मुझे देखते हुए जवाब दिया। 
"अच्छा जी ! न लगता !! इतनी सारी पोयम सुनाई, कविताएं सुनाई, कहानी सुनाई.... और किस तरह की सेवा रह गई...? देखो अब अपनी बात से मुकरो मत ?", मैंने शिकायती लहजे में कहा। 
"अच्छा ! हिसाब कर रहे हो ?", उसने कुछ नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा।

मैंने लापरवाही से जवाब दिया, "अरे नहीं यार, हिसाब नहीं लगा रहा हूँ, बस याद दिला रहा हूँ... सैलरी वाली बात ?"
अचानक वह चलते हुए रुक गई फिर मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। मेरी आंखों में देखते हुए कुछ पल मौन खड़ी रही। 
बोलने की पहल मैंने ही की, "क्या बात है ? यूं चलते-चलते अचानक रुक मेरी तरफ ऐसे क्यों देख रहे हो...?"
उसके होठों में फीकी-सी मुस्कान आ गई, "नहीं तुम सही कहते हो... तो फिर ठीक है चलो हिसाब करते हैं। लेकिन पहले मेरे उन आंसुओं का हिसाब कर दो जो इन आंखों से बहे हैं तुम्हारे लिए ? उन बेचैनियों का भी कर दो, जो हर पल इस दिल में उठाती रहीं तुम्हें देखने के लिए। मेरी उन बेकरारियों का भी जो तुमसे मिलने के लिए मेरे मन मेरी आत्मा में एक तूफान-सी लाती थीं। मेरी उन अधूरी ख्वाइशों, अधूरी चाहतों का भी कर दो, जिनके पूरे होने का अरमान लिए मैं अब भी तरसती हूँ..? और फिर मैं तुम्हें कोई मजदूरी क्यों दूं, ताकि तुम उसे भी पोएट्री बुक में दबा कर चले जाओ....?"
"ओह ! ... चलो बुरा मत मानो वापस ले लूंगा। वैसे भी मैंने लौटाने के लिए थोड़े न रखा था। बस ज्ञान ने दिया तो रख कर भूल गया...", मैंने बहाना बनाने की कोशिश की। 
"झूठे इंसान !!", फिर वह जोर से हंसी थी, जैसे कोई अर्धविक्षप्त पागल हंसता है। मैं चीखा, "प्लीज... चुप हो जाओ... कोई देखे तो न जाने क्या समझे..."
वह ऊपर असमान की तरफ अपनी उंगली उठाकर उसी तरह हंसते हुए बोली, "उसके अलावा कौन देखेगा... हुं ? लेकिन वो करेगा कुछ नहीं... निर्मोही हैं... पत्थर दिल है... तुम्हारी तरह..."
वह अभी भी उसी तरह हंसती जा रही थी, फिर मैंने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। कुछ देर बाद हम घर के नजदीक नीम के पेड़ के नीचे पहुंचे जिसके तने के चारों तरफ मिट्टी का गोल चबूतरा बना हुआ था। उसने धीरे से मेरा हाथ छोड़ दिया और उसी चबूतरे पर जाकर गुमसुम सी बैठ गई।

घर के नजदीक पहुंचकर उसका इस तरह से बैठ जाना मुझे समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन मैं कर भी क्या सकता था, सिवाय इसके कि मैं भी जाकर उसके बगल में चुपचाप बैठ जाऊं, और मैंने वही किया। 
जब खामोशी कुछ लंबी हो चली तो उसे मैंने ही तोड़ा, "पीहू ! क्या हुआ ? थक गई क्या ?" 
उसने सर झुकाए हुए ही जवाब दिया, "हां..."
"देखो अब तो हम घर के बिल्कुल पास है, चलो उठो..?"
उसने घर की तरफ उचाट दृष्टि डालते हुए कहां, "नहीं... मुझे नहीं जाना घर..."
"क्यों...?"
उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए पूछा, "क्यों !! तुम नहीं जानते क्या ?"
मैं इंकार में अपना सर हिलाते हुए कहा, "नहीं... और यह क्या बच्चों की तरह रूठ कर बैठ गई हो... ज्ञान सही कहता है..."
इस बार उसने थोड़ा सा गुस्से से मेरी तरफ देखा, "हां सच कहते हो... देवताओं का वरदान तो सिर्फ तुम्हे ही मिला है न...?"
मैंने उसे समझाते हुए कहा, "मेरा मतलब वह नहीं है पीहू जो तुम समझ रही हो... देखो हम घर के बिल्कुल नजदीक हैं... जरा सोचो यदि बाबा बाहर आ गए तो क्या होगा... हमारे आचरण से भले ही न लगे लेकिन स्मेल तो आएगी न ? इसीलिए कह रहा हूँ, पागल मत बनो उठो..."
"चलो ठीक है, मैं पागल ही सही लेकिन तुम तो नहीं थे न ?", अपनी नजरे मेरे चेहरे में स्थिर रख वह आगे कह रही थी, "तुमने क्यों रोका... कूद गए न होते मेरे साथ...?"
मैंने आश्चर्य से कहा, "मैने रोका !! रोका तो उस लड़के ने था... मैं तो खुद तुम्हारे साथ था... तुम्हारा हाथ पकड़े हुए..."
मेरी बात पूरी भी न हुई थी कि उसके चेहरे के भाव बदले। आंखों में क्रोध के स्थान पर करुणा जागी। फिर न जाने उसके हृदय में कैसा सैलाब उमड़ा, भावनाओं की न जाने कौन-सी आंधी चली, उसने कस कर मुझे अपनी बाहों में भर लिया। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि एकपल के लिए मुझे महसूस हुआ जैसे उसके हाथ लोहे के बने हो, मैं इतना ही कह सका, "ये क्या पीहू !! छोड़ो कोई देखेगा तो क्या रहेगा..."
उसने रोते हुए कहा, "उफ़ ! यह तुमने क्या किया... आगे मिलने की सभी आशाएं खत्म कर दी... यदि कल हम उस खाई में कूद गए होते तो कम से कम फिर मिलने की आस तो होती... लेकिन अब वह भी खत्म हो गई... ये क्या कर दिया तुमने..."
सच कहूं तो उस दिन मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कह रही थी... और उसके कहने के अर्थ क्या थे। क्षणमात्र के लिए ही सही लेकिन मैंने यही सोचा कि शायद सत्य सही कहता है...अकेलापन और किस्से कहानियों की दुनिया ने पीहू के सामान्य स्वभाव को बदलकर रख दिया है। लेकिन अगले ही पल मुझे अपनी ही सोच पर घृणा हुई। तो क्या मैं पीहू को सिर्फ इतना ही समझ पाया हूँ ? मेरी नज़रें बराबर घर के बंद दरवाजे पर लगी हुई थी। न जाने क्यों मुझे एहसास हुआ जैसे कोई दरवाजे के पीछे से हमें देखने की कोशिश कर रहा है। 
मैंने फिर उसे समझाते हुए कहा, "प्लीज पीहू, चुप हो जाओ... घर चलते हैं न, फिर आराम से बात करेंगे..."
कुछ देर रो लेने के बाद उसने स्वयं को नियंत्रित किया और हम पगडंडी से घूम कर पीछे के अटारी वाले दरवाजे पर पहुंचे। 

पीछे का दरवाजा खुला था... ज्ञान को चटाई पर लेटे अपना इंतजार करते हुए पाया। मैने कहा, "सॉरी यार, देर हो गई न..? सत्य कहां हैं...?"
"नहीं, कोई बात नहीं... कुछ देर पहले यहीं था। शायद बाबा के पास चला गया हो... लो आ गया...", उसने अंदर से आते हुए सत्य की तरफ इशारा करते हुए कहा। आते ही वह मुझसे बोला, "कहा था न, तुम बाइक से आ जाते... पीहू ने तो तुम्हे परेशान कर लिया होगा...", फिर वह पीहू से बोला, "देखो बाबा आराम कर रहे हैं... उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना है... तुम हाथ पैर धो लो फिर खाना निकाल कर यहीं लाते है.…"
पीहू और सत्य ने खाना परोसा। बाबा की नींद में कोई बाधा न पहुंचे इसलिए हम लोग कच्चे घर में ही खाना खाने बैठे। खाना खाते हुए अचानक पीहू ने सत्य से पूछा, "तुम्हें याद है हमारे बर्थडे वाली पूजा और पार्टी, इसी जगह पर कमली और मंगल चाचा के साथ हमने खाना खाया था..."
"हां तो...?", सत्य ने उदासीनता से पूछा। 
इस बार पीहू ने सत्य से कुछ नहीं कहा बल्कि अपनी डायमंड रिंग की तरफ देखते हुए वह बोली, "ज्ञान भैया, आप अच्छे से खाइएगा...जी भर के... कुछ कम पड़े तो बताइएगा, मैं लाऊंगी।... पता नहीं आप मेरी शादी में आयें या न आयें... तो इसे मेरी शादी की ट्रीट समझिए...?"
"क्यों नहीं आऊंगा ? यदि तुम बुलाओगी तो जरूर आऊंगा...?", ज्ञान ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया।
"ये लो...", पीहू जोर से हंसते हुए बोली, "अब बहन को अपनी शादी में भाई को भी बुलाना होगा..."
सत्य ने उसे कुछ डांटे हुए कहा, "कहा न बाबा आराम कर रहे हैं, चुपचाप खाना खाओ..."
कुछ देर बाद लंच समाप्त हुआ और बर्तन समेट लिए गए। ज्ञान ने तय किया कि एक घंटे आराम करने के बाद निकलेंगे। दरवाजा खुला था, ज्ञान वहीं जमीन पर चटाई बिछा के लेट गया। पीहू और सत्य बेडरूम में चले गए और मैं अटारी में आ गया। मेरा बैग टेबल में रखा था। सांसों की डोर पोयट्री बुक उसी तरह अपनी जगह पर रखी हुई थी। मैंने अपनी डायरी से एक पन्ना फाड़कर अधूरी कविता को पूरा लिखा। साथ ही दो लाइन और लिख वापस उसी बुक में दबा दिया... 
   यूं तो पहले भी देखा हैं हमने जुदाई का मंजर,
   पर तुझसे दूर जाने का एहसास कुछ और ही है।

मैने देखा दोनों नोट भी उसी तरह रखे हुए थे। मै चारपाई पर लेट गया। खिड़की खुली हुई थी और बाहर से ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। एक रात मैं इसी अटारी को छोड़कर भागा था, लेकिन आज इसे छोड़ने में इतनी तकलीफ क्यों महसूस हो रही थी ? एक अनजाने दर्द से मैं क्यों गुजर रहा था ? आंख बंद किए हुए मैं सोच रहा था कि लोग सच कहते हैं कि जिंदगी चार दिन की होती है, और शायद वो चार दिन की जिंदगी मैंने जी ली। जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था, मेरे दिल की धड़कनें और मन की बेचैनियाँ बढ़ती जा रही थी। मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था, क्या सचमुच अब मैं यहां से चला जाऊंगा ?  कुछ देर यूं ही लेटे रहने के बाद मैं उठा। बैग से बॉटल और कांच की एक ग्लास निकली और उसे खिड़की में रख उसी के पास खड़ा बाहर देखने लगा। यह घर, इस घर की ये अटारी, यहां की आवो-हवा से जुड़ी हर एक यादें अब मुझे बेचैन कर रही थी। मैने अपनी सोच की दिशा मोड़ने के लिए एक जाम बनाया और उसी तरह बाहर देखते हुए धीरे-धीरे पीता रहा। अब मैं अपने ही अंतर्द्वंद से लड़ रहा था, जाऊं कि न जाऊं ? 
यह दुनिया है मेरे दोस्त, यहां मांगने से कुछ नहीं मिलता। आंसू कमजोरी की निशानी होते हैं। यदि कुछ पाना है, तो पत्थर की तरह कठोर बनकर उसे हासिल करने के लिए निर्णय लेना पड़ता है। सही-गलत, पाप-पुण्य से परे हटकर सोचना पड़ता है। पीहू चाहती है कि मैं रुक जाऊं, सत्य भी चाहता है कि मैं रुक जाऊं... तो फिर दिक्कत किस बात की ? ज्ञान और घर वालों को समझा लेने में कोई कठिनाई नहीं होगी। क्या कोई घर से दूर रहकर सर्विस नहीं करता ?
