ss

 Khaa h sahab is samay
आपकी यादों में, वरना क्या वजूद हमारा
 Ji
Nakaila ghom jayiye kisi din
पहले यह बताओ, कैसी हो तुम
Badiya hu
25tarik ko aa gyi hu Nakaila
नकैला छोड़े हुए लगभग 1 साल होने को आए हैं, बहुत खुशी हुई तुमने मैसेज किया
Jii
मेरी कार के अगले पहिए का हब डिस्टर्ब है कंपनी में आर्डर किया है लेकिन अभी तक आया नहीं है, आप ही लिए मिल लीजिए हमसे ?
Jii dekhiye satna jana hoga to Call karungi aapko
हम तुम्हारी मम्मी से शर्मिंदा भी हैं, एक छोटा सा सीमांकन का काम न करवा सके, जिस घर से इतना प्यार दुलार मिला इज्जत सम्मान मिला उनके किसी काम न आ सके। सोचता हूं तो गिल्टी महसूस करता हूं
Koii baat nhi. Maii bhi gyi thi parso Bola h 1week k andr ki naap dunga Ri se baat kar k aai hu
Paise bhi bol aai hu ki 10hjar dungii naap do
Bola to h Ab dekhiye kya hota h
RI कौन है ? क्या अंबिका प्रसाद त्रिपाठी जी हैं ?
Nhii
Rajneesh varma
तब एक काम और करना, नक्शा तरमीम भी करवा लेना।
Naksa satna se
Nikalwa layi hu
और बताओ आनंद, रिद्धि सिद्धि सब कैसे हैं
Ek dum Badiya h sab log
पुराना बंदोबस्ती नक्शा रिकॉर्ड रूम से ?
Jii
तो फिर यह बहुत अच्छा काम किया कंप्यूटर के डिजिटल नक्शे उतने सही है नहीं
Hmmmm...
कल आप उसकी इमेज मुझे भेजिएगा
[30/05, 10:58 pm] S Singh: Computer wala hi h
[30/05, 10:58 pm] S Singh: Sayad
[30/05, 10:58 pm] S Singh: Bhejungi aapko
[30/05, 11:02 pm] Shailendra Singh Parihar: मैने तुमसे से कभी कहा था कि जब भी तुम बहुत याद आती हो तो मैं तुम्हें एक खत लिखता हूँ। इस तरह तुम्हे याद भी कर लेता हूँ और तुम डिस्टर्ब भी नहीं होती। यदि हँसो न तो एक पैराग्राफ भेजु
 😜😜
 Ji
 यदि मैंने तुम पर कोई इल्जाम लगाया भी तो तुम्हारे बदले सारे एक्सक्यूस भी मैंने दिए। तुम्हारे लिए मैं खुद से भी लड़ा हूं कि तुम सही हो और मैं गलत हूं। आज भी लड़ता हूं और आज भी अपने आप को ही दोषी मानता हूं और तुम्हें सही पाता हूं।
[30/05, 11:09 pm] S Singh: Accha
[30/05, 11:09 pm] S Singh: Aisa kyuu
[30/05, 11:10 pm] Shailendra Singh Parihar: दुनिया की रंगीनियां अब नहीं लुभाती, किसी से बातें करने का मन भी नहीं करता, अकेला और शांत रहना पसंद करता हूं। तब भी कहीं ना कहीं एक तस्वीर मेरी निगाहों में आकर ठहर जाती है, कुछ पल के लिए फिर उससे भी बातें करता हूं। कभी-कभी मन को समझाता हूं कि जो मिला वह मिट्टी है जो नहीं मिला वह सोना लगता है। यदि तुमने स्वीकार कर लिया होता तो शायद तुम से इतनी मोहब्बत न होती। दूर हो तो कम से कम मोहब्बत तो कायम है। लेकिन तब भी यह बात मुझे उतनी ही झूठ महसूस होती है जितना कि कहूं कि सूरज पश्चिम से निकलता है और पूर्व में डूबता है।
Aap bhi na 😀😀
तुमसे न कहूँ तो फिर किस से कहू
Ha ye bhi sahi baat hai
सही है न ? जिससे प्यार हो उस से कहना जरूरी होता है। विवाह, परिवार, बचन को निभाना पड़ता है, और प्यार को जीना होता है, मेरा ऐसा मानना है
Bilkul Usee hi kahna uchit rhta h
जहां पर त्याग का अर्थ एक दूसरे को त्याग देना नहीं बल्कि संसार के सभी वैभव, सभी आकर्षण से तटस्थ रहकर एक दूसरे को स्वीकार करना, अंगीकार करना और स्वयं के अंदर जीते चले जाना है।
Jii, Aap bhut deeply likhte h
मैने तुम्हे अपने अंदर जिया है शिल्प
Jii
मैं जानता हूं, कल की दुनिया अलग थी, आज की दुनियां अलग है। तब मैंने अपनी कलम से अपनी एक अलग दुनिया बनाई और तुम्हे साथ ले उसी दुनिया में चलते हुए तुम तक ही पहुंचा और फिर जब कभी तुम पूछती हो कि " क्या कभी तुमने मुझे याद किया ?" तो समझ नही पाता कि तुम्हे क्या जवाब दूं । तब पूरी की पूरी "आह! तुम कहा गए" भी अधूरी सी लगती है।

