तुम कहां गए ? 28
हृदय के मानसरोवर में तुम्हारी मनमोहक पावन प्रांजली मूर्ति स्थापित करने के बाद अब उसी में विसर्जित करने का क्या समय आ गया है, मेरे दोस्त? कर भी दूं तो कैसे ? फिर इस सुने मन में क्या शेष रह जायेगा ? मैं नहीं जानती कि इस सृष्टि का अभ्युदय कब हुआ और उसका विनाश कब होगा। लेकिन वे पल मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है जो मैंने तुम्हारे साथ गुजारे या तुम्हारे निकट होते हुए भी तुमसे दूर रहकर। तुमसे प्रथम मिलन का वह पल मेरे लिए कोई विस्मयकारी नहीं था। मुझे उत्तेजित नहीं कर पाया। और न ही आश्चर्यचकित करने वाला था। हो भी तो क्यों तुम जैसे साधारण व्यक्ति से मिलना विस्मयकारी, उत्तेजक और आश्चर्यचकित करने वाला कैसे हो सकता था भला !! यह कैसे लिख दूं कि तुमने एक रिश्ते का परित्याग किया जबकि तुमने मुझसे कोई रिश्ता बनाया ही नहीं ; यह भी कैसे लिख दूं कि तुम मेरी नियति थे, मेरे भाग्य में लिखे थे! होते तो आज इतनी दूर कैसे चले जाते । तुमने त्याग किया और मैंने उसे स्वीकार किया। सहर्ष न सही आंखों में आंसू लेकर भी नहीं, लेकिन ...