मुझ जैसा मूर्ख कौन होगा जो पीहू के हृदय की बात जानकर भी अब उससे दूर चला जाए ?  नहीं चाहिए मुझे कोई आध्यात्मिक प्यार। मैं पीहू के साथ एक वास्तविक जिंदगी जीना चाहता था...
सत्य मेरा कोई दुश्मन नहीं और न ही मैं उससे किसी भी रंजिश का बदला लेना चाहता था। मैं तो बस पीहू का होना चाहता था। मैं उसके साथ जिंदगी जीना चाहता था। वह सदैव मेरे पास रहे, मैं उसके पास रहूं, और जैसे सत्य को विश्वास है कि एक न एक दिन पीहू उससे विवाह करने के लिए तैयार हो जाएगी तो उस जैसी आशा मैं क्यों नहीं रख सकता ? मैं ऐसी जिंदगी तो जी चुका हूँ। लेकिन उसका अंजाम ?
बस यहीं पर आकर मेरी सोच ठहर गई। इन सब के बावजूद यदि अंत में विवाह के लिए बाबा ने सत्य को ही चुना तो...? और कौन-सा इतनी आसानी से सत्य पीहू की जिंदगी से दूर चला जाएगा ? 
कुछ देर पहले बगीचे में जब मैने सब कुछ पीहू पर छोड़ दिया, उससे कह दिया कि अब तुम जैसा चाहो मैं वही करूंगा तो उसके बाद उसने एकबार भी रुकने के लिए नहीं कहा, क्यों ? मैं नहीं जानता कि पीहू और सत्य के बीच का प्रेम किस स्तर तक है। प्रेम है भी या नहीं या केवल उसके होने मात्र का भ्रम ? पीहू के अब तक जीवन को ध्यान में रख कर उसके बारे में विचार करूं तो उसका जन्म एक संस्कारी, शिक्षित और सुविधा सम्पन्न परिवार में हुआ। उसे हर रिश्ते विरासत में मिले। मॉडर्न और ट्रेडिशनल सोसाइटी दोनों के बीच उसका जीवन गुजारा। 
बॉम्बे जैसे महानगर में उसे आधुनिक एजुकेशन मिली। निश्चित ही स्कूल-कॉलेज में फ्रेंडशिप सर्किल भी आधुनिक और चमकदार रहा होगा। बड़े पापा और बड़ी मम्मी से पारिवारिक मूल्य और उनके महत्व को समझने का नजरिया मिला। पिता जो एक पब्लिशिंग कंपनी में सब एडिटर के साथ-साथ एक बेहतरीन राइटर भी थे, उनसे किताबों के प्रति अभिरुचि मिली। भारतीय अध्यात्म से प्रेरित हो कर कभी उसकी स्वीडिश नानी ने उसके भारतीय नाना से विवाह किया था। उसकी मां की परवरिश भी कुछ हद तक उसी तरह हुई होगी जैसे की पीहू की। और शायद इसीलिए उसे अपनी मां से रूप सुंदरता के साथ-साथ आधुनिक और व्यापक दृष्टिकोण भी मिला। 
और बाबा से मिले संस्कार। जीवन को अपनी पसंद और उन्मुक्त भाव से जीने का नजरिया। बाबा की पूर्ण सहमति के साथ उसके पापा, बड़े पापा और बड़े भाई तीनों ने अपनी-अपनी पसंद से विवाह किया। जहां तक मैं समझ पा रहा था तो इस परिवार में विचारों के आदान-प्रदान खुले माहौल में जरूर होते रहे होंगे, किंतु विचार एक दूसरे पर थोपे नहीं गए होंगे। निर्णय लेने की स्वतंत्रता और उससे होने वाले किसी भी प्रकार के परिणाम के प्रति पूरे परिवार का एकजुट हो कर खड़े रहना और उसका सामना करना इस परिवार की सबसे बड़ी विशेषता रही होगी। 
और एक दिन सब कुछ समाप्त। उसके जीवन के महत्वपूर्ण रिश्ते पल भर में राख हुए। एक बड़ा भाई, इतनी दूर जो होकर भी नहीं के बराबर है। बचे बाबा और ये घर जहां पर पीहू की पूरी दुनिया सिमट के रह गई। खुले आकाश में उड़ने की अभिलाषा और क्षमता लिया हुआ एक परिंदा पिंजड़े में कैद हो कर रह गया। बेरहम परिस्थितियों ने उसका खुला आसमान छीन लिया। यहां आने पर पहले दिन ही मंगल से पीहू के बारे में मुझे जो जानकारी मिली वह आज के पीहू के ठीक विपरीत थी। लगभग तीन वर्षों से उसका संपूर्ण जीवन और व्यक्तित्व इसी घर में कैद था। वह अपनी बगिया में भी बहुत कम आती-जाती थी। मेरे साथ पीहू का उन्मुक्त भाव से बगिया में समय बिताने पर मंगल को खुद आश्चर्य हुआ था। 
उसके इस अधूरे और कुछ हद तक एकाकी जीवन में सत्य का प्रवेश सूखी धरती पर पहली बरसात की तरह रहा होगा। सत्य की सादगी और उसका आकर्षक व्यक्तित्व शायद उसके मन को भा गया हो। उसे सत्य के रूप में एक अच्छा मित्र मिला, जिससे वह अपने सभी सुख-दुःख बांट सकती थी। सत्य ने भी पीहू की निश्छल भावनाओं का सम्मान किया होगा और उसके रोने पर उसका दिल भी द्रवित हुआ हो ?  उससे मिले सम्मान को पीहू ने कई गुना कर उसे लौटाया। वह किसी सूखती अमरबेल की तरह जीवन प्राप्त करने के लिए उससे लिपटती चली गई। उसने उससे भले ही विवाह नहीं किया लेकिन बाबा की इच्छानुसर उसे अपने जीवन में कुछ शर्तों के आधीन पति का स्थान देने में भी कोई संकोच नहीं किया। 
अब उसी सत्य के पास पीहू के लिए समय नहीं है। शायद उसने पीहू की इच्छा और क्षमता का सही आकलन ही नहीं किया। यदि किया होता तो उसे मालूम पड़ता है कि पीहू का व्यक्तित्व सिर्फ चार-दिवारी में कैद हो जाने का नहीं है। वह उन औरतों में से नहीं है जिनके पति उनसे कहे कि मैं कमा के ला रहा हूं और तुम आराम से घर में बैठकर खाओ, गृहस्थी संभालों और मेरा इंतजार करो।
फिर एक दिन उसकी मुलाकात हम-उम्र एक ऐसे लड़के से हुई जो खुले आसमान के नीचे दोपहर बारह बजे बेपरवाह, एक हाथ में सुलगती सिगरेट और दूसरे हाथ में पोएट्री बुक लिए बैठा है। खाट के सिरहाने में एक अधूरा जाम और व्हिस्की की खुली बॉटल रखी है। उसे आश्चर्य भी हुआ होगा और आविश्वास भी। कैसे उसकी हो उम्र का एक लड़का इस तरह की जिंदगी जी सकता है। प्रथम दृष्टि में उसे उस लड़के में तीन दिन पहले देखे गए स्वप्न की छाया नजर आई, किंतु अगले ही पल उस स्वप्न का अंत सोच कर वह डर गई। एक दिन यह भी मुझे छोड़ कर चला जाएगा।  इसीलिए उसने सत्य से उस लड़के को इस घर से दूर रखने के लिए कहा। जबकि सच यह था कि उसने उस लड़के को इस घर से नहीं अपितु अपने जीवन से दूर रखने की नाकाम कोशिश की। दूसरे दिन जब उसे उसके बारे में कुछ और जानकारी मिली, उसके ज्ञान, दृष्टिकोण और क्षमता का आभास हुआ तो उसे उस लड़के में अपना ही प्रतिरूप नजर आया। 
प्रत्येक जीव सर्वाधिक प्रेम स्वयं से करता है । आज आम के पेड़ या फिर पोयट्री ट्री के नीचे उस लड़के को गले लगा, उसके माथे को चूमकर जो भी उसने कहा, वह वास्तव में स्वयं से ही कहा। उसे पुनः खुद को खुद से मिलाने में वह लड़का तो सिर्फ एक माध्यम बना। अब उसका दूर जाना पीहू को पीहू से ही अलग कर देने जैसा होगा। उसका खुला आसमान, उड़ने की अभिलाषा, इन सब का एक झटके में अंत कर देना होगा। उसकी क्षमता, इच्छा, व्यक्तित्व और सोच को फिर से एक परिधि में कैद कर देने जैसा होगा।
और वह लड़का जो बहुत ही कम उम्र में जीवन के कई पहलुओं को देखते हुए, महसूस करते हुए यहां तक पहुंचा है, उसे भी तो पीहू जैसी दृढ़ मनसिकता का एक मजबूत इंसान चाहिए। उसे भी एक ऐसे  साथी की तलाश है जो इस खुले आसमान में उसके साथ उड़ सके, उसके साथ हंस सके, मुस्कुरा सके और जरूरत पड़ने पर उसे गले से लगा सके। उसके लिए भी पीहू से दूर जाने का अर्थ है खुद से खुद को दूर ले जाना। तो अब ?
यहां ठहरने का एक ही अर्थ है कि धीरे-धीरे पीहू की जिंदगी से सत्य को दूर करना, और यह कार्य किसी को करना नहीं पड़ेगा। यह तो खुद-ब-खुद स्वचालित रूप से होता चला जाएगा। जब इसे रोकने की कोशिश की जाएगी तो कमिटमेंट, लॉयल्टी, एलिगेशन, विक्टिम, एक्यूज्ड, कलपेट इत्यादि शब्दों की भारी भरकम और नई-नई परिभाषाएं दी जाएंगी। एक दूसरे पर आरोप सिद्ध करने के प्रयास किए जाएंगे। 
उफ़ !  तो अब मैं क्या करूं, कहां जाऊं, क्या निर्णय लूं ? आज फिर मैं द्वंद के दोराहे पर खड़ा था जहां फैसला लेना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। हे ईश्वर ! तो क्या पीहू के साथ जिंदगी जीने के लिए मुझे स्वार्थी इंसान बनना पड़ेगा...? मेरे और उसके बीच का संबंध सिर्फ प्रेम का नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा ऊंचाइयों पर स्थापित हो चुका है, और वह है दर्द और आंसुओं का संबंध। जिसमें अब किसी छल, कपट, स्वार्थ, झूठ का कोई स्थान नहीं।
मैने जाम एक झटके में खाली किया। क्या किस्मत पाई है मैने भी। किसी ने अपना बनाकर एक पल में अजनबी बना दिया ... और किसी ने एक अजनबी को इस कदर अपना बना लिया कि फिर से अजनबी बन जाने का अब कोई इरादा नहीं हो रहा था।
प्रिय और मित्र के आलिंगन के भेद मालूम हैं मुझे। मित्र को गले लगाते समय एक लड़की के जिस्म की दूरी क्या होती है, अंदाजा है मझे। वहीं दूसरी तरफ जब वही लड़की अपने प्रिय का आलिंगन करती है तो जिस्म के नजदीकियों का भी अनुभव है मुझे। 
पीहू ने जिस तरह से मुझे अपने गले लगाया था, वह पल मुझे याद है। और सच कहूं तो अच्छी तरह से याद है। जहां मेरे दिल की धडकनों ने उसके दिल की धड़कनों को स्पष्ट सुना था। 
हृदय की बेचैनियां बढ़ती जा रही थी। मैंने दूसरा जाम बनाया। डूबो लेना चाहता था खुद को आज शराब में। सारी भावनाओं को दफन कर देना चाहता था शराब के इस प्याले में। लेकिन इससे हासिल क्या होगा ? क्या दिल की बेचैनियां खत्म हो जाएंगी ? क्या पीहू से जुदा होकर मैं जिंदगी में आगे बढ़ पाऊंगा ? नामुमकिन की हद से भी अधिक नामुमकिन लग रहा था। केवल मोह के बंधन होते तो मैं तोड़ देता, लेकिन ये बंधन तो प्रीत के हैं। इन्हें कैसे तोड़ दूं ? और इससे भी बड़ा सवाल, आखिर क्यों तोड़ दूं ? क्या केवल इसलिए कि वह बाबा के चाहने पर पीहू सत्य के साथ वचनबद्ध है ? तो रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है मुझे ?
