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Showing posts from November, 2021

मैं डिजिटल युग का

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मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विरह प्रेमी कवि हूं। तुम्हारे अनंत:पुर से, निष्कासित श्रापित यक्ष हूं। मेघ नहीं बिट से अपना, हाल-ए-दिल पहुंचाता हूं। तुम्हारी विरह वेदना में जब, ऑफ से ऑन हो जाता हूं। तब एक अक्षर लिखने को भी, एट बिट से एक बाइट बनाता हूं।। एमबी फिर जीबी भी, जब कम पड जाते हैं। तब चाहत से अपनी,  टेरा बाइट बनाता हूं। नेटवर्क कंजेक्शन और, व्यस्ततम रूट तुम्हारा। फिर भी अपना सन्देश,  तुम तक पहुंचाता हूं। जज़्बातों के छोटे-छोटे पैकेट कर, हर पैकेट में लिख दोनों का एड्रेस, फिर सभी को तुम्हें सेंड करता हूं। उनमें से कुछ तुम तक पहुंचे, कुछ कंजेक्शन में फंस के लौटे, आहों के रूटर से उनको, फिर री रूट दिखलाता हूं। ये क्रम यूं ही अनवरत चलता रहेगा, जब तक हर पैकेट तुम तक न पहुंचा दूं। क्योंकि ? मैं इस डिजिटल युग का, टेक्निकल विराह प्रेमी कवि हूं। मेघ नहीं बिट से तुम तक, अपनी विरह वेदना पहुंचाता हूं। Shailendra S. Mr. भूपेंद्र सिंह बघेल, सतना को सादर समर्पित।

गॉडफादर 2

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गॉडफादर 2 पापा !  लगभग 25 वर्ष की एक खूबसूरत सी लड़की होठों में गजब की मुस्कुराहट लिए सामने खड़ी थी। उसका संबोधन सुनकर वह चौक गया, " कौन ! कौन हो तुम !! "        वह कमरे में दाखिल होते हुए बोली, " पापा !! आपने मुझे पहचाना नहीं ...  मैं ... मैं खुशी हूं ... " " हा ..... खुशी .... तुम यहां !! इस वक्त !!  . ." , उसे एकाएक विश्वास ही न हुआ था खुशी कैसे हो सकती है वह तो . . . " हां पापा ! मैं ... आपकी बेटी ... " ,  ओह राइटर ! पिता के लिए बेटी के दिल की दीवानगी न पहचान पाये ? खून के रिश्ते ही सब कुछ नहीं होते, राइटर।      जलजले का वह दूसरा दिन था। मंजर और भी खौफनाक था। ताश के मानिंद धराशाही इमारतें और उनके मलबे में दबी अनगिनत लाशें, और जो बचे उनके करुण विलाप। दिल दहला देने वाले अविश्वसनीय दृश्य थे।      आलीशान कोठी के मलबे के ढेर के नीचे दबी लाशें अभी तक बाहर न निकाली जा सकी थी। बड़ी-बड़ी मशीने, क्रेन का भारी शोर-शराबा और उनके बीच वह स्तब्ध मौन खड़ा न रह सका। न रो लेने की क्षमता और न अपने आप को खुद समेट कर किसी ...