विरह गीत
ये खामोश समुंदर कहता है,
आँखों का दरिया पानी था।
तेरी वफा वो तेरी मोहब्बत,
बिखरे ख्वाबों का हिस्सा था।
हम ढूंढ रहे हैं साहिल को,
इक गहरे दर्द के दरिया में।
सच तो है ये है मेरे दिलबर,
हमारा मिलना एक किस्सा था।
जो लहरें आकर लौट गई,
वो बीते कल की बातें थीं।
किनारे पर हम बैठे रहे,
और सदियों सी लंबी रातें थीं।
गम की इस सर्द तन्हाई में,
अब खुद से मिलना होता है।
जिसे मान लिया था हमराही,
उसे छोड़कर एक दिन जाना था।
अब दिल के सुन साहिल पर,
यादों का एक सन्नाटा है।
जिस मोड़ पर हम ठहरे थे,
उस मोड ने हमको बांटा है।
तू छोड़ गया तो जाना हमने,
हर मोड़ पर एक अफसाना था।
मान लिया था मंजिल जिसको,
वह महज मुसाफिरखाना था।
एक हूंक हृदय से उठती है,
हर पल इक वीरानी है।
इस तन्हा सफर के रस्ते में,
तेरी हर इक याद पुरानी है।
इस तन्हा सफर के रस्ते में,
तेरी हर इक याद पुरानी है।
ये सूना आंगन, ये खाली घर,
तेरी आहट को तरसे हैं।
हर कोने में बस तू ही तू ,
और हम पागल जैसे फिरते हैं।
तेरी आहट को तरसे हैं।
हर कोने में बस तू ही तू ,
और हम पागल जैसे फिरते हैं।
सब कहते हैं मैं जिंदा हूँ,
पर सांस कहाँ अब आती है।
तुम्हारी जुदाई की गहरी टींसे,
अब मेरे दिल को तड़पाती हैं।
पर सांस कहाँ अब आती है।
तुम्हारी जुदाई की गहरी टींसे,
अब मेरे दिल को तड़पाती हैं।
शाम ढले जब आंगन में,
पंछी घर वापस आते हैं।
तब ज़ख्म पुराने दिल के,
फिर ताज़ा होकर रोते हैं।
पंछी घर वापस आते हैं।
तब ज़ख्म पुराने दिल के,
फिर ताज़ा होकर रोते हैं।
अब मैं रोकूं क्यूं तुमको,
शांत सफर की राहों में ?
पर याद हमेशा आओगी,
तुम मेरी सूनी-सूनी बाहों में।
शांत सफर की राहों में ?
पर याद हमेशा आओगी,
तुम मेरी सूनी-सूनी बाहों में।
तुम मुक्त हुए हो बंधन से,
अब कोई दर्द न छूने पाए।
अब कोई दर्द न छूने पाए।
सो जाओ गहरी निंदिया में,
हम हर मौन में तुमको ढूँढेंगे।
जाओ अंबर की ओढ़ चुनरिया,
मेरी नयन नीर बन जाना।
तुम्हारे बिन इस दुनिया में,
मैं भी सीखूँगा तन्हा रह जाना।
मैं भी सीखूँगा तन्हा रह जाना।
जिस हाथ को मैंने छोड़ा था।
मिट्टी उसे समेटे सोती है।
यादें और दिल के टुकड़े,
अब तेरी राह बिखेरूं क्यूं ?
हम जीते-जी जब लाश हुए,
लोग शोक पे खड़े रहें क्यूं ?
अब तेरी राह बिखेरूं क्यूं ?
हम जीते-जी जब लाश हुए,
लोग शोक पे खड़े रहें क्यूं ?
