द विश - 2
द विश
उसने एकदम सूनी-सूनी नज़रों से मेरी तरफ देखा था। मैने संजीदगी से पूछा, "आज कुछ नहीं कहोग ?"
"क्या कहूँ ?" - उसने सच कहा था, वह तो सब कुछ कह चुका था... अब क्या कहता ?
उस दिन उसने भावुकता में मुझसे कह तो दिया लेकिन मेरी जीवन शैली और मेरा वैभव देखकर वह पीछे हट गया था। सामान्य घर का एक लड़का जिसके उज्जवल भविष्य का अब तक कोई आधार नहीं... अपनी अनिश्चित जीवन शैली और भविष्य में होने वाली स्ट्रगल में मुझे कैसे शामिल कर लेता। इसीलिए तो मैंने कहा था न कि उसकी मैथ्स मजबूत थी। तभी तो मेरी सगाई पर वह अपने ही शहर से दूर चला गया था। उसने अपने आप को गिल्ट महसूस किया होगा, शायद। और क्या केवल मैं इसलिए उसे अपनी जिंदगी से खारिज कर दूं ?
मैं कुछ देर यूं ही चुपचाप उसे देखती खड़ी रही और वह टेबल में सर झुकाए बैठा था। मैंने उससे इतना ही कहा, "भूल जाओ सब कुछ, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है..."
मैं जाने के लिए पलटी, चली ही जाती यदि उसने पीछे से मेरी कलाई न पकड़ ली होती - ' सॉरी !"
मैंने उसी की भाषा में उस से पूछा था, "सॉरी ! किस बात के लिए ?"
फिर वह बच्चों की तरह रो पड़ा। मैंने पलट कर उसके आसूं पोछे - ' तुम ये क्या कर रहे हो ... कही अब तुम उस दिन का बदला तो नहीं ले रहे मुझसे ? '
मैं दिलासा उसे दे रही थी या कि खुद अपने आप को ? पता नहीं ! उसका सुबकना अब हिचकियों में बदल गया था। मैंने अपनी हथेली उसके होठों में रख दी - "न ... रोते नहीं ! जानते हो मेरे दोस्त ! हमने व्यापर किया, लेन - देन किया। तुमने मुझे साइंस पढाई,और मैंने तुम्हे लैंग्वेज। हम दोनों ही सफल रहे, यही हमारी सबसे बड़ी सफलता है। तुमने जो मेरे प्रति महसूस किया, कह गए। मुझे खुशी है कि तुमने अभिव्यक्ति की भाषा सीख ली। लेकिन अब इसका क्या करोगे... मैं तो जीवन की कमेस्ट्री पढ़ गई न ? जीवन में, इस कमेस्ट्री के समीकरण को बैलेंस तो करना ही पड़ेगा। अच्छा तुम ही बाताओ, एक लेडी, लेडीज परफ्यूम का यूज क्यूँ करती हैं ? क्या इसलिए कि उसकी खुशबू उसे पसंद होती है , नहीं।
हम हमेशा अपने ऑपोज़िट को आकर्षित करना चाहते हैं। यही प्रकृति का शाश्वत और अटल नियम है। क्या यह कम है ? मैं यदि कुछ न भी कहूँ , तो क्या मैं इस शाश्वत-अटल नियम को बदल सकती हूँ। हां, कल जहाँ तुम थे, वहां आज मैं खड़ी हूँ... तुम्हारे ही द्वारा समझाए गए सारे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ, बिलकुल तुम्हारे ऑपोज़िट हूँ। मैंने तुमसे कमेस्ट्री पढ़ी। जीवन की कमेस्ट्री में भावनाओं का कोई मोल नहीं मेरे दोस्त। प्यार, फीलिंग्स, आंसू इनका कोई अर्थ नहीं। एक कैमिकल रियेक्सन, एक परफेक्ट साइंटिफिक रीजन। यहाँ तक की प्रेम की अनुभूति का होना भी एक प्रकार से हार्मोनिक कैमिकल रियेक्सन का परिणाम है। याद करो, यही तो समझाया था न तुमने मुझे ? "
वह चुप था। मैंने मन बदलने के लिहाज से कहा - "आओ छत पर चलते हैं..."