:यदि मान सको तो मान लेना, यही मेरे जीवन का सच है जिसे साबित करने के लिए आह! तुम कहा गए" के  सिवा न तो कोई शख्स है, न कोई सबूत, न कोई दलील।
Jii
Maii padti hu jo aap likhte h
Stetus me bhi
क्योंकि प्रेम संबंध में योग नहीं वियोग होता है, दूरियां होती हैं। इंसान अपने अहंकार और अस्तित्व को खोकर अर्थात शून्य होकर इसे प्राप्त करता है। दूरियां अर्थात भाग। अब आप 0 / 0 करे तो परिणाम अनंत आएगा। अनंत अर्थात अनकाउंटेबल, अनडिफाइंड जिसकी गिनती नहीं की जा सकती है और जो अपरिभाषित है। इसलिए कभी किसी से मत पूछिए कि वह आपसे कितना प्रेम करता है, और कभी यह बताने की कोशिश भी मत कीजिए कि आप उसे कितना प्रेम करते हैं।
🌹❤️❤️❤️🌹❤️❤️🌹❤️
हमारे विचार और दृष्टिकोण केवल हमारे व्यक्तित्व को ही प्रभावित नहीं करते हैं। हम दूसरे के प्रति जो विचार या दृष्टिकोण रखते हैं उसका प्रभाव भी उस व्यक्ति पर हमारे प्रति देखने में आता है।
तो एक सच तुमसे आज कहता हूँ, तुम पढ़ सको इसलिए ये स्टेटस में लिखता हूं, और यह उतना ही सच है जितना कि सूरज का पूर्व से निकलना
Accha
Maii padti hu Sare stetus
और जब नहीं पड़ती हो तो मैं उदास हो जाता हूँ 😭
😁😜😜
सच में,
Ha
मुझे तो लगा तुम डांटेगी, स्टॉकिस्ट कहीं के
😁😁 Nhii
और एक बात तुमसे और कहता हूं, दोस्ती में प्यार हो सकता है, आसान है। लेकिन जिससे मोहब्बत हुई उससे केवल दोस्त मान लेना संभव नहीं। इसलिए अब एक दूसरे को, केवल दोस्त मान लेना हमारी मजबूरी को ही प्रदर्शित करेगा। क्योंकि जहां तक मैं समझता हूं प्रेम, प्रेम होता है उसका कोई दूसरा विकल्प नहीं होता उसे किसी दूसरे शब्द से विस्थापित नहीं किया जा सकता। मिलते हैं जिंदगी के फिर किसी मोड़ पर मैं कभी भी खुद को तुम्हारे काबिल समझ ही नहीं पाया। तुम सुंदर हो, स्मार्ट हो, पढ़ी लिखी भी हो। और तुम में हजार कारण थे कि कोई भी तुमसे मोहब्बत कर सकता था, लेकिन मुझ में ? फिर भी मैने की और की ही नहीं उसका इजहार भी किया।
[30/05, 11:38 pm] Shailendra Singh Parihar: शुभ रात्रि
[31/05, 7:42 am] Shailendra Singh Parihar: रात्रि की शुभ रात्रि का जवाब सुबह के शुभ सुबह में भी न दिया !! कैसी गर्लफ्रेंड हो मेरी !!!
[31/05, 7:43 am] Shailendra Singh Parihar: गुड मॉर्निंग जी 💥
[31/05, 7:52 am] Shailendra Singh Parihar: नक्शा भेज दीजिएगा