जिस आध्यात्मिक प्रेम की शुरुआत पांच वर्ष पहले हो चुकी थी, उसे ही तो आगे बढ़ना था। मैं अपने आप को मन ही मन समझा रहा था। अपने इरादे मजबूत कर रहा था। लेकिन इन आंखों का क्या करूं जो दिल के जज्बातों को आंसुओं में परोस देने के लिए बेताब थीं। मैं खिड़की की छड़ को मजबूती से पकड़े उस पर अपना सर झुका रो पड़ा।
उसकी वो निरीह आंखे और एक सवाल मेरे अंतर्मन में अभी तक गूंज रहा था, ".... जब हमने एक दूसरे की पसंद से भी प्यार कर लिया तो फिर हम जुदा क्यों हों... बताओ ? "
बस उसी क्षण मैंने फैसला लिया। मैं उसके साथ रहूंगा। मैं उसे केवल सत्य के भरोसे छोड़कर नहीं जा सकता। बस मुझे बाबा का साथ चाहिए। मैं आज वापस तो जाऊंगा, लेकिन जल्द ही लौट कर आऊंगा। यहीं पीहू के साथ स्वयं को स्थापित करूंगा। उसके साथ रहूंगा, बिना किसी रिश्ते के... मैने दूसरा पैग एक ही सांस में खाली भी कर दिया।
   .... और रही बात पीहू के रोकने की तो वह और कितनी बार रोके। आखिर प्रत्येक इंसान का स्वाभिमान भी तो होता है। वह तो पहले न जाने कितनी बार कह चुकी है। निर्णय लेने के लिए उसने मुझे स्वतंत्र छोड़ दिया। मुझे अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर उठ कर निर्णय लेना होगा। मुझे खामोशी के साथ सबसे पहले अपने मित्रता के धर्म को निभाना होगा। जिस तरह कल शोक में डूबी पीहू को टीन-शेड की तरफ देखते हुए मैने बिना कुछ बोले गले से लगा लिया और उसके शोक की भावना को आत्मसात कर लिया, ठीक उसी तरह आगे भी करना होगा। बिना कुछ जताए, बिना कुछ बोले, धीरे-धीरे उसे उसकी स्वयं की बनाई हुई इस कैद से बाहर निकलना होगा। केवल और केवल तभी मैं उसके नि:स्वार्थ और सच्चे प्रेम तक पहुंच पाऊंगा। 
अब प्रश्न मेरे या पीहू के बीच प्रेम का रह ही नहीं गया। प्रश्न था उसकी इच्छा की आजादी का, एकबार फिर पीहू को उसे लौटा देने का। खुद को एकत्र कर फिर से नई शुरुआत करने का। भले ही मैं पीहू से कई बार कहा चुका हूँ कि जरूरी नहीं की जीवन में प्यार एक ही बार हो, लेकिन इस तथ्य से मैं अभी भी पूर्ण रूप से कहां मुक्त नहीं हो पाया था। पूर्वनिर्मित मान्यताओं और अवधारणा की कैद में रह कर कर हम किसी से प्रेम कर ही नहीं सकते। प्रेम तो मुक्ति चाहता है। उन्मुक्त भाव से खुला आसमान चाहता है। पहले हम दोनों को अपने ही द्वारा बनाई गई भ्रामिक कैद से मुक्त होना होगा। केवल तभी हम एक दूसरे के अंतर्मन में स्थापित प्रेम तक पहुंच पाएंगे। समय लगेगा, लेकिन यह कोई कठिन कार्य नहीं है, बशर्ते कि हम एक दूसरे के पास और साथ रहे। अब धीरे-धीरे मेरे अंदर एक ऐसे आध्यात्मिक प्रेम का जन्म हो रहा था जो प्रिय से विरक्ति नहीं युक्ति चाहता है। एक ऐसा योग जो उसे सशरीर प्राप्त कर लेने की किसी भी लालसा से मुक्त हो।
अब यह मेरा अंतिम निर्णय था कि यहां से जाने के बाद मैं जल्द ही लौट कर आऊंगा। अब मेरे मन में कोई अन्तर्द्वन्द नहीं था। खुद को बहुत ही रिलैक्स महसूस कर रहा था। वास्तविक पीहू से मिलने की संभावना से ही मन रोमांचित हो उठा। दो रचनाकार एक कलम से इसी यथार्थ की धरातल में अपने स्वप्निल संसार की रचना करेंगे। इसी विचार से मेरी आंखों में खुशी के असंख्य सितारे झिलमिला उठे और प्रत्येक सितारे में एक ही प्रतिबिंब उभर के सामने आ रहा था।
मैने तीसरा लार्ज पैग बनाया कि तभी महसूस हुआ जैसे पीछे कोई खड़ा हो। मैंने समझा ज्ञान होगा, मैने कहा, "तो चले..." 
लेकिन जैसे ही पीछे पलटा तो पीहू को खड़ा पाया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहां, "ये क्या !! तुम रो रहे हो..."
"हां रो रहा हूं लेकिन ये आंसू ख़ुशी के हैं...", मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। 
"खुशी के !!... मुझसे दूर जा रहे हो और आंखों में खुशी के आंसू हैं ?", उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखते हुए पूछा। 
"राइटर हूँ न, जुदाई में भी मिलन की राह निकाल लेता हूँ...", मैंने कुछ मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा।
कुछ पल मुझे देखते रहने के बाद उसने भी कहा, "अच्छा !! लेकिन अभी तो तुम्हे बाबा बुला रहे हैं..."
"हुं... बाबा बुला रहे हैं... लेकिन क्यों ? नहीं मेरा मतलब जाते समय तो मिलने जाऊंगा ही न, इसलिए पूछ रहा हूँ...?", मैंने आश्चर्य से पूछा था।
उसने सर झुकाए हुए जवाब दिया, "मुझे नहीं पता, लेकिन अभी बुलाया है..."
मैंने आगे पूछा, "और उनके पास कौन है...?"
जब मैं आई तो अकेले ही थे।
"तो क्या तुम न चलोगी...?", मैने पूछा था।
"नहीं... शायद बाबा तुमसे अकेले में मिलना चाहते हैं... और देखो, जरा अच्छे से मिलना... लो रुमाल मुंह पोछ लो... बाल बिखरे हैं कंघी कर लो... और परफ्यूम डाल लो... शराब की महक नहीं आनी चाहिए... और बार-बार कह रही हूं कि प्लीज अच्छे से बात करना..."
उसका इतना कहना था कि मुझे कुछ खीझ के साथ-साथ क्रोध भी आ गया, "हां ठीक कहती हो... लेकिन कोई बहुत अच्छी शक्ल सूरत तो मेरी है नहीं, फिर मुंह पोछने से क्या होगा ? बालों में कंघी करने से कोई जेंटलमेन तो बन जाता नहीं ? और शराब तो पी ही ली, तो महक तो आएगी... चाहे कितना ही परफ्यूम क्यों न डाल लूं... और ये अच्छे से बात करने से तुम्हारा क्या मतलब ? क्या मैं पागल इंसान हूं पीहू ? या फिर कुत्ता हूँ कि उन्हें काट खाऊंगा...? और फिर क्यों जाऊं उनसे मिलने ? क्या लगते हैं वह मेरे ? एक मिनट... एक मिनट... कहीं तुम तो शर्मिंदा नहीं हो कि मैं तुम्हारा..."
मेरी इतना कहने पर वह मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। एक हाथ से मेरा बाजू और दूसरे हाथ से मेरे चेहरे को अपने चेहरे के सामने लाते हुए कहां, "ये तुम्हे क्या हो गया... प्लीज!! चुप हो जाओ... देखो मुझे माफ कर दो...जो तुम समझ रहे हो ऐसा कुछ भी नहीं... मैं तो खुद भी हैरान हूँ कि बाबा ने तुम्हें बुलाया क्यों है... प्लीज देखो मेरी तरफ... मुझ पर गुस्सा मत करो..."
मैंने उसकी आंखों में देखा, सच्चाई उसकी आंखों से झलक रही थी। मैंने भी धीरे से कहां, "सॉरी पीहू !!... पता नहीं मुझे क्या हो गया था..."
उसने अपने रुमाल से मेरा चेहरा पोंछते हुए आगे कहा, "रुकना... कंघी कर दूं, बाल सचमुच बिखरे हुए हैं...", फिर उसने दीवाल की रैक से आईना और कंघी उठा ली। आईना मुझे थमाते हुए बोली, "लो जरा पकड़ो इसे... और थोड़ा-सा सर झुकाओ... हां अब ठीक है..."
उसने मेरे बालों में कंघी करते हुए कहा, "बाबा से अच्छे से बात करने के लिए इसलिए कहा कि उन्हें नहीं लगना चाहिए कि तुम रुड हो..."
मैंने थोड़ा-सा हंसते हुए कहा, "ओह!! तो ये बात है... जैसे कि कभी तुम्हे लगा था... है न ?... तो तुम फ़िक्र मत करो... अभी जैसे तुम्हे सजदा किया है न... बाबा के सामने भी सर झुका के बात करूंगा... विश्वास करो मैं उनसे कोई ऐसी बात नहीं कहूंगा जो उन्हें बुरी लगे... आफ्टर ऑल तुम्हारा बॉयफ्रेंड राइटर भी है... इतना अंडरस्टीमेट न करो... और क्या भूल गई मैं वही हूं जिसने कभी बाबा से पार्टी के लिए इजाजत ली थी ?"
फिर मैने खिड़की में रखे जाम को उठाया तभी उसने प्यार से कहा, "नहीं भूली... इसलिए कह रही हूँ अभी नहीं... प्लीज पहले बाबा से...",  इतना कहने के साथ ही उसने बैग से परफ्यूम निकालकर स्प्रे किया।
"चलो ठीक है...", मैने जाम वापस खिड़की में रखते हुए कहा, "प्लीज कहने की जरूरत नहीं पीहू, बल्कि मुझे अच्छा लगा कि तुमने मुझे रोका।... लेकिन यार तैयार तो तुम मुझे ऐसे कर रही हो जैसे बाबा से मैं तुम्हारा हाथ...?"
उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "बताया न, मुझे तो खुद नहीं मालूम... रही बात तुम्हारी, वो तुम ही जानो ?"
मैने उसे चारपाई पर प्यार से बैठाते हुए कहा, "चलो कोई बात नहीं... तुम बैठो आराम से, और ये क्या... मेरे तो बाल संवार दिए और खुद तुम्हारे बिखरे हैं... पकड़ो ये आईना और लाओ दो कंघी इधर..."
"नहीं न... बाबा इंतजार कर रहे होंगे... अभी तुम जाओ... लौटने पर...", उसने मुझे समझाना चाहा।
"ओए मैडम जी !! पल भर में दुनिया बदलती है... लो पकड़ो आईना... बस दो मिनट लगेंगे...", मैने अधिकारपूर्वक कहा।
इस बार उसने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया। एक हाथ से आईना थाम दूसरे हाथ में पकड़ी हुई कंधी मेरी तरफ बढ़ा दी। मैं उसके पीछे ही चारपाई पर घुटने के बल बैठ गया और उसके बाल संवारते हुए धीरे से पुकारा, "पीहू !"
"हुं..."
"तुमने बालों में कभी मशीन या कलर आई मीन...", मैंने संकोच में बात अधूरी छोड़ दी।
"ओह ! तो क्या तुम्हें अभी भी लगता है कि मेरे बाल नेचुरल नहीं हैं...?", उसने कुछ नाराजगी जाहिर करते हुए कहा। 
"नहीं मेरा मतलब ये नहीं... तुम महानगर में रही हो... वहां के कल्चर में परवरिश हुई है, तो मैंने सोचा हो सकता है...", मैंने उसे समझाते हुए कहा।
"ठीक है, वहां के माहौल में पली बढ़ी हूँ। फ्रेंडशिप सर्किल भी वही का ही था, लेकिन मेरी परवरिश मेरे परिवार के बीच हुई... और फिर मैं कलर या मशीन का यूज़ क्यों करूंगी ? मेरे बाल तो खुद सुंदर और कलरफुल हैं... तुम्हें भी तो अच्छे लगते हैं न...?"
"हां बहुत, और जानती हो पीहू, एक बात शायद तुमने भी ध्यान नहीं दी होगी..."
"क्या ?"