लो समेट लिया मैंने अपना हठ,
अब तुमको न रोकूँगा।
जाओ तुम परियों की दुनियां,
अपने अश्रु-धारा मैं रोकूँगा।
अब तुमको न रोकूँगा।
जाओ तुम परियों की दुनियां,
अपने अश्रु-धारा मैं रोकूँगा।
अब कैसा हक मेरा तुम पर,
जो तुम पंचतत्व में लीन हुए।
जो तुम पंचतत्व में लीन हुए।
बिखर के फिर से मैं सज्ज हुई,
अब जीवन-युद्ध फिर प्रारंभ हुए।
मेरी आँखों को चूमती हुई तेरी निगाहें,
मेरे बदन को छूती हुई तेरी निगाहें,
मेरे दिल में उतारती हुई तेरी निगाहें,
जब मेरी निगाहों से टकराती तेरी निगाहें,
हर चाहत को बयां करती हैं तुम्हारी निगाहें।
मेरी आँखों को चूमती तेरी निगाहें,
मेरे बदन को छूती तेरी निगाहें।
मेरे दिल में उतरती तेरी निगाहें,
शब-ए-रात में उलझी तेरी निगाहें।
मेरी निगाहों से टकराती तेरी निगाहें,
हर चाहत को बयां करती तेरी निगाहें।
ख़ामोशी को बयां करती तेरी निगाहें।
मेरी धड़कन की साज़ तेरी निगाहें।
दुनिया के सारे होश-ओ-हवास भुलाकर,
मुझे खुद में उलझा देती हैं तेरी निगाहें।
जैसे जीने का कोई मक़सद मिल गया मुझे,
यूं मेरी ज़िंदगी में शामिल हुईं तेरी निगाहें।
सूरज की पहली किरण-सी लगती हैं,
मेरी रातों में उजाला भरती तेरी निगाहें।
अब कोई ख़्वाहिश न रही इस दिल में,
मेरी आँखों में बसी हैं सिर्फ तेरी निगाहें।
अबचेतन मस्तिष्क में कैद घटनाएं एवं यादें स्वप्नदर्शी होती है।
उक्त कथन की व्याख्या कीजिए ?
सजनी दीवानी गीत
"कहाँ जाबे सजनी, महुआर कस मतात है रे,
चंदा सुरुज के जोड़ी, नैना तोर कजरारे...
दीवानी होगे कर्मा की धुन मा,
मांदर बाजे धिन-धिन ता,
छम-छम पैंजनी बाजे गोड़ मा,
झूम-झूम नाचे सजनी दीवानी रे..."
छैला छाय रहे मधुबन में सावन सुरत बिसारे मोर।
मोर शोर बरजोर मचावै, देखि घटा घनघोर।।
कोकिल शुक सारिका पपीहा, दादुर धुनि चहुंओर।
झूलत ललिता लता तरु पर, पवन चलत झकझोर।।
ताखि निकुंज सुनो सुधि आवै श्याम संवलिया तोर।
विरह विकल बलदेव रैन दिन बिनु चितये चितचोर।।
बहुत सी योजनाओं जैसे फार्मर रजिस्ट्री, साइबर नामांतरण, धारणाधिकार, इत्यादि में पूरे देश में प्रथम स्थान रखता है। योजनाएं किसी भी डिपार्टमेंट की हों, अंत में हमें सौंप दी जाती है और जमीनी स्तर पर हम उसे पूरा करते हैं। एक ग्रामीण सुशासन के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को लागू करना पटवारी सचिव रोजगार सहायक इत्यादि कर्मचारी ही पूरा करते हैं।
हमें इस बात का खेद है कि सरकार हमें ही फसाने की कोशिश में लगी रहती है। स्वामित्व रजिस्ट्री इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जिसके हम मालिक ही नहीं उसके विक्रेता कैसे बन सकते हैं ? सरकारे बदल जाती उनके वादे बदल जाते हैं। आपसे बेहतर इसे कौन समझ सकता है ?
अंत में कानूनी दाव-पेंच पर हम हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के चक्कर लगाते फिरेंगे। एक साधारण ग्रामीण कलेक्टर, तहसीलदार और एसडीएम को नहीं जानता। वह हमें पहचानता है। हमसे जुड़ा होता है इसलिए सभी सही और गलत काम के लिए वह हमें ही उत्तरदाई समझता है।
एक तरफ एक ग्रामीण जिसका हित प्रभावित होगा, वह हमसे प्रश्न पूछेगा और दूसरी तरफ कोर्ट, "जब आप उस संपत्ति के स्वामी ही नहीं थे तो आपने उसे बेच कैसे दिया ?" तब तक तो सरकारे बदल जाएगी। जो चेहरे आज बड़े-बड़े वादे करते हुए दिखाई दे रहे हैं पता नहीं कहां होगे ? लेकिन कानून के सामने और खासकर ग्रामीण के सामने तो हम खड़े होंगे न ?
इसे एक उदाहरण से समझ लीजिए। माना कि किसी गांव में आपका दादाओ परदादाओ के समय से एक पुश्तैनी मकान है। आप का एक भाई अपने परिवार के साथ उस मकान पर रहता है, और आप जीवन यापन के लिए किसी दूसरी जगह पर किराए का मकान लेकर सा परिवार रहते हैं और काफी दिनों से आप अपने घर-गांव नहीं गए, तो क्या उसे मकान से आपका हक समाप्त हो जाएगा ?