मैंने तुमसे कहा न, अपनी उपेक्षा का मैंने कभी तुम्हें दोषी माना ही नहीं, तो फिर आज क्यों मान लूं कि तुम्हारे प्रति प्रेम को स्वीकार कर मुझसे कोई जुर्म हो गया। कुछ दिनों तक मैं ये भी न समझ पाया था कि तुमसे इतनी सहजता से अपने हृदय की बाते लिख जाता था। तुम्हारे सामने एक नए रिश्ते की शुरुआत थी, और मेरे पास एक ठहरे हुए जीवन की शांति। क्या तुमसे मात्र आकर्षण था, यदि हां तो किस बात का। तुम्हारे रूप, सुंदरता, ज्ञान का; या फिर कोई रूहानी रिश्ता। पता नहीं क्या था, पर कुछ न कुछ तो था जिसमें मैं लगातार बंधता जा रहा था। 
 इत्तेफाक से ही सही एक रात घर में रुकना हुआ। सुबह चाय पीते हुए उस बादाम के पेड़ को पहली बार गौर से देखा और सोचा ये जिंदगी भी तो कुछ इसी तरह की होती है। उलझी, घुमावदार किंतु सुंदर और लुभावनी। फिर एक शाम इस पेड़ के नीचे तुम्हें कुछ उदास बैठा हुआ देखा। दिल में आया रुक जाऊं, तुमसे तुम्हारी उदासियों का कारण पूछ लूं। लेकिन अगले ही पल एहसास हुआ, यदि मैं रुका भी तुम शायद ही मेरे पास बैठना पसंद करो। तब तुम किसी न किसी बहाने से अंदर चली जाती। तो क्या यह पल भी मैं तुमसे छीन लूं ? उसे दिन पहली बार मन में एक ख्वाहिश नहीं जन्म लिया। एक दिन इसी बादाम के पेड़ के नीचे मैं तुम्हारे साथ बैठकर चाय पिऊंगा। और देखो तो वह ख्वाहिश आज भी अधूरी रह गई। 
     फिर अगले साल तुम्हें स्कूल के सामने बैठे हुए भी देखा। यह दो तस्वीर हमेशा मेरे हृदय में कैद हो कर रह गई। कभी किसी ने मुझसे कहा था कि हम जैसा हैं दूसरों को वैसा ही समझने की भूल कर लेते हैं, जबकि यह दुनिया झूठे, मक्कार और फरेबी लोगों से भरी पड़ी है। मैं जानता था तुम्हारा मन सच्चा है, मैं सच्चा हूँ, लेकिन देखने वालों की निगाहें? जरूरी नहीं कि वह भी सच्ची हो ? मेरी एक भूल का परिणाम क्या हो सकता है ? बस इसी का आभास होते ही मैं अंतर्मुखी हो गया। शायद यही हाल-ए-दिल तुम्हारा भी रहा हो। या फिर हमारा मिलना किसी अधूरी कहानी का मुकम्मल होना था ?

कभी तुमने लिखा था, "जब तक तुम इस धरती में रहोगे, मैं तुम्हारे साथ रहूंगी...". तो कहता हूँ आज तुमसे, "क्यों भटक रही हो मेरे साथ ? मुक्त हो जाओ अपने वादे से... अब तुम भी कह दो मुझे अलविदा..."


कुरेद कर पुराना जख्म दिल का,
फिर तुम यूं खामोश हो गए।
कोई मजबूरी थी बेचारे दिल की,
या फिर कोई पुरानी रंजिश निभा गए।
(शैलेन्द्र एस.)

पीहू कहानी "अजनबी" का कोई पात्र नहीं बल्कि पूरी की पूरी कहानी ही है। यदि मैं उसे इस कहानी का पात्र मान भी लूँ तो उसके द्वारा कही गई यह बात भी माननी होगी, "एक ऐसी रोमांटिक कहानी जो कालचक्र से परे है... जहा बिछोह के बाद भी किरदार एक दूसरे के मन में बसते है..."


