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समास
समास हिंदी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक अंग है। इसके भेदों को उनके नाम के अर्थ, पद की प्रधानता और आंतरिक संरचना के आधार पर ही समझा जा सकता है।
नीचे सभी मुख्य 6 समासों की नाम के अनुरूप गहन परिभाषा और प्रत्येक के 50-50 उदाहरण पूर्ण कारण सहित दिए गए हैं।

1. अव्ययीभाव समास (Adverbial Compound)
नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'अव्ययीभाव' का शाब्दिक अर्थ है—'जो अव्यय न हो, उसका अव्यय बन जाना' (अव्यय हो जाना)।
  • पद प्रधानता: इस समास में पूर्व पद (पहला पद) प्रधान होता है।
  • गहन विश्लेषण: इसमें पहला पद प्रायः कोई उपसर्ग या अव्यय ( जैसे: यथा, प्रति, आ, भर, हर, अनु ) होता है। जब यह पहला पद दूसरे पद (संज्ञा) से मिलता है, तो वह पूरे समस्त पद को ही 'अव्यय' (क्रियाविशेषण) बना देता है। इसके बाद उस शब्द के रूप में लिंग, वचन या कारक के कारण कोई बदलाव नहीं होता। इसमें शब्दों की पुनरुक्ति (एक ही शब्द का दो बार आना) भी शामिल है।
50 उदाहरण और कारण
  1. यथाशक्ति: शक्ति के अनुसार — 'यथा' अव्यय के कारण पूरा पद क्रियाविशेषण बन गया है।
  2. प्रतिदिन: प्रत्येक दिन — 'प्रति' उपसर्ग हर दिन की प्रधानता को दर्शाता है।
  3. आजीवन: जीवन भर — 'आ' उपसर्ग सीमा और अवधि को निश्चित करता है।
  4. भरपेट: पेट भरकर — 'भर' अव्यय पेट की पूर्णता की स्थिति को बताता है।
  5. आमरण: मरण तक — 'आ' उपसर्ग अंत की सीमा को रेखांकित करता है।
  6. यथासंभव: जैसा संभव हो — 'यथा' अव्यय योग्यता या संभावना को प्रधान बनाता है।
  7. प्रतिवर्ष: हर वर्ष — 'प्रति' के जुड़ने से कालवाचक अव्यय बनता है।
  8. आजन्म: जन्म से लेकर — 'आ' उपसर्ग शुरुआत की सीमा तय करता है।
  9. यथामति: मति (बुद्धि) के अनुसार — बुद्धि के अनुसार कार्य की रीति बताता है।
  10. निडर: डर के बिना — 'नि' उपसर्ग अभाव का बोध कराकर अव्यय बनाता है।
  11. बेशक: शक के बिना — 'बे' (फारसी उपसर्ग) निश्चितता का अव्यय रूप है।
  12. बाकायदा: कायदे के अनुसार — 'बा' उपसर्ग रीतिवाचक अव्यय का निर्माण करता है।
  13. रातोंरात: रात ही रात में — एक ही संज्ञा शब्द की पुनरुक्ति से क्रियाविशेषण बना है।
  14. हाथोंहाथ: एक हाथ से दूसरे हाथ में — शब्दों के दोहराव से कार्य की शैली स्पष्ट है।
  15. साफ-साफ: बिल्कुल स्पष्ट — विशेषण की द्विरुक्ति से अव्यय भाव प्रकट है।
  16. प्रत्येक: एक-एक — 'प्रति + एक' में प्रति अव्यय प्रधान है।
  17. अनुरूप: रूप के योग्य — 'अनु' उपसर्ग सादृश्यता (समानता) का बोध कराता है।
  18. यथासमय: समय के अनुसार — काल की अनुकूलता का अव्यय रूप।
  19. अकारण: बिना कारण के — 'अ' उपसर्ग निषेध का अव्यय भाव लाता है।
  20. यथायोग्य: जितना योग्य हो — मात्रा या सीमा का अव्यय रूप।
  21. परिक्षेप (या यावज्जीवन): जीवन पर्यन्त — 'यावत्' अव्यय अवधि को निश्चित करता है।
  22. घर-घर: प्रत्येक घर — स्थान की पुनरुक्ति से व्याप्ति का बोध होता है।
  23. पल-पल: हर पल — समय की निरंतरता की द्विरुक्ति।
  24. बीचोंबीच: बिल्कुल बीच में — स्थिति की गहनता बताने वाला पुनरुक्त शब्द।
  25. बाअदब: अदब के साथ — 'बा' उपसर्ग सहित का भाव देकर अव्यय बनाता है।
  26. नालायक: जो लायक न हो — 'ना' उपसर्ग यहाँ अव्यय की भाँति प्रयुक्त है।
  27. अनजाना: बिना जाना हुआ — 'अन' उपसर्ग के कारण अनिश्चितता का अव्यय।
  28. प्रतिमास: प्रत्येक महीने — कालवाचक अव्यय पद।
  29. प्रत्यक्ष: आँखों के सामने — 'प्रति + अक्ष' (आँख) आँखों के आगे की स्थिति।
  30. परोक्ष: आँखों से ओझल — 'पर + अक्ष' स्थिति का अव्यय।
  31. अनुकूल: मन के अनुसार — 'अनु' उपसर्ग इच्छा के झुकाव को दिखाता है।
  32. यथाविधि: विधि के अनुसार — नियम के पालन की रीति।
  33. निर्विवाद: बिना विवाद के — 'निस्' उपसर्ग विवाद के अभाव को दिखाता है।
  34. निर्मल: मल से रहित — गंदगी की अनुपस्थिति का सूचक अव्यय।
  35. संदेहसहित (या सप्रमाण): प्रमाण सहित — 'स' उपसर्ग साथ होने का अव्यय भाव लाता है।
  36. सकुशल: कुशलता के साथ — यात्रा या स्थिति की सकुशलता का विशेषण-अव्यय।
  37. निःसंकोच: संकोच के बिना — हिचकिचाहट की अनुपस्थिति।
  38. दरअसल: असल में — 'दर' फारसी उपसर्ग अधिकरण का अव्यय रूप बनाता है।
  39. फीसदी: प्रत्येक सैकड़ा — 'फी' अरबी-फारसी अव्यय दर को दर्शाता है।
  40. हरघड़ी: प्रत्येक घड़ी — 'हर' अव्यय समय की प्रत्येक इकाई को प्रधान करता है।
  41. यथाक्रम: क्रम के अनुसार — व्यवस्था का अव्यय सूचक।
  42. एकाएक: अचानक (एक के बाद एक) — आकस्मिकता का बोध कराने वाली द्विरुक्ति।
  43. धीरे-धीरे: मंद गति से — रीतिवाचक क्रियाविशेषण की शुद्ध द्विरुक्ति।
  44. गली-गली: प्रत्येक गली — स्थानवाचक संज्ञा का अव्यय रूप में विस्तार।
  45. कमबख्त: कम भाग्य वाला — 'कम' उपसर्ग न्यूनता का बोध कराता है।
  46. बेरहम: रहम के बिना — क्रूरता या दया के अभाव का वाचक।
  47. अनंत: जिसका अंत न हो — सीमाहीनता का निषेधात्मक अव्यय।
  48. प्रतिध्वनि: ध्वनि के बाद ध्वनि — 'प्रति' उपसर्ग अनुकरण को दर्शाता है।
  49. यथाबल: बल के अनुसार — सामर्थ्य की सीमा का सूचक।
  50. रातोरात (या कानोंकान): कान ही कान में (खबर फैलना) — गोपनीयता की रीति का अव्यय।