इसी बीच स्वामित्व योजना का काम शुरू हुआ। और भाई ने यह जानकारी दी कि यह मकान उसका है और अपना नाम उस मकान में दर्ज करवा लिया, जिसकी बाद में पटवारी ने आपके भाई के नाम विक्रेता बनकर रजिस्ट्री भी करवा दी। कुछ वर्षों बाद आप सर्विस से रिटायर हो के अपने घर गांव पहुंचे और आपके भाई ने उस घर में घुसने से आपको मना कर दिया।
कारण बताया कि यह घर पटवारी ने मेरे नाम से रजिस्ट्री करवा दी है। अब दोषी कौन ?
1. क्या आप, जो सर्वे के समय अपने घर में नहीं मिले ? नहीं, आप हो या न हो आपका उस घर से हक़ समाप्त नहीं होता, आप तो पीड़ित व्यक्ति होंगे।
2 क्या आपका भाई, कुछ हद तक मान सकते हैं। लेकिन जहां निजी स्वार्थ में अंधे होकर कुछ लोग जीवित भाई या पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र तक बनवाकर उनकी संपत्ति अपने नाम पर लिखवा लेते हैं, ऐसे समाज और व्यक्तियों से क्या आशा की जा सकती है ?
3. क्या विक्रेता यानी पटवारी ? जी हां कोई दोष न होते हुए भी वही निम्न बिंदुओं पर विधि का दोषी माना जाएगा...
अ) जिस संपत्ति का वह मालिक था ही नहीं उसे बेचने का हक किसने दिया ? वह जज के सामने चिल्लाता रहेगा, कहता रहेगा। सर हम मजबूर थे, मुख्यमंत्री जी का ऑर्डर था। कलेक्टर और एसडीएम साहब सस्पेंड और बर्खास्त करने में तुले हुए थे। हम कहां जाते हैं हमारा भी घर परिवार है उसका जीवन यापन कैसे होता। जज रहेगा यदि कोई कुआं में कूदने को कहेगा तो कूद जाओगे ? क्या नौकरी बचाने के लिए और अपने घर परिवार का जीवन यापन करने के लिए किसी का हक मार लोगे ?
ब) दूसरा आरोप लगेगा आप गांव के पटवारी थे, तो आपको हर एक घर की जानकारी होना चाहिए था। अब हम उनको कैसे समझाएं कि आपके ही भाई ने हमें गलत जानकारी दी। हर 3-4 साल बाद अधिकारी और कर्मचारियों के ट्रांसफर होते हैं। नई जगह पहुंचते हैं, उन्हें उसे क्षेत्र की जानकारी हने में समय लगता है। जो हमें दिया ही नहीं गया सारी योजना को पायलट योजना और अभियान के रूप में पूर्ण करवाया जाता रहा। उस समय भी यही धमकी दी जती थी सस्पेंड कर देंगे, बर्खास्त कर देंगे। और तो और सर जिस गांव का हमें निष्पादक बनाया गया, वहां के स्वामित्व रिकॉर्ड हमारे पूर्व के पटवारी साहब ने तैयार किया था। जज कहेगा, वह सब मैं नहीं जानता लेकिन तुम विक्रेता कैसे बन गए, पहले यह बताओ ?
तो जान लीजिए, हम जानबूझकर कुएं में नहीं कूदेंगे और न ही आपको धक्का देंगे। हमारा इस योजना का विरोध आपके हित में भी है। संपूर्ण पारदर्शिता के साथ हर एक घर के प्लॉट की और उसमें रहने वालों की विवेचना उच्च स्तर पर होनी चाहिए। प्रत्येक घर में निवास करने वाले व्यक्ति को बुलाकर शपथ पत्र के साथ उस घर में सभी हिस्सेदारों की जानकारी राजस्व न्यायालय में लेना आवश्यक है। जब तक यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती तब तक रजिस्ट्री न होना ही अच्छा है। कम से कम प्रभावित व्यक्ति हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का चक्कर तो नहीं लगाएगा। उसकी सुनवाई कलेक्टर स्तर पर जिले में ही हो जाएगी। इस प्रक्रिया में हम प्शासन के साथ हैं।
यदि एक बार रजिस्ट्री हो गई तो फिर यह कलेक्टर स्तर से बात हटकर सिविल कोर्ट के दायरे में आ जाएगी। इसमें हम सब की परेशानी है। इसीलिए इस योजना को अभियान और पायलट योजना से हटाया जाए।
लेकिन हक तो आपका भी है।
मैं भारतवर्ष हूँ और मैने देखा है-
संगमरमर सा जिस्म लिए, लोग यहां से फ़ना हुए।
रूहों के ताजमहल उनके न होने पर अब हंसते हैं।।
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