जो तुम कभी आओ मेरे घर, मेरे न रहने के बाद,
तो चुपके से समेट लेना खुद को,
और ले जाना अपने साथ।
मेरे घर में तुम्हारी बहुत सी यादें होंगी, 
मेरी कुछ किताबें, कुछ तुम्हें लिखे अधूरे-पत्र,
जो अब भी तुम्हारे आने का रास्ता तकते होंगे।
लेकिन आईने के सामने ज्यादा देर मत ठहरना,  
उसमें मैं भी तुम्हें देखते हुए दिख सकता हूँ, 
एक आखिरी मुलाकात की आरजू लिए,
जिसे मैने कभी अधूरा छोड़ दिया था।
(शैलेन्द्र एस.)
मेरे दिल में जो जज्बात थे तुम्हारे लिए, 
वो सब मैंने अपनी कहानी के, 
एक किरदार से कहे।
अब हैरान हूं परेशान भी, 
कि तुझे चाहूं या उसे चाहूं।


एक सुबह, जड़ों की शुरुआती के दिन थे मैं बाहर बैठा था सामने मदिर, उसके पीछे तुम्हार घर। पीछे से उगता हुआ सूरज, जब मैंने लिखा, तुमसे मिलना, मिलकर बिछड़ना किसी रोमांटिक कहानी की शुरुआत नहीं हो सकती।
उस वीरान, तपते पत्थरों के बीच मेरे पास क्या था  ? सिर्फ तुम न  ?इसलिए कहता हूं कविता कभी झूठी नहीं थीं। फिर किसी और को सुनाई भी नहीं। हो सकता है जिन्होंने किताबों में पढ़ी हो तो पढ़ी हो लेकिन मैं फिर मैने उसका जिक्र सिर्फ तुमसे किया है इसके अलावा किसी और से नहीं। 
सोच समझ के कहता हूं मैं यह सब बातें तुमसे इसलिए शेयर कर रहा हू, कि मेरे मन की भावना सच्ची है, तुम सच्ची हो शिल्प। दुनिया झूठी और फरेब से भरी है। कौन किस पल किसी से छल कर जए, ना हम समझते हैं ना तुम ।



बस इतना करना, 
जाते वक्त दरवाजा धीरे से बंद कर देना।
कहीं मेरी यादें बाहर ना निकल जाएं, 
और तुम्हारे साथ चली आएं ।

वारिसना, रजिस्ट्री, वसीयत इत्यादि से संबंधित नामांतरण के समय:-
खसरे में दर्द होने वाला नया नाम आधार कार्ड के नाम और उसकी वल्दियत के नाम से मैच होना चाहिए।  नहीं तो आगे चलकर फार्मर रजिस्ट्री (किसान आईडी), आधार ई केवाईसी पीएम किसान पोर्टल में नाम इत्यादि नहीं अप्रूव हो पाएंगे। 

प्रिय दोस्तों,
सप्रेम नमस्कार।
मैं कोई ऊंचे कद का लेखक नहीं। कोई शोहरत या बड़ा नाम नहीं। लेखन के शुरुआती दौर में मैंने कुछ छोटी-छोटी कहानियां लिखी। कुछ प्रकाशित हुई और कुछ मेरे बिस्तर की सिलवटों में बिखर के रह गईं। एक दौर ऐसा भी आया जब मैंने लिखना छोड़ दिया, लेकिन कुछ कहानियां मेरे अंतस में लगातार चलती रहीं। दशक बाद जब मैंने दोबारा कलम उठाई तो मन में विचार आया कि क्यों न उन्हीं कहानियों को कागज पर उतारूँ। लेकिन कैसे ? यह सबसे बड़ा प्रश्न था मेरे सामने। मैंने पूरी ईमानदारी से उन्हें कम से कम शब्दों में लिखने की कोशिश की, लेकिन नहीं लिखा पाया।