वह धीरे - धीरे मेरे साथ चल पड़ा। कुछ देर बाद ही हम छत पर थे। चारो तरफ शहर की जगमगाती रौशनी और ऊपर झील-मिल सितारों से भरा कला आसमान।
मैंने उससे कहा - ' कितना अच्छा लग रहा है न ? '
उसने फीकी मुस्कान के साथ कहा था - ' हां सच, सब कुछ कितना अच्छा लग रहा है.ये सुनो ! तुम्हे अपनी वो कविता याद है ? वही जो...?"
- 'कौन सी ? ---- ओह ! वही वाली जो दशवी में तुम्हे इम्प्रेश करने के लिए...?', उस रात अनायास ही वर्षों से मेरे मन में दबा सच मेरी जुबान पर आ गया था।
"अच्छा !! तो तुमने मुझे...?", कहते कहते वह रुक गया। मैंने शर्म से अपनी नज़रे झुका ली। उसने मेरी असहजता को समझा और बातों की दिशा बदल दी, "हां, वही वाली... ?
मैने उसी तरह झुकी नजरों से कहा- 'हां, कुछ-कुछ याद है, लेकिन अब ये न कहना की सुनाओ..?"
"हां तो !! सुनाओ न...", उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
"अब इतनी भी याद नहीं कि..",
मेरी बात पूरी होती उससे से पहले उसने कहा, "मुझे याद है..."
-'क्या !! तुम्हे __ तुन्हे वो स्टूपिड सी कविता याद है ? ओह गॉड ! तब की याद है !!! ' -मैं आश्चर्यचकित थी - 'अच्छी मैमोरी है तुम्हारी, जिसने लिखी, उसे याद नही... और तुम्हे याद है...!!"
उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं बात मेमोरी की नहीं है... कभी भूल इसलिए नहीं पाया कि दिन में एक न एक बार मन ही मन रिवीजन कर लेता..."
"रिवीजन !! ये तुम्हे कौन सा एग्जाम देना था कि... अच्छा तो सुनाओ..."
- ' नहीं , पहली लाइन तुम कहो ---
-' हां, वो तो याद है, "जब हार गया दिल तुमसे, अब जीत गए भी तो क्या... यही थीं न ?
"हाँ... बिल्कुल यही है..."
"आगे की तुम सुनाओ तो जानू कि तुम्हे याद है ?"
अगले ही पल उसने अपनी आंखें बंद की जैसे खुद को समेट रहा हो और फिर...
बंधनों में बंधी रही मैं,
तू आज़ाद परिन्दे सा।
सपनों में गुंथी रही मैं,
तू आजाद खयालों सा।
बंधनो में बंधी रही मैं,
तू आज़ाद परिन्दे सा।
टूट गिरा दिल के आंगन में ,
तू नील गगन के तारे सा।
बंधनो में बंधी रही मैं,
तू आज़ाद परिन्दे सा।
जब हार गया दिल तुमसे,
अब जीत गए भी तो क्या ।
मैं खो सी गई। उसके कहने का अंदाज़ क्या कहूं ! एक - एक शब्द जैसे उन्हें जिंदगी मिल गई हो।
"है न याद ? कही कुछ भूला तो नहीं ?"
"ओह ! नहीं यार, मुझे याद आ गए... बिकुल वही शब्द हैं... जानते हो, जब तुम्हे इंप्रेश करने के लिए कुछ लिखना चाहा तो पता नहीं ये शब्द कैसे लिख गई। आज इतने सालों बाद तुम्हारे मुख से सुना तो लग ही नहीं रहा कि इन शब्दों को कभी मैंने ही लिखा था। उस समाय तो बस तुकबंदी की थी ! तुम्हारे होठो पर आये तो सज गए... इन्हे इनके अर्थ मिल गए... आज तो मैं तुमसे इम्प्रेश हो गई. !! हां सच, अब तो लगता है, तुम सुनाते रहो और मैं सुनती रहूँ... उस दिन कहाँ पता था कि मैं अपनी ही किस्मत....
- ' अपनी नहीं, हमारी, और किस्मत को कब से मानने लगी तुम ?
