My Inception (Part-1)

     '' ऊर्जा को न तो उत्त्पन्न किया जा सकता और न हि नष्ट किया जा सकता है  '' - यह ऊर्जा का अक्षय सिद्धांत है। ऊर्जा का अक्षय होना आवश्यक है। इसी सिद्धांत के कारण ब्रम्भाण्ड में ऊर्जा का अक्षय भंडार है।  

    ऊर्जा का रूपांतरण किया तक सकता है, जैसे टरबाइन के घूमने पर विद्दुत उत्त्पन्न होना, वास्तव में मकेनिकल ऊर्जा का विद्दुत ऊर्जा में परिवर्तन होना है। यह सिध्दांत ठीक उसी तरह काम करता है जैसे हमारी आत्मा का सिध्दांत - ' आत्मा का न तो जन्म होता न हि उसका विनाश, वह एक शरीर को त्याग दूसरे शरीर को धारण करती है '- अर्थात ऊर्जा की तरह वह भी अजर-अमर है,  या फिर कह सकते है - ' आत्मा एक विशेष प्रकार की ऊर्जा है जो शरीर धारण करती है. ' - यदि ईश्वर के होने की अवधारणा को मान लिया जाये तो क्या  प्रकृत के सभी जीव ' वेल प्रोग्राम्ड ' उच्च कोटि के आर्टिफिशल इंटेलिजेंसी से युक्त एक रोबोट है ?  हो सकता है।  

    जब तक रोबोट का  बाहरी आवरण ' मटेरियल ' तंदुरस्त है तब तक  रोबोट चलेगा उसके बाद डेड। ऊर्जा को धारण करने में असमर्थ होने पर वह ऊर्जा ब्रम्भाण्ड में लीन हो जाएगी। रोबोट का  बाहरी आवरण/ ' मटेरियल ' को सुरक्षित रखने की सारी जद्दोजहद को हम नाम देते है - ' लाइफ सेविंग '. 

वास्तविकता क्या है ? देखना, छूना, या फिर महसूस करना। यही प्रश्न मैंने अपने बेटे से पुछा था। उसका सीधा - सपाट उत्तर - ' रियल्टी डस नॉट एक्सिस्ट -  Reality doesn't exist ' . पुछा था ' क्या है ' और  मिल गया एक सिद्धांत। 

    हवा, गर्मी , शर्दी कुछ भी जिन्हे हम न तो देख सकते है और न ही छू सकते है। उनके होने का केवल एहसास होता है।  वह भी एक ऊर्जा है जिसे आप केवल महसूस कर रहे होते है। 

    एक शोकाकुल विरह वेदना में लिप्त प्रेमी अपनी प्रेमिका को याद कर अपनी आँखे बंद कर उसे देख सकता है। उसकी वेदना में वह शक्ति है जो ब्रम्भाण्ड से ऊर्जा एकत्र कर उसकी  प्रेयषी का प्रतिबिम्ब 'रेटिना' में बना सकती है। हमें आभास या महसूस करने के लिए भी एक शक्ति चाहिए जो ऊर्जा को एकत्र कर सके - ' और उस वक्त उसके लिए वह शक्ति है वेदना जो उसे दृष्टि देती है। ' 

    अब और आगे बढ़ते है।  अपनी प्रेमिका से मिलने की उत्कंठा / लालसा लिए प्रेमी सो जाता है।  उसे स्वप्न होता है की उसकी प्रेमिका उससे मिलने आई है और भाव-विहल उसे गले लगा लेती  है।  

    उसका यूँ आना, उसके आंसू पोछना, दिलासा देना और फिर उसे गले लगा लेना, क्या वास्तविक है ? कोई भी कहेगा ' नहीं '. वास्तविक कहाँ यह तो सपना है। लेकिन नहीं उस स्वप्न की दुनिया में उस प्रेमी के लिए सब कुछ वास्तविक है, उसके लिए वही रियलिटी है। यहाँ तक की उसकी प्रेमिका की वास्तविक दुनिया, उसके प्रेमी के स्वप्न की दुनिया से अलग है जिस स्वपन का वह खुद एक हिस्सा है।  

    वास्तविकता वास्तव में समय , परिस्थित और खुद की समझ इत्यादि चीजों पर निर्भर करती है।  इसलिए यह निरपेक्ष नहीं सापेक्ष है, और जो सापेक्ष है वह एक भ्रम है जैसे की चलती बस में सवार व्यक्ति को रोड किनारे स्थित वस्तुओं के पीछे छूटने का भ्रम होना। कह सकते हैं की वास्तविकता एक भ्रम है जिसका कोई  अस्तित्व नहीं। 

    यदि दोनों एक ही तरह का स्वप्न देखते हैं तो ? अब दोनों के लिए एक ही वास्तविकता हैं, - ' एक  साथ होना '. जबकि दोनों के घर वालों के लिए वे अलग-अलग , अपने-अपने घरों में सो रहे हैं।  जब तक दोनों जागते नहीं हैं तब तक वे दोनों एक समानांतर संसार में रहेंगे।  यदि दोनों का स्वप्न कभी न  टूटे तो ? 

    शून्य आयाम से लेकर दशवें आयाम तक विचरण करने वाला असीमित शक्तियों का स्वामी होगा। जो एक ब्रम्भाण्ड के छोटे से छोटे कण से लेकर किसी दूसरे अनंत ब्रम्भाण्ड के छोटे से छोटे कण तक पहुंचने की क्षमता रखेगा, उसे क्या कहेंगे ? उसका न तो कोई आकर होगा न स्वरुप,  न तो वह उत्पन्न होगा न नष्ट , जिसे हम न देख सकेंगे न छु सकेगे। यहाँ तक की सामान्य परिस्थितियों में  हम उसे अहसास भी न कर पाएंगे।  उसके होने के एहसास मात्र के लिए मन में सूक्ष्म किन्तु बहुत ही उन्नत किस्म की प्रयोगशाला चाहिए। 

              - बड़ी बहन श्रीमती संतोष सिंह को सदर सर्पित 

शैलेन्द्र एस. 'सतना'


 

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