2. तत्पुरुष समास (Determinative Compound)

नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'तत्पुरुष' का विग्रह होता है—'तस्य पुरुषः' (उसका पुरुष)। इस नाम में ही दूसरा पद ('पुरुष') प्रधान है।
  • पद प्रधानता: इस समास में उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है।
  • गहन विश्लेषण: इसमें प्रथम पद गौण होता है और द्वितीय पद के अर्थ की मुख्यता होती है। विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच में कारक विभक्ति (को, से, के लिए, से अलग, का/के/की, में/पर) प्रकट होती है। समस्त पद बनते समय इन विभक्तियों का लोप हो जाता है। इसके मुख्य 6 भेद (कर्म से अधिकरण तक) होते हैं।
50 उदाहरण और कारण
  1. राजपुत्र: राजा का पुत्र — 'पुत्र' प्रधान है, 'का' सम्बन्ध कारक का लोप है।
  2. गगनचुंबी: गगन को चूमने वाला — 'को' कर्म कारक की विभक्ति का लोप।
  3. यशप्राप्त: यश को प्राप्त — कर्म तत्पुरुष का उदाहरण।
  4. रथाscaled (रथारूढ़): रथ पर आरूढ़ (सवार) — 'पर' अधिकरण कारक का लोप।
  5. स्वर्गगत: स्वर्ग को गया हुआ — द्वितीय (कर्म) तत्पुरुष।
  6. करुणापूर्ण: करुणा से पूर्ण — 'से' करण कारक (जुड़ाव) का लोप।
  7. हस्तलिखित: हाथ से लिखित — लिखने का साधन हाथ है (करण तत्पुरुष)।
  8. तुलसीकृत: तुलसी द्वारा रचित — 'द्वारा' करण कारक का लोप।
  9. शोककुल (शोकाकुल): शोक से आकुल — व्याकुलता का कारण शोक है।
  10. कष्टसाध्य: कष्ट से साध्य (पूरा होने वाला) — करण कारक की विभक्ति।
  11. प्रयोगशाला: प्रयोग के लिए शाला — 'शाला' (घर) प्रधान है, 'के लिए' संप्रदान का लोप।
  12. देशभक्ति: देश के लिए भक्ति — चतुर्थी (संप्रदान) तत्पुरुष।
  13. रसोईघर: रसोई के लिए घर — घर का उद्देश्य रसोई है।
  14. गौशाला: गायों के लिए शाला — संप्रदान कारक की विभक्ति का लोप।
  15. हथकड़ी: हाथ के लिए कड़ी — सुरक्षा साधन के उद्देश्य का बोध।
  16. परीक्षाभवन: परीक्षा के लिए भवन — भवन का प्रयोजन परीक्षा है।
  17. ऋणमुक्त: ऋण से मुक्त — ऋण से 'अलग' होने का भाव (अपादान तत्पुरुष)।
  18. देशनिकाला: देश से निकाला — देश से पृथकता का बोध।
  19. पथभ्रष्ट: पथ से भ्रष्ट — रास्ते से अलग हो जाने का भाव।
  20. भयभीत: भय से भीत (डरा हुआ) — डर के उद्गम स्थान में अपादान होता है।
  21. गुणहीन: गुणों से हीन — गुणों से रहित या अलग होना।
  22. गंगाजल: गंगा का जल — 'जल' प्रधान है, गंगा से उसका 'सम्बन्ध' है।
  23. राजकुमार: राजा का कुमार — षष्ठी (सम्बन्ध) तत्पुरुष।
  24. देशोद्धार: देश का उद्धार — देश के विकास का सम्बन्ध।
  25. मूर्तिपूजा: मूर्ति की पूजा — क्रिया और कर्म का सम्बन्ध सूचक।
  26. पुस्तकालय: पुस्तकों का आलय (घर) — सम्बन्ध कारक का लोप।
  27. पराधीन: पर (दूसरों) के अधीन — पराश्रित सम्बन्ध का बोध।
  28. शरणमण्डल (या कार्यकुशल): कार्य में कुशल — 'कुशलता' का आधार कार्य है (अधिकरण तत्पुरुष)।
  29. वनवास: वन में वास — रहने का आधार 'वन' है।
  30. सिंहआसन (सिंहासन): सिंह के चिह्न वाला आसन — सम्बन्ध या मध्यमपदलोपी तत्पुरुष।
  31. घृतान्न (घृतमिश्रित अन्न): घी से बना अन्न — करण/मध्यमपदलोपी तत्पुरुष।
  32. धर्मवीर: धर्म में वीर — वीरता का क्षेत्र धर्म है (अधिकरण)।
  33. आनंदमग्न: आनंद में मग्न — मग्न होने की स्थिति का आधार।
  34. आपबीती: आप (स्वयं) पर बीती — अधिकरण कारक (पर) का लोप।
  35. कलाप्रवीण: कला में प्रवीण — निपुणता का क्षेत्र कला है।
  36. जलधारा: जल की धारा — धारा का सम्बन्ध जल से है।
  37. सज्जन (सत्-जन - संधि है, समास में): सतपुरुष (यह कर्मधारय में जाएगा, तत्पुरुष का शुद्ध रूप): गोपाल: गो (गायों) का पालक — सम्बन्ध तत्पुरुष।
  38. मदमाता: मद से माता (अंधा) — नशे के कारण अंधा (करण)।
  39. मनमाना: मन से माना हुआ — अपनी इच्छा से किया गया कार्य।
  40. स्वर्गवास: स्वर्ग में वास — मृत्यु के उपरांत स्थिति का आधार।
  41. दानवीर: दान देने में वीर — दान की प्रवृत्ति में श्रेष्ठता।
  42. शरणागत: शरण को आगत (आया हुआ) — कर्म तत्पुरुष (को)।
  43. जेबखर्च: जेब के लिए खर्च — व्यय का प्रयोजन।
  44. पापमुक्त: पाप से मुक्त — अपादान कारक (पृथकता)।
  45. जलमग्न: जल में मग्न — डूबने का आधार जल है।
  46. गुरुदक्षिणा: गुरु के लिए दक्षिणा — संप्रदान तत्पुरुष।
  47. प्रेममयी: प्रेम से युक्त — करण तत्पुरुष।
  48. राजआज्ञा (राजाज्ञा): राजा की आज्ञा — सत्ता और आदेश का सम्बन्ध।
  49. विद्यासागर: विद्या का सागर — ज्ञान की अगाधता का सम्बन्ध।
  50. सत्यग्रह (सत्याग्रह): सत्य के लिए आग्रह — आग्रह का पावन उद्देश्य (संप्रदान)।