मैंने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, "यही कि सूरज की सुबह या शाम की जब सिंदूरी रोशनी तुम्हारे बालों में पीछे से टकराती है न, तो तुम्हारे चेहरे के पीछे इंद्रधनुषी रंग बिखेरती है। यू नो... जैसे किसी देवी के दिव्य चेहरे के पीछे से तेज उजागर होता है। हैपी बैजानी नाला... वाला..."
उसने भी थोड़ा सा मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ भी ? लेकिन अब यह हैपी बैजानी क्या है...?"
मैंने भी हंसते हुए कहा, "अरे यार कुछ नहीं, क्या है न कि कभी इंद्रधनुष के रंगों को रटने का शॉर्टकट तरीका एक टीचर ने बताया था..."
मेरी बात सुनकर उसने भी हंसते हुए कहा, "वॉव, क्या बात है। अच्छा यह बताओ इन चार दिनों के अंदर तुमने मेरे बारे में बहुत कुछ जान लिया। मेरे नॉलेज की तारीफ की, मेरे चेहरे की तारीफ की यहां तक की इन बालों की रही सही खासियत भी अभी बता दी... लेकिन कभी मेरे फीगर की तारीफ नहीं की.. क्यूं ?"
मैंने कुछ शरमाते हुए कहा, "शायद इसलिए कि तारीफ करने की भी एक मर्यादा होती है... पर डॉन्ट वरी वह भी बेहद संतुलित है... वो क्या कहते हैं... चलो छोड़ो.... अच्छा यह बताओ इस सुंदरता और ज्ञान का क्या कभी तुम्हें गुरुर नहीं हुआ...?"
इस बार उसने गंभीरता से कहा, "नहीं ऐसा नहीं है, कभी थोड़ा बहुत मन में आ जाता था... लेकिन अब नहीं रहा... और तुम्हारे सामने तो बिल्कुल भी नहीं..."
मैंने आश्चर्य से पूछा, "मेरे सामने !! वो भला क्यूं... ?"
"माइलस्टोन के लिए लिखी गई तुम्हारी कविताएं पढ़ के..."
"मतलब...?", मैंने पूछा।
"चलो अभी कंघी करो... बाद में बताऊंगी..."
कुछ देर बाद वह बात बदलते हुए बोली, "कलर और मशीन तो कभी यूज़ नहीं किया, वैसे हां कभी-कभी मेहदी लगा लेती हूँ, लेकिन कभी साबुन या शैंपू का यूज़ नहीं करती, उसकी जगह काली मिट्टी में एलोवेरा, आंवले का रस और दो चार बूंद नींबू का रस मिला कर पेस्ट बना लेती हूँ, फिर उसी से धोती हूँ... लेकिन तुमने बताया नहीं कि पूछा क्यूं...?"
"कहा न बस ऐसे ही...  कलर के साथ मुझे इनकी खुशबू भी अच्छी लगी...", मैने कहा।
"और क्या अच्छा लगा...", उसने पूछा।
"जानती हो पीहू ! तुम्हारी ये रेशमी जुल्फें तुम्हारी सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती हैं... बताऊं कैसे ? तो सुनो, क्योंकि इनके घुमाव बिल्कुल कर्ली नहीं हैं... इन्हें देखकर आभास होता है जैसे कि सागर ने सूरज की सारी रोशनी को अपने आंचल में समेट लिया है और उसकी लहरें सुनहरी आभा के साथ लहरा रही है। ऐसा लगता है... जीवन भर तुम्हारे बालों की इस उलझन को यूं ही सुलझता रहूं..."
वह भोलेपन से बोली, "तो रोका किसने है...?"
किंतु मैंने बात की दिशा बदल दी। कुछ संजीदगी और प्यार से बोला, "इन बालों की तरह अपना भी ध्यान रखना... घर के कामों में अपने आप को बहुत मत उलझा लेना... उतना ही करना जितने में तुम्हे थकान न लगे... ज्यादा जरूरी हो तो मंगल और कमली को बुला लेना... और फिर सत्य तो है ही... कुछ उससे भी करवा लेना... अपनी मन-पसंद बुक पढ़ना... हां, यदि मेरे जाने के बाद बाबा तुमसे मेरी शिकायत करे, नाराज़ हों, मेरे शराब पीने के कारण मुझे भला-बुरा कहे तो चुपचाप सुन लेना... पलट कर जवाब मत देना... कल सत्य के साथ शहर जा कर किसी अच्छे डाक्टर से चेकअप कर लेना... कभी कभी छोटी सी बात बाद में बड़ी हो जाती है... मेरे आने से पहले भी तो तुम्हे इसी कारण से बुखार आ गया था न ? तो देखो अपने प्रति कोई लापरवाही मत करना... और दुबारा मरने की बात मत करना और न ही सोचना..."
"और...?", उसने फिर धीरे से पूछा
मैने बालों को सलीके से समेटते हुए धीरे से कहा,  "और कभी-कभी मुझे भी याद कर लेना..."
उसके शरीर में हल्का सा कंपन हुआ, जैसे खुद को रोने से रोकने की कोशिश में हल्की सी हिचकी निकल गई हो। कांपते स्वर में उसने फिर पूछा, "और...?"
उसके पूछने पर ठीक वही हालत मेरी हुई। मेरी भी आवाज कांप गई, "और हां... तुमने ठीक याद दिलाया, सबसे जरूरी बात तो कहना भूल ही गया था... दिनभर के काम-काज से फुर्सत हो के कुछ देर आराम करना... फिर जब उठना तो अपनी पसंदीदा ड्रेस पहनना... यूं ही अपने बाल संवारना... माथे में छोटी सी बिंदी लगाना... थोड़ी सी फेस क्रीम... हल्की सी लिपस्टिक... और अपने होठों में ढेर सारी मुस्कान ले, आइने में खुद को देखना।... मैं भी तुम्हारी ही नजरों से तुम्हे देखूंगा... चाहे मैं जहां भी रहूं। जब कभी मन उदास हो, हृदय में कोई हूक उठे, तो अपनी डायरी में दिल की बातें लिखना या फिर कोई पोयम लिखना... लौट के आया तो सभी पढूंगा... अब मैं जाऊं...?"
लेकिन मैं जैसे ही चारपाई से उठने को हुआ उसने मेरा हाथ पकड़ वापस अपने पास बैठा लिया। फिर अपने हाथ में पकड़े हुए आईने को मेरे चेहरे के सामने करते हुए अपने चेहरे को मेरे चेहरे के नजदीक लाती गई। जब दोनों के चेहरे एक साथ उस आईने में दिखने लगे। कुछ देर तक हम दोनों उसी आईने में एक-दूसरे को देखते रहे, फिर उसकी नजर मेरे चेहरे में आ टिकी।
"ये सुनो...", उसने धीरे से पूछा, "तुम लव मैरिज करोगे या फिर अरेंज ?"
"पता नहीं...", मैंने अनमने ढंग से जवाब दिया, "लेकिन यह सवाल मुझसे क्यों... और फिर लव मैरिज करने के लिए कोई ऐसा इंसान आपकी जिंदगी में होना चाहिए जो आपसे प्यार भी करता हो और शादी भी करने के लिए तैयार हो..."
उसने दूसरा प्रश्न किया, "यदि मान लो तुम्हारी जिंदगी में कोई ऐसा इंसान है जो तुमसे प्यार करता हो, और तुमसे शादी करने के लिए भी तैयार हो, तो ?"
"यदि मैं भी उससे प्यार करता हूँ तो मैं जरूर करूंगा...", मैंने शांत मन से जवाब दिया।
"लेकिन लोग कहते हैं... शादी के बाद प्यार खत्म हो जाता हैं, जिंदगी भर का पछतावा रहता है...?", उसने फिर पूछा। 
"तो फिर मुझे लगता नहीं की दोनों के बीच कभी प्रेम रहा होगा ? रही बात पछतावे कि तो... यह भी तो हो सकता है कि एक सुकून हो कि हम अपने फैसले के साथ हैं... जिससे प्यार करते हैं... वो हमारे साथ है...?"
"क्या तुम्हें पछतावा है कि उस लड़की ने तुमने प्यार किया और फिर तुम्हें छोड़ कर चली गई...?"
"नहीं पछतावा तो नहीं है, लेकिन हां एक शिकायत थी... लेकिन बहुत सोचने के बाद वह भी दूर हो गई...?"
"क्या सोच कर ?"
"यही कि उसके माता-पिता या रिश्तेदारों के प्रति मेरे मन में किसी भी प्रकार की रंजिश या दुर्भावना न जन्म ले.... शायद इसलिए उसने खुद को बुरा साबित किया...?"
"क्या अभी भी उससे प्यार करते हो...?"
"हां..."
"इस बार शायद शब्द का यूज़ नहीं किया...?"
"कोई डाउट होता तो करता... वैसे भी पीहू, मैं मानता हूँ कि इस दुनिया में छल-प्रपंच भी होता है... प्यार में लोग धोखा भी खाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो वफाएं निभाना तो चाहते हैं, लेकिन निभा नहीं पाते। मजबूर हो जाते हैं... कभी अपने प्यार के लिए, तो फिर कभी अपनों के लिए। तो क्या वे हमें भूल जाते हैं, या भुला दिए जाते हैं ? ऐसे लोगों की सुखद स्मृतियां हमारे पास सदैव होती हैं। हम उनसे कभी नफरत कर ही नहीं पाते... जब उससे नफरत नहीं, उसकी सुखद स्मृतियां हमारे पास है, तो उसके प्यार को कैसे भूला जा सकता हैं...? यह तो खुद से झूठ बोलना होगा न ?"
"शादी के बाद अपनी पत्नी को बताओगे...?"
"जरूर, यदि उसने पूछा तो ? यदि नहीं तो मैं ढिंढोरा नहीं पीटूंगा...."
"जानने के बाद यदि कहीं उसने तुम्हे छोड़ दिया तो...?"
"तो उसे रोकने की पूरी कोशिश करूंगा, उसी ईमानदारी और शिद्दत के साथ जैसे कि मैंने किसी को अपनी जिंदगी में शामिल करना चाहा था। समझाने का प्रयास भी करूंगा कि मैं तुम्हारे साथ झूठ बोलकर जिंदगी कैसे जी पाऊंगा.... फिर वह तो गुजारनी जैसी होगी न ?"
और फिर मैने आइने में देखा कि उसका चेहरा मेरे चेहरे के कुछ और नजदीक आया... फिर उसके होठों ने मेरे दाहिने गाल को धीरे से छू लिया। कुछ देर तक वह अपना सर मेरे कंधे में रख उसी तरह गुमसुम बैठी मेरे चेहरे को देखती रही, फिर धीरे से बोली, "लौट के जल्दी आना। अच्छा बताओ, जब आओगे तो मुझसे शादी करोगे...?"
उसकी बात सुनकर मैं चकित था। मैंने उसकी तरफ गौर से देखा। पीहू की आवाज, उसके हृदय की धड़कन, उसकी नजरों से छलकता प्यार, मुझे कहीं से महसूस नहीं हुआ कि यह बात उसने मज़ाक या फ्लर्ट करने के लिए कही है। मैने आश्चर्य से पूछा, "पीहू ! आर यू प्रपोज मी ?"
"हां...",  इसबार उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "करना तो तुम्हे चाहिए था, लेकिन कोई बात नहीं, अब एक्सेप्ट ही कर लो...?"
मैं मन ही मन सोच रहा था, क्या यह वही पीहू है, जिसके मुख से यह सुनने के लिए सत्य तरस गया ? और आज उसने अपने हृदय की बात एक सामान्य से लड़के से कही, जिसने आज तक खुद को उसके काबिल ही न समझा था !!
मैंने शांत मन से कहा, "बिल्कुल... क्यों नहीं। रही बात प्रपोज करने की तो डरता था। सत्य जैसी लड़के को बाबा के स्वीकार करने के बाद भी तुमने हमेशा इनकार किया तो उसके आगे फिर मेरी क्या बिसात थी ?", फिर मैंने भी मुस्कुराते हुए पूछा, "तो इसीलिए मेरा इतना बड़ा इंटरव्यू लिया गया ? लेकिन अचानक ये ख्याल आया कैसे...?"