 जिंदगी का कोई एक पहलू ,एक लम्हा या एक पल होता तो शायद मैं भी गागर में सागर भरने में कामयाब हो जाता। लेकिन नहीं, यहां तो मेरे किरदारों द्वारा कहे गए हर एक शब्द, जिए गए हर एक लम्हे, हर एक पल यादगार थे। उनके द्वारा महसूस किए गए हर एक जज़्बात अपने आप में एक कहानी थे। लिखने के दौरान ही मैंने महसूस कर लिया कि उन्हें शब्दों की सीमाओं में बांध देना उनके साथ नाइंसाफी होगी। 
    आप स्वयं विचार कीजिए यदि मैंने उन्हें कम से कम शब्दों में बांधने की कोशिश की होती, या जिसे आप कह सकते हैं सागर को गागर में भरने की कोशिश की होती, तो फिर सागर की वे लहरें कहां जाती ? उनकी बेचैनियों को कौन समझता ? अपनी तड़प लिए साहिल से उनके टकराने का दर्द कौन महसूस कर पाता ? मैं यह भी जानता हूँ कि आंखों से दो आंसू बहे या हजार, उनके दर्द की इंटेंसिटी एक-सी होती है, लेकिन लगातार उनके बहाते रहने की पीड़ा का एहसास फिर कौन कर पाता। फिर कौन किसी से कह पाता, "खुद का रोना भूल गया हूँ, जब से तेरी इन आंखों में तिरते आंसू देखे हैं..."
     जो गागर में भर गया, समझिए अमृत हो गया। मूल्यवान है, किंतु जिंदगी जीने के परिपेक्ष में निरर्थक। शायद इसलिए कि फिर वह जीवन-मरण के चक्र से दूर हो गया। जीवन और मृत्यु के बीच का सफर ही तो ज़िन्दगी को जीना है, उसे महसूस करना है। वैसे भी सागर को गागर में भरने की जरूरत क्या है ? उसे तो उसकी उद्यम और उच्चश्रृंखल लहरों के साथ ही खुला छोड़ देना चाहिए, जिसकी अनंत गहराइयों में हजारों जीव सांस लेते हैं। खुले आसमान के नीचे, जहां वह उन्मुक्त भाव से आकाश के प्रतिबिंब को स्वयं में समाहित कर सके। सूर्य की तपिश हो या फिर चंद्रमा की शीतल चांदनी या फिर हवा की रवानी, जिन्हें वह आत्मसात कर सके। अब आप ही बताइए क्या एक घड़े में उसे यह सब मिल पाता ? शायद नहीं। 
   सच पूछिए तो मैने पूरी ईमानदारी से कोशिश की थी, आह ! तुम कहां गए, माइलस्टोन और अजनबी के लिये, ताकि आपका मूल्यवान समय बच सके, लेकिन कामयाब नहीं हो पाया।
 तो फिर मैने उन्हें भावनाओं की धरातल में खुला छोड़ दिया, जैसे कि कभी भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त कर दिया था। 
    अजनबी लिखने का एहसास ठीक उसी तरह का रहा जैसे मेरा कोई प्रिय अपनी समस्त वेदनाओं और बेचैनियों को समेटे हुए मुझसे लिपटकर लगातार रोता जा राह है। और मैं ? मैं उसे शब्दों से कोई सांत्वना नही दे पा रहा हूँ, बल्कि मैं भी उसके साथ लगतार रोते रहने के लिए विवश हूँ। अजनबी विवशता के उन्हीं पलों में लिखी गई, पवित्र आँसुओं के सतत् निर्मल प्रवाह की कहानी है। जहां न तो कोई नायक है, न नायिका और न ही कोई खलनायक। यदि कुछ हैं तो किरदारों की अनकही कहानियों, उनके आँसू, उनके जज्बात; जो कभी-कभी आपस में टकरा तो जाते हैं, लेकिन एक दूसरे से विद्रोह नहीं करते।
धन्यवाद के साथ, आपका शैलेन्द्र एस.
सतना, मध्यप्रदेश।

पीहू का जीवन खुले आसमान के नीचे जलते हुए दीपक की तरह रहा। दीपक की लौ चलती हुई तेज़ हवाओं के थपेड़ों के साथ लहराती रही, लड़ती रही, लेकिन उसने हार नहीं मानी। जबकि उसे बखूबी अंदाजा था कि एक दिन किसी दिशा से तेज हवा का एक झोंका आएगा और उसे बुझा जाएगा।  उसके सामने तुम्हें रहकर जाना। मैंने उससे कहा भी कि जरूरत कभी भी प्यार नहीं हो सकता। बेहतर विकल्प जीवन का आधार नहीं हो सकता। उसने स्वीकार भी किया। 
सूली पर लटकये हुए ईशू के हाथों और पैरों से टपकते हुए लहू को तो सभी ने देखा होगा। किंतु आँखों से बहते हुए आँसूओ को शायद ही किसी ने देखा हो। अंतिम समय में कील के ठोकने की असहनीय पीड़ा लिए हुए ईश्वर से उनके द्वारा की गई प्रार्थना, "इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं..." तो सभी ने सुनी होगी। किंतु उस पीड़ा को शायद ही कोई मासूस कर पाया हो..."

