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एक चोर

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एक चोर। दिल से लिए गए फैसले सही होते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह फैसले आपके लिए हितकारी ही हों।  एक छोटी सी कहानी कहता हूं :       एक शहर में एक प्राचीन मंदिर था। वहां का पुजारी वंश परंपरा के अनुसार ही होता था। यानी पुजारी का लड़का ही पुजारी बनता था। यही परंपरा थी। मंदिर में जो चढ़ावा आता भेंट स्वरूप जो श्रद्धालु भेंट चढ़ाते उनकी चोरी कर-कर के वह परिवार धीरे-धीरे शहर का एक धनाढ्य परिवार बन गया।     उसी शहर में एक चोर था। जो बेहद ही चालाक और शातिर था। यह भी उसके कुल खानदान की परंपरा थी। यह हुनर पीढ़ियों से उसके घर - परिवार में चल रहा था। मानवता और इश्वर पर अटूट विश्वास था। प्रत्येक सुबह मंदिर जरूर जाता। चोरी किए गए धन का कुछ भाग वह मंदिर में चढ़ावे के रूप में चढ़ाता और कुछ गरीबों में बांट देता। शेष भाग से वह अपने घर परिवार का भरण-पोषण करता।       एक दिन वह चोर जब पुजारी के घर से चोरी करके जैसे ही बाहर निकल रहा था, उसी समय रात में आवारागर्दी करने वाले कुछ लोगों ने उसे देख लिया और उसे मारने के लिए पीछे दौड़ पड़े। चोर भागते - भागते ...

अलविदा (🌹कविताएं 🌹)

अलविदा    यादों के इस सफर उससे दुबारा मिलने से पहले मैंने कभी अपनी कल्पनाओं की दुनिया में उसके लिए सोचा था मेरे दोस्त,   अखियां तो भर आती होंगी,  जब मुझे इग्नोर तुम करती होगी।  मेरी मायूसी भी याद आती होगी,  जब बिंदास हंसी तुम हंसती होगी।  आह! मेरी मोहब्बत कैसे भूली होगी,  जब उसे माय लव तुम लिखती होगी।  दे दिलासा अपनी मजबूरी का जब, दोहरा जीवन तुम जीती होगी। ना जाने कितने सपने टूटे होंगे,  ना जाने कितने अरमान उठे होंगे।  तुम गुजर गई, मैं बीत गया,  जब-जब तुमने यह सोचा होगा। मेरी जान, जान पर जान बन आती होगी,  जब मेरीजान उसे तुम कहती होगी। मजबूर हालातों की सूली पर चढ़,  सारी वफाएं हम पर ही तो हंसती होंगी।     मैंने देखा है, महसूस किया है, उसकी मोहब्बत को उसकी सभी चाहतों को, जो जो आज भी उसके हृदय में स्थापित है। हां मेरी राइटर यह कोई भ्रम नहीं है, यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, मैंने देखा है उसे यह जीवन जीते हुए।     आज... आज एकबार फिर अलविदा कहने से पहले मैं .... मैं कहता हूं तुझसे, कि आज मैं उसे...

आह ! तुम कहां गए !!

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सितारों की  दुनियाँ 1  आह ! तुम कहां गए ... ? यह कहानी नहीं , एक विजन है। विजन जो मैंने अपनी आंखों से देखा , जिसे हृदय से महसूस किया। यह मन  का दर्शन है। इसमें आप कोई भी कहानी फिट कर सकते हैं। वास्तव में यह कुछ पत्रों का संग्रह है , जो एक किरदार ने दूसरे किरदार के लिए लिखें , जब वह उसके जीवन से दूर , बहुत दूर जा चुका था।          और जिसके लिए उसने इन्ही पत्रों में ही किसी एक पत्र में लिखा है ,  " तुम मेरी इस कहानी के एकमात्र और बेनाम किरदार हो "              हां , एक बात और ; प्रथम पत्र के शुरुआती संबोधन और अंतिम पत्र के समापन से मैंने उनका क्रम निर्धारित किया। शेष पत्रों का क्रम मैंने अपनी स्वयं की बुद्धि और ज्ञान कौशल से निर्धारित किया है। यदि आपको इनका क्रम उचित ना लगे तो क्षमा कीजियेगा।             उम्र के लिहाज से बड़ी , किंतु जिन्हें मैंने अपने मन से सदैव अपनी छोटी बहन की तरह ही माना , उन्हें सादर समर्पित -   ...