उसने गंभीरता से कहा, "यह तुम्हारे सवाल का जवाब है ? कोई भी लड़की जो थोड़ा बहुत सुंदर हो, जहीन हो तो उसे अपनी सुंदरता और खूबियों पर गुमान होता है, मुझे भी था। लेकिन आज सोचती हूँ तो पाती हूँ कि इसमें मेरा क्या है ? यह फिजिकल अपीरियंस तो मुझे अपने माता-पिता से मिली, संस्कार अपने परिवार से मिले तो फिर खुद पर गुरुर कैसा...? जो कुछ थोड़ा बहुत गुरूर बचा वह तुम्हारी नजदीकियों ने तोड़ दिया... नहीं यह मत समझना कि मैं तुम्हारी तारीफ कर रही हूँ... पर ये सच है। एक तरह से ये तारीफ खुद की है।... क्योंकि एक समझदार और जहीन लड़की ही तुम्हें पसंद कर सकती है... और वह मैं हूँ, तो हां इस बात पर मैं गुरुर कर सकती हूँ..."
और उसकी बात सुनकर मुझे इसकी सोच पर आश्चर्य हुआ। इसलिए नहीं कि उसने अप्रत्यक्ष रूप से मेरी तारीफ की, बल्कि इसलिए कि उसकी इस सोच ने कितनी सहजता से मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास मुझे वापस लौटा दिया। प्रत्यक्षत: मैंने उससे कहा, "कहते हैं पीहू कि इसान को नियति किए गए कर्मों के अनुसार ही प्रतिफल देती है... यह तुम्हारे पूर्वजन्म के अच्छे कर्म ही है कि तुम्हें ऐसे माता-पिता मिले... इतना अच्छा परिवार मिला। सुंदरता के साथ तुम्हें अच्छे संस्कार मिले... और मुझे तुम्हारा निश्छल प्यार। इस पर मैं भी गुरुर कर सकता हूँ... लेकिन पता नहीं क्यूँ जब तुमने एकदम से मुझे प्रपोज किया तो मुझे डर सा लगा ?"
"डर ? कैसा डर ?", उसने आश्चर्य से पूछा।
"हां पीहू डर, किसी से प्यार करना अलग बात है और शादी करना अलग। एक वैवाहिक संबंध में रिस्पांसिबिलिटी, लॉयल्टी, कमिटमेंट, एडजस्टमेंट ये सभी कुछ तो होता है। लेकिन मैं इनसे डरने की बात नहीं कर रहा हूँ। मुझे तो डर इस बात से लग रहा है कि आगे चलकर तुम्हें अपने इस फैसले पर कहीं रिग्रेट न हो। मान लो जिंदगी के किसी मोड़ पर तुम्हें यह एहसास हुआ कि मैं तुम्हारे काबिल न था और आज लिया गया ये फैसला तुम्हे गलत लगा तो सच कहूं तो फिर मैं जी नहीं पाऊंगा ?"
उसने कुछ देर तक मेरी तरफ ध्यान से देखा। मेरे अंतर्मन को पढ़ने की कोशिश की, उसके बाद शांत मन से बोली, "सच कहते हो तुम, यदि मैंने यह फैसला किसी भावुकता में आकर या जल्दबाजी में लिया होता तो हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं है। मेरा यह फैसला किसी भावुकता के अधीन नहीं। सच कहूं तो मैंने बहुत सोच-समझ कर यह फैसला लिया है। अब तुम पूछ सकते हो कि इन चार दिनों में मैंने तुम्हारे अंदर ऐसा क्या देख लिया, तो एक बात कहती हूँ, रिस्पांसिबिलिटी, लॉयल्टी, कमिटमेंट, एडजस्टमेंट इन सब का एक ही आधार है, वह है प्यार और उस पर विश्वास, जैसे कि ईश्वर के होने या न होने पर होता है..."
"इसका मतलब हमारे बीच कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं होगा न ?"
"यह किसने कह दिया ? एक पत्नी का यह तो पहला अधिकार होता है। जो बात मुझे पसंद नहीं आएगी उस पर तो लडूंगी और सच कहूं तो जी भर के लडूंगी, तैयार रहना ?"
"मैं गुस्सा हो गया या फिर रूठ गया तो ?"
"तो इन चार दिनों की बहुत सारी यादें हैं हमारे पास। किसी एक याद को लेकर यूं ही तुम्हारे कंधे पर सर रखकर तुम्हें याद दिलाऊंगी, फिर से तुम्हारी दोस्त और प्रेमिका बन जाऊंगी... तब तो तुम मान ही जाओगे न ? और यह क्या क्या, तुम मुझसे नहीं लड़ोगे ?"
मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं, कभी नहीं..."
वह भी थोड़ा सा मुस्कुराते हुए बोली, "तो फिर ठीक है तुम्हारे बदले भी मैं ही लड़ लिया करूंगी। अच्छा मेरे मन में एक और लालच है... तुमसे अपनी सेवा चाहती हूँ... देखो अपनी बात से मुकरना मत... पहले कहा है न ?"
"इंकार कब किया, लेकिन ये तो अभी भी कर सकता हूँ... तुम आज्ञा तो दो...", मैंने अपने हाथ जोड़ते हुए उससे कहा।
"नहीं, मैं तो यूं ही कह रही थी...", उसने संकोच से मुस्कुराते हुए कहा।
पता नहीं क्यों उस पल मुझे आभास हुआ की इन चार दिनों में वह काफी थक गई है। उस वक्त उसके मन और शरीर की पूरी थकान चेहरे में दिख रही थी। मैने प्यार से कहा, "तुम लेट जाओ, ये लो तकिया..."
"नहीं... रहने दो। मैंने तो ऐसे ही...", उसने कुछ शरमाते हुए फिर इंकार करना चाहा।
इस बार मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "मन में कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रखनी चाहिए... पूरी न हुई तो फिर पुनर्जन्म लेना पड़ता है, और फिर ये जिंदगी चार दिन की ही तो है... जब भी मौका मिले इसे जी लेना चाहिए..."
फिर उसने मना नहीं किया। मैंने उसके दोनों पांव अपनी गोद मे रख धीरे-धीरे दबाने लगा। उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, "मेरी तरफ देख कर मुझे कोई ऐसी बात बताओ जी आज तक किसी ने न कहो हो, तुमने भी नहीं...?"
मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा। उसका सर तकिया पर था और गालों में उसके बाल बिखरे हुए थे और आंखें मेरी तरफ देखी हुई। मैंने उससे कहा, "आई थिंक तुम दुनिया की पहली लड़की हो जिसके आंखों का और बालों का कलर बादामी है। कम से कम मैंने तो नहीं देखा... और एक बात तुम्हें देखकर मैंने हमेशा महसूस किया जैसे कोई एंजल आसमान से भूले-भटके इस धरती में उतर आई है...लेकिन पीहू, बाबा ने तो तुम्हारे लिए सत्य को पहले से ही... क्या वो मान जाएंगे..?
उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, "पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हारे लौटने का इंतजार करूंगी। जब इस बार तुम आओगे तो हम दोनों ही बाबा से बात करेंगे। तुम अपने घर में भी पूछ लेना..."
"पीहू ! मेरे पैरेंट्स को मेरी खुशी चाहिए। मेरे पिताजी ने भी किसी जमाने में बॉम्बे से ग्रेजुएशन की थी। वो खुले विचारों के हैं, हां मां पुराने विचारों की हैं। लेकिन यदि मैं कहूंगा तो वो भी मान जाएंगी। लेकिन यहां मैं करूंगा क्या ? मेरा मतलब जॉब...?"
"वो सब हो जाएगा... कंप्यूटर साइंस न सही इतनी बड़ी स्कूल तो है, यहां वैसे भी टीचर्स की कमी रहती है। लेकिन तुम्हे सत्य की कंपनी में सर्विस नहीं करने दूंगी। पहले हम साथ-साथ ग्रैजुएशन कंप्लीट करेंगे... फिर पीजी। माइलस्टोन और अजनबी भी तो लिखनी है न ?", उसने मुस्कुराते हुए कहा।
"नहीं भूला, लेकिन मान लो कि यदि किसी कारण से बाबा नहीं माने तो ?"
"देखो बहुत आगे की नहीं सोचते हैं... वैसे भी मुझे सत्य को एक न एक दिन सच बता देना है। हम इंतजार करेंगे, तब तक तुम कुंवारे रहोगे, समझे ?", उसने अपनी निगाहें मेरे चेहरे में स्थिर रखते हुए कहा। उसकी आवाज में गजब का विश्वास झलक रहा था।
"क्यों नहीं ?", मैंने संजीदगी से अपने आप को समेटा और मन ही मन शब्दों का चयन किया, फिर कुछ भारी आवाज़ में बोला, "हे राधे ! किसी युग में तुमने इंतजार किया... इस युग में मैं करूंगा... तुम्हे वचन दिया... जब तक तुम इस धरती में हो... मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा..."
वह कुछ हंसते हुए बोली, "राधे ! वाह !! अब एक्टिंग छोड़ो और ये तो बताओ, क्या उससे भी कभी यही कहा था...?"
"नहीं, सच मानो कभी नहीं कहा। यदि कहा होता तो तुमसे कभी न कहता। दूसरी बात राधे कहने की, तो यह भी गलत नहीं कहा है। अधूरी ख्वाइशों, अधूरी चाहतों का नाम राधे ही होता है...", मैंने उतनी ही संजीदगी से आगे कहा, "रही बात एक्टिंग करने की, तो न... ये एक्टिंग नहीं एक वचन है.और फिर वचन तो वचन होता है न...?"
मैने उसकी हथेली में अपनी हथेली रख उसकी मुठ्ठी धीरे से बंद कर दी, "लो रखो सम्हाल के..."
उसने भी अपनी मुट्ठी बंद करते हुए कहा, "तो सोच लो रख लिया... अब तुम मत भूल जाना ?"
"कदापि नहीं, जो भूला तो हरजाई...", मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा।
कुछ देर बाद उसने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम क्या जानो तुम्हारे आने के तीन दिन पहले से लगातार काम कर रही हूँ, सचमुच थक गई थी... एक बात कहूं तुम्हारे हाथों में जादू है... सारा दर्द, सारी थकान दूर हो गई... काश !! बाबा देख पाते..."
"वो भला क्यूं...?", मैंने आश्चर्य से पूछा।
"इतना भी नहीं समझते, दुनिया के पेरेंट्स यही चाहते है कि उसकी बेटी को तुम जैसा दूल्हा मिले, जो उसकी बेटी के दुःख-तकलीफ को बिना कहे समझ जाए... अच्छा चलो बहुत हो गई मेरी सेवा। अच्छा एक बात पूछूं बुरा तो ना मानोगे ?"
"बिल्कुल नहीं तुम पूछो तो...?"
"हम दोनों में कोई तो समानता तो होगी जो तुम मुझसे प्यार कर बैठे ?"
मैं सिर्फ मुस्कुरा के रह गया, तब उसने आगे पूछा, "क्या बात है कोई जवाब नहीं दिया ?"
मैंने सर झुकाए हुए कहा, "मैं कुछ देर पहले जिस डर की बात कर रहा था, उनमें से एक यह भी है। कहीं इसी बात को लेकर आगे ..."
मेरी बात पूरी होने से पहले ही उसने मुझसे कहा, "नहीं, ऐसा कभी नहीं होगा, जानते हो क्यों ? शायद इसलिए कि अब मैं भी मानती हूँ कि प्रेम का कोई क्रम नहीं होता। वह या तो होता है या फिर नहीं होता। और फिर क्या मैं तुम्हें इतनी नादान दिखती हूँ जो इतना भी न समझ सके कि उससे दूर होकर भी, एक वजह होते हुए भी तुम उससे कभी नफरत न कर सके तो मेरे पास होने पर मुझसे प्यार क्यों न कर सकोगे ? अच्छा चलो समानता न सही, अंतर ही बता दो... मैं बुरा नहीं मानूंगी...?"
"हां वो मैं बता सकता हूँ...", मैने मुस्कुराते हुए कहा...
"वो दर्द भरी दुपहरी थी, तू सुकून भरी शाम है।
वो धीरे-धीरे जलती थी, तू धीरे-धीरे ढलती है।"
"क्या बात है ? आई इंप्रेस्ड, अब जाओ, बाबा इंतजार कर रहे होंगे..."
"अच्छी बात है... लेकिन एक स्वप्न ले कर जा रहा हूँ। इस बार जब लौट कर आऊं तो मेरे बैग में व्हिस्की की बॉटल नहीं बल्कि बाबा की पोती के लिए उसकी पसंदीदा किताबें हों...", 
मैं उठा किंतु सीढ़ियां उतरने से पहले उसकी तरफ देख थोड़ा सा मुस्कुराते हुए बोला, "... तुम कहीं जाना मत, रुकना यही, लौटकर तुमसे एक जरूरी बात कहनी है..."