3. कर्मधारय समास (Appositional / Descriptive Compound)

नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'कर्मधारय' का अर्थ है—'कर्म को धारण करने वाला' अर्थात् जो दूसरे पद की विशेषता या उसके गुण रूपी कर्म को स्वयं में धारण करता है।
  • पद प्रधानता: यह तत्पुरुष का ही एक उपभेद है, अतः इसमें भी उत्तर पद ही प्रधान होता है।
  • गहन विश्लेषण: इस समास के दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य (Qualitative) या उपमान-उपमेय (Metaphorical) का सम्बन्ध होता है। पहला पद दूसरे पद की बनावट, रंग, गुण या श्रेष्ठता की व्याख्या करता है। विग्रह करने पर 'है जो' या 'के समान' या 'रूपी' शब्द आते हैं।
50 उदाहरण और कारण
  1. नीलकमल: नीला है जो कमल — 'नीला' विशेषण है और 'कमल' विशेष्य।
  2. महापुरुष: महान है जो पुरुष — पुरुष की महानता का गुण प्रकट है।
  3. चरणकमल: कमल के समान चरण — चरणों की तुलना (उपमेय) कमल (उपमान) से है।
  4. चंद्रमुख: चंद्रमा के समान मुख — मुख की सुंदरता की तुलना चाँद से है।
  5. पीतांबर: पीला है जो अंबर (कपड़ा) — वस्त्र का रंग पीला होना (विशेषण)।
  6. महात्मा: महान है जो आत्मा — आत्मा की आंतरिक उच्चता का सूचक।
  7. कापुरुष: कायर है जो पुरुष — पुरुष की हीनता वाचक विशेषण।
  8. मृगनयन: मृग के समान नयन — आँखों की उपमा हिरण की आँखों से है।
  9. क्रोधग्नि (क्रोधाग्नि): क्रोध रूपी अग्नि — क्रोध पर अग्नि का आरोप (रूपक सम्बन्ध)।
  10. विद्याधन: विद्या रूपी धन — ज्ञान को धन के रूप में श्रेष्ठ बताया गया है।
  11. सज्जन: सत् (अच्छा) है जो जन — व्यक्ति का गुण 'अच्छा' होना है।
  12. कुपुत्र: कुत्सित (बुरा) है जो पुत्र — पुत्र की बुराई का विशेषण।
  13. परमानंद: परम है जो आनंद — आनंद की चरम सीमा (विशेषण)।
  14. नीलगगन: नीला है जो गगन — आकाश के रंग की विशेषता।
  15. अधमरा: आधा है जो मरा — अवस्था सूचक विशेषण पद।
  16. रक्तांबर: रक्त (लाल) रंग का है जो अंबर — वस्त्र का वर्ण।
  17. कृष्णसर्प: कृष्ण (काला) है जो सर्प — साँप की प्रजाति/रंग का बोध।
  18. भलमानस: भला है जो मानस (मनुष्य) — मनुष्य की भलमनसाहत।
  19. वचनामृत: वचन रूपी अमृत — वचनों की मधुरता की तुलना अमृत से।
  20. देहलता: देह रूपी लता — कोमल शरीर पर लता का आरोप।
  21. महारानी: महान है जो रानी — नारी की प्रशासनिक या उच्च स्थिति।
  22. श्वेतपत्र: श्वेत (सफेद) है जो पत्र — पत्र का रंग या सरकारी दस्तावेज की विशेषता।
  23. मंदबुद्धि: मंद है जिसकी बुद्धि (या मंद है जो बुद्धि) — बुद्धि का धीमापन।
  24. सद्धर्म: सत् है जो धर्म — धर्म की सत्यता।
  25. प्राणप्रिय: प्राणों के समान प्रिय — प्रियता की तुलना प्राणों से की गई है।
  26. नराधम: नरों में है जो अधम (नीच) — व्यक्ति की हीनता का विशेषण।
  27. लौहपुरुष: लोहे के समान सुदृढ़ है जो पुरुष — व्यक्ति की दृढ़ता की उपमा।
  28. कनकता: कनक (सोने) के समान चमकती लता — रूपक-उपमा का मेल।
  29. कमलनयन: कमल के समान नयन — नयनों की उपमा कमल दल से।
  30. मुखचंद्र: मुख रूपी चंद्रमा — चेहरे पर चाँद का अभेद आरोप।
  31. कीर्तिलता: कीर्ति रूपी लता — यश का विस्तार लता की तरह होना।
  32. शोकसागर: शोक रूपी सागर — दुःख की अगाधता को सागर के समान बताना।
  33. कुमति: कुत्सित (बुरी) है जो मति — मति का कुत्सित रूप।
  34. सुनीति: सु (अच्छी) है जो नीति — नीति की श्रेष्ठता।
  35. दीनदयाल: दीन (गरीबों) पर दया करने वाले हैं जो — दयालुता का गुण।
  36. शुभागमन: शुभ है जो आगमन — आने की मंगलमयता।
  37. नवयुवक: नव (नया/युवा) है जो युवक — आयु सूचक विशेषण।
  38. पूर्णचंद्र: पूर्ण है जो चंद्र — चंद्रमा की पूर्ण गोलाई की अवस्था।
  39. सत्कर्म: सत् (अच्छा) है जो कर्म — कर्म की गुणवत्ता।
  40. नीलकंठ: नीला है जो कंठ — शिव जी के अर्थ से अलग केवल कंठ की विशेषता।
  41. घनश्याम: घन (बादल) के समान श्याम (काला) — रंग की उपमा।
  42. ऋषिवर: ऋषियों में श्रेष्ठ है जो — श्रेष्ठता सूचक पद।
  43. ग्रंथरत्न: ग्रंथ रूपी रत्न — ग्रंथ का मूल्य रत्न के समान बताना।
  44. भवसागर: भव (संसार) रूपी सागर — दुनिया की तुलना गहरे समंदर से।
  45. कुसंगत: कुत्सित है जो संगति — संगति का दोष दिखाना।
  46. परमेश्वर: परम है जो ईश्वर — ईश्वरीय सत्ता की सर्वोच्चता।
  47. अंधकूप: अंधा (गहरा/अंधेरे से युक्त) है जो कूप (कुआँ) — कुएँ की भयावहता।
  48. लालमिर्च: लाल है जो मिर्च — मिर्च के तीखे रंग का बोध।
  49. गुरुदेव: गुरु रूपी देव — गुरु को देवता के समतुल्य मानना।
  50. कालीमिर्च: काली है जो मिर्च — मिर्च की प्रजाति का रंग सूचक।