मैने पीहू को मरते हुए नहीं देखा और न ही उसे अपने अंतिम क्षणों में सभी के लिए क्षमादान की प्रार्थना करते हुए सुना। लेकिन उसके आंसू और पीड़ा को मैने शिद्दत के साथ वर्षों पहले महसूस कर लिया था...
"मेरे लिए अजनबी लिखना, आज भी उन्हीं आंसुओं और दर्द को महसूस करने के बराबर है..."
उसने कभी मुझसे कहा था मैं तुम्हें जीवन के हर उस मोड़ में मिलूँगी जब तुम उदास होगे। फिर अपने अंतिम समय मैं मेरे लिए उसने एक पत्र लिखा। उसमें लिखा था, मैं तुम्हें जिंदगी के रास्ते में फिर मिलूँगी, हो सकता है, तुम्हें दुनियादारी से दूर अपने अंतर्मन में बसा लूं, लेकिन स्वीकार नहीं करूंगी। यदि उन पलों, उन लम्हों को तुम लिख सके तो समझूंगी कि तुम सचमुच के राइटर हो।
     कुछ दिनों तक मेरा लिखना चालू है, फिर अचानक ही छोड़ दिया सब कुछ निरर्थक लगने लगा। 23 साल की उम्र में माइलस्टोन के लिए लिखी गई कविताएं पड़ी रह गई। पीहू के लिखे हुए पत्र को जो की पूरी किताब के बराबर है कई बार पर पढ़ा। मैं फिर अवसाद के घेरों में घिरता चला गया।  
    आज यह लिखूं की तुमसे मिलना एक इत्तेफाक था तो गलत होगा। कुछ फैसले हम नहीं करते, हमारी नियति करती है। कभी साइंस और कॉमर्स के स्टूडेंट रहे व्यक्ति को लिटरेचर से मोहब्बत हो गई थी। 








ailendra S


Everyone must have seen the blood dripping from Jesus's hands and feet as He hung upon the cross; yet, hardly anyone would have noticed the tears flowing from His eyes.
 Everyone must have heard the prayer He offered to God in those final moments—amidst the excruciating agony of the nails being driven in—"Forgive them, for they do not know what they are doing"; yet, hardly anyone could have truly felt that pain...
I did not see Pihu as she embraced a painful death, nor did I hear her pray for forgiveness for everyone in her final moments. Yet, I had deeply felt her tears and anguish years before...


जहां ठहर कर एक पल के लिए किसी को पढ़ने की जरूरत महसूस ना हो, तो उसको एहसास नहीं दिलाना चाहिए कि हा मैं पढ़ती हूँ। किसी को किसी की कहानी में कोई इंटरेस्ट नहीं होता, मैं जानता हूँ।
माइलस्टोन हो या अजनबी हो मेरी कहानी है, जो मोहताज नहीं कि कोई उसे पढ़े या न पड़े। कभी किसी ने कहा था कि चलती हुई राहों में मैं तुम्हें फिर से मिलूंगी, मुझे आभास हुआ, लेकिन वो नहीं मिली। एक अलग शख्सियत एक अलग चेहरा जिसके लिए मैंने कभी कोई कविता लिखी, हां यही एक तस्वीर है मेरे पास। सच वह नहीं होता जो हमें दिखता है मेरे दोस्त ! बल्कि सच तो वह होता है जिसे हम देखना चाहते और फिर वह हमें दिखता है।

तुम तो मेरे अपने थे। सच, अपना ही माना था तुम्हे । तुम जब भी मेरे सामने आए, मैं ठीक उसी तरह मिली, जैसा कि मैं थी। तुम्हारे सामने सज - संवर कर आने की दिल से कोई ख्वाइश न हुई। जैसी थी वैसे ही आई। 

खुद की अपनी वह तस्वीर, कभी इतनी प्यारी ना लगी, जब तक तुम न लिख गए,

'हां! यही एक तस्वीर है मेरे पास' . . .