"जी, हम आपका बेसब्री से इंतजार करेंगे...', उसने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया। 
मैंने आश्चर्य से पूछा, "आप !! ये संबोधन कैसे बदल गया ?"
"अब तो कहने की आदत डालनी पड़ेगा न...", उसने कुछ शरमाते हए जवाब दिया।
"तुमसे 11 महीने बड़ा हूँ, इसलिए...?"
"नहीं, यही मानना होता तो कभी तुम कहती ही नहीं... अभी भी नहीं समझे ?"
मैंने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, "नहीं तो...?"
"बुद्धू कहीं के...", इस बार उसकी आवाज में शोखी थी।
"हां वो तो मैं हूँ... रुकना लौट के आता हूँ तो विस्तार से समझा देना, तुम तो इंटेलीजेंट हो न ? मैं जस्ट अभी आता हूँ...", अंत में मैंने चुटकी बजाते हुए कहा, "यूं...गया और... यूं आया..."
लगभग पंद्रह-बीस मिनट बाद जब मैं लौट कर आया तो उसे खिड़की के पास खड़े हुए पाया। उसके चेहरे में बेचैनियां साफ झलक रही थीं। मुझे देखते ही उसने आतुरता से पूछा, "क्यों बुलाया था बाबा ने तुम्हें ? क्या सत्य भी था ? ",  फिर उसने जवाब भी स्वयं ही दिया, "नहीं रहा होगा ... उसे तो मैं बेडरूम में सोते हुए छोड़ कर आई थी... ज्ञान भैया भी नीचे ही सो रहे है... तो तुम बाबा से बिल्कुल अकेले मिले ? बताया नहीं क्या कहा बाबा ने...?"
पहले मैंने अपने आप को सामान्य किया फिर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "कोई खास बात नहीं, बस समझाया कि शराब पीना छोड़ दूं... और डांटा भी कि मैं इतना लापरवाह क्यों हूँ... मुझे अपनी जॉब और पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। अपने पेरेंट्स के बारे में सोचना चाहिए। उनकी कुछ आशाएं हैं, जिन्हें मुझे ही पूरा करना होगा। बस यही समझ लो मुझे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व के प्रति सजग किया है।... चलो अब बैग में समान अच्छे से रख लूं..."
"फिर तुमने क्या कहा...?", उसने उत्सुकता से पूछा।
 "मैन ?..... मैने भी कह दिया... शराब क्यूं छोड़ूं... मेरी जिंदगी... मेरे फैसले... वैसे भी किसी आदत को छोड़ना आसान होता है क्या.. तुम्ही कहो...?", मैने लापरवाही दिखाते हुए जवाब दिया।
उसने आश्चर्य से मुझे देखा, "तुमने ऐसा कहा... मैं नहीं मान सकती...?"
"सच में कहा...", मै उसकी आंखों में देखते हुए बोला। मेरी बात सुनकर वह खमोश हो गई।
कुछ देर बाद फिर उसने आतुरता से पूछा, "तुम मुझसे कुछ जरूरी बात कहना चाहते थे न... तो कहो...?"
मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, "बात करना चाहता था... मैं ?"
"हां तुम !!... जाते हुए तो मुझसे कह कर गए थे न...?", मेरी बात सुनकर उसे भी आश्चर्य हुआ था।
मैंने याद करने की कोशिश का अभिनय करते हुए कहा, "तुमसे कह कर गया था ? क्या बात करना चाहा होगा ?... अरे छोड़ो यार, मुझे तो कुछ याद ही नहीं आ रहा है... वाकई यह शराब बहुत बुरी चीज होती है। अब देखो तो, धीरे-धीरे मेरी याददाश्त भी जाती जा रही है... सॉरी..."
मैंने बैग में समान रखना शुरू किया। उसने कुछ देर तक मेरे जवाब की प्रतीक्षा की लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उसने एक गर्लफ्रेंड की तरह ही समझना शुरू किया "अच्छे से रहना, अपना ध्यान रखना, कभी उदास मत होना और हां देवदास बनने की तो सोचना मत...", फिर धीरे से उसने कहा, "जाते समय मेरे सामने मत आना, न ही मुझसे मिलने की कोशिश करना... मैं तुम्हें जाते हुए नहीं देख पाऊंगी..."
"क्यों... ये कैसी बात हुई ? ऐसा नहीं होगा...", मैने विरोध जताया,  "मेरी तरफ देखो पीहू ! और बताओ मुझे, क्या प्यार जीवन में एक ही बार होता है...?"
"नहीं जानती...", उसकी आवाज के साथ उसका शरीर भी धीरे से कांप गया। वह मेरे पास से उठ पुनः खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
मैं उसे देखते हुए आगे बोला, "मैं पूछना चाहता था कि दूसरी बार क्यों नहीं हो सकता ?"
"नहीं जानती...", वह लगभग रोते हुए बोली।
"मैंने तुमसे कहा था न कि जाने से पहले मैं तुमसे एक बात पूछूंगा और वही बात मैं पूछ रहा हूँ... क्या जरूरी है कि जीवन में प्यार एक ही बार हो...?"
उसने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, "हां याद है... और शायद तुम्हें भी याद होगा कि मैंने भी कहा था कि यदि मेरे पास कोई जवाब न हुआ तो क्या तुम मुझसे रूठ कर चले जाओगे... बोलो...?"
मैं खिड़की के नजदीक उसके पास पहुंचा। एक हाथ से उसने छड़ पकड़ रखी थी। मैने भी अपने दाहिने हाथ से उसके हाथ को पकड़ते हुए कहा, "पीहू ! प्लीज देखो मेरी नजरों में..."
उसने अपनी झुकी हुई पलके मेरी तरफ उठाई और मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, "बिल्कुल नहीं पीहू... मैं तुमसे रूठ कर नहीं जाऊंगा, ... बल्कि जो सवाल मैंने तुमसे किया है, उसका जवाब स्वयं देकर जाऊंगा..."
मैंने खुद के इरादे मजबूत किए लेकिन स्वर कांप गए, "तो सुनो पीहू... हां प्यार जीवन में एक ही बार होता है... और वह प्यार तुम कर चुकी हो और मैं भी कर चुका... तुम मेरे जीवन का एक हसीन फरेब हो, इन नजरों का एक खूबसूरत धोखा..."
उसकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। मैंने उसे सच्चे हृदय से गले लगाया और खुद रो पड़ा। एक बार फिर सांत्वना के प्रत्येक शब्दों ने अपनी परिभाषाएं खो दी और दोनों के हृदय की पीड़ा को आंसुओं ने बयां किया। हम दोनों ही कुछ देर तक एक-दूसरे से लिपट कर रोने के बाद खुद को नियंत्रित किया। वह कुछ पल मेरी नजरों में देखती रही फिर अपनी नजरें झुकाते हुए शांत मन से सिसकते हुए कहा, "अब जरा फिर से बोलों..."
"क्या...?", मैंने उसकी आंखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुए आद्र कंठ से पूछा।
"जो अभी कहा था... मै तुम्हारे जीवन का एक हसीन फरेब हूँ...",  इस बार उसके वाणी में करुणा थी, लेकिन मन में एक अजीब-सी शांति, जो शायद किसी तूफान के आने से पहले की होती है। मै चुप था और उसने मेरी खामोशियों के अर्थ समझ लिए। 
उसने मेरे हाथ से अपना हाथ धीरे से छुड़ाते हुए कहा, "ठीक है... मत कहो। तो अब जाओ... देखो ज्ञान भैया भी उठ गए हैं, सत्य भी उठ गया होगा... बाबा से एक बार फिर मिल लेना। मै अब नीचे न आऊंगी...  बैग सीढ़ी के आखिरी पायदान पर रखा हुआ मिल जाएगा..."
लेकिन मैं जाने के लिए जैसे ही पलटा, वह मेरी पीठ से लिपट गई। धीरे से मेरे कंधे में अपना सर रख दिया। उसकी बिखरती सांसों की आवाज मुझे स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही थी। वह कुछ देर तक मुझसे लिपट कर यूं ही खड़ी रही जैसे एक सूखती अमरबेल जीवन प्राप्त करने के लिए अपने निकटतम पेड़ का आलिंगन कर लेती है, बेखबर इस बात से कि वह पेड़ अब खुद ही सूख चुका है, भला वह उसे जिंदगी कैसे दे सकता है ?
उसने सिसकते हुए कहा, "जा राहें हो तो जाओ, लेकिन हंसते-मुस्कुराते हुए जाओ... मै तुम्हे जिंदगी के हर उस मोड़ पर मिलूंगी जब तुम उदास होगे, अपने आप को अकेला महसूस करोगे। अपने एक नए रूप में... एक नए अंदाज में...?"
मैंने स्थिर और शांत मन से उससे कहा, "पीहू, मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं किन हालातो में मैं तुम्हारे पास पहुंचा था। लेकिन उतनी ही अच्छी तरह से मुझे यह भी याद है, किस प्यार और विश्वास के साथ सत्य मुझे यहां पर लाया था ? बाबा ने कितने स्नेह से मुझे आशीर्वाद दिया था ?... और यह भी कि तुमने कितने अपनत्व और मान-सम्मान के साथ इसी अटारी में मुझे खाना खिलाया था। तुमने अपनी जिंदगी की बहुत सी खुशियां और दुःख मुझसे बांटे। मैं जब टूटा, बिखरा, जिंदगी से मायूस हुआ तो मेरे पास ज्ञान, सत्य, बाबा, मंगल कमली सभी तो थे। लेकिन मुझे संवारने में सबसे अहम किरदार तुम्हारा रहा। किसी ऐसे लड़कों को अपना बॉयफ्रेंड बनाना, प्यार करना, उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखना जो पहले से ही किसी को प्यार कर चुका हो, किसी के साथ शादी के सपने भी देख चुका हो, किसी भी लड़की के लिए आसान नहीं था। तुमने तो उसके दर्द को भी महसूस किया, जिससे तुम आज तक मिली भी नहीं।

अक्सर मेरे दिमाग में एक प्रश्न उठता था कि उसने मुझे छोड़ क्यों ? मैं हीन-भावना से ग्रस्त था कि जरूर मेरी कमी के कारण मुझे छोड़ गया ? लेकिन जब तुमने मुझसे प्यार किया, मुझे चाहा, और इतना कि आज मुझसे शादी तक करने के लिए तैयार हो... जिन शब्दों को सुनने के लिए सत्य तरस गया, तुमने कितनी सहजता से मुझसे कह दिया। यहीं से मेरा दृष्टिकोण बदल गया। यदि उसने मेरी कमी को ध्यान दिया होता तो कभी मुझसे प्यार ही न किया होता। तुमने तो मेरे अंदर का खोया हुआ आत्मविश्वास मुझे लौटया है पीहू।
मैं तुमसे या किसी और से नाराज होकर नहीं जा रहा हूँ... जो वादे तुमसे किये या खुद से किये हैं, उन्हें पूरी ईमानदारी के साथ पूरा करूंगा... लेकिन तुम अपना ख्याल रखना। तुमने अभी पूछा था न कि मैं लौटकर तुमसे क्या कहना चाहता था ? तो सुनो, मुझे अपने प्रति तुम्हारे प्यार, तुम्हारी चाहतों का अंदाजा उसी पल हो गया था जब तुमने अपनी अंगूठी के लिए फिंगर चेंज कर ली थी, जबकि मैने कहा भी कि इस उंगली में ढीली है, गिर सकती है। तुमने कहा, तुम पहनाओ तो, वो सब मैं देख लूंगी। सच उस समय तक मैं नहीं जानता था कि इंगेजमेंट फिंगर कौन-सी होती है...? मैने यही तो जानने के लिए तुमसे कहा था, "हां सही कहती हो, देखो न इस उंगली में पहनते-पहनते व्हाइट स्पॉट पड़ गया। याद हैं तुमने धीरे से क्या कहा था ?
उसने सिसकते हुए कहा, "हां, बुद्धू कहीं के..."