4. द्विगु समास (Numeral Compound)
नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'द्विगु' शब्द स्वयं में इस समास का उदाहरण है। इसका विग्रह होता है—'द्वयोः ग्वोः समाहारः' (दो गायों का समूह)। 'द्वि' यानी दो (संख्या) और 'गु' यानी गाय (संज्ञा)।
  • पद प्रधानता: यह भी तत्पुरुष का उपभेद है, अतः इसमें भी उत्तर पद ही प्रधान माना जाता है, लेकिन इसकी पहचान पूर्व पद से होती है।
  • गहन विश्लेषण: इस समास का पहला पद अनिवार्य रूप से संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा समस्त पद किसी 'समूह' (Collection) या 'समाहार' का बोध कराता है। यह स्वतंत्र अर्थ न देकर समाहार को मुख्य रखता है।
50 उदाहरण और कारण
  1. चौराहा: चार राहों का समाहार — 'चार' संख्या राहों के समूह को दर्शाती है।
  2. नवग्रह: नौ ग्रहों का समूह — 'नौ' संख्या आकाशीय पिंडों के समूह का वाचक है।
  3. त्रिलोक: तीन लोकों का समाहार — तीन भुवनों के समूह का बोध।
  4. सप्ताह: सात अह्नों (दिनों) का समूह — समय की सात कड़ियों का योग।
  5. पंचवटी: पाँच वटों (वृक्षों) का समूह — स्थान विशेष में वृक्षों की संख्या।
  6. द्विगु: दो गायों का समूह — नाम के अनुरूप मूल द्विगु रूप।
  7. शताब्दी: शत (सौ) अब्दों (वर्षों) का समूह — सौ सालों का कालखंड।
  8. अष्टाध्यायी: आठ अध्यायों का समाहार — पाणिनी के ग्रंथ की संरचना (8 अध्याय)।
  9. त्रिवेणी: तीन वेणियों (नदियों) का समाहार — संगम स्थल पर तीन धाराओं का मिलना।
  10. दशब्दी (दशक): दस वर्षों का समूह — समय का दस वर्षीय रूप।
  11. त्रिभुज: तीन भुजाओं का समाहार — ज्यामितीय आकृति जिसमें तीन रेखाएँ हैं।
  12. चौमासा: चार मासों (महीनों) का समूह — वर्षा ऋतु के चार महीने।
  13. दुबन्नी: दो आनों का समूह — पुरानी मुद्रा की संख्या।
  14. चवन्नी: चार आनों का समाहार — मौद्रिक मूल्य की सामूहिक संख्या।
  15. अठन्नी: आठ आनों का समूह — 50 पैसे के सामूहिक सिक्के का मूल्य।
  16. त्रिफला: तीन फलों का समाहार — आयुर्वेद की तीन जड़ी-बूटियों का योग।
  17. सतसई: सात सौ (दोहों) का समाहार — बिहारी लाल की रचना के पद।
  18. पंचपात्र: पाँच पात्रों (बर्तनों) का समूह — पूजा के बर्तनों की संख्या।
  19. षट्कोण: छह कोणों का समाहार — ज्यामिति की छह कोण वाली आकृति।
  20. नवरात्र: नौ रात्रियों का समूह — शक्ति पूजा के नौ दिनों का त्योहार।
  21. दशमुख (यदि साधारण अर्थ में लें): दस मुखों का समूह — संख्या प्रधान (अन्यथा बहुब्रीहि)।
  22. द्विवेदी: दो वेदों को जानने वाला या दो वेदों का समूह — संख्यात्मक ज्ञान।
  23. त्रिवेदी: तीन वेदों का ज्ञाता — संख्या वाचक कुल उपाधि।
  24. चौपाय: चार पैरों का समूह (पशु) — शारीरिक अंगों की संख्या।
  25. पंचतत्व: पाँच तत्वों का समाहार — सृष्टि के ५ मूल घटक।
  26. दुमट: दो मिट्टियों का मिश्रण — कृषि भूमि का संख्यात्मक रूप।
  27. तिरंगा: तीन रंगों का समाहार — भारत के ध्वज के तीन रंग (समूह वाचक)।
  28. इकतारा: एक तार वाला वाद्य यंत्र — तारों की एकल संख्या।
  29. दोपहर: दो पहरों का समाहार — समय का द्वितीय भाग।
  30. पचमढ़ी: पाँच मढ़ियों (कुटियाओं) का समूह — पर्यटन स्थल की भौगोलिक संख्या।
  31. त्रिपुंड: तीन रेखाओं का समूह — माथे पर चंदन की तीन लकीरें।
  32. त्रिरत्न: तीन रत्नों का समूह — जैन या बौद्ध धर्म के ३ रत्न।
  33. चौखट: चार खूटों (कोनों) का ढांचा — दरवाजे का चौकोर रूप।
  34. सतखंडा: सात खंडों (मंजिलों) का मकान — इमारत की ऊंचाई का संख्यात्मक रूप।
  35. पंचामृत: पाँच अमृत तुल्य पदार्थों का समूह — चरणामृत के ५ घटक।
  36. नवरत्न: नौ रत्नों का समाहार — अकबर के दरबार के ९ विद्वान या मणि।
  37. त्रिकाल: तीन कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) का समूह — समय के तीन आयाम।
  38. चतुष्पदी: चार पदों (पैरों) का छंद या समूह — काव्यात्मक संरचना।
  39. सप्तर्षि: सात ऋषियों का समूह — आकाश का तारामंडल।
  40. दशमूल: दस जड़ों का समाहार — आयुर्वेद की औषधि।
  41. दुगुना: दो गुना समूह — गणितीय आवृत्ति।
  42. त्रिमूर्ति: तीन मूर्तियों का समाहार — देवत्रय की मूर्तिकला।
  43. चौपड़: चार पट्टियों का खेल — पासे के खेल का आधार।
  44. पंचांग: पाँच अंगों का समाहार — ज्योतिषीय काल गणना।
  45. सप्तपदी: सात पदों (वचनों) का समूह — विवाह के सात फेरे।
  46. षटऋतु: छह ऋतुओं का समूह — वर्ष चक्र की ६ ऋतुएँ।
  47. त्रिनेत्र (साधारण गणना): तीन नेत्रों का समूह — संख्या का बोध।
  48. अष्टसिद्धि: आठ सिद्धियों का समूह — हनुमान जी की ८ शक्तियाँ।
  49. नवनिधि: नौ निधियों का समाहार — कुबेर की ९ संपत्तियाँ।
  50. शतदल: सौ दलों (पंखुड़ियों) का समूह — कमल के फूलों की पंखुड़ियां।

