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तुम कहां गए -2

      तुम तो मेरे अपने थे। सच, अपना ही माना था तुम्हे । तुम जब भी मेरे सामने आए, मैं ठीक उसी तरह मिली, जैसा कि मैं थी। तुम्हारे सामने सज - संवर कर आने की दिल से कोई ख्वाइश न हुई। जैसी थी वैसे ही आई।           खुद की अपनी वह तस्वीर, कभी इतनी प्यारी ना लगी, जब तक तुम न लिख गए, 'हां! यही एक तस्वीर है मेरे पास' . . . कनखियों से छुप कर मुझे देखती आंखे, कानों में लटकती छोटी-छोटी बालियां, वजूद की सारी गर्मी समेटे हुए ये होठ, किसी के आने की आहट पा चुप हो गए हैं। गालों को छू लेने की, अधूरी लिए आस, सलीके से सवारे गए ये रेशमी बाल। नर्म मुलायम ये सिंदूरी गाल  । . . . . .       मैं आज भी जब कभी अपनी वह तस्वीर देखती हूं, तो तुम्हारी यही कविता याद आती है मुझे । यह तो सच है कि मैं तुम्हें कनखियों से ही देखा करती थी।        शायद पढ़ने की कोशिश करती थी कितनी सच्चाई है तुम में, और तुम्हारी इन आंखों में। कितनी चाहत है मेरे लिए ।     और न जाने क्यों मुझे हर बार यही महसूस होता कि तुम वह नहीं हो, जैसा कि तुम दिखन...