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माइलस्टोन का सच

माइलस्टोन के 4 पार्ट हैं। 1. माइलस्टोन 2. अलविदा 3. आह ! तुम कहां गए 4. अवतार      मैंने सोचा ही नहीं था कि मैं कभी माइलस्टोन लिखूंगा। लिखना और पढ़ना दोनों ही मैंने तकरीबन 10 साल पहले ही छोड़ दिया था। पहले भी कुछ छोटी-मोटी कहानियां ही लिखी थी।      वास्तव में माइलस्टोन के दो नहीं चार प्रमुख किरदार है। प्रथम व द्वितीय भाग माइलस्टोन व अलविदा में तीन किरदार है, नायक, नायिका और राइटर। जी हां राइट भी उसका एक किरदार ही हैं।       आह ! तुम कहां गए में एक किरदार है जो माइलस्टोन की नायिका किरदार का प्रतिरूप नहीं है।       वास्तव में माइलस्टोन की कहानी एक वृत्त (सर्किल)  है, और इसीलिए आप इसे किसी भी भाग से पढ़ना शुरू कर सकते हैं। और अंतिम भाग को पढ़ते ही आप खुद वहीं पहुंच जाएंगे जहां से आप ने शुरू किया था। इसकी कहानी एक लूपिंग है। अर्थात कभी न समाप्त होने वाला एक चक, एक वृतांत है।      इस कहानी के दो प्रमुख पात्र "किरदार"  और "आह ! तुम कहां गए" कि नायिका है। अब चूंकि किरदार एक ऊर्जा के रूप में अपने राइ...

शायद

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शायद, वो शख्स अब महफिलों में रहता है। न जाने कितने लोगों से घिरा रहता है। खुद हंसता है औरों को भी हंसता है। दिल में सपनों के नए दिये जलता है।  उसे शायद ही याद हो वो गुजरा जमाना, वो एक कमरा, वो एक दरवाजा। एक खिड़की, शोर मचाता हुआ कूलर, रोड और मोटर गाडियों का शोर, मुझे उसका बस देखते रहना, उसकी खामोश मोहब्बत का पढ़ना।  कभी वापस लौट जाने की जिद,  तो कभी बेवजह मुझ से उलझना।  रुठने पर मेरा उसको मनाना।  कहां याद होगा उसे वह गुजरा जमना। पर कभी सोचती हूँ कि शायद,  वह भी कभी सोचता होगा, मेरे कमरे के उस सूनेपन को, जो अब मेरे दिल में समा गया है। उसे याद करती मेरी आहों को, आंखो से सूख गए मेरे आंसुओं को। मेरे धड़कते दिल की धड़कन को, शायद वह भी महसूस करता होगा। पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा,  कुछ होता होगा, क्योंकि, वो शख्स अब महफिलों में रहता है। खुद हंसता है औरों को भी हंसता है। दिल में सपनों के नए दिये जलता है।  🩸 जो एक शाम जीनी थी, अब जी लो जरा। जो एक बात कहनी थी, अब कह दो जरा। जो एकबार रोना था लिपटकर, अब रो लो जरा। जो जाना था दूर मुझसे, अब जाओ भी या...

💓 माइलस्टोन ( सिंबल ऑफ लव) 💓 शैलेन्द्र एस., सतना (MP)

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माइलस्टोन (सितारों की  दुनियाँ - 2 ) ग़र निकलता अपनी मंजिल की तलाश में, तो अपनी दास्तां वहीं लिखता मेरे दोस्त ! पर यह तो है तुम्हारी यादों का सफर, मिलते हैं मील के पत्थर।  उन्हीं पत्थरों पर, दो दिलों के निशां छोड़ता हूं।  जो कभी तुम गुजरो किसी मंजिल की तलाश में, हां तब, तुम्हें ये निशां मेरी याद दिलाएंगे।  हमारी वफा, हमारी बेवफाई की दास्तां तुमको सुनाएंगे।  रहेंगे जब तक ये मोहब्बत के रास्ते,  चलते रहेंगे राही, गुजरते रहेंगे मुसाफिर।  अपने सीने पर लिए निशां,  मील के पत्थर तब भी यही रहेंगे। Shailendra S.  हां, मेरे राइटर ! इंसानी समझ उम्र की मोहताज कहां होती है ? यदि ऐसा है,, तो 17-अट्ठारह वर्ष की उम्र कम नहीं होती। उस लड़के को समझना चाहिए था कि मोहब्बत कभी मांगी नहीं जाती, उसका तो इजहार किया जाता है। उसे समझना चाहिए था कि मांगी हुई मोहब्बत कभी भी वापस करनी पड़ सकती है।     लेकिन नहीं, उसे तो उसकी आंखों में अपने लिए मोहब्बत दिखाई दी, वह ना कहेगी, इसीलिए तो उसने कहा था। उस वक्त तो उसने यही सोचा था कि वह तो उसके दिल की अधूरी बात ...