5. द्वंद्व समास (Copulative Compound)
नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'द्वंद्व' का शाब्दिक अर्थ है—'मल्ल युद्ध', 'जोड़ा' या 'कलह'। जब दो समान बलशाली योद्धा आपस में लड़ते हैं, तो कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।
  • पद प्रधानता: इस समास में दोनों पद (पूर्व पद और उत्तर पद) प्रधान होते हैं।
  • गहन विश्लेषण: इसमें दोनों पद एक-दूसरे के विपरीत (विलोम) या पूरक होते हैं। दोनों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है। इनके बीच प्रायः 'योजक चिह्न' (-) लगा होता है। विग्रह करने पर 'और', 'या', 'अथवा', 'एवं' जैसे समुच्चयबोधक अव्यय लगते हैं। इसके तीन उपभेद हैं: इतरेतर (और), वैकल्पिक (या), और समाहार (इत्यादि)।
50 उदाहरण और कारण
  1. माता-पिता: माता और पिता — दोनों ही पारिवारिक रूप से समान रूप से प्रधान हैं।
  2. पाप-पुण्य: पाप या पुण्य — दो विपरीत नैतिक अवस्थाओं का द्वंद्व (वैकल्पिक)।
  3. दिन-रात: दिन और रात — काल चक्र के दो अनिवार्य परस्पर विरोधी अंग।
  4. सुख-दुःख: सुख या दुःख — जीवन की दो अनुभूतियाँ जो बारी-बारी आती हैं।
  5. भाई-बहन: भाई और बहन — सगे सम्बन्धों की समान प्रधानता।
  6. अन्न-जल: अन्न और जल — जीवन यापन के दोनों अनिवार्य पूरक तत्व।
  7. धर्म-अधर्म: धर्म या अधर्म — आचरण के दो मार्ग (एक समय में एक ही संभव)।
  8. अमीर-गरीब: अमीर और गरीब — समाज के दोनों वर्गों का सामूहिक बोध।
  9. भला-बुरा: भला या बुरा — नीतिगत मूल्यांकन के दो छोर।
  10. छोटा-बड़ा: छोटा और बड़ा — आकार या पद की दृष्टि से परस्पर विरोधी युग्म।
  11. राधा-कृष्ण: राधा और कृष्ण — भक्ति मार्ग के दो पूरक अभिन्न नाम।
  12. सीता-राम: सीता और राम — मर्यादा पुरुषोत्तम और शक्ति का युग्म।
  13. खट्टा-मीठा: खट्टा और मीठा — स्वाद के दो भिन्न अनुभव।
  14. ठंडा-गरम: ठंडा या गरम — स्पर्शानुभूति के दो विपरीत रूप।
  15. हार-जीत: हार या जीत — प्रतियोगिता के दो संभावित परिणाम।
  16. लाभ-हानि: लाभ या हानि — व्यापारिक आर्थिक परिणाम।
  17. नर-नारी: नर और नारी — सृष्टि के दोनों लैंगिक आधार।
  18. देश-विदेश: देश और विदेश — भौगोलिक क्षेत्रों का सामूहिक रूप।
  19. गंगा-यमुना: गंगा और यमुना — दो प्रमुख नदियाँ, दोनों स्वतंत्र रूप से प्रधान।
  20. दूध-दही: दूध और दही — खाद्य पदार्थों का पूरक जोड़ा।
  21. दाल-रोटी: दाल और रोटी — भोजन की बुनियादी आवश्यकता (समाहार में 'दाल-रोटी इत्यादि' जीवनयापन)।
  22. घी-शक्कर: घी और शक्कर — मधुर भोजन का युग्म।
  23. अपना-पराया: अपना या पराया — सम्बन्धों की भावना के दो छोर।
  24. आकाश-पाताल: आकाश और पाताल — ब्रह्मांड के दो विपरीत छोर।
  25. आगे-पीछे: आगे और पीछे — दिशा सूचक परस्पर विरोधी शब्द।
  26. ऊँचा-नीचा: ऊँचा या नीचा — धरातल की असमानता।
  27. यश-अपयश: यश या अपयश — सामाजिक प्रतिष्ठा और कीर्ति के दो रूप।
  28. स्त्री-पुरुष: स्त्री और पुरुष — समाज के दो मुख्य स्तंभ।
  29. गुण-दोष: गुण और दोष — किसी वस्तु या व्यक्ति की समग्रता।
  30. लेन-देन: लेना और देना — व्यापार की दो पूरक क्रियाएँ।
  31. जीवन-मरण: जीवन और मरण — सृष्टि का अकाट्य सत्य चक्र।
  32. आज-कल: आज और कल — समय के दो निरंतर हिस्से।
  33. रात-दिन: रात और दिन — अहोरात्र का बोध।
  34. सत्य-असत्य: सत्य या असत्य — कथ्य की प्रामाणिकता।
  35. जड़-चेतन: जड़ और चेतन — दार्शनिक रूप से संपूर्ण प्रकृति।
  36. राजा-प्रजा: राजा और प्रजा — राज्य व्यवस्था के दो समान महत्वपूर्ण अंग।
  37. सुबह-शाम: सुबह और शाम — दिन के दो संधिकाल।
  38. हाथ-पैर: हाथ और पैर — शरीर के अंगों का समाहार (हाथ-पैर इत्यादि)।
  39. कपड़ा-लत्ता: कपड़ा और लत्ता — वेशभूषा का समाहार वाचक रूप।
  40. रुपया-पैसा: रुपया और पैसा — धन-दौलत का सामूहिक रूप।
  41. कंद-मूल: कंद और मूल — ऋषियों के भोजन के अवयव।
  42. देव-दानव: देव और दानव — पौराणिक इतिहास के दो परस्पर विरोधी दल।
  43. कृष्ण-अर्जुन: कृष्ण और अर्जुन — महाभारत के दो मुख्य पात्र।
  44. जलवायु: जल और वायु — पर्यावरण के दो मुख्य प्राणवायु तत्व।
  45. थोड़ा-बहुत: थोड़ा या बहुत — अनिश्चित संख्या/मात्रा का द्वंद्व।
  46. पच्चीस: पाँच और बीस — इतरेतर द्वंद्व (संख्याओं का योग भी द्वंद्व होता है)।
  47. कतरा-कतरा (या चाल-चलन): चाल और चलन — व्यवहार का समाहार।
  48. लोटा-डोरी: लोटा और डोरी — कुएँ से पानी निकालने के दो पूरक साधन।
  49. नमक-मिर्च: नमक और मिर्च — भोजन का स्वाद बढ़ाने वाले तत्व।
  50. घी-तेल: घी और तेल — वसायुक्त रसों का समाहार।

