कुछ अफसानें प्यार के
खूब मर चुके हम मज़हब पे ,
आओ शायर बनाये,
कुछ ख़िदमतगारों को.
ये कौम है इंसानियत की
बाकी सब फलसफ़े ज़माने के.
नहीं पूछना है अब हाल-ए -दिल तुमसे,
कहने होंगे अब तुमको भी,
कुछ अफसानें प्यार के.।
हा, चलना ही होगा अब तुमको भी ,
नहीं रुकना किसी दर-ओ-दीवार पे।
खुद लिखने होंगे अब तुमको भी,
कुछ अफसानें प्यार के.।
शैलेन्द्र एस. 'सतना'
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