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Showing posts from September, 2021

तुम कहां गए ? 28

    हृदय के मानसरोवर में तुम्हारी मनमोहक पावन प्रांजली मूर्ति स्थापित करने के बाद अब उसी में विसर्जित करने का क्या समय आ गया है, मेरे दोस्त?     कर भी दूं तो कैसे ? फिर इस सुने मन में क्या शेष रह जायेगा ?      मैं नहीं जानती कि इस सृष्टि का अभ्युदय कब हुआ और उसका विनाश कब होगा। लेकिन वे पल मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है जो मैंने तुम्हारे साथ गुजारे या तुम्हारे निकट होते हुए भी तुमसे दूर रहकर।       तुमसे प्रथम मिलन का वह पल मेरे लिए कोई विस्मयकारी नहीं था। मुझे उत्तेजित नहीं कर पाया। और न ही आश्चर्यचकित करने वाला था। हो भी तो क्यों तुम जैसे साधारण व्यक्ति से मिलना विस्मयकारी, उत्तेजक और आश्चर्यचकित करने वाला कैसे हो सकता था भला !!     यह कैसे लिख दूं कि तुमने एक रिश्ते का परित्याग किया जबकि तुमने मुझसे कोई रिश्ता बनाया ही नहीं ; यह भी कैसे लिख दूं कि तुम मेरी नियति थे, मेरे भाग्य में लिखे थे! होते तो आज इतनी दूर कैसे चले जाते । तुमने त्याग किया और मैंने उसे स्वीकार किया। सहर्ष न सही आंखों में आंसू लेकर भी नहीं, लेकिन ...

तुम कहां गए ? 27

    लेकिन शायद उस दिन मैं तुम से अधिक खुद का ही उपहास कर रही होऊंगी। जब तुम ही ना रहोगे, तो फिर मेरी हंसी का क्या अर्थ रह जाता है? मैं तुम्हारी हंसी उड़ा कर तुम्हें विवश देखना चाहती हूं। हां सच कहूं तो मैं तुम्हें अपना जैसा बनते देखना चाहती हूं।      मैं एक आस लेकर एकटक तुम्हें देखते रहना चाहती हूं। और यह भी चाहती हूं कि तुम मुझे उसी तरह उपेक्षित करते रहो जैसा की मैंने कभी तुम्हें किया था, इतना ही विवश ! हां मेरे दोस्त।     तुम चाहकर भी मेरे किसी आस का उत्तर न दे सको, आगे बढ़ कर उसे स्वीकार न कर सको, न ही मुझे तुम गले से लगा सको। तो फिर जरा सोचो मेरे दोस्त, उस वक्त तुम्हारे दिल में क्या गुजरेगी?    बस मैं तुम्हें भी इतना ही विवश देखना  चाहती हूं, एकदम मजबूर। तब शायद उस दिन तुम्हें इस बात का एहसास होगा कि उस वक्त मेरी विवशता क्या रही होगी जब तुम किसी आस से मेरी तरफ देखते थे, और मैं तुम्हें उपेक्षित करने के लिए इतना ही मजबूर थी, जितना की उस वक्त तुम होगे? अब देखो न ! भूत, वर्तमान और भविष्य किस तरह एकाकार हो गए हैं !      हां...