6. बहुब्रीहि समास (Attributive / Exocentric Compound)
नाम के अनुरूप गहन परिभाषा
  • नाम का अर्थ: 'बहुब्रीहि' का शाब्दिक अर्थ है—'बहु' (बहुत सा) और 'ब्रीहि' (धान/चावल) अर्थात् "बहुत धान वाला व्यक्ति (किसान या धनी)"। यह नाम स्वयं ही किसी तीसरे व्यक्ति की ओर इशारा कर रहा है।
  • पद प्रधानता: इस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता (अन्य पद प्रधान होता है)।
  • गहन विश्लेषण: जब दो पद (पूर्व और उत्तर) आपस में मिलते हैं, तो वे अपने सामान्य अर्थ को पूरी तरह छोड़ देते हैं। वे दोनों मिलकर किसी तीसरे विशेष संज्ञा (व्यक्ति, वस्तु, देवता या स्थान) के विशेषण या पर्यायवाची के रूप में कार्य करते हैं। विग्रह करने पर 'जिसका', 'जिसकी', 'जिसके', 'वह' जैसे शब्द आते हैं।
50 उदाहरण और कारण
  1. लम्बोदर: लंबा है उदर जिसका अर्थात् गणेश — दोनों पद मिलकर 'गणेश जी' को रूढ़ करते हैं।
  2. दशानन: दस हैं आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण — दस मुखों का स्वामी केवल रावण है।
  3. चक्रपाणि: चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके अर्थात् विष्णु — सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु का बोध।
  4. पीतांबर (विशिष्ट अर्थ): पीले हैं वस्त्र जिसके अर्थात् कृष्ण — यहाँ कृष्ण जी विशेष्य बन जाते हैं।
  5. चतुर्भुज: चार हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात् विष्णु — चार भुजाधारी देव।
  6. नीलकंठ: नीला है कंठ जिनका अर्थात् शिव — विषपान के कारण प्रसिद्ध शिव का नाम।
  7. गजानन: गज (हाथी) के समान आनन है जिसका अर्थात् गणेश — हाथी के मुख वाले देव।
  8. त्रिलोचन: तीन हैं लोचन (आँखें) जिनकी अर्थात् शिव — दिव्य सीवीतीसरी आँख वाले महादेव।
  9. चंद्रशेखर: चंद्रमा है शिखर (सिर) पर जिसके अर्थात् शिव — शीश पर चाँद धारण करने वाले।
  10. गंगाधर: गंगा को धारण किया है जिसने अर्थात् शिव — जटाओं में गंगा को रोकने वाले।
  11. गिरिधर: गिरि (पहाड़) को धारण किया था जिसने अर्थात् कृष्ण — गोवर्धन उठाने वाले।
  12. मुरलीधर: मुरली को धारण करता है जो अर्थात् कृष्ण — वंशी बजाने वाले नंदनंदन।
  13. दिगंबर: दिशाएं ही हैं अंबर (वस्त्र) जिनका अर्थात् शिव या जैन मुनि — नग्न रहने वाले योगी।
  14. श्वेतांबरी (या श्वेतांबरा): श्वेत वस्त्रों वाली है जो अर्थात् सरस्वती — ज्ञान की देवी।
  15. वीणापाणि: वीणा है पाणि (हाथ) में जिसके अर्थात् सरस्वती — संगीत की देवी।
  16. पंकज: पंक (कीचड़) में जन्म लेता है जो अर्थात् कमल — कीचड़ में पैदा होने वाली हर वस्तु पंकज नहीं, केवल कमल है।
  17. जलज: जल में उत्पन्न होता है जो अर्थात् कमल/शंख — विशिष्ट अर्थ में रूढ़।
  18. आशुतोष: जो आशु (शीघ्र) तोष (प्रसन्न) हो जाते हैं अर्थात् शिव — भोलेनाथ की विशेषता।
  19. महावीर: महान वीर हैं जो अर्थात् हनुमान/जैन तीर्थंकर — विशिष्ट पुरुषों के लिए रूढ़।
  20. बज्रांग (बजरंगबली): वज्र के समान अंग हैं जिसके अर्थात् हनुमान — सुदृढ़ शरीर वाले कपिराज।
  21. मारुतनंदन: मारुत (वायु) के नंदन (पुत्र) हैं जो अर्थात् हनुमान — पवनपुत्र।
  22. दशरथपुत्र (या राघव): रघु के वंशज हैं जो अर्थात् राम — रघुकुल शिरोमणि।
  23. निशाचर: निशा (रात) में विचरण करता है जो अर्थात् राक्षस/असुर — रात्रि के जीव।
  24. चंद्रमुखी: चंद्रमा के समान मुख है जिसका अर्थात् सुंदरी स्त्री — किसी विशेष सुंदरी का सूचक।
  25. सुलोचना: सुंदर हैं लोचन जिसके अर्थात् मेघनाद की पत्नी/विशेष स्त्री — सुंदर आँखों वाली नारी।
  26. भूपेन्द्र (या महीपति): मही (धरती) का पति है जो अर्थात् राजा — शासक के लिए रूढ़।
  27. पंचानन: पाँच हैं आनन जिसके अर्थात् शिव/सिंह — शिव का तांत्रिक रूप या शेर।
  28. षडानन: छह हैं आनन जिसके अर्थात् कार्तिकेय — शिव के जेष्ठ पुत्र।
  29. कुसुमायुध: कुसुम (फूल) ही हैं आयुध (शस्त्र) जिसके अर्थात् कामदेव — प्रेम के देवता।
  30. मनसिज: मन में सृजित (पैदा) होता है जो अर्थात् कामदेव — मन की वासना/प्रेम।
  31. अनंग: बिना अंग के है जो अर्थात् कामदेव — शिव के श्राप से भस्म हुए बिना शरीर के देव।
  32. त्रिवेणी (स्थान): तीन नदियाँ मिलती हैं जहाँ अर्थात् प्रयागराज — तीर्थराज प्रयाग का वाचक।
  33. मकरध्वज: मकर (मगरमच्छ) के चिह्न वाला ध्वज है जिसका अर्थात् कामदेव/हनुमान पुत्र — विशिष्ट व्यक्तित्व।
  34. जगतपिता: जगत के पिता हैं जो अर्थात् ब्रह्मा — सृष्टि के रचयिता।
  35. चतुरानन: चार हैं आनन जिसके अर्थात् ब्रह्मा — चार मुखों वाले देव।
  36. कमलासन: कमल है आसन जिनका अर्थात् ब्रह्मा — कमल के फूल पर बैठने वाले।
  37. लक्ष्मणानुज: लक्ष्मण के अनुज (छोटे भाई) हैं जो अर्थात् शत्रुघ्न — रामायण का पात्र।
  38. घनश्याम (विशिष्ट): घन के समान श्याम हैं जो अर्थात् श्रीकृष्ण — सांवले कन्हैया।
  39. वक्रतुंड: वक्र (टेढ़ी) है तुंड (सूंड) जिसकी अर्थात् गणेश — मंगलमूर्ति।
  40. एकदंत: एक है दंत (दांत) जिनका अर्थात् गणेश — परशुराम युद्ध में एक दांत टूटने वाले देव।
  41. विघ्नहर्ता: विघ्नों को हरने वाले हैं जो अर्थात् गणेश — संकटमोचक।
  42. सिंधुसुता: सिंधु (समुद्र) की सुता (पुत्री) हैं जो अर्थात् लक्ष्मी — समुद्र मंथन से प्रकट देवी।
  43. पद्मासना: पद्म (कमल) है आसन जिनका अर्थात् लक्ष्मी — धन की देवी।
  44. उमापति: उमा (पार्वती) के पति हैं जो अर्थात् शिव — महादेव का पारिवारिक नाम।
  45. शूलपाणि: शूल (त्रिशूल) है पाणि में जिसके अर्थात् शिव — त्रिशूलधारी।
  46. मृगेन्द्र: मृगों (पशुओं) का इन्द्र (राजा) है जो अर्थात् सिंह — जंगल का राजा शेर।
  47. खगेश: खगों (पक्षियों) का ईश है जो अर्थात् गरुड़ — भगवान विष्णु का वाहन।
  48. जितेंद्रीय: जीत ली हैं इंद्रियां जिसने अर्थात् ऋषि/सिद्ध पुरुष — संयमी महात्मा।
  49. दीर्घबाहु: दीर्घ (लंबी) हैं बाहु (भुजाएं) जिसकी अर्थात् विष्णु/वीर पुरुष — अलौकिक शक्ति संपन्न।
  50. बारहसिंगा: बारह हैं सींग जिसके अर्थात् एक विशेष वन्य पशु — हिरण की प्रजाति विशेष।