"जैसे आज कहा... मैने तो उसी पल समझ लिया था, लेकिन अनजान बना रहा। आत्मविश्वास की कमी थी न... तुम मुझसे बेहतर हो, विवाह के लिए तो घर-परिवार के लोगों को योग्य वर की तलाश होती है न, जो किसी भी दृष्टिकोण से मैं नहीं था। तो तुम ही बताओ, तुम्हे प्रपोज कैसे करता ? बस मैं तुम्हें प्यार कर सकता था, तो किया। लौटकर मैं तुमसे यही कहना चाहता था, यदि किसी भी वजह से बाबा या ध्रुव भैया हमारे विवाह के लिए तैयार न हुए तो तुम मेरे लिए अपने मन में कोई दु:ख मत पालना, और न ही अपने किसी आचरण से उनका मन दु:खी करना, क्योंकि हमारा प्यार किसी रिश्ते का मोहताज नहीं।
इंगेजमेंट फिंगर में पहनी हुए यह डायमंड रिंग हमारे प्यार की निशानी है... न कि विवाह की। तुम भविष्य में किसी से विवाह भी करोगी, तब भी यह तुम्हारे साथ रहेगी। लेकिन आज तुमने अपनी समस्त विशिष्टताओं का त्याग कर मुझे शादी के लिए प्रपोज किया, मेरा आत्मविश्वास मुझे लौटाया। तो देखो, नियति ने मेरे माध्यम से तुम्हारा स्वाभिमान तुम्हे लौटाया है। याद करो उसने मेरे मुख से तुम्हारे लिए आज क्या कहलवाया है, 'जब तक तुम इस धरती में हो... मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा...', तो हाँ पीहू, मैं सचमुच करूंगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तुम कोई गलत फैसला लो। फिर यदि नियति की मर्जी न होती तो क्या मैं अपनी रिस्टवाच उस लड़के को देता ? देखो तो एक बार फिर मेरे जीवन में समय-चक्र रुक-सा गया...?"
वह रो पड़ी। मैं चुपचाप खड़ा रहा। कुछ देर रो लेने के बाद वह मेरे पीछे ही घुटने के बल बैठ गई। अगले ही पल उसने वह किया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। उसके दोनों हाथ मेरे पैरों में थे। मैने पलट कर उसे रोकने की कोशिश करनी चाही, "ये क्या पीहू... उफ़ ! ये तुमने क्या किया..?"
"वही किया जो करना चाहिए और फिर तुम्हारे सवाल का जवाब भी तो देना था, इंटेलिजेंट जो ठहरी ? न... पलटना नहीं और न ही मुझे रोकने की कोशिश करना... आज सुबह ही कहां था न कि मेरी यह बात याद रखना...", उसने लगभग रोते हुए कहा, "मैं कोई नादान लड़की नहीं जो तुम्हारे बदले हुए व्यवहार के कारण को समझ न सकूं... जो कभी उसके माता-पिता ने उससे मांगा होगा, शायद आज वही मेरे बाबा ने तुमसे मांग लिया... तुम्हारे साथ फिर से छल हुआ। वही कहानी फिर से दोहराई गई... है न ? उन्हें माफ कर देना..."
"न पीहू ऐसा नहीं कहते ! वो मेरे भी बाबा हैं...", मैं इतना ही कह सका। 
उसने आगे कहा, "हो सके तो मेरे लिए एक दुआ करो कि इस वक्त मैं तुमसे जो मांग रही हूँ... उसे ईश्वर पूरा करे..."
"यह गलत है पीहू... यदि तुम्हे मुझसे कुछ चाहिए... तो सीधे मुझसे कहो न... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि तुम मुझे आज्ञा दो...", उसकी स्थित और भावुकता को महसूस कर मेरी भी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली।
"जरूर कहती... लेकिन कहते है न, कोई मन्नत मांगो तो उसे किसी से कहना नहीं चाहिए... अपनो से भी नहीं। यदि कह दिया फिर वो पूरी नहीं होती...", उसने अपनी दोनों हथेली अपने माथे से लगा,  माथे से सर के पीछे की तरफ ले जाते हुए कहा, "जाते समय रोने पर तो पाबंदी लगा ही दी... कम से कम आशीर्वाद तो देते जाओ..."
मैने उसके सर पर अपना दाहिना हाथ रखा। मेरी आवाज कांप रही थी, "मेरा और तुम्हारा संबंध रिश्ते-नातों से दूर दर्द और आंसुओं का है पीहू। आज उसे ही साक्षी मान कर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, तुम्हारी हर मनोकामना पूरी हो... तुम सदैव हंसती-मुस्कुराती रहो... तुम्हे जीवन की हर खुशी मिले... जाते वक्त तुम्हारे रोने में पाबंदी लगा दी थी न ? तो जान लो, जब भी तुम्हारे दिल में कोई दर्द उठेगा, तुम्हारी आंखों में कोई आंसू आएंगे... तो उस वक्त मेरे हृदय में भी एक टींस उठेगी... मेरी भी आंखें सजल होंगी। मैं भी तुम्हारे साथ रोऊंगा..."
कुछ देर बाद वह धीरे से उठी फिर अपना मुंह फेर खिड़की की छड़ पकड़ कर बाहर देखते हुए खड़ी हो गई। मैने खिड़की में रखी बॉटल को अपने बैग में रखने से पहले उससे पूछा, "इसे छोड़ दूं...?"
यह सब कहते हुए मेरी नजर उसके माथे से होते हुए उसकी आंखों में आकर ठहर गई। कभी जब पहली बार इन आंखों में देखा था तो इनमें एक अनकही बेचैनी एक इंतजार दिखा था। लेकिन इसबार मैने देखा, मेरे चेहरे का अक्स उसकी गहरी बादामी आंखों में कैद था। निश्चित ही हम एकदूसरे से कुछ और भी कहना चाहते थे, लेकिन उस वक्त न तो जुबान साथ दे रही थी और न ही हमारे पास अब कोई शब्द थे। हम दोनों एकदूसरे की तरफ यूं ही निर्मेष देखते रहे। मेरी तस्वीर उसकी आंखों से धुंधली होते हुए पूरी तरह से धुल जाती इससे पहले ही उसने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,   "नहीं... इसकी अब कोई जरूरत नहीं, और हो सके तो तुम भी फेक देना..."
मैने खिड़की में रखे तीसरे जाम को उठा एक शिप ली और उसे वापस उसी जगह रख दिया। मैने बॉटल को बैग में रखा। उसके पापा की स्टोरी बुक और स्केच निकाल कर चारपाई पर एक किनारे रख दिया। अंत में उसकी डार्क एलो कलर की शाल निकाल। उसके दोनों कंधों में पीछे से डालते हुए धीरे से कहा, "अपना ध्यान रखना पीहू... अब मैं चलता हूँ...", वह उसी तरह शांत खिड़की से बाहर देखती हुई खड़ी रही। मेरा बैग अभी भी उसी तरह चारपाई पर रखा था।
मैं जाने के लिए जैसे ही पलटा उसने कसकर मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने धीरे से पलट कर उसकी तरफ देखा। नजरे झुकी हुई थी और मुझे उसके चेहरे में एक अलग ही प्रकार का दर्द दिखा। जी हां, बिल्कुल अलग ही प्रकार का दर्द। जैसे... जैसे वह खुद को ही रोकने की नाकाम कोशिश कर रही है... या फिर उससे उसकी कोई सांस छीन रहा है.... एक अजीब सी बेचैनी एक अजीब सी कसमसाहट... एक मासूम बच्ची अपनी ज़िद के साथ... नहीं मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी... उस समय मैं महसूस कर रहा था जैसे हम प्रेमी प्रेमिका हों ही न, बल्कि एक ही शरीर के दो हिस्से हैं। मैं अपना हाथ अपनी तरफ खींच रहा था और वह मासूम बच्ची की उसी  जिद के साथ अपनी तरफ... न मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी। मैंने दूसरे हाथ से उसके हाथ की पकड़ ढीली की और अपना हाथ धीरे से छुड़ाते हुए बस इतना ही कह पाया, "प्लीज..."
सीढ़ी के नजदीक पहुंच कर मैंने उसे धीरे से फिर पुकारा, "पीहू ! "
उसने कांपते हुए स्वर में कहा, "नहीं ! अब तुम जाओ..."
"देखो ! सीढी के नीचे तक तो छोड़ दो...", मैने आशा भरी दृष्टि से उसकी तरफ देखते हुए कहा।
"नहीं... अब यहां से तुम्हे अकेले ही जाना होगा...  प्लीज जाओ... और न रुलाओ मुझे। हो सके तो बाबा से एक बार फिर मिल लेना। लेकिन हां, जाने से पहले जो मैं कहती हूँ ध्यान से सुनते जाओ...
    इस दिल के सारे अरमान... सारी ख्वाहिशे तभी तक के लिए होती है... जब तक सांसों की डोर होती है। जिस दिन यह डोर टूट जाती है न... तो सारी शिकायतें, उलझने, चाहते, मोहब्बतें सब कुछ यही बिखर के रह जाती हैं। हो सके तो जीवन में एक बार कुछ पल के लिए उस जगह के पास बैठ कर देखना... जहां कोई अपना प्रिय सुपुर्द-ए-खाक या राख हुआ हो। जो कभी तुम्हारे जीवन का हिस्सा था... जिसके साथ तुमने कुछ पल बिताए थे... जिसके साथ तुम हंसे थे... जिसके लिए तुम कभी रोए थे। हो सकता है, तुम्हारे ऐसा करने से उसे मुक्ति मिल जाए... और तब उस दिन मैं तुमसे पूछूंगी कि अब बताओ कितनी अजनबी हूँ मैं तुम्हारे लिए... और तुम मेरे लिए..."
उसकी ये बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे लगा ही नहीं कि कभी इस पीहू से मेरी मुलाकात हुई है... एक अलग ही पीहू मेरे सामने खड़ी थी।
"नाराज मत हो पीहू... ठीक है मैं जा रहा हूँ... मैं बाबा से मिलकर चला जाऊंगा... मेरा बैग नीचे रख देना... इट्स ओके...",  फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगा।
पीछे से महीन किन्तु सिसकियों में डूबी हुई एक आवाज आई, "नो...नो.. इट्स नॉट ओक..."
मेरे कदम सीढ़ी के उसी पायदान पर रुक गए । एक स्टेप-अप, एक स्टेप-डाउन। मैं उसकी तरफ कुछ मुस्कुराते हुए देखाना चाहता था। उसी दिन की तरह अपना दाहिना हाथ उसकी तरफ बढ़ाना चाहता था। लेकिन मैं उसकी तरफ न तो देख पा रहा था, न मुस्कुरा पा रहा था और न ही हाथ उठा पा रहा था... जैसे किसी अनजानी शक्ति ने मुझे जकड़ लिया हो। अभी एक क्षण पहले ही मै चाहता था कि वह मेरी तरफ देखे, मुझे नीचे तक छोड़ने आए, और अब ? मैं बिलकुल नहीं चाहता था कि वह मेरी तरफ देखे, मेरे बढ़े हुए हाथ को थामने के लिए वह सीढ़ियों को उतर मेरे पास आए। नहीं..नहीं... बिल्कुल नहीं, उसकी अवनति मुझे मंजूर नहीं...
मैंने अपनी पीठ और सर दिवाल से टिका, कस कर अपनी आँखें बंद कर ली। मेरी आंखों में आंसुओं का सैलाब एक बार फिर उमड़ा। मैं ठीक उसी तरह रो रहा था जैसे कभी पांच साल पहले रोया था। न कोई क्रंदन, न कोई हिचकी, न कोई सिसकी। बस आंखों से आंसू बहते जा रहे थे। मैं बड़ी मुश्किल से उससे सिर्फ इतना ही कह सका, "पीहू ! मुझे तुम्हारे होने से प्यार है... चाहे तुम धरती के किसी कोने में रहो..."
