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मैं डिजिटल युग का

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मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विरह प्रेमी कवि हूं। तुम्हारे अनंत:पुर से, निष्कासित श्रापित यक्ष हूं। मेघ नहीं बिट से अपना, हाल-ए-दिल पहुंचाता हूं। तुम्हारी विरह वेदना में जब, ऑफ से ऑन हो जाता हूं। तब एक अक्षर लिखने को भी, एट बिट से एक बाइट बनाता हूं।। एमबी फिर जीबी भी, जब कम पड जाते हैं। तब चाहत से अपनी,  टेरा बाइट बनाता हूं। नेटवर्क कंजेक्शन और, व्यस्ततम रूट तुम्हारा। फिर भी अपना सन्देश,  तुम तक पहुंचाता हूं। जज़्बातों के छोटे-छोटे पैकेट कर, हर पैकेट में लिख दोनों का एड्रेस, फिर सभी को तुम्हें सेंड करता हूं। उनमें से कुछ तुम तक पहुंचे, कुछ कंजेक्शन में फंस के लौटे, आहों के रूटर से उनको, फिर री रूट दिखलाता हूं। ये क्रम यूं ही अनवरत चलता रहेगा, जब तक हर पैकेट तुम तक न पहुंचा दूं। क्योंकि ? मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विराह प्रेमी कवि हूं। मेघ नहीं बिट से तुम तक, अपनी विरह वेदना पहुंचाता हूं। Shailendra S. Mr. भूपेंद्र सिंह बघेल, सतना को सादर समर्पित।

गॉडफादर 2

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गॉडफादर 2 पापा !  लगभग 25 वर्ष की एक खूबसूरत सी लड़की होठों में गजब की मुस्कुराहट लिए सामने खड़ी थी। उसका संबोधन सुनकर वह चौक गया, " कौन ! कौन हो तुम !! "        वह कमरे में दाखिल होते हुए बोली, " पापा !! आपने मुझे पहचाना नहीं ...  मैं ... मैं खुशी हूं ... " " हा ..... खुशी .... तुम यहां !! इस वक्त !!  . ." , उसे एकाएक विश्वास ही न हुआ था खुशी कैसे हो सकती है वह तो . . . " हां पापा ! मैं ... आपकी बेटी ... " ,  ओह राइटर ! पिता के लिए बेटी के दिल की दीवानगी न पहचान पाये ? खून के रिश्ते ही सब कुछ नहीं होते, राइटर।      जलजले का वह दूसरा दिन था। मंजर और भी खौफनाक था। ताश के मानिंद धराशाही इमारतें और उनके मलबे में दबी अनगिनत लाशें, और जो बचे उनके करुण विलाप। दिल दहला देने वाले अविश्वसनीय दृश्य थे।      आलीशान कोठी के मलबे के ढेर के नीचे दबी लाशें अभी तक बाहर न निकाली जा सकी थी। बड़ी-बड़ी मशीने, क्रेन का भारी शोर-शराबा और उनके बीच वह स्तब्ध मौन खड़ा न रह सका। न रो लेने की क्षमता और न अपने आप को खुद समेट कर किसी ...

गॉडफादर - 1

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            जब दरख़्त के साए उनके कद से लंबे हो चले ठीक तभी एक यात्री विमान चील की मानिंद रनवे की तरफ झपटा। लगभग चंद मिनटों बाद है दो अधेड़ व्यक्ति एयरपोर्ट से बाहर निकले और पार्किंग में खड़ी लग्जरी कार की तरफ बढ़े। उनमें से एक व्यक्ति समकालीन लेखक और दूसरा धनाढ्य, दोनों में गहरी मित्रता, जो स्कूल के जमाने से चली आ रही थी। उन्होंने एक दूसरे को नाम भी दे रखा था राइटर और वेल्दीमैन।           कुछ देर बाद कार शहर की भीड़भाड़ को चीरती हुई हाईवे पर दौड़ने लगी। खामोशी के एक लंबे अंतराल के बाद वेल्दीमैन ने कुछ दार्शनिक अंदाज में पूछा , " राइटर ! अपनों से दूर एक अजनबी शहर में, .... पराए लोगों के बीच मरना कितना तकलीफदेह होता है ...... तुमने कभी एहसास किया है ?"    हूं ......  राइटर ने सहमति से अपना सर कई बार हिलाया। फिर ओठों के बीच सिगरेट दबा तल्लीनता से लाइटर जलाने में व्यस्त हो गया।        " राइटर ! मुझसे न पूछोगे ? " ,     राइटर ने गहरी दृष्टि से वेल्थीमैन की तरफ देखा फिर हौले स...

आशाओं के दीप - 2

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      आशा के मुताबिक उसमें कोई पत्र नहीं था। उसमें कागज का एक छोटा सा टुकड़ा था और उसके नाम से एक डिमांड ड्राफ्ट। हिसाब के टुकड़े में मूलधन प्लस ब्याज मिलाकर जितना टोटल होता था, वह रकम डिमांड ड्राफ्ट में लिखी थी।     " ओह ! कितना शातिर और बदमाश निकला। तुम्हारे सारे सपने चुरा लिए और देखो भेजा भी तो क्या भेजा! पैसे वापस किए उसने !! हम लोगों ने क्या समझा और वह क्या निकला !!! "       पारुल भरपूर अपने दिल की भड़ास निकाल रही थी। लेकिन उसकी दीदी चुपचाप खामोशी से पथराई सी आंखों से कभी हिसाब के उस छोटे से कागज के टुकड़े को देखती तो कभी डिमांड ड्राफ्ट को। पल भर के लिए उसे भी महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके सारे सपने चुपके से चुरा भी लिए हो।           "  दीदी हम उसे ऐसे ही नहीं छोड़ेंगे। मैं तो उसकी क्लास लूंगी। मैं तो कहती हूं दीदी तुम्हें उससे कम से कम एक बार मिलना चाहिए। हम पता लगाएंगे शहर का नाम तो मालूम ही है। हम खोज निकलेंगे उसे। और फिर पूछेंगे, तुम न सही लेकिन मैं उससे जरूर पूछूंगी। उसने तुम्हारे साथ ऐसा क्यों कि...

आशाओं के दीप - 1

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        दीदी कब तक करोगी उसका इंतजार ? दो  साल कम नहीं होते ? वह आने से रहा। पक्का बिजनेसमैन निकला दीदी, सौ लगाए और लाखों लेकर चला गया।          पारुल ने दीदी के चेहरे में नजरें गड़ा दी। देखना चाहती थी कि उसकी बातों का उसकी दीदी पर क्या असर हुआ। लेकिन उसकी दीदी उसी तरह उदास स्वर में बोली, " उसने कहा था वह आएगा . .  उसने कहा था आशाओं के दीप कभी बुझने न देना . . ."        " तुम समझती क्यों नहीं दीदी . .",  पारुल कृतिम क्रोध दिखाते हुए बोली थी, " आशाओं के दीप जले और जलकर बुझ भी गए। कभी सोचती हूं . . . तुम्हारी उससे मुलाकात न होती तो अच्छा था . . . उससे कभी बात न होती तो अच्छा था . .  और उससे कभी मोहब्बत न होती तो और अच्छा होता।        पारुल उसी कृतिम क्रोध को लिए कमरे से बाहर चली गई। उसे यादों का मृदुल स्पर्श मिला।      " मुंबई वैरायटी शो ", प्रदर्शनी की जान हुआ करती थी। किशोरवय से लेकर उम्र दराज तक के लोग दर्शक दीर्घा में होते। मादक फिल्मी गानों की प्ले क...

अक्सर मुझे देख कर !

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अक्सर मुझे देख कर, तुम्हारी ही बातें करते हैं लोग, हां सच! मैं कुछ भी नहीं पूछता, फिर भी ! सब कुछ बताते हैं,  तुम्हारे बारे में लोग। न जाने क्यों यह भी पूछते हैं कि,  मैं तुमसे कहीं नाराज तो नहीं? फिर भी मैं कुछ नहीं कहता ! हां चुप रहता हूं !! तब बड़ी हमदर्दी से,  लोग मुझसे कहते हैं, संभालो खुद को,  अक्सर दिल में ही तो, बिजलियां गिरा करती हैं दोस्त!! फिर भी मैं कुछ नहीं कहता,  चुप रहता हू, और तब ? और भी बारीकी से बताते हैं लोग। कैसे कुछ ने तुम्हें उदास देखा था, कैसे कुछ ने तुम्हें हंसता भी देखा था। किसी की याद में गुमसुम, अपने घर के सामने ही, कल बैठा हुआ भी देखा था। चलती राह के मुसाफिरों को रोक, मेरे बारे में पूछते हुए भी देखा था। नादान हैं, न जाने कौन सी कहानियां बनाते हैं लोग? हां, मैं जानता हूं, मुझे पता है ! बस यह कहानियां ही तो है, जो अक्सर मुझे सुनाते हैं लोग ।। और भी ना जाने,  क्या-क्या बताते हैं लोग। जैसे वे गवाह हो,  तुम्हारी तन्हाइयों के, जैसे वे गवाह हों,  तुम्हारी रुसवाईयों के, जैसे वे गवाह हों,  मेरी बेबाफाइओ के, कुछ ...

न जाने क्या पा लिया उसने !

ना जाने क्या कह गया वह जमाने से, अपना ही शहर छोड़ गया मेरे आने से। बमुश्किल खोज पाया था मैं उसे, फिर क्यों रूठा है ? लौट कर न आने से। शायद तुमसे ही कुछ कह गया हो मेरे बारे में अब तुम भी बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से। ना जाने क्या पा लिया, उसने किसी खजाने से ? क्या कम थे ये मोती, जो गिरे मेरी आंखों से? ना जाने क्या पा लिया, उसने चुप रह जाने से? बमुश्किल छोड़ा होगा उसने भी, किसी के समझाने से। बताओ कुछ तो कह गया होगा वह तुमसे? अब तुम्ही बताना उसे, क्या गुजरी है उसके जाने से।। Shailendra S.