💡 गहन तुलनात्मक निष्कर्ष:
  1. अव्ययीभाव क्रिया की रीति, समय या स्थान बताता है।
  2. तत्पुरुष कारक की कड़ियों से जुड़कर उत्तर पद का महत्त्व बढ़ाता है।
  3. कर्मधारय गुण की प्रशंसा या तुलना करता है।
  4. द्विगु केवल गणितीय समाहार (समूह) तक सीमित रहता है।
  5. द्वंद्व तराजू के दो पलड़ों की तरह दोनों पदों को बराबर हक़ देता है।
  6. बहुब्रीहि इन सब से ऊपर उठकर एक नया रहस्यमयी या अलौकिक 'तीसरा अर्थ' सामने लाता है।

 अलंकार

एआई मोड
हिंदी साहित्य में छंद कविता की रचना को लयबद्ध, सुव्यवस्थित और संगीतमय बनाने के नियम हैं। मुख्य रूप से इनमें मात्राओं (ह्रस्व/लघु और दीर्घ/गुरु) की गणना की जाती है।
लघु मात्रा (। ) का मान 1 होता है और गुरु मात्रा (ऽ) का मान 2 होता है।
यहाँ चौपाई, दोहा और सोरठा छंद की विस्तृत जानकारी उदाहरण के साथ दी गई है:
1. चौपाई छंद
यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण (लाइन्स) होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अंत में दो गुरु (ऽऽ) होना शुभ माना जाता है।
  • उदाहरण:
    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
    राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
  • मात्रा गणना (प्रथम चरण):
    ज (1) य (1) ह (1) नु (1) मा (2) न (1) ज्ञा (2) न (1) गु (1) न (1) सा (2) ग (1) र (1) = 16 मात्राएँ।
2. दोहा छंद
यह एक अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें भी चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) होना जरूरी है।
  • उदाहरण:
    रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
    पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
  • मात्रा गणना (प्रथम पंक्ति):
    • प्रथम चरण: र (1) हि (1) म (1) न (1) पा (2) नी (2) रा (2) खि (1) ए (2) = 13 मात्राएँ।
    • द्वितीय चरण: बि (1) न (1) पा (2) नी (2) स (1) ब (1) सू (2) न (1) = 11 मात्राएँ।
3. सोरठा छंद
यह भी एक अर्धसम मात्रिक छंद है। यह दोहा छंद का ठीक उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरणों के अंत में तुक (Rhyme) मिलती है।
  • उदाहरण:
    जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन।
    करहु अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
  • मात्रा गणना (प्रथम पंक्ति):
    • प्रथम चरण: जो (2) सु (1) मि (1) र (1) त (1) सि (1) धि (1) हो (2) इ (1) = 11 मात्राएँ।
    • द्वितीय चरण: ग (1) न (1) ना (2) य (1) क (1) क (1) रि (1) ब (1) र (1) ब (1) द (1) न (1) = 13 मात्राएँ।

छंद तुलना सारणी (Quick Summary)
छंद का नामछंद का प्रकारकुल चरणपहले और तीसरे (विषम) चरण की मात्राएँदूसरे और चौथे (सम) चरण की मात्राएँविशेष पहचान
चौपाईसम मात्रिक416 मात्राएँ16 मात्राएँहर चरण में बराबर (16) मात्राएँ होती हैं।
दोहाअर्धसम मात्रिक413 मात्राएँ11 मात्राएँसम चरणों (2, 4) के अंत में जगण (।ऽ।) या तगण नहीं आता, अमूमन गुरु-लघु (ऽ।) होता है।
सोरठाअर्धसम मात्रिक411 मात्राएँ13 मात्राएँयह दोहे का उल्टा है। विषम चरणों (1, 3) के अंत में तुक मिलती है।

अलंकार 

का शाब्दिक अर्थ है 'आभूषण' या 'गहना'। [1] जिस प्रकार आभूषण पहनने से नारी के सौंदर्य में वृद्धि होती है, ठीक उसी प्रकार काव्य (कविता) में अलंकारों के प्रयोग से उसके सौंदर्य, प्रभाव और चमत्कार में वृद्धि होती है। [1] संक्षेप में, काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहते हैं। 
अलंकार के प्रकार (Types of Alankar)
मुख्य रूप से अलंकार के दो भेद होते हैं (कुछ विद्वान 'उभयालंकार' को मिलाकर तीन भी मानते हैं, लेकिन मुख्य दो ही हैं): [2]
  1. शब्दालंकार: जहाँ शब्दों के प्रयोग के कारण काव्य में चमत्कार या सौंदर्य पैदा होता है। [2]
  2. अर्थालंकार: जहाँ शब्दों के अर्थ के कारण काव्य में चमत्कार या सौंदर्य पैदा होता है। [2]
नीचे दोनों भेदों के प्रमुख अलंकारों और उनके 5-5 उदाहरणों की सूची दी गई है:

1. शब्दालंकार के प्रमुख भेद और उदाहरण
शब्दालंकार के तीन मुख्य रूप हैं: अनुप्रास, यमक और श्लेष। [2]
(अ) अनुप्रास अलंकार (Alliteration)
जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। [2]
  • उदाहरण 1: तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। ('त' वर्ण की आवृत्ति)
  • उदाहरण 2: रघुपति राघव राजा राम। ('र' वर्ण की आवृत्ति)
  • उदाहरण 3: चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही थीं जल-थल में। ('च' वर्ण की आवृत्ति)
  • उदाहरण 4: कालिंदी कूल कदंब की डारिन। ('क' वर्ण की आवृत्ति)
  • उदाहरण 5: मुदित महीपति मंदिर आए। ('म' वर्ण की आवृत्ति)
(ब) यमक अलंकार
जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग-अलग हो, वहाँ यमक अलंकार होता है। [2]
  • उदाहरण 1: कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। (पहले कनक = सोना, दूसरे कनक = धतूरा) [2]
  • उदाहरण 2: काली घटा का घमंड घटा। (पहली घटा = बादल, दूसरी घटा = कम होना)
  • उदाहरण 3: तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं। (पहले बेर = बार/समय, दूसरे बेर = फल)
  • उदाहरण 4: जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं। (पहले तारे = उद्धार करना, दूसरे तारे = आसमान के सितारे)
  • उदाहरण 5: सजना है मुझे सजना के लिए। (पहले सजना = श्रृंगार करना, दूसरे सजना = पति/प्रियतम)
(स) श्लेष अलंकार
श्लेष का अर्थ होता है 'चिपका हुआ'। जहाँ एक ही शब्द का प्रयोग एक ही बार हो, लेकिन उसके अर्थ एक से अधिक (अलग-अलग संदर्भों में) निकलें, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। [2]
  • उदाहरण 1: रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून। (पानी के तीन अर्थ हैं: मोती के लिए = चमक, मनुष्य के लिए = इज्जत, आटे/चूने के लिए = जल)
  • उदाहरण 2: चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर। सुबरन को ढूँढत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर। (सुबरन के तीन अर्थ हैं: कवि के लिए = अच्छे शब्द, व्यभिचारी के लिए = सुंदर रूप, चोर के लिए = सोना/स्वर्ण)
  • उदाहरण 3: मंगन को देखि पट देत बार-बार है। (पट के दो अर्थ हैं: वस्त्र और दरवाजा)
  • उदाहरण 4: जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करे, बढ़े अंधेरो होय। (बारे = बचपन में / जलाने पर, बढ़े = बड़ा होने पर / बुझने पर)
  • उदाहरण 5: मधुवन की छाती को देखो, सूखी इसकी कितनी कलियाँ। (कलियाँ = खिलने से पूर्व की दशा / यौवन पूर्व की अवस्था)

2. अर्थालंकार के प्रमुख भेद और उदाहरण
अर्थालंकार के अंतर्गत मुख्य रूप से उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा आते हैं। [2]
(अ) उपमा अलंकार (Simile)
जहाँ किसी अत्यंत प्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति से किसी सामान्य वस्तु या व्यक्ति की तुलना (समानता) की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। इसमें सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। [2]
  • उदाहरण 1: हरि पद कोमल कमल से। (भगवान के पैरों की तुलना कमल से की गई है)
  • उदाहरण 2: पीपर पात सरिस मन डोला। (मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है)
  • उदाहरण 3: मुख मयंक सम मंजु मनोहर। (मुख की तुलना चंद्रमा से की गई है)
  • उदाहरण 4: हाय फूल सी कोमल बच्ची, हुई राख की थी ढेरी। (बच्ची की तुलना फूल से की गई है)
  • उदाहरण 5: कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। (वचनों की तुलना वज्र से की गई है)
(ब) रूपक अलंकार (Metaphor)
जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) में कोई भेद न रखकर दोनों को एक ही मान लिया जाता है (अर्थात रूप दे दिया जाता है), वहाँ रूपक अलंकार होता है। [2]
  • उदाहरण 1: चरन कमल बंदौ हरि राई। (चरणों को ही सीधा कमल कह दिया गया है)
  • उदाहरण 2: मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहूँ। (चंद्रमा को ही खिलौना मान लिया गया है)
  • उदाहरण 3: पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। (राम नाम को ही रत्न रूपी धन मान लिया गया है)
  • उदाहरण 4: मन सागर, मनसा लहरि, बूढ़े बहे अनेक। (मन को सागर और इच्छाओं को लहरें माना गया है)
  • उदाहरण 5: आए महंत वसंत। (वसंत ऋतु को सीधा महंत/साधु का रूप दे दिया गया है)
(स) उत्प्रेक्षा अलंकार
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसमें मनु, मानो, जनु, जानो, मनहु, जनहु जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। [2]
  • उदाहरण 1: सोहत ओढ़ें पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात। (श्रीकृष्ण के शरीर पर पीले वस्त्रों को देखकर ऐसा लगता है मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो)
  • उदाहरण 2: उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा। मानो हवा के ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा। (शरीर के काँपने में सोते हुए सागर के जागने की कल्पना है)
  • उदाहरण 3: ले चला साथ मैं तुझे कनक, ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण जनक। (धतूरे को ऐसे ले चला मानो भिक्षुक को सोना मिल गया हो)
  • उदाहरण 4: सिर फट गया उसका वहीं, मानो अरुण रंग का घड़ा। (फटे सिर में लाल रंग के घड़े की संभावना की गई है)
  • उदाहरण 5: पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के, मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के। (बादलों के आने में शहर के दामाद/पाहुन के आने की कल्पना की गई है)


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हिंदी साहित्य में छंद कविता की रचना को लयबद्ध, सुव्यवस्थित और संगीतमय बनाने के नियम हैं। मुख्य रूप से इनमें मात्राओं (ह्रस्व/लघु और दीर्घ/गुरु) की गणना की जाती है।
लघु मात्रा (। ) का मान 1 होता है और गुरु मात्रा (ऽ) का मान 2 होता है।
यहाँ चौपाई, दोहा और सोरठा छंद की विस्तृत जानकारी उदाहरण के साथ दी गई है:
1. चौपाई छंद
यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण (लाइन्स) होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अंत में दो गुरु (ऽऽ) होना शुभ माना जाता है।
  • उदाहरण:
    जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
    राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
  • मात्रा गणना (प्रथम चरण):
    ज (1) य (1) ह (1) नु (1) मा (2) न (1) ज्ञा (2) न (1) गु (1) न (1) सा (2) ग (1) र (1) = 16 मात्राएँ।
2. दोहा छंद
यह एक अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें भी चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) होना जरूरी है।
  • उदाहरण:
    रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
    पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
  • मात्रा गणना (प्रथम पंक्ति):
    • प्रथम चरण: र (1) हि (1) म (1) न (1) पा (2) नी (2) रा (2) खि (1) ए (2) = 13 मात्राएँ।
    • द्वितीय चरण: बि (1) न (1) पा (2) नी (2) स (1) ब (1) सू (2) न (1) = 11 मात्राएँ।
3. सोरठा छंद
यह भी एक अर्धसम मात्रिक छंद है। यह दोहा छंद का ठीक उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे (सम) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरणों के अंत में तुक (Rhyme) मिलती है।
  • उदाहरण:
    जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन।
    करहु अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
  • मात्रा गणना (प्रथम पंक्ति):
    • प्रथम चरण: जो (2) सु (1) मि (1) र (1) त (1) सि (1) धि (1) हो (2) इ (1) = 11 मात्राएँ।
    • द्वितीय चरण: ग (1) न (1) ना (2) य (1) क (1) क (1) रि (1) ब (1) र (1) ब (1) द (1) न (1) = 13 मात्राएँ।

छंद तुलना सारणी (Quick Summary)
छंद का नामछंद का प्रकारकुल चरणपहले और तीसरे (विषम) चरण की मात्राएँदूसरे और चौथे (सम) चरण की मात्राएँविशेष पहचान
चौपाईसम मात्रिक416 मात्राएँ16 मात्राएँहर चरण में बराबर (16) मात्राएँ होती हैं।
दोहाअर्धसम मात्रिक413 मात्राएँ11 मात्राएँसम चरणों (2, 4) के अंत में जगण (।ऽ।) या तगण नहीं आता, अमूमन गुरु-लघु (ऽ।) होता है।
सोरठाअर्धसम मात्रिक411 मात्राएँ13 मात्राएँयह दोहे का उल्टा है। विषम चरणों (1, 3) के अंत में तुक मिलती है।




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