कलयुग में तीन युगों का

कलयुग में सतयुग का,
 अब तो आरंभ करो।
हरिश्चंद्र से-सत्य पुरुष का,
 अब धारा में अवतार करो।
तारामती की बलिदान शक्ति का
  अब हर नारी में संचार करो।।

गगन-भेदी हुंकार करो,
  हां राम, धनुष टंकार करो।
खड़ा दसों बुराई का रावण,
  अब दिव्यास्त्र संधान करो।
अमृत घट लिए नाभि में तो क्या,
   हां राम! अब तुम संघार करो।।

बाल्यावस्था में ही, अत्याचारी कंस का,
कर भीषण आघात, मुष्ठि प्रहार करो।
सबल पुरुष की वीर सभा में,
खड़ी द्रोपदी की करुण पुकार सुनो।
शस्त्र-त्याग, अर्जुन खड़ा बीच कुरुक्षेत्र,
भगवत गीता का संचार करो।
अधर्म पक्ष में खड़े भीष्म तो क्या,
उन पर भी बाणों की बौछार करो।
पुत्र-मोह, धर्म-विरुद्ध, हैं खड़े गुरुदेव,
उन पर भी द्रष्टधुम तुम वार करो।
युद्ध क्षेत्र के भगोड़े दुर्योधन पर,
हां भीम! तुम अंतिम प्रहार करो।।

इस कलयुग में भी तीन युगों-सा,
हे पुरुषोत्तम!! तुम न्याय करो।।

Shailendra S.

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