- ' हां , सच कहते हो, नहीं मानती थी, लेकिन आज अपने ही लिखे शब्दों को जी रही हूँ, कभी चाहा कि तुम कुछ कहों, तब तुम खामोश रहे...और जब तुमने कहा... तब तक....
- ' जनता हूँ, समझ सकता हूँ, शायद मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना चाहिए था...", उसने नजर मुझसे हटाते हुए कहा।
- ' नहीं...नहीं ये बात नहीं है... कह गए तो अच्छा ही हुआ। कम से कम मेरे लिए तो अच्छा ही है... अब खुद को शायद समझा ले जाऊ कि कभी मैंने जो चाहा वो पाया... हाँ वह मुझे मिला !!
तभी आसमान से एक तारा टूटा, ठीक सामने।
' देखों, अरे वो देखो...एक तारा टूटा ' - मैंने उसे किसी छोटे बच्चे-सा झंझोर दिया।
लेकिन यह क्या ! उसने आखें बंद कर ली। जैसे वह टूटते तारे को देख कोई विश मांग रहा हो। जब उसकी आँखें खुली तो मैंने पुछा - 'कोई विश मांग रहे थे क्या ?"
उसने मुस्कुरातें हुए अपना सर हिलाया। मैंने गौर किया कि उसकी मुस्कान में पहले जैसा फीकापन नहीं बल्कि एक जिंदादिली झलक दिख रही थी।
- तो क्या मांगा तुमने ?", मैं पूछा।
सुने शांत मन से जवाब दिया, "यही कि आसमान से टूटा यह तारा अकेला न रहें..."
- "तो क्या दूसरा भी टूटेगा ? अब देखो ! ये तो बिलकुल भी न कहना... हाँ, कितने अंधविश्वासी होते जा रहे हो तुम !!"
- ' हाँ जरूर टूटेगा, यदि यह दूसरा न हुआ तो दूसरा भी अवश्य टूटेगा... और मुझे कह रही हो अंधविश्वासी ...!! तो अभी किस्मत यानि डेस्टनी की बात किसने की... बोलो ?"
- ' हे भगवान ! तुमसे तो बातो में कोई जीत नहीं..." मेरी बात अधूरी रह गई... मैंने देखा, उसी पल दूसरा तारा टूटा... और उस रात मैने जाना, "इस श्रष्टि का प्रत्येक कण अथवा पार्टिकल किसी न किसी दुसरे पार्टिकल के बांड या अनुबंध में है । जहां भी होंगे, एक-दुसरे को आकर्षित करेंगे..."
अब चाहूँ तो इस कहानी को यही छोड़ा दूँ , लेकिन तब शायद अधूरी रह जाए. इसलिए आगे कहती हूँ,
चलते समय अपने आंसुओं को रोक न सकी, "आंटी ! इसका ध्यान रखियेगा...",
एक माँ से उसी के बेटे के लिए मेरे द्वारा कहे गए ये अंतिम शब्द थे। फिर मैं वह से चली आई। दूसरी सुबह...
"वह शहर ! छूट सा गया. जिंदगी के रास्तें में कहीं दूर, कहीं पीछे रह गया शायद.... लेकिन उसकी याद है कि दिल से जाती नही... वह अक्सर याद आ ही जाता है....
मैं ने कमेस्ट्री से पी.जी. किया फिर पी.एच.डी.। आज कालेज में कमेस्ट्री की प्रोफेसर हूँ। जिंदगी की इस भागम-भाग में... मैं अपने लिए तन्हाई के कुछ पल निकलती हूँ... फिर अपनी पलके बंद कर लेती हूँ.... और तब !! मैं आज भी देखती हूँ कि....
"उस दिन.... आसमान से टूटे दो सितारे, उसी शहर की उसी छत में... एक-दूसरे के सामने खड़े... एक-दूसरे को देखते हुए... उसी तरह मुस्कुरा रहे हैं। चारो तरफ 'शहर की जगमग रौशनी है, और उनके सर के ऊपर झिल-मिल सितारों भरा कला आसमान है।
और !!!... और हर रात उसकी वह विश पूरी होती है।
शैलेन्द्र एस. 'सतना'
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ReplyDeleteलाजवाब कहानी सर, जो किसी बंधन में नहीं बांधती, शायद यही इसकी खासियत है।
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