माना कि 💓💓💓

माना इस कदर रुसवा हुए महफिलों में,
बज्म-ए-यारां में अश्क-ए-नूर हो गए ।
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
हां, कुछ तो था हमारी,
आशिकी में भी असर,
जो छलक कर कहीं तुम, 
बस एक जाम न हो गए।
💕💕💕💕💕💕💕
कुछ तो वफा निभाई है तुम ने भी, 
ये मेरी जान - ए  - वफा !
जो हम भी पूरे के पूरे,
किसी और का न हो गए।
💚💚💚💚💚💚
कुछ तो उधार रह गया था शायद,
इस मोहब्बत के बाजार में,
चुकाते रहे जिसका कर्ज,
जो अब तक रुखसत न हो गए।
Shailendra S.
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