फिर मैं धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगा। कुछ शब्द मेरे जेहन में गूंज रहे थे। उनकी आवृत्ति और तीव्रता इतनी अधिक थी कि अब उसकी तरफ मुड़ के देखना जरूरी हो गया था। सीढ़ी के आखिरी पायदान में मेरे कदम रुक गए। मैंने पलट कर देखा वह सीढ़ी के ऊपर पहले पायदान के पास खड़ी थी। 
मैंने अपने आंसू पोछे और शांत मन से कहा, "तुम जिस मुकाम पर हो, प्यार की जिन ऊंचाइयों पर खड़ी हो, तुम मुझे वहीं अच्छी लग रही हो...आज से पांच वर्ष पूर्व शुरू हुई एक कहानी के किरदार ने इस राइटर की हथेली को अपने दिल पर रखकर कभी उससे कहा था, "हो सकता है मेरे दोस्त, मेरे प्रियवर !! जिंदगी में कभी तुम्हें मेरी मोहब्बत एक फरेब महसूस हो, और तुम समझो कि मैंने तुम्हारे साथ कोई दिल्लगी की थी; तो तुम इस पल को, इस लम्हे को जरूर याद करना...", बिछड़ते समय उससे तो नहीं कह पाया लेकिन आज तुमसे कहता हूँ, मैं तुम्हे कभी भी बेवफा नहीं समझूंगा। तुम्हारे साथ जिए गए हर लम्हे मेरी यादों में रहेगे। उसने यह भी लिखा था, "हो सकता है मेरे प्रियवर !  मैं किसी दिन इतनी मजबूर हो जाऊं की तुम्हें त्याग देने में ही मुझे तुम्हारा या फिर अपनों का हित नजर आए, तो कहती हूँ, तुम उस दिन खुद को टूटने मत देना...", तो सुनो पीहू ! वादा है, मै बिल्कुल नहीं टूटूंगा।  उस वक्त मुझे मौका ही नहीं मिला कि उसके सवालों के जवाब दूं। लेकिन आज जब मैने देखा, तुम मोहब्बत की उन्हीं ऊंचाइयों पर खड़ी हो तो सोचा...  तुमसे कह दूं..."
मैंने उसे अंतिम बार देखा वह उसी तरह शांत निर्मेष मुझे देखती हुई उन्हीं ऊंचाइयों पर खड़ी थी। मेरे होठों में एक फीकी मुस्कान आई, मैने कहा, " यदि मैं केवल तुम्हारे स्वप्न की वह परछाई भर होता, तो यह सब तुमसे कभी न कहता, चुपचाप चला जाता। लेकिन क्या करूं, मैं तो माइलस्टोन का किरदार भी हूँ न, तो फिर कैसे न कहता ? तो लो पीहू तुम्हारा वह अधूरा स्वप्न अब पूरा हुआ... मैं जा रह हूँ... अपना ख्याल रखना..."
ये मेरे आखिरी लफ्ज़ थे जो मैंने उससे कहे। एक कहानी फिर से शुरू हुई और उसी अंजाम तक पहुंची। न किसी ने रोका और न ही मैं रुका। पीछे पलट कर भी नहीं देखा। एक बार फिर मैंने किसी को तन्हा छोड़ दिया और जीवन-पथ पर आगे बढ़ गया। पीछे से मैने जानने की कोई कोशिश नहीं की, कि उसने मुझसे किया हुआ वादा पूरी तरह निभाया या नहीं ? 
अपने आंसुओं को आस्तीन से एक बार फिर पोंछा। खुद को नार्मल किया। ज्ञान को बाइक के नजदीक जो गौशाला के पास थी, झुक के कुछ रिपेयर करते हुए देखा। घर के आंगन की तरफ देखा, खाली नजर आया। मैं चलता हुआ बेडरूम के नजदीक पहुंचा। अंदर झाक कर देखा, सत्य बेखबर-सा सो रहा था। मैं धीरे से अंदर दाखिल हुआ, उसके पास बिस्तर में उसके सिरहाने बैठ गया। मैने पहली बार उसकी तरफ ध्यान से देखा, उसमें मुझे एक सरल, सुकुमार राजकुमार की मासूम सूरत नजर आई। आखिर इस इंसान को किस बात, किस गुनाह की सजा मिले ? कहते हैं गुजरते हुए वक्त के साथ इंसान का बड़े से बड़ा जख्म भी भर जाता है। हो सकता है आज यह पीहू को ठीक से समझ नहीं पा रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि भविष्य में भी यह नहीं समझ पाएगा। आज पीहू को न सही, लेकिन इसे तो प्यार है उससे ? हो सकता है जिंदगी के सफर में साथ चलते-चलते ये दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ सके, तब मैं एक गुजरी हुई कहानी बनके न रह जाऊंगा ? तो क्या अच्छा न होगा कि अब इस कहानी को इसी मोड़ पर छोड़ दिया जाए ? लेकिन कैसे ?
तभी मेरी नजर सोफे पर पड़ी एक नोटबुक और पेन पर गई। मैं चुपचाप उठकर सोफे पर आ गया। हृदय में पीहू से बिछोह की पीड़ा और सत्य के लिए मन में अथाह करुणा लिए नोटबुक के बीच के पन्ने में मैंने एक छोटी सी कविता लिखी,  फिर उस पन्ने को फाड़ कर अपनी जेब में रख लिया। सत्य के कंधे को हिलाते हुए बोला, "सत्य ! उठो... उठो यार... हम जा रहे हैं..." 
मैं बैठक में पहुंचा और एक बार फिर बाबा के पैर छूकर उनसे इजाजत ली। बाबा मुझसे कुछ और भी कहना चाहते थे, लेकिन सत्य को नजदीक आता देख वे चुप हो गए। वह बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए मुझसे बोला, "एक मिनट, मैं मुंह-हाथ धो लूं... तब तक तुम बाबा से बात करो..."
मैने बाबा से हाथ जोड़कर उनसे अंतिम विदा मांगी, "बाबा जा रहा हूं... जाने-अनजाने मुझसे कोई भूल हुई हो, कोई अपराध हुआ हो या फिर किसी भी पल मैंने आपका दिल दु:खाया हो तो सत्य और पीहू समझ कर क्षमा कर दीजिएगा..."
मेरी आंखों के साथ ही बाबा की आंखों में भी आंसू आ गए। वे तख्त से उठे, मेरे दोनों जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा, "...नहीं तुमसे कोई भूल या अपराध नहीं हुआ...", फिर मेरे सर पर अपनी हथेली रखते हुए कहा "मेरा आशीर्वाद है, सदा खुश रहो, सुखी रहो..."
पीहू ने जो कहा, जो चाहा वह पूरा हुआ। कहते हैं न, हम जिसे प्यार करे, अपना सच्चा दोस्त समझे, उसकी अनकही बातों को भी समझना चाहिए। जब पीहू यह समझ सकती है कि बाबा ने मुझसे क्या कहा होगा, क्या चाहा होगा या फिर क्या मांगा होगा तो फिर त्याग करने में मुझे किस दर्द से गुजरना पड़ा होगा इससे वह अनजान कैसे हो सकती है ? क्या उसने ये अंदाजा न लगाया होगा कि ऐसे में मेरा बर्ताव उनके प्रति कुछ रुखा भी हो गया होगा ? 
मैने अपनी जेब से लिखी कविता की पर्ची निकाली, उन्हें देते हुए बोला, "बाबा जो अपने कहा, जो चाहा, मैने उसे पूरा किया... आपसे एक प्रार्थना है, यह पीहू के लिए लिखा है... जाते हुए उसे देने की हिम्मत नहीं हो रही है...जब मैं चला जाऊं... तो पहले आप इसे पढ़ लीजिएगा, और फिर यदि आपको उचित लगे तो किसी न किसी बहाने से पीहू को दे दीजिएगा। लेकिन हां बाबा... किसी भी कीमत में इसे सत्य को मत दीजिएगा..."
बाबा कुछ बोले नहीं, कागज़ के टुकड़े को अपने कुर्ते की जेब में चुपचाप डालते हुए मुझे विश्वास दिलाया, "ठीक है..."
सत्य बाथरूम से बाहर आते हुए बोला, "चलो यार, पहले जाना तो मुझे भी फैक्ट्री की तरफ था... लेट हो गया तो अब माइंस ही जाऊंगा..."
बाबा से इजाजत लेकर हम दोनों गैलरी पार कर जब अटारी के पास से गुजर रहे थे तो सत्य ने सीढ़ी के आखिरी पायदान में रखे हुए मेरे बैग को उठाते हुए कुछ ऊंची आवाज में कहा, "पीहू !! हम लोग जा रहे हैं... दरवाजा अंदर से बंद कर लेना...", फिर वह धीरे से मुझसे बोला, "तुमने बाय तो कह दिया न..."
"हुं... कह दिया है... अब चलो...", मैने भी धीरे से कहा।
 हम सड़क पर आ गए। औपचारिक बातचीत के बाद उसने भी मुझसे वही सब समझाया जो पीहू पहले ही कह चुकी थी। फिर उसने ज्ञान से कहा, "हो सकता है कल मैं घर आऊंगा... मिलेगा न...?"
ज्ञान ने जवाब दिया "हां ... कल आया तो मिल जाऊंगा। परसों शाम तक मुझे भी जाना है... ठीक है तू अभी निकल... हम भी निकालते हैं... बाय..."
 सत्य चला गया। ज्ञान बाइक को शीशम के पेड़ के पास खड़ी करते हुए बोला, "अरे यार रुक, मै भी बाबा से मिलकर आता हूँ। पता नहीं क्या सोचे ...", फिर वह तेजी से घर की तरफ भागा। दरवाजा अभी भी खुला था।
मैने बाइक की सीट पर बैग को रख दिया। फिर उसी में टिक कर खड़ा हो गया। मेरी नजर एकटक खिड़की पर थी। मैने देखा, अटारी में बिजली का बल्ब चमक रहा है, पर्याप्त उजाला फैला है। तभी एक साया खिड़की के पास उभरा। मेरे और बल्ब की रौशनी के दरमियां एक हाथ से खिड़की की छड़ पकड़ कर बाहर की तरफ देखते हुए खड़ा हो गया। उसके दूसरे हाथ में मेरा तीसरा अधूरा जाम है।
मैंने ध्यान से देखा, उसके बदन पर डार्क बादामी कलर का सलवार-सूट और उसी से मैच करता दुपट्टा हैं। सलीके से पीछे की तरफ संवारे हुए अध-खुले बाल जो पीछे से आ रही बल्ब की लाल रोशनी से कुछ और सुनहरे और रेशमी लग रहे हैं। कानों में पहने छोटे-छोटे गोल टप्स सूरज की किरणें से चमक कर चंद्रमा की भांति खिल रहे हैं। होठों में हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक उसके गालों के रंग के साथ मैच कर रही है... लेकिन उसके चेहरे पर खामोश रात की उदासी है, गहरी आंखें कुछ भरी हुई है। मैंने अपनी आंखें बंद कर ली। तो सत्य ने उस दिन पीहू से झूठ नहीं कहा था। जो उसने देखा, वही सब तो मुझे भी दिख रहा है !! लेकिन क्यों ? 
जब दोबारा मैने अपनी आँखें खोली तो उस परछाईं के लबों पर एक फीकी-सी मुस्कान थी। अपना दाहिना हाथ खिड़की के बाहर निकाल, उसे मेरी तरफ हिलाते हुए कहा, "अलविदा..."
मैंने भी भरी हुई आंखों से उसी तरह मुस्कुराते हुए अपना हाथ हिला दिया, "अलविदा..."
"ये भाई पागल हो गया है क्या...", ज्ञान ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा, "किसे हाथ हिला रहा है ? किसे अलविदा कह रहा है, खिड़की में तो कोई है ही नहीं ?"
मैंने ज्ञान की तरफ पलटते हुए आश्चर्य से पूछ, " क्या !! ... कोई नहीं है !!! लेकिन मुझे...?"
लेकिन फिर जब मैने दोबारा खिड़की की तरफ देखा तो सचमुच वहां कोई नहीं था। मैने ज्ञान से सामान्य ढंग से कहा, "लेकिन खिड़की तो है न ! उसी को अलविदा कह रहा था..."
मैने बैग से बॉटल निकली, ढक्कन खोलकर एक तरफ फेंक दिया। ज्ञान ने कहा, "ला दे... ठंड के दिन हैं... और सफर दूर का है..."
तीन-चार घूंट पीने के बाद उसने बॉटल मुझे वापस की। मैने एक ठंडी आह भरी। दो घूट पीने के बाद बॉटल खिड़की की तरफ दिखाते हुए एकबार फिर नाम होती आंखों से कहा, "पीहू !... अलविदा..."
फिर बची हुई शराब ज़मीन में उड़ेल दी और खाली बॉटल को पेड़ के पास ही लुढ़का दिया, और ज्ञान से बोला, "हां... अब चल..."




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