तुम कहां गए - 7

     कोई आरोप पत्र जारी हो उससे पहले मैं कुछ देर के लिए ही सही इस कहानी की डोर अपने हाथ में लेता हूं।  हैलो ! पहले अपने बारे में बता दूँ  - मैं इस कहानी का तीसरा और अहम किरदार हूँ, इतना अहम कि मेरे बगैर यह कहानी पूरी या अपने मुकम्मल अंजाम तक पहुंच ही नहीं सकती । तो मैं कौन हूं ? 

मैं वो हूँ जो इस कहानी के दोनों प्रमुख पात्रों की स्मृतियों को सजोयें निर्विकार भाव से कहानी को अपनी स्मृति में लिख रहा हूं। दोनों की स्मृतियां बना रहा हूं। सुन रहा हूं। 


     पहले किरदार ने अपनी या अपने बारे में लिख दी, और आगे भी लिखेगी। वह आरोप - पत्र भी तैयार कर दूसरे किरदार पर आरोपित भी करेगी। लेकिन उसके किसी भी आरोप का खंडन या जवाब देने के लिए वह हैं कहा ! वह तो जहा से आया था वही वापस लौट चुका है। लेकिन हाँ , उस पर लगाए जाने वाले सभी आरोपों के जवाब मेरी स्मृतियों में कैद हैं।  जब वह वापस लौट रहा था तो मैंने उससे पूछा था कि जब वह जनता हैं कि उसपर आरोप लगेंगे तो वह खुद अपने ऊपर लगने वाले सभी आरोपों के जवाब भी खुद ही देता जाये ? 

" नहीं , यदि मैं ऐसा करता हूँ तो मुझे पहले उसे बताना होगा कि मैं वास्तव में कौन हूँ ? कहा से आया हूँ ? और यदि मैं ऐसा करता हूँ, तो मैं उसे हमेशा के लिए खो दूंगा। वह यही की हो कर रह जाएगी और मैं फिर उससे कभी न मिल पाऊंगा  "

उसने बस इतना ही कहा था।

 फिर से मिल पाने की प्रत्येक संभावना को अपने साथ साथ ले  वह चुपचाप चला गया।  

जब तक आरोप तय नहीं किये जाते तब तक मैं अपनी स्मृतियों के उस भाग तक नहीं पहुंच पाऊंगा जहा उसके जवाब सुरक्षित हैं । इसलिए जरूरी हैं पहले आरोप-पत्र जारी हो  . . . 

कहानी की डोर मैं पुनः पहले किरदार को सौपता हूँ   . . . 

to be continued . . .

Shailendra S. 'Satna'


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