कनखियों से छुप कर मुझे देखती आंखे,

कानों में लटकती छोटी-छोटी बालियां,

वजूद की सारी गर्मी समेटे हुए ये होठ,

किसी के आने की आहट पा चुप हो गए हैं।

गालों को छू लेने की, अधूरी लिए आस,

सलीके से सवारे गए ये रेशमी बाल।

नर्म, मुलायम, ये सिंदूरी गाल  

. . . . .

मैं आज भी जब कभी अपनी वह तस्वीर देखती हूं, तो तुम्हारी यही कविता याद आती है मुझे । यह तो सच है कि मैं तुम्हें कनखियों से ही देखा करती थी। 

शायद पढ़ने की कोशिश करती थी कितनी सच्चाई है तुम्हारे मन में, और तुम्हारी इन आंखों में कितनी चाहत है मेरे लिए ।

और न जाने क्यों मुझे हर बार यही महसूस होता कि तुम वह नहीं हो, जैसा कि तुम दिखना चाहते हो। 

मुझे तुम्हारी हर एक बात झूठी लगती। कुछ नहीं बस शब्दों के जादूगर थे तुम, जो मेरा मन मोह लेना चाहते थे।

पता नहीं क्यों, कभी विश्वास ही ना कर पाई तुम पर। जबकि तुम्हारे हर एक शब्द मुझे यकीन दिलाना चाहते थे कि बस यही एक सच्चाई है, मेरे लिए, तुम्हारे मन में -

जिंदगी के अधूरे कैनवास पर,

जिंदगी से उल्लासित एक चेहरा।

वीरान, तपते पत्थरों के बीच

मेरे वजूद का एहसास दिलाता एक चेहरा।

बरसते बादल, कड़कती बिजली,

के बीच दमकता एक चेहरा।

मेरी बेजान उदास रातों में,

मेरे साथ हंसता मुस्कुराता एक चेहरा।

मेरे मन में उसे छू लेने की लिए आस,

हां ! तुम्हारी यही एक तस्वीर है मेरे पास।

. . . . . . .

यह लाइन आह तुम कहां गए कि हैं।

 ब्लॉक करो मुझे, कभी मत पढ़ो, मैं क्या लिखता हूं क्या नहीं ? जो मैं समझ के भी ना समझ पाया। तो इसलिए मेरे स्टेटस पढ़ने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं। दिखावा मत करो मैंने पहले भी लिखा है आज भी लिखता हूं, पढ़ने और पास आउट करने के बीच के फर्क को में समझता हूं। हर कोई पीहू जैसा नहीं होता।

यह मेरी सोच थी, लेकिन गलत थी। पूरी शिद्दत और ईमानदारी से लिखी गई इस कविता के अर्थ को तुम समझोगे शायद समझ पाओ। 

वीरान, तपते पत्थरों के बीच

मेरे वजूद का एहसास दिलाता एक चेहरा।

बरसते बादल, कड़कती बिजली,

के बीच दमकता एक चेहरा।

मेरी बेजान उदास रातों में,

मेरे साथ हंसता मुस्कुराता एक चेहरा।


मैंने गुजरी है वह रातें, वह दिन वह लम्हे, वह पल जो आज भी गुजरात हैं, शिल्प। अब तुम्हारे पास नई जिंदगी है! कहां याद होगी तुम्हें वह बातें। तुम जिसमें खुश हो मैं उसमें खुश हूं। पर आखिरी बार की तरह अब कहता हूँ, की लाग लपेट की दुनिया से दूर कभी तुम्हारे अंतर्मन में कोई पुकार गुजरेगी तो यही होगी, "आह तुम कहां गए"

तुम कभी यह मत समझना कि तुम मुझे ब्लॉक कर दोगी कि मुझसे बात नहीं करोगी, तो मैं तुम्हारे परिवार से दूर हो जाऊंगा। कहते हैं, हर इंसान की जिंदगी की एक कहानी होती है,  अब मैं तुम्हारी जिंदगी में होकर भी नहीं हूँ। मुझे समझने में वक्त लगा और जिसे शायद तुमने बहुत पहले समझ लिया था।।
वैसे भी कहते हैं शिल्प ! टूटे बिखरे दिलों की सौगात क्या ?  क्यों उनके लिए वक्त बर्बाद किया जाए ? मेरी नदानी मेरा बचपन समझ के मुझे माफ कर देना। तुम तो समझडर हो न? 
नासमझ इंसान को ही पता नहीं होता सुबह के 4:00